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प्रारंभ से पढें
पृथ्वीसेन द्वितीय के बाद प्रवरपुर पर बौद्धों का कब्जा हो गया। पैलेस को बौद्ध विहार
का रुप दे दिया गया। पैलेस के चारों ओर छोटी छोटी कुटिया बना दी गयी।
जिसमें बौद्ध साधू निवास करने लगे। बौद्ध धर्म से संबंधित शिक्षाएं दी जाने
लगी। बौद्ध धर्म की धार्मिक शिक्षाओं का केन्द्र बन गया। कहते हैं कि यहाँ
बोधिसत्व नागार्जुन ने कुछ समय निवास किया था। इसी किंवदंती के
सहारे बौद्धों ने जापान की सहायता से यहाँ पर उत्खनन करवाया। लेकिन उत्खनित
इतिहास तो बहुत दूर तक जाता है। कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।
वाकटक राजाओं का इतिहास एवं उनका महल भी निकल आया।
महल पर आज भी भूकंप के द्वारा विनाश के चिन्ह एवं नल राजाओं द्वारा जलाए जाने के चिन्ह दिखाई देते हैं। वीराने में प्रवरपुर का पैलेस अपने विध्वंस की गाथा स्वयं कहता है। बस इसे देखने एवं सुनने के लिए नजर होनी चाहिए। भग्नावेश से जाहिर होता है कि कभी यह स्थान भी अपनी बुलंदी पर रहा होगा। जहाँ बैठ कर राजा लोगों की किस्मत खरीदता होगा। प्रजा की किस्मत का लेखा-जोखा करता होगा। पर काल से आज तक कोई नहीं बच पाया। चाहे वह कितना ही बड़ा एवं कीर्तिवान क्यों न रहा हो। काल ने सबको धराशायी कर दिया। उससे बड़ा पहलवान ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं। इसलिए कहते हैं "द्वितीयोनास्ति"।
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| प्रवरपुर पैलेस पर विध्वंस के चिन्ह, अग्निदाह एवं भूकम्प का प्रमाण |
महल पर आज भी भूकंप के द्वारा विनाश के चिन्ह एवं नल राजाओं द्वारा जलाए जाने के चिन्ह दिखाई देते हैं। वीराने में प्रवरपुर का पैलेस अपने विध्वंस की गाथा स्वयं कहता है। बस इसे देखने एवं सुनने के लिए नजर होनी चाहिए। भग्नावेश से जाहिर होता है कि कभी यह स्थान भी अपनी बुलंदी पर रहा होगा। जहाँ बैठ कर राजा लोगों की किस्मत खरीदता होगा। प्रजा की किस्मत का लेखा-जोखा करता होगा। पर काल से आज तक कोई नहीं बच पाया। चाहे वह कितना ही बड़ा एवं कीर्तिवान क्यों न रहा हो। काल ने सबको धराशायी कर दिया। उससे बड़ा पहलवान ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं। इसलिए कहते हैं "द्वितीयोनास्ति"।
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| प्रवरपुर पैलेस के शिखर से दृश्यावलोकन |
राजा प्रवरसेन की नगरी मनसर (प्रवरपुर) से जब हम रामटेक
(रामटेकरी) की ओर बढे तो सूरज आग बरसा रहा था। प्यास बहुत जोरों से लग रही
थी। मनसर पैलेस में हमारे अलावा कोई दूसरा पर्यटक नहीं था। मनसर देखने का
आनंद अद्भुत था, इसी आनंद ने हमें भीषण गर्मी को झेलने लायक बना दिया।
अन्यथा सड़क पर कोई दिखाई नहीं देता था। गर्मी में सब अपने एसी और कुलर
चालु करके घरों के भीतर कैद थे। भूख भी जोरों की लग रही थी। सड़क के किनारे
एक होटल देख कर गाड़ी रोकी गयी। पर वहाँ कोई त्यौहार होने के कारण रसोईया
नहीं था। हम आगे बढ गए। महाराष्ट्र में लगभग हर होटल और ढाबे में परमिट बार
है। गरमी के मौसम को देख कर पुराने दिनों की याद आ गयी।
जब दो ठंडी बीयर उदरस्थ कर गर्मी कम कर ली जाती थी। शरीर लू के थपेड़े झेलने लायक हो जाता है। फ़िर तो आग में से भी निकला जा सकता था। लेकिन समय को देखते हुए अब हमें राजा बेटा बनना ही पड़ गया। ललक तो कभी-कभी जोर मार देती है। पर आत्मबल रोक लेता है। ललचाई नजरों से देखते रहे ठंडी बीयर लोगों को पीते हुए। हाय रे हमारी किस्मत! ये न थी हमारी किस्मत, विसाले बीयर होता…… :) जिल्ले इलाही ने सर पर शमशीर लटका रखी थी। जहाँ भी होटल के भीतर जाता था। शर्मा जी पीछे आ जाते थे। आखिर हमने ईरादा त्याग दिया और एक होटल में भोजन करने पहुंच गए।
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| हिडिम्बा टेकरी पर श्री सत्येन्द्र शर्मा एवं संध्या शर्मा जी |
जब दो ठंडी बीयर उदरस्थ कर गर्मी कम कर ली जाती थी। शरीर लू के थपेड़े झेलने लायक हो जाता है। फ़िर तो आग में से भी निकला जा सकता था। लेकिन समय को देखते हुए अब हमें राजा बेटा बनना ही पड़ गया। ललक तो कभी-कभी जोर मार देती है। पर आत्मबल रोक लेता है। ललचाई नजरों से देखते रहे ठंडी बीयर लोगों को पीते हुए। हाय रे हमारी किस्मत! ये न थी हमारी किस्मत, विसाले बीयर होता…… :) जिल्ले इलाही ने सर पर शमशीर लटका रखी थी। जहाँ भी होटल के भीतर जाता था। शर्मा जी पीछे आ जाते थे। आखिर हमने ईरादा त्याग दिया और एक होटल में भोजन करने पहुंच गए।
सुबह से लगभग 10 लीटर पानी पी
चुका था। एक लीटर पानी एक बार में अंदर हो जाता और आधे घंटे में भाप बनकर
उड़ जाता है। गर्मी के मारे बुरा हाल था। भोजन करके हम रामटेक के मंदिर की
ओर चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर स्थित है। रामटेकरी में प्रवेश द्वार के पहले
मोटरसायकिल एवं कार स्टैंड बना हुआ है। जहाँ गाड़ी खड़ी करने पर दस रुपए
प्रति वाहन की दर से वसुला जाता है। हमने यहां अपनी बाईक खड़ी की। सामने ही
ओ3म के आकार का कालीदास स्मारक बना हुआ है। मंदिर के मार्ग में यहाँ भी
बंदरों की सेना से सामना हुआ। रास्ते के दोनो तरफ़ पूजा के सामान एवं चना
चबेना की दुकानें लगी हुई हैं।
बेर को कूट कर बनाया गया "बोरकुट" बड़ी मात्रा में बिक रहा था। हमने 10 रुपए की एक थैली ली। जिसका स्वाद बढिया था। पहले जब घर में बेर सुखाते थे तो उनका मुठिया बनाया जाता था। जो खाई-खजानी के रुप में बच्चों का मन बहलाता था। अब वो दिन नहीं रहे। यहाँ बोरकुट देख कर उन दिनों की याद आ गयी। जब गाँव से दरोगा की डोकरी बोईर का मुठिया बनाकर लाती थी और हम उसका इंतजार करते थे। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप एक कब्र है जिसपर चादर चढाई हुई थी। यह कब्र किसकी थी और यहाँ क्यों मौजूद है? इसके विषय में कोई माकूल जानकारी नहीं मिली।
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| राम टेकरी के प्रवेश द्वार पर मजार |
बेर को कूट कर बनाया गया "बोरकुट" बड़ी मात्रा में बिक रहा था। हमने 10 रुपए की एक थैली ली। जिसका स्वाद बढिया था। पहले जब घर में बेर सुखाते थे तो उनका मुठिया बनाया जाता था। जो खाई-खजानी के रुप में बच्चों का मन बहलाता था। अब वो दिन नहीं रहे। यहाँ बोरकुट देख कर उन दिनों की याद आ गयी। जब गाँव से दरोगा की डोकरी बोईर का मुठिया बनाकर लाती थी और हम उसका इंतजार करते थे। मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप एक कब्र है जिसपर चादर चढाई हुई थी। यह कब्र किसकी थी और यहाँ क्यों मौजूद है? इसके विषय में कोई माकूल जानकारी नहीं मिली।
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| रामटेकरी के प्रवेश द्वार पर हेयर कटिंग सेलुन |
मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नाई ने सिट डाउन ओपन हेयर कंटिंग सेलून खोल
रखा है। जब हम पहुंचे तो वह एक व्यक्ति की दाढी मुड़ रहा था। मंदिर के
प्रथम दरवाजे पर भैरव और शिरपुर दरवाजा लिखा है। इस मंदिर को यहाँ गढ मंदिर
कहा जाता है। बलुआ पत्थर से निर्मित मंदिर में कोई विशेष कारीगरी एवं
अलंकरण नहीं दिखाई दिया। जैसा भोरमदेव, नकटा मंदिर जांजगीर में दिखाई देता
है। गढ मंदिर के चारों तरफ़ परकोटा बना हुआ है। मुख्यमंदिर बीच में बना है।
जहां फ़ोटो खींचने की मनाही है, लिखा था। मैने एक कोशिश की, पर पुजारी ने
रोक दिया।
मंदिर के भीतर एसी लगा हुआ है। भगवान भी गर्मी से बेहाल थे, तभी गर्मी से राहत दिलाने के लिए एसी का प्रबंध किया गया था। दिन भर की घुमक्कड़ी के कारन थकान हो गयी थी। मैने वहीं मंदिर के फ़र्श पर एक नींद लेने का विचार बनाया और सो गया। भोजन के नशे ने साथ दिया और एक घंटे की अच्छी नींद आई। जब नींद को आना हो तो मखमल के गद्दे की जरुरत नहीं पड़ती। कठोर चट्टान पर भी आ जाती है। एक घंटे के बाद जब नींद खुली तो तबियत एकदम फ़्रेश हो चुकी थी। बैटरी रिचार्ज हो चुकी थी।
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| गर्मी से बेहाल भगवान के लिए वाताकूलन की व्यवस्था |
मंदिर के भीतर एसी लगा हुआ है। भगवान भी गर्मी से बेहाल थे, तभी गर्मी से राहत दिलाने के लिए एसी का प्रबंध किया गया था। दिन भर की घुमक्कड़ी के कारन थकान हो गयी थी। मैने वहीं मंदिर के फ़र्श पर एक नींद लेने का विचार बनाया और सो गया। भोजन के नशे ने साथ दिया और एक घंटे की अच्छी नींद आई। जब नींद को आना हो तो मखमल के गद्दे की जरुरत नहीं पड़ती। कठोर चट्टान पर भी आ जाती है। एक घंटे के बाद जब नींद खुली तो तबियत एकदम फ़्रेश हो चुकी थी। बैटरी रिचार्ज हो चुकी थी।
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| भोंसला राजाओ द्वारा निर्मित प्रवेश द्वार |
मंदिर से बाहर आने पर सामने
विशालकाय वराह देव की मूर्ती दिखाई दी। वराह देव की इतनी बड़ी मूर्ति मैने
और कहीं दूसरी जगह नहीं देखी। वाकटक राजा धर्माभिमानी एवं सहिष्णु वृत्ति
के थे, रुद्रसेन द्वितीय की पट्टरानी प्रभावती सम्राट चंद्रगुप्त की बेटी
थी। प्रभावती गुप्त वैष्णव पंथ की अनुयायी थी। इसके पुत्र और पौत्रों ने
रामगिरि पर नृसिंह, त्रिविक्रम, वराह तथा गुप्तराम आदि मंदिरों का निर्माण
कराया। देवगिरि के यादव राजाओं ने यहाँ राम-लक्ष्मण मंदिरों का निर्माण
किया।
कहते हैं महानुभाव पंथ के निर्माता चक्रधर स्वामी ने यहां धर्मोपदेश किया। एक नजर पुन: गढ मंदिर पर डाल कर हमने वराह एवं नृसिंह मंदिर देखा। संध्या जी ने कालीदास स्मारक देखने की इच्छा जाहिर की। कालिदास स्मारक का निर्माण महाराष्ट्र सरकार द्वारा पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके साथ कहीं कोई प्राचीन कथानक जुड़ा हुआ नहीं है। नव निर्माण सुंदर है लेकिन देख-रेख के अभाव में खंडहर होने की आशंका है। स्मारक के मैदान की दूब सूख चुकी है। जिसके कारण यह उजड़े हुए चमन के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने सोचा था कि कालिदास से संबंधिक कुछ जानकारियाँ यहाँ पर प्राप्त होगी पर ऐसा कुछ नहीं था।
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| विष्णुअवतार वराह देव मंदिर |
कहते हैं महानुभाव पंथ के निर्माता चक्रधर स्वामी ने यहां धर्मोपदेश किया। एक नजर पुन: गढ मंदिर पर डाल कर हमने वराह एवं नृसिंह मंदिर देखा। संध्या जी ने कालीदास स्मारक देखने की इच्छा जाहिर की। कालिदास स्मारक का निर्माण महाराष्ट्र सरकार द्वारा पर्यटन को बढावा देने के उद्देश्य से किया गया है। इसके साथ कहीं कोई प्राचीन कथानक जुड़ा हुआ नहीं है। नव निर्माण सुंदर है लेकिन देख-रेख के अभाव में खंडहर होने की आशंका है। स्मारक के मैदान की दूब सूख चुकी है। जिसके कारण यह उजड़े हुए चमन के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने सोचा था कि कालिदास से संबंधिक कुछ जानकारियाँ यहाँ पर प्राप्त होगी पर ऐसा कुछ नहीं था।
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| राम लक्ष्मण मंदिर |
रामगिरि की पहाड़ियों बीच एक झील
है। जो सड़क से बहुत ही सुंदर दिखाई देती है। इसे अबांळा तालाब कहा जाता
है। इस तालाब की गणना स्थानीय प्रवित्र तीर्थ के रुप में की जाती है। इस
तालाब का जीर्णोद्धार एवं इसके किनारे मंदिरों का निर्माण भोसलें राजाओं ने
किया था। तालाब के चारों तरफ़ बने हुए मंदिर माला में गुंथे हुए मनकों की
तरह सुंदर दिखाई देते हैं। तालाब के चारों तरफ़ बस्ती बसी हुई है। यहाँ
पंडों के स्थाई निवास है। विभिन्न जातियों ने अपने समाज की सुविधा की
दृष्टि से धर्मशालाएं एवं ठहरने का स्थान बना रखा है।
मृत्योपरांत यहाँ कर्मकांड एवं पिंडदान किए जाते हैं। भोजन भट्ट पंडे यहीं मिल जाते हैं, बस उन्हे नगद दे दीजिए फ़िर सारी व्यवस्था यहीं हो जाती है। इस तालाब में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा प्रवेश द्वार है। मेरे कैमरे की बैटरी चुक गयी थी। आज दिन भर में बहुत अधिक चित्र ले लिए थे। इसलिए इस स्थान के सीमित ही चित्र मिले। अबांळा तालाब से जब हम वापस हो रहे थे तो सूर्यास्त हो रहा था। पहाड़ियों के बीच से अस्ताचल की ओर जाता सूरज कह रहा था कि - मैने तुम्हे बहुत तपा दिया। पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो अभी तक घुमक्कड़ी कर रहे है। मै तो थक गया, अब चलता हूँ आराम करने। तुम जो चाहे करो तुम्हारी मर्जी, पर आज की लड़ाई तुम जीत चुके हो।
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| कालिदास स्मारक पर सूर्यास्त का विहंगम दृश्य |
मृत्योपरांत यहाँ कर्मकांड एवं पिंडदान किए जाते हैं। भोजन भट्ट पंडे यहीं मिल जाते हैं, बस उन्हे नगद दे दीजिए फ़िर सारी व्यवस्था यहीं हो जाती है। इस तालाब में प्रवेश करने के लिए एक बड़ा प्रवेश द्वार है। मेरे कैमरे की बैटरी चुक गयी थी। आज दिन भर में बहुत अधिक चित्र ले लिए थे। इसलिए इस स्थान के सीमित ही चित्र मिले। अबांळा तालाब से जब हम वापस हो रहे थे तो सूर्यास्त हो रहा था। पहाड़ियों के बीच से अस्ताचल की ओर जाता सूरज कह रहा था कि - मैने तुम्हे बहुत तपा दिया। पता नहीं तुम किस मिट्टी के बने हो जो अभी तक घुमक्कड़ी कर रहे है। मै तो थक गया, अब चलता हूँ आराम करने। तुम जो चाहे करो तुम्हारी मर्जी, पर आज की लड़ाई तुम जीत चुके हो।
हमने रामगिरि तीर्थ से विदा ली और
चल पड़े नागपुर की ओर सपाटे से। क्योंकि जितनी दूर आ गए, उतनी दूर हमें
लौटना भी था। मनसर एवं रामटेक की यात्रा शर्मा दंपत्ति के साथ आनंदायी रही।
वापसी में कामठी की रेल्वे क्रांसिग के पास से मैं साथियों से आगे निकल
गया। तभी मेरा मोबाईल बजा, शर्मा जी कह रहे थे कि वापस लौट आओ। उनकी गाड़ी
बंद हो गयी थी। वापस लौटने पर देखा कि उनकी गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही
है। वे पास ही मिस्त्री ढूंढने गए, हम वहीं खड़े रहे।
बाईक में पिस्टन प्रेसर ही नहीं बना रहा था। जिससे किक लगे और वह स्टार्ट हो। मिस्त्री ने मगजमारी कर ली। अब लगा कि बाईक यहीं मिस्त्री के पास ही छोड़ कर जाना पड़ेगा। चलो एक बार धक्का मारकर चालु करने का प्रयास कर लिया जाए। धक्का मारने पर बाईक स्टार्ट हो गयी। एक बारगी चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। रात के नौ बज रहे थे। घर पहुंचने की भी जल्दी थी। बाईक ने फ़िर साथ नहीं छोड़ा। घर पहुचा कर ही दम लिया। इस तरह महाराष्ट्र के मनसर एवं रामटेक के प्राचीन स्थल की सैर निर्विघ्न सम्पन्न हुई। ( यात्रा-सम्पन्न)
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| पहाड़ी से अंबाळा तालब का दृश्य |
बाईक में पिस्टन प्रेसर ही नहीं बना रहा था। जिससे किक लगे और वह स्टार्ट हो। मिस्त्री ने मगजमारी कर ली। अब लगा कि बाईक यहीं मिस्त्री के पास ही छोड़ कर जाना पड़ेगा। चलो एक बार धक्का मारकर चालु करने का प्रयास कर लिया जाए। धक्का मारने पर बाईक स्टार्ट हो गयी। एक बारगी चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। रात के नौ बज रहे थे। घर पहुंचने की भी जल्दी थी। बाईक ने फ़िर साथ नहीं छोड़ा। घर पहुचा कर ही दम लिया। इस तरह महाराष्ट्र के मनसर एवं रामटेक के प्राचीन स्थल की सैर निर्विघ्न सम्पन्न हुई। ( यात्रा-सम्पन्न)
https://www.evivek.com/Encyc/2023/2/11/Magnificent-religious-places-in-Vidarbha.html
विदर्भातील वैभवसंपन्न धार्मिक स्थळे
विवेक मराठी 11-Feb-2023
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विदर्भातील अभयारण्यातील जीवविविधता पाहण्यासाठी अनेक पर्यटक पसंती दर्शवितात. तसेच या ठिकाणी धार्मिक स्थळेदेखील पाहण्यासारखी आहेत. या धार्मिक स्थळांना ऐतिहासिक वारशाचे कोंदण लाभले आहे.
vivek
विदर्भ हा प्रदेश निसर्गसौंदर्याने नटलेला आहे. या ठिकाणी जीवविविधता, खाणींचा खजिना, नदी, खोरी आहेत आणि त्याबरोबर अभयारण्याने येथील पर्यटनात आणखीनच भर घातली आहे. या ठिकाणी धार्मिक स्थळेदेखील पाहण्यासारखी आहेत. मग, या धार्मिक स्थळांबरोबर विदर्भातील काही वारसा स्थळांबाबत आपण जाणून घेणार आहोत.
एकमेवाद्वितीय मार्कांडा - गडचिरोली
काही स्थानांवर गेल्यावर तेथील विलक्षण कलाकृती प्रेमातच पाडते, असेच एकमेवाद्वितीय मार्कंडा आहे. आपल्यापैकी बरेच जण या स्थानी गेले असतील. अतिशय सुंदर, रम्य, शांत ठिकाण म्हणून आपण नागपूरहून एका दिवसात जाऊन येऊ शकतो. नागपूरपासून 190 कि.मी. दूर असलेले एक गाव आहे. ते वैनगंगा नदीच्या काठावर वसलेले आहे. या गावाजवळ दक्षिणवाहिनी वैनगंगा वळसा घेऊन उत्तरवाहिनी होते आणि यासाठी याचे आगळेवेगळे असे महत्त्व आहे.
भारतीय संस्कृतीमध्ये नद्यांना खूप महत्त्व आहे. पाण्याच्या ठिकाणी असणारी जीवन धारण करण्याची क्षमता भारतीय संस्कृतीने निर्विवादपणे मान्य केली आहे. म्हणूनच आपल्या पवित्र स्थानांना आपण ’तीर्थक्षेत्र’ म्हणतो. नदी, त्यातही उत्तरवाहिनी म्हणजे अत्यंत पवित्र मानली जाते. अशा उत्तरवाहिनी नद्यांच्या काठावर अनेक तीर्थक्षेत्रे विकसित झालेली दिसतात. मार्कंडा हे असेच एक तीर्थक्षेत्र आहे. मार्कंडेय ऋषींची तपोभूमी म्हणून आज मार्कंडा ओळखले जाते. येथील सर्व लहान-मोठी मंदिरे एकाच नागर शैलीतील आहेत.
साधारणपणे इ.स. 1873-75पर्यंतच्या काळात सर कनिंगहॅम यांनी सर्वप्रथम या मंदिरांकडे जगाचे लक्ष वेधले. आज मार्कंडा हे देवस्थान विदर्भात गडचिरोली जिल्ह्यातील चामोर्शी तालुक्यात आहे. संथपणे वाहणारी उत्तरवाहिनी वैनगंगा आणि तिच्या तिरावरची अप्रतिम स्थापत्यशैली असलेली ही मंदिरे बघताक्षणीच मनाला भुरळ घालणारी आहेत. या देवळांपैकी मार्कंडेय ऋषींचे देऊळ, यमधर्माचे आणि महादेवाचे मंदिर हे उत्कृष्ट शिल्पकृतीचे नमुने आहेत. अत्यंत बारीक नक्षीदार कलाकुसर हे या मंदिरांचे वैशिष्ट्य आहे. मानवी जीवनाच्या विविध छटांचे आणि अनुभवांचे मूर्तिमंत चित्रण या मंदिरांमध्ये करण्यात आले आहे. मानवी आकृत्या चितारताना चेहर्यावरचे हावभाव ठळकपणे चित्रित केले आहेत. कलावंतांनी जीवनाचा सर्व अंगांनी केलेला विचार बघून आपण थक्क होतो. आवर्जून प्रत्यक्ष बघावे असेच हे स्थान आहे.
vivek
केवल नृसिंह - रामटेक
वाकाटक म्हणजे महाराष्ट्राच्या सांस्कृतिक, राजकीय आणि धार्मिक इतिहासात क्रांती घडवणारे प्राचीन राजघराणे होते. या राजघराण्याच्या दोन शाखा होत्या - एक नंदिवर्धन (नगरधन, नागपूर) आणि दुसरी शाखा वत्सगुल्म (वाशीम). पूर्व विदर्भ, मध्य प्रदेश आणि छत्तीसगडच्या भागावर याच नंदिवर्धन शाखेने राज्य केले. ही शाखा तशी फार प्रबळ होती. सद्य:स्थितीत महाराष्ट्रातील सर्वात प्राचीन मंदिर बांधणारे हे घराणे होते.
नागपूरपासून जवळपास 40 कि.मी. अंतरावर असणार्या आणि भोसल्यांच्या स्थापत्यकलेने नटलेल्या रामटेक शहरातील वाकाटकांच्या खुणा असलेल्या पुरातन केवल नृसिंह मंदिर आहे.
रामटेक आणि मनसर या दोन ठिकाणी वाकाटकांच्या धार्मिक विविधतेची झलक आपल्याला पाहावयास मिळते. रामटेक येथे असणारे केवल नृसिंह मंदिर, रुद्र नृसिंह मंदिर, वराह मंदिर, त्रिविक्रम मंदिर ही महाराष्ट्रातील आद्य-वैष्णवांची ठळक उदाहरणे म्हणून पाहिली जातात. आपण नरसिंहाची अनेक प्रकारची शिल्पे पाहिली असतील, पण केवल नृसिंह हे त्यातील एक दुर्मीळ शिल्प आहे. आवर्जून बघावे असेच हे मंदिर आहे.
vivek
कापूर बावडी - रामटेक
विदर्भात अनेक प्राचीन ऐतिहासिक वास्तू आहेत. काही जतन करून ठेवल्या आहेत, काही पडायला आलेल्या आहेत. अशीच एक वास्तू बघण्याचा योग आला, तिचे नाव आहे ‘कापूर बावडी’. रामेटकपासून साधारणपणे 5-6 कि.मी. अंतरावर असलेले निसर्गाच्या सानिध्यात असलेलं ठिकाण ‘कापूर बावडी’. प्रसिद्ध जैन मंदिराजवळच असलेले हे ठिकाण प्रत्येकाला आवडेल असेच आहे. रामटेक तसे प्राचीन स्थान आहे. आता मनसरच्या जागतिक उत्खननाने या रामटेकची आणखी एक वेगळीच ओळख निर्माण झाली आहे.
आता बावडी म्हणजे बाहुली अर्थात विहीर. गडावरदेखील अशीच एक बाहुली आहे. तीसुद्धा अशीच भव्य आहे. गडावरील बाहुलीचे नाव आहे ‘लोपामुद्रा बाहुली’. लोपामुद्रा म्हणजे अगस्त्य ऋषींची पत्नी. साधारणपणे 4000 वर्षांपूर्वी दक्षिण भारतात आर्यांची संस्कृती सरकली. त्याचा पहिला टप्पा म्हणजे रामटेक. विदर्भात ‘कलचुरी’ नावाचे राजे होऊन गेले. त्यांनी ही बाहुली बांधली, म्हणून त्याचा अपभ्रंश होत होत त्याचे नाव कापूर बावडी असे पडले.
दैत्यसूदन मंदिर - लोणार
जगप्रसिद्ध लोणार सरोवरासोबतच लोणारमध्ये एक अपरिचित, प्राचीन पण तितकीच सुंदर वास्तू उभी आहे, ती म्हणजे दैत्यसूदन मंदिर. आज जगात असलेल्या तीन उल्कापाती सरोवरांतील एक विदर्भात बुलढाणा जिल्ह्यात लोणार या गावी आहे. असे म्हणतात की, अमेरिकेत अॅरिझोना, आफ्रिकेत बोत्सवाना व रशियात सैबेरिया येथे अशी सरोवरे आहेत. भारतात ते विदर्भात आहे. या उल्कापाती सरोवरामुळे लोणार हे गाव आणि लोणार सरोवर जगन्मान्य झाले आहे आणि त्याच्याच जवळ हे दैत्यसूदन मंदिर आहे.
लोणार सरोवराच्या परिसरात अनेक प्राचीन मंदिरे पाहायला मिळतात. दैत्यसूदन मंदिर हे त्यातले सर्वात उत्कृष्ट आणि विलक्षण सुंदर आहे. नागपूरहून 400 कि.मी. इतक्या लांबचा प्रवास करून इथे यायचे म्हणजे एक साहसच होते. पण मंदिर पाहिल्यावर मिळणार्या समाधानात इथे येण्याचे सार्थक होते. आपल्या पूर्वजांनी केलेल्या शिल्पांचे नक्षीकाम बघून अभिमान वाटतो आणि नकळत हात जोडले जातात. इतिहासाची साक्ष देणारे हे मंदिर आजही दिमाखात उभे आहे. विलक्षण अद्भुत स्थापत्यरचना, नाजूक कोरीवकाम, उत्कृष्ट शिल्पकला, शिल्पांचे वैविध्य, त्यावरील भाव हे आपल्या प्रगत प्राचीन भारतीय कलेचा परिचय देत दैत्यसूदन मंदिर आज उभे आहे. हे सगळे पाहत असताना आणि पुढे कितीही वेळा पाहिले, तरी मन भरत नाही. आवर्जून बघावे असेच मंदिर म्हणजे दैत्यसूदन मंदिर.
जगदीश्वर महादेव मंदिर - अंभोरा
नागपूर-भंडारा रस्त्यातील हे अत्यंत रमणीय ठिकाण अंबानगरी अर्थात अंभोरा आहे. अंभोरे गावात अतिउंच कडा असून याच पार्श्वभूमीवर त्यास कोलासुरानचे पहाड म्हणतात. आकाशात झेप घेणारे पक्षी हमखास सरळ चैतन्येश्वराच्या प्राचीन मंदिराच्या छतावर येऊन स्थिरावतात. अंभोरा हे देवस्थान वैनगंगा, कन्हान, आंब, मुर्जा, कोलारी या पाच नद्यांच्या संगमावर वसलेले आहे, त्यामुळे निसर्गसौंदर्याच्या आणि सांस्कृतिक दृष्टीने हे ठिकाण वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. भरगच्च पसरलेली झाडी, नद्यांचे विस्तृत पात्र, मऊशार रुपेरी वाळू आणि थोड्या अंतरावर टेकडीला वळसा घालून चंद्राकार झालेली आंब नदी आणि या निसर्गसौंदर्याने वेढलेले महादेवाचे मंदिर बघताच सर्व दु:ख विसरायला लावणारे आहे. कदाचित म्हणूनच इथल्या महादेवाचे नावही चैतन्येश्वर आहे. कारण चैतन्य इथल्या कणाकणात ठासून भरल्याचे बघताक्षणीच जाणवते.
अंभोरा येथे पाच नद्यांचा संगम, मुकुंदराजाची समाधी, चैतन्येश्वरांचे पितळी कळस, धर्मशाळा, भूगर्भाचा तुटलेला कडा, नद्यांचे पाणी आणि घनदाट अरण्य असे निसर्गाचे अद्भुत दर्शन होते. या अंभोरा नगरीचे प्राचीन नाव अंबनगरी, त्याची झाली अंबानगरी व आता आपण तिचे आधुनिक नाव ठेवले श्रीक्षेत्र अंभोरा आहे. आपल्या मायमराठीचे आद्य ग्रंथ समजतात ज्ञानदेवांची ज्ञानेश्वरी. पण या ज्ञानेश्वरी ग्रंथाच्या 100 वर्षे आधी आपल्या विदर्भातील एका विद्वानाने ‘विवेकसिंधू’ नावाचा ग्रंथ लिहिला. त्या विद्वानाचे नाव आहे मुकुंदराज. ते एका अर्थाने मराठीचे आद्य ग्रंथकार ठरतात. श्री क्षेत्र अंभोरा ही त्यांची भूमी आहे. अंभोर्यात अनेक पुरातन अवशेष आहेत. पूर्व दिशेच्या उंच कड्यावर असलेल्या श्रीचैतन्येश्वरांचे देऊळ त्या सर्व पुरावशेषात सर्वोत्तम असेच आहे. अंभोरा हे एका अर्थाने पाच नद्यांच्या संगामावरील बेट असून त्याच्या मध्यभागी पूर्व दिशेस उंच जाणार्या पायर्यांनी वर चढत गेलो की, आपण त्या प्राचीन मंदिरात पोहोचतो. वरच्या माथ्यावरून जो निसर्गसौंदर्याचा देखावा दिसतो, तो शब्दांच्या पलीकडचा आहे.
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रुक्मिणी मंदिर - महाल - नागपूर
नागपूर शहराचा इतिहास, श्रीमंत राजे भोसले राजवंश व गोंड राजवंश यांच्या भोवतीचा आहे. या उभय राजवंशांनी नागपूरचे वैभव उभे केले होते. त्यातही विशेषत: द्वितीय रघुजी भोसले महाराजांच्या कारकिर्दीत नागपूरचा दर्जा सुशोभित अशा दिल्ली शहरासारखा होता. त्या वेळी बागबगिचे, पेठा, राजवाडे, मंदिर, मठ, स्थापत्य, स्मारक, स्तंभ यांच्या उभारणीची त्यांनी झपाट्याने सुरुवात केली होती. त्यातील त्यांनी बांधलेली मंदिरे आजही या सगळ्या वैभवाची साक्ष देत उभे आहे.
श्रीमंत भोसले यांचे मंदिरस्थापत्य हा एक स्वतंत्र विषय आहे. पण त्यालाही मर्यादा आहे. नागपूर शहरातील भोसल्यांनी बांधलेल्या या मंदिरात भोंडा महादेव, पार्डीचे श्रीकृष्ण मंदिर, सोनेगावचे मधुसूदन मंदिर, सक्करदर्याचे श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर, महालातील असंख्य मंदिरे यांचा समावेश होतो. या सर्व मंदिराच्या स्थापत्याचा मुकुटमणी ठरावे असे महालातील श्रीरुक्मिणी मंदिर आहे. हे मंदिर अक्षरश: डोळ्यांचे पारणे फेडणारे आहे. गांधी गेट ते बॅ. अभ्यंकर पुतळ्याच्या मधोमध ही स्थापत्यकृती आहे, प्रवेशद्वार कमानी असून त्या काळी बाजूच्या ओट्यावर द्वारपाल असत. त्यात हे मंदिर आपल्या पूर्ण वैभवाने ऊन-वारा-पाऊस यांची तमा न बाळगता आजही दिमाखात उभे आहे.
नागपूरमधील हे मंदिर म्हणजे स्थापत्यकृती, शिल्पप्रतिमा व सुशोभन यांचा परमोच्च बिंदू आहे. श्रीमंत राजे भोसल्यांनी साधारणपणे काही वर्षांपूर्वी ओरिसा, छत्तीसगड, बिहार व बंगाल जिंकला. साहजिकच तेथील कारागीर, शिल्पकार, मूर्ती कोरणारे स्थापती, तंत्रज्ञ, देवळे बांधणारे त्या वेळी नागपूरला आले आणि स्वाभाविकच नागपूरच्या अनेक मंदिरस्थापत्यावर ओरिसा-छत्तीसगड स्थापत्याचा प्रभाव जाणवतो. श्रीरुक्मिणी मंदिर असेच आहे. श्रीमंत राजे भोसले यांच्या राजवाड्यास अगदी लागून असलेले हे मंदिर आहे. महाराष्ट्राच्या शिल्पपरंपरेपेक्षा वेगळे स्थान असलेल्या श्रीरुक्मिणी मंदिरात संगमरवराचा गरुड मंडप असून त्यावर राजस्थानच्या कारागीरांचा प्रभाव जाणवतो. आवर्जून बघावे असे अप्रतिम मुरलीधर मंदिर आहे.
श्री मधुसूदन मंदिर - सोनेगाव - नागपूर
नागपूरातील मधुसूदन मंदिर बरेच दिवस एकांतात असेच होते. सोनेगाव विमानतळ भागात असल्याने कुणी सहसा तेथे जात नसे. पण आता विमानतळावर जाण्यासाठी नवा रस्ता येथून सुरू झाल्यामुळे ही वास्तू सहज नजरेत भरणारी आहे. या वास्तुकलेचे वेगळेपण म्हणजे दगडी बांधणी. अनेक प्रकारच्या जाळीने नक्षीदार व कुठली तरी कल्पना साकारल्यासारखी दिसतात. या मंदिरात मुधुसूदन रूपातील श्रीकृष्णाबरोबर रुक्मिणी आणि सत्यभामा आहेत आणि हे खूप कमी ठिकाणी बघायला मिळते.
कमलपुष्पासारखे शिखर असलेला सुरेख व टुमदार राजस्थानी थाटाचा गरुड मंडप पाहतच राहावा असा आहे. त्यात श्री नासिकाग्र मुद्रेचा टोकदार गरुड म्हणजे एक दिव्य अनुभवच आहे. मंडपाचा आकार चौकानी असून सभोवताल सज्जा आहे. त्यावर कमळकलिकांची खास मराठा शैलीतील महिरप असून तीदेखील सुशोभित आहे. उंच उंच होत जाणारी ही मंदिर मालिका म्हणजे श्रीमंत भोसल्यांनी भारतीय शिल्पपरंपरेवर केलेले खूप मोठे स्थापत्य उपकारच ठरतात आणि आजही इतके वर्षे होऊनसुद्धा ती वैभवाने उभी आहेत. वारा, पाऊस आणि वादळ यांचे अनेक तडाखे बसूनसुद्धा ही ऐतिहासिक वास्तू दिमाखात उभी आहे. नक्कीच एकदा तरी बघायला हवे असे हे मुधुसूदन मंदिर आहे.
https://www.evivek.com/Encyc/2023/2/11/Magnificent-religious-places-in-Vidarbha.html
विवेक मराठी 11-Feb-2023
विदर्भातील अभयारण्यातील जीवविविधता पाहण्यासाठी अनेक पर्यटक पसंती दर्शवितात. तसेच या ठिकाणी धार्मिक स्थळेदेखील पाहण्यासारखी आहेत. या धार्मिक स्थळांना ऐतिहासिक वारशाचे कोंदण लाभले आहे.
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विदर्भ हा प्रदेश निसर्गसौंदर्याने नटलेला आहे. या ठिकाणी जीवविविधता, खाणींचा खजिना, नदी, खोरी आहेत आणि त्याबरोबर अभयारण्याने येथील पर्यटनात आणखीनच भर घातली आहे. या ठिकाणी धार्मिक स्थळेदेखील पाहण्यासारखी आहेत. मग, या धार्मिक स्थळांबरोबर विदर्भातील काही वारसा स्थळांबाबत आपण जाणून घेणार आहोत.
एकमेवाद्वितीय मार्कांडा - गडचिरोली
काही स्थानांवर गेल्यावर तेथील विलक्षण कलाकृती प्रेमातच पाडते, असेच एकमेवाद्वितीय मार्कंडा आहे. आपल्यापैकी बरेच जण या स्थानी गेले असतील. अतिशय सुंदर, रम्य, शांत ठिकाण म्हणून आपण नागपूरहून एका दिवसात जाऊन येऊ शकतो. नागपूरपासून 190 कि.मी. दूर असलेले एक गाव आहे. ते वैनगंगा नदीच्या काठावर वसलेले आहे. या गावाजवळ दक्षिणवाहिनी वैनगंगा वळसा घेऊन उत्तरवाहिनी होते आणि यासाठी याचे आगळेवेगळे असे महत्त्व आहे.
भारतीय संस्कृतीमध्ये नद्यांना खूप महत्त्व आहे. पाण्याच्या ठिकाणी असणारी जीवन धारण करण्याची क्षमता भारतीय संस्कृतीने निर्विवादपणे मान्य केली आहे. म्हणूनच आपल्या पवित्र स्थानांना आपण ’तीर्थक्षेत्र’ म्हणतो. नदी, त्यातही उत्तरवाहिनी म्हणजे अत्यंत पवित्र मानली जाते. अशा उत्तरवाहिनी नद्यांच्या काठावर अनेक तीर्थक्षेत्रे विकसित झालेली दिसतात. मार्कंडा हे असेच एक तीर्थक्षेत्र आहे. मार्कंडेय ऋषींची तपोभूमी म्हणून आज मार्कंडा ओळखले जाते. येथील सर्व लहान-मोठी मंदिरे एकाच नागर शैलीतील आहेत.
साधारणपणे इ.स. 1873-75पर्यंतच्या काळात सर कनिंगहॅम यांनी सर्वप्रथम या मंदिरांकडे जगाचे लक्ष वेधले. आज मार्कंडा हे देवस्थान विदर्भात गडचिरोली जिल्ह्यातील चामोर्शी तालुक्यात आहे. संथपणे वाहणारी उत्तरवाहिनी वैनगंगा आणि तिच्या तिरावरची अप्रतिम स्थापत्यशैली असलेली ही मंदिरे बघताक्षणीच मनाला भुरळ घालणारी आहेत. या देवळांपैकी मार्कंडेय ऋषींचे देऊळ, यमधर्माचे आणि महादेवाचे मंदिर हे उत्कृष्ट शिल्पकृतीचे नमुने आहेत. अत्यंत बारीक नक्षीदार कलाकुसर हे या मंदिरांचे वैशिष्ट्य आहे. मानवी जीवनाच्या विविध छटांचे आणि अनुभवांचे मूर्तिमंत चित्रण या मंदिरांमध्ये करण्यात आले आहे. मानवी आकृत्या चितारताना चेहर्यावरचे हावभाव ठळकपणे चित्रित केले आहेत. कलावंतांनी जीवनाचा सर्व अंगांनी केलेला विचार बघून आपण थक्क होतो. आवर्जून प्रत्यक्ष बघावे असेच हे स्थान आहे.
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केवल नृसिंह - रामटेक
वाकाटक म्हणजे महाराष्ट्राच्या सांस्कृतिक, राजकीय आणि धार्मिक इतिहासात क्रांती घडवणारे प्राचीन राजघराणे होते. या राजघराण्याच्या दोन शाखा होत्या - एक नंदिवर्धन (नगरधन, नागपूर) आणि दुसरी शाखा वत्सगुल्म (वाशीम). पूर्व विदर्भ, मध्य प्रदेश आणि छत्तीसगडच्या भागावर याच नंदिवर्धन शाखेने राज्य केले. ही शाखा तशी फार प्रबळ होती. सद्य:स्थितीत महाराष्ट्रातील सर्वात प्राचीन मंदिर बांधणारे हे घराणे होते.
नागपूरपासून जवळपास 40 कि.मी. अंतरावर असणार्या आणि भोसल्यांच्या स्थापत्यकलेने नटलेल्या रामटेक शहरातील वाकाटकांच्या खुणा असलेल्या पुरातन केवल नृसिंह मंदिर आहे.
रामटेक आणि मनसर या दोन ठिकाणी वाकाटकांच्या धार्मिक विविधतेची झलक आपल्याला पाहावयास मिळते. रामटेक येथे असणारे केवल नृसिंह मंदिर, रुद्र नृसिंह मंदिर, वराह मंदिर, त्रिविक्रम मंदिर ही महाराष्ट्रातील आद्य-वैष्णवांची ठळक उदाहरणे म्हणून पाहिली जातात. आपण नरसिंहाची अनेक प्रकारची शिल्पे पाहिली असतील, पण केवल नृसिंह हे त्यातील एक दुर्मीळ शिल्प आहे. आवर्जून बघावे असेच हे मंदिर आहे.
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कापूर बावडी - रामटेक
विदर्भात अनेक प्राचीन ऐतिहासिक वास्तू आहेत. काही जतन करून ठेवल्या आहेत, काही पडायला आलेल्या आहेत. अशीच एक वास्तू बघण्याचा योग आला, तिचे नाव आहे ‘कापूर बावडी’. रामेटकपासून साधारणपणे 5-6 कि.मी. अंतरावर असलेले निसर्गाच्या सानिध्यात असलेलं ठिकाण ‘कापूर बावडी’. प्रसिद्ध जैन मंदिराजवळच असलेले हे ठिकाण प्रत्येकाला आवडेल असेच आहे. रामटेक तसे प्राचीन स्थान आहे. आता मनसरच्या जागतिक उत्खननाने या रामटेकची आणखी एक वेगळीच ओळख निर्माण झाली आहे.
आता बावडी म्हणजे बाहुली अर्थात विहीर. गडावरदेखील अशीच एक बाहुली आहे. तीसुद्धा अशीच भव्य आहे. गडावरील बाहुलीचे नाव आहे ‘लोपामुद्रा बाहुली’. लोपामुद्रा म्हणजे अगस्त्य ऋषींची पत्नी. साधारणपणे 4000 वर्षांपूर्वी दक्षिण भारतात आर्यांची संस्कृती सरकली. त्याचा पहिला टप्पा म्हणजे रामटेक. विदर्भात ‘कलचुरी’ नावाचे राजे होऊन गेले. त्यांनी ही बाहुली बांधली, म्हणून त्याचा अपभ्रंश होत होत त्याचे नाव कापूर बावडी असे पडले.
दैत्यसूदन मंदिर - लोणार
जगप्रसिद्ध लोणार सरोवरासोबतच लोणारमध्ये एक अपरिचित, प्राचीन पण तितकीच सुंदर वास्तू उभी आहे, ती म्हणजे दैत्यसूदन मंदिर. आज जगात असलेल्या तीन उल्कापाती सरोवरांतील एक विदर्भात बुलढाणा जिल्ह्यात लोणार या गावी आहे. असे म्हणतात की, अमेरिकेत अॅरिझोना, आफ्रिकेत बोत्सवाना व रशियात सैबेरिया येथे अशी सरोवरे आहेत. भारतात ते विदर्भात आहे. या उल्कापाती सरोवरामुळे लोणार हे गाव आणि लोणार सरोवर जगन्मान्य झाले आहे आणि त्याच्याच जवळ हे दैत्यसूदन मंदिर आहे.
लोणार सरोवराच्या परिसरात अनेक प्राचीन मंदिरे पाहायला मिळतात. दैत्यसूदन मंदिर हे त्यातले सर्वात उत्कृष्ट आणि विलक्षण सुंदर आहे. नागपूरहून 400 कि.मी. इतक्या लांबचा प्रवास करून इथे यायचे म्हणजे एक साहसच होते. पण मंदिर पाहिल्यावर मिळणार्या समाधानात इथे येण्याचे सार्थक होते. आपल्या पूर्वजांनी केलेल्या शिल्पांचे नक्षीकाम बघून अभिमान वाटतो आणि नकळत हात जोडले जातात. इतिहासाची साक्ष देणारे हे मंदिर आजही दिमाखात उभे आहे. विलक्षण अद्भुत स्थापत्यरचना, नाजूक कोरीवकाम, उत्कृष्ट शिल्पकला, शिल्पांचे वैविध्य, त्यावरील भाव हे आपल्या प्रगत प्राचीन भारतीय कलेचा परिचय देत दैत्यसूदन मंदिर आज उभे आहे. हे सगळे पाहत असताना आणि पुढे कितीही वेळा पाहिले, तरी मन भरत नाही. आवर्जून बघावे असेच मंदिर म्हणजे दैत्यसूदन मंदिर.
जगदीश्वर महादेव मंदिर - अंभोरा
नागपूर-भंडारा रस्त्यातील हे अत्यंत रमणीय ठिकाण अंबानगरी अर्थात अंभोरा आहे. अंभोरे गावात अतिउंच कडा असून याच पार्श्वभूमीवर त्यास कोलासुरानचे पहाड म्हणतात. आकाशात झेप घेणारे पक्षी हमखास सरळ चैतन्येश्वराच्या प्राचीन मंदिराच्या छतावर येऊन स्थिरावतात. अंभोरा हे देवस्थान वैनगंगा, कन्हान, आंब, मुर्जा, कोलारी या पाच नद्यांच्या संगमावर वसलेले आहे, त्यामुळे निसर्गसौंदर्याच्या आणि सांस्कृतिक दृष्टीने हे ठिकाण वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. भरगच्च पसरलेली झाडी, नद्यांचे विस्तृत पात्र, मऊशार रुपेरी वाळू आणि थोड्या अंतरावर टेकडीला वळसा घालून चंद्राकार झालेली आंब नदी आणि या निसर्गसौंदर्याने वेढलेले महादेवाचे मंदिर बघताच सर्व दु:ख विसरायला लावणारे आहे. कदाचित म्हणूनच इथल्या महादेवाचे नावही चैतन्येश्वर आहे. कारण चैतन्य इथल्या कणाकणात ठासून भरल्याचे बघताक्षणीच जाणवते.
अंभोरा येथे पाच नद्यांचा संगम, मुकुंदराजाची समाधी, चैतन्येश्वरांचे पितळी कळस, धर्मशाळा, भूगर्भाचा तुटलेला कडा, नद्यांचे पाणी आणि घनदाट अरण्य असे निसर्गाचे अद्भुत दर्शन होते. या अंभोरा नगरीचे प्राचीन नाव अंबनगरी, त्याची झाली अंबानगरी व आता आपण तिचे आधुनिक नाव ठेवले श्रीक्षेत्र अंभोरा आहे. आपल्या मायमराठीचे आद्य ग्रंथ समजतात ज्ञानदेवांची ज्ञानेश्वरी. पण या ज्ञानेश्वरी ग्रंथाच्या 100 वर्षे आधी आपल्या विदर्भातील एका विद्वानाने ‘विवेकसिंधू’ नावाचा ग्रंथ लिहिला. त्या विद्वानाचे नाव आहे मुकुंदराज. ते एका अर्थाने मराठीचे आद्य ग्रंथकार ठरतात. श्री क्षेत्र अंभोरा ही त्यांची भूमी आहे. अंभोर्यात अनेक पुरातन अवशेष आहेत. पूर्व दिशेच्या उंच कड्यावर असलेल्या श्रीचैतन्येश्वरांचे देऊळ त्या सर्व पुरावशेषात सर्वोत्तम असेच आहे. अंभोरा हे एका अर्थाने पाच नद्यांच्या संगामावरील बेट असून त्याच्या मध्यभागी पूर्व दिशेस उंच जाणार्या पायर्यांनी वर चढत गेलो की, आपण त्या प्राचीन मंदिरात पोहोचतो. वरच्या माथ्यावरून जो निसर्गसौंदर्याचा देखावा दिसतो, तो शब्दांच्या पलीकडचा आहे.
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रुक्मिणी मंदिर - महाल - नागपूर
नागपूर शहराचा इतिहास, श्रीमंत राजे भोसले राजवंश व गोंड राजवंश यांच्या भोवतीचा आहे. या उभय राजवंशांनी नागपूरचे वैभव उभे केले होते. त्यातही विशेषत: द्वितीय रघुजी भोसले महाराजांच्या कारकिर्दीत नागपूरचा दर्जा सुशोभित अशा दिल्ली शहरासारखा होता. त्या वेळी बागबगिचे, पेठा, राजवाडे, मंदिर, मठ, स्थापत्य, स्मारक, स्तंभ यांच्या उभारणीची त्यांनी झपाट्याने सुरुवात केली होती. त्यातील त्यांनी बांधलेली मंदिरे आजही या सगळ्या वैभवाची साक्ष देत उभे आहे.
श्रीमंत भोसले यांचे मंदिरस्थापत्य हा एक स्वतंत्र विषय आहे. पण त्यालाही मर्यादा आहे. नागपूर शहरातील भोसल्यांनी बांधलेल्या या मंदिरात भोंडा महादेव, पार्डीचे श्रीकृष्ण मंदिर, सोनेगावचे मधुसूदन मंदिर, सक्करदर्याचे श्रीलक्ष्मीनारायण मंदिर, महालातील असंख्य मंदिरे यांचा समावेश होतो. या सर्व मंदिराच्या स्थापत्याचा मुकुटमणी ठरावे असे महालातील श्रीरुक्मिणी मंदिर आहे. हे मंदिर अक्षरश: डोळ्यांचे पारणे फेडणारे आहे. गांधी गेट ते बॅ. अभ्यंकर पुतळ्याच्या मधोमध ही स्थापत्यकृती आहे, प्रवेशद्वार कमानी असून त्या काळी बाजूच्या ओट्यावर द्वारपाल असत. त्यात हे मंदिर आपल्या पूर्ण वैभवाने ऊन-वारा-पाऊस यांची तमा न बाळगता आजही दिमाखात उभे आहे.
नागपूरमधील हे मंदिर म्हणजे स्थापत्यकृती, शिल्पप्रतिमा व सुशोभन यांचा परमोच्च बिंदू आहे. श्रीमंत राजे भोसल्यांनी साधारणपणे काही वर्षांपूर्वी ओरिसा, छत्तीसगड, बिहार व बंगाल जिंकला. साहजिकच तेथील कारागीर, शिल्पकार, मूर्ती कोरणारे स्थापती, तंत्रज्ञ, देवळे बांधणारे त्या वेळी नागपूरला आले आणि स्वाभाविकच नागपूरच्या अनेक मंदिरस्थापत्यावर ओरिसा-छत्तीसगड स्थापत्याचा प्रभाव जाणवतो. श्रीरुक्मिणी मंदिर असेच आहे. श्रीमंत राजे भोसले यांच्या राजवाड्यास अगदी लागून असलेले हे मंदिर आहे. महाराष्ट्राच्या शिल्पपरंपरेपेक्षा वेगळे स्थान असलेल्या श्रीरुक्मिणी मंदिरात संगमरवराचा गरुड मंडप असून त्यावर राजस्थानच्या कारागीरांचा प्रभाव जाणवतो. आवर्जून बघावे असे अप्रतिम मुरलीधर मंदिर आहे.
श्री मधुसूदन मंदिर - सोनेगाव - नागपूर
नागपूरातील मधुसूदन मंदिर बरेच दिवस एकांतात असेच होते. सोनेगाव विमानतळ भागात असल्याने कुणी सहसा तेथे जात नसे. पण आता विमानतळावर जाण्यासाठी नवा रस्ता येथून सुरू झाल्यामुळे ही वास्तू सहज नजरेत भरणारी आहे. या वास्तुकलेचे वेगळेपण म्हणजे दगडी बांधणी. अनेक प्रकारच्या जाळीने नक्षीदार व कुठली तरी कल्पना साकारल्यासारखी दिसतात. या मंदिरात मुधुसूदन रूपातील श्रीकृष्णाबरोबर रुक्मिणी आणि सत्यभामा आहेत आणि हे खूप कमी ठिकाणी बघायला मिळते.
कमलपुष्पासारखे शिखर असलेला सुरेख व टुमदार राजस्थानी थाटाचा गरुड मंडप पाहतच राहावा असा आहे. त्यात श्री नासिकाग्र मुद्रेचा टोकदार गरुड म्हणजे एक दिव्य अनुभवच आहे. मंडपाचा आकार चौकानी असून सभोवताल सज्जा आहे. त्यावर कमळकलिकांची खास मराठा शैलीतील महिरप असून तीदेखील सुशोभित आहे. उंच उंच होत जाणारी ही मंदिर मालिका म्हणजे श्रीमंत भोसल्यांनी भारतीय शिल्पपरंपरेवर केलेले खूप मोठे स्थापत्य उपकारच ठरतात आणि आजही इतके वर्षे होऊनसुद्धा ती वैभवाने उभी आहेत. वारा, पाऊस आणि वादळ यांचे अनेक तडाखे बसूनसुद्धा ही ऐतिहासिक वास्तू दिमाखात उभी आहे. नक्कीच एकदा तरी बघायला हवे असे हे मुधुसूदन मंदिर आहे.
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