Sthapatyam
Vol.1
Issue.2
डाॅ. ज्ञानेन्द्र नारायण राय
शिव का चतुर्मुख स्वरूप में चार मुख चारों दिशाओं को ईगिंत करते हैं। जैसा कि श्लोक में देख जा सकता है।
चतुर्मुखश्य संवृतो दर्शयन् योगमुत्तमम्।।
पूर्वेण वदनेनाहमिन्द्रत्वमनुशास्मि ह ।
उत्तरेण त्वया सार्धं रमाम्यहमनिन्दिते।।
पश्चिमं में मुख सौम्यं सर्वप्राणिसुखावहम्।
दक्षिणं भीमसंकाशं रौद्रं संहरति प्रजाः।।
Source: Author
पूर्व दिशा वाले मुख से इन्द्र पद का अनुशासन करता हूँ। पूर्व दिशा इन्द्र का स्थान है।
वास्तु
शास्त्र में पूर्व में इन्द्र देव स्थापित किये जाते है जिन्हें महेन्द्र
भी कहा जाता है। पूर्व दिशा का शिव स्वरूप भी इन्द्र पद को अनुशासित करता
है। इन्द्र शुभ हैं मंगलकारी है और समृद्धि देते है अतः इन्द्र स्वरूप इस
दिशा का शिव मुख मंगलकारी है।
शिव का उत्तर दिशा का मुख पार्वती के साथ वार्तालाप के सुख का अनुभव कराता है।
उत्तर दिशा के स्वामी सोम है। सोम समृद्वि सुख के देव है जिन्हे उत्तर
दिशा में स्थापित किया जाता है। सुख जीवन का सबसे महत्तवपूर्ण पहलू है सुख
कई साधनों से संभव है जिसमें अपने प्रिय से वार्ता करने का सुख सर्वाेपरि
है। शिव और पार्वती आपस में वार्ता करते हैं जिस आनन्द का द्योतक उत्तर
दिशा का शिव मुख है। सोम-सूर्य के समान, प्रकाशवान बहुत अधिक बेगवान,
विजेता, योद्धा, और सबको संपत्ति, गौ, बैल, अन्न आदि देने वाले माने जाते
है। उपरोक्त वस्तुएँ सुख और समृद्धि के आधार है। शिव का यह मुख
वास्तुशास्त्र में बताये दिशा के अनुकृल सुखप्रद देखा जा सकता है।
मेरा पश्चिम वाला मुख सौम्य है
वास्तुशास्त्र में पश्चिम दिशा में वरुण, पुष्पदंत इत्यादि देवता स्थापति
किये जाते है। वरुण सौम्य देव है। ये जल के देवता है। इनका आवाहन
वास्तुमण्डल के जलीय तत्व के सन्तुलन हेतु किया जाता है। जल समस्त जीवों के
जीवन का आधार है और सभी को सुख देता है। पश्चिमाभिमुखी शिव का मुख भी अपने
सौम्य स्वरुप से सभी प्राणियों को सुख देता है।
दक्षिण दिशा वाला भयानक मुख रौद्र है जो समस्त प्रजा का संहार करता है। वास्तुमण्डल में दक्षिण
दिशा में यम का स्थान है। यम मृत्यु के देवता है जो भयानक और मृत्यु कारक
है। दक्षिण दिशा का शिव मुख भी इसी तरह के भाव से भावीत है। कल्याणकारी शिव
का रौद्र रुप दक्षिण दिशा का द्योतक है या दक्षिण दिशा रौद्र रुपी यम का
प्रतीक है। वास्तुशास्त्र के परिपेक्षय में देखने से हमें शिव के सभी
स्वरुप सही ज्ञात होते हैं, वैसे तो चतुर्मुख या पञ्चमुख, शिवलिङ्ग कम ही
देखने में आते है किंतु वास्तुशास्त्रीय परम्परा में इन्हें देखा जा सकता
है।
Sthapatyam
Vol.3
Issue.6
डाॅ. नीरज कुमार पाण्डेय
डाॅ. चन्द्रनील शर्मा
बिहार के गया जिले से 25 कि.मी. उत्तर में बारबरा और नागार्जुनी नाम की 2 पहाड़ियाँ स्थित हैं, जो अपने प्राचीन और सुदृढ गुफा निर्माण के लिये जानी जाती है। संभवतः यह पत्थरों को काटकर गुफा बनाने का पहला सफल प्रयास था। इनकी चमकदार अन्दर की दीवारों को देखकर मौर्य युगीन कहना ठीक रहेगा। चार गुफाओं का निर्माण बारबरा की पहाड़ी में और तीन नागार्जुनी की पहाड़ी में है। अलेक्जेण्डर कनींघम ने सबसे पहले इन्हें देखा और इसके विषय में आर्किलाॅजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित कराया। उसके बाद कई अन्य विद्वानों ने भी इस पर शोध किया। यहाँ से प्राप्त अभिलेखों में इन पहाड़ियों का नाम गोरथगिरि, खलतीका और प्रवरगिरि है। बारबरा पहाड़ी के चार गुफाओं में एक गुफा का नाम कर्ण चौपड़ है जो 33 फीट लम्बा, 14 फीट चौड़ा और 10 फीट ऊँचा है। मौर्थन पाॅलिस से सज्जित इस गुफा में सम्राट अशोक के उन्नीसवें वर्ष के सम्राट होने के अवसर पर अभिलेख लिखवाया गया है जिसमें सुपिया नाम की एक समर्पित सेविका का उल्लेख है और गुफा को सुपिया कहा जाता है।
Source: Author
सुपिया का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थ के विनय पीटक में भी मिलता है। सुपिया और सुपीय श्रावक श्रावीका थे जो बनारस में रहते थे। सुपिया बौद्ध धर्म को समर्पित श्राविका थी। सुपिया बौद्ध बिहारों में जाकर भिक्षुओं की सेवा करती थी।
एक दिन एक भिक्षु को अतिसार हो गई और उसने माँस का सूप पीने की इच्छा सुपिया से जाहिर की। सुपिया ने अपने शिष्यों से माँस लाने की बात कही पर माँस नहीं मिला, जिससे की सूप बनाया जाये। अंत में सुपिया ने सोचा, अगर भिक्षु को माँस का सूप नहीं मिला तो वह मर जायेगा। उसने अपने जाँघ का माँस काटकर शिष्य को दिया और भिक्षु के स्वस्थ होने की कामना की।
एक दिन भगवान बुद्ध सुपीय के कहने पर सुपिया के घर खाने आये वहाँ उन्होने सुपिया के अस्वस्थ होने के विषय में जाना और उसे स्वस्थ किया। बीमार भिक्षु से पूछने पर कि उसने किसका माँस खाया तो उसे पता नहीं था इस पर उसे भगवान बुद्ध ने डाँटा और बताया कि वह सुपिया का माँस था। बीमार भिक्षु शर्मिन्दा हो गया तब भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को उपदेश दिया कि यदि कोई मनुष्य स्वेच्छा से और अच्छी भावनाओं के साथ अपना माँस खिलाता है तो उसे खाना चाहिये।
बारबरा पहाड़ी की सुपिया गुफा का नाम इसी कहानी के ऊपर पड़ा। अभिलेख में भी सुपिया का नाम इस कहानी की सत्यता को साबित करता है।
रेनु पाण्डेय
Sthapatyam
Vol.1
Issue.6
डाॅ. ओम प्रकाश लाल श्रीवास्तव
भारतीय
संस्कृति एवं कला में द्यूत-क्रीडा एक प्रमुख अंग रहा है। ऋग्वेद के पूर्व
काल से ही द्यूत-क्रीडा समाज में प्रचलित रही इसकी गणना चौसठ कलाओं में की
गई है। द्यूत-क्रीडा मनोरंजन के साथ-साथ धन एकत्र करने का भी साधन है।
ऋग्वेद में द्यूत (अक्ष के पासे) को विभीतक (बहेड़ा) के बड़े फल की तरह कहा
गया है। खेलते समय कम्पन करता हुआ जुआड़ी को रोमांचक अनुभूति प्रदान करता है
उसका सोना-जागना, सुख-दुःख सब पर पासे का नियन्त्रण होता है। जुआड़ी के
परिवार वाले दुःखी होते हैं एवं वह ऋणी तथा चोरी के कर्म में प्रवृत्त होता
है। (ऋग्वेद 10.34.1, 10.34.9, 10.34.10)
महाभारत
काल का सर्वनाशी युद्ध भी द्यूत-क्रीड़ा के कारण ही हुआ था। शकुनि
द्यूत-क्रीड़ा का विशेषज्ञ था वह द्यूत-क्रीड़ा का रहस्य बताते हुये कहता है
कि दाॅव मेरा धनुष, अक्ष बाण है, अक्षों का भीतरी भाग धनुष की डोरी ओर पासा
फेंकने का स्थान ही मेरा रथ है। महाभारत 2-56.-4
युधिष्ठिर द्वारा द्यूत-क्रीडा को पापकर्म कहने पर शकुनि अपने तर्को के द्वारा उन्हें गलत सिद्ध करता है। महाभारत 2.59.7-14, 2.61.1
द्यूत-क्रीडा के दुष्परिणाम से परिचित होने के कारण धृतराष्ट्र ने पहले ही उसके अवगुणों की चर्चा करके उसका विरोध किया। महाभारत 2-50,11-12
कौटिल्य
ने अपने अर्थशास्त्र में द्यूत-क्रीडा की व्यवस्था किये जाने एवं जुआड़ियों
से राजस्व वसूली तथा द्यूत-क्रीडा में कपटपूर्ण व्यवहार पर दण्ड का विधान,
शुद्ध कौडी एवं पासा की व्यवस्था, दूसरे के कौडी एवं पासा को निषेध तथा
जीते हुए धन पर कर तथा कौडी, पासा, अटल, द्यूतशाला की जमीन का किराया
इत्यादि का वर्णन किया है। इस प्रकार द्यूत-क्रीडा पर राजकीय नियन्त्रण वह
मनोरजंन के साधन के साथ-साथ राज्य के आय का भी स्रोत था। शूद्रक केे
मृच्छकटिकम् में द्यूत-क्रीडा की चर्चा तथा विभिन्न दाँवों की भी चर्चा
प्राप्त होती है। मृच्छकटिकम्-2.7-9
परम्परानुसार
कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा को द्यूत-प्रतिपदा कहा जाता है। माना जाता है कि
उस दिन पार्वती ने द्यूत-क्रीड़ा में शिव को हराया था जिसमें शिव दुखी तथा
पार्वती प्रसन्न हुईं थी। इस प्रकार ये परम्परा आज तक कई स्थानों पर
विद्यमान है और माना जाता है कि उस दिन जुआ जीतने से वर्ष मंगलमय और हारने
से वर्षभर धन की हानि होती है। शिव-पार्वती की द्यूत-क्रीडा और तत्सम्बधी
हास-परिहास के विविध प्रसंग साहित्य के साथ-साथ प्राचीन अभिलेखों और
मूर्तियों में भी प्राप्त होते है।
Source: Author
अम्बिका दत्त व्यास रचित मंगलमणिमाला के (श्लोक -1182), रेड्डिशासन का अभिलेख, इन्द्रपाल का गौहाटी ताम्रपत्रलेख तथा युवराजदेव द्वितीय कालीन विलहरी प्रस्तर अभिलेख
इन सन्दर्भ में विशेष रूप से शिव-पार्वती के द्यूत-प्रकरण की चर्चा की गई
है जिसमें दाॅव पर चन्द्रमा आदि लगाने तथा पार्वती द्वारा उसे जीत लेने की
कथा उल्लेखित है। द्यूत-क्रीडारत शिव-पार्वती की एलोरा, के गुफा संख्या 21
में विलासपुर जनपद में ताला के देवरानी मन्दिर में, रानी दुर्गावती
संग्रहालय जवलपुर में प्रस्तर मूर्ति एवं अंकन उपलब्ध है।
इन
उपरिसन्दर्भित विविध प्रसंगो से यह स्पष्ट है कि द्यूत को दुव्र्यसन माना
जाता था किन्तु इसके बावजूद मनोरंजन के साधन के रूप में द्यूत-क्रीडा
भारतीय संस्कृति एवं कला का एक प्रमुख अंग रहा है।
जितेन्द्र कुमार उपाध्याय
स्थापत्यम्
वास्तुशास्त्र में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र शब्द
एक चिन्तन
वास्तुशास्त्र के ग्रन्थों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र शब्दों का प्रयोग किया गया है। भूमि व भवन के लिए इन शब्दों का प्रयोग प्राय: सर्वत्र दिखाई देता है। ब्राह्मणादि वर्ण विशेष ही पारिभाषित भूमि व भवन में निवास करे ऐसी धारणा बनाने से पहले हमें इन शब्दों का प्रायोगिक व प्रासंगिक अर्थ समझना होगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र शब्द वेदों, ब्राह्मण-ग्रन्थों, धर्मसूत्रों एवं संहिता-ग्रन्थों में वर्ण एवं जाति दोनों अर्थों के लिए प्रयोग किया गया है। ये शब्द कहीं वर्ण व्यवस्था को पारिभाषित करते हैं तो कहीं जाति व्यवस्था को।
इस प्रकार शास्त्रों में वर्ण एवं जाति शब्द समान अर्थ के साथ-साथ दूसरे अर्थ में भी प्रयुक्त हैं। वर्ण शब्द की अवधारणा वंश, संस्कृति, चरित्र एवं व्यवसाय पर आधारित है जिसमें व्यक्तिगत नैतिकता व बौद्धिकता का समावेश पाया जाता है। यह स्वाभाविक व्यवस्था का परिचायक है। वर्ण, समाज या वर्ण-विशेष के उच्च मापदण्डों की व्याख्या करता है। वर्ण, जन्म से प्राप्त अधिकारों व विशेषाधिकार पर बल नहीं देता है। जाति, जन्म एवं आनुवंशिकता पर बल देती है। यह उच्च मापदण्डों के बिना आचरण पर, केवल विशेषाधिकार पर आधारित है। वास्तुशास्त्र में प्रयोग किये गये ब्राह्मणादि शब्द वर्ण व्यवस्था के द्योतक हैं न कि जाति व्यवस्था के। अत: इस सम्बन्ध में वर्ण व्यवस्था एवं उनके कर्मों, गुणों को ध्यान में रखकर वास्तुशास्त्र में उल्लििखत नियमों का विश्लेषण करना होगा।
अत: ग्रन्थों में वर्णित वर्णों के गुणों एवं कर्मों को ध्यान में रखकर तथा उसी दृष्टिकोण से वास्तुशास्त्र का अध्ययन कर वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता एवं उपादेयता देखनी होगी।
भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था के उद्गम एवं उसकी विशिष्टताओं पर प्राचीन वाङ्गमय से लेकर पाश्चात्त्य लेखकों की कृतियाँ मौजूद हैं। पाश्चात्त्य लेखकों में सिडनी जेम्स मार्क लो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ए विजन ऑफ इण्डिया, द्वितीय संस्करण, १९०७, पृ. २६२-२६३ में एवं जार्ज मेरेडिथ ने अपनी पुस्तक यूरोप एण्ड एशिया, १९०१, पृ. ७२ में वर्ण व्यवस्था की बहुत प्रशंसा की है। इसीप्रकार विलियम एडवर्ड बरगार्ड डू बोइस ने भी प्रशंसा की है जबकि कुछ ने बहुत ही कड़ी आलोचना एवं भत्र्सना की है। सर हेनरी समनर मेने ने एशियण्ट ला, १९३०, पृ. १७ तथा एम.ए. शेरिंग ने हिन्दू ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स, अंक ३, पृ. २९३ में इसे विनाशकारी परम्परा मानकर भत्र्सना की है। जन्म एवं व्यवसाय पर आधारित जाति व्यवस्था प्राचीन काल में फारस, रोम, जापान आदि स्थानों में भी थी, परन्तु समय के प्रवाह में वहाँ समाप्त हो गयी और भारतवर्ष में उसकी निरन्तरता बनी रही।
ऋग्वेद में 'वर्ण शब्द रंग, प्रकाश या जन-समूहों के लिए आया है। 'यो दासं वर्णमधरं गुहाक:' (ऋग्वेद २.१२.४) तथा 'उभौ वर्णावृषिरुग्र: पुपोष (ऋग्वेद १.१७९.६), जिन्होंने (इन्द्र ने) दास रंग को गुहा (अन्धकार में रखा) तथा (क्रोधी ऋषि अगस्त्य) ने दो वर्णों की कामना की, के आधार पर काले और गोरे दो प्रकार के जन समूह थे।
ब्राह्मणश्च शूद्रश्च चर्मकर्तोन्यायच्छेते।
देव्यो वै वर्णो ब्राह्मण: असूर्य: शूद्र:।
तैत्तिरीय ब्राह्मण, १.२.६
ब्राह्मण दैवी वर्ण है और शूद्र असूर्य वर्ण है अर्थात् असूर्य वर्ण शूद्र जाति हुआ। ऋग्वेद में आर्यों एवं दासों या दस्यु लोगों के बारे में बहुत लिखा है। ऋग्वेद (१०.२२.८) के अनुसार दस्यु एवं दास दोनों एक ही हैं।
दस्यु लोग देवताओं के नियमों को न मानने वाले, यज्ञ न करने वाले, जिनकी बोली स्पष्ट एवं मधुर न हो, गूँगे एवं चपटी नाक वाले बताये गये हैं।
ऋग्वेद के मन्त्र १०.९०.१२ को छोडक़र कहीं भी वैश्य एवं शूद्र शब्द का उल्लेख नहीं है। ऋग्वेद में ब्राह्मण शब्द किसी जाति के लिए नहीं आया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण (३.९.१४) में 'ब्रह्म वै ब्राह्मण: क्षत्रं राजन्य:' ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के लिए आया है।
निरुक्त में सन्दर्भित कथा है कि ऋष्टिषेण ऋषि के दो पुत्रों में बड़े बेटे देेवापि के इन्कार करने पर छोटा बेटा शन्तनु राजा बना, बाद में देवापि ने शन्तनु का पुरोहित बनकर यज्ञ करवाकर वर्षा करवायी।
देवापिश्च आष्र्टिषेण: शंतनुश्च कौरव्यौ भ्रातरौ बभूवतु:।
स शंतनु: कनीयान् अभिषेचयांचक्रे। देवापि: तप: प्रतिपेदे।
तत: शंतनो: राज्ये द्वादश वर्षाणि देवो न ववर्ष। तमूचु: ब्राह्मणा: - 'अधर्म: त्वयाऽऽचरित:, ज्येष्ठं भ्रातरम् अन्तरित्य अभिषेचितम्। तस्मात् ते देवो न वर्षति' इति। स शंतनु: देवापि: शिशिक्ष राज्येन। तमुवाच देवापि: - 'पुरोहित: ते असानि, याजयानि च त्वा' इति।
निरुक्तम्, २.१०
कुरुवंश में ऋष्टिषेण के दो पुत्र देवापि और शन्तनु हुए। छोटे भाई शन्तनु ने अपना राज्याभिषेक करा लिया और देवापि तपस्या करने लगा। इससे शन्तनु के राज्य में बारह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। ब्राह्मणों ने उससे कहा- 'तुमने अधर्म किया है, बड़े भाई को छोड़ कर तुमने अभिषेक करा लिया। इसी से तुम्हारे यहाँ पानी नहीं बरसता।' शन्तनु ने देवापि को राज्य लेने को कहा। देवापि ने उत्तर दिया- 'मैं तुम्हारा पुरोहित रहूँगा और तुम्हें यज्ञ कराऊँगा'।
यहाँ पर विचारणीय है कि शन्तनु का अधर्म राज्य करना नहीं है वरन् बड़े भाई के स्थान पर राज्याभिषेक है तथा अधर्म का परिहार है यज्ञ। इन दोनों राज्यधर्म व पौरोहित्य कर्म का निर्वहन एक ही पिता के दो पुत्र करते हैं न कि भिन्न कर्मों के लिए भिन्न जाति विशेष का व्यक्ति।
कुविन्मा गोपां करसे जनस्य कुविद् राजानं मघवन्नृजीषिन्।
कुविन्म ऋषि पपिवांसं सुतस्य कुविन्मे वस्वो अमृतस्य शिक्षा:।।
ऋग्वेद, ३.४३.५
हे इन्द्र! तू मुझे अनेक बार गोपति, नृपति, धनपति एवं अनेक बार सोम पीने वाला ऋषि बना और मुझे क्षय रहित धन दे। इस प्रकार एक ही व्यक्ति राजा, धनवान् या ऋषि बन सकता था।
यत्राष्र्टिषेण: कौरव्य ब्राह्मण्यं संशितव्रत:।
तपसा महता राजन् प्राप्तवानृषिसत्तम:।।
सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपा:।
ब्रह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रस्तथा मुनि:।।
महाभारत, शल्यपर्व, ३९.३६-३७
जहाँ कठोर व्रत का पालन करने वाले मुनिश्रेष्ठ आषर््िटषेण ने बड़ी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान् तपस्वी देवापि और विश्वामित्र मुनि ने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था।
विश्वामित्रो वशिष्ठश्च मतङ्गो नारदादय:।
तपोविशेषै: सम्प्राप्ता उत्तमत्वं न जातित:।।
शुक्रनीतिसार:, ४.४.३८
(क्षत्रिय से उत्पन्न हुए) विश्वामित्र, (अप्सरा से उत्पन्न हुए) वशिष्ठ, (साधारण वर्ण में उत्पन्न हुए) मतङ्ग, (दासी पुत्र) नारद आदि विशेष तप के द्वारा उत्तमता को प्राप्त हुए थे, जाति से नहीं।
विश् शब्द ऋग्वेद में 'मानुषीर्विश:', 'मानुषीषु विक्षु', 'मानुषीणां विशाम्' प्रयोग जन समूह के लिए आया है। ऋग्वेद के मन्त्र 'यत्पाञ्चजन्यया विशेन्द्र घोष असृक्षत्' (८.६३.७) में विश् शब्द सम्पूर्ण जाति का द्योतक है। कुछ विद्वानों के अनुसार श्रुति ग्रन्थों के बाद के ग्रन्थों में 'दास' का अर्थ है 'गुलाम' (क्रीतभृत्य)। दास या दस्यु जातियाँ हराकर गुलाम बना दी गयीं और वे सेवा करने लगीं। वैदिक कालीन ग्रन्थों, ब्राह्मण ग्रन्थों एवं स्मृति ग्रन्थों के आधार पर विजित दस्यु या दास शूद्रों में परिणित हो गये।
तैत्तिरीय संहिता के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र एक ही समाज के अंग हैं- 'रूचं नो धेहि ब्राह्मणेषु रूचं राजसु नस्कृधि। रूचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रूचा रूचम्'(५.७.६.३-४) अर्थात् 'हमारे ब्राह्मणों में प्रकाश भरो, हमारे मुख्यों (राजाओं) में प्रकाश भरो, वैश्यों एवं शूद्रों में प्रकाश भरो और अपने प्रकाश से मुझमें भी प्रकाश भरो'।
ब्राह्मण ग्रन्थों के समय से वर्ण-व्यवस्था सुदृढ़ हो गई थी। देवताओं, ऋतुओं, वृक्षों, ग्रहों, आदि सभी में वर्ण विभाजन किया गया था। अग्नि एवं बृहस्पति देवताओं में ब्राह्मण; इन्द्र, यम, वरुण क्षत्रिय; वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुत् वैश्य तथा पूषा शूद्र के रूप में वर्णित हैं। ऋतुओं को भी वर्णों के आधार पर ब्राह्मणादि वर्ण में विभाजित किया गया। इसी क्रम में गुणों के आधार पर भूमि को भी ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या व शूद्रा में पारिभाषित किया गया।
सिता रक्ता च पीता च कृष्णा चैव क्रमान्मही।
विप्रादीनां हि वर्णानां सर्वेषामथवा हिता।।
समराङ्गणसूत्रधार, ८.४८
सफेद भूमि ब्राह्मण के लिए, क्षत्रिय के लिए लाल भूमि, वैश्य के लिए पीली भूमि और शूद्र के लिए काले रङ्ग की पृथ्वी प्रशस्त मानी गई है।
ब्रह्मैव व्वसन्त: क्षत्रं ग्रीष्मो व्विडेव व्वर्षास्तस्माद्ब्राह्मणो व्वसन्त ऽआदधीत ब्रह्म हि व्वसन्तस्तस्मात्क्षत्रियो ग्रीष्म ऽआदधीत क्षतœँ हि ग्रीष्मस्तस्माद्वैश्यो व्वर्षास्वादधीत विड्ढि व्वर्षा:।।
शतपथ ब्राह्मण, २.१.३.५
बसन्त ऋतु ब्राह्मण, ग्रीष्म ऋतु क्षत्रिय एवं वर्षा ऋतु वैश्य है।
झष: कर्कटो वृश्चिको भूमिदेवा धनुर्मेषसिंहास्तथा क्षत्रियाश्च।
वृष: कन्यका नक्रराशिर्विराश्च नृयुग्मं तुला कुम्भराशिश्च शूद्रा:।।
मुहूर्तसंग्रहदर्पणम्, २.२४
कर्क, वृश्चिक, मीन राशि ब्राह्मण; मेष, सिंह, धनु राशि क्षत्रिय; वृष, कन्या, मकर राशि वैश्य तथा मिथुन, तुला, कुम्भ राशि शूद्र हैं।
ब्राह्मणौ जीवशुक्रौ च क्षत्रियौ भौमभास्करौ।
सोमसौम्यौ विशौ प्रोक्तौ राहुमन्दौ तथान्त्यजौ।।
मुहूर्तसंग्रहदर्पणम्, ३.८
ग्रहों में बृहस्पति, शुक्र ब्राह्मण हैं; सूर्य, मंगल क्षत्रिय हैं; चन्द्र, बुध वैश्य हैं; शनि, राहु अन्त्यज ग्रह हैं।
सर्वाधिक श्लोकों वाला वास्तु ग्रन्थ अपराजितपृच्छा में अश्वों को भी वर्णों के आधार पर परिभाषित किया गया है। यहाँ पर अश्वों के कई भेद में चार भेद उत्तम माने गये तथा उन्हें जाति की नहीं वर्ण की संज्ञा दी गई-
.. .. .. अश्वाश्चातुर्वण्र्यं च कथ्यते।।
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा अश्वाश्चत्वार उत्तमा:।
अपराजितपृच्छा, ८०.३-४
१. ब्राह्मण, २. क्षत्रिय, ३. वैश्य और ४. शूद्र - ये चार प्रकार के उत्तम अश्व होते हैं।
चातुर्वण्र्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बमय: स्मृत: ............ पूर्वत: श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै।। पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते। भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वित:। तेनास्य शूद्रता सिद्धा मेरोर्नामार्थकर्मत:।। पाश्र्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्ण स्वभावत:। तेनास्य क्षत्रभाव: स्यादिति वर्णा: प्रकीर्तिता:।।
मत्स्य पुराण, ११३, १२, १४-१६
चारों ओर अनेक प्रकार की रंगों वाली पाश्र्व भूमियों से संयुक्त वह सुमेरु प्रजापति ब्रह्मा के समान सभी गुणों से संयुक्त है। पूर्व दिशा से श्वेतवर्ण वाला वह सुमेरु पर्वत अव्यक्त ब्रह्मा की नाभि के बन्धन से उत्पन्न हुआ है, इसी श्वेतवर्णता से उसमें ब्राह्मण के गुणों की समता मानी गयी है। दक्षिण दिशा से देखने में वह पीले रंग का है, इसी से वह वैश्यवृत्ति का माना गया है। पश्चिम दिशा से उसकी शोभा भ्रमर के पंख के समान श्याम है, इसी से इसके मेरु नाम की सार्थकता अर्थ और कर्म दोनों से-सिद्ध होती है तथा इसकी शूद्रता भी सिद्ध होती है। उस सुमेरु पर्वत का उत्तरी भाग लाल रंग का है, जिससे इसका क्षत्रियत्व सिद्ध होता है।
चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
श्रीमद्भगवद्गीता, ४.१३
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:।।
श्रीमद्भगवद्गीता, १८.४१
श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण चारो वर्णों का आधार गुण व कर्म बताते हैं।
इसी क्रम में वास्तु ग्रन्थ समराङ्गणसूत्रधार चार वर्णों की व्याख्या करता है-
तत: स चतुरो वर्णानाश्रमांश्च व्यभाजयत्।।
.. .. .. ब्राह्मणास्तेऽभवंस्तदा।।
.. .. .. क्षत्रियास्त इहाभवन्।।
.. .. वैश्यस्य कथितो धर्मस्तद्वत्।।
.. ते शूद्रजातयो जाता नातिधर्मरताश्च ये।।
समराङ्गणसूत्रधार, ७.९-१६
तदनन्तर अनुशासन के लिए महाराज पृथु ने प्रजाजनों के मध्य चार वर्णों एवं चार आश्रमों का विभाग किया। उनमें से जो वेद पढ़ते थे और अच्छे आचार-विचार वाले अध्येता थे, उन संयमी विद्वान् एवं चरित्रवान् जनों को ब्राह्मण बनाया।
.. जिनके शरीर हृष्ट पुष्ट और लम्बे-चौड़े थे वे क्षत्रिय हुए।
.. १. चिकित्सा, २. खेती, ३. वाणिज्य, ४. स्थापत्य, ५. पशु-पालन यह पाँच वैश्य के धर्म नियत किए गए।
.. जिनका न बहुत आदर होता था और न अधिक पवित्र रहते थे और न तो धर्म-परायण ही थे, ऐसे क्रूर स्वभाव वाले प्रजाजन शूद्र कहलाये।
प्रज्ञाव्वृद्धिय्र्यशोलोकपक्ति: प्रज्ञा व्वद्र्धमाना चतुरो धम्र्मान्ब्राह्मणमभि निष्पादयति ब्राह्मण्यम्प्रतिरूपचय्र्या यशोलोकपक्तिं लोक: पच्यमानश्चतुर्भिद्र्धम्र्मैब्र्राह्मणं भुनक्यर्चया च दानेन चाच्येयतया चावध्यतया च।।
शतपथ ब्राह्मण (११.४.१.१) के अनुसार ब्राह्मणों के चार विलक्षण गुण हैं- (१) ब्राह्मण्य (पवित्र पैतृकता), (२) प्रतिरूपचय्र्या (पवित्र आचरण), (३) यश एवं (४) लोकपक्ति (लोगों को पढ़ाना या पूर्ण बनाना)। जब लोग ब्राह्मण से पढ़ते हैं या पूर्ण होते हैं तो उसे चार विशेषाधिकार देते हैं (१) अर्चा (आदर), (२) दान, (३) अप्र्यकता (कोई कष्ट नहीं देना) एवं (४) अवध्यता।
शतपथ ब्राह्मण ५.१.१.१२ में कहा गया है 'राजा वै राजसूयेनेष्ट्वा भवति न वै ब्राह्मणो राज्यायालमवरम्' ब्राह्मण राज्य के योग्य नहीं है।
इस प्रकार वेद, शतपथ ब्राह्मण, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णुधर्मसूत्र, वशिष्ठधर्मसूत्र, गौतम, बौधायन शुल्वसूत्र, महाभारत, पुराण आदि कतिपय ग्रन्थों के आधार पर ब्राह्मणों के जीवन का आदर्श मितव्ययि, सादा जीवन उच्चविचार, धन संचय न करना, संस्कृति सम्बन्धी रक्षण एवं विकास करना है। आपातकाल के लिए गौतम ६.६ एवं ६.७ में कहा है 'आपत्काले मातापितृमतों बहुभृत्यस्यानन्तरका वृत्तिरिति कल्प:। तस्यानन्तरका वृत्ति: क्षात्रोऽभिनिवेश:। एवमप्यजीवन्वैश्यमुपजीवेत्।' यदि ब्राह्मण शिक्षण, पौरोहित्य एवं दान से अपनी जीविका न चला सके तो वह क्षत्रियों की वृत्ति कर सकता है। यदि वह भी सम्भव न हो तो वैश्य वृत्ति कर सकता है।
ऐतरेय ब्राह्मण ३८.३ एवं ३९.३ में कहता है 'क्षत्रियोऽजनि विश्वस्य भूतव्य गोप्ताजनि विशामत्ताजनि ........... ब्राह्मणो गोप्ताजनि धर्मस्य गोप्ताजनि।' जब राजा का राज्याभिषेक हो जाता था तो यही समझा जाता था कि एक क्षत्रिय सबका अधिपति - ब्राह्मणों एवं धर्म की रक्षा करने वाला - उत्पन्न किया गया है।
यहाँ पर विचारणीय यह है कि क्षत्रिय का राज्याभिषेक करने पर राजा सबकी रक्षा नहीं करता था वरन् राजा का राज्याभिषेक करने पर क्षत्रिय सबकी रक्षा करता था अर्थात् जाति नहीं क्षात्रधर्म ही प्रमुख माना गया।
वेदाध्ययन करना, यज्ञ करना एवं दान देना ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य के आवश्यक कत्र्तव्य माने गये। वेदाध्यापन, यज्ञ कराना, दान लेना ब्राह्मणों के विशेषाधिकार माने गये। युद्ध करना एवं प्रजाजन की रक्षा करना क्षत्रियों के तथा कृषि, पशुपालन, व्यापार आदि वैश्यों के विशेषाधिकार बनाये गये। शूद्र जनों के लिए सेवा भाव की व्यवस्था बनायी गयी।
उपरोक्त उदाहरणों में जाति एवं वर्ण शब्द में विभेद करके तत्कालीन व्यवस्था की वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता विचारते हैं। पूर्व में लिखे इन ग्रन्थों के समय से वर्तमान युग में पठन-पाठन, शासन व्यवस्था व्यापारादि में बहुत परिवर्तन आ चुका है। गुरुकुल विश्वविद्यालयों में, राजमहल विधानसभाओं एवं लोकसभा में, छोटी-छोटी लोहारों की भ_ियाँ बड़े-बड़े इस्पात कारखानों के रूप में जैसे परिवर्तन आ चुके हैं। आजकल ब्राह्मण जाति के लोग भी शास्त्रों में वर्णित शूद्रकर्म करते हैं। शूद्र जाति के लोग ब्राह्मण का कर्म करते हैं। अत: वर्तमान जाति व्यवस्था को नकारते हुए उपरोक्त वर्णित वर्ण व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता एवं उपादेयता देखनी होगी। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, अनुसन्धानशालाओं आदि में जहाँ आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण को न अपनाते हुए ब्राह्मणी-भूमि या ब्राह्मणों के लिए आये जैसे शब्दों की प्रासंगिकता हमें खोजनी होगी, जहाँ ब्राह्मण के शास्त्र-विहित कत्र्तव्यों का पालन किया जाता है। ब्राह्मणों के जीवन का आदर्श जैसा पहले कहा जा चुका है हमें यहाँ खोजना होगा।
ब्राह्मणों के आदर्श में है सादा जीवन, उच्च विचार और वत्र्तमान में ये विशेषताएँ समाज में अन्य नौकरी पेशा व व्यवसायिक वर्गों के सापेक्ष में विश्वविद्यालयों व अनुसन्धानशालाओं में पायी जाती हैं। विश्वविद्यालय धन संचय नहीं करते, ये अनुदान पर ही चलते हैं। संस्कृति सम्बन्धी विकास कार्य या उनको जीवित रखना विश्वविद्यालय करते हैं। इस प्रकार वर्तमान में ब्राह्मणोचित कत्र्तव्यों का पालन विश्वविद्यालयों, अनुसन्धानशालाओं में हो रहा है।
मुम्बई विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, विक्रम विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, तेलुगु विश्वविद्यालय, कन्नड़ विश्वविद्यालय, केरल विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय;, तमिल विश्वविद्यालय आदि तमाम विश्वविद्यालय सभी प्रदेशों में ब्राह्मणी भूमि पर बने हुए हैं।
इसी प्रकार देश की लोकसभा तथा विधानसभाएँ (प्राचीन अथवा नवीन भवन) क्षत्रिया भूमि पर बने हुए हैं। इस देश में बड़े से बड़े अधिकारी भी शूद्रा भूमि पर निवास करते पाये जाते हैं, क्योंकि वास्तुशास्त्र में नौकरी-पेशा को दास-वृत्ति में लिया जाता है। इसी प्रकार सफल व्यापारिक संकुलों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों की स्थिति भी उन्हीं भूमियों पर है जहाँ शास्त्र में धनागम विशेष के लिए बताया गया है। भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमि पर व्यवसाय विशेष होता है ऐसे उदाहरण सर्वत्र मौजूद हैं।
इस प्रकार वर्तमान जाति व्यवस्था व वास्तु-शास्त्र का तादात्म्य स्थापित होता नहीं दिखाई देता है। उपरोक्त वर्णित वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही इसकी प्रासंगिकता एवं उपादेयता दृष्टिगोचर हो रही है। अत: जाति सूचक शब्दों का जाति के लिए अर्थ न करके तत् सम्बन्धी गुण एवं व्यवहार (वर्ण व्यवस्था) की व्याख्या करनी चाहिये। ब्राह्मणी या ब्राह्मण के लिए आये शब्दों का अर्थ ब्राह्मणोचित कत्र्तव्य करना चाहिये, अर्थात् ब्राह्मणी भूमि पर ब्राह्मणोचित कत्र्तव्यों का पालन सुगमता एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न होते हैं, इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र शब्द से अर्थ करना होगा कि उस भूमि पर तत्-तत् वर्णों के उचित कत्र्तव्यों (वर्णव्यवस्था) का पालन सुगमता से सम्पन्न होगा, जो कि किसी भी जाति का व्यक्ति कर सकता है। वास्तव में भूमि विशेष में वर्ण-विशेष का गुण स्वाभाविक रूप से प्रकृति-प्रदत्त होता है जो किसी जाति विशेष के लिए नहीं होता।
भिन्न-भिन्न वर्ण वाली भूमि अपने वर्ण के पारिभाषित गुणों में अभिवृद्धि करती है किसी भी जाति का व्यक्ति जिस वर्ण वाली भूमि पर निवास करता है उसके स्वाभाविक गुणों में भूमि के वर्ण वाले गुणों की अभिवृद्धि होती है। वास्तव में भूमि विशेष के पारिभाषित वर्ण वाले गुणों के अनुरूप कार्य ही उस भूखण्ड पर सफल होते हुए सर्वत्र पाये जाते हैं। ब्राह्मणी भूमि पर विश्वविद्यालयों का निर्माण, क्षत्रिया भूमि पर संसद व विधानसभाओं का निर्माण, धनागम के लिए पारिभाषित भूमि पर सफल व्यापारिक संकुलों व औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण, शूद्रा भूमि पर सरकारी व गैर सरकारी कर्मचारियों के आवासीय कालोनियों का निर्माण सर्वत्र पाया जाता है। यदि ब्राह्मण वर्ण के गुणों से युक्त भूमि पर या भवन में व्यापारिक या औद्योगिक प्रतिष्ठानों का निर्माण पाया जाता है तो उनमें ब्राह्मण वर्ण के गुणों की अभिवृद्धि पायी जाती है अर्थात् ब्राह्मण वर्ण के गुणों में वर्णित निर्धनता एवं माँगना खाना की तरह बैंकों व अन्य सुलभ स्थानों से ऋण लेने की निरन्तर प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। ब्राह्मण वर्ण के गुणों में धन सञ्चय करना नहीं वर्णित है अत: ऐसे उद्योग या व्यापार लाभ की स्थिति में न आकर अपनी पूँजी नहीं बढ़ा पाते हैं कर्ज के रूप में लिया हुआ धन ही दिखाई देता है। ईमानदारी से कार्य करते हुए ये अन्य को भी सलाह मशविरा देते हुए पाये जाते हैं। ब्राह्मणी भूमि पर निर्मित उद्योग या व्यापार, अपने कर्मचारियों व अन्य को लाभ देता है, प्रतिष्ठित होता है, अपनी शाखाएँ भी बढ़ा सकता है परन्तु लाभ की स्थिति में नहीं होता है। वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता एवं उपयोगिता उस औद्योगिक या व्यापारिक संस्थान की भूमि व भवन के ब्राह्मण वर्ण वाले गुणों में परिवर्तन कर वैश्य वर्ण के गुणों की अभिवृद्धि करने या वैश्य वर्ण वाली भूमि पर ही ऐसे उद्योग धन्धों को स्थापित करने की है।
कार्य एवं उद्देश्य के अनुरूप ही वर्ण के गुणों से युक्त भूमि व भवन का चुनाव उस कार्य एवं उद्देश्य की अभिवृद्धि करता है
Sthapatyam
Vol.6
Issue.2
डाॅ. निहारिका
अल्मोड़ा
से 35 कि.मी. और काठगोदाम से 130 कि.मी. की दूरी पर जागेश्वर धाम है जिसे
वहाँ के द्वादस ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है। जटा गंगा के तट पर
स्थित यह मन्दिर समूह देव भूमि उत्तराखण्ड के पवित्र स्थानों में से एक
है।
अपने अनोखे स्थापत्य के लिये
प्रसिद्ध इन मन्दिरों का निर्माण कात्यूरी राजाओं द्वारा (800-1100 ई.) में
कराया गया। ये सभी मन्दिर समूह रूप में स्थित है जिनका स्थापत्य
भिन्न-भिन्न है। पूर्ववर्मन का तालेश्वर ताम्रपत्र से यह निश्चत होता है कि
इन मन्दिरों का निर्माण छठीं-सातवीं शताब्दी में प्रारम्भ हो चुका था
जिसका प्रमाण शुंग, कुषाण और गुप्त कालीन कलाकृतियों से भी होता है।
प्रारम्भ
में लकड़ी के मन्दिर बने थे पर कालक्रम में उनके जगह पर पत्थर के मन्दिर
बनाये गये, जैसा कि अभी भी महामृत्युँजय और नवदुर्गा मन्दिर देखने से पता
चलता है। इन मन्दिरों का निर्माण पत्थरों को लोहे के कील से जोड़कर किया गया
है जिससे भूकम्प आने पर भी उनका नुकशान नहीं होता। इन मन्दिरों का निर्माण
एक बड़े चैकोर सतह पर किया गया है। मुख्य मन्दिर जागेश्वर के चारों तरफ कई छोटे बड़े मन्दिर हैं।
Source: Author
जागेश्वर
में 124 मन्दिरों का समूह है जिनमें कुछ तो 8वीं-9वीं शताब्दी और कुछ
10वीं शताब्दी के बने हुये हैं। पत्थरों से मन्दिरों का निर्माण पहली से
दूसरी शताब्दी में शुरू हो गया था पर छठी-सातवीं शताब्दी में इनके विकसित
स्वरूप देखे जाते हैं, जो तत्कालीन राजाओं द्वारा बनवाये गये थे।
जागेश्वर
समूह के 124 मन्दिरों में से तीन मन्दिर कुबेर समूह के, 14 दण्डेश्वर समूह
के है जिसका स्थापत्य दर्शनीय और सराहनीय है। इन मन्दिरों का निर्माण पाँच
तरह से किया गया है।
1-समतल छत 2- रेखा लातीन शिखर 3-पिरामिड शिखर 4-बल्लभी 5-मिश्रित शिखर
मन्दिर
में प्रयोग किये गये पत्थर भूरे रंग के हैं जो उत्तराखण्ड के जंगलों में
बहुतायत से मिल जाता है। लाल रंग के चित्तीदार पत्थर भी कहीं-कहीं उपयोग
किये गये है। इन पत्थरों को जोड़ने के लिये सीमेन्ट या चूने का उपयोग नहीं
किया गया है। समतल छत वाले मन्दिरों का निर्माण गुप्तकाल में हुआ। इन मन्दिरों में बरामदा और मण्डप नहीं है। रेखा लातीन स्टाइल के मन्दिरों के छत समानान्तर बने हैं जिन्हें फूल-पत्तियों के बेल बूटे से सजाया गया है। पिरामिड स्टाइल के शिखर जागेश्वर, लकुलीश और नटराज मन्दिर के है जिनके बेदीवन्ध और जंघा साधारण है। वल्लभी
स्टाइल के मन्दिरों के शिखर हाथी के पृष्ठ जैसे होते हैं। नवदुर्गा मन्दिर
का शिखर इसी स्टाइल में बना है। पश्चिमाभिमुखी चण्डी के मन्दिर का शिखर मिश्रित स्टाइल का है। इस मन्दिर में रेखा लातीन शिखर और पिरामिड शिखर दोनों का मिश्रण देखा जा सकता है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्य जर्नल
Sthapatyam
Vol.3
Issue.6
डाॅ. विनय कुमार
प्रत्येक
ग्रामीण परिवेश में शिल्पकारों का महत्व है। बिहार राज्य के शिल्पकारों का
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान प्रारम्भ से ही देखा जा सकता
है। ग्रमीण समाज का ताना-बाना विभिन्न जातियों को मिलाकर बनता है। ये
जातियाँ अपने सामाजिक दायित्व को भलि-भाँति पूरा करतीं हैं जिससे ग्रामीण
समाज की अर्थव्यवस्था ठीक से संभल पाती है और साथ ही देश को अर्थव्यवस्था
में भी ग्रामीण शिल्पकारों का महत्वपूर्ण स्थान रहता है।
ग्रामीण
समाज में कई तरह के वर्ग होते है जैसे- लोहार, कुम्हार, चमार, नोनिया,
सुनार, बढई इत्यादि। ये सभी वर्ग अपने कार्य में दक्ष होते हैं और गाँव में
एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति तो करते ही हैं साथ ही अन्य जगहों पर भी
अपनी शिल्प को बेचकर आर्थिक रूप से समृद्ध बनते हैं ।
भारतीय
हस्त शिल्प का उदाहरण हमें आज से 5000 वर्ष पूर्व का प्राप्त होता है।
सिन्धु घाटी की सभ्यता में (3000 बीसी. - 1700 बीसी.) हमें हस्त शिल्प के
नमूनें देखने को मिलते हैं। प्राचीन समय में भी भारतीय सिल्क का निर्यात
बाहर के देशों में होता था। हमारे देश का सिल्क हमेशा से मशहूर रहा जिसमें
बिहार का मलबरी सिल्क बहुत प्रसिद्ध है।
17वीं-19वीं शताब्दी में बिहार का राॅ सिल्क
महत्वपूर्ण व्यपारिक वस्तु था जिसका निर्यात बाहर के देशों तक में होता
था। 1621 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वारा पटना में एक सिल्क का
कारखाना खोला गया था जिसके लिए पटना बहुत मशहूर था।
Source: Author
बिहार
का राॅ सिल्क सबसे अच्छा माना जाता है। 18वीं सदी में बिहार सिल्क उत्पादन
का सबसे बड़ा केन्द्र था। उस काल में बिहार में कपड़े पर रंग चढाने का काम
भी बहुत विकसित हो चुका था। सूती, उनी या रेशमी वस्त्रों पर कई प्रकार के
रंग चढाये जाते थे जैसे- फूल, फल, पत्ते, जड़, बीज, पेड़ों की छाल, मिट्टी और
कुछ कीड़े भी थे जिनसे रंग चढ़ाने का काम होता था। रंग चढ़ाने वाली जातियों
को रंगरेज कहा जाता था जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों होते थे। मुस्लिम
समुदाय में उन्हें सेख कहा जाता था और हिन्दू समुदाय में टाँटी।
बिहार की मधुबनी शिल्प
जिसे मिथीला पेन्टिग के नाम से भी जाना जाता है, एक खुबशूरत चित्र कला है।
इस पेन्टिग को अँगुली, पेन, ब्रश, माचीस की तिल्ली का प्रयोग करके बनाया
जाता है। इस कला की रामायण काल से प्रसिद्धि है जब जनक जी ने सीताजी के
विवाह के लिए नगर को सजाने की आज्ञा दी थी। 1934 ई. में आये भूकंप में
ध्वस्त घरों के अवशेषों का निरीक्षण करते समय विलीयम. जी. आर्चर नामक अंग्रेज अधिकारी की नजर इस कला पर पड़ी और उसने इस कला को विश्वमंच पर स्थापित किया।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल
Sthapatyam
Vol. 5
Issue. 4
डाॅ. विनय कुमार
प्राचीन ग्रन्थों में गान्धार क्षेत्र का वर्णन देखा जाता है। गान्धार शब्द का अर्थ गन्ध से भरा क्षेत्र है। गान्धार शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में आता है। धृतराष्ट्र की पत्नी गान्धारी भी गान्धार से थी। गान्धार की राजधानी तक्षशीला थी। चौथी शताब्दी में अलेक्जेण्दर ने इस प्रान्त को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। चन्द्रगुप्त ने सेल्युक्स निकेटर को हराकर उसकी लड़की से शादी की और दहेज रूप में गान्धार क्षेत्र को प्राप्त किया था। उसके पौत्र अशोक ने बौद्ध धर्म को स्वीकारा और भगवान बुद्ध के दाँतों के अवशेष यहाँ रखवाये।
Source: Author
गान्धार
प्रान्त की कला जिसे गान्धार स्कूल भी कहा जाता है, उन पर पर्शीयन और
व्हेलेन्स्टीक कला का प्रभाव देखा जाता है। गान्धार कला में पर्शीय,
मौर्यन, पार्थीयन, कुषाण, सायंथीयन, सभी कलाओं का मिश्रण देखा जाता है।
गान्धार कला के अन्तर्गत बनाये गये बुद्ध मूर्तियों में सिर के ऊपर
घुंघराले बालों का जुड़ा, चहेरे पर मुँछ, माथे पर तीसरे नेत्र की बिन्दी,
रोमन टोगा के जैसा दोनों कन्धों को ढँके हुये प्लेटदार वस्त्र देखे जाते
है। ये शैली रोमन ग्रीक शैली जैसी है जिसमें भारतीय कला का पुट भी है।
भूरे पत्थर से बने गान्धार क्षेत्र की बुद्ध प्रतिमाओं में कान बड़े, भिक्षु का वस्त्र और शान्त मुद्रा समान रूप से देखे जाते है।
छठी
सातवीं शताब्दी में निर्मित कुषाण कालीन मथुरा की बुद्ध मुर्तियों में भी
गान्धार कला का प्रभाव देखा जाता है। गान्धार क्षेत्र की बुद्ध मूर्तियों
में ग्रीक देवता, 'अपोलो' से समानता देखी जा सकती है। पेशावर, तक्षशीला, हाडा (अफगानिस्तान) क्षेत्र की मूर्तियों में गान्धार कला को देखा जाता है।
यहाँ की मूर्तियाँ भूरे या नीले पत्थर से बनाई गई हैं और इनमें प्लास्टर का भी उपयोग किया गया है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम्
जितेन्द्र कुमार उपाध्याय
स्थापत्यम्
आगम
एवं तन्त्र शब्दों की व्युत्पत्ति अनेक ग्रन्थों में अनेक प्रकार से की गई
है। प्रो. विण्टरनित्ज-ठीक ठीक कहा जाए तो सहिंताएँ वैष्णवों के, आगम
शैवों के तथा तन्त्र शाक्तों के पवित्र ग्रन्थ है। श्री चार्ल्स ईलियट ने
सन् 1121 ई. में लिखा कि तन्त्र, आगम और संहिताओ ने अपने प्रतिपाद्य विषय
को चार भागो में बाँटा था-ज्ञान, योग, क्रिया और चर्या। बौद्ध तन्त्रों में
ज्ञान के स्थान पर अनुत्तर नाम मिलता है।
म.म.पी.वी.
काणे का कहना है कि लोग तन्त्रों से तात्पर्य लगाते है शक्ति की पूजा,
मुद्राएँ, मन्त्र, मण्डल, पञ्च, मकार, दक्षिण मार्ग, वाम मार्ग एवं
ऐन्द्रजालिक क्रियाएं जिनके द्वारा अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। इस
प्रकार हम देखते है कि तन्त्र एवं आगम को परिभाषित करने वाले इसे एक
संकुचित क्षेत्र में रखे हुये है जबकि (देवोभूत्वा देवं यजते) यह इनका सिद्धान्त वाक्य था एवं देव स्वरूप होकर वह अपने आराध्य को मूर्ति, पट, मन्त्र, मण्डल मे स्थापित करता था।
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वैदिक
कर्मकाण्ड से विलक्षण इस कर्मकाण्ड की निष्पत्ति के लिए जिस शास्त्र का
आविर्भाव हुआ, वही आज आगम अथवा तन्त्रशास्त्र के नाम से अभिहित है। इसका
मूल लक्ष्य है भगवान के पास पहुँचने के अपेक्षा भगवान को ही पूजक के पास
आने के लिए विवश करना तथा भक्त को भगवान के साथ संयुक्त करना। तन्त्र एवं
आगम शास्त्र ने पुराणों पर भी गहरा प्रभाव डाला और प्रत्यक्ष रूप से
मध्यकालीन, बुद्धोत्तरकालीन भारतीय धार्मिक रीतियों तथा आचारों को भी
प्रभावित किया। तन्त्रों का प्रादुर्भावः मुख्यतः भारत मे ही हुआ था चीन
इत्यादि का प्रभाव बाद में पड़ा। तंत्र की एक सामान्य प्रक्रिया है जिसको
वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध जैन सम्प्रदायों ने अपने-अपने मत के परिपेक्ष्य
में प्रकारान्तर में ग्रहण किया।
अद्वैत,
द्वैताद्वैत और द्वैत तंत्रों में दर्शानिक मतभेद होते हुए भी दीक्षा,
पूजा, मन्त्र, यंत्र इत्यादि में बहुत समानता रखते है। तंत्र से ग्रन्थों
की रचना लगभग छठवीं शताब्दीं से प्रारम्भ हो गयी जो दसवीं-ग्यारहवीं
शताब्दी तक अनवरत होती रही। तंत्र जो आजकल समाज में भय का कारक हो रहा है
वस्तुतः वह केवल वरिवस्या नहीं है बल्कि वह किसी भी मुख्य साधना का आन्तरिक
योग है कुण्डली का जागरण इत्यादि तन्त्रों का ही एक अंग है। तन्त्रों का
समाज में लोकप्रिय होने का कारण इसकी उदारता भी रही है जाति, लिंग, इत्यादि
का भेद यहाँ नही है इसका द्वार सबके लिए खुला है।
Sthapatyam
Vol.3
Issue.6
प्रोफेसर डाॅ. दीनबन्धु पाण्डेय
मौर्य कालीन स्थापत्य की सबसे बडी विशेषता पत्थरों पर की गई चमकदार पाॅलिश है। पत्थरों पर की गई पाॅलिश आज से 2500 वर्ष बाद भी उतने ही आकर्षक और चिकने हैं। मौर्य कालीन पाॅलिश कला कितनी पुरानी है, इसके ऊपर शोध होते रहे हैं। जिसमें से प्रो. निरंजन राय के शोध महत्वपूर्ण हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ने चमकीले पाॅलिश के ऊपर महाभारत के प्रसंगों का जिक्र किया है जिसमें युधिष्ठिर की सभा महत्वपूर्ण है। बाल्मिकी रामायण और महाउम्मग जातक (न. 546) में भी पाॅलिश का वर्णन मिलता है।
Source: Author
वासुदेव
शरण अग्रवाल ने माना है कि मय नामक राक्षस, जिसने युधिष्ठिर के सभापर्व का
निमार्ण किया था, वह बाहर से आया था। यानि कि पाॅलिश की आइडिया किसी बाहरी
से आया था। इसी तरह की विचारधारा से प्रो. निहार रंजन राॅय भी सहमत थे। अपस्तम्बश्रोतसूत्र और बृहत्कल्पसूत्रभाष्य
इत्यादि ग्रन्थों में भी पाॅलिश करने की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है
जिससे इस तकनीकी को बहुत पुराना यानि मौर्य काल से भी प्राचीन माना जाता
है। महाभारत में लक्ष्मण के भवन को सूर्यप्रभा सा चमकीला कहा गया है।
खुजराहो स्थित महावराह की मूर्ति और भोजपुर स्थित भोजेश्वर के शिव लिंग की
पाॅलिश दर्शनीय है। पत्थरों पर पाॅलिश का काम मौर्य कालीन न होकर और पहले
का है। मौर्य सम्राट बिन्दुसार के समय से इस कला का प्रचलन हो चुका था।
दिल्ली टोपरा से प्राप्त स्तम्भ न. 7 जो अशोक के पहले का था, उस पर सम्राट
अशोक ने अभिलेख लिखवाया। वैशाली से प्राप्त स्तम्भ भी सम्भवतः बिन्दुसार के
समय का है। इन स्तम्भों की पाॅलिश आज भी चमक लिये हुये है। पाॅलिश की
परम्परा बहुत प्राचीन सिद्ध होती है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम्
Sthapatyam
Vol.2
Issue.11
आर्की. निधि पाण्डेय
सातवाहन सम्राटों के काल, लगभग दूसरी शताब्दी में दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार प्रारम्भ हुआ और स्तूप बनवाये गये जिसमें अमरावती भी एक था। अमरावती का बौद्ध स्तूप सभी स्तूपों में बड़ा और आकर्षक था।
Source: Author
दक्षिण
भारत में बौद्ध धर्म अधिक समय तक नहीं टिक पाया। लगभग चौथी शताब्दी
आते-आते यहाँ से बौद्ध धर्म समाप्त हो चुका था। आंध्र प्रदेश के गुण्टुर
जिले से 32 कि.मी. और विजयवाड़ा से 39 कि.मी. की दूरी पर कृष्णा नदी के
दक्षिण दिशा में अमरावती नामक जगह है। लगभग 1344 ई. तक इस स्तूप का प्रयोग
बौद्ध धर्मावलंबियों द्वारा किया जा रहा था पर उसके बाद इस स्तूप के कई भाग
क्षतिग्रस्त होते चले गये। 1797 ई. में काॅलीन, मेकेंजी नामक एक ब्रिटिश
ऑफिसर ने इस जगह को देखा और इस बिखरे हुये धरोहर की सूचना एशियाटिक सोसाइटी
ऑफ बंगाल को दी, बाद में 1816 ई. में मेकेंजी ने इन बिखरे हुये अवशेषों को
कलकत्ता म्यूजियम में रखवाया। 1840 में सर वाल्टर नामक अंग्रेज ने यहाँ की
खुदाई करवाई। 1880 ई. में राबार्ट सावेल ने भी कुछ जगहों की खुदाई करवाई
और अवशेषों को इकट्ठा किया। प्राप्त अवशेषों से अमरावती के स्तूप की
जानकारी मिलती है कि इस स्तूप का हीनयान प्रकार से निर्माण प्रारम्भ हुआ और जो धीरे-धीरे महायान प्रकार में बदलने लगा।
यह
एक बड़ा स्तूप था जिसकी गुम्बज का आधार 162 फीट था और प्रदक्षीणा पथ 30 फीट
चौड़ा था। सम्पूर्ण संरचना 192 फीट में बना हुआ था और इसकी ऊँचाई लगभग
90-100 फीट के आस-पास थी। बाहरी रेलिंग की ऊँचाई लगभग 13 फीट की थी जिसमें
तीन तीन कलात्मक पत्थर की धारियाँ बनी हुईं देखी जाती हैं। इनके प्रत्येक
खंम्बो पर एक-एक छोटे स्तूप बने हुये थे। इस स्तूप के चारों तरफ खुला हुआ
स्थान था।
बौद्ध स्मारक तो अब
लगभग समाप्त हो चुके हैं, पर बचे हुये संगमरमर के भग्न अवशेष अभी भी
ब्रिटिश, चेन्नई और कोलकाता के म्यूजियम में रखे हुये हैं। स्थापत्य की
दृष्टि से अमरावती स्तूप के पत्थरों पर की गई कला सराहनीय है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम्
Sthapatyam
Vol.1
Issue.8
राजेन्द्र यादव
नागर
प्रकार के मन्दिरों में से एक भुमिजा प्रकार के मन्दिर हैं जिन्हें परमार
प्रकार के मन्दिर भी कहा जाता है मध्य प्रदेश के निमार जिले में ओंकार
मानधाता स्थित अमरेश्वर मन्दिर को इसका प्रारम्भिक स्वरूप माना जाता है
(10वीं शताब्दी), बाद में इस तरह के मन्दिर गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र,
तेलांगना और कर्नाटक में भी बनाये गये।
समरांगण
सूत्रधार के 65 वें अध्याय में भूमिजा प्रकार के मन्दिरों की विशद
व्याख्या मिलती है। प्रासादमण्डन में आठ प्रकार के मन्दिरों का वर्णन किया
गया है जिसमें नागर, द्रावीण, भूमिज, लातीना, सानधारा, विमान नागर, विमान पुष्पक और मिश्रक। भुमिजा मन्दिर इन आठ प्रकार के मन्दिरों मे से एक है जो विशेषकर शिवजी के मन्दिरों में पाये जाते हैं (Jain Bhagwandas 1963, p.3)
नागरा द्राविडाश्चैव भूमिजा लतिनास्तथा।
सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाकिंता।।
मिश्रकास्तिलकैः श्रृगैंरष्टौ जातिषु चोत्तमाः।
सर्वदेवेषु कत्र्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ।। प्रासादमण्डन, 1.7-8
अपराजितपृच्छा
में 25 प्रकार के मन्दिरों का वर्णन प्राप्त है। महोबा का शिव मन्दिर और
मकरवाई का मन्दिर भुमिजा प्रकार के मन्दिरों और नागर शिखर में आते हैं।
लखनऊ से महोबा की दूरी 319 किमी. और खुजराहो से 55 किमी. है। महोबा अपने
अन्दर समृद्ध विरासत को समेटे हुये सुन्दर पर्यटन स्थल है। बारहवीं से
तेहरवीं शताब्दीं में इस शैली के मन्दिरों का निर्माण महोबा में प्रारम्भ
हुआ जो संभवतः मदनवर्मन का समय था।
ये
मन्दिर चन्देल प्रकार के मन्दिरों से भिन्न है। ग्रेनाइट पत्थरों से बने
ये मन्दिर पञ्चरथ था सप्तरथ आकृति के हैं। जो पीठ, मण्डोवर और शिखर युक्त
है और पञ्चभूमि में बँटे हुये है। कुछ स्थानीय वास्तु रचना के साथ इन
मन्दिरों का स्थापत्य भूमिजा प्रकार के मन्दिरों से थोड़ी भिन्न है। महोबा
के मन्दिरों की शिल्परचना मध्य-युगीन महाराष्ट्र के मन्दिरों की सजावट से
की जा सकती है। रहीलिया, खाखरा मठ, मकरवाई और रावतपुर के मन्दिरों का
स्थापत्य नागर शैली के भुमिजा मन्दिर स्थापत्य है जिसमें क्षेत्रीय
स्थापत्य कला भी शामिल है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम्
Sthapatyam
Volume.5
Issue.1
प्रो. अरविन्द कुमार सिंह
मध्यप्रदेश
के शिवपुरी नगर में स्थित बाणगंगा, जहाँ पर स्थित प्राचीन मन्दिर, बावन
कुण्ड तथा गणेश जी की प्रतिमा प्रसिद्ध है। महाभारत में बाणगंगा का उल्लेख
भीष्म की प्यास बुझाने के लिये लिखा गया है परन्तु वहाँ के प्रस्तर अभिलेख
के अनुसार पाण्डव अर्जुन ने गाय की प्यास बुझाने के लिए तीर मारकर
जलस्त्रोत बनाकर गाय की प्यास बुझाई थी।
गंगा का इसी स्थान के आस-पास बावन कुण्ड़ों के रूप मेें प्रकट होने की घटना को बावन गंगा के रूप में उल्लेख है।
गर्दे
(1991/1934.35.13) में बाणगंगा कुण्ड़ परिसर में स्थित स्तम्भ, शिला फलक
तथा जैन चरण पादुका चौकी पर अकिंत सात अभिलेखों के विद्यमान होने की जानकरी
प्राप्त होती है। सम्वत 1703 में तिथ्याकिंत इन अभिलेखों में धार्मिक
महत्व के अनेक कार्यों का वर्णन है जैसे कुण्ड निर्माण, मन्दिर निर्माण,
जैन तथा हिन्दू देवों की स्थापना, तुलादान।
बाणगंगा
के अभिलेखों का अध्ययन अनेक दृष्टियों में महत्वपूर्ण है। इन में मुगल
बादशाह शाहजहाँ के अधिनस्थ स्थानीय शासक महाराज श्री अमर सिंह के शासनात
होने का भी उल्लेख प्राप्त होता है। अभिलेख के अनुसार जैन तीर्थकरों की चरण
पादुका के साथ-साथ विश्वनाथ महादेव (शिव) की स्थापना जैन दानदाता द्वारा
एक ही मन्दिर में करवाई गई थी जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उस समय
विभिन्न धर्मावलम्वियों के मध्य धार्मिक सहिष्णुता तथा अन्य धर्मों के
प्रति समादर का भाव व्याप्त था।
नागरी
लिपि एवं भ्रष्ट संस्कृत भाषा में लिखित इस अभिलेख का उल्लेख कुछ
विद्वानों (गर्दे 1991/1934.35.22) द्विवेदी 2004: 446 विलिस 1996: 55
द्वारा पूर्व में किया गया है किन्तु अभी तक इसका प्रकाशन नही हुआ है।
Source: Author
एक ही पाषाण पर अंकित अभिलेख को बीच में लकीर खींचकर तीन भागों में विभक्त किया गया है।
प्रथम
खण्ड में पाँच पंक्तियाँ हैं जिनमें स्थानीय शासक महाराज श्री अमर सिंह का
उल्लेख है। अभिलेख का प्रारम्भ श्री राम नाम तथा आदिनाथ महावीर के मन्दिर
के उल्लेख के साथ हुआ है।
बाणगंगा का उल्लेख सौमपुरी तीर्थ के रूप में किया गया है।
द्वितीय
खण्ड में मोहनदास की वंशावली उल्लिखित है। तृतीय खण्ड में मनीकई कुण्ड
निर्माण, मन्दिर निर्माण, 24 तीर्थंकरों, पाशर्वनाथ, विश्वनाथ महादेव,
प्रतिमा की स्थापना मोहनदास द्वारा शक शालिवाहन सम्वत 1568 तथा विक्रम
सम्वत (1703) ईस्वी 1646 में वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन करवाए जाने का
उल्लेख है।
स्तम्भ अभिलेख
अभिलेख
का आरम्भ तीर्थंकर की आराधना गणधर तथा कुंदकुंद परम्परा के उल्लेख के साथ
हुआ है। जिसमें स्थापना काल तथा प्रतिमा की प्रतिष्ठा इत्यादि का वर्णन
है।
खण्डित स्तम्भ अभिलेख
अभिलेख
के खण्डित होने के कारण इसके वण्र्य विषय के सन्दर्भ में स्पष्ट जानकारी
उपलब्ध नहीं हो पाती है। सम्भवतः घुहराया जाति के लोगों द्वारा निर्माण
करवाने तथा उपासना किए जाने का उल्लेख अभिलेख में हुआ है।
चरण पादुका अभिलेख
अभिलेख
में सम्वत् 1703 में निर्मित चौबीसी चरण पादुका के पुननिर्माण का विवरण
दिया हुआ है जिसका संघई मोहनलाल द्वारा करवाया गया था।
संगमरमर पाषाण अभिलेख
बाणगंगा
की उत्पत्ति बतलाने वाला यह अभिलेख गोविन्द दास गोयल द्वारा स्वर्गीय
महन्त बाबा पुस्करदास जी की वाणी द्वारा सुनकर एवं अपनी स्वर्गीय माता की
स्मृति में लगाया गया है।
जितेन्द्र कुमार उपाध्याय
स्थापत्यम् जर्नल
Sthapatyam
Vol. 2
Issue. 9
Dr. Rashmi Kala Agrawal
प्रकृति
कई चीजों से सुशोभित है जैसे मनुष्य फल, फूल, पेड़, पौधे, पक्षी जानवर
इत्यिादि। इन सभी में मनुष्य ज्ञानवान प्राणी है जो अपनी भावनाओं को कला,
काव्य या लेखनी के माध्यम से व्यक्त करता है।
अजन्ता की विश्वप्रसिद्ध चित्र कला भगवान बुद्ध के बाद की हैं जिसको वकाटक
नामक चित्रकार ने अपने सूक्ष्म प्राकृतिक अवलोकन से अजन्ता की गुफाओं को
जातक कथाओं के चित्रों से चित्रित किया। जातक कथाओं में जानवरों जैसे हाथी,
घोड़ा, बन्दर, हँस, मृग आदि का वर्णन है, ठीक उसी तरह से गुफाओं की दीवार
इन चित्रों से बोधिसत्व की कहानी को कहते हुये प्रतीत होते हैं।
गुफा
नं 1 में महाजनक जातक की कथाओं से लिये गये जंगली मृग के जोड़े को जो
महाजनक की बातों को ध्यान से सुन रहे है, दर्शाया गया है। गुफा नं 1 का ही
एक और चित्र जिसमें किन्नर, बन्दर, मोर संसारिकता में लगे हैं और एक हँस जो
बोधिसत्व पद्मपानी को पीछे मुड़कर देख रहा है। ये चित्र मनमोहक हंै। पशु
पक्षी और जानवरों के चित्र बनाने की परम्परा बहुत पहले से है जिसकी चर्चा
विष्णुघर्माेत्तर पुराण में तृतीय खण्ड के अध्याय 42, 47, 48 में देखी जाती
है। गुफा नं. 17 में छदन्त जातक (514) की कथा, जंगल में हाथियों के झुंड
के बीच बोधिसत्व का चित्रण बहुत ही सुन्दर और शान्तिप्रद है। इसी जातक में
वर्णित कथा का चित्रण जिसमें एक शिकारी और बन्दर एक पलाश वृक्ष के नीचे
बैठे हैं और चिटियाँ पेड़ पर चढ़ रहीं हैं, दर्शनीय हैं।
सुतसोम
जातक की कथा (525) गुफा नं. 17 में चित्रित है जिसमें घोड़े पर चढ़े राजा
सुदास और घोड़े के पैरों की मुद्रा दर्शनीय है। मतीपोषक जातक (455) में
वर्णित कथा जिसमें अन्धे हाथी के बच्चे की देखभाल उसके माता-पिता कर रहे
हैं और बोधिसत्व हाथी माँ हाथी के उपर पानी डाल रहे हैं।
महिष
जातक की कथा (278) में भैंसे को परेशान करता हुआ बन्दर और शान्त महिष का
चित्र गुफा नं. 17 में देखा जा सकता है। महिष जातक की कथा जिसमें बन्दर से
परेशान भैंसा उसे जमीन पर गिरा देता है और भय मिश्रित क्षमा याचना करते
हुये बन्दर के चित्र में भावनाओं की बारीकी देखी जा सकती है।
महाहँस
जातक (534) की कथा, पंक्ति बद्ध उड़तें हुये हँसों का चित्रण गुफा नं. 17
की दीवार पर बना हुआ है। कपि जातक (250) की कथा गड्ढे़ में गिरे हुये
शिकारी को बचाता हुआ बन्दर और बन्दर को मारने की कोशिश करते शिकारी का
चित्र. गुफा नं. 17 की दीवार पर बना हुआ है।
महाहँस
जातक (534) का सुनहरा हँस और एक बच्चे के हाथ में मुर्गी, जिसे वो देवी
हरीती को समर्पित करने जा रहा है, गुफा नं. 2 में देखा जा सकता है।
महाजन
जातक (539) की कथा जिसमें राजा जनक रानी के साथ बै्रकेट में बैठे हैं, उस
बै्रकेट के पाये में बनाए गये शेर का चित्रण गुफा नं. एक में देखा जा सकता
है।
इन्हे देखकर यह सिद्ध होता है कि चित्रकार वकाटक
भी बौद्ध धर्म के अनुआई थे और उन्होंने बौद्ध ग्रन्थों का गहन अध्यन किया
था। भावनापूर्ण चित्रों के माध्यम से जातक कथाओं का वर्णन कला की पराकष्टा
है जो अजन्ता के भित्ती चित्रों में देखे जा सकते हैं।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल
भागवत पुराण का काल निर्धारण: एक समीक्षा
Sthapatyam
Vol-3, issue-2
Prof. Dr. Samaresh Bandyopadhyay
Principal Advisor,
North American Institute for Oriental and Classical Studies, Franklin, Tennessee, U.S.A.
भागवत पुराण
कब लिखा गया यह एक विवाद का विषय है। इस महापुराण के तीसरे अध्याय के कुछ
श्लोकों की समीक्षा करने पर इसे 3000 से 5000 वर्ष पूर्व का माना गया है पर
बहुत से मतमतान्तरों को देखने पर भागवत पुराण का काल निर्धारित करना कठिन कार्य है क्योेेंकि भागवत पुराण के काल निर्धारण पर कई विवाद हैं। W.M.Spink और K.Vatsyayana ने इस पुराण को दसवीं शताब्दी में लिखा गया माना है। Karl
J. Khandelvala ने नौवीं शताब्दी और K.A.Nilkanta Sastri ने इसको दसवीं
शताब्दी के प्रारम्भ काल का माना है। A.D.Pratapaditya Pal ने 900 A.D. के
कुछ समय पहले तमील प्रदेश मे लिखा गया, ऐसा माना है।
R.C. Majumdar ने कहा कि भागवत पुराण
के काल का निर्धारण करना मुश्किल है। बहुत से विद्वानों ने इसका काल
निर्धारण सातवीं से नौवीं शताब्दीं को माना है जबकि B.B.Mazumdar ने भागवत पुराण और सभी पुराणों का काल निर्धारण छठवीं शताब्दीं के नजदीक माना है। R.C. Hazra ने छठी शताब्दी के पूर्वाह्न को माना है।
Source: Author
छठी
शताब्दी के पूर्वाह्न काल में महाभारत पुराण का लेखन हुआ इस विचार धारा से
हमें सहमत होना लाजमी है क्योंकि ये वो काल है जिसमें गुप्त वंश का शासन
था और गुप्तों के सिक्कों और अभिलेखों को देखकर इसकी सत्यता प्रमाणित होती
है।
परमभागवत महाराजाधिराज श्री कुमार गुप्त महेन्द्रादित्य गुप्त कालीन सिक्कों पर लिखे हुये पाये गये। चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम और स्कन्द गुप्त को परमभागवत के सम्बोधन से अभीहीत किया गया, जिससे भागवत काल का निर्धारण हो पाता है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम्
Sthapatyam
Vol.2, issue.9
डाॅ. राधेश्याम द्विवेदी
उत्तर
प्रदेश की नेपाल सीमा से लगे राप्ती नदी के उस पार वर्तमान बस्ती मण्डल के
सिद्धार्थ नगर जिले के अन्तर्गत पिपरहवा एवं गनवरिया को वास्तविक रूप में
कपिलवस्तु होने का गौरव प्राप्त हुआ है।
1898
ई. में विलियम सी.पेप्सी एवं 1970-76 ई. में के.एम. श्रीवास्तव के उत्खनन
प्रमाणों से अब तक लागभग 1000 ई. पूर्व के प्रमाण लोगों के सामने आये थे
परन्तु वर्तमान में बी.आर. मणि जी एवं पी.के. मिश्रा द्वारा उत्खनित
अनुसन्धानों (2012-13 ई.) के नवीनतम परिणामों ने इस अनुसंधान को 2000 ई.
पूर्व तक सिद्ध किया है।
Source: Author
भगवान
बुद्ध की अस्थि का विभाजन इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है जिसमें उत्तर
प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के पिपरहवा से 1897 में नहर खुदाई के दौरान
प्राप्त पाँच अस्थि कलश इस बात के सबूत है। पी.सी. मुखर्जी ने 1899 ई. में
नेपाल के तराई के साथ पिपरहवा का संक्षिप्त उत्खनन कराया था। उन्होंने
नेपाल के तिलौराकोट को कपिलवस्तु बताया है। रीज डेविड्स ने तिलौराकोट को
प्राचीन तथा पिपरहवा को नवीन कपिलवस्तु बताया है। नवीन कपिलवस्तु का
निर्माण संभवत विडूड्भ द्वारा नष्ट करने के बाद किया गया प्रतीत होता है।
इन दो स्थानों का विवाद बहुत दिनों तक चलता रहा। देबला मित्रा ने 1962 ई.
में गनवारिया को कपिलवस्तु माना है, जो पिपरहवा से एक कि.मी. दूर है। दीर्घ
समय तक विवाद में रहने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पटन मण्डल के
तत्कालीन अधीक्षक के.एम. श्रीवास्तव ने 1971-75 ई. के मध्य पिपरहवा स्तूप
का तथा 1974-76 ई. तक वहाँ से दक्षिण पश्चिम एक कि.मी. दूर स्थित गनवरिया
नगर का उत्खनन कराया। स्तूप के पास संघाराम से निकली उत्कीर्णित अभिलेख
“ओमदेवपुत्र विहारे कपिलवस्तु भिक्क्षु संघम” तथा “महा कपिलवस्तु
भिक्क्षुसंघम” से कपिलवस्तु की पहचान सुनिश्चित हो गई है। यह 27०, 26,, 30,, उत्तरी अक्षाँस तथा 83०, 07,, 50,, पूर्वी देशान्तर पर उत्तर प्रदेश के वर्तमान बस्ती मण्डल के सिद्धार्थ नगर जिले में स्थित है।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल
Sthapatyam
Volume.1
Issue.5
डाॅ0 अरूण केसरवानी
हरियाणा
के कुरूक्षेत्र जिले में शेख चेहली का मकबरा देश का प्रमुख राष्ट्रीय
स्मारक है। इसे दाराशिकोह ने शेख चेहली की याद में 1650 ई. में बनवाया था।
यह मकबरा दाराशिकोह (20 मार्च 1615 ई.-30 अगस्त 1659 ई.) के पठन पाठन और
अध्यात्मिक ज्ञान का मौलिक प्रतीक था। शेख मुइनुद्दीन चिश्ती जो लगभग 1192
ई. में भारत आये, इस मत के संस्थापक थे। निजामुद्दीन औलिया, नसीरूद्दीन
चिराग-दिल्ली इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध सूफी सन्त थे।
हरियाणा
में हाँसी नामक स्थान उनका केन्द्र था लेकिन मुगलो के समय थानेसर और
पानीपत उनके प्रमुख केन्द्र हो गये। हजरत जलालुद्दीन (मृत्यु 1582 ई.)
थानेसर के प्रसिद्ध सूफी सन्त थे। वे अकबर के समकालीन थे। 1581 ई. में अकबर
थानेसर आया था तो उनसे मिला था। उन्होने कुछ पुस्तकें लिखीं और यहाँ एक
मदरसे की स्थापना की। उसके बाद उनके दामाद शेख निजामलदीन यहाँ के प्रसिद्ध
सूफी सन्त हुये। सम्राट अकबर से उनके अच्छे सम्बन्ध थे पर जहाँगीर से उनके
सम्बन्ध ठीक नहीं थे और वे बल्ख (मध्य एशिया) में जाकर बस गये जहाँ 1627 ई.
में उनकी मृत्यु हो गई।
थानेसर की
इसी परम्परा में शेख चेहली हुये। उनका असली नाम अब्दुर्रहीम बन्नूरी था।
वे बन्नूर के रहने वाले थे। वे शेख जलाला थानेसरी से मिलने ईरान से यहाँ
आये और बाद में यहीं बस गये। उनके कई नाम थे पर शेख चेहली लोकप्रिय नाम था।
प्रसिद्ध सेखीबाज शेख चिल्ली से इनका दूर का भी रिश्ता नहीं था। चालीस दिन
तक लगातार खुदा की इबादत और चिल्ला करने के कारण इनको चिल्ली (चेहली) कहा
जाने लगा था।
वे दाराशिकोह के
अध्यात्मिक गुरू थे। मुहम्मद तुगलक, बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी और हुमायूँ
के फारसी लेखों से पता चलता है कि थानेसर के स्थानीय अफसरों ने यहाँ कई
इमारतें बनवाई, जो अब खंडहर हो गई, जो बची हैं उसमें पथरिया मजिस्द, शेख
चेहली का मकबरा और मदरसा प्रमुख है।
हरियाणा
के इतिहास में शेख चेहली का मकबरा विशिष्ट स्थान रखता है। यह मकबरा हर्ष
के टीले के पूर्वी किनारे पर स्थित है। शेरशाह सूरी (1540-1545 ई.) की
बनवाई ग्रैंट ट्रंक रोड इसी मकबरे के प्रवेश द्वार के पास से होकर जाती
थी।
Source: Author
यह
मकबरा लगभग 40.50 मी. लम्बे और 52.10 मी. चौड़े परकोटे के मध्य स्थित है।
परकोटे में 12 छतरियाँ है जिनके चारों ओर लगभग 50 से.मी. उँची जालीदार
वेेदिका है। छतरियों पर चूना सुर्खी का प्लास्टर, नीले, पीले, सन्तरी, सफेद
और लाल रंग की टाइलें लगी थी जिनके अब अवशेष बचे हैं।
मकबरा
आठ कोंणो वाले चबुतरे पर बना है। फर्श से चबुतरे की उँचाई लगभग 63 से.मी.
और इसकी एक भुजा की लम्बाई 10.30 मी. है। मकबरे का आधार योजन अष्टकोणीय है।
शेख का मजार चबूतरे के फर्श से 89 से.मी. की उँचाई पर स्थित है और उसकी एक
भुजा की लम्बाई 5.50 मी. है। इसके कोने में आठ मिनारें है जिससे इसकी
सुन्दरता में चार-चाँद लग जाते हैं। मकबरे के पास बाद का बना गजपृष्टाकार
छत का एक और मकबरा है।
इस मकबरे
में कुछ घटिया किस्म के संगमरमर का प्रयोग हुआ है जिसे देखकर ऐसा लगता है
संभवतः ताज महल के पत्थरों की तरह इन्हें भी इटली से मंगवाया गया हो या ताज
महल के बचे हुये संगमरमर से इसका निर्माण हुआ हो। 1962 में भारत सरकार ने
इसका अधिग्रहण कर राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल
मातृ स्वरूपा त्री देवियाँ सृष्टि को
संचालित करती हैं। सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा। दुर्गा शक्ति का संचालन
करती हैं माता लक्ष्मी धन और पुत्र की प्रदाता हैं और देवी सरस्वती जीवन को
राग रंग और ज्ञान से भरपूर करतीं हैं। जीवन इन तीनों के बिना नहीं चल
सकता। जीने के लिये धन चाहिये उसे संभालने के लिये शक्ति और उसे संतुलित
करने के लिये ज्ञान चाहिये।
ज्ञान के दीपक से कई तरह की विद्याओं के प्रकाश का फैलाव होता रहता है। कहीं राग रागनियों के ताना बाना है तो कहीं विद्या का विनोद।
विद्या
अपने आप में विनोद है। विद्या के कई प्रकार है। जिसे मातृ शक्ति सरस्वती
अपने कर में लिये वीणा के सप्त तारों के टंकार से झंकृत करती है।
Source Edit : Sthapatyam Team
वसंत
सभी ऋतुओं का राजा है जिसके संगीतमय वातावरण में संगीत की देवी सरस्वती को
माघ शुक्ल पंचमी के दिन आवाहित करके स्वागत किया जाता है। ऋतुराज वसंत से
देवी सरस्वती का सम्बन्ध हमें इस विचार से भी मजबूत करता है कि इस उमंग भरे
मौसम को हमें ज्ञान के मौज में जीना चाहिये। जैसा कि-
वसंत आ गया है वसंत आ गया है।
हवा हुई गुनगुनी मदहोश छा गया है ।।
जब मौसम ही मदहोश हो तो होश को संभालना पड़ेगा। होश को संभालने का काम वीणा वादिनी हीं करेंगी अतः देवी का सहारा तो चाहिये।
सृष्टि
की रचयिता ने सृष्टि की रचना तो कर डाली पर वो सृष्टि वाक् शक्ति से विहीन
थी। सृष्टि अधुरी और नीरस थी अतः अपने कमण्डल के जल से एक सुन्दर स्त्री
को, जो अपने एक हाथ में वीणा ली हुईं थीं, को प्रकट किया। उस सुन्दर स्त्री
के हाथों से वीणा के तार झंकृत हुये और शान्त सी सृष्टि में हलचल पैदा हो
गई। इस तरह वाणी की देवी सरस्वती का प्राकट्य बसंत पंचमी को हुआ और
चतुर्दिक राग, रंग और स्वर का प्रस्फुटन भी।
वसंत को ऋतुराज कहा जाता
है। सरसों के फूलों से पीली हुई धरती, सर्दियों से ठिठुरे हुये पेड़ो पर
नूतन पत्तों के बीच खिले हुये फूल, भौरों का गुंजार, समाप्त होती ठंड की
खुशी और नये अन्न से भरे खेत, यह माहौल किसे खुश नहीं करता। निरसता के बीच
सरसता का आगमन ही वसंत है जिसमें देवी सरस्वती की वीणा की झंकार मंगलमय
सृष्टि का सूचक है।
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वष्टु धियावसुः।। ऋग्वेद 1.3.10
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल
प्रोफेसर दीनबन्धु पाण्डेय
लेखन
परमपरा की शुरूआत अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि से मानी जाती है। उसके पहले
हड़प्पा और सिन्धु घाटी सभ्यता में कुछ सांकेतिक चिन्ह अवश्य देखे जाते हैं
पर उसे शब्द रूप में आबद्ध नहीं किया जा सकता।
अशोक
महान के समय में ब्राह्मी लिपि की लेखन परम्परा समृद्ध हो चुकी थी जो अशोक
के द्वारा पत्थर पर लिखवाये गये धार्मिक सन्देशों में देखा जाता है। इन
अभिलेखों की लेखन कला और उसकी सुन्दरता मंत्रमुग्ध कर देती है। किसी भी
संरचना का चिरस्थाई होना उसके गुणों में एक है। शिलाभिलेखों के निर्माण में
चिरस्थाई होने के लिये चिलिथितिक्या, चिरठिकित, चिरथिकित, चिलंथिकिता आदि
पाली शब्दों का प्रयोग बारम्बार किया गया है जो आज भी चिरस्थाई है।
उन
अभिलेखों को शिला फलक या स्तम्भ पर लिखवाया गया जो अमीट और अक्षुण हो गये।
अशोक के अभिलखों में भित्तिका और शाला का सन्दर्भ देखा जाता है जो वास्तु
रचना दृष्टि की महत्वपूर्ण हैं और जिसे बौद्ध भिक्षुओं के लिये जगह-जगह पर
बनवाया गया।
Source: Author
बौद्ध
संस्कृत परम्परा के अनुसार समुद्र नामक भिक्षु से धर्म के 84,000 अँग की
जानकारी प्राप्त होने पर अशोक ने बुद्ध के शरीर के धर्मावशेषों पर उतनी हीं
संख्या में स्तूप बनवाने की सोचा और दस धर्म स्तूपों के गर्भ से धर्म रज
लेकर देश विदेश के विभिन्न स्थानों पर 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया।
शिलाभिलेखों
पर कूप और मग (पथ) शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। राजभवन के विभिन्न
भाग पाकशाला (महानस), अवरोधन (ओरोधन) या अन्तःपुर, (गाभागार) शयनगृह,
उद्यान (उयान), आराम (आलम), आम्रवाटिका (अंबावाडिका) दानग्रह तथा
विश्रामगृह के उल्लेख भी मिलते हैं।
चतुर्थ
शिला अभिलेख में 'रूप' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। 'दिवियानि लूपानि
तथा दिवनी रूपानि' का अर्थ कलाकारों द्वारा रचित विमान, हस्ति एवं
अग्निस्कन्ध को कहा जाता था। लुभावने स्वरूप के लिये प्रिय शब्द का प्रयोग
तो अशोक की उपाधि प्रियदसि (प्रियदर्शी) से ही स्पष्ट है।
बराबर
के कर्णचौपार गुहा अभिलेख में बर्षा ऋतु के सन्दर्भ को लेते हुये पर्वत को
सुपिय (सुप्रिय) कहा जाना मनोहर वातावरण का संकेत देता है।
अशोक के अभिलेखों में जौगड़ एवं बराबर के विश्व झोपड़ी गुहा अभिलेख में स्वस्तिक, मत्स्य, खड्ग, आदि मंगल चिन्ह देखने को मिलते हैं।
रेनु पाण्डेय
संपादक
स्थापत्यम् जर्नल