From Temples to Museums: The many lives of Uma Maheshvara sculptures
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चित्र 1: उमा महेश्वर, नंदुआ, नवादा; 10वीं से 12वीं शताब्दी; अब पटना संग्रहालय में, अभिगमन संख्या 11065; फोटो सौजन्य: अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज (इसके बाद AIIS), गुड़गांव |
मुझे पहली बार पटना संग्रहालय में उमा महेश्वर के रूप में शिव और पार्वती (चित्र 1) की यह छवि देखने को मिली; मैं इस छवि की सुंदरता से उतना ही मोहित हुआ जितना कि वैवाहिक प्रेम के इसके बेबाक चित्रण से। जिस बात ने मेरी जिज्ञासा को जगाया वह यह थी कि संग्रहालय में इन छवियों की बड़ी संख्या पाई गई। इस प्रतीक का क्या महत्व था? 5वीं से 13वीं शताब्दी ई. तक की लंबी अवधि में बिहार के स्थलों से इस विशेष छवि की इतनी सारी किस्में क्यों पाई गईं।
उमा
महेश्वर की शास्त्रीय छवि में शिव और उनकी पत्नी उमा को एक ही आसन पर बैठे
हुए, एक दूसरे के साथ अंतरंग आलिंगन में लीन दिखाया गया है। शिव को पत्थर
के गद्दे या कमल के सिंहासन पर बैठाया जा सकता है, जबकि पार्वती शिव की गोद
या जांघों पर बैठती हैं। पार्वती को हमेशा दो भुजाओं के साथ दिखाया जाता
है, जबकि शिव की दो, चार या उससे भी ज़्यादा भुजाएँ हो सकती हैं। शिव को
लंबा और पार्वती को छोटी और लगभग बच्चे जैसी आकृति में दर्शाया गया है। वे
दोनों एक प्रभामंडल से घिरे हुए हैं, आभूषणों से सजे हुए हैं और अपनी
भुजाओं में अलग-अलग हथियार और आभूषण लिए हुए हैं। अक्सर उनके वाहन
या सवारी (पार्वती का बाघ और शिव का नंदी बैल), और गणेश और भक्तों जैसे
अन्य देवताओं को भी चित्रित किया जाता है। यह छवि ब्रह्मांडीय प्रजनन के
साथ-साथ दो शक्तिशाली और स्वतंत्र देवताओं के संश्लेषण का प्रतिनिधित्व
करती है।
धार्मिक मूर्तियों पर अधिकांश माध्यमिक साहित्य ने इन छवियों का सर्वेक्षण केवल सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से किया या आम तौर पर उन्हें केवल धार्मिक ग्रंथों के चित्रण के रूप में अध्ययन किया और उनकी जांच इस आधार पर की गई कि वे पाठ्य विवरणों को कितनी बारीकी से चित्रित करते हैं। उन्होंने छवियों के अनुष्ठान और स्थापत्य संदर्भ, उनके महत्व और उद्देश्य, उन्हें मूल रूप से कहाँ रखा गया था या उनके निर्माण के पीछे कौन से कलाकार थे, इस पर ध्यान नहीं दिया। उमा महेश्वर की छवियों में मेरी रुचि अलग है: न केवल उनकी प्रतीकात्मकता और शैली को देखना बल्कि छवियों की मूल स्थापत्य स्थिति, उनके अनुष्ठान संदर्भ, उनके निर्माण के पीछे सामाजिक-धार्मिक परिवेश और सबसे महत्वपूर्ण रूप से पवित्र छवियों के जीवन का पता लगाना और यह देखना कि वे सदियों से कैसे बची रहीं और आज उन्हें कैसे देखा जाता है।
मूर्ति
मैं इस प्रतीक की छवि और महत्व को समझना चाहता था और मैंने बिहार के संग्रहालयों, प्रकाशित अभिलेखों और ऑनलाइन फोटो अभिलेखागार और कैटलॉग से कुछ मूर्तियों के साथ शुरुआत की। जैसा कि अपेक्षित था, इनमें से बड़ी संख्या में छवियां संग्रहालयों और निजी संग्रहों में पाई गईं, लेकिन काफी संख्या में विभिन्न मंदिरों में भी बिखरी हुई थीं। फिर मैंने उन्हें विभिन्न श्रेणियों में सारणीबद्ध किया, जिसमें खोज स्थान, तिथि, प्रयुक्त सामग्री, शैलीगत प्रकार शामिल थे, और स्थानिक और लौकिक समानताओं और विविधताओं की जांच करने के लिए उनका मानचित्रण किया (चित्र 2 और 3)।
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चित्र 2: उमा महेश्वर, कष्टहरिणी घाट, मुंगेर इस प्रतीक को 'क्लासिक' पूर्वी भारतीय मुद्रा में दर्शाता है; 9वीं10वीं तकशताब्दी; अब पटना संग्रहालय में, अभिगमन संख्या 6837; फोटो सौजन्य एआईआईएस, गुड़गांव |
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चित्र 3: उत्कीर्ण उमा महेश्वर, कुर्किहार; 910वीं तकशताब्दी; कांस्य; अब पटना संग्रहालय में, अभिगमन संख्या, 9660; फोटो सौजन्य एआईआईएस, गुड़गांव |
माध्यमिक और ऑनलाइन स्रोतों के सर्वेक्षण के अपने पहले दौर में मैंने बिहार से लगभग 80 उमा महेश्वर मूर्तियों की पहचान की। छवि के प्रकार की बारीकी से जांच करने पर मुझे एहसास हुआ कि छवियों के निष्पादन की शैली में बहुत भिन्नता थी - शरीर की मुद्रा, हाथों और पैरों की स्थिति, चेहरे की अभिव्यक्ति, पीठ की पटिया, सहायक आकृतियाँ आदि। बिहार की उमा महेश्वर मूर्तियाँ विभिन्न सामग्रियों जैसे ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, स्लेट आदि और यहाँ तक कि कांस्य और अष्टधातु (आठ धातुओं का एक पारंपरिक मिश्र धातु) में बनाई गई थीं। हालाँकि सबसे लोकप्रिय पत्थर काला बेसाल्ट था जो आमतौर पर 8वीं और 12वीं शताब्दियों के बीच पूर्वी भारत की छवियों से जुड़ा हुआ है।
बिहार में उमा महेश्वर की प्रतिमाओं का सबसे बड़ा संकेन्द्रण पटना, जहानाबाद, रोहतास, गया, औरंगाबाद, नालंदा और नवादा के दक्षिणी जिलों में है और संकेन्द्रण का दूसरा क्षेत्र भागलपुर और मुंगेर जिलों में गंगा नदी के किनारे स्थित है (चित्र 4)। मुझे जो बात प्रभावित करती है वह यह है कि इस क्षेत्र को बौद्ध धर्म के गढ़ के रूप में देखा जाता है, जिसमें बोधगया और नालंदा प्रमुख केंद्र हैं और राजगीर और पावापुरी जैन तीर्थस्थल हैं। इस बीच गया शहर श्राद्ध (पूर्वजों को सम्मानित करने के लिए हिंदू अनुष्ठान) के अनुष्ठान से जुड़ा हुआ है और अब यह एक प्रमुख वैष्णव (हिंदू संप्रदाय जो भगवान विष्णु की प्रधानता में विश्वास करता है) केंद्र है। ऐसा कहने के बाद, ये सभी स्थल एक मजबूत शैव उपस्थिति (हिंदू संप्रदाय जो भगवान शिव की प्रधानता पर जोर देता है) के प्रमाण दिखाते हैं।
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चित्र 4: दक्षिण बिहार का मानचित्र जिसमें प्रमुख धार्मिक स्थल दर्शाए गए हैं; लेखक का अपना |
पिछले कुछ वर्षों में, मैंने अकेले इस क्षेत्र से 150 से अधिक उमा महेश्वर मूर्तियां खोजी हैं। मेरी छवियों की सबसे बड़ी संख्या 9वीं और 12वीं शताब्दी के बीच की अवधि की है और मेरे डेटा में सबसे पुरानी छवि 5वीं और 8वीं शताब्दी के बीच की है (चित्र 5)।
12वीं/13वीं शताब्दी में प्राप्त बाद की छवियों से पता चलता है कि कैसे मूर्तियां समय के साथ अधिक विस्तृत और अत्यधिक अलंकृत हो गईं (चित्र 6)।
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चित्र 6: उमा महेश्वर, बोधगया बाद के मंडल शैली प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करता है; 11 वीं13 तकशताब्दी; अब पटना संग्रहालय में; फोटो साभार: एआईआईएस, गुड़गांव |
संग्रहालयों
इनमें से कुछ चित्र वर्तमान में संग्रहालयों और निजी संग्रहों में पाए जाते हैं और उन्हें सूचीबद्ध किया गया है और कुछ प्रकाशित किए गए हैं। मैंने इन सभी संग्रहालयों का दौरा किया, लेकिन बिहार की उमा महेश्वर की मूर्तियों को ट्रैक करना अधिक कठिन था, जो अब यूरोप और यूएसए के संग्रहालयों में हैं (तालिका 1)। यह देखना मेरे लिए आकर्षक और आश्चर्यजनक दोनों था कि बिहार के सुदूर गांवों और स्थलों से ये मूर्तियाँ दुनिया भर के इतने सारे संग्रहालयों और कला संग्रहों तक कैसे पहुँची हैं।
भारत में , ये चित्र विभिन्न संग्रहालयों में पाए जाते हैं, जहाँ उनके प्रदर्शन का संदर्भ और वर्गीकरण बहुत भिन्न होता है। उत्खनन से प्राप्त मूर्तियाँ अक्सर अपना पहला घर साइट संग्रहालयों में पाती हैं, जहाँ किसी विशेष उत्खनन से प्राप्त कलाकृतियाँ रखी जाती हैं, जैसे नालंदा और बोधगया में। इनमें से बड़ी संख्या में चित्र अब पटना संग्रहालय में संग्रहीत और प्रदर्शित हैं, और इनका उद्देश्य बिहार राज्य के गौरव और पहचान को प्रदर्शित करना है। जिन जिलों में अपने संग्रहालय हैं जैसे गया, भागलपुर और नवादा, वहाँ चित्र जिलों के भीतर ही रखे गए हैं। कभी-कभी असाधारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण बिहार की कई मूर्तियाँ राज्य के बाहर कोलकाता के भारतीय संग्रहालय; नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय; मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय (पूर्व में प्रिंस ऑफ़ वेल्स संग्रहालय) और इलाहाबाद संग्रहालय आदि में भी पहुँच गई हैं।
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जगह |
संग्रहालय |
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संयुक्त राज्य अमेरिका |
मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, न्यूयॉर्क; म्यूज़ियम ऑफ़ फाइन आर्ट्स, बोस्टन; एशियन आर्ट म्यूज़ियम, सैन फ्रांसिस्को; क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट; रॉकफेलर संग्रह आदि। |
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यूरोप |
ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन; संग्रहालय फर इंडिशे कुन्स्ट, बर्लिन; रिज्क्सम्यूजियम, लीडेन, नीदरलैंड्स; पैन-एशियाई कला गैलरी, ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड आदि। |
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नीलामी घर |
क्रिस्टी और सोथबी |
तालिका 1: विदेशों में उमा महेश्वर की मूर्तियां
बिहार के मंदिर
यह कहानी का सिर्फ़ आधा हिस्सा था; उत्खनन रिपोर्ट पढ़ने और फोटो अभिलेखागार देखने पर मुझे पता चला कि उमा महेश्वर की बहुत सी प्रतिमाएँ अभी भी विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों पर मौजूद हैं और मंदिरों या घरेलू पूजा स्थलों में पूजा के लिए मौजूद हैं। संग्रहालयों में उमा महेश्वर की प्रतिमाओं की मेरी तालिका ने मुझे यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर इतनी सारी प्रतिमाएँ बची हुई हैं तो वे मंदिर कहाँ थे जहाँ उन्हें कभी स्थापित किया गया था? उनके उपयोग का मूल संदर्भ क्या था? यह एक अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था और मैंने बिहार के मंदिरों के बारे में पढ़ना शुरू किया।
बिहार में सबसे पुराने तीर्थस्थल गया जिले में बराबर पहाड़ियों में स्थित चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा अभयारण्य हैं। इन गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी और तीसरी शताब्दी में हुआ था और इन्हें राजा अशोक और उनके पोते दशरथ ने बौद्ध और आजीविक भिक्षुओं को समर्पित किया था (चित्र 7)।
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चित्र 7: लोमस ऋषि गुफा का अग्रभाग, बराबर हिल्स, गया; फोटो सौजन्य: एआईआईएस, गुड़गांव |
बिहार में 5वीं/6वीं शताब्दी से ही, उत्तर भारत के अन्य स्थानों की तरह, स्वतंत्र, एक कमरे वाले मंदिर - हिंदू और बौद्ध दोनों - का निर्माण शुरू हुआ। सबसे शुरुआती मंदिर मिट्टी की ईंटों से बने थे और बाद में उन्हें पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया। यहां तक कि पहले के चट्टान को काटकर बनाए गए मंदिरों का भी दोबारा इस्तेमाल किया गया और उन्हें पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया। ऐसा लगता है कि शुरुआती मूर्तियों को इन जैसी संरचनाओं में रखा गया था (चित्र 8)।
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चित्र 8: कोंच, गया स्थित मंदिर; मूल सूर्य मंदिर जो बाद में विष्णु मंदिर बन गया और अब शिव मंदिर है; फोटो सौजन्य: श्री विकास वैभव |
8 तारीख तक/9वांसदियों ई.पू. में, मूल मिट्टी-ईंट के मंदिरों को अधिक विस्तृत पत्थर की संरचनाओं (चित्र 9) द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा। हालांकि पत्थर की मूर्तियां बच गईं और उन्हें नई संरचनाओं में रखा गया। मुख्य मंदिर के अलावा, मंदिर परिसरों में कई छोटी संरचनाएं भी शामिल थीं: सहायक मंदिर जिनमें मुख्य देवता के अवतार (अवतार), टैंक, पुजारियों के लिए घर, दीवारें, प्रवेश द्वार आदि रखे गए थे। इतनी सारी संरचनाओं के साथ अधिक छवियों की आवश्यकता थी और इसलिए इस समय बिहार में बड़ी संख्या में पत्थर की मूर्तियां बनाई गईं।
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चित्र 9: मुंडेश्वरी मंदिर, इस क्षेत्र के सबसे पुराने पत्थर के मंदिरों में से एक, जैसा कि अब यह बिना शिखर के मौजूद है; फोटो सौजन्य: एआईआईएस, गुड़गांव |
11वीं/12वीं शताब्दी तक मंदिरों के जीर्णोद्धार का एक और दौर चला और बिहार के धार्मिक परिदृश्य में बड़े, बहु-धार्मिक वास्तुशिल्प परिसर देखे जा सकते हैं, जहाँ विभिन्न संप्रदायों और धर्मों के मंदिर एक ही धार्मिक परिसर में समाहित थे। एक मंदिर परिसर में सूर्य, विष्णु, शिव और यहाँ तक कि बुद्ध को समर्पित विभिन्न मंदिर होते थे। इन मंदिरों की दीवारों को सजाने और स्थापित करने के लिए और भी अधिक प्रतिमाओं की आवश्यकता होती थी। इसलिए हमारे पास बड़ी संख्या में प्रतिमाएँ हैं जिन्हें इस अवधि का माना जा सकता है।
मंदिरों में उमा महेश्वर की प्रतिमाएँ कहाँ रखी गई थीं? क्या वे मुख्य देवता थे जिन्हें स्थापित किया गया था या वे मंदिरों की दीवारों पर थे? यदि उन्हें दीवारों पर रखा गया था तो किस दीवार पर: मुख्य मंदिर के अंदर या बाहर सजावटी तत्वों के रूप में? मुझे एहसास हुआ कि किताबें पढ़ना और ऑनलाइन छवियों को देखना मेरे सवालों का जवाब नहीं दे रहा था और यह समय था कि मैं एक फील्ड ट्रिप पर जाऊँ ताकि प्रत्यक्ष रूप से देख सकूँ कि मंदिरों को कैसे व्यवस्थित किया जाता था, मंदिरों में छवियों को कैसे रखा जाता था, उनका धार्मिक और अनुष्ठानिक महत्व क्या था और सबसे बढ़कर, इन प्राचीन छवियों को वर्तमान समय में कैसे देखा जाता है।
क्षेत्र से नोट्स
पटना संग्रहालय
मैंने पटना संग्रहालय से शुरुआत की, जहाँ मैंने उन मूर्तियों को ढूँढना शुरू किया जिन्हें मैंने अब तक किताबों और कैटलॉग में देखा था। पटना संग्रहालय की स्थापना 1917 में बिहार के नए बने प्रांत के पहले संग्रहालय के रूप में की गई थी। नए प्रांत के गठन से पहले, बिहार और उड़ीसा के स्थलों से खुदाई में मिले सभी अवशेषों को कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में ले जाया गया था। पटना संग्रहालय की स्थापना के बाद बिहार राज्य ने अनुरोध किया कि इन कलाकृतियों को उनके मूल गृह राज्य में वापस भेज दिया जाए। संग्रहालय में बिहार के विभिन्न स्थलों से निजी दानकर्ताओं से प्राप्त 45,000 से अधिक वस्तुओं का विशाल संग्रह है और उन्होंने अन्य संग्रहालयों से भी वस्तुएँ खरीदी और उधार ली हैं। संग्रहालय से उमा महेश्वर की जितनी भी छवियाँ मैंने रिकॉर्ड की थीं, उनमें से केवल कुछ ही दीर्घाओं में प्रदर्शित की गई थीं; बाकी भंडारण में थीं और कुछ ऐसी थीं जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था।
संग्रहालय के मूल प्रवेश रजिस्टरों को पढ़ते समय मुझे जो सबसे दिलचस्प खोज मिली, वह थी एक निश्चित “बिहार संग्रहालय” का अस्तित्व, जहाँ से उमा महेश्वर की कई प्रतिमाएँ प्राप्त की गई थीं। क्यूरेटर ने मुझे बिहार संग्रहालय की दिलचस्प कहानी सुनाई, जो अब मौजूद नहीं है, लेकिन इसका बिहार की धार्मिक मूर्तियों के भाग्य और उन स्थलों के इतिहास पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा होगा जहाँ से इन्हें प्राप्त किया गया था।
1860 के दशक के अंत में, एएम ब्रॉडली बिहारशरीफ (नालंदा से लगभग 11 किलोमीटर दूर) के जिला मजिस्ट्रेट थे। अपने कई समकालीनों की तरह वे भी बुद्ध के जीवन से जुड़े स्थलों की खुदाई के मिशन पर थे, जैसा कि विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों में दर्ज है। अपने पास मौजूद कैदियों की मदद से वे नालंदा के आसपास के स्थलों की खुदाई करने लगे। जाहिर है कि ये खुदाई वैज्ञानिक रूप से योजनाबद्ध या निष्पादित नहीं थी। उन्होंने जो पुरावशेष एकत्र किए, उनसे उन्होंने अपने आधिकारिक बंगले में एक ओपन-एयर संग्रहालय स्थापित किया और इसे बिहार संग्रहालय कहा। उनकी मृत्यु के बाद उनके संग्रह को भारतीय संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ इन मूर्तियों के मूल खोज-स्थलों को "बिहार" के रूप में सूचीबद्ध किया गया। बाद में, इस संग्रह के कुछ हिस्सों को पटना संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ फिर से कहा गया कि यह "बिहार" से है; और इन मूर्तियों का मूल स्थल हमेशा के लिए खो गया। मूर्तियाँ इधर-उधर जाती रहीं, इनमें से कुछ विदेश चली गईं और कई अब पटना में नए बिहार संग्रहालय में रखी गई हैं (चित्र 10)।
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चित्र 10: ब्रॉडले संग्रह से उमा महेश्वर; अब पटना संग्रहालय में, अभिग्रहण संख्या 7881; फोटो सौजन्य: एआईआईएस, गुड़गांव |
इस प्रकार खोज के औपनिवेशिक तरीकों और शौकिया उत्खनन ने बिहार के स्थलों के अध्ययन के तरीके पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। औपनिवेशिक अधिकारियों के निजी संग्रह, जिनमें से कई अब खो चुके हैं; उनकी आंशिक व्याख्या और स्थलों के बेतरतीब संरक्षण, और संग्रहालयों के निर्माण ने मूर्तियों के महत्वपूर्ण आंदोलन और उनके मूल संदर्भ के विनाश का कारण बना होगा।
धार्मिक स्थलों का मानचित्रण
मेरे फील्ड ट्रिप के दूसरे भाग में तीर्थस्थलों का मानचित्रण करना शामिल था। मूर्तियों पर अपने डेटा के आधार पर मैंने गांवों का दौरा करना शुरू किया। इस खोज में अक्सर ग्रामीणों के साथ बातचीत बहुत मददगार साबित हुई। उन्होंने न केवल मुझे आस-पास के तीर्थस्थलों तक पहुँचाया, बल्कि पुरातात्विक टीलों और अन्य स्थानों के स्थान के बारे में भी मुझे बहुमूल्य सलाह दी, जहाँ दिलचस्प मूर्तियाँ रखी गई थीं। फील्ड ट्रिप ने मेरे लिए सब कुछ बदल दिया क्योंकि जमीनी स्तर पर वास्तविकताएँ मेरी कल्पना से बहुत अलग थीं।
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चित्र 11: आधुनिक महादेव मंदिर, अकबरपुर, हिलसा, पटना; एक पुराने मंदिर के अभी भी दिखाई देने वाले चबूतरे पर पुनर्निर्मित; फोटो लेखक की अपनी |
चित्र 11 में आप पटना के पास अकबरपुर का एक विशिष्ट, आधुनिक मंदिर देख सकते हैं। यह मंदिर संभवतः प्राचीन बस्ती के टीले के ऊपर स्थित है और शिव को समर्पित है। गर्भगृह या गर्भगृह में एक प्राचीन लिंग (या भगवान शिव के प्रतीक के रूप में पूजी जाने वाली लिंग वस्तु) है, जबकि दीवारों पर पार्वती (उनकी पत्नी), गणेश (शिव के पुत्र) और उमा महेश्वर की अन्य प्राचीन मूर्तियाँ हैं। मंदिर के बाहर पंक्तिबद्ध अन्य प्राचीन प्रतिमाएँ हैं जो 9 वीं और 12 वीं शताब्दी के बीच की हैं जो स्पष्ट रूप से पुराने मंदिरों से आई थीं, जो अब नष्ट हो चुके हैं। मंदिर के बगल में एक तालाब है जहाँ हर साल सूर्य देव को समर्पित छठ का वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। मंदिर के पीछे एक नीम का पेड़ भी है जो पवित्र परिसर में एक और अनुष्ठान स्थल है।
गांव वालों से मूर्तियों की मौजूदगी के बारे में पूछने पर मुझे बताया गया कि ये देवता बगल के तालाब में खोजे गए थे। मूल रूप से वे उसी स्थान पर एक पुराने मंदिर में स्थापित थे। 12वीं/13वीं शताब्दी के तथाकथित इस्लामी छापों के समय उन्हें तालाब में छिपा दिया गया था, जहां वे भूले-बिसरे रह गए। यही कहानी क्षेत्र के कई अन्य मंदिरों पर दोहराई जाती है, चाहे वे शिव, विष्णु, देवी या बुद्ध को समर्पित हों। इसके अलावा, एक बार मूर्तियां बरामद होने के बाद गांव वालों और पुजारियों ने हिंदू और बौद्ध मूर्तियों के बीच अंतर नहीं किया: बुद्ध की मूर्ति को विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाना या छोटे लघु स्तूप (एक अर्धगोलाकार बौद्ध मंदिर) को लिंग के रूप में पूजा जाना आम बात है । गांव के मंदिरों में पवित्र स्थान को हिंदू, बौद्ध या जैन के रूप में वर्गीकृत करना वास्तविक से अधिक सैद्धांतिक है।
नालंदा
नालंदा मेरे लिए विशेष रूप से दिलचस्प स्थल था क्योंकि मेरे डेटा से पता चला कि मठ परिसर में ही कई उमा महेश्वर मूर्तियां (चित्र 12) पाई गई थीं और मुझे यह काफी दिलचस्प लगा। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ही बौद्ध मठ में यह हिंदू मूर्ति क्या कर रही थी। नालंदा साइट संग्रहालय की मेरी यात्रा ने मठ क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के कई गांवों से उमा महेश्वर की कई मूर्तियों की मौजूदगी की पुष्टि की।
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चित्र 12: उमा महेश्वर, बड़गांव, नालंदा, फोटो लेखक का अपना |
नालंदा में मठ परिसर ने विद्वानों का बहुत ध्यान आकर्षित किया है और यह एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है; हालाँकि, आस-पास का क्षेत्र उपेक्षित है। मैं अनौपचारिक रूप से इस पड़ोस का सर्वेक्षण और मानचित्रण करना चाहता था ताकि यह देख सकूँ कि किस तरह के मंदिर और मूर्तिकला के अवशेष बच गए हैं। मठ क्षेत्र के ठीक बाहर बरगांव गाँव विशेष रूप से दिलचस्प है। जैसा कि मैंने कहीं और देखा था, बरगांव सूरज पोखर नामक एक बहुत बड़े तालाब के किनारे स्थित है जिसके चारों ओर आधुनिक मंदिरों की एक श्रृंखला बनी हुई है, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सूरज मंदिर है जो गाँव के बीचों-बीच स्थित है (चित्र 13)।
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चित्र 13: सूरज मंदिर, बड़गांव, नालंदा; फोटो लेखक की अपनी |
इन सभी आधुनिक मंदिरों में काले बेसाल्ट की मूर्तियों और स्थापत्य के टुकड़ों का एक समृद्ध संग्रह है, जिनकी पूजा की जाती है और विधिवत अभिषेक किया जाता है। अधिकांश मूर्तियाँ हिंदू देवताओं की हैं और उनमें एक बहुत ही विशिष्ट शैव उपस्थिति है। सूरज मंदिर और तट पर स्थित अन्य मंदिरों में उमा महेश्वर की कई जीवित मूर्तियाँ हैं। यह देखना दिलचस्प है कि इस प्रसिद्ध बौद्ध मठ के निकट इतनी बड़ी हिंदू स्थापना कैसे फली-फूली। मूर्तिकला और स्थापत्य अवशेषों के आधार पर, मंदिरों का समय 9वीं शताब्दी के बीच माना जा सकता है।और 12वींशताब्दी ई.पू. यह वह अवधि भी थी जब पाल शासकों के अधीन नालंदा मठ में जीवन का एक नया दौर आया और बिहार और तिब्बत और अन्य हिमालयी राज्यों के बौद्ध मठों के बीच घनिष्ठ संबंध थे। नालंदा में मठ परिसर में कई स्थलों और संरचनाओं पर खुदाई भी इसी अवधि की है।
नालंदा मठ के पास दूसरा महत्वपूर्ण स्थल जगदीशपुर गांव में है, जहां रुक्मिणीस्थान नामक मंदिर कृष्ण की प्रेमिका रुक्मिणी को समर्पित है। एएसआई संरक्षित मंदिर में एक एकल-कोशिका वाला मंदिर है जिसमें एक ऊंचा शिखर है , जिसके अंदर 12 फुट ऊंची बैठी हुई बुद्ध की प्रतिमा है, जो आधी जमीन में दबी हुई है। यह मंदिर अब वैष्णव किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है और बुद्ध की कृष्ण के रूप में और उनके साथ आए बोधिसत्वों की रुक्मिणी के रूप में पूजा की जाती है। किंवदंतियों में कहा गया है कि लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थित मठ परिसर रुक्मिणी के पिता का महल था जहां वह रहती थीं और जहां से वह हर दिन इस मंदिर में पूजा करने आती थीं और यहीं से कृष्ण ने उनका अपहरण किया था। धर्म और लोककथाओं ने इस प्राचीन बुद्ध प्रतिमा को नए अर्थ दिए हैं,
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चित्र 14: रुक्मिणीस्थान, जगदीशपुर, नालंदा में विशाल बुद्ध की प्रतिमा; फोटो लेखक की अपनी है |
नालंदा में तीसरा दिलचस्प मंदिर तेलिया बाबा का है - जहाँ धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध (बुद्ध के इस चित्रण को विधि का चक्र भी कहा जाता है जो बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद उनके पहले उपदेश को दर्शाता है) को ग्रामीण भैरव के रूप में पूजते हैं क्योंकि उनमें रोगों को ठीक करने की शक्ति है। इस बीच, इस क्षेत्र में आने वाले थाई तीर्थयात्री उन्हें काले बुद्ध के रूप में पूजते हैं (चित्र 15)।
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चित्र 15: बुद्ध को भैरव या तेलिया बाबा या काले बुद्ध के रूप में पूजा जाता है, नालंदा; फोटो सौजन्य: सोनाली ढींगरा |
मैं जो कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि किंवदंतियों और मौखिक परंपराओं का उपयोग विभिन्न मंदिरों को एक साथ जोड़ने और उन्हें मठ परिसर से जोड़ने के लिए किया गया है। 2016 में, नालंदा को शिक्षा के एक प्राचीन केंद्र के रूप में विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया था। हालाँकि यह महत्वपूर्ण है कि हम सदियों से निवास की विभिन्न परतों को समझने के लिए इस महत्वपूर्ण स्थल को आस-पास की बस्तियों और मंदिरों के साथ घनिष्ठ संबंध में देखें।
बोधगया
बिहार में दूसरा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बोधगया है, जो बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति का स्थल है। यूनेस्को ने महाबोधि मंदिर परिसर को उसके अद्वितीय सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य के लिए सूचीबद्ध किया है और महाबोधि मंदिर और बोधि वृक्ष को भी अपने दायरे में लिया है।
बोधगया में दो स्थल हैं जो मेरे लिए विशेष रुचि के हैं, जहाँ उमा महेश्वर की प्रतिमाओं के साक्ष्य मिले हैं। पहला है महंत का परिसर (चित्र 16), जो महाबोधि मंदिर परिसर के पास स्थित शैव महंतों (पुजारियों) का निवास स्थान है। 17वीं शताब्दी के इस निवास स्थान के अंदर एक मंदिर है जो आम जनता के लिए प्रतिबंधित है। इसमें बौद्ध और हिंदू छवियों का संग्रह है, सभी हिंदू देवताओं के रूप में पूजे जाते हैं। ये छवियाँ महाबोधि परिसर के आसपास के अन्य ऐतिहासिक हिंदू और बौद्ध मंदिरों से सदियों से एकत्र की गई होंगी, और जिनके बारे में आज हमें कोई जानकारी नहीं है। यह भी संभव है कि कुछ छवियाँ 18वीं शताब्दी में इसके संरक्षण से पहले महाबोधि मंदिर से ही आई हों। अब जो अवशेष बचे हैं वे केवल मूर्तिकला और वास्तुकला के टुकड़े हैं।
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चित्र 16: बोधगया महंत के परिसर में मूर्तियां; फोटो सौजन्य श्री विकास वैभव |
दूसरा मंदिर महाबोधि मंदिर के ठीक उत्तर में स्थित पीपल के पेड़ के नीचे एक मंदिर है (चित्र 17)। इसमें हिंदू छवियों का एक संग्रह है, जिनकी सदियों से पूजा की जाती रही है, जिसमें 9वीं और 12वीं शताब्दी ई. के बीच की उमा महेश्वर की मूर्ति भी शामिल है। यहाँ बची हुई मूर्तिकला के अवशेष दर्शाते हैं कि सदियों से यह स्थल कैसे बदल गया है। पिछले कई वर्षों में, यह स्थल बौद्धों और शिव के अनुयायियों के बीच अपने स्वामित्व को लेकर विवादों और बहसों और मुद्दों का विषय रहा है। छवियाँ पूरे परिदृश्य में बिखरी हुई हैं और महाबोधि परिसर का वर्तमान संरक्षण केवल कहानी का एक हिस्सा बताता है। बोधगया में धर्म दैनिक जीवन के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है; और यह समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे इस स्थल और पवित्र स्थान में निरंतर निवास और अनुष्ठान अभ्यास का इतिहास है। विभिन्न धर्मों के उत्थान और पतन की अवधि की पहचान करने के बजाय इस निरंतरता को उजागर करना महत्वपूर्ण है।
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चित्र 17: महाबोधि परिसर, बोधगया से वृक्ष मंदिर; फोटो लेखक की अपनी है |
धागों को एक साथ बांधना
उमा महेश्वर की मूर्तियों के बाद के जीवन का पता लगाकर मैं दिखाता हूं कि एक धार्मिक मूर्ति का जीवन उसके निर्माण के समय तय नहीं होता है, बल्कि उसके अनुष्ठान और वास्तुशिल्पीय स्थान और समय के साथ पूजा करने वाले समुदाय के द्वारा लगातार पुनर्परिभाषित होता रहता है । मैं ऐतिहासिक जांच के मुख्य स्रोत के रूप में धार्मिक मूर्तियों का उपयोग करता हूं और सामान्य मानदंड के रूप में ग्रंथों से तुलना किए बिना उनका अध्ययन करता हूं। छवियों के वास्तुशिल्प संदर्भ और अनुष्ठानिक उपयोग पर प्रकाश डालकर मैं दक्षिण बिहार के स्थलों का एक ऐतिहासिक वर्णन तैयार करता हूं और स्थलों का एक उल्लेखनीय पहलू जो उभर कर आता है वह है रूपांकनों, छवियों और पंथों में स्पष्ट बहुदेववाद। एक ही पवित्र स्थान के भीतर बौद्ध, जैन और हिंदू छवियों को देखना और अभी भी पूजा के अंतर्गत होना आम बात है। उमा महेश्वर की छवियों और बिहार में फील्डवर्क के मेरे विश्लेषण का यह संक्षिप्त विवरण
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चित्र 18: पुस्तक कवर |
दक्षिण बिहार के स्थल किस समय एकेश्वरवादी बौद्ध या हिंदू पहचान प्राप्त करना शुरू करते हैं? प्राचीन इतिहास कोई दिया हुआ नहीं है, बल्कि समय के साथ विभिन्न अभिनेताओं द्वारा चुनिंदा रूप से प्रस्तुत किया जाता है और दो महत्वपूर्ण अवधियाँ थीं जब बिहार का इतिहास फिर से लिखा जा रहा था। 19वीं से 20वीं शताब्दी में बिहार में पुरातात्विक अन्वेषणों की शुरुआत हुई जब औपनिवेशिक अधिकारियों ने यात्राएँ कीं, संग्रह किए और व्यक्तिगत और निजी संग्रहालय स्थापित किए। परिणामस्वरूप मंदिर स्थलों को पुनर्गठित किया गया (औपनिवेशिक धारणा और मंदिरों की योजनाओं के पाठ्य अनुमान के अनुसार), संरक्षण के नाम पर और धार्मिक मूर्तियों को उनके मूल संदर्भों से हटा दिया गया। पुनर्खोज की इस प्रक्रिया में जबकि कुछ छवियों की पूजा जारी रही, इनमें से बड़ी संख्या को संग्रहालयों में ले जाया गया और उनकी पवित्र पहचान खो गई, उन्हें कला वस्तुओं के रूप में देखा जाने लगा। दक्षिण बिहार के पवित्र स्थलों, तीर्थस्थलों और प्रतीकों पर औपनिवेशिक प्रवचन ने कुछ नामकरण और पहचानें बनाईं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें देखने के लिए स्थायी धार्मिक श्रेणियाँ तय कीं। उदाहरण के लिए, प्राचीन बौद्ध अतीत की खोज में जब पुरातात्विक स्थलों की खोज की गई और कलाकृतियों को सूचीबद्ध और प्रलेखित किया गया, तो कोई भी अवशेष जो इस दृष्टि से मेल नहीं खाता था, उसे त्याग दिया गया और उसे केवल आकस्मिक माना गया। उमा महेश्वर जैसे प्रतीक जो शैव धर्म (शिव की पूजा) से जुड़े थे, उन्हें बिहार के इतिहास के लिए महत्वहीन बताकर किनारे कर दिया गया। उमा महेश्वर प्रतीक विशेष रूप से वैवाहिक प्रेम के अपने स्पष्ट चित्रण के लिए अवमानना को भड़काता था और यहां तक कि इसे "अशिष्ट" भी कहा जाता था।
इतिहास लेखन का दूसरा दौर 1920 और 30 के दशक में आया जब बिहार राज्य का नवगठित किया गया और इसकी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान स्थापित करने के प्रयास किए गए। संग्रहालय क्षेत्रीयता और राष्ट्रवाद के विचारों को फैलाने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन गए। नव स्थापित संग्रहालयों ने अपने प्रदर्शन, सूचीकरण और नामकरण के आख्यानों के माध्यम से एक दृश्य संग्रह प्रस्तुत किया, जिसने उन मापदंडों को संहिताबद्ध किया जिनके भीतर धार्मिक छवियों को देखा जाना था, इस प्रकार प्रतिमा विज्ञान के अध्ययन को आकार दिया। उदाहरण के लिए, बुद्ध के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थलों से एकत्रित मूर्तियों और अवशेषों के साथ दक्षिण बिहार के बौद्ध इतिहास को लोकप्रिय बनाने के लिए दीर्घाओं का उपयोग किया गया था। संग्रहालय ने अपने वर्गीकरण के माध्यम से बिहार के रैखिक इतिहास के औपनिवेशिक संस्करण की पुष्टि भी की, जो क्रमिक रूप से बौद्ध, जैन, मौर्य, गुप्त, पाल, सेन और इसी तरह है।
औपनिवेशिक पुरातत्व और सदियों के ज्ञान उत्पादन के माध्यम से स्थापित पहचानें उन प्रतिमानों को परिभाषित करती रहती हैं जिनके भीतर हम इस क्षेत्र और इसके इतिहास को देखते हैं। कलाकृतियों की गतिशीलता को बड़े पैमाने पर अनदेखा किया जाता है क्योंकि वे कई धार्मिक पहचानों को जोड़ती हैं। बिहार के इतिहास की कोई भी चर्चा इसके बौद्ध अतीत और अशोक और मौर्य साम्राज्य के गौरव के विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
शंकर किंवा शिव हा भारतात पुजल्या जाणाऱ्या महत्वाच्या देवतांपैकी एक अत्यंत महत्त्वाचा देव. या शंकराचे मूळ काही हजार वर्ष मागे जाते. अतिप्राचीन कालखंडात लिंग रूपाने पूजन होणारा देव, जनन आणि पुनर्निर्मिती दाखवणारा देव, वेदांमध्ये दिसणारा रुद्र, महायोगी शिव, सगळं काही आपल्या क्रोधाने नष्ट करणारा प्रलय आणि त्याच वेळेला परम भक्ताच्या मागण्या पूर्ण करणारा शिव, अशा शेकडो छटा या महादेवाच्या आहेत. स्मशानात अंगाला राख फासून राहणाऱ्या साधुंपासून ते तलम वस्त्र घालून राजवाड्यात राहणाऱ्या राजापर्यंत सगळ्यांना याने आपल्यात सामावून घेतले आहे. मंदिराच्या गर्भ गृहात प्रामुख्याने लिंग स्वरूपात याचे पूजन होत असेल तरीही शिल्पशास्त्रात शंकर या संकल्पनेवर मोठ्या प्रमाणात प्रयोग झाले आहेत.
शंकराच्या शिल्पामध्ये काही प्रमुख गोष्टी आपल्याला बघायला मिळतात. डोक्यावर असलेल्या जटा किंवा जटा मुकुट, कपाळावर कोरलेला तिसरा डोळा, हातात पकडलेला त्रिशूळ, शिवाला अत्यंत प्रिय असलेले वाद्य म्हणजेच डमरू, इत्यादी लांच्छने बघून शिवाचे शिल्प ओळखता येते.
शिवमूर्ती
सर्वसाधारणपणे शिवमूर्तींची मांडणी म्हणजे चार हात, हाती डमरू, त्रिशुळ, कमंडलु, अक्षमाला, गळ्यात नाग, वाहन नंदी अशी. पण शिवमूर्तींचेही अनेक प्रकार आहेत त्यातील काही मोजके प्रकार आता येथे बघू.
बदलती शिल्पे, बदलता समाज
बॉस्टनच्या म्युझियम ऑफ फाईन आर्टस (कला संग्रहालया) मध्ये आम्ही काय खाल्ले सारखे (अजूनच) रटाळ डिटेल्स कोणाला नको असतील असे धरून पुढे चालू करते...
आर्ट म्युझियम म्हटले की खरे तर आपल्या डोळ्यांसमोर शिल्पे, भिंतीवर अडकवलेली चित्रे, फारतर कलात्मक गालिचे अशा वस्तू येतात, पण बहुदा टीव्ही येत नाहीत/नसावेत. पण आम्ही खाणे आटपून मधल्या चौकातून जिन्याकडे जायला निघालो तो काही लोक भिंतीला टेकून समोर पाहत हसत असल्याचे दिसले. तर त्यांच्यासमोर भिंतीवर एकत्र जोडलेल्या पंधरा-वीस लहान टीव्हींचा एक संच होता. प्रत्येक टीव्हीत एका व्यक्तीचा क्लोजअप, आणि कानाला हेडफोन लावून ऐकू येत असलेले गाणे म्हणत असल्याचे चित्रीकरण दिसत होते. बाथरूममध्ये कोणी गात असताना जसे कोणी ऐकत नाही म्हणून निर्धास्त असतो तसे मन लावून गाणे म्हणत स्वतःत गुंगून गेलेल्या त्या सर्व लोकांना पाहून थोडी गंमत वाटली. पं. भीमसेन जोशी, लता, अशा अनेक गायकांचे "मिले सूर मेरा तुम्हारा" ज्यांना परिचित आहे त्यांना यात फारसे वेगळेपण वाटणार नाही. फरक फक्त एकच होता की सर्वजण एकच गाणे एकाच वेळी म्हणताना दिसत होते, त्या सर्वांचे मिळून एकच एक जोडलेले चित्र तयार झाले होते. त्यांच्याकडे बघताना असे वाटले की येत्या काळाची ही झलक आहे. खरे तर म्युझियममधील वस्तूंना "हात लावू नये" ही सूचना आपण बरेचजण पाळत असतो, पण तरी मनात आणल्यास वस्तू इथे समोरच आहे, मनात आणल्यास तिला स्पर्श करता येऊ शकतो ह्याची मनात जाणीव असते, खोलीतले गंध, दगडी शिल्पाचा थंडगारपणा, ह्या गोष्टी हा अनुभव घडवत असतात. पण कोणी सांगावे कदाचित पुढच्या काळात कलेचे आविष्कार बघण्याच्या पद्धती कदाचित स्पर्शरहित असू शकतील?!
खरे तर यापुढे अधिक फिरण्याचे मनात नव्हते. पण मागे एकदा येथे आलेले असताना म्युझियममधील भारतीय उपखंडाच्या दालनात खास राजस्थानी मिनिएचर (लहान) चित्रे बघून तशी चित्रे काढण्याच्या आणि रंगवण्याच्या संधीचा आम्ही पुरेपूर फायदा घेतला होता. त्याची आठवण आली आणि म्हटले जाण्याआधी परत एकदा तिथे जाऊ या.
या दालनाकडे जायला एक मोठी खोली ओलांडून जावे लागले. मिनिमलिस्ट (कमीतकमी) अशा सामानात विमानतळांवर असतात तशा काँप्युटरांच्या पुढे बसलेले म्युझियमचे कर्मचारी पाहून म्युझियमची वाटचाल स्पर्शरहित होण्याकडे चालली आहे असा संशय अशामुळे जरा दाटच झाला!
पण एकदा का या भारतीय दालनात आले की परत त्या कधीच्या काळी घडवलेल्या दगडा-मातीच्या वस्तू आपल्यापासून हाताच्या अंतरावर असतात. हडप्पा/मोहेंजोदारो येथील लहानलहान मातीच्या रांजणांपासून ते बौद्ध, जैन, हिंदू शिल्पकला, आणि काही मुस्लिम प्रभावाखालची चित्रे येथे ठेवलेली आहेत. यातील वस्तू इजिप्तमधील वस्तूंइतक्या भव्य नाहीत, काही तर दहा एक शतके इतक्याच जुन्या, म्हणजे खरे तर बर्यापैकी अलिकडच्या काळातील आहेत, त्यामुळे या वस्तूंना इजिप्तसारखे वलय नाही. शिवाय इजिप्तमधील प्रदर्शनाची जाहिरात कितीही भरभक्कम केली असली तरीही या दालनात आल्यावर एक प्रकारचा आपलेपणा वाटतो. तरी इथल्या भारतीय हॉटेलांमध्ये गेलो, की तिथे भिंतीवर लावलेले गणपती, राधा-कॄष्ण, फारतर लामणदिवे, किंवा उंच पितळी समया, आग्रा शैलीतली चित्रे, नक्षीकाम केलेली लाकडी पार्टिशने अशा सवयीच्या झालेल्या शोभेच्या वस्तूंकडे दुर्लक्ष करून आपल्या टेबलाकडे जाण्याचा एक प्रकारचा कोडगेपणा देखील आलेला असतो. त्यामुळे परत जेव्हा कुठेतरी खणून काढलेल्या ह्या वस्तू दिसतात त्यावेळी त्यांच्याकडे हॉटेलमधील शोभेच्या वस्तूंकडे पाहतो त्यापेक्षा वेगळ्या नजरेने पाहिले पाहिजे हे मुद्दाम लक्षात ठेवावे लागते. मग त्या नुसता वस्तू न राहता त्यात मागील संस्कृतीच्या खुणा, तंत्रज्ञानात झालेली प्रगती, तत्कालिन व्यापार-उदीमाची व्यापकता असे थोडे थोडे लक्षात येत जाते. थोडा का होईना इतिहास वाचलेला असला, की ह्या म्युझियमांकडे पाहण्याची एक वेगळी दृष्टी मिळते हेही खरे. शिवाय एखाद्या समाजाच्या आशा-आकांक्षांमध्ये काळाप्रमाणे होणारे बदलही जाणवू शकतात. म्युझियममध्ये आम्ही बरेच काही पाहिले, बरेच फोटो काढले. फोटो काढताना लक्षात आले नाही, पण नंतर असे वाटले की यात स्त्रियांच्या शिल्पांमध्ये काळानुरूप होत गेलेले बदल आपोआप थोडेफार टिपले गेले असे वाटते. शिल्पे करण्याच्या माध्यमात, तंत्रात आणि सादरीकरणातही खूपच फरक पडल्याचे दिसते.
ख्रिस्तपूर्व काळात स्त्रियांना देवतेचा दर्जा (मातृदेवता) दिला असावा अशी समजूत आहे. यापैकी पहिल्या मूर्तींची डोळे दाखवण्याची पद्धत अतिशय सोपी, लहान मुलांनाही करता येईल अशी दिसते. स्त्री असूनही मूर्तीच्या डोक्यावर एक प्रकारची पगडी दिसते आहे. पहिली मूर्ती करणे विशेष अवघड नाही. दुसर्या मूर्तीवर मात्र श्रम घेतले आहेत हे स्पष्ट आहे. ह्या स्त्रीने घातलेल्या विशिष्ट दागिन्याला छन्नविरा म्हणतात असे कळले. हा दागिना त्याकाळात बराच लोकप्रिय असावा. ह्या नटलेल्या मूर्तीवरून ती देवता असावी असे दिसत नाही. एखादी नर्तकी, आकर्षक स्त्री असावी तशी दिसते.
डोळे दाखवण्याची पद्धत आता खालच्या मथुरा येथील प्रतिमेमध्ये वेगळी, जरा सुधारलेली दिसते. शिवाय ही प्रतिमा भट्टीतून भाजून काढलेली आहे.
कान झाकून जातील इतकी मोठी कर्णभूषणे दिसतात. एवढे मोठे कानातले घातले तर कान ओघळतील असे आम्हाला सांगत, तसे त्यांना लहानपणी कोणी सांगितले नसावे! डोक्यावर बांधलेली तीन गोलाकार आभुषणे नक्की कशासाठी आहेत समजत नाही.
नंतरच्या स्त्रीप्रतिमांमध्ये आकार, लय, प्रमाणबद्धपणा, मोकळेपणा अधिक जाणवू लागतो. सांचीच्या प्रसिद्ध स्तूपाच्या एका तोरणावरील यक्षीचे अवशेष (इ. स. पहिले शतक).
या यक्षीला "फर्टिलिटी गॉडेस" म्हटले आहे. बुद्धानंतरच्या काही शतकांत अनेक स्तूप, लेणी बांधली गेली.
बुद्धाने तर करीत असलेला संसार सोडून दिला. त्याच्या गोष्टीत "मार" नावाचा राक्षस येतो, खरे तर मार म्हणजे बुद्धाला निर्वाणापासून दूर ठेवण्याचा प्रयत्न करणारा मोह. अमरावतीच्या स्तूपावरील ह्या चित्रात मार आपल्या मुलींना बुद्धाचे लक्ष त्यांच्याकडे जावे म्हणून पाठवतो. पण अशा सर्व मोहांवर विजय मिळवल्यानंतर बुद्धाला निर्वाण प्राप्त होतेच. वरील शिल्पातून दिसते ती बौद्ध शिल्पकलेची जुनी परंपरा आहे, या परंपरेने बुद्धाचे मनुष्यस्वरूपात चित्रण केले जात नाही, तर चित्रात बुद्ध असल्याचे त्याच्या पादुका, सिंहासन (कारण तो राजपुत्र होता) आणि बोधीवृक्ष यावरून दाखवले जाते. या शिल्पात स्त्रिया आहेतच, पण दुर्लक्षित आहेत.
मग येतात "हिंदू" देव-देवता. यात दोन्ही देव आणि देवता यांना महत्त्वाची स्थाने मिळालेली दिसतात. त्यांचे चेहरे आधीच्या शिल्पकलेहून अधिक आकर्षक, आणि नाजूक दिसतात. देव जरा कुटुंबवत्सलही झालेले दिसतात! सुंदर चेहरे, दागदागिने, दोनांहून अधिक हात असे या शिल्पांचे स्वरूप दिसू लागते. शंकर, पार्वती यांचे कुटुंब म्युझियममध्ये आहेच. गणपतीदेखील आपल्या दोन्ही पत्नींसह आहे. हरीहर (शंकर आणि विष्णू यांच्या संगमाने तयार झालेला - काही संशोधकांच्या मताने शैव आणि वैष्णव यांच्या "समन्वय" काळातील ) गोतावळ्यासह येथे आहे. तशीच महिषासुरमर्दिनी दुर्गा आहे. जावा येथील महिषासुरमर्दिनीचे हे नवव्या-दहाव्या शतकातले शिल्प. या दुर्गेचा चेहरा अगदी भारतीय म्हणावा असा नाही, त्यावर जावा येथील कारागिरांचीच छाप आहे. पण बाकी शिल्प मात्र भारतातील दुर्गेप्रमाणेच आहे.
रामायणातील सीताहरणाच्या दृष्याचे इंडोनेशियातील अकराव्या शतकातील शिल्प दिसते -म्हणजे या काळात रामायण इंडोनेशियापर्यंत पोचले होते.
तेराव्या शतकापर्यंत स्त्रियांचे प्रेमिक म्हणून मोकळेपणाने चित्रीकरण झालेले दिसते. हे हस्तिदंतामध्ये कोरलेले ओरिसामधले एक शिल्प. इथले कोरीवकाम अधिक वाढलेले दिसते, दागदागिने, आकार, विषय सर्वच दृष्टींनी कला विकसित झाल्याचे दिसते.
माती, दगड, हस्तिदंत, लाकूड अशा विविध माध्यमांमधून तयार केलेली ही शिल्पे बदलती सामाजिक स्थिती दाखवत असावीत असे वाटले. जरी एका दालनातील काही चार-दोन शिल्पांवरून तत्कालिन समाजाचे यथार्थ चित्र उभे करणे शक्य नसले तरी कळते की या शिल्पांमध्ये वैविध्य आहे, वस्तू तयार करण्याची तंत्रे हळूहळू पण खात्रीने विकसित होत गेली आहेत, त्या शिल्पांचे विषय बदलत गेले आहेत, याचाच अर्थ समाज गतिशील होता, भरभराटीस येत होता. भारताला स्वतःचा इतिहास नाही असे म्हणणार्या मार्क्सच्या लिखाणाचा प्रसिद्ध संशोधक डी. डी. कोसंबी यांनी कठोर समाचार घेतला आहेच, पण ही अशी शिल्पेही हे दाखवून देण्यास ठोस पुरावा ठरावी.
कांचीपुरमच्या कांची-कामाक्षी मंदिरातील एका खांबावरील दक्षिणामुर्ती शिवांची शिल्पमुद्रेचा फोटो काढला होता तो सादर.

दक्षिण भारतात शिवाच्या रुपात ते विविध कला व ज्ञानाचे गुरू मानले जातात. त्यांचे तोंड दक्षिण (यम) दिशेला असून वडाच्या झाडाखाली ते एक पाय मांडीवर घेऊन आसनस्थ आहेत. त्यांच्या सोबत अनेक विषयाचे विचारक व साधक ज्ञान प्राप्तीसाठी दाटीने मिळेल त्या दगडाधोंड्यांवर बसून विचारविनिमय करताना दिसतात. कधी कधी नंदी बाजूला ते निरखनाता दिसतो. उजव्यापायांच्या खाली एका बुटक्या अपस्मार नावाच्या दैत्याला शिवांनी त्याने अज्ञान, संशय व दुर्मतीला पायाने दाबून धरलेले आहे असे मानले जाते. या रूपात शिव चार हाताचे असून एका मागच्या हातात धगधगता अग्नी वा मशाल तर दुसऱ्या हाती जपमाला तर कधी ताडपत्रांची चवड, धरलेली दिसते. काही ठिकाणी ते वीणावादन करताना किंवा वीणा बाजून ठेवलेली असे दिसतात. उजवा हात इथे त्यांनी आपल्या हृदयाला उजव्या बाजूला असल्याचा संकेत करताना दिसतो.
या चित्रात उजवा खालचा हात कर्तरिमुद्रेत तर डावा वरदमुद्रेत दिसतो. कर्तरी मुद्रा ज्ञान मुद्रेसमान असावी. पैकी तीन उघडलेली बोटे गर्व, दुष्कृत्य व स्वतः बद्दलची भ्रामक वा आभासी समजूत यांच्यापासून दूर अंगठा म्हणजे शिवतत्व आणि तर्जनी म्हणजे जीव तत्व यांचे एकत्र येणे असे मानले जाते.

या मंदिरातील आणखी एक मुर्ती श्वानवाहन कालभैरवाची आहे. यावर आणखी प्रकाश टाकला जावा ही विनंती.
भारतीय मूर्तीशास्त्र हे डॉ. नी. पु. जोशींचे पुस्तक सुरेख आहे पण अतिशय संक्षिप्त माहिती आहे.
दक्षिणामूर्ती शिवाचे वर्णन खासच. ही अशी एक मूर्ती बहुधा वेरूळ येथे आहे. पण माझ्या नजरेतून मात्र निसटली.
शेवटची मूर्ती पण जबरी. मस्तकी अग्नीज्वाळांसारखे उभे राहिलेले केस हे पण भैरवाचे एक लक्षण आहे.
लिंग,, रूद्र, शिव हा बराच मोठा विषय असून ह्याच्या फारश्या खोलात न जाता आपण आता शिवलिंगे आणि शिवमूर्तींचे मूर्तीशास्त्राच्या दृष्टीने काही प्रकार बघूयात.
या वाक्यासाठी टाळ्या. लेख मुद्देसूद कसा लिहावा आणि होणारी पुढील चर्चा अपेक्षित चौकटीत कशी राहील याचा एक उत्तम आदर्श म्हणता येईल असे हे वाक्य आहे. !
पण लिंगपूजेविषयी वेदांमध्ये (किमान ऋग्वेदात) माहिती नाहिये. कारण तू म्हणतो तसे काळाच्या ओघात रुद्राचे पुढे शिवात रुपांतर केले गेले. पण रुद्र ही अनार्य देवता माझ्यामते नव्हती. कारण ऋग्वेदांत रुद्राचे उल्लेख आहेत त्यावरुन ती वैदिक देवता आहे हे मान्य करण्यास हरकत नसावी. अर्थात ऋग्वेदांत वेळोवेळी भर पडलेली आहे. रुद्राचा उल्लेख नंतर जोडला गेला आहे किंवा कसे याबद्दल मात्र मला कल्पना नाही. ही बाब अभ्यासकांवर सोडूयात.
३. दिक्पालरूपी शिवलिंग.
यामध्ये तू निदर्शित आणून दिलेल्या चिन्हांमुळेच हे शिवलिंग दिक्पालांचे आहे हे सिद्ध होते. तुझा तर्क योग्यच आहे.
सहस्त्र व कोटी लिंगेही आवडलीत. हजार पेक्षा जास्त अयोनिज लिंगाला कोटीलिंग म्हणणे सयुक्तीक ठरते कारण प्रत्यक्ष १ कोटी अयोनिज लिंगे कोरणे कारागिरांच्या वेळेचा अपव्यय आणि अशक्य"कोटी"तही आहे.
मूर्तींकडे वळताच पहिल्या ६ मूर्त्या पाहून एक क्षण माझ्या आवडत्या नटराजाचा विसर पडला होता. प्रत्येक लिंग व मूर्तीच्या ओघाने दिलेली माहिती सुंदर आहे. शेवटी आधीच्या वेरुळ मालिकेत पाहिलेला माझा आवडता नटराज ७ क्रमांकावर दिसला आणि अधिकच आनंद झाला.
शिवाने नुसते १०८ मुद्रांमध्ये नृत्य केले अशी मान्यताच नाही तर शिवाला नृत्यकलेचा उद्गाताही मानले जाते. शास्त्रशुद्ध पद्धतीने नृत्य शिकण्यासाठी शिवाची आराधना त्यासाठीच केली जाते. मलाही ही माहिती सुदैवाने अलिकडेच वाचल्यामुळे कळाली.
१०.१ रावणानुग्रहशिवमूर्ती च्या ओघाने आलेली कथा ज्ञानात छान भर टाकते आहेच शिवाय मूर्तिचे विश्लेषणही चित्तवेधक आहे.
संहारमूर्ती नावाप्रमाणेच साजेश्या आहेत. त्यातली अंधकासुरवधाची संहारमूर्ति तुझ्या वेरुळच्या लेखात आधी पाहिली होती. ती खरोखर संहारक दिसते.
भैरवावर संक्षेपाने पण नेमकी माहिती तू दिली आहेस.
अधिक माहितीसाठी - भैरवावर रा.चिं.ढेरे यांनी लज्जागौरी ग्रंथात बरेच सुंदरपणे सांगितले आहे. मातृकांवरही त्यातच विपुल लेखन आहे. ते तू वाचले असशीलच. पण पुढील लेखनासाठी संदर्भ तपासून बघण्यासाठी नक्कीच उपयोग होईल.
दिक्पालांवर तुझ्या लेखाची मात्र प्रतिक्षा करतो आहे. दिक् पाल तू आधी लिही असा आग्रह करु इच्छितो. कारण दिक् पालांचे दिशांवर नियंत्रण असल्याकारणाने वैज्ञानिक भूमिकेतूनही या दिक् पालांचे महत्त्व आहेच. पण मूर्तीविज्ञानात त्याची दखल तू कशी घेतोस याची उत्सुकता आहे :)
शिव म्हणा, रुद्र म्हणा कि आणखी काहि. आर्य, अनार्य, द्रविड, वैदीक वगैरे संस्कृतींचे पडसाद त्या त्या काळच्या मुर्तीशास्त्रात आढळतात. पण हि मंदीरे आणि मुर्त्या केवळ काहि कथाबीजांवर आधारीत असतात का? कि त्या प्रदेशाचा राजा, मुर्तीकाराला अभिप्रेत भाव, अॅक्च्युअल स्थापत्य करणार्यांच्या सोयी-एक्स्पर्टीज-मर्यादा, उपलब्ध साधनं, जसं पाषाण वगैरे घटक कंसीडर केल्या जात असतील? सर्वात महत्वाचं म्हणजे प्राचीक काळापासुन अनेक प्रकारच्या उपासना पद्धतींच्या अनाकलनीय प्रॅक्टीस प्राचारात होत्या व आहेत. जर हि मंदीरं त्या विशिष्ट उपासनेकरता बनविली जात असतील, किंवा उपलब्ध मंदीरात एखादी उपासना सुरु करण्यात येत असेल तर त्या मुर्ती किंवा मंदीराच्या रचना व आवार त्या उपासनेला अनुकुल बनवण्यात येत असावं काय? अशी कुठली सिग्नेचर व्यवस्था दिसुन येते का? केवळ मातृभाव, प्रजजन गौरव किंवा शौर्य कौतुक करायला म्हणुन हि मंदीरं बांधण्यात आलि असं वाटत नाहि. व्हॉट माइट बी द अदर साईड?
ह्या मूर्ती शक्यतो ग्रांथिक वर्णनांवर आधारीत असतात. काही मूर्ती चक्क वेदांतील उल्लेखाबरहूकूम बनवलेल्या आहेत. उदा. पाटेश्वरातील अग्नी वृषाची अतिशय दुर्मिळ मूर्ती. पुराणांत, रामायण, महाभारत आदी महाकाव्यांत बरीच वर्णने आली आहेत. त्यानुसारही मूर्टी घडवल्या जातात. अर्थात प्रत्यक्ष पूजेच्या मूर्ती शक्यतो साध्या असून मंदिरांच्या अथवा लेण्यांच्या बाह्यभितींवर पुराणातले प्रसंग कोरलेले आढळतात.
मूर्ती कोरण्याच्या बाबतीत परंपरांचे दोन प्रकारे पालन केलेले आढळते जसे पहिला प्रकार म्हणजे विष्णू, ब्रह्मा, शिव, स्कंद किंवा इतरही बर्याच देवता. यांची लक्षणे सर्व ठिकाणी सारखीच आढळतात. उदा. शिवाच्या हाती त्रिशूळ - डमरू, विष्णूच्या हाती शंख-चक्र. ही परिस्थिती सहसा कुठेच बदलत नाहीच.
तर दुसरा प्रकार म्हणजे लेणी-मंदिरे कोरण्याच्या कलेतील बदल. माझ्या मते भारतात बौद्द लेण्यांपासून प्रेरणा घेण्यात आली. काळानुसार शैलीत बदल दिसत असला तरी मूळ गाभा एकच असल्याचे दिसते.
वेगवेगळ्या राजवटींमध्ये मूर्ती कोरण्यात फरक असला तरी मूळ मूर्तीची लक्षणे तीच असल्याचे दिसते. राष्ट्रकूट कला ही सहसा द्राविड पद्धतीची दिसते साहजिकच त्यांनी ऐहोळे, पट्टदकल, महाबलीपुरम इत्यादी प्राचीन मंदिरांच्या शैलीवरून प्रेरणा घेतल्याचे दिसते. तर होयसाळांनी मूळ गाभा तोच ठेवून मूर्ती अतिशय सालंकृत करून नवीनच होयसाळ शैली निर्माण केली जी आज होयसाळ स्कूल म्हणून ओळखली जाते. अर्थात ह्यात तिकडच्या ग्रेनाईट दगडाचा पण तितकाच महत्वाचा वाटा.
सहासा ही मंदिरे सर्वसाधारण उपासनेसाठी बनवली जात असावेत. प्रसंग कोरण्याचा सर्वात मोठा हेतू मला असा वाटतो म्हणजे त्याकाळी बौद्ध धर्माच्या वाढत्या प्रसारामुळे मूळ वैदिक धर्मापासून दूर जाणार्या जनतेला परत आपल्या धर्माकडे वळवून घेणे. अर्थात त्याचा बौद्ध धर्मावर प्रतिकूल परिणाम झालाच. वेरूळसारख्या तिभव्य लेण्याच्या निर्मितीनंतर अजिंठा जवळजवळ विस्मृतीत गेले.
माझ्या मते तरी धर्मप्रसारासाठीच आणि त्यानंतर वेगवेगळ्या राजवटींशी असलेल्या स्पर्धेतून देखणी मंदिरे उभारली गेली. उपासना हा हेतू बहुधा गौणच होता.
अर्थात हिंदूंमध्ये तेव्हाही तंत्र उपासना चालत होतीच पण सहसा यासाठी जनतेपासून फटकून असणार्या, एकाकी, निर्जन जागांचा उपयोग केला गेला. उदा: पाटेश्वर.
वेगवेगळ्या प्रदेशांतील मूर्तींचे चेहरे पहाताना त्या त्या प्रदेशातील लोकांच्या चेहरेपट्टीशी ते मिळतेजुळते वाटतात. उदा.राणीवाव या लेखांतल्या स्त्रीमूर्ती या पातळ ओठांच्या आणि सडपातळ बाहू-दंड-मांड्यादि अवयवांच्या वाटतात. जैनांच्या महावीरमूर्तीचे ओठ हे अगदी वेगळे असतात. म्हणजे वरच्या ओठाच्या दोन पाकळ्या अर्धगोलाकार वरती वळलेल्या वगैरे. वेगवेगळ्या देशांतील बुद्धप्रतिमा पहातानाही असेच वाटते. दक्षिण भारतातील स्त्रीमूर्ती अतिसौष्ठवपूर्ण आणि धष्टपुष्ट वाटतात. हा माझा दृष्टिभ्रम आहे की खरेच असे काही असू शकते?
चित्रकलेतही वेगळ्या वंशाच्या लोकांनी काढलेली भारतीयांची चित्रे वेगळी म्हणून ओळखू येतात. अपरे आणि पातळ नाक, गोलसर (आपल्याकडले मीन, हरिण वगैरेसारखे लांबट असतात) डोळे ,लांब मान, उतरता आणि विस्तृत स्कंधप्रदेश असा थोडा वेगळेपणा दिसतो. असो. मूर्तिशास्त्राचा काहीच अभ्यास नाही तेव्हा इथेच थांबावे हे बरे.
अर्थात त्याकाळी लिंग पूजा ही शिव अथवा रूद्र देवतेची नसून ती होती प्रजनन शक्तीची. निसर्गाच्या पुनरुत्पादनाच्या चमत्काराचे प्रतिक म्हणून स्त्रीशक्तीची उपासना योनीपूजेच्या स्वरूपात तर पुरुष शक्तीची उपासना लिंग स्वरूपात करण्यास प्रारंभ झाला असे म्हणता यावे.
कमाल असते नाही अशा योगायोगांची ? विचक्राफ्ट संबंधि सर्व मुळ माहितिस्त्रोतात ते फक्त निसर्गधर्म/शक्ति/देवता मानतात व त्यात पुरुषाला होर्न(शिंग असलेला) गॉड ऑफ हंटिग अन स्त्रिला गॉडेस ऑफ फर्टिलिटी मानुन पुजा/विधी करतात.
आंध्रप्रदेशात गुडिमल्लम इथे इसापूर्व ३ शतकातील एक शिव मंदिर आहे. तिथे असलेली ही अनोखी मुर्ती. (फोटो विकिवरून साभार)
शिवपार्वती
इतक्यात ‘व्हॅलेंटाईन डे’ किंवा खरेतर ‘व्हॅलेंटाईन सप्ताह’ संपन्न की काय तो झाला! तरुणाईकरिता अगदी गजबजलेला आठवडा. ‘रोझ डे’, ‘टेडी डे’, ‘चॉकलेट डे’ वगैरे कसले कसले ‘डेज्’ झाले. ‘रोझ डे’ला गडद लाल रंगांचे गुलाब देऊन आपले प्रेम व्यक्त करायचे. ‘प्रॉमिस डे’ हा प्रेमाच्या आणाभाका घ्यायच्या. ‘प्रोपोज डे’ आपल्या प्रेमाची कबुली देऊन, लग्नाची मागणी घालायची. प्रेमी युगुलांसाठी हा एक सणच म्हणा. प्रेम करणे, प्रपोज करणे नवीन का आहे? मानव पृथ्वीवर अवतरण्याच्या आधीपासून ‘प्रपोज डे’ आहे.
मानवांमध्ये, देवांमध्ये मात्र मनपसंत जोडीदाराला ‘प्रोपोज’ करणाऱ्यांमध्ये आद्य प्रेमिका आहे – उमा! हिमवान् पर्वताची कन्या पार्वती. लाडाकोडात वाढलेली राजाची कन्या! ही गिरीकन्या गिरीजा, आकंठ प्रेमात पडली! कुणाच्या? तर अंगाला भस्म लावलेल्या, व्याघ्रांबर परिधान केलेल्या, दाढी जटा वाढवलेल्या एका कफल्लक जोग्याच्या! त्याच्याशीच लग्न करायचा विचार तिचा पक्का होता. किती समजावलं तिला, कोणी राजकुमार पाहू गं तुझ्यासाठी! पण, पार्वती काही बधली नाही. तिने शिवशंकर शंभोला प्रसन्न करून घेण्यासाठी तपश्चर्या आरंभली. फक्त पाने खाऊन उपवास केले. पुढे पाने खाणेसुद्धा बंद केले, तेव्हा तिला ‘अपर्णा’ नाव मिळाले. तिने पंचाग्नी पेटवून घोर तपश्चर्या सुरू केली. आपल्या प्रेमाची प्रांजळ कबुली देणारी, स्वत: पुढाकार घेऊन लग्नासाठी मागणी घालणारी पार्वती आदर्शच म्हणायला हवी.
शंकर तर ध्यान लावून बसलेले. त्यांना या कशाचाच पत्ता नाही! इकडे तर इंद्रादिक देवसुद्धा वाट पाहू लागले, कधी शंकर डोळे उघडणार, कधी पार्वतीच्या तपश्चर्येला प्रसन्न होणार आणि कधी त्यांचा विवाह होणार! पार्वतीची अवस्था पाहून त्यांनी कामदेवाला गळ घातली, “जा रे, तू तरी शंकराला ध्यानातून जागे कर. तुझ्या मदनबाणाने त्याला घायाळ कर! म्हणजे तो पार्वतीशी विवाह करायला उत्सुक होईल!” कामदेवाने त्याचा उसाचा गोड धनुष्य घेतला, भात्यात पाच प्रकारचे मदनबाण घेतले आणि कैलासावर पोहोचला. त्याने शंकरावर मदनबाण सोडताच शंकर ध्यानातून जागे झाले. डोळे उघडताच समोर कामदेव दिसला आणि सगळा प्रकार शंकराच्या लक्षात आला. आपल्याला समाधीतून उठवणाऱ्या कामदेवावर शंकर संतापले. शंकराने तिसरा डोळा उघडून त्याला क्षणात भस्मसात केले! (शंकराचा राग उतरल्यावर, कामदेवाच्या पत्नीने रतीने, शंकराकडे क्षमा मागितली. त्यावर शंकराने कामदेवाला पुन्हा जीवंत केले. कामदेवाला जिथे पुन्हा शरीर प्राप्त झाले, नवीन रूप मिळाले तो प्रांत ‘कामरूप’ या नावाने प्रसिद्ध झाला. जो आज आपण ‘आसाम’ म्हणून ओळखतो.)

आत्ता कुठे शंकराचे लक्ष पार्वतीकडे गेले. तिची मागणी त्याला कळली. तेव्हा त्याने तिची परीक्षा घेण्याचे ठरवले. एका बटूचा वेश घेऊन तो पार्वतीकडे गेला आणि तिच्या पुढे शंकराला नावे ठेवू लागला. “तो काय पडला जोगी, तू तर राजकन्या, कशाला त्याच्या मागे लागतेस? त्याला राहायला न घर ना दार. कधी उठून गणांना घेऊन स्मशानात जाऊन बसेल, तर कधी कैलासात ध्यानस्थ बसेल! त्या जोग्याचा काही नेम नाही बरे का!” शंकराची निंदा ऐकून पार्वतीला फार राग आला. तिने त्या बटूला तेथून चालते व्हायला सांगितले. त्यावर शंकराची खात्री पटली की पार्वती आपल्याशी लग्न करण्यास योग्य आहे. शंकर प्रसन्न झाला! त्याने पार्वतीला लग्नाला होकार दिला!
फार शिकण्यासारखी गोष्ट आहे ही. लग्नाच्या आधी शंकराने कामदेवाला जाळून भस्म केले आहे! वासनारहित शुद्ध प्रेम हा वैवाहिक जीवनाचा पाया आहे हे दाखून दिले. अगदी इतक्यात घडलेली दोन-तीन जळीतकांड वाचत आहोत. ‘प्रपोज’ केल्यावर ‘नाही’ म्हटले म्हणून किंवा उपभोग घेऊन स्त्रीला जाळले गेले. अशा घटना वाचून सांगावेसे वाटते की, स्त्रीला नाही, कामवासनेला जाळायचे असते. स्वत:च्या ‘Lust’ ला जाळायचे असते. पण, हे शिकवणार कोण? शिवपुराणातील ही शंकराची कथा हे शिकवण्यासाठीच लिहिली आहे. लहानपणापासून पुराणातील या गोष्टी सांगितल्या-ऐकल्या तर संस्कार होतील आणि याचसाठी आपले पौराणिक ग्रंथ व कथा ही पुराणातली वानगी नाहीत, तर आजही ‘रिलेव्हन्ट’ आहेत. त्यातील धडे आजही गरजेचे आहेत.
शंकराने विवाहाला होकार देताच सगळीकडे आनंदी आनंद झाला. लग्नाची तयारी झाली. पार्वतीचे आई-वडील आलेत. विवाहाला स्वत: ब्रह्म पुरोहित म्हणून आला आहे. गंधर्व नवीन जोडप्यावर आकाशातून पुष्पवृष्टी करत आहेत. मंगल वाद्ये वाजत आहेत. वधू-वर दोघेही किंचित संकोचलेले आहेत. शंकर एक पाय गुडघ्यात वाकून उभा आहे. अधोवदना पार्वती पायाच्या अंगठ्याने जमीन उकरत आहे आणि वधूचा हात वरच्या हातात द्यायच्या ऐवजी, चक्क शंकराचा हात पार्वतीच्या हातात दिला आहे! चुकलं का काही पुरोहिताचे? की पार्वतीने लग्नात शंकराचा हात मागितला असे सुचवायचे आहे?
प्रेमळ जोडपे कसे असावे याचे धडेच शिव-पार्वतीने घालून दिले आहेत. शंकर उगीच फोनमध्ये किंवा पेपरमध्ये डोके खुपसून बसणारा किंवा लग्नाच्या आधी गणांसोबत रमायचा तसे तासन्तास त्यांच्यात रमणारा नवरा नाहीये. पार्वती पण आपल्या माहेरच्या वैभवाचे गुणगान करणारी बायको नाही. दोघे एकमेकांना वेळ देतात. गप्पागोष्टी करतात. आपल्या मनातील गुज सांगतात. एकत्र फिरायला जातात. कित्येक कहाण्यांची सुरुवात ही ‘एकदा काय झालं? शंकर पार्वती विमानातून जात होते’ अशी होते. इतकंच काय, दोघे मिळून सारीपाटाचा डावसुद्धा खेळतात. एकदा सारीपाट खेळताना शंकर सारखा जिंकला, तेव्हा पार्वती खट्टू झाली. मग शंकर एक डाव मुद्दाम हरला, त्या डावात पार्वतीने त्याचा नंदी जिंकून घेतला आणि आपल्या सख्यांकडून तिने नंदी आणवून घेतला!

लक्षात घेण्यासारखे आहे बरे, पार्वती कधीच एकटी नसते. तिच्याबरोबर कायम तिची सखी असते. सखी-पार्वती अशी जोडगोळीच आहे. तिच्या बरोबर तिच्या मैत्रिणी असतात. ‘माझे मूड, माझ्या स्त्रीमनातील तरल संवेदना’ वगैरे नवऱ्याने समजून घेतल्याच पाहिजेत, असा तिचा आग्रह नाही. शॉपिंगला नवऱ्याने आलेच पाहिजे, अशी तिची अपेक्षा नाही. अशा तिच्या गरजा पण नाहीत. कारण, तिला मैत्रिणी आहेत. जीवाभावाच्या, साथ देणाऱ्या, तिच्या तक्रारी ऐकून घेणाऱ्या, उपाय सुचवणाऱ्या आणि तिची चूक असेल तर ती चूक दाखवून देणाऱ्यासुद्धा.
आता संसार म्हटला की, भांडणे आलीच! शंकर-पार्वती असले म्हणून काय झालं? एकदा काय झाले, रावण कैलासामध्ये शंकराला भेटायला आला. पण द्वारपालांनी त्याला अडवले. ‘अंदर की बात’ अशी की, शंकर-पार्वतीचे काही कारणाने भांडण झाले होते. पार्वती रुसली होती. रागावून, तोंड फिरवून बसली होती. आता तिथे रावणाला कसे पाठवणार? पण रावणाला आला राग. तो म्हणाला, “मी कैलासच उचलून लंकेला घेऊन जातो!” रावण कैलास तोलू लागला. पर्वत हलायला लागला. पशुपक्षी, यक्ष-गण सगळे घाबरून सैरावैरा पळू लागले. पार्वती पण घाबरली. पण भांडण झालंय, मग शंकराला कसे बिलगणार? म्हणून दुरूनच तिने शंकराच्या हाताला धरले आहे आणि शंकर स्थितप्रज्ञपणे आपल्या पायाच्या अंगठ्याने कैलास दाबतो. त्या भाराने रावण चिरडला जाऊ लागतो. त्याचा अहंकार गळून पडतो. त्यावर रावण शिवतांडव स्तोत्र गाऊन शंकराची स्तुती करतो. शंकर त्याने प्रसन्न होऊन रावणाला क्षमा करून सोडून देतो!

शिव-पार्वतीच्या वैवाहिक आयुष्यात चढउतार पण आलेत. आता हा गंगावतरणाचाच प्रसंग पाहा. आकाशातून त्रिमुखी गंगा पृथ्वीवर कोसळणार आहे. गंगेचा ओघ पृथ्वीला सहन होणार नाही, म्हणून भगवान शंकर गंगा आपल्या जटेत झेलण्यासाठी उभा आहे आणि सवत आणली की काय, या विचाराने खिन्न होऊन तिथून काढता पाय घेणारी पार्वती. शंकर एका हाताने तिला थांबवत जणू म्हणत आहे, “अगं, जाऊ नकोस. तू समजतेस असे काही नाही! या भगीरथासाठी गंगेला जटेत झेलत आहे इतकेच!”
शंकराचा राग, संताप, तिसरा डोळा उघडणे, पराक्रम गाजवणे वगैरे गोष्टी रणांगणासाठी राखीव आहेत. ‘ऑफिसचा स्ट्रेस’ घरी आणून बॉसचा राग तो बायकोवर काढत नाही. घरी तो अतिशय शांत, सुस्वभावी, प्रेमळ आणि भोळा नवरा आहे. संसारात, मुलाबाळात रमणारा गृहस्थ आहे. एखाद्या रविवारी सकाळी जर पार्वतीने “अहो! किती रद्दी साठली आहे, तेवढी टाकून येता का?” असे म्हटले तर तो शांतपणे, “येताना भाजी आणायची का?” असे विचारून रद्दीची पिशवी घेऊन जाईल! शंकर-पार्वती आणि त्यांची दोन मुले हे चौकोनी कुटुंब आहे. अशा कुटुंबवत्सल शंकराचे वर्णन करताना संत कृष्णसुत म्हणतात-
गणूबाळ खेळे लडिवाळ,
धरुनी मृदू गाल, चुंबना घेई
ते कौतुक पाहुनी हासे अंबाबाई
श्रीसांब जगादिस्तंभ, गौरी हेरंभ जयाच्या अंकी
उद्धार करा मी, रुतलो या भवपंकी
या दैवी जोडप्याच्या संसारात, पार्वती भोळ्या शंकराची काळजी वाहताना दिसते. जसे, समुद्रमंथनाच्या प्रसंगी जेव्हा हलाहल विष प्रकट झाले, तेव्हा सर्व देवांनी शंकराकडे धाव घेतली. शंकराला म्हणू लागले काहीतरी करून जगाला संहारापासून वाचव! तेव्हा शंकराने हलाहल पिण्याचे ठरवले. पार्वतीने त्याला सावध केले, विरोध केला. तरीही शंकराने हलाहल प्राशन केलेच. तेव्हा विष पोटात जाऊ नये म्हणून पार्वतीने पट्कन त्याचा गळा धरला. पार्वतीच्या या प्रसंगावधानाने ते विष शंकराच्या कंठात राहिले. त्याचा कंठ विषाने काळानिळा झाला. कर्पुरासारख्या गौरवर्णीय शंकराला ‘नीलकंठ’ नाव मिळाले. शंकर-पार्वतीचा संवाद तर दैवी आहे!
कधी पार्वतीने म्हणावे, “मला किनई आज अगदी बोअर झालंय गडे! एखादी गोष्ट सांगा ना!” की लगेच शंकराने तिला विद्याधर राजांच्या सात भल्यामोठ्या रोमांचकारी कहाण्या सांगाव्यात. त्यांच्या या संवादातून बृहत्कथा या सर्वात मोठ्या आणि प्राचीन कथा संग्रहाचा जन्म होतो किंवा पार्वतीने कधी योगसाधनेबद्दल प्रश्न करावा आणि शंकराने तिला योगमार्गाचे ज्ञान द्यावे. या संवादातून नाथपंथाचा जन्म होतो. कधी पार्वतीने नवल करावे, इतका एकसारखा ज्याचा विचार करत बसला आहात, ते गीतातत्त्व आहे तरी काय? तेव्हा शंकराने तिचेच कौतुक करत म्हणावे, “देवी, तुझे रूप जसे नित्यनूतन असल्याने तुझा थांग लागत नाही. तसे गीतेतील तत्त्वज्ञानाचा विचार करू जावे, तर रोज नवीनच आहे असे दिसते!”
तेथ हरू म्हणे नेणीजे ।
देवी जैसे का स्वरूप तुझे ।
तैसे हे नित्य नूतन देखिजे ।
गीतातत्त्व ॥ ज्ञा. १.७१ ॥
त्यांच्या दोघात श्रेष्ठ कोण, कनिष्ठ कोण असे जर शंकराला विचारले, तर तो पार्वती श्रेष्ठ आहे असेच म्हणेल. शंकराच्या नावातून पण हे कळते. त्याला पार्वतीच्या नावाने ओळखले जाते. जसे, ‘गिरिजापती’, ‘उमाकांत’, ‘पर्वतीपती.’ पण, पार्वतीची मात्र स्वत:ची ओळख आहे. अंबा, दुर्गा, गौरी, उमा! ती कधी स्वत:ची ओळख, ‘मी शंकराची भार्या’ अशी करून देत नाही. पहा तर या शिल्पात शंकरदेखील हेच सुचवत आहे – शक्तीशिवाय मी अचेतन शव आहे! पार्वती म्हणजे माझे चैतन्य आहे, प्राण आहे!
सहजच भारतातील ‘व्हॅलेंटाईन डे’ हा शिव-पार्वतीच्या स्मरणाने होतो. लग्नाच्या आधी वधू गौरीहराची पूजा करते ते याकरिता की, माझा संसार शिव-पार्वतीच्या संसारासारखा होवो! लग्नानंतर पहिली पाच वर्षे नवरी श्रावण महिन्यात मंगळागौरीची पूजा करते. ते देखील यासाठी की, गौरीने प्रसन्न होऊन माझा प्रपंच नेटका करावा! पार्वती जशी शंकराच्या गळ्यातील ताईत झाली, तालिका झाली तसे पत्नीने नवऱ्याच्या गळ्यातील ताईत व्हावे, म्हणून विवाहिता दर वर्षी हरतालिकेची पूजा करते. हे सगळे आपल्याकडचे प्रेम साजरं करायचे ‘डेज’ आहेत. सेंट व्हॅलेंटाईनच्या कित्येक शतके आधीपासून आपल्याकडे प्रेमाचे ‘डेज्’ साजरे केले जात आहेत. या ‘डेज्’ ना शिव-पार्वतीच्या कथेची पार्श्वभूमी लाभली आहे.
शिव-पार्वतीच्या कथेला फक्त संसारिक, प्रापंचिक नाही तर सामाजिक आणि आध्यात्मिक जोड आहे. शिव-पार्वती नुसतेच ‘प्रपोज’ करायला शिकवत नाहीत, तर ‘प्रपोज’ करणाऱ्याची/करणारीची परीक्षा घ्यायला शिकवतात. ‘प्रपोज’ करणारा/करणारी परीक्षेत पास झाली तरच ‘हो’ म्हणायचे हे शिकवतात. नुसतेच ‘एकमेकांवर प्रेम करत फिरा,’ असे शिकवत नाहीत, तर ते विमानातून फिरताना कोणी दु:खी कष्टी दिसले, तर तिथे थांबून त्याची चौकशी करून त्याला मदत करायला शिकवतात. नुसतेच लग्न करायला शिकवत नाहीत तर ते निभवायला शिकवतात. नवरा – बायकोची बरोबरी शिकावात. “गप गं! तुला काय कळते यातले!” असे न म्हणता बायकोचे ऐकायला शिकवतात आणि नवरा-बायकोचे अद्वैत शिकवताना दोघांना पुरुष-प्रकृतीच्या पातळीवर घेऊन जातात.
- दीपाली पाटवदकर
केवल शिव, छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तू संग्रहालय, मुंबई
आता या फोटोमध्ये असलेल्या शिवाचे निरीक्षण करूयात. आधी सांगितल्याप्रमाणे डावीकडून उजवीकडे असे निरीक्षण करायचे आहे. मूर्ती स्थानक म्हणजेच उभी आहे, हातामध्ये पकडलेला त्रिशूळ आणि त्या दंडाला खाली वेटोळे दिलेला नाग, कमरेवर नेसलेले वाघाचे कातडे (गुडघ्याजवळ वाघाचे तोंड दिसेल), डोक्यावर असलेला जटा मुकुट, पाठीमागे कोरलेली प्रभावळ किंवा वलय हे त्याच्या दैवत्वाचा पुरावा देतात.
लिंगपुराण, शिवपुराण, इत्यादी पुराणांमध्ये शंकराच्या कथा आपल्याला वाचायला मिळतात. वेदांमध्ये छोट्या प्रमाणात दिसणारा रुद्र ते पौराणिक कालखंडात प्रमुख देव म्हणून दिसणारा शिव हा प्रवास खरंच अद्भुत आहे.
शिवमुर्तीशास्त्र
केवलमूर्ती :-
यामध्ये एकटा शिव समभंग अवस्थेत (दोन्ही पायावर सरळ) उभा असतो. या मूर्तिप्रकारात फारसे लालित्य नसते. प्रसंगी त्याच्या मागे नंदीही काडलेला असतो. त्याच्या वरच्या उजव्या हातामध्ये त्रिशूळ व अन्य हातांमध्ये डमरू, सर्प इ. लांछने असतात. वेरुळच्या कैलास मंदिरामध्ये अनेक ठिकाणी याचे शिल्पांकन दिसते.अंजली मुद्रेतील केवल शिव
भिक्षाटनमूर्ती :-
पुराणातील एका कथेनुसार शिव-पार्वती सारीपाटाचा खेळ खेळत असताना पार्वतीने शिवाचे त्रिभुवनासहीत सर्व वस्त्रेही जिंकून त्याला दिगंबर केले. त्यामुळे शिवाला भिक्षा मागत फिरावे लागले. भिक्षापात्र घेऊन उभा असलेल्या शिवाचे शिल्प अनेक मंदिरांमध्ये आढळते. या मूर्तीला भिक्षाटन शिव असे म्हणतात. वेरुळ येथील कैलासमंदिराच्या मागील (पूर्वेकडील) विथिकेत (व्हरांड्यात) हे शिल्प आढळते. येथे शिवाला भिक्षा वाढणारी स्त्री ही अन्नपूर्णा पार्वतीमाताच असते.
भिक्षाटन शिव-Bhikshatan Shiv,Kailasnathar Temple,Kanchipuram

A different form of Shiva named as BHIKSHATAN SHIV is seen in some of the Shiv Temples of Southern India, including Kailasnathar Temple at Kanchipuram, Tamilnadu. The Story here briefly describes the story of Bhikshatan Shiv as found in various Puranas and its Sculptural representation in various Temples. Interestingly, we can connect the Stories of (1) Lingodbhav Shiv (2) Bhikshatan Shiv (3) Bhairav form of Shiv and (4) Kapalik Shiv though these stories and Sculptures.
कांचीपुरमच्या कैलासनाथार मंदिरात फिरताना शिवाचे एक वेगळेच रूप आपल्याला पाहायला मिळालं आणि याचे वेगळेपण शोधताना एक आगळीवेगळी कथा समोर आली ती म्हणजे “भिक्षाटन” करणाऱ्या शिवाची. ही मूर्ती जवळपास नग्न, म्हणजे सर्वस्वाचा त्याग केलेली आहे आणि भैरवासारखी उग्र देखील नाही. याची कथा थोडक्यात समजली ती अशी…
लिंगोद्भव शिवाच्या स्वरूपाने कालभैरवाला जन्म देत ब्रम्हाचे ५वे शीर कापले. या ब्रह्महत्येच्या पापामुळे ते शीर त्याचा हाताला चिकटले. म्हणून पापाचे परीक्षालन करण्या करिता शिवाने भैरवाचे रुप टाकून कापालिकाचे (ब्रम्हाच्या कपालातून भिक्षा मागणारा) रुप धारण केले. हाच कापालिक म्हणजे देशोदेशी भिक्षाटन करत फिरणारा शिव.

दक्षिणेकडील काही देवळात शिवाचे हे “भिक्षाटन” रुप आढळते. राजाराजा चोलाचा पुत्र राजेंद्र चोला याने बांधलेल्या गंगाईकोंडा चोलापूरम येथील मंदिरात देखील हे आहे. भिक्षाटन करणारा हा शिव तिन्ही लोकात भटकतो तसा तो देवदार वनात (अथवा दारुक वनात) देखील जातो. तेथे ऋषीमुनी यज्ञ कार्यात गुंतलेले असतात. ऋषीपत्नी या शिवाचे नग्न पण तेजस्वी रुप पाहून मोहित होतात व त्यांची वस्त्रे ढळतात, अशीही शिल्पे काही ठिकाणी आहेत. कधीकधी या शिवाबरोबर इतर स्त्रिया, किंवा भिक्षा टोपलीत घेऊन चालणारा सहायक असेही दाखविले जातात. काही ठिकाणी ऋषीमुनी त्याला मारायला धावतात (आपल्या स्त्रियांना नादाला लावल्यामुळे) अशीही शिल्पे आहेत. यात शिल्पांमध्ये बरेचदा शिवाच्या पायात खडावा देखील दाखविल्या जातात. बरेचदा भिक्षा देणारी स्त्री “देवी अन्नपूर्णा” म्हणून देखील दर्शविली जाते.
भिक्षाटन शिवाच्या पुराणातील कथा
पुराणातील कथांनुसार यात वैविध्य आढळते. कूर्म पुराणानुसार या भटकंतीत शिव पुढे वैकुंठाला जातो तेव्हा त्याचे हे कापालिक रूप बघून विष्णूंचा द्वारपाल “विश्वकसेन” त्याला अडवितो तेव्हा संतप्त झालेला भिक्षाटन शिव विश्वकसेनाला आपल्या त्रिशुळाने मारून उचलतो व अजून एक पाप जोडतो. आता हे भिक्षाटन रुप कंकालमूर्तीत परिवर्तित होते व विष्णूकडे आपल्या मुक्ततेसाठी भिक्षा मागते. यावेळी विष्णू त्याच्या मस्तकाची शीर कापून त्याचीच धार अन्नरूपात या कंकालाच्या भिक्षापात्रात टाकतो व त्याला वाराणसीत जाऊन पापक्षालनाचा सल्ला देतो. तसे केल्यावर भिक्षाटन शिवाच्या हस्ताला चिकटलेले ब्रम्हाचे शीर गळून पडते. ही जागा म्हणजेच वाराणसीतील “कपाल मोचन कुंड” याच ठिकाणी विश्वकसेनाचे शव देखील अदृश्य होते व शिवाचे पापक्षालन होऊन तो पुन्हा कैलासावर परततो.

वामन पुराणात हि कथा थोड्या वेगळ्या स्वरूपात येते. या कथेनुसार प्रजापती दक्षाच्या यज्ञात सती पार्वतीने स्वतःला झोकून दिल्यावर तिच्या विरहाने व्याकुळ झालेला व त्याचबरोबर मदनाने त्याला उन्माद आणि विजृम्भण नावाचे दोन बाण मारून विद्ध केले. हा शिव संतापात विश्वात भ्रमण करून जगताला पीडा देत असताना यक्षाधिपती कुबेराचा पुत्र “पांचालिकाने” त्याला पाहिले व शिवाकडून ही दोन्ही अस्त्रे धारण करत तो “पांचालिकेश” झाला आणि शिव पुढे विंध्य पर्वताकडे भिक्षाटनासाठी निघाला तोच शिव म्हणजे हा “भिक्षाटन शिव”. पण शंकराला त्या अवस्थेत पाहून वसिष्ठ पत्नी अरुंधती आणि अत्री पत्नी अनुसूया यांच्या व्यतिरिक्त इतर ऋषीपत्नी मोहित होऊ लागल्या, त्यांची वस्त्रे ढळू लागली आणि म्हणून संतप्त झालेल्या ऋषींनी शिवलिंग पृथ्वीवर पतित होईल असा शाप दिला आणि शंकराची कामभावना गळून पडली, आणि शंकर तेथून अंतर्धान पावले.

याप्रकारे शांत झालेले शंकर वनांत शांत बसलेले असताना कामदेव मदन त्यांच्या मागावर आला. त्याला पाहून शंकर क्रोधीत झाले व त्यांनी आपला तृतीय नेत्र उघडून त्याला भस्म केले, म्हणजेच त्यांनी कामभावनेवर संपूर्ण विजय प्राप्त केला. भस्म झालेला कामदेव मदन त्यानंतर विना अंगाचा म्हणजेच अनंग म्हणून फिरू लागला.

स्कंद पुराणानुसार ही कथा अगदी वेगळ्या स्वरुपात येते. यानुसार दारुक (देवदार) वनातील ऋषींचे गर्वहरण करण्याकरिता शिवाने “भिक्षाटन” रूप धारण केले तर विष्णूने मोहिनीरूप. तेथे तपश्चर्या करणाऱ्या ऋषींचे गर्वहरण करण्याकरिता शिव तेथे भिक्षेला गेले तेव्हा ते सतीच्या विरहाने व्याकुळ व तिच्याच विचारात होते. म्हणून ऋषिपत्नींना त्यांची दया आली व त्या त्यांना भिक्षा देऊ लागल्या. ते सहन न झाल्याने ऋषींनी त्यांना तुम्ही षंढ व्हाल असा शाप दिला पण यानंतर त्या ऋषींना सर्व जागाच लिंगमय भासले व त्याचा आदी आणि अंत त्यांना सापडेना. यावर त्यांनी हि गोष्ट ब्रह्मदेवानं सांगितली तेव्हा ब्रह्मदेवांनी शंकरांना हंसरूप घेऊन त्या लिंगाचे मूळ सापडल्याची कथा सांगितली आणि केतकीच्या फुलाची साक्ष दिली. यानंतर लिंगपूजा सर्वव्यापी झाली व अनेक ठिकाणी शिवलिंगाची स्थापना केली गेली.
भिक्षाटन शिव शिल्प ओळखायचे कसे?

या शिवाच्या रूपाचे वैशिष्ट्य म्हणजे शिवाचे नग्न स्वरूप. यातील शिल्पात बरेचदा शिवचरणी लीन झालेल्या स्त्रिया असतात. कामासक्तीने वस्त्रे ढळलेल्या स्त्रीचे शिल्पदेखील कधी कधी सोबत दाखविलेले असते. तर कधी जमलेली भिक्षा एका टोपलीत सोबत घेऊन चाललेला गण असतो व शिव त्यातीलच काही भाग सोबत असणाऱ्या कुत्र्याला देत असतात. भैरव स्वरूपात हातात ब्रम्हाचे ५वे शीर हातात घेऊन चाललेला शिव असतो. खांद्यावर अथवा हातात त्रिशूल असतो आणि बरेचदा या शिल्पांच्या पायात खडावा असतात ज्या इतर शिव शिल्पांमध्ये आढळून येत नाहीत.

भिक्षाटन शिवाच्या अनेक मूर्ती तामिळनाडूच्या विविध देवळातून पाहायला मिळाल्या. बृहदीश्वर मंदिर (तंजावर), एकांबरेश्वर मंदिर (कांचीपुरम), जळकंठेश्वर मंदिर (वेल्लोर) अशा काही मूर्तींची छायाचित्रे मी येथे टाकली आहेत पण सर्वसाधारणपणे दक्षिणेकडील बऱ्याच मंदिरात एकाहून अनेक खांबांवर शिवाचे भिक्षाटन, भैरव, कापालिक अशी अनेक रूपे सापडतात. फक्त आपण नीट निरीक्षण केले पाहिजे आणि या पाठीमागची कथा आपल्याला समजली तर ती शिल्प कळल्याचा आनंद देखील होतो.
महाराष्ट्रातील काही मंदिरांतील मी घेतलेली छायाचित्रे देखील मग मी चाळली आणि यात मला खिद्रापूरच्या कोप्पेश्वर (Koppeshwar Temple, Khidrapur, Maharashtra) मंदिरात, अंबरनाथच्या आम्रेश्वर शिव मंदिरात (Ambreshwar Temple, Ambarnath, Maharashtra) देखील हि शिल्पे कोरली असल्याचे आढळले.
हरिहरमूर्ती :-
सामाजिक ऐक्यासाठी कोरलेल्या शिल्पांमध्ये याचा समावेश करावा लागेल. शैव आणि वैष्णव यांच्यात उफाळलेल्या संघर्षाला उत्तर म्हणून या मूर्तीची निर्मिती झाली. ही दोन्ही वेगळी तत्त्वज्ञाने नसून एकाच वैदिक तत्त्वज्ञानाची ही दोन अंगे आहेत. ह्या उभ्या मूर्तीमध्ये मूर्तीच्या उजवीकडील अंग हे शिवाचे. उजव्या हातात त्रिशूल, डोक्याच्या अर्ध्या भागावर जटामुकुट आणि त्याखाली कोपऱ्यात नंदी ही शिवाची लक्षणे तर त्यातील शिवाच्या डाव्या बाजूला डोक्यावर विष्णूचा मुकुट, डाव्या वरच्या हातात चक्र, डाव्या खालच्या हातात शंख आणि खाली कोपऱ्यात हात जोडून बसलेला मानवी रूपातील गरुड ही सर्व विष्णूची लक्षणे. कैलास मंदिरातील पूर्वेकडील म्हणजे मागच्या विधिकेतील शिल्पपटात बरोबर मधोमध हे शिल्प कोरलेले आहेत.वीणाधर शिव :-
या मूर्तीमध्ये शंकराच्या हातात वीणा दाखवलेली असते. वेरुळच्या कैलास मंदिराभोवताली असणाऱ्या उत्तरेकडील विथिकेमध्ये हे शिल्प आहे. या मध्ये शंकर पार्वती बसलेले दाखवलेले असून, शंकराने हातात वीणा धरलेली दाखवली आहे. काही मंदिरांमध्ये नृत्य मुद्रेमध्ये सुद्धा शिवाने वीणा धरल्याचे दिसते.लिंगोद्भव मूर्ती :-
शिव मूर्तीच्या शिल्पांकनांचे तीन गट पडतात. व्यक्त, अव्यक्त आणि व्यक्ताव्यक्त. ज्या मूर्ती शारीर रूपात शिव दिसतो त्याला व्यक्त म्हणतात. अव्यक्त रूप म्हणजे शिवलिंग आणि त्याचे प्रकार.लिंगोद्भव शिव हे शिवाच्या व्यक्ताव्यक्त या प्रकारात येते. या शिल्पात मधोमध एक शिवलिंग असते ज्यामध्ये एक ज्योतीचा आकार कोरलेला असतो. त्यामध्ये एक उभी मानवाकृती कोरलेली असते जो आयुध विरहित शिव असतो. शेजारी चार मुखी ब्रह्मदेव उभा असतो आणि त्यान डोक्यावर हंसाचे रूप घेऊन तो आकाशात उड्डाण करताना दिसतो. तर शिवलिंगाच्या दुसऱ्या बाजुला विष्णु उभा असून त्याच्या पायाजवळ तो वराह रूपाने पाताळात जाताना दिसतो. यांची कथा (शिवपुराण, अ.२ श्लोक ३० ते ५०), एकदा ब्रह्मा आणि विष्णुमध्ये श्रेष्ठ कोण यावरून वाद झाल त्यांचे भांडण विकोपाला गेले. त्यावेळेस एक प्रचंड मोठी ज्वाला (अग्री स्तंभ) दोघांमध्ये प्रकर दोघांपैकी जो याच्या टोकाचा थांग लावेल तो श्रेष्ठ असे ठरले. हंसाचे रूप घेऊन ब्रह्माने आकाशाचे टोक शोधण्याचा प्रयत्न केला, तर त्याचे खालचे टोक शोधायला वराहाचे रूप घेऊन विष्णु पाताळात गेला. त्या दोघांनाही ते टोक काही सापडले नाही परत येऊन भेटल्यावर ब्रह्याने आपल्याला टोक सापडले असे खोटेच सांगितले. तेव्हा त्या स्तंभातून साक्षात शिव स्वतः प्रकट झाले आणि माझा थांग तुम्हाला लागणार नाही असे सांगितले. खोटे बोलल्याबद्दल ब्रह्माला त्यांनी शाप दिला. शैव पंथाचे माहात्य्य सांगणारे हे कथानक आणि त्याला अनुसरून केलेले हे शिल्प आहे असे सर्वसाधारणपणे मानले जाते.
परंतु या शिल्पामध्ये काळ अवकाश यांची अथांगता आणि अवकाश-ऊर्जेचे नाते स्पष्टपणे दाखविण्याचा प्रयत्न असावा असेही मत आहे (झिमर: १९९०, पृ.४८-५०). कैलासमंदिराच्या पायऱ्या उजवीकडून चढून जाताना प्रवेशद्वारावरील उजवीकडील भिंतीवर हे शिल्प दिसते.
यातील पहिलीच मूर्ती पाहूयात ती लिंगोद्भव शिवाची.
ही मूर्ती लिंग आणि मूर्ती अशा दोन्ही प्रकारांत गणली जाते.
. लिंगोद्भव शिव.
एकदा ब्रह्मा आणि विष्णू यांत श्रेष्ठत्वावरून वाद निर्माण झाला. तेव्हा एक दैदिप्यमान अग्निस्तंभ प्रकट झाला. याचा आदी आणि अंत जो शोधून काढेल तो श्रेष्ठ असे ठरले. विष्णू वराहाचे रूप घेऊन पाताळ शोधायला गेला तर ब्रह्माने हंसरूप घेऊन आकाशात मुसंडी मारली. जेव्हा कुणालाही कसलाही थांग लागेना तेव्हा ते दोघेही शिवाला शरण गेले तेव्हा दोघेही आपापल्या परीने श्रेष्ठ आहेत असे सांगून शिवाने लिंगोद्भव स्वरूपात आपले रूप प्रकट केले.
वेरूळ कैलास लेण्यातील लिंगद्भव शिवप्रतिमा
पुण्यातील त्रिशुंड गणेश मंदिरातील लिंगोद्भव प्रतिमा. 
Lingodbhava Shiva-लिंगोद्भव शिव - तामिळनाडू, शिल्पयात्रा

Lingodbhava Shiva – Brahma and Vishnu decided to take up the challenge to find ends of the pillar and prove their supremacy. Brahma takes up the form of a Swan or Gander and flies to the topside to look for the upper end while Vishnu takes the form of a boar and dives deep down to search for the bottom. But none of them succeeds in finding the end. Brahma decides to lie about finding the end, whereas Vishnu concedes.
Enraged, Shiva appeared out of the fiery column and cursed Brahma so that he would not be worshipped in temples on earth.
शिवरात्र व लिंगोद्भव शिव यांचा परस्परसंबंध

एक लिंगरूपी तेजोस्तंभातून शिवाचे प्रकटीकरण ही शिवकथा आपल्याला दक्षिणेकडील काही मंदिरात पाहायला मिळते. कुंभकोणम येथील ऐरावतेश्वर मंदिराच्या मागील भागात याचे एक उत्कृष्ट शिल्प आहे. या शिल्पसंकल्पनेचा उगम आपल्याला थिरुक्कुरल या प्राचीन तामिळ ग्रंथात आढळतो. अशाच प्रकारचं पण काहीसे वेगळे शिल्प आम्हाला कांचीपुरम येथील कैलासनाथार मंदिरात देखील आढळले. कांचीपुरमच्या एकांबरेश्वर मंदिरात देखील विष्णुमंदिराच्या पाठच्या भिंतीवर लिंगोद्भव शिवाचे सुंदर शिल्प आहे. महाराष्ट्रातील मुंबईजवळच्या अंबरनाथ येथील आम्रनाथ शिवमंदिरामध्ये देखील हे शिल्प आपल्याला जीर्णावस्थेत आढळून येते.
लिंगोद्भव शिवाची कथा
कल्पाच्या अंती महाप्रलयाच्या वेळी विष्णू आपल्या योगनिद्रेमध्ये होते. तेव्हा त्यांच्यासमोर ब्रह्मदेव प्रकट झाले. ब्रह्माने विश्वाचा निर्माता म्हणून विष्णूला स्वतःची ओळख करून दिली, ज्या वर विष्णूने सांगितले की तो विश्वाचा शिल्पकार आहे. यावरून एकमेकांवरील श्रेष्ठत्वाबद्दल दोघांमध्ये वाद सुरू झाला.
तेव्हा शिवशंकर लिंगरूपातील तेजोस्तंभासारखे प्रकट झाले व त्यांनी या दोघांनीही आपला ठाव शोधण्यास सांगितले. त्यावेळी या लिंगाचा ठाव शोधण्याकरिता ब्रह्मदेवांनी हंस रूपाने वरच्या बाजूला, तर विष्णूंनी वराहरुपाने याच्या खालच्या बाजूस प्रयाण केले. पण बऱ्याच शोधाअंती देखील त्यांना याचा अंत काही सापडला नाही. यावेळी ब्रह्मदेवांनी मात्र त्या तेजोस्तंभाचा वरचा भाग शोधला आहे असे सांगायचे ठरविले.

ब्रह्मदेव हंसाच्या रूपात वरच्या दिशेने उडत असताना त्यांना केतकीच्या फुलाच्या पाकळ्या खाली पडताना दिसल्या होत्या. गूढ तेजोस्तंभाच्या शिखरावर पोहोचून त्याचा अंत शोधण्याच्या आपल्या प्रयत्नांना कंटाळलेल्या, ब्रह्माने, त्या केतकीच्या फुलाला, आपल्या असत्यकथनात सहभागी होण्याची विनंती केली. ते केतकीचे फुल तेथूनच आले आहे असे त्याने सांगावे, असे ठरले. ब्रह्मदेवांनी तेजोस्तंभरूपी शिव आणि विष्णूची भेट घेतली आणि त्याने या विश्वस्तंभाचे मूळ शोधले असल्याचे ठामपणे सांगितले. यासाठी त्यांनी त्या केतकीच्या फुलाची साक्ष देखील काढली. क्रोधित शिव अग्निमय स्तंभातून प्रकट झाला आणि त्याने ब्रह्मदेवांना शाप दिला की पृथ्वीवरील मंदिरांमध्ये त्याची पूजा केली जाणार नाही. ब्रह्मदेवाची मंदिरे पृथीवर न आढळण्याची ही कथा. त्याचबरोबर शंकराच्या शापामुळेच केतकीचे फुल देखील पूजेसाठी का वापरले जात नाही, याचीही संगती आपल्याला या कथेमुळे लागते. शिवाच्या प्रकटीकरणाचा हा काळ म्हणजेच लिंगोद्भव काळ हा शिवरात्र म्हणून साजरा केला जातो, अशा प्रकारचे वर्णन आपल्याला काही ठिकाणी पाहायला मिळते.
यावेळी असत्यकथनाबद्दल क्रुद्ध होत शंकराने भैरवाची निर्मिती केली. या भैरवाने ब्रम्हाचे ५ वे शीर कापून टाकले. आपले भवितव्य समोर दिसताच ब्रह्मदेवाने शंकरांची माफी मागितली आणि शंकरानी त्याला क्षमा केली. म्हणूनच ब्रम्हाची काही मंदिरे असली तरी त्याची विशेष पूजा होत नाही. भैरवाची मूर्ती दाखविताना कधी कधी त्याच्या हातात ब्रम्हाचे हे शीर देखील दाखवले जाते. आणि ही सर्व घटना तामिळनाडूतील अरुणाचलेश्वर मंदिर परिसरात घडली असे मानले जाते. म्हणूनच हे मंदिर पंचमहाभूतांपैकी अग्नी तत्वाचे निदर्शक मानले. जाते. या घटनेचे वर्णन आपल्याला अरुणाचल पुराण या स्थलमाहात्म्य पुराणात आढळून येते.

या शिल्पामध्ये आपल्याला बरेचदा डावीकडे ब्रह्मदेव तर उजवीकडे श्रीविष्णू पाहायला मिळतात व लिंगातून प्रकटलेल्या शिवपिंडीवर आपल्याला हंसरुपातील ब्रह्मदेव आणि खालच्या बाजूला वराहरुपातील श्रीविष्णू दिसून येतात.
. लिंगिन शिवमूर्ती
हा एक शिवमूर्तीचा आगळावेगळा प्रकार. सर्वसाधारणपणे ही मूर्ती उमामाहेश्वर प्रकारात दिसते. यात शिवाने शिवलिंग धारण केलेले दिसते. यालाच लिंगायत मूर्ती असेही काहीजण म्हणतात. आजही लिंगायत लोक आपल्याकडे सतत शिवलिंग धारण करत असतात.
उमामाहेश्वर प्रकार (म्हणजे शिव पार्वती यांच्या एकत्रित मूर्ती) यातच अंतर्भूत असल्याने त्याचे वेगळे वर्णन करीत नाही.
वेरूळच्या कैलास लेणीच्या मुख्य प्रवेशद्वारावरील गोपुरावर असणारा हा लिंगिन शिव
वेरूळ कैलास लेणीच्याच प्रदक्षिणापथावर असलेला हा लिंगिन शिव
प्रदक्षिणापथावरच असलेली लिंगिन शिवाची अजून एक प्रतिमा.
ह्याने आपल्या उजव्या हातातील बोटांमध्ये शिवलिंग धारण केले आहे.
नटेश अथवा नटराज :-
नटराज शिव अथवा नृत्य मूर्ती
हा एक सर्वपरिचीत प्रकार. नटराज प्रकारात शिव हा नृत्यमुद्रेत दिसतो. शिवाने १०८ प्रकारे नृत्य केले अशी मान्यता आहे. तांडवनृत्यसुद्धा ह्या नटराज प्रकारातच येते.
नटराज शक्यतो चारापेक्षा अधिक हातांचा दर्शवला जातो. ८, १०, १६ हातांचेही नटराज आहेत. हातांमध्ये त्याने खङग, शक्ती, दंड, त्रिशुल, नाग, ज्वाला इत्यादी आयुधे धारण केलेली असतात.
वेरूळ लेणी क्र. २१ रामेश्वर येथील कटीसमनृत्यमुद्रेत असलेली शिवप्रतिमा
वेरूळ लेणी क्र. १६ येथील शिवतांडव प्रतिमा
कटीसम तांडव :-
वेरुळमधील रामेश्वर लेण्यात (क्र.२१) याचे अत्यंत श्रेष्ठ असे शिल्पांकन दिसते. यात शंकराचे डावे पाऊल पूर्ण उचललेले असून केवळ त्याची बोटे खाली टेकलेली आहेत आणि उजवे पाऊल अर्धवट उचललेल्या अवस्थेत आहे. त्याच्या वरच्या उजव्या हातात डमरू आणि वरच्या डाव्या हातात अग्नी असून खालचा उजवा हात अभय मुद्रेत असून खालचा डावा हात नृत्य मुद्रेत आहे. कानात कुंडले, गळ्यात कंठी आणि हार, पोटाभोवती उरबंध, हातात कंकणे, दंडावर सर्पकेयूरे व कंबरेत मेखला आहे. त्याने वाघाच्या कातड्याचे वस्त्र नेसले असून त्या वस्त्राच्या टोकाला बारीक वाघनखेही दिसतात. त्या शिल्पाच्या मागील भिंतींवर शिवाच्या डाव्या हाताच्या बाजूला वायू, कुबेर, इंद्र आणि यम हे अष्ट दिक्पालांपैकी चार दिक्पाल आपापल्या वाहनांसहित आहेत आणि शिवाच्या उजव्या हातावर काही आकाशमार्गाने उडणारे तपस्वी आणि गंधर्व आहेत.
कटीसम तांडव, रामेश्वर लेणे, वेरूळ

तबलावादक महिला, भाजे लेणे
शिवाच्या उजव्या पायाशेजारी तीन वादक असून त्यांच्यावरच्या अंगाला एका हत्तीचे डोके दिसते. तो गणपती आहे. शिवाच्या डावीकडे एक मिशा असलेला पुरुष उभा असून त्याच्या समोर कडेवर बाळ कार्तिकेयाला घेउन एक स्त्री उभी आहे. त्या दासीच्यासमोर शिवाकडे तोंड करून पार्वती बसली आहे आणि पार्वतीकडे तोंड करून वादन करणारी एक स्त्री आहे. तिच्यामागे उभ्या असलेल्या दासीचा चेहरा आणि गळा तेवढाच दिसतो. शिवाच्या पायामध्ये एक छोटा अस्थिपंजर गण (भृंगी) नाचताना दिसतो.या नृत्य प्रकाराला 'कटीसम तांडव' म्हणतात. नटराजाच्या या शिल्पाची गणना भारतातील श्रेष्ठ शिल्पात केली जाते.
'वामांगीचा लास्यविलासु ! जो हा जगतूप आभासु !
तो तांडव मिसें कळासू ! दाविसी तू !' (ज्ञा. अध्याय १७ ओवी ८)
पार्वती जणू काही म्हणते की, , सृष्टीच्या निर्मितीची प्रसूती वेदना तर माझी, केवळ तांडवाच्या रूपाने हे (शिव) नृत्यातून दाखवतात आणि निर्मितीचे सारे उत्पत्ती आणि लयाचे हे अविरत चालणारे चक्र दाखविण्यासाठी त्याने तालवादकाचर्चा श्रेय बळकावतार।
हे केलेली आहे. सम म्हणजे निर्मिती (जन्म) आणि काल म्हणजे लय (मृत्यू) प्रत्येक आवर्तनार जन्म आणि एकदा मृत्यू अशी कल्पना करून संगीतामध्येही आपल्या पुनर्जन्माच्या प्रतिनिधित्व केलेले आहे. काळाचे चक्र अविरत फिरत असून त्यात पुनःपुन्हा घटना घडतात असे असले तरी आपल्या जीवनात एकदाच जन्म आणि मृत्यू येत असतो आपल्या दृष्टीने काळ हा चक्रका नसून एकमार्गी (unidirectional) असतो. कारण आपल्या दृष्टीने आपण काळात सतत पुढेच कसे असतो. हे दाखविण्यासाठी शंकराच्या डाव्या पायाखालील स्त्री वादकाच्या हातात तालाच्या प्रत्ये मात्रेवर वाजणारे एक वाद्य आहे. तिच्यासाठी सम आणि काल नाही तर तिचा ताल एकमार्गी शिवाचे वैश्विक नर्तन हे चक्राकार (cyclic) असून त्याची पार्थिव अनुभूती मात्र एकमार्गी (unidirectional) असते हे सांगण्यात कलाकार यशस्वी झाला आहे.
तांडवाच्या शिल्पांच्या कल्पकतेसमोर जगातील कलाकार आणि विद्वान विनम्र होतात. रोडी (Rodin) या जगप्रसिद्ध फ्रेंच शिल्पीने तर हे शिल्प पाहिल्यावर असे म्हटले आहे की, यातील परिपूर्णता पाहून मला छिन्नी आणि हातोडी फेकून शिल्पकलेतून निवृत्त व्हावेसे वाटते. उत्पत्ती, स्थिती आणि लयीचे हे महान नृत्य ज्या रंगमंचावर चालते त्याला चिदंबरम् असे नाव दिलेले आहे.आनंद कुमारस्वामी हे जन्माने सिलोनी असले तरी भारतीय शिल्पशास्त्राचे गाढे अभ्यासक होते. त्याने नटराजाचे हे नृत्य चालणाऱ्या रंगमंचाचे नाव चिदंबरम् का? यावर भाष्य केले आहे. ते असे म्हणतात की चिदंबरम् या शब्दावर श्लेष केलेला आहे. त्याचा दुसरा अर्थ मानवी अंतःकरणाचा केंद्रबिंदू असाही होतो. कुमारस्वामी पुढे म्हणतात, की या भारतीय कलाकारांची महती काय तर त्यांच्या शब्दात "While the artists of the world were trying to understand and imitate nature ancient Hindu artists were trying to understand nature's nature."
नादंत तांडव :-
कलेच्या कार्यक्रमात रंगमंचावर हे शिल्प नेहमी दिसते किंवा नाटक सुरू होण्यापूर्वी पडद्यामागे त्याचे पूजन केले जाते. धातुमुर्तीमध्ये गोलाकार वलयामध्ये एका पायावर उभ्या असलेल्या शंकराची नृत्य मुद्रा यात दिसते. वलयावर प्रत्येकी पाच ज्वाला असलेल्या अग्नीचे शिल्यांकन असते.चार हातांच्या ह्या मूर्तीतील वरच्या उजव्या हातात डमरू आणि वरच्या डाव्या हातात अग्री असून, उजवा हात अभय मुद्रेत असून खालचा डावा हात गजहस्त (हत्तीच्या साडेसारखा झुलणारा) उजव्या मनगटाखाली डाव्या हाताचे मनगट असते, डाव्या हाताच्या बोटाने त्याने उचललेल्या पायाकडे अंगुलीनिर्देश केलेला असतो. तोल सावरण्यासाठी किंचित गुडघ्यात वाकविलेल्या उजव्या पायाखाली एक व्यक्ती दिसते. हात पाय दुमडून बसलेल्या या व्यक्तीच्या पाठीवर शिवाचा उजवा पाय असतो. तांडवाचे एकूण एकशे आठ प्रकार आहेत. त्यातील या मुद्रेला नादंत तांडव असे म्हणतात. शंकराभोवताली असणारे हे ज्वालांचे वलय यातील प्रत्येक ज्वालेला पाच शिखा असतात. पंचमहाभूतांचे ते निर्देशक आहे. यांची संख्या सत्तावीस असून हे सत्तावीस नक्षत्रांमध्ये बद्ध असलेल्या आपल्या आकाशगंगेचे रूप असते. डमरू हे उत्पत्तीचे रूप. ब्रह्मांडामध्ये सर्वप्रथम महानाद झाला आणि मानवी बोधाचे शब्द प्रकरणे-अइउण्। ऋलृक् । एओङ्। ऐऔच्। हयवरट्। लण्। अमड. णनम्। झभ ञ। घढधष् । जबगड्रदश् । ख फ छठ थचटतव्। कपय्। श ष सर्। हल् ।
या महानादाच्या पाठोपाठ झालेल्या स्फोटातून प्रचंड मोठा अग्नी निर्माण झाला. या ज्वाळा ब्रह्मांडाची मूलभूत ऊर्जा आहे. म्हणून शिवाच्या डाव्या हातात अग्ग्री दाखविलैला असतो. यातून नंतर पंचमहाभूतांची निर्मिती झाली. महाभूतांच्या मिश्रणातून सृष्टी उत्पन्न झाली.
काहीही निर्माण करण्यासाठी काही तरी वापरावे लागते, काही तरी तोडावे लागते, मोडावे लागते किंवा त्याचे आहे ते स्वरूप बदलावे लागते. आधी केलेले सर्व तोडून मग नवीन आणि पुन्हा हे सर्व मोडून त्यातून नवीनतम करायचे म्हटल्यास सगळेच क्षणाक्षणाला नष्ट करावे लागेल. मग सृष्टी राहणार कशी म्हणून शिवाचा उजवा हात अभय मुद्रेत असतो. जे इष्ट आहे, जे सुष्ट आहे त्याला त्वरित न तोडता तसेच राखण्याचे आश्वासन तो देतो. परंतु जे अनिष्ट आहे त्याचे रूपांतर म्हणजे लय आणि जे दुष्ट आहे त्याचा नाश म्हणजे संहार तो करतो. हे कार्य त्याचे अविरत सुरू असते म्हणून त्यांच्याभोवती फिरण अग्रिगोलकांचे वलय हेच सुचित करत असते. याला 'तिरोभाव' असे म्हणतात

नावंत तांडव, दशावतार लेखणे, वेरूळ
शिवाचा पाय हे त्याच्या अनुग्रहाचे निर्देशक असते. जर त्याचे दोन्ही पाय टेकलेले दाखवले गेले असते कोणालाच मुक्ती देत नाही असा त्याचा अर्थ झाला असता. शिवाने एक पाय उचलल्यामुळे ध्यास घेतलेल्या मुमुक्षांना तो मुक्ती मार्गावरून जाऊ देतो. त्यासाठी त्याने (शिवाने) त्यांना (मुमु अनुमती दिली आहे हे त्याच्या डाव्या पावलाकडे निर्देश करणाऱ्या डाव्या हातांच्या बोटांवरुन केले जाते. ब्रह्मांडातील दुष्ट शक्तींचा, दुष्ट प्रवृत्तींचा आणि उपद्रवी घटकांचा कधीही समूळ नाश करता येत नाही. त्यांचे फक्त दमन करता येऊ शकते किंवा त्यांच्यावर तात्कालिक नियंत्रण ठेवता येते. त्याच्या पायाखालील व्यक्तीच्या रूपात या दुष्ट शक्तीचे प्रतिनिधित्व केलेले असते. याला 'अप पुरुष' असे म्हणतात. त्यामुळे तांडवाच्या शिल्पाचे उत्पत्ती (डमरू), स्थिती (अभय मुद्रा), (अग्नी), तिरोभाव (प्रभावळ) आणि अनुग्रह (उचललेला पाय) हे पाच गुणधर्म मानले आहे धातूशिल्पांमध्ये दिसणारे हे रूप पाषाणशिल्पांमध्ये मात्र क्वचितच दिसते. पाषाणशिल्पांमध्ये तांडवाची अन्य रूपे कोरलेली दिसतात याचे कारण धातूमूर्ती ओततानाची काही तांत्रिक बंधने येथे नसतात. तसेच पाषाण शिल्पांमध्ये उचललेला पाय पण दाखविताना त्याचा त्रिमितीचा आभास निर्माण करणे तसे अवघडच जाते.
नादंत तांडवाचे एक विलोभनीय शिल्प वेरुळमधील दशावतार लेण्यामध्ये (वेरुळ क्रं. १५) कोरलेले आहे. या शिल्पात नृत्य मुद्रेत असलेला शिव हा आठ हातांचा असून त्याचा डावीकडचा एक आणि उजवीकडचा एक असे कोणत्याही दोन हातांचा विचार केल्यास त्यातून एक नृत्य मुद्रा प्रकटते.
वेरुळ मधल्या विविध तांडव मूर्ती
ललित तांडव - हे लंकेश्वर लेण्यातील (लेणी क्र. १६) शिल्प असून अत्यंत गतिमान नृत्याचे शिल्पांकन आहे. जवळजवळ आठ फूट उंचीच्या या मूर्तीमध्ये कलाकाराने त्याची प्रतिभा पणाला लावलेली दिसते. गती दाखविण्यासाठी त्याचे हललेले केस, उडणारे वस्त्र याशिवाय त्याच्या डाव्या हातात डमरू दाखवलेला आहे. इतकी गती आहे की पाहणाऱ्याला डाव्या हाताच्या ठिकाणी उजवा हात असल्याचा भ्रम होतो.
ललित तांडव, लंकेश्वर लेणे
भुजंगत्रासित तांडव साप पाहिल्या नंतर दचकून पाय जसा उचलला जातो त्याप्रमाणे डावा पाय उचलून भुजंग त्रासित ही मुद्रा नृत्यात केली जाते. साधारणपणे रंगमंचीय प्रस्तुतीकरणात मांडी जमिनीला समांतर होईल या उंचीपर्यंत नर्तकाचा पाय उचललेला असतो, या शिल्पात मात्र शंकराची ही मुद्रा असल्यामुळे त्याचा गुडघा, हनुवटीपर्यंत उचललेला दिसतो. हे शिल्प कैलास मंदिरातील प्रदक्षिणा पथावर मुख्य मंदिराच्या दक्षिणेकडील भिंतीवर कोरले आहे.
ऊर्ध्वजानू तांडव :-याची कथा अशी कालीचे नृत्य आणि शंकराचे तांडव याची स्पर्धा सुरू झाली. शिवाप्रमाणे कालीने सर्व तांडवांचे प्रकार लीलया करून दाखवले. शेवटी शंकराने नृत्य करताकरता एका पायावर नृत्य सुरू केले आणि उजव्या पायाचा अंगठा हातानी धरून आपल्या कपाळावर टेकवला. ही मुद्रा कालीलाही करणे शक्य होते परंतु स्त्रीसुलभ संकोचाने तिने ते तसे केले नाही. (शिवरामामूर्तीः १९७४१. ३७९). कैलास मंदिराच्या मुख्य प्रवेशद्वारा बाहेरील डावीकडच्या भिंतीवर हे शिल्प आपल्याला दिसते यात शंकराचा उजवा पाय ताठ होऊन त्याच्या खांद्यावर गेल्याचे कोरलेले आहे.

ऊर्ध्वजानु तांडव, कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम
दक्षिणामूर्ती - शिवाच्या बसलेल्या मूर्तीमध्ये ध्यानस्थ शिव अशी मूर्ती आपल्याला दिसते. योगशास्त्राचा आचार्य म्हणून शिवाचे हे ध्यान दक्षिण भारतात प्रामुख्याने प्रसिद्ध आहे. काहींच्या मते कला, संगीत व इतर भौतिक शास्त्रे यांचा उपदेश देत असताना शंकराचे तोंड दक्षिण दिशेकडे होते. श्रीमद शंकराचार्यांनी इतरांबरोबर दक्षिणामूर्तींचेही बरेंच स्तवन केले आहे. वेरुळमध्ये कैलास मंदिराखाली पश्चिम भिंतीवर याचे विराट शिल्प आहे. या शिल्पात झाडाखाली पद्मासना बसलेली, उजवा हात मांडी घातलेल्या उजव्या गुडघ्यावर असून डावा हात डाव्या मांडीच्या गुडघ्यावर जमिनी बोटे असलेल्या स्थितीत (भूमी मुद्रेमध्ये) आहे. एका आसन बसलेली ही शिवाची मूर्ती आहे. निर्माण करणाऱ्या त्या महायोगा समाधी लागली. आता नवनिर्मिती कशी होणार ह्या चिंतेतून अष्टदिश देव धावत आले. शिल्पाच्या वारच्या भागात आपापल्या वाहनांवर देव शिवाला हात जोडून विनंती करताना दिसतात. शिवाच्या खालच्या बाजूला दोन गण दाखवले आहेत. समाधी सोडण्याची त्यातील एक जण ढोल बडवतो आहे तर दुसरा त्याच्या वाद्याचा कर्कश आवाज काढून शिवाला जागे करावयाचा प्रयत्न करतो आहे. या गणांच्या वादनाने अन्य योग्यांची समाधी भंग पावली. शिवाच्या बाजूला गुडघ्याभोवती योगपट्ट गुंडाळलेले योगी दिसतात. भगवान शिव मात्र अविचलित आणि शांतच बसलेले दिसतात.

महायोगी शिव, कैलास मंदिर, वेरूळ
लकुलीश - इ.स. पहिल्या शतकात लकुलीश नावाच्या एका आचायनि कायावरोहण (गुजरात) या तीर्थक्षेत्री पाशुपत पंथाची स्थापना केली. पुढे यालाच शिवाचे रूप म्हणून मान्यता प्राप्त झाली. कमळावर किंवा आसनावर बसलेली ही शिवाची मूर्ती असून त्याच्या हातात एका सोटा दाखवला जातो. याला लगुड असेही म्हणतात. ही मूर्ती नेहमी उर्ध्वलिंगी या स्वरूपातच कोरलेली असे. वेरुळमध्ये घुमार लेणे (क्र.२९) येथे याचे मोठे शिल्प आहे. तसेच कैलास मंदिरामागील पश्चिम भिंतींवरील व्हरांड्यात याची उभी मूर्तीही दिसते.

लकुलीश, धुमार लेणे, वेरू
उमामहेश्वर आलिंगन मूर्ती-
उमामहेश्वर या शिल्पामध्ये नंदीवर आरूढ शंकर आणि पार्वती ज्यामध्ये दोघांचेही दोन्ही पाय नंदीच्या एकाच बाजूला (दर्शनी बाजूला) सोडलेले दिसतात. शंकराचा डावा हात पार्वतीच्या कमरेभोवती असून त्याने तिला एक हलके आलिंगन दिलेले असते. या शिल्पाला उमामहेश्वरालिंगन मूर्ती असे म्हणतात. कैलास मधील दक्षिणे-कडील व्हरांड्यात हे शिल्प आहे.
उमामहेश्वर, कैलास मंदिर, वेरूळ
अर्धनारीश्वर शिवाच्या शिल्पांमधील सर्वपरिचित आणि लोकप्रिय असलेले हे शिल्प. बहुतेक वेळा ही मूर्ती उभी असते. पण क्वचित प्रसंगी बसलेलीही आढळते. हरिहर मूर्ती प्रमाणेच हे एक जोड शिल्प आहे. यातील मूर्तीचा उजवीकडचा अर्धा भाग हे शंकराचे अंग आणि डावीकडील भाग हे पार्वतीचे अंग. यामध्ये डोक्यातील केश रचना सुद्धा वेगळी दिसते. तसेच चेहरा आणि अन्य शरीराचे भाग ह्यातील वेगळेपण दाखवायला अत्यंत कौशल्याने कोरलेले दिसतात. पार्वतीच्या डाव्या हातामध्ये आरसा दिसतो. स्वतःला पूर्णत्व आणण्यासाठी ती शिवाशी एकरूप होते. परंतु तोंड वळवून ते न पाहता असल्यामुळे आरशात बघून त्याची खात्री करून घेते. सांख्य तत्त्वज्ञानातील पुरुष आणि प्रकृती ऐक्य सांगणारे, वैश्विक तत्वज्ञानातील जड आणि चेतन किंवा वेदातील अद्वैत कल्पना साका शिल्प असून असून अणूची संरचना आणि कार्य याचे हे प्रतिक आहे. या एकरूपतेचे अत्यंत समर्पक निरूपण ज्ञानेश्वरांनी (ज्ञानेश्वरी, अध्याय ५ ओवी क्र. १३२ ते १३५) केले आहे.

अर्धनारीश्वर, गंगैकॉडचोलपुरम, तमिळनाडू
कल्याणसुंदर - -
कल्याण म्हणजे लग्न. शंकर पार्वतीच्या लग्नाचे अत्यंत मनोहारी शिल्पांकन अनेक मंदिरात दिसते. या शिल्पामध्ये साधारणतः शंकराने पार्वतीय पाणिग्रहण केलेले दाखवते त्यामध्ये खाली होम पेटलेला असतो आणि ब्रह्मदेव पौरोहित्य करताना दिसतो. याशिवाय पार्वतीच्यामागे तिचे वडील हिमवान, तिची आई मेना आणि शिवाचे गण, दासदासी वगैरे ही दाखवलेले असतात. दशावतार लेणीतील (वेरुळ लेणी क्र. १५) एका शिल्पात पार्वतीने आपले दोनही शंकराच्या हातात दिलेले दिसतात. कैलास मंदिरातील पूर्व भिंतीवर मात्र या मालिकेतील सर्वात सुंदर शिल्प कोरलेले आहे. या शिल्पामध्ये पार्वतीने आपल्या उजव्या हाताने शंकराचा हात पकडलेला असे अजब शिल्पांकन आहे. ही कलाकाराची चूक नसून त्याची असामान्य प्रतिभा इथे प्रगटलेली दिसते. या शिल्पात वधू पार्वती लज्जेने मान झुकविलेली (अधोवदना) व नजर खाली वळविलेली (सलज्जा) आणि डावा पाय किंचित वाकवून (सविनया) अशी उभी आहे. पण गंमत पहा तिने शंकराचा हात हाती घेतला आहे. कलाकाराची चूक तर नव्हे ? नाही, अहो हेच व्हावे म्हणून पार्वतीनेच तर तप केले होते. हे जमविण्यातला तिने घेतलेला पुढाकार यात दर्शविलेला आहे. पण हे धारिष्ट्य सर्वांसमोर करावे लागले त्यामुळे ती संकोचली आहे. ज्यामुळे तिच्या डाव्या पायाच्या अंगठ्याने उजव्या पायाचा अंगठा घासते आहे. निर्जीव पाषाणात साकार केलेला हा जिवंत देखावा खरोखरच पाहण्यासारखा आहे. शंकराचाही उजवा गुडघा किंचित वाकलेला आहे. साहजिकच आहे. मी मी म्हणणाऱ्या नवरदेवांप्रमाणे साक्षात महादेवाचीही बोहल्यावर चढल्यावर अशीच गत झाली असेल नाही का?
उमा महेश्वर (सिद्धेश्वर मंदिर, लातुर)
सारिपाट क्रीडा :-
शिव पार्वती यांचा विवाहानंतर संसार सुरू झाला, स्वाभाविकच पती- पत्नींच्या मनोरंजनाचेही कार्यक्रम सुरू झाले. शंकर पार्वती सारिपाट खेळावयास बसले. नवविवाहितांच्या मानसिकतेप्रमाणे सुरुवातीचे डाव शंकर मुद्दाम हरत राहिले. एकेक गोष्ट पणाला लावत पार्वतीच्या आग्रहाने त्यांनी त्यांच्या प्रिय नंदीलाही पणास लावले आणि हरले. नंदीला घेऊन जायला पार्वतीची दासी गेली आणि तिने त्याला कानाने ओढून नेत असल्याचे कलाकाराने दाखविले आहे. बलाढ्य नंदी आता दास झाला आहे हे कळल्यावर शिवाच्या काही गणांनी त्याला त्रास द्यावयाला सुरुवात केली. कोणी शेपूट चावत आहे तर कोणी शिंग धरत आहे, तर तो जाऊ नये म्हणून कोणी त्याचे पाय धरत आहे. अन्य गण नंदीच्या दहशतीतून मुक्त झाल्यामुळे त्यांनी एकमेकांवर हल्ले सुरू केले. कोणी दुसऱ्याचे केस उपटतो आहे तर कोणी मुष्टिप्रहार करतो आहे, कोणी आपला पृष्ठभाग उघडा करून दाखवितो आहे, तर कोणी चक्क वाकुल्या दाखवितो आहे, वर्गातून शिक्षक बाहेर गेल्यानंतर बालवाडीमध्ये आपणही हेच करत नव्हतो का ?
शिल्पामध्ये वरील भागात खेळाला वेगळीच कलाटणी मिळालेली कलाकाराने दाखवली आहे. हातात फासे घेऊन अजून एक शेवटचा डाव खेळायचा आग्रह शिवाने केला. पार्वतीच्या लक्षात आले की हा अंतर्यामी महादेव आतापावेतो हरलेले सर्व काही परत मिळविणार, म्हणून तिने डाव सोडून जायची तयारी केली. तिच्या उठण्याच्या हेतूचे शिल्पांकन कलाकाराने तिच्या डाव्या हाताखालील उशी दबली गेली असल्याचे दाखवून केले आहे. तसेच तिचे डावे ढोपरही सरळ आहे. तिचा उजवा हात विस्मय मुद्रेमध्ये आहे. जणू काही ती शिवाला विचारते आहे, "काय देवा, हे तुम्हाला शोभते का ? काय काय डावावर लावायचं आणि कोणचे दान पडणार हेही तुम्हीच ठरविणारे, माझी काय फजिती करण्यासाठी हा आग्रह सुरू आहे का? " भगवान शंकराची मुद्रा मात्र अत्यंत बोलकी आहे. ते म्हणत आहेत की कोण जिंकलं किंवा कोण हरलं याच्यासाठी खेळ खेळला जात नाही.खेळ तर केवळ खेळासाठी असतो. एवढ्याशा कारणाने खेळ कधीही अर्धवट सोडता कामा नये कारण हा केवळ सारिपाट नव्हे तर संसाराचाच खेळ असतो.
सोमास्कंद मूर्ती :-
(स उमा स्कंद) पार्वती आणि स्कंद - कार्तिकेय यांच्यासह असणारे हे शिल्प असते. या शिल्पामध्ये शंकर आणि पार्वती यांच्या बरोबरच छोटासा (बाल) स्कंदही असतो. तो उभा, नाचताना किंवा आईच्या मांडीवरही असू शकतो. शिव पार्वती अर्थातच बसलेले असतात. वेरुळमध्ये हे शिल्प कैलास मंदिराच्या गर्भगृहाबाहेरील उजवीकडच्या भिंतीवर आहे. यातील पार्वतीचे डोके मात्र आता नाही. शिवाच्या मांडीवर बाल स्कंद असून तो आपल्या आईकडे बघतो आहे, परंतु त्याचा उजवा हात उचललेला असून त्याची मूठ वळलेली आहे. तो आपल्या छोट्या तर्जनीने शिवाकडे बोट दाखवून आपले बाबा हे किती मोठे आहेत हे अभिमानाने सांगतो आहे.
असेच शिल्प महाबलिपुरमच्या समुद्र किनाऱ्याजवळील मंदिरातही आहे. तेथे कार्तिकेयाच उजवा हात अशाच प्रकारे शंकराकडे बोट करताना दिसतो, तर त्याचा डावा हात त्याने स्वतःच छातीवर ठेवला आहे. माझे बाबा आहेत असे तो आग्रहाने दाखवतो आहे.
गंगाधर मूर्ती :-
भगीरथाने दीर्घ प्रयत्न करून आपल्या पूर्वजांच्या उद्धाराकरता स्वर्गातून गंगेला आणण्याच उपक्रम केला, वेरुळ येथील कैलास मंदिराच्या प्रवेशद्वाराच्या डाव्या बाजूला गंगावतरणाचे विलक्षण शिल्प कोरले आहे. डाव्या कोपऱ्यातील तप करणाऱ्या भगीरथाच्या तपश्चर्येने गंगेचे अवतरण झाले आहे. ती शिवशंकराच्या खांद्यावर आरूढ आहे, श्रीशंकराने आपली एक बट मोकळी करून गंगेला प्रवाही केले आहे. जन्हु राजाने तिला अडवली. शिल्पामध्ये डावीकडे जन्हु राजा बसलेला दिसतो. त्याची समजूत काढल्यावर त्याने तिला न गिळता आपल्या कानातून वाट काढून दिली. त्याला कानातून ती पुन्हा वाहू लागली. शिल्पाच्या खालच्या बाजूला मुक्तीची वाट पाहत बसलेले सगरपुत्र दिसतात. गंगेच्या पावन स्पशनि त्यांना मुक्ती मिळाली. कलाकाराची कल्पकता मात्र या शिल्पात कोरलेल्या पार्वतीमुळे उठून दिसते. तिला वाटले की तिच्या नवऱ्याने सवत आणली म्हणून ती चिडते, रुसते. शंकराच्या हे लक्षात आल्यावर त्याने तिला समजवण्याचा प्रयत्न केला तर ती त्याचा हात झिडकारताना दाखवली आहे. तरीही तो तिची हनुवटी उचलून तिला जणू काही हे सांगतो की, अगं वेडाबाई ही सवत नाही, तिच्यावर उगीच रागावू नकोस. भरतभूमीवर घडणाऱ्या या अभूतपूर्व सोहळ्याला डोळे भरून पाहा, केवळ सगरपुत्रांनाच नव्हे तर कोट्यवधी मानवांना शतकानुशतके मुक्ती देण्याकरता, भारताला सुजलाम् सुफलाम् करण्याकरता ही पावन गंगा आज पृथ्वीवर अवतरते आहे तिचे स्वागत कर. पार्वती मात्र संतापाने काहीही ऐकण्याच्या मनस्थितीत नाही. शिवाचा हात ती त्वेषाने झिडकारते आहे. कोण्या मूखनि तिच्या तोंडावरच घणाचा घाव घातल्यामुळे तिच्या चेहऱ्यावरील क्रोधित मुद्रा मात्र आज दिसू शकत नाही.

गंगावतरण, कैलास मंदिर, वेरूळ
अनुग्रह मूर्ती :-
शिवाच्या अनुग्रह मूर्तीमध्ये रावणानुग्रह, चंडेशानुग्रह, विष्णवानुग्रह असे विविध प्रकार आढळतात. यातील रावणानुग्रह मूर्ती हे अत्यंत लोकप्रिय शिल्प आहे. वेरुळ मध्ये रामेश्वर लेणे (क्र.२१), रावण की खाई (क्र. १४), दशावतार लेणे (क्र.१५) कैलास आणि लंकेश्वर (क्र.१६) आणि धुमार लेणे (क्र.२९) इथे हे शिल्प पाहावयास मिळते. याशिवाय घारापुरी, विरूपाक्ष मंदिर (पट्टदकल), परशुरामेश्वर मंदीर (ओडिशा), बृहिदश्वर मंदिर (तंजावर), आँढा नागनाथ या ठिकाणी हे शिल्प दिसते. एवढेच नाही तर कंबोडियातील मंदिरांमधेही याचे अत्यंत कल्पक शिल्पांकन आढळते. याशिवाय गंगाई कोंडचोलापुरम् (तामिळनाडू) येथे चंडेशानुग्रह यांचे सुंदर शिल्प आहे. कैलास मंदिराच्या दक्षिण भिंतीवर कोरलेले शिल्प हे या सर्वांमधील सर्वात भव्य आणि सर्वात श्रेष्ठ शिल्प आहे.
चंडेशानुग्रह :-
तमिळनाडूमधील ६३ नायनमार किंवा नयनार या शैव संतांची माहिती असणारे पेरीय पुराण १२व्या शतकात लिहिले गेले. यामध्ये चंडेश्वराची कथा येते. विचार सर्मण हे त्याचे मूळ नाव. या गावातील लोक गायींना नीट वागवत नाहीत हे पाहून त्याने स्वतः गायींची काळजी घ्यायचे ठरविले. यावर प्रसन्न होऊन गायी त्याला भरपूर दूध देत. हे सर्व दूध तो शिवाच्या वाळूच्या केलेल्या शिवलिंगावर रोज वाहून टाकायचा. हे त्याच्या वडीलांना कळले. त्यांनी रानात जाऊन पाहिले तर हा शिवपूजेत मग्न होऊन वाळूच्या पिंडीवर दुधाचा अभिषेक करत होता. क्रोधाने त्यांनी त्याला काठीने मारायला सुरुवात केली. आपल्या भक्तीत व्यत्यय आणणाऱ्याकडे न पाहताच विचार सर्मणाने ती काठी हिसकावली आणि मारणाऱ्याच्या माध्य आपल्याच वडीलांच्या दिशेने भिरकावली. शिवकृपेने त्या काठीची कुऱ्हाड झाली आणि ती त त्याच्या वडीलांचा मृत्यू झाला. तरीही हा पूजेतच मग्न होता. त्याची ही निस्सिम भक्ती पाहून शिव झाले आणि पार्वतीसह ते प्रकट झाले. त्यांनी आपल्या भक्ताला आलिंगन दिले. त्यामुळे सर्मण सारुप्य मुक्ती मिळाली. शिव त्याला म्हणाले की, 'आता मीच तुझा पिता. तू चंडिकेश्वराच्या धामीड तिथे तुला माझ्याप्रमाणेच पूजतील'. यानंतर आपल्या गळ्यातील माळ स्वहस्ते चंडेशाच्या डोक्या फेट्यासारखी बांधली. आणि शिवपार्वती अंतर्धान पावले. विचार सर्मण चंडेश झाला. अशा निम्तो शिवभक्ताच्या हाताने मृत्यू आल्यामुळे त्याच्या वडीलांनाही मुक्ती मिळली आणि पितृहत्येचे चंडेशला लागले नाही. (शिवानंद : १९९९, पृ. २८). गंगाईकोंडचोलापुरम येथील मंदिरात या प्रमाण उत्कृष्ट शिल्पांकन केलेले आहे.
चंडेशानुग्रह, गंगैकोंडचोलपुरम, तमिळना
विष्णवानुग्रह :-
विष्णूने शिवाकडून सुदर्शन चक्र प्राप्त करण्यासाठी उग्र तपश्चर्या केली. त्याने फूले अर्पण करण्याचा संकल्प केला. ती फुले घेऊन तो शिवाला अर्पण करायला गेला तेव्हा एक फूल शिवाने लपवून ठेवले. प्रत्यक्ष फुले वाहताना एक फूल कमी असल्याचे जेव्हा विष्णुच्या
लक्षात आले तेव्हा त्याने त्या एका फुलाऐवजी आपला एक डोळाच काढून शंकराला अर्पण करून संकल्प पूर्ण केला. कमळ कमी पडले म्हणून कमल-नयन दिले! त्याची ही भक्ती पाहून प्रसन्न होऊन शिवाने त्याला सुदर्शन चक्र दिले (शिवपुराण, अ. ३१, ४०-५२). याचे एक शिल्प कांचीपुरम् येथील कैलासनाथच्या मंदिरात दिसते. यामध्ये आसनावर शिव-पार्वती बसलेले असून शिवाच्या उजवीकडे खाली विष्णू बसलेला असून तो आपला एक डोळा काढून शिवाला अर्पण करताना दाखवलेला आहे.
किरात- अर्जुनानुग्रहमूर्ती :-
पांडवांच्या वनवासात धर्मराजाने अर्जुनाला इंद्राकडून दिव्यशक्ती प्राप्त करून घ्यायला सांगितले. अर्जुन इंद्राला भेटला तेव्हा इंद्राने त्याला सर्व सामर्थ्यशाली शिवाकडून पाशुपतास्त्र घेण्यास सांगितले. अर्जुन हिमालयात गेला आणि त्याने घोर तपश्चर्या आरंभ केली. ती पाहून हिमालयातील ऋषींनी शंकरांना सांगितले की तो एवढी तपश्चर्या करतो आहे, तर त्याची इच्छा पूर्ण करावी. शंकराने अर्जुनाची परीक्षा घ्यायची ठरवले. किरात वेष धारण करून शंकर अर्जुनाच्या जवळ पोचला. तेव्हा त्याला दिसले की, मूक नावाचा एक राक्षस वराहचे रूप घेऊन अर्जुनावर हल्ला करायच्या
अर्जुनानुग्रह, महाबलीपुरम, तमिळनाडू
तयारीत आहे. म्हणून त्याने आपले धनुष्य काढले. तोपर्यंत अर्जुनानेही आपले धनुष्य सज्ज केले. शंकर म्हणाला की मी त्या वराहला आधी पाहिले म्हणून मी त्याला मारणार. अर्जुनाने किराताच्या बोलण्याचा अनादर करून वराहावर बाण सोडला. तिकडून शंकरानेही एक बाण सोडला. दोघांच्या बाणाने वराहरूपी मूकराक्षस याने आपले भयंकर रूप प्रकट केले आणि मरून पडला. वराहला कोणी मारले यावरून या दोघात वाद सुरू झाला. दोघांनीही एकमेकांवर बाणांचा वर्षाव केला. आपल्या बाणांनी किरातला काही होत नाही हे पाहून अर्जुन त्याच्या अंगावर धावून गेला. मग त्यांच्यात द्वंद्वयुद्ध झाले, मग मुष्ठीयुद्ध झाले.अर्जुनाचा पराक्रम पाहून शंकर प्रसन्न झाला आणि त्याने आपले खरे रूप प्रकट केले व त्याला पाशुपतास्त्र दिले. (महाभारत, आरण्यपर्व, किरातपर्व, अ. ३८-४०),
वेरुळमधल्या महाभारताच्या शिल्पपटाची सुरुवातच या कथेने होते. त्यात सुरुवातीला वराहाभोवती दोन धनुर्धर दाखवले आहेत. नंतर त्यांच्यामध्ये झालेले मुष्टी युद्ध आणि द्वंद्र आणि त्यापुढे आसनस्थ शिव त्यांच्या पुढे गुडघे टेकून शंकराच्या पाया पडणारा अर्जुन दिसतो. महाबलिपुरम येथे अर्जुनाच्य तपश्चर्येचे हे शिल्प पंधरा फूट उंच आणि चाळीस फूट रुंद अशा विराट कातळावर कोरलेले आहे. शिल्पात दोन्ही हात डोक्यावर धरून डाव्या पायावर उभे राहून उजव्या पायाचा तळवा डाव्या गुढगा टेकून उभ्या असलेल्या तप करणाऱ्या अर्जुनाचे शिल्प असून त्याच्या शेजारी चार हातांचा त्रिशुलधारी शिव उभा असल्याचे शिल्प आहे. अर्जुनाने केवळ वायू भक्षण करून हात वर करून स्थिर स्थितीत तप केले म्हणून या शिल्पात वृक्षासनामध्ये उभा असलेला अर्जुन दिसतो. या कातळावर असंख्य शिल्प असून अर्जुनानुग्रहाचा हा सर्वात मोठा शिल्पपट आहे.
११. संहारमूर्ती.
ह्या मूर्तीचे शिवाचे संहाररूप अथवा रौद्ररूप दाखवतात. सज्जनांच्या रक्षणासाठी, असुरांच्या नाशासाठी शिवाने रौद्ररूप धारण करून त्यांचा संहार केला. ह्या सर्व कथा संहारमूर्तींमध्ये कोरलेल्या असतात. संहारमूर्तींमध्येच भैरवाचाही समावेश आहे पण आपण भैरवमूर्ती नंतर एका स्वतंत्र प्रकरणात पाहूयात.
संहारमूर्तीमध्ये पहिली मूर्ती घेऊ ती म्हणजे कालारी शिव अथवा मार्कंडेयानुग्रहमूर्ती
११.१ कालारी शिव अथवा मार्कंडेयानुग्रहशिवमूर्ती.
ह्या मूर्तीचा समावेश एकाचवेळी अनुग्रह आणि संहार अशा दोन्ही प्रकारांमध्ये होतो याचे कारण म्हणजे मार्कंडेयावर अनुग्रह करून शिव साक्षात कालरूपी यमाचे पारिपत्य करीत आहे.
याची थोडक्यात कथा अशी.
पुराणकथेप्रमाणे निपुत्रिक असलेल्या मर्कंड ऋषींच्या तपश्चर्येमुळे प्रसन्न होऊन शंकर त्यांना अतिशय विद्वान पुत्र होईल असा आशिर्वाद देतो. मर्कंडाचा हा अल्पायुषी पुत्र शिवाच्या उपासनेत गढून जातो. मार्कंडेय १६ वर्षाचा होतो तेव्हा त्याचे प्राण हरण करायला खुद्द यम तिथे येतो. प्रार्थनेत गढलेल्या मार्कंडेयाच्या गळ्यात यम आपला यमपाश आवळतो. मार्कंडेयासारख्या भक्ताला यम ओढून नेत आहे हे शिवाला सहन न होऊन तो पिंडीतून प्रकट होऊन साक्षात यमधर्मावर क्रोधाने लत्ताप्रहार करून त्याला दूर ढकलून देतो. भयभीत यम शंकराची प्रार्थना करून त्याजकडे अभयदान मागत आहे. यमधर्मरूपी साक्षात कालाचे पारिपत्य करून मार्कंडेयाला जीवदान दिल्याने शिवाच्या ह्या रूपाला कालारी शिव अथवा कालांतक शिव असेही म्हटले जाते.
वेरूळ येथील कैलास लेणीच्या प्रदक्षिणापथावर असलेली कालारी शिव प्रतिमा
वेरूळ येथील कैलास लेणीमधील कालारी शिवप्रतिमा
गजासुरसंहारमूर्ती आणि अधकासुरवधमूर्ती
ह्या दोन्ही मूर्तीबाबत एकच कथा आहे.
अंधक नावाच्या असुराला ब्रह्मदेवाच्या वराने आपल्या जमिनीवर पडणार्या रक्ताच्या प्रत्येक थेंबापासून एकेक असुर निर्माण होईल अशी शक्ती प्राप्त होते. अंधकासुराच्या प्रभावाने हैराण झालेले देव शंकराकडे अभय मागण्यासाठी जातात त्याच वेळी नीलासुर नावाचा राक्षस हत्तीचे रूप धारण करून शंकराचे पूजन करणार्या ऋषींना त्रास देतो. शंकर आधी गजासुराचा वध करून त्याच एक दात उपटतो आणि त्यानंतर त्याचे गजचर्म अंगाभोवती गुंडाळून एका हाती वाडगा धरून त्रिशुळाने अंधकासुराचा वध करतो. आपल्या त्रिशुळावर उचलून धरलेल्या अंधकाचे रक्त वाडग्यात गोळा करतो तसेच वाडग्याबाहेर पडणारे रक्ताचे चुकार थेंब त्वरेने शोषून घेण्यासाठी आपल्या योगसामर्थ्याने मातृकेची (चामुंडेची) उत्पत्ती करतो.
वेरूळच्या कैलास लेणीतील गजासुरवधाची ही मूर्ती
वेरूळच्या लेणी क्र. २९ मधील अंधकासुरवधाचे हे अतिशय प्रत्ययकारी शिल्प. पहा शिवाचे डोळे कसे भयानक क्रोधाने खोबणीतून पार बाहेर आलेले आहेत.
कैलास लेणीतील प्रदक्षिणापथावरील अंधकासुरवधाचे अजून एक शिल्प
त्रिपुरांतकशिवमूर्ती
तारकासुराचे तीन मुले विद्युन्माली, तारकाक्ष आणि कमलाक्ष यांनी ब्रह्मदेवाची आराधना करून आकाशगामी असलेली अनुक्रमे सुवर्ण, रौप्य आणि लोहमय अशी तीन फिरती पुरे प्राप्त करून घेतली. ही तिन्ही पुरे एकाच रेषेत असतांनाच एकाच बाणाने ह्यांचा विध्वंस करू शकणाराच त्रिपुराचा वध करू शकेल असा वर त्यांनी मिळविला. तीन फिरत्या पुरांमुळे अतिशय बलवान झाएल्या ह्या तीन्ही असुरांचा शंकराने विष्णूरूपी बाण करून त्यांचा नाश केला अशी ही थोडक्यात कथा.
वेरूळ येथील प्रदक्षिणापथावरील त्रिपुरांतक शिवमूर्ती.
सुरुवातीस अनुग्रहमूर्ती पाहूयात.
१०. अनुग्रहमूर्ती
अनुग्रहमूर्ती म्हणजे शंकराच्या वरप्रदानास अथवा अनुग्रहास प्राप्त झालेल्या व्यक्तिची कथा.
ह्यात रावणानुग्रह आणि मार्केंडेयानुग्रह असे दोन उपप्रकार येतात.
१०.१ रावणानुग्रहशिवमूर्ती
कुबेराचा पराभव करून त्याचे पुष्पक विमान पळवून रावण कैलासपर्वतावर शंकराचे दर्शन घेण्यास येतो. शिवपार्वतीची क्रिडा चालू असल्याने द्वारपालांनी हाकलून दिलेला गर्वोन्मत्त रावण कैलास पर्वतच उचलण्याचा बेत करतो. आपल्या सर्व हातांनी कैलास पर्वत तळापासून उचलायला लागतो. तर शंकर मात्र भयभीत पार्वतीला आणि भेदरलेल्या शिवगणांना धीर देऊन आपल्या पायाच्या अंगठ्याने कैलासास दाबून धरतो. कैलासाच्या ओझ्याखाली चिरडत चाललेला रावण प्राणांची भीक मागून शिवस्तुती गाऊन शंकराचा अनुग्रह प्राप्त करून घेतो अशी याची थोडक्यात कथा.
वेरूळच्या कैलास लेणीत रावणानुग्रहाचे अतिशय अप्रतिम शिल्प आहे.
शिल्पपटात कैलास पर्वत उठावात कोरलेला आहे तर त्याच्या खालच्या भागात खोबणी करून त्यात रावणाचे शिल्प कोरलेले आहे. रावणाची मस्तके सुटी आहेत. कैलास उचलताना रावणाने एक पाय गुडघ्यात मुडपून दुसरा पाय जमिनीवर घट्ट रोविला आहे. आपल्या वीस हातांनी सर्व शक्ती पणास लावून त्याने कैलास अर्धवट उचललेला आहे. इतकी प्रचंड ताकत पणास लावताना साहजिकच रावणाची मान तिरकी झालेली असून कानातले एक कुंडल खांद्यावर टेकलेले आहे तर दुसरे कुंडल हवेत झुलत आहे. कैलास पर्वतावरील घनदाट वनराजी त्यावर झाडे आणि त्यावरील भयभीत मर्कटे कोरून दाखवली आहे. वृक्षराजीच्या वर भयभीत शिवगण तर शेजारी दोन द्वारपाल कोरलेले आहेत. पार्वतीच्या शेजारी असलेली एक दासी पाठमोरी होऊन पळून जात आहे. तर भयभीत पार्वतीला निर्विकार शंकर धीर देत असून एका पायाने कैलास दाबून धरत आहे. आकाशात अष्टदिक्पाल रावणाचे हे गर्वहरण पाहावयास जमले आहेत.
वेरूळ लेणी क्र २९ मधील रावणानुग्रहशिवमूर्ती
वेरूळ लेणी क्र. २१ (रामेश्वर) येथील रावणानुग्रहशिवमूर्ती. लक्ष्यपूर्वक पाहिल्यास रावणाचे दहावे मुख हे गर्दभाचे असल्याचे दिसेल.
गोंदेश्वर मंदिर, सिन्नर येथील बाह्यभिंतीवर कोरलेली रावणानुग्रहशिवमूर्ती
रावणानुग्रहशिवमूर्ती प्रकार दुसरा
रावणानुग्रहशिवमूर्तीचा अजून एक प्रकार वेरूळ येथील कैलास लेणीच्या प्रदक्षिणापथावर पाहावयास मिळतो. या कथेप्रमाणे वरप्राप्तीसाठी रावण दहा हजार वर्षे तप करतो प्रत्येक सहस्त्र वर्षानंतर आपले एकेक मस्तक कापून शंकराला अर्पण करतो जेव्हा शेवटी आपले शेवटचे मस्तक कापून देण्यास सिद्ध होतो तेव्हा भगवान शंकर प्रकट होऊन त्याला वर प्रदान करतात.
अर्थात यातील गंमत म्हणजे ही कथा आहे मूळची ब्रह्मदेवासंदर्भात. वाल्मिकी रामायणाप्रमाणे रावण हा ब्रह्मदेवाला मस्तके अर्पण करून वरप्राप्ती करून घेतो. तर येथे मात्र शिवाची कथा कोरलेली आहे. एकंदरीतच वैदिक देवता विस्मृतीत जात असताना शैव, वैष्णव पंथांचे प्राबल्य कसे वाढायला लागले होते याचा हा एकप्रकारे पुरावाच.
मूळ वाल्मिकीरामायणातील श्लोक पहा.
दशवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः ।
पूर्णे वर्षसहस्रे तु शिरश्चाग्नौ जुहाव सः ||
एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः ।
शिरांसि नव चाप्यस्य प्रविष्टानि हुताशनम् ॥
अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः ।
छेत्तुकामे दशग्रीवे प्राप्तस्तत्र पितामहः ॥
पितामहस्तु सुप्रीतः सार्धं देवैरुपस्थितः ।
तव तावद् दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥
शीघ्रं वरय धर्मज्ञ वरो यस्तेऽभिकाङ्क्षितः ।
कं ते कामं करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रमः ॥
कथेचा थोडक्यात आशय वर दिलाच असल्याने आता याचे परत भाषांतर करीत नाही.
वेरूळ येथील कैलास लेणीतील प्रदक्षिणापथावरील रावणानुग्रहशिवमूर्ती
मार्कंडेयानुग्रहमूर्ती
अनुग्रहमूर्तीचाच पुढचा प्रकार म्हणजे मार्कंडेयानुग्रहशिवमूर्ती. अर्थात हीच मूर्ती शिवाच्या संहारमूर्तीमध्येही गणली जात असल्याने हिच्याबद्दल अधिक उहापोह मी पुढील संहारमूर्ती प्रकरणात करतो.
रावणानुग्रह क्र. १ :-
रावणानुग्रहाच्या दोन प्रकारच्या मूर्ती दिसतात १) यामध्ये आपली दहा डोकी कापून शंकराल अर्पण करणाऱ्या रावणाचे एक शिल्प असते. याशिवाय २) शिव पार्वती ज्यावर विराजमान आहेत तर कैलास पर्वताला रावण उखडून टाकण्याचा प्रयत्न करीत असल्याचे शिल्प असते.वेरुळमधील कैलास मंदिराभोवतालच्या उत्तरेकडील व्हरांड्यातील पहिले शिल्प रावणानुग्रहाचे आहे. एका पिंडीभोवती ९ मानवी शिरे कोरलेली दिसतात. रावणाने श्रीशंकराला अर्पण केलेली स्वतःची ९ मस्तके (नवविधा भक्तीची प्रतीके) आहेत. दहावे मस्तकही तो कापत असल्याचे थरारक दृश्य आहे. याची कथा अशी की रावण रोज सकाळी तलावातून कमळ तोडायचा. स्नान करून शंकराची पूजा करायचा. एकदा शंकराच्या मनात विचार आला की रावणाची भक्ती आपण तपासून पाहावी. शंकराने त्याच्या ताटातील फुले काढून घेतली. स्नान करून रावण आला. पाहतो तर काय ? तेथे कमळे नाहीत. आता फुले आणायला माघारी वळला तर संकल्प मोडतो आणि तसाच पूजेला देवळात देला तर देवाच्या पूजेसाठी रिकाम्या हाताने जावे लागणार. रावण काय ते समजला. क्षणाचाही विचार न करता तो तलवार घेऊन तरातरा तसाच पिंडीसमोर गेला आणि म्हणाला, देवा, परीक्षाच घ्यायची होती तर इतकी साधी कशाला ? दहा शिरकमले जी तू मला दिली आहेस, त्याचा उपयोग कधी होणार? असे म्हणून त्याने एका मागून एक आपली डोकी कापायला सुरुवात केली आणि पिंडीला तो अर्पू लागला. दहावे डोकेही कापण्याच्या तो तयारीत होता. शिल्पामध्ये एका हाताने कपाळ घट्ट धरलेले दिसते ते त्राग्याने नव्हे तर कापण्यासाठी, ते घट्ट धरून त्याचा निश्चय व्यक्त करण्यासाठी. समर्पित भक्तीची ही परिसीमाच नव्हे काय? ही भक्ती पाहून भगवान शंकर प्रसन्न झाले आणि त्याला अनुग्रह दिला. देऊळ पाहायला सुरुवात केल्यावर विथिकेमध्ये अगदी प्रथमच हे शिल्प हेतूपुरस्सर कोरले आहे. इतकी अविचल निष्ठा आणि भक्ती आपल्या मनात असेल तर पायऱ्या चढून गेल्यावर त्या परब्रह्माचे दर्शन होऊ शकते, हा संकेत येणाऱ्या सर्व भक्तांसाठी सूचकतेने दिलेला आहे. कोणतेही मोठे काम करायचे असल्यास प्रसंगी शीर कापून द्यायची सुद्धा तयारी असेल तरच ते काम पूर्णत्वाला जाण्याची शक्यता असते असा संदेश या शिल्पातून देण्याचा प्रयत्न दिसतो. (देगलूरकर : २००८, पृ.५१)
रावणानुग्रहमूर्ती, कैलास मंदिर, वेरुळ
रावणानुग्रह क्र. २ :-
या प्रकारच्या शिल्पाला कैलास तोलन असे म्हणतात. महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओरिसा आणि तमिळनाडू या ठिकाणच्या मंदिरातील हे अत्यंत लोकप्रिय शिल्प आहे. ह्याच्या तीन कथा-आशय तोच ठेवून - तपशिलात थोड्याफार फरकाने आढळतात. रामायणामधील कथेमध्ये कुबेराचा पराजय केल्यानंतर रावणाने त्याचा आकाशमार्गे जाणारा पुष्पक रथ घेतला आणि तो त्यातून विहार करू लागला. त्याचा रथ कैलास पर्वतापाशी अडला. ते पाहून शंकराचे गण आणि नंदी जे त्या वेळेस मर्कटरूपात होते ते त्याला हसू लागले. तेव्हा चिडून जाऊन रावणाने रागाच्या भरात कैलास पर्वत उखडून टाकण्याचा प्रयत्न केला.कैलासतोलन, कैलास मंदिर, वेरूळ
दुसन्या एका कथेमध्ये रावणाने शंकराला लकेत चलण्याचे आवाहन केले. तेव्हा आपण सोडून जाऊ शकत नसल्याचे शिवाने त्याला सांगितले. त्यावर उपाय म्हणून रावणाने कैलासासह शिवपार्वतीला लकेत न्यायचे ठरविले. म्हणून कैलास पर्वत उचकटण्याचा प्रयत्न त्याने केला.शंकराने कैलास हलल्यास ब्रह्मांडाचे संतुलन बिघडेल म्हणून आपल्या उजव्या पायाचा अंगठा दाबून स्थिर केले. तसेच रावणाचेही दमन केले. रावणाची ही भक्ती पाहून शिवाने त्याला चंद्रहास तलवार दिली. या कथेवर आधारित शिल्प वेरुळमध्ये अनेक ठिकाणी कोरलेले दिसते.
तर तिसऱ्या कथेमध्ये शंकर पार्वती यांच्यामध्ये काही कारणाने विसंवाद निर्माण झाला त्यामुळे शिवाच्या द्वारपालाने रावणाला कैलासावर जाण्यापासून अडवले. या कथेवर आधारित संबध भारतातील हे एकमेव शिल्प असावे. (अपवाद लंकेश्वर लेण्यामध्ये याचा एक प्रयत्न झालेला दिसतो. )
वेरुळ येथील कैलास मंदिराच्या दक्षिणेकडील भिंतीवर सर्वात विलक्षण, कल्पक, परिपूर्ण तोलनाचे शिल्प आहे. त्याची कथा अशी, रावण कुबेराचा पराभव करून आकाशमार्गे परतताना चाटेवर कैलास पर्वत दिसला. तो पाहण्याच्या इच्छेने तो पर्वतावर उतरला. उतरताक्षणी श्रीशंकराच द्वारपालांनी त्याला रोखले. उन्मत रावणाचा अहंकार जागृत झाला व मस्तीने तो म्हणाला, 'ज्या ठिकाणी मला मुक्त प्रवेश नाही, ती जागाच लंकेत घेऊन जातो. मग बघतो मला शंकराचे दर्शन घेण्यापासून कोण प्रतिबंध करतो ते." रागाच्या भरात तीरासारखा तो कैलास पर्वताच्या खाली गेला, वीरासनावर बसून आपल्या वीसही हातांनी कैलास पर्वत गदागदा हलवून उखडून काढला. कैलासाला भूकंपासारखे हादरे बसू लागले. त्या वेळी कैलासावर काय स्थिती होती बरे? शिव पार्वती असले तरी ते शेवटी नवराबायको. काही भांडण झाल्याने पार्वती तोंड फिरवून कृतक्कोपाने महादेवापासून दूर बसली होती. दासी तिची समजूत घालत होती. अचानक बसणाऱ्या हादऱ्यांनी दासी भयकंपित होत स्वतःचा जीव वाचविण्यासाठी पळू लागली व पार्वती राग विसरून भयभीत होऊन शंकराला बिलगते. शिल्पकाराने खोदलेल्या बारकाव्यांमुळे हे शिल्प जिवंत झाल्यासारखे वाटते. पळणाऱ्या दासीला अंशात कोरलेले आहे, तिचा अंबाडा अर्धवट सुटलेल्या अवस्थेत आहे. त्यामुळे तिचा वेग नजरेला जाणवतो. या गतीने पळताना समोर पाहून पळणे स्वाभाविक असते. पण या दासीचा नेत्रकटाक्षा मागे आहे, नवरा बायकोचे भांडण आता तरी मिटले की नाही हे पाहण्याच्या स्त्रीसुलभ उत्सुकने ! पार्वतीने भयकंपित होऊन शिवाचा दंड धरला आहे. तो तिने प्रेमाने घरलेला नसून भीतीने पकडला असल्यामुळे तिची बोटे विलग झाली आहेत. अत्यंत रेखीवपणे कोरलेले हे शिल्प तो क्षण आजही जणू जिवंत करते, कैलासाला बसलेल्या हादऱ्यांनी आजूबाजूच्या निसर्गावर आणि मनुष्यमात्रांवर झालेला परिणाम तितक्याच उठावदारपणे कोरलेला आहे. झाडावरची माकडे भयभीत झालेली आहेत.शिवगण रावणावर दगडांचा वर्षाव करत आहेत तर वादन करणारे कलाकार आपली वाद्ये खांद्यावर पळायच्या तयारीत आहेत, हिमालयात तप करणारे ऋषी महादेवाकडे अपेक्षेने पाहत आहेत, देवा देवा आता कसे होणार ? पण हा सर्व कोलाहल श्रीशंकर शांतपणे न्याहाळत आहे. जणू त्याला विचारायचे आहे, अरे मी असताना तुम्हा सर्वांना इतके धाबरण्याचे कारण काय? तेही या यत्किचित रावणाला ? शिवाने आपल्या उजव्या पायाच्या अंगठ्याने किंचित दाब द्यायला सुरुवात केली. या किंचित दाबानेही रावणाच्या अंगावर प्रचंड दबाव येऊ लागला. त्याचा एकेक हात श्रमाने थकून खाली पडू लागला, एक चेहरा रडू लागला, एक चेहरा मर्कटासारखा वेडावाकडा झाला. त्याच्या लक्षात आले की कैलास उपटणे सोपे पण तो हलवणे अशक्य कारण ही झुंज तर प्रत्यक्ष महादेवाशी आहे. येथे आपली डाळ शिजणार नाही. अशा प्रसंगी शिवाची स्तुती केली तरच आपली सुटका होईल हे रावणाच्या लक्षात आले. त्याने आपल्या बुद्धिचातुर्याने एक स्तोत्र रचले. याला रावणविरचित शिवतांडवस्तोत्र असे म्हणतात. ते त्याने मोठमोठ्याने म्हणायला सुरुवात केली.
"जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्य लब्मितां भुजंगतुंगमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्मन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ।।"
अशा प्रकारच्या पंधरा श्लोकांचे हे स्तोत्र ऐकून प्रसन्न झालेल्या भोळ्या शंकराने त्याला क्षमा केली. अचाट शक्तिशाली माणसाचा अहंकार नाहीसा करण्यासाठी परमेश्वराच्या यत्किंचित अंगठा टेकवण्याएवढी शक्ती पुरेशी असते. या शिल्पातून बोध घ्यायचा आहे तो असा की जीवनात भूकंपासारखे प्रसंग येतात. प्रत्यक्ष भूमी हादरून किंवा कुटुंबात भूकंपसदृश घटना घडल्यानेसुद्धा अशा प्रसंगी प्रज्ञावान मंडळींनी ठामपणे उभे राहून धैर्याने त्याचा सामना केला पाहिजे. हीच गोष्ट भगवंताने गीतेत सांगितली आहे.
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।। भ. गीता २-५६ ।।
एका श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानाला एका पुराणकथेच्या माध्यमातून अत्यंत नाट्यमय पद्धतीनी शिल्पांकित करून आजरामर करण्याचा हा एक असामान्य प्रयोग म्हणावा लागेल. कैलासतोलन या मालिकेतील जगातील सर्वात मोठे आणि सर्वात श्रेष्ठ असे हे शिल्प आहे.
मार्कडेयानुग्रह :-
मर्कड ऋर्षीना अनेक अपत्ये झाली. पण ती जगली नाहीत. ऋषींनी मग मृत्यूलाच साकडे घातले. यम प्रसन्न झाला आणि म्हणाला, मी तुम्हाला पुत्र देईन परंतु तो एक तर दीर्घजीवी आणि मतिमंद असेल किंवा अत्यंत हुशार परंतु अल्पजीवी असेल. मातापित्यांनी अल्पजीवी पण हुशार मुलगा होऊ दे असा वर मागितला. मुलगा झाल्यावर त्याचे नाव त्यांनी माकैडेय ठेवले. ही मार्कंडेय जन्माची कथा आहे. हा मुलगा जसजसा मोठा होऊ लागला तसा तो हुशार असल्यामुळे शिवाची भक्ती करू लागला. तो सोळा वर्षाचा झाला तेव्हा यम त्याला न्यायला आला. मार्कंडेय शिवाच्या आराधनेत इतका गुंग झाला होता की त्याच्याभोवती यमाने पाश टाकला आहे याचेसुद्धा त्याला भान राहिले नाही. शिवाने पाहिले की, एक अनन्यसाधारण भक्त आपली इतकी मनोभावे आराधना करता असताना त्याच्यावर मृत्यूसुद्धा काय म्हणून झडप घालेल ? पिंडीतून शिव प्रकटला आणि त्याने यमावरतीच हल्ला केला. त्याच्या छातीत त्रिशूळ खुपसला आणि कमरेत लाथ मारली. ती लाथ इतकी जबरदस्त आहे की, यम अक्षरशः भेलकांडत गेल्याचे कलाकाराने कोरले आहे. त्याच्या चेहऱ्यावर आश्चर्य आहे की, आपल्याला मारणारा हा कोण? शैव पंथांचे उदात्तीकरण करणारी ही कथा आहे. वेरुळमधील कैलास लेणे क्र.१६ तर दशावतार लेणे (क्र. १५) येथे कोरलेले हे कालारी या नावाने सुध्दा ओळखले जाणारे शिवाचे संहारशिल्प सर्वोत्तम म्हणावे लागेल. याशिवाय विघ्नेश्वरानुग्रह व नंदिशानु अशी अनुग्रह शिल्पेही असतात.मार्कंडेयानुग्रह, कैलास मंदिर, वेरूळ
संहार मूर्ती :-
शिवाच्या तांडवाचे वर्णन करताना शिव त्याचा तिसरा डोळा उघडतो आणि तो सर्वांचा सा कमलो असे सांगितले जाते. यावरून आकांडतांडव करणे हा वाक्यचारही रूढ झाला आहे.परंतु शिल्पकलेत मात्र असे संहार तांडव दिसत नाही. उलट पक्षी निर्मितीचा परमानंद चेहऱ्यावर प्रकटलेले त्याचे प्रसन्न आणि शांत रूपच दिसते. शिवाचे आक्रमक रूप त्याच्या संहार शिल्पांमध्ये दिसते. निरनिराळ्या असुरांचा वध दर्शवणारी ही शिल्पे असतात, ज्यामध्ये भैरव, गजासुरवध, अंधकासुर, त्रिपुरांतक, कालारी, कामंतक, शरभ, ब्राह्म शिरच्छेदक, वीरभद्र आदी शिल्पांचा समावेश असतो.
भैरव मूर्ती :-
शिव पुराणामध्ये भैरव हे शिवाचे पूर्ण रूप. भैरव किंवा कालभैरव हा वाराणसीचा अधिपती मानला जातो. तसेच अनेक गावांचा रक्षक किंवा क्षेत्रपाल अशा देवाला भैरव असेही म्हणतात. या शिवाच्या रूपात त्याच्या जटा मुक्त झालेल्या असतात. भैरवाच्या गळ्यामध्ये नररूंडाची माळ असते. याशिवाय त्याच्या हातात खड्ग, त्रिशूल, डमरू आणि मुंड इ. असतात. कानात सर्प कुंडले, कमरेत घंटा असलेला करगोटा आणि घुंगरू असलेले नुपूर असतात. चेहऱ्यावर अत्यंत उग्र असे भाव असतात. काही मूर्तीमध्ये तो विवस्त्र असतो. भैरवाचे एक अत्यंत सुरेख शिल्प हे राणी की वाव-पाटण येथे आहे. या मूर्तीला अठरा हात असून हातांची जणू एक महिरपच त्याच्या भोवती झालेली दिसते. चेहऱ्यावर उग्र भाव दाखविण्यासाठी केवळ त्याचे डोळे वटारलेले आहेत. परंतु त्याची परिणामकारकता दाखविण्यासाठी कलाकाराने चांगलीच कल्पकता दाखवलेली आहे. शंकराच्या पायाखाली एक राक्षस कोरला असून त्याचा एक हात त्याने कापून टाकला आणि मुंडके उडवले असे दाखवले आहे. तोडलेले मुंडके शंकराच्या खालच्या डाव्या हातात केसाने धरलेले असून त्याच्या खाली एक श्वान आहे जो त्याच्या मानेतून टपकणाऱ्या रक्ताचे थेंब चाटताना दाखवले आहे. शंकराच्या उजव्या पायाजवळ त्याचा एक अस्थिपंजर परंतु जटाधारी गण आहे जो त्या दैत्याचा तुटलेला हात चावून खायचा प्रयत्न करतो आहे. (बीभत्स रस हा दाखवू नये असा संकेत असला तरी कलाकाराने या शिल्पात तो अत्यंत सूचकतेने दाखवला आहे.) वेरुळमध्ये (कैलास लेणे) गजासुरवध आणि अंधकासुरवध या शिल्पांमध्ये शिवाचे उग्र रूप दाखवले आहे. अन्य असुरवध शिल्पांमध्ये मात्र त्याच्या चेहऱ्यावर सौम्यच भाव आहेत. भैरवाची एकूण ६८ रूपे आहेत. त्या सर्वांची वेगवेगळी नावे आहेत. याशिवाय बटुक भैरव आणि स्वर्णाकर्षण भैरव अशीही रूपे आढळतात.
चित्र क्र. ८६ : भैरव, रानी की बाव, पाटण
गजासुरवध :-
कूर्म पुराणात आलेल्या कथेप्रमाणे वाराणसीच्या कृत्तिवासेश्वर लिंगाचे पूजन करणाऱ्या ब्राम्हणांना त्रास देणाऱ्या हत्तीचा वेष घेतलेल्या एका असुराचा शंकराने संहार केला आणि त्याचे कातडे उत्तरीय म्हणून पांघरले. गजासुराच्या इतरही कथा आहेत. दक्षिण भारतीय परंपरेप्रमाणे शंकराने या आसुरांचा नाश तंजावर जिल्ह्याच्या बळूवूल गावात केला. (जोशी: १९७९, पृ.२००),गजासुरवध वेरुळ :-
कैलास मंदिरात हे शिल्प महायोगी शिवाच्या बरोबर समोरच्या बाजूला कोरलेले आहे. भगवान शिवाचे एक आक्रमक रूप कोरलेले दिसून येते. नीलासुर हा राक्षस मातला आणि देवलोकांना त्रस्त करून सोडले. तेव्हा सर्व देवलोक श्रीशंकराकडे आले. शंकराने सर्व देवांकडे मागणी केली की या युद्धामध्ये तुम्ही सर्वांनी आपापल्या परीने साहाय्य करावे. तेव्हा देवतांनी आपापल्या शक्ती त्याच्या मदतीला पाठवून दिल्या. त्या शक्ती शिल्पांमध्ये शंकराच्या पायाशी बसलेल्या मातृकांच्या रूपाने दिसतात. शिवाने डमरूचा भयंकर नाद करत गजासुरावर आक्रमण केले. प्रथम त्याचा दात तोडला. शिल्पामधील शिवाच्या वळलेल्या मुठीतील दात हे त्याच्या निग्रहाचे प्रतीक आहे. तर गजासुराचे चामडे सोलून ते सूर्याजवळ धरले आणि जाळून टाकले. अशा त-हेने गजासुराला मारले. युद्ध पाहण्यासाठी पार्वती पण आली होती. शिवाचे ते अक्राळविक्राळ रूप, आकाशपर्यंत पसरलेल जटा, विस्फारलेले नेत्र, गळ्यात नररूडांची माळ आणि त्याचा युद्धोन्माद पाहून पार्वती हळूच तेथून सटकण्याच्या तयारीत आहे. शिवाच्या हे लक्षात आल्यावर त्याने त्याही स्थितीमध्ये तिचे समाधान करण्याचा प्रयत्न केला आहे. एका हाताने तिची हनुवटी हळुवारपणे धरून तो जणू तिला सांगायचा प्रयत्न करतो आहे की माझा हा आवेश गजासुरासाठी आहे. तुझ्यासाठी मात्र प्रिये, मी भोळासांबच आहे. कथेतील हा भाग शिल्पकाराने या शिल्पात हुबेहूब साकारलेला आहे.चित्र क्र. ८७ : गजासुरवध, कैलास मंदिर, वेरूळ
अंधकासुरवध :-
ही कथा वराह, कूर्म आणि वामन पुराणात येते. ब्रह्मदेवाच्या वराने उन्मत झालेला हा असुर देवांना अतिशय त्रास देऊ लागला. ते शंकराकडे गा-हाणे घेऊन गेले असता अंधकासुराने शंकरावरच आक्रमण केले. शंकराने त्याला शूलावर उचलून घेतले. त्याच्या जखमांमधून गळणारे रक्तबिंदू जा जमिनीवर पडले तर त्यापासून पुन्हा एक असुर निर्माण होऊ शकतो. तसे होऊ नये म्हणून शिवाने आपल्या डोळ्यापासून योगेश्वरी (काली) नावाची एक मातृका उत्पन्न केली. तिने आपल्या हातातील कपालामध्ये ते थेंब धरले आणि त्या युद्धात शिवाने अंधकासुराचा नायनाट केला. हे शिल्प वेरुळमध्ये अनेक ठिकाणी दिसते. परंतु त्याचा सर्वोत्कृष्ट आविष्कार दशावतार लेंणे (क्र.१५) मध्ये दिसतो. शिवाने अंधकासुराला म्हणजे अज्ञानाच्या राक्षसाला भाल्याच्या टोकावर घेतले आणि दूर अंतराळात भिरकावून दिले. ही क्रिया या शिल्पामध्ये अत्यंत आवेशपूर्ण दाखविली आहे. परंतु दैवीकरण करणे म्हणजे काय तर हेच कृत्य करायला माणसाला प्रचंड शक्ती वापरायला लागली असती. तर इथे मात्र शिवाने अत्यंत लीलया हे केल्याचे शिल्पकाराने कोरले आहे. त्या अचाट शक्तीला पाहून प्रभावित झालेली पार्वती शेजारी कोरलेली आहे. अंधकासुराच्या शरीरातून पडणाऱ्या प्रत्येक रक्ताच्या थेंबातून नवीन अंधकासुर जन्माला येणार म्हणून ते पडणारे थेंब गोळा करायला कपाल घेऊन काली शिवाला साहाय्य करीत आहे. कालीचा अजस्त्र आकार शिल्पामध्ये चपखलपणेसामावलेला आहे. इथे कलाकाराला असे वाटले की, शिवाने भाला जर एवढ्या जोराने भोसकला असेल तर अंधकासुराच्या शरीरातून रक्ताबरोबर मांसाचेही तुकडे उडू शकतात, त्यांना हवेतल्या हवेत झेलण्यासाठी कलाकाराने एका उडणाऱ्या गरुडालाही शिवाच्या कपाल धरलेल्या हाताखाली कोरलेले आहे.शिल्पाचा विशाल आकार, त्यातील पात्रांची संरचना आणि यांचा आवेश हे सगळेच थक्क करणारे !
अंधकासुरवध, कैलास मंदिर, वेरूळ
त्रिपुरांतकमूर्ती :-
त्रिपुर संहाराची कथा महाभारतात आहे. तारकासुराचे तीन मुलगे विद्यन्माली, तारकाक्ष आणि कमलाक्ष यांनी ब्रह्मदेवाची आराधना करून तीन किल्ल्याचे स्वामित्व मिळविले आणि असाही वर प्राप्त करून घेतला की हे किल्ले त्यांच्या इच्छेप्रमाणे फिरत असावेत. हजार वर्षात एकदा ते एका बिंदूवर यावेत आणि त्यावेळी एकाच बाणाने कोणी त्यांना पाडले तरच ते विनष्ट होऊ शकतील. मयासुराने त्या सोने, चांदी, व लोखंडाचे किल्ले बांधून दिले. याप्रमाणे बलवान होऊन त्यांनी देवांना अतिशय छळण्यास प्रारंभ केला. लिंगपुराणातील कथेत (७,२-४). शेवटी शंकराने मेरूपर्वताचे धनुष्य करुन त्याला वासुकी नागाची प्रत्यंच्या जोडून एक बाण ठराविक क्षणी मारून असुरांचा नाश केला व देवांची सुटका केली. (ढाल : २०००, पृ.२१४).या कथेचा अन्य काही तपशिलही अनेक ठिकाणी आढळतो. शंकराने पण या असूराचा नाशासाठी देवांच्या शक्तीची मागणी केली. त्याप्रमाणे सर्व देवांनी या युद्धात सहकार्य केले. शंकराने विष्णू, अग्नी, आणि यम यांचा बाण केला. मेरू पर्वताचे धनुष्य केले आणि त्यासाठी वासुकी सापाची प्रत्यंचा केली. पृथ्वीचा रथ केला, मंदर पर्वताचा अक्ष करून त्यावर चाके म्हणून चंद्र आणि सूर्य बसविले, उपचक्र म्हणून हिमालय आणि विंध्याद्री पर्वत बसविले. सप्तर्षीना चाकावर गोलाकार बसवून चाके सुशोभित केली. गंगा, सरस्वती आणि सिंधू या नद्या चाकाच्या अक्षाच्या खिट्ट्या झाल्या. आकाश रथाचे छप्पर झाले, त्यांच्या रथाला चार वेदांचे अश्व जोडले. सर्पराज कालपृष्ठ, नहुष, करकोटक आणि धनंजय हे घोड्यांना बांधणारे पट्ट झाले तर कृति, सत्य, वैराग्य आणि ऐश्वर्य हे घोड्यांचे लगाम झाले. सोम अग्नि आणि विष्णू शंकराचा बाण झाले. ज्यात अग्नी हा बाणाची दांडी झाला. सोम बाणाचे शीर्ष झाला आणि स्वतः श्रीविष्णू बाणाचे टोक झाले. (डॉनिजर : १९७५, पृ.१२७-१३२).
त्रिपुरांतक मूर्ती या घटनेची जाणीव करून देते. येथे शिवाचे धनुष्य, बाण किंवा शरसंधान ह्या महत्वाच्या गोष्टी होत. दक्षिण भारतामध्ये या मूर्ती अधिक दिसतात. आगम साहित्यात याचे पुष्कळ वर्णन येते. त्यात त्याचे आठ प्रकार सांगितलेले आहेत. वेरुळमध्ये याचे कैलास आणि दशावतार लेण्यात शिल्प दिसते.
वेरुळमधील शिल्पांमध्ये दोन्ही पायात अंतर घेऊन शिव रथावर उभा असल्याचे दाखवले जाते. यातून अत्यंत गतिमान अशा रथावर त्याने तोल सांभळण्यासाठी घेतलेला पवित्रा लक्षात येतो. धनुष्यावर बाण दिसत नाही. परंतु शिवाचा उजवा हात कानाजवळ दिसतो. आकर्ण धनुष्य ओढून त्याने नुकताच तो बाण सोडल्याचे स्पष्ट होते. बाण सुटल्याने असुरांचा नाश झाला असल्यामुळे ते दशावतार लेणीतील शिल्पपटात कोरलेले दिसत नाही. परंतु कैलास लेण्यातील शिल्पपटात मात्र दोन असुर वर आणि एक असुर मारला गेल्यामुळे तो आकाशातून पडताना दिसतो. कैलास लेण्यात आणि दशावतार लेण्यात घोडे आणि रथ हे काटकोनात असलेल्या भिंतींच्या कोपऱ्यावर कोरलेले आहेत. कलाकाराच्या या कल्पकतेमुळे या दृश्यातील रथाला गतीचा आभास झाल्यासारखा दिसतो.
तमिळनाडूमधील तंजावर येथील बृहदीश्वर मंदिराच्या भोवती दक्षिण, पश्चिम आणि उत्तर भिंतीवर प्रत्येकी सहा देवकोष्ठ असून त्या सर्व देवकोष्ठांमध्ये शिवाची त्रिपुरांतक श्रेणीतील अगदी वेगळी शिल्पे आहेत. या देवळाच्या गर्भगृहाबाहेरील दर्शनी भिंतीची लांची जवळजवळ ४० फूट असून त्याची उंचीही जवळजवळ तेवढीच आहे. यामध्ये सहा सहा देवकोष्ठांचे दोन थर आहेत. त्यातील वरच्या थरामध्ये डाव्या हातात उभे धनुष्य आणि उजव्या हातात एक बाण पालेल्या शिवाच्या अठरा मूर्ती आहेत. प्रथम दर्शनी तर ही श्रीरामाचीच मूर्ती वाटते. कारण शिवाने डाव्या हातात धरलेले नुष्याचे एक टोक जमिनीला टेकलेले असते तर दुसरे त्याच्या डोक्याहूनही वर गेलेले आहे. मेरू पर्वताचेच धनुष्य ते, लहान कसे असणार. अन्यथा शिवाचे पिनाक हे धनुष्य सांबराच्या सिगापासून केलेले असल्यामुळे अन्य मूर्तीमध्ये ते लहानसेच दाखवले असते. बृहदीश्वर मंदिरातील या सर्व शिवाच्या मूर्ती जिगुरांतक शिव याचीच शिल्पे आहेत (नागास्वामी : २०१०).

त्रिपुरांतक, बृहदीश्वर मंदिर, तंजावर

त्रिपुरांतकमूर्ती, कैलास मंदिर, वेरुळ
त्रिमुखी शिव.
ह्याला तीन मुखे असतात. त्रिमुखी शिवाची सर्वात प्रसिद्ध प्रतिमा म्हणजे घारापुरी येथील ब्रह्मा-विष्णू-महेश अशी मानली गेलेली शिवप्रतिमा. वास्तविक ही प्रतिमा ब्रह्मा-विष्णू-महेश अशी नसून शंकराच्याच सदाशिव रूपाची आहे.
वेरूळ येथील त्रिमुखी शिव
चतुर्मुख शिव.
ह्याच्या नावाप्रमाणेच ह्याला चार मुखे आहेत. काही संशोधक ह्यालाच सदाशिव (पंचमुखी शिव) असे मानतात ह्याचे पाचवे मुख हे दाखवले नसते व ते आकाशाच्या दिशेने असे मानले जाते.
पाटेश्वर येथील चतुर्मुख शिव

५. लकुलीश शिव
इसवीसनाच्या पहिल्या शतकानंतर व गुप्तकाळाच्या आधी लकुलीश नावाच्या मुनीने पाशुपतमताची स्थापना केली. हे मत ळूहळू मान्य होत जाऊन लकुलीश हा शिवाचेच प्रतिक झाला. ह्याची मुख्य लक्षणे म्हणजे ह्याच्या हातात सोटा अथवा लगूड असते आणि हा उर्ध्वरेता असतो. ह्याचा एक हात नेहमी वरदमुद्रेत असतो. लकुलीश शिवाची मूर्ती पद्मासनी अथवा उभ्या अशा दोन्ही प्रकारांत सापडते.
वेरूळ लेणी क्र. २९ मधील पद्मासनस्थ लकुलीश शिवाची मूर्ती
वेरूळ कैलास लेणीतील (लेणी. क्र. १६) उभ्या अवस्थेतील उर्ध्वरेता लकुलीश
कल्याणसुंदर मूर्ती
शिवपार्वती विवाहाचे अंकन दाखवणार्या मूर्तीस कल्याणसुंदर मूर्ती म्हणतात. ह्या मूर्तींमध्ये शिवाने पार्वतीचा हात आपल्या हाती घेतलेला असतो. ब्रह्मदेव हा भटाचे काम करत असतो तर दिक्पाल, विष्णू आदी देव शिवाच्या विवाहाप्रित्यर्थ आलेले असतात.
वेरूळ लेणी क्र. २९ मधली कल्याणसुंदर मूर्ती
वेरूळ लेणी क्र. २१ मधली कल्याणसुंदर मूर्ती
९. सोमास्कंदमूर्ती
या मूर्तीमध्ये शिव आणि पार्वती यांचे मध्ये लहानसा स्कंद अथवा कार्तिकेय असतो.. अर्थात स उमा स्कंद (उमेसहित स्कंद) तो उभा, बसलेला किंवा आईच्या किंवा बाबांच्या मांडीवरही दाखवला जातो.
वेरूळ कैलास लेणीमंदिराच्या अंतराळात सोमास्कंद मूर्ती कोरलेली आहे.
आतापर्यंत आपण उमामाहेश्वर आणि केवल शिव प्रकारच्या मूर्ती पाहिल्या आता शिवाच्या मूर्तींचे अजून काही प्रकार बघू.
यात येतात ते अनुग्रह आणि संहारमूर्ती
शिवाच्या अन्य मूर्ती
सदाशिव मूर्ती :-
पाच तोंडाचा व दहा हातांचा शंकर हा 'सदाशिव' या नावाने ओळखला जातो. तसेच अनेक मुखांच्या शंकराच्या मूर्तीलाही सदाशिव म्हटले जाते. अशा वर्णनाच्या काही विशेष मूर्ती आढळतार परंतु साधारणपणे अनेक मुख असणाऱ्या शंकराच्या शिल्पाला सदाशिव म्हणतात. तत्पुरुष, वामदेश अघोर, सद्योजात, आणि ईशान अशी याच्या पाच मुखांची नावे असतात. मूर्तीमध्ये हा तीन किंवा चा तोंडाचा दिसतो. त्याचे समोर मध्यभागी असणाऱ्या मुखाला तत्पुरुष असे म्हणतात. त्याचा डावीकडील वामदेव तर उजवीकडील मुखाला अघोर म्हणतात. डोक्यावरील मुखाला ईशान म्हणतात तर पाचवे मुख जे दिसत नाही त्याला सद्योजात म्हणतात. ही पाच मुखे पंचमहाभूतांचे प्रतिनिधित करतात. यातील डोक्यावरील मुख ईशान हे आकाश तत्त्वाचे प्रतिनिधित्व करत असल्यामुळे ते काही शिल्पांमध्ये दाखवले जात नाही. घारापुरी (एलिफंटा) येथील त्रिमूर्ती या नावाने प्रसिद्ध असलेले शिल्प हे ब्रह्मा, विष्णू, महेश या त्रिदेवतांचे नसून सदाशिवाचे शिल्प आहे. या शिल्पात तीनच मुखे दिसतात आणि डोक्यावरील ईशान दाखवलेला नाही. शिवाच्या डावीकडील तोंडाचे नाव वामदेव. वामदेव म्हणजे परिष्कृत निर्मिती म्हणून याचा चेहरा अत्यंत सुकुमार तरुणाप्रमाणे कोरलेला आहे. त्याचे उजवे तोंड म्हणजे अघोर. यातील अघोर म्हणजे निर्मिती साठी लागणारी ऊर्जा आणि शक्तीचे रूप. हातोडीचा ठोका कठीण पदार्थाबर घालताना दाताखाली ओठ चावून भुवया विस्फारून अत्यंत त्वेषाने तेवढाच नियंत्रित आणि संयमित करून तो ठोका घालावा लागतो याचे ते प्रतीक आहे. या शिल्पातीत अघोराने चावलेला ओठ आणि त्याची वक्र झालेली भुवई यांची साक्ष देतात. या दोन्हीतील समतोल साधणारा निःपक्ष म्हणूनच निर्विकार तरीही निर्मितीचे समाधान दाखवणारा चेहरा हा मधल्या तोंडावर म्हणजे तत्पुरुषाचा असतो, घारापुरीतील हे शिल्प खरं तर अर्धशिल्पच (bust) आहे. शंकराच्या छातीपर्यंतच कोरलेले हे शिल्प आहे. हे शिल्प २१ फूट उीचे आहे. अर्धशिल्पांमध्ये जगातील सर्वात श्रेष्ठ असे हे शिल्प आहे.एकपाद शिव मूर्ती :-
ही शिल्पे संख्येने अतिशय कमी असतात आणि साधारणतः तांत्रिक पंथाच्या मंदिरात ही दिसतात. यामध्ये कमरेवरील शंकराचे शरीर पूर्ण असते आणि कमरेखाली एकच पाय दोन्ही पायाच्या जागी कोरलेला असतो. या शिल्पात शंकर ऊर्ध्वलिंगी दाखवलेला असतो. भुवनेश्वर उबळील हीरापूर येथील चौसष्ठ योगिनींच्या मंदिरात हे शिल्प दिसते.विलक्षण चतुष्पाद सदाशिव, खजुराहो

एकपाद शिव, हीरापुर
अजएकपाद शिव
हा शंकराच्या मूर्तीचा एक अतिशय दुमिळ प्रकार. महाभारतात वर्णिल्याप्रमाणे हा रूद्र कुबेराबरोबरच धनाचे रक्षण करत असतो. याचे तोड बकर्याचे असल्याने हा अग्नीशी समान मानला जातो तर ह्याने आपले संतुलन एकाच पायांवर खुबीने साधलेले असते.
पाटेश्वर येथील अजएकपादाची दुर्मिळ प्रतिमा

अप्रतिम अतुलनीय अर्धनारीश्वर (राजापुर, जि. हिंगोली)
औंढा नागनाथ जवळ राजापुर येथे तीन मुर्ती आहेत. यात सरस्वती आणि योग नरसिंह यांच्या मुर्ती आहेत. तिसरी अप्रतिम मुर्ती आहे अर्धनारीश्वराची. शिव पार्वतीची संयुक्त मुर्ती. उजव्या बाजुला शिव आहे आणि डावीकडे पार्वती. पत्नी ही नेहमी डाव्या बाजूला दाखवली जाते म्हणूनच वामांगी असा शब्द आला आहे.
या शिल्पकाराचे कसब अगदी एक एक जागी आढळते. पार्वतीचा मुकुट सजलेला (करंडमुकुट) आणि शिवाचा मुकुट जटांचा. तिच्या कानात सुंदर नाजूक कुंडले तर शिवाच्या कानात सर्पाकार कुंडले. पार्वतीला हातभर काकणं, तोडे. बाजुबंद, खालच्या हातात नाजुकपणे धरलेला कमंडलू. कमरेला मेखला. कमाल म्हणजे तिच्या वस्त्रांवरची नक्षीही दाखवलेली आहे. पायात तोडे तर आहेतच पण अंगठ्या जवळच्या बोटात जोडवे पण आहेत. वरच्या हातात आरसा आहे.
शिवाच्या वरच्या हातात त्रिशुळ आहे. खालच्या हातात अक्षयमाळा आहे. बाजुबंद सर्पाकार राकट आहे. पायात रूंडमाळा दिसतात, पण हीच माळ पार्वतीच्या बाजूने नाजूक दागिना बनते. गळ्यातील माळेचेही असेच. शिवाच्या बाजूने सरळ ठाशीव दिसणारी माळ पार्वतीच्या स्तनांवरून वळण घेत कलात्मक डौलदार बनते. तिचे वार्यावर उडणारे वस्त्र आणि शिवाचे जाडे भरडे वस्त्र.
खाली शिवाचे वाहन नंदी आहे आणि पार्वतीचे सिंह न दाखवता लोध (मुंगुस किंवा घोरपड) दाखवले आहे.
महाराष्ट्रात अर्धनारीश्वराच्या मुर्ती फार थोड्या आहेत. ज्या आहेत त्या मंदिराच्या बाह्य भागावर कोरलेल्या आढळून येतात. मुख्य मुर्ती म्हणून कोरलेवी हाच एकमेव अप्रतिम नमुना.
सप्तस्वरमयशिव
आधुनिकतेच्या शिखरावर असलेली मुंबई तेवढीच प्राचीन सुद्धा आहे. याच मुंबईच हृदय समजला जाणाऱ्या परिसरात म्हणजेच परळ गावात एक प्राचीन शिवमूर्ती आहे. परळ गावातील #चण्डिकादेवी किंवा बारदेवीच्या मंदिराच्या शेजारीच ही मूर्ती आहे. १९३१ मध्ये रस्त्याचे बांधकाम चालू असताना सापडलेली ही मूर्ती स्थानिकांच्या हट्टामुळे (अर्थात चांगलंच आहे) आजही इथेच आहे. पुरातत्व विभागाच्या माहिती प्रमाणे ही मूर्ती गुप्त कालीन म्हणजेच इसवी सनाच्या पाचव्या किंवा सहाव्या शतकातील असावी.
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जवळपास १३७ इंच उंचीची ही मूर्ती ७७ इंच रुंदीच्या भागावर उठावशीर कोरलेली आहे. मध्यभागी मुख्य प्रतिमा, तिच्या डोक्यावर एकावर एक अश्या दोन मूर्ती तर मुख्य मूर्तीच्या खांद्यातून दोन मूर्ती, आणि त्या वरील मूर्तीच्या खांद्यावरून दोन मूर्ती त्रिभंगावस्थेत अश्या एकूण सात मूर्ती नजरेला पडतात. मुख्य मूर्तीच्या पायाजवळ एकूण पाच वादक बसलेले आहेत.
सात पैकी सहा मूर्ती ह्या द्विभुज असून, या मूर्तीच्या डाव्या हातात एक हातात कमंडलू आणि दुसरा हात मुद्रा अवस्थेत आहेत. मध्यभागी सर्वात वरची मूर्ती मात्र दहा हातांची आहे. या मूर्तीच्या उजव्या हातात हातात कमंडलू, चक्र, खेटक, तलवार, आणि एक हात मुद्रा अवस्थेत आहे, तर डाव्या बाजूला एक हात अभिषेक मुद्रेत असून इतर हातात धनुष्य, दोन भरीव चक्र आणि एका हातात कमंडलू आहे.
एकाही मूर्तीवर मुकुट नसला तरी केसांची जटामुकुट सारखी अतिशय सुंदर आणि वेगळी रचना, डोक्यावर चंद्रकोर, गळ्यात हार, नक्षीदार कटीवस्त्र,कानातील कुंडल, हातात कडे, यांनी युक्त ह्या मूर्ती अतिशय सुंदर दिसतात.
काही अभ्यासकांच्या मते मधल्या तीन मूर्ती म्हणजे तमोगुणी शिव, सत्वगुणी विष्णू, आणि राजस ब्रह्मा असावा, तर इतर चार मूर्ती ह्या सद्योजात, वामदेव, अघोर, आणि तात्पुरुष असावेत. तर काहींच्या मते मधल्या मूर्ती ह्या पाश, पशु आणि पती असावे तर इतर प्रतिमा या विद्या, क्रिया, योग आणि चर्या हे शिवसिद्धांताचे लक्षण असावेत.
सी शिवरामन या मूर्तीला शिवाची सप्तस्वरमय मूर्ती असे म्हणलेले आहे, मात्र मुख्य प्रतिमेपैकी कोणाकडेही कोणतेही वाद्य नसल्याने हा विचार विवादित आहे. तर पायाजवळ बसलेले वादक हेच शिवाच्या सप्तस्वरमय रुपाकडे संकेत करीत आहेत, त्यामुळं सुरांशी मेळ घातला जाऊ शकतो असेही काहींचे म्हणणे आहे.
महेश तानाजी देसाई
#भ्रमणगाथा

गजहा - शिवाची रौद्र आणि संहारक रूपातली मूर्ती.
खजुराहो येथील खंडारीया महादेव मंदिरामध्ये हे शिल्प दिसते. आणखी एक शिल्प खजुराहो येथील संग्रहालयात आहे. या शिल्पात आठ तोंडाचा शिव म्हणजे दर्शनी भागात खांद्यावर तीन मुखं आणि त्याच्यावर तीन छोटी मुखे, या दोन्ही स्तरांमध्ये चवथे मुख मागील बाजूला आहे हे गृहीत धरले जाते. अशी त्याच्या आठ मुखांची रचना आहे. डोक्यावर मध्यभागी शिवलिंग कोरलेले आहे. या मूर्तीला चार पाय असून त्यातील दोन पाय पद्मासनात आणि खाली सोडलेले दोन पाय जमिनीवर टेकलेले दिसतात. या मूर्तीला बारा हात होते. परंतु आता त्यातला एकच शिल्लक आहे. चतुष्पाद म्हणजे चार पायांचा. या ठिकाणी पाद शब्दावर श्लेष केलेला आहे. शैव पंथांच्या अनुयायांसाठी चार मार्ग किंवा चार पाद सांगितले आहेत. शैव सिद्धान्तामधील हे चार मार्ग म्हणजे योग-पाद, ज्ञान- पाद, क्रिया-पाद आणि चर्या-पाद. सदाशिवाच्या पद्मासनात असलेले दोन पाय म्हणजे ज्ञान आणि योग पाद होय आणि खाली सोडलेले दोन पाय क्रिय पाद (उपासना पद्धत) आणि चर्या पाद (आचरणाचे नियम) होय. केवळ या मूर्तीच्या दर्शनाने भक्तांन जीवनात मुक्ती देणाऱ्या चार मार्गांचे स्मरण व्हावे अशी यांची योजना आहे.

एकादश रुद्र, कैलासनाथ मंदिर, कांचीपुरम
ज्या शिल्पातून सगळे तत्त्वज्ञान साकारले जाते, अशा शिल्पांना डॉक्टर गो. बं. देगलूरकर यांचा मते 'बिंब ब्रह्म' असे म्हणतात. याशिवाय अष्ट मुख आणि द्वादश मुख शिव अशीही शिवाची शिले असतात. काही शिल्पांमध्ये सिंहासह शिव कोरलेला असतो.
शिवाचे शिल्पांकन अनेक प्रकारे होते. त्यातील सर्वच प्रकार सर्व मंदिरात दिसत नसल्यामुळे येथे सर्वाधिक प्रचलित आणि संख्येने जास्त असणाऱ्या तसेच सामान्यतः अनेक देवळांमध्ये प्रकर्षनि आढळणाऱ्या शिल्पांचेच वर्णन प्रामुख्याने केले आहे. अकरा रुद्र यांचे एकत्रित किंवा स्वतंत्र शिल्पांकन दिसते. (कांचीपुरम - तामिळनाडू येथील कैलासनाथाचे मंदिर, सिद्धापूर-गुजराथ येथील शिव मंदिर) तसेच अज मुख, अघोर, नीलकंठ, वीणाधर, हनुस्पर्श (पार्वतीच्या हनुवटीला हात लावलेला बालशिव, विषपायी आवक्ष, महेशमूर्ती अशी विविध रूपेही दिसतात. (जोशी : १९७९, पृ.२०२- २०३).
तालागाव (बिलासपूर, छत्तीसगढ) येथे दहाव्या अकराव्या शतकातील रुद्र शिवाची एक उभी असलेली द्विभुज प्रतिमा मिळाली आहे. ही ऊर्ध्वलिंगी असून हातात आयुधे नाहीत. त्यांच्या संपूर्ण शरीरावर विविध प्राणी अंकित केलेले आहेत. छाती, पोट, मांड्या यावर सात मानव मुखे आहेत. गुडघ्याच्या ठिकाणी दोन सिंहाची तोंडे दिसतात. पोट हे महाकुर्माचे रूप, भुवयां ऐवजी मासे, एका विशाल कपाळावर टिळ्याच्या ऐवजी पाल, बुबुळाऐवजी मानवी कवट्या, याशिवाय डोके, कान, लिंग यासारख्या अवयवांवर साप, मोर, मगर वगैरे प्राणीही लहानमोठ्या प्रमाणात दिसतात. डॉ. देगलूरकर झांनी याला 'सर्वभूतवहित्र' असे म्हटले आहे.
पुणे येथील भारत इतिहास संशोधक मंडळामध्ये एक द्विभुज मूर्ती आहे. त्याच्या माथ्यावर आधी तीन फणांचा व त्याखाली पंधरा फणांचा नाग आहे. त्याच्या हसऱ्या चेहऱ्याला दाढी असून त्याच्या डाव्या हातात नाग आणि उजव्या भग्नावस्थेत असलेल्या हातात बटवा आहे. सर्पाच्या साहाय्यात असत्यामुळे श्री. नि.पु. जोशी (जोशी: १९७९) यांनी याला धन्वंतरी शिव असे म्हटले आहे. डॉक्टर देगलूरकरांच्या मते (देगलूरकर : २००७) ही धन्वंतरीचीच मूर्ती असून हे विष्णूचे रूप असल्याचे म्हटले आहे.
शिवाची १ ०८ रुपे
महादेव
वीरूपाक्ष
चंद्रार्धककृतशेखर
अमृत
शाश्वत
स्थानू
नीलकंठ
पिनाकी
वृषाभाक्ष
महाज्ञेय
पुरुष
सर्वकामद
कामारी
कामदहन
कामरूप
कपर्दी
विरूप
गिरीश
भीम
सॄक्की (म्हणजे मोठे मोठे जबडे वाले)
रक्तवासा
योगी
काल दहन
त्रिपुरघ्न
कपाली
गूढव्रत
गुप्त मंत्र
गंभीर
भाव गोचर
अणिमादीगुणाधार
त्रिलोकेश्वर्यदायक
वीर
वीरहंता
घोर
विरूप
मासल
पटू
महामासाद
उन्मत
भैरव
महेश्वर
त्रैलोक्यद्रावण
लुब्ध
लुब्धक
यज्ञसूदन
कृतिकासुतयुक्त
उन्मत
कृत्तीवासा
गजकृत्तीपरिधान
क्षुब्द
भुजंग भूषण
दत्तालंब
वेताल
घोर
शाकिनी पूजित
अघोर
घोरदैत्यग्न
घोरघोष
वनस्पती
भस्मांग
जटिल
शुद्ध
भेरुड शतसेवित
भूतेश्वर
भूतनाथ
पंचभूताश्रित
खग
क्रोधित
निष्ठूर
चंड
चंडिश
चंडिका प्रिय
चंडतुंड
गरुत्मान
निस्त्रिश
शव भोजन
लेलिहान
महारौद्र
मृत्यू
मृत्यूर गोचर
मृत्योमृत्यु
महासेन
स्मशानारण्यवासी
राग
विराग
रागांध
वितराग
शतार्ची
सत्व
रज
तम
धर्म
अधर्म
वासनवानुज
सत्य
असत्य
सदृप
असदृप
अहेतुक
अर्धनारीश्वर
भानू
भानुकोटीशतप्रभ
यज्ञ
यज्ञपती
रुद्र
ईशान
वरद
शिव
शिवाची १ ०८ रुपे
https://www.maheshnaik.com/lingodbhava-shiva/
भारतात जे दैवत सर्वाधिक पुजले जाते ते म्हणजे शिव. शिव हा दोन्ही प्रकारे पुजला जातो. लिंग स्वरूपात आणि मूर्त स्वरूपात.
लिंग पूजा ही पार सिंधू संस्कृतीपासून पाहण्यात येते. अर्थात त्याकाळी लिंग पूजा ही शिव अथवा रूद्र देवतेची नसून ती होती प्रजनन शक्तीची. निसर्गाच्या पुनरुत्पादनाच्या चमत्काराचे प्रतिक म्हणून स्त्रीशक्तीची उपासना योनीपूजेच्या स्वरूपात तर पुरुष शक्तीची उपासना लिंग स्वरूपात करण्यास प्रारंभ झाला असे म्हणता यावे. पुढे वैदिक आर्यांनी ह्या दोन्ही पूजांना आपल्यात सामावून घेत शिव व शक्ती यांच्या उपासनेच्या प्रथा रूढ केल्या.
वेदांमध्ये शिवलिंगाचे वर्णन कुठे येत असल्याचे मला ठाऊक नाही पण रूद्राचे वर्णन मात्र येते. हा रूद्र मूळचा अनार्य. वैदिकांनी तो आपल्यात सामावून घेतला पण आजही कुठेतरी त्याचे मूळचे अनार्य स्वरूप आपल्याला भैरव, वीरभद्र आदी रूपांमध्ये दिसून येते. ह्या रूद्रालाच नंतर शिव समजले जाऊ लागले.
ऋग्वेदात रूद्राचे वर्णन पुढीलप्रमाणे येते.
ऋग्वेद मंडळ १, सूक्त ४३
गाथपतिं मेधपतिं रुद्रं जलाषभेषजम |
तच्छंयोः सुम्नमीमहे ||
यः शुक्र: इव सूर्य: हिरण्यमिव रोचते |
श्रेष्ठ: देवानां वसुः ||
शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये |
नर्भ्यो नारिभ्यो गवे ||
सर्व स्तुतींचा नाथ, सर्व यागांचा स्वामी, व जलौषधींचा प्रभु असा जो रुद्र त्याचेजवळ स्वकल्याणेच्छु भक्त जे धन मागतो, त्याच धनाची आम्ही याचना करतो.
हा देवांचे श्रेष्ठ वैभव असून, ह्याचें तेज देदीप्यमान सूर्याप्रमाणें व कांति सुवर्णाप्रमाणें आहे.
हा आमचा अश्व, आमचा मेंढा, मेंढी, आमचे नोकर, दासी व धेनु ह्यांना उत्तम रीतीने आनंदांत राहतां येईल असे करतो
ऋग्वेद मंडळ २, सूक्त ३३
स्थिरेभिरङगैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशेहिरण्यैः |
ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद्रु॒द्रादसु॒र्यम् ॥
अर्हन् बिभर्षि सायकानि धन्व अर्हन् निष्कं यजतं विश्व:रूपं ॥
अर्हन् इदं दयसे विश्वं अभ्वं न वै ओजीयः रुद्र त्वत् अस्ति ॥
नानाप्रकारची रूपें धारण करणारा, उग्र व जगाचा आधार अशा भगवान् रुद्राची अंगयष्टि अत्यंत सुदृढ असून त्या आपल्या शुभ्रतेजस व सुवर्ण स्वरुपानेंच तो फार शोभिवंत दिसतो. सर्व भुवनांची समृद्धि, आणि सर्व भुवनांचा प्रभु अशा ह्या भगवान् रुद्रापासून त्याचे ईश्वरी सामर्थ्य दूर झालें असें कधींही होत नाहीं.
तूं हातांत धनुष्यबाण घेतले आहेस ते तुलाच शोभतात, तर्हेतर्हेचे स्वच्छ आणि पवित्र पुष्पहार तू घातलेले आहेस तेही तुलाच शोभतात. हें विश्व येवढें अवाढव्य व भयंकर पण त्याच्यावरही तूं दया करतोस ही थोरवी तुझीच. कारण हे रुद्रा, तेजस्वीपणांत तुझ्यापेक्षां वरचढ असा कोणी आढळणारच नाही.
ऋग्वेद मंडळ ७ सूक्त ४६
मा नः वधीः रुद्र मा परा दाः मा ते भूम प्रऽसितौ हीळितस्य
आ नः भज बर्हिषि जीव:शंसे यूयं पात स्वस्तिऽभिः सदा नः ॥
आम्हाला मारू नको आणि दूर टाकून किंवा परक्यांच्या हातांतही देऊन टाकू नकोस. अथवा आमचा पराभव करू नकोस. तुझ्या क्रोधरूपाच्या पापरूपी बंधनांत आम्ही बद्ध न होऊं. हविचा स्वीकार कर. तुम्ही सदा सुवचनांनी आमचा प्रतिपाळ करा.
नमुन्यादाखल दिलेल्या वरील सूक्तांमध्ये रूद्राचे मूळचे अनार्य स्वरूप त्याच्या क्रोधरूपाने प्रकट होत्सेते दिसते.
रूद्राचे जसे भयानक म्हणून वर्णन आले आहे त्याच प्रमाणे तो भयनाशक अथवा कल्याणकारक असल्याचेही वर्णन ऋग्वेदांत आलेले आहे. जलाषभेषज अथवा जलौषधींचा प्रभू असे रूद्राला मानले गेले आहे. रूद्राला शिवाचे स्वरूप कधी आले ते नेमके सांगता येत नाही मात्र हा बदल वेदोत्तर काळात घडला आणि गुप्तकाळापासून (इ.स.३५०-५००) शिवाला आजचे स्वरूप प्राप्त व्हायला सुरुवात झाली असे म्हणावयास हरकत नाही.
अर्थात हा लिंग,, रूद्र, शिव हा बराच मोठा विषय असून ह्याच्या फारश्या खोलात न जाता आपण आता शिवलिंगे आणि शिवमूर्तींचे मूर्तीशास्त्राच्या दृष्टीने काही प्रकार बघूयात.
ही हरवळे (साखळी) येथील गुहांतील वैशिष्ट्यपूर्ण आकाराची शिवलिंगे. यांच्याबद्दल जास्त माहिती मिळू शकली नाही पण कदाचित ती तांत्रिक पूजेशी संबंधित असू शकतील असे वाटते.
सविस्तर प्रतिसाद आणि त्यातील दुवे आणि छायाचित्रांबद्दल धन्स.
गुहेतील शिवलिंगे अगदी आदिम काळातील म्हणजे दिसतात. ह्यांचा काळ नक्की कोणता ते माहित करून घ्यायला आवडेल. पण तांत्रिक पंथातील वाटत नाही. ही शिवलिंगांच्या प्राथमिक अवस्थेतील दिसतात. पुरुष शिश्नाचा आकार असलेली. बहुधा २००० वर्षे जुनी.
पं. महादेवशास्त्री जोशी यांचे भारताची मूर्तीकला हे पुस्तक नक्कीच विकत घेईन.
एकाच्या म्हणण्याप्रमाणे बहुतेक चौथ्या शतकातल्या मानवनिर्मित गुहा असाव्यात. हे फार जुने ठिकाण आहे. इथे एक जुनी जैन बस्ती आहे तसंच एक बुद्धप्रतिमाही सापडली होती.
साधारण अशा आकाराची लिंगे घारापुरी बेटावर आणि ख्मेर अंगकोरवट इथे मिळाल्याचे उल्लेख सापडले. तर खरोखरच तिथे तशा अकाराची चित्रं पहायला मिळाली.
http://blogs.bootsnall.com/theglobaltrip/updates/005873.shtml
http://en.wikipedia.org/wiki/Khmer_architecture
शिवप्रभाव मुर्ती, लिंग, नाणी आणि लोककथा यांच्या रुपांत पामिरचे पठार (आत्ताचे ताजिकिस्तान, किर्घिजिस्तान, अफगाणिस्तान आणि हिंदुकुश पर्वतराजी आणि तिच्या आजूबाजूचा प्रदेश), भारत, ब्रम्हदेश ते इंडोनेशियासह दक्षिणपूर्व आशियात अगदी व्हिएतनामपर्यंत सापडतो.
शिवप्रभाव मुर्ती, लिंग, नाणी आणि लोककथा यांच्या रुपांत पामिरचे पठार (आत्ताचे ताजिकिस्तान, किर्घिजिस्तान, अफगाणिस्तान आणि हिंदुकुश पर्वतराजी आणि तिच्या आजूबाजूचा प्रदेश), भारत, ब्रम्हदेश ते इंडोनेशियासह दक्षिणपूर्व आशियात अगदी व्हिएतनामपर्यंत सापडतो.
परकी आक्रमणांत लिंगे फोडली गेल्यावर तेथे नवीन न बसवता "गुप्तलिंग " म्हणू लागले असावेत .(भिमाशंकर ?)
सहमत. आज जिथे लिंग दिसत नाही ती बहुतांश मूर्तीभञ्जकांनी भग्न केलेली आहेत. काही मोरीच्या वाटेवर तर काही विहिरीतून पाणी शेंदताना उभे राहण्याच्या जागी बसवली गेलेली.
असेच एक सासवडच्या चांगावटेश्वर मंदिरातील भग्न शिवलिंग. धडधडीतपणे फोडून काढल्याचे दिसत असूनही हे शिवलिंग गुप्त आहे असे तिथल्याच एका फलकावर लिहिलेले आहे.
एक "भैरव" अनेक वर्षापूर्वी नेपाळमध्ये पाहिला होता. या भैरवाला अल्कोहोलचा नैवेद्य आवडतो. माझ्याकडील स्थिरचित्रात याचे चित्र आहे ते जोडत आहे "नैवेद्य" मूर्तिवर दिसत असलेल्या छिद्रात टाकायचा असतो असे आठवते.

पण योग्य चित्र निवडल्याची खात्री नसल्याने पट्कन सापडलेला एक दुवा देखील जोडत आहे.
http://brookstonbeerbulletin.com/beer-in-art-45-the-hindu-god-shiva-as-b...
क प्रष्ण आहे की शिवलिंगाचे श्रुंग हे उत्तर दिशा दर्शवते किंवा उत्तरेकडे असते हे खरे आहे का?
होय, शाळुंकेची वहाण उत्तरेकडे असावी अश्या तर्हेने शिवलिंग स्थापलेले असते.
दिशेबद्दल माहिती नाही.
पण शिवलिंगाची पन्हळ (शाळुंकेचा लांबट भाग) हा साधकाच्या उजवीकडे असावा असा संकेत आहे.
पाटेश्वरची शाक्तपंथीय शिवलिंगे ह्या संकेताला छेद देतात.
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पण कदाचित श्रुन्ग हे उत्तर दिशेला ठेव्ण्याच्या पद्धती साठी सुद्धा असु शकेल? हे दिशादर्शकाचा वापर करुन ठरवता येवु शकेल.
बहुतेक वेळा शिवमंदीरात जाताना शिवपिंडीचे दर्शन घ्यायला पायर्या उतरून खाली जावे का लागत असावे? कोकणातील बिमलेश्वर सारख्या मंदिराचे एखाद दुसरा अपवाद वगळता हेच सगळीकडे दिसून येते..
प्रॅक्टिकल शक्यता अशी की शिवलिंगावर अभिषेक सतत सुरू असतो. त्यातील इकडे तिकडे उडालेले पाणी गाभार्यातच रहावे आणि त्या पाण्याने सगळे देऊळ ओले/निसरडे होऊ नये यासाठी कदाचित अशी रचना करत असावेत.
तसेच एक अजुन पाहिले आहे की शिव मंदीराला लागुनच पाण्याचा स्त्रोत किंवा तलाव असतो...पूर्वीच्या काळी ओलेत्यानेच महादेवाची पुजा / दर्शन करावे असा प्रघात असावा असे मला वाटते. { हा माझा फक्त अंदाज आहे.}
शिवमंदिरांमधील शिवपिंडी ह्या सभामंडपाच्या पातळीतच आहेत.
कोल्हापुरच्या अंबाबाईच्या मंदिरातील शिवमंदीर हे तर एक माळा वर आहे.
उज्जैन जवळही एक भेरवनाथाचे मंदीर आहे.त्यालाही दारुचाच "भोग" चढवतात.आमचे कुलदैवत असलेल्या कर्हाडजवळील भैरोबाला पुर्वी गांजाची चिलीम भरुन नेवैद्य दाखवायचे असे आमचे सासरकडच्या वडीलधार्यांनी सांगीतलेले पुसटसे स्मरते आहे.
कुडाळ मधिल मुर्तींना अजुनही गांजाचा नैवद्य लागतो माहितेय पण कराडमधील कोणतं मंदिर कळेल का ???
बदामिच्या गुंफेंत आणि परिसरां त छान लिंगे आणि साडेसहाफुटी पूर्ण शिवमूर्ती अखंड आहेत .
ऐहोळे गावातील मंदिरातल्या पिंडीवर पाणी टाकले की त्यात नंदीचे प्रतिबिंब दिसते (मोटरच्या आरशात दिसते तसे)
शिवलिंगे
शिवलिंगाची रचना सर्वसामान्यपणे शाळुंका अथवा योनी व त्यामध्ये लिंग अशा प्रकारची असते. ह्यालाच सयोनीज शिवलिंग असे म्हणतात. हे आपल्या नेहमीच्या माहितीतले शिवलिंग.
पिंपरी दुमाला येथील यादवकालीन मंदिरातील सयोनीज शिवलिंग.
आता आपण यातील काही भन्नाट प्रकार पाहूयात. यातील काही प्रकार पूर्वीच माझ्या पाटेश्वर मंदिरावरील लेखात आलेलेच होते.
१. एकमुखलिंग
यामध्ये शिवलिंगावर एक मुख कोरलेले असते.
पाटेश्वर येथे अशा प्रकारचे एक शिवलिंग आहे. ह्या एकमुखलिंगाभोवती लहान लहान अयोनीज लिंगांनी फेर धरलेला आहे.
पाटेश्वर येथील एकमुखलिंग
२. चतुर्मुखलिंग
यातील शिवलिंगावर चार मुखे कोरलेली असतात. सर्वसाधारणपणे ही चार मुखे म्हणजे शिवाची चार रूपे असतात. अघोर, उष्णीषिन्. योगी आणि स्त्री.
महाभारतातल्या अनुशासनपर्वातील उमामाहेश्वर संवादानुसार तिलोत्तमा नावाच्या अत्यंत सुंदर अप्सरेला आपल्या भोवती फिरताना पाहून तिच्या फिरण्याच्या दिशेप्रमाणे शंकराला चार मुखे उत्पन्न झाली. तसेच त्यात शंकर पुढे म्हणतो की पूर्वेकडील मुखाने मी इंद्रपद भोगतो, उत्तरेकडील मुखाने मी तुझ्याशी रतीक्रिडा करतो, पश्चिमेकडील मुखाने मी सर्व प्राण्यांना सुख देतो तर दक्षिणेकडील मुखाने मी रौद्र असून त्याद्वारे मी संहार करीत असतो.
तर काही संशोधकांच्या मते ही चार मुखे म्हणजे ब्रह्मा, विष्णू, महेश आणि सूर्य ह्यांची प्रतिके असतात.
पाटेश्वर येतीलच चतुर्मुखलिंग.

३. दिक्पालरूपी शिवलिंग.
हे ही शिवलिंग पाटेश्वर येथीलच आहे. यात शाळुंकेवरील शिवलिंगाभोवती चक्र, चांदणी, बदाम यांच्या आकृत्या आहेत. एकूण दहा चिन्हे यावर कोरलेली आहेत. यातील आठ चिन्हे म्हणजे अष्टदिक्पालांचे प्रतिक असावे तर उरलेली दोन सूर्य आणि विष्णूची प्रतिके असावीत.

४. अष्टोत्तरशत लिंग.
अष्टोत्तरशतलिंगामध्ये सर्वसाधारणपणे मुख्य लिंगावर लहान लहान अशी १०८ अयोनीज शिवलिंगे कोरलेली असतात.
पाटेश्वर येथील अष्टोत्तरशत लिंग
५. सहस्त्रलिंग
सहत्रलिंगांमध्ये सर्वसाधारणपणे मुख्य लिंगावर लहान लहान अशी १००० अयोनीज शिवलिंगे कोरलेली असतात.
पाटेश्वर येथीलच अजून एक सहस्त्रलिंग

६. कोटीलिंग
हा प्रकार पण सहस्त्रलिंगासारखाच पण यातील अयोनीज लिंगांची संख्या हजारापेक्षाही अधिक असते तेव्हा त्याला कोटीलिंग म्हणतात.
पाटेश्वर येथील कोटीलिंग
शिवलिंगांचे ढोबळमानाने काही प्रमुख प्रकार आपण बघितलेच. पाटेश्वरला यापेक्षाही अधिक प्रकारची लिंगे आहेत
गुड्डीमल्लमचे शिवलिंग
आता संहारमूर्तीपैकीच एक असलेल्या शिवाच्या भैरवरूपाबाबत आपण पाहू.
१२. भैरव
भैरव हे शंकराचे पूर्ण रूप होय. तो सर्व जगाचे भरण करतो आणि रूपाने भीषण आहे म्हणूनच ह्या रूपाला भैरवरूप असे म्हणतात. भैरवमूर्ती महाराष्ट्रात बहुतेक ठिकाणी आढळतात. साक्षात यमरूपी काळही त्याला घाबरून असतो म्हणून त्याला काळभैरव असेही संबोधले जाते.
बटबटीत डोळे, ओठांतून बाहेर पडणारे दात, गळ्यात नरमुंडमाला, त्रिशुळावर किंवा हातात नरमुंड लटकावलेले, नरमुंडातील गळणारे रक्त चाटणारे एक किंवा अधिक कुत्रे (भैरवाचे वाहन्ही कुत्राच आहे), सर्परूपी दागिने ही भैरवाची प्रमुख वैशिष्ट्ये. भैरवमूर्ती बरेचदा नग्नावस्थेतही दाखवलेल्या असतात.
भैरवाबाबतची कथा अशी-
ब्रह्मदेवाने रूद्र उत्पन्न केला आणि त्याला कपालि या नावाने संबोधून पृथ्वीचे रक्षण कराण्यास सांगितले. या नावामुळे स्वतःचा अपमान झाल्याचे वाटून रूद्राने आपल्या डाव्या हाताच्या अंगठ्याच्या नखाने ब्रह्माचे पाचवे मस्तक तोडून त्याला चतुर्मख केला. तथापि ते मस्तक त्याच्या हाताला चिकटून राहिले. ह्यापासून मुक्त होण्यासाठी ब्रह्मदेवाने त्याला १० वर्षे कापालिक व्रत करण्यास सांगितले. रूद्राने केसाचे जानवे आणि अस्थींचा हार घातला. जटामुकुटावर नरमुंड ठेवले व हातात रक्ताने भरलेले कपाल घेऊन तीर्थाटन केले व काशीस त्याच्या अंगठ्यास चिकटलेले मस्तक गळून तो मुक्त झाला.
शंकराच्या ह्या रूपालाच भैरवरूप म्हटले जाते.
भैरवमूर्तींचे असंख्य प्रकार आहेत. कोकणात आढळणार्या वेताळ मूर्ती म्हणजे असितांग भैरवाचाच एक प्रकार.
सामान्य, क्षेत्रपाल, चंड, स्वच्छंद, स्वणाकर्षण, आसितांग्, बटुक, कापाल, भीषण, घोर असे भैरवाचे विविध प्रकार.
वेरूळ येथील लेणी क्र. २१ येथील असितांग भैरव.
खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिराच्या बाह्यभिंतीवर कोरलेली भैरवमूर्ती.
खिद्रापूर येथीलच गजारूढ भैरव
गोंदेश्वर मंदिर, सिन्नर येथील भैरवमूर्ती
भुलेश्वर मंदिर, पुणे येथील उजवीकडील दोन भैरवमूर्ती

पूरच्या कुकडेश्वर मंदिरावरील भैरव प्रतिमा

रांजणगावाजवळील पिंपरी दुमाला येथील दुर्लक्षित मंदिराच्या बाह्यभागावरील ही भैरव प्रतिमा

पेडगाव येथील अप्रतिम शिल्पकेलेने समृद्ध असलेल्या लक्ष्मीनारायण मंदिराच्या बाह्यभिंतीवरील भैरव मूर्ती
भैरव प्रतिमा पाहून झाल्यावर मी आता इशाण प्रतिमांकडे वळून लेखाचा समारोप करतो.
१३. इशण
हा अष्टदिक्पालांपैकी एक. इंद्र, अग्नी, वायु, वरूण, कुबेर, यम, निऋती आणि इशान्य दिशेचा पालन करणारा हा लोकपाल म्हणजे इशण अथवा इषान. हे शिवाचेच एक रूप. ह्याची लक्षणे सर्वसामान्यपणे शंकराचीच असतात. म्हणजे त्रिशुळ, डमरू वगैरे.
पेडगाव येथील अप्रतिम शिल्पकेलेने समृद्ध असलेल्या लक्ष्मीनारायण मंदिराच्या बाह्यभिंतीवरील ही इशण मूर्ती
टोके गाव, प्रवरासंगम येथील सिद्धेश्वर मंदिरातील विष्णू उपमंदिरावरील ही इशण मूर्ती
आतापर्यंत आपण काही प्रकारची शिवलिंगे तर बर्याच प्रकारच्या शिवप्रतिमा पाहिल्या. यातले बरेचसे प्रकार उदा. दक्षिणामूर्ती, भिक्षाटनमूर्ती, चंद्रशेखरमूर्ती, गंगाधरमूर्ती, वीरभद्र आदिंची छायाचित्रे माझ्याजवळ नसल्याने इथे द्यायच्या राहून गेल्यात. जर कुणाजवळ तशा मूर्तीची छायाचित्रे अथवा वर्णन असेल तर ते येथे अवश्य द्यावेत.
पुढेमागे क्वचित विष्णू, दिक्पाल, मातृका यांवरही लिहिण्याचा विचार आहे. बघू कधी आणि कसे जमते ते.
लकुलिश, भैरव, एकपाद अज आणि बाकी तीनचार फॉर्म हे एकदम वेगळे वाटले. सहस्रलिंग व कोटिलिंग हे जबरीच आहे. शिल्पांबद्दल म्हणायचे तर वेरूळची शिल्पे सर्वांत जबराट वाटली.

हा फोटो मी बागडोगराला असलेल्या BSF च्या वसाहतीमध्ये असलेल्या मंदिरातून घेतला आहे. हे मंदिर जनतेसाठीपण खुले आहे. मंदिराच्या परिसरातून पाय हलत नव्हता. इतका छान निसर्ग की........................ बस्स........!!!
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सर्व मूर्ती सहाव्या शतकांनतरच्या आहेत . आठव्या शतकांनतरच्या मूर्ती फार आखीव रेखीव होऊ लागल्या (=सुबक ?)आणि भाव लोप पावले .
गंडकी नदीतल्या काळ्या शाळीग्रामाचा वापर थोडा नंतर सुरू झाल्यावर काही ठिकाणची लिंगे नंतर बदलण्यात आली असावीत .
परकी आक्रमणांत लिंगे फोडली गेल्यावर तेथे नवीन न बसवता "गुप्तलिंग " म्हणू लागले असावेत .(भिमाशंकर ?)
परकी आक्रमणांत लिंगे फोडली गेल्यावर तेथे नवीन न बसवता "गुप्तलिंग " म्हणू लागले असावेत .(भिमाशंकर ?)
सहमत. आज जिथे लिंग दिसत नाही ती बहुतांश मूर्तीभञ्जकांनी भग्न केलेली आहेत. काही मोरीच्या वाटेवर तर काही विहिरीतून पाणी शेंदताना उभे राहण्याच्या जागी बसवली गेलेली.
असेच एक सासवडच्या चांगावटेश्वर मंदिरातील भग्न शिवलिंग. धडधडीतपणे फोडून काढल्याचे दिसत असूनही हे शिवलिंग गुप्त आहे असे तिथल्याच एका फलकावर लिहिलेले आहे.
आताचे शिवाचे स्वरूप हे आर्यांचा रुद्र आणि द्रविडांचा लिंगरूप शिव यांचे एकत्रिकरण असावे असेच दिसते. त्यामुळेच शिवाची उपासना सर्वात व्यापक प्रदेशात होते. नेपाळातील पशुपतीनाथापासून ते थेट रामेश्वरपर्यंत.
सिंधु संस्कृतीच्या उत्खननात सापडलेल्या महत्त्वाच्या गोष्टींमधे पशुपतीस्वरूप त्रिमुखी देवतेचे शिल्प आणि लिंगसदृश शिल्प आहे.
http://www.hindunet.org/hindu_history/sarasvati/html/Trefoil1.htm
http://en.wikipedia.org/wiki/Indus_Valley_Civilization
https://sites.google.com/site/kalyan972/culturallegacy
http://lafinefleurduyoga.over-blog.com/article-16057840.html
इथे त्यांची छायाचित्रे पाहता येतील. अर्थात हा आताच्या स्वरूपातील शिव नाही तर अगदी प्राथमिक काळातील शिवसदृश देवता (पशुपती) आणि आदिम रहिवाशांची लिंगपूजा असावी.
शिवमूर्तींबाबत पं महादेवशास्त्री जोशी यांच्या 'भारताची मूर्तीकला' या पुस्तकात रुद्र हा अग्नितत्त्वापासून उत्पन्न झाला असे वेदातील उल्लेख आणि सिंधुसंस्कृतीतील पशुपती आणि लिंग या शिल्पांबद्दल उल्लेख देऊन पुढे या दोन्हीचे एकत्रित रूप म्हणजे आजचे शिवाचे स्वरूप यबद्दल विस्ताराने लिहिले आहे. या पुस्तकात शिवाच्या मूर्तीबद्दल पं. जोशी म्हणतात, " शाळुंका ही पार्वतीस्वरूप तर शिवलिंग हा महेश्वर. शाळुंकेसहित लिंगाची पूजा केल्याने दोन्हीची पूजा केल्यासारखे होते. शाळुंका कशी निर्माण करावी? शाळुंकेच्या घेराचे ३ प्रकारे आहेत. लिंगाच्या घेराच्या तिप्पट तो अधम, दीडपट तो मध्यम तर चौपट तो उत्तम. शाळुंकेची उंची विष्णुभागाइतकी असावी, तिचा आकार चतुष्कोण, द्वादशकोण, षोडषकोण किंवा गोल असावा. अभिषेक हा शिवलिंगाचा मुख्य उपचार असल्याने शाळुंकेला पन्हळ ठेवणे आवश्यक आहे. शिवलिंग शाळुंकेत स्थापन करताना त्याचे ब्रह्मभाग व विष्णुभाग हे भूमीत जायला हवेत. रुद्रभाग तेवढाच वर असावा."
मूर्तींच्या प्रकारात पं जोशी दक्षिणामूर्ती असा एक प्रकार देतात. तो बुद्धी देणारा आणि सामान्य मानवरूपात दाखवला जातो. आणखी एक प्रकार म्हणजे अर्धनारीश्वर. मूळ लिंग आणि शाळुंका या स्वरूपातील शिवाची मूर्ती बनवायला सुरुवात झाली तेव्हाचे रूप म्हणजे एकाच मूर्तीत सामावलेले शिव आणि पार्वेती.
"नंदी, गणेश, स्कंद, भैरव, पार्वती (दुर्गा) हे शिवाच्या परिवारातील देव आणि त्यांच्या मूर्ती शिवाच्या मूर्तीबरोबर किंवा वेगळ्या बघायला मिळतात."
गोवा आणि कोकणात शिवगणांमधे वेताळ आणि अन्य स्थानिक राखणदार समजले गेलेल्या देवांचा समावेश होतो.
हा लोलये येथील बेताळ.
शिव म्हणा, रुद्र म्हणा कि आणखी काहि. आर्य, अनार्य, द्रविड, वैदीक वगैरे संस्कृतींचे पडसाद त्या त्या काळच्या मुर्तीशास्त्रात आढळतात. पण हि मंदीरे आणि मुर्त्या केवळ काहि कथाबीजांवर आधारीत असतात का? कि त्या प्रदेशाचा राजा, मुर्तीकाराला अभिप्रेत भाव, अॅक्च्युअल स्थापत्य करणार्यांच्या सोयी-एक्स्पर्टीज-मर्यादा, उपलब्ध साधनं, जसं पाषाण वगैरे घटक कंसीडर केल्या जात असतील? सर्वात महत्वाचं म्हणजे प्राचीक काळापासुन अनेक प्रकारच्या उपासना पद्धतींच्या अनाकलनीय प्रॅक्टीस प्राचारात होत्या व आहेत. जर हि मंदीरं त्या विशिष्ट उपासनेकरता बनविली जात असतील, किंवा उपलब्ध मंदीरात एखादी उपासना सुरु करण्यात येत असेल तर त्या मुर्ती किंवा मंदीराच्या रचना व आवार त्या उपासनेला अनुकुल बनवण्यात येत असावं काय? अशी कुठली सिग्नेचर व्यवस्था दिसुन येते का? केवळ मातृभाव, प्रजजन गौरव किंवा शौर्य कौतुक करायला म्हणुन हि मंदीरं बांधण्यात आलि असं वाटत नाहि. व्हॉट माइट बी द अदर साईड?
ह्या मूर्ती शक्यतो ग्रांथिक वर्णनांवर आधारीत असतात. काही मूर्ती चक्क वेदांतील उल्लेखाबरहूकूम बनवलेल्या आहेत. उदा. पाटेश्वरातील अग्नी वृषाची अतिशय दुर्मिळ मूर्ती. पुराणांत, रामायण, महाभारत आदी महाकाव्यांत बरीच वर्णने आली आहेत. त्यानुसारही मूर्टी घडवल्या जातात. अर्थात प्रत्यक्ष पूजेच्या मूर्ती शक्यतो साध्या असून मंदिरांच्या अथवा लेण्यांच्या बाह्यभितींवर पुराणातले प्रसंग कोरलेले आढळतात.
मूर्ती कोरण्याच्या बाबतीत परंपरांचे दोन प्रकारे पालन केलेले आढळते जसे पहिला प्रकार म्हणजे विष्णू, ब्रह्मा, शिव, स्कंद किंवा इतरही बर्याच देवता. यांची लक्षणे सर्व ठिकाणी सारखीच आढळतात. उदा. शिवाच्या हाती त्रिशूळ - डमरू, विष्णूच्या हाती शंख-चक्र. ही परिस्थिती सहसा कुठेच बदलत नाहीच.
तर दुसरा प्रकार म्हणजे लेणी-मंदिरे कोरण्याच्या कलेतील बदल. माझ्या मते भारतात बौद्द लेण्यांपासून प्रेरणा घेण्यात आली. काळानुसार शैलीत बदल दिसत असला तरी मूळ गाभा एकच असल्याचे दिसते.
वेगवेगळ्या राजवटींमध्ये मूर्ती कोरण्यात फरक असला तरी मूळ मूर्तीची लक्षणे तीच असल्याचे दिसते. राष्ट्रकूट कला ही सहसा द्राविड पद्धतीची दिसते साहजिकच त्यांनी ऐहोळे, पट्टदकल, महाबलीपुरम इत्यादी प्राचीन मंदिरांच्या शैलीवरून प्रेरणा घेतल्याचे दिसते. तर होयसाळांनी मूळ गाभा तोच ठेवून मूर्ती अतिशय सालंकृत करून नवीनच होयसाळ शैली निर्माण केली जी आज होयसाळ स्कूल म्हणून ओळखली जाते. अर्थात ह्यात तिकडच्या ग्रेनाईट दगडाचा पण तितकाच महत्वाचा वाटा.
सहासा ही मंदिरे सर्वसाधारण उपासनेसाठी बनवली जात असावेत. प्रसंग कोरण्याचा सर्वात मोठा हेतू मला असा वाटतो म्हणजे त्याकाळी बौद्ध धर्माच्या वाढत्या प्रसारामुळे मूळ वैदिक धर्मापासून दूर जाणार्या जनतेला परत आपल्या धर्माकडे वळवून घेणे. अर्थात त्याचा बौद्ध धर्मावर प्रतिकूल परिणाम झालाच. वेरूळसारख्या तिभव्य लेण्याच्या निर्मितीनंतर अजिंठा जवळजवळ विस्मृतीत गेले.
माझ्या मते तरी धर्मप्रसारासाठीच आणि त्यानंतर वेगवेगळ्या राजवटींशी असलेल्या स्पर्धेतून देखणी मंदिरे उभारली गेली. उपासना हा हेतू बहुधा गौणच होता.
अर्थात हिंदूंमध्ये तेव्हाही तंत्र उपासना चालत होतीच पण सहसा यासाठी जनतेपासून फटकून असणार्या, एकाकी, निर्जन जागांचा उपयोग केला गेला. उदा: पाटेश्वर.
थोडे धार्ष्ट्य : वेगवेगळ्या प्रदेशांतील मूर्तींचे चेहरे पहाताना त्या त्या प्रदेशातील लोकांच्या चेहरेपट्टीशी ते मिळतेजुळते वाटतात. उदा.राणीवाव या लेखांतल्या स्त्रीमूर्ती या पातळ ओठांच्या आणि सडपातळ बाहू-दंड-मांड्यादि अवयवांच्या वाटतात. जैनांच्या महावीरमूर्तीचे ओठ हे अगदी वेगळे असतात. म्हणजे वरच्या ओठाच्या दोन पाकळ्या अर्धगोलाकार वरती वळलेल्या वगैरे. वेगवेगळ्या देशांतील बुद्धप्रतिमा पहातानाही असेच वाटते. दक्षिण भारतातील स्त्रीमूर्ती अतिसौष्ठवपूर्ण आणि धष्टपुष्ट वाटतात. हा माझा दृष्टिभ्रम आहे की खरेच असे काही असू शकते?
चित्रकलेतही वेगळ्या वंशाच्या लोकांनी काढलेली भारतीयांची चित्रे वेगळी म्हणून ओळखू येतात. अपरे आणि पातळ नाक, गोलसर (आपल्याकडले मीन, हरिण वगैरेसारखे लांबट असतात) डोळे ,लांब मान, उतरता आणि विस्तृत स्कंधप्रदेश असा थोडा वेगळेपणा दिसतो. असो. मूर्तिशास्त्राचा काहीच अभ्यास नाही तेव्हा इथेच थांबावे हे बरे.
आपल्या' माणसासारखी मार्तंड भैरवाची मुर्ती - राजेंद्र गलांडे.
मूर्ती मालिका - २५
अग्नीचा एडका, कुबेराचा मुंगूस, इंद्राचा ऐरावत.... ही वाहनसाखळी ठरवतांना काही लॉजिक असते का मूर्तिशास्त्रात ?
अग्नीचा एडका, कुबेराचा मुंगूस, इंद्राचा ऐरावत.... ही वाहनसाखळी ठरवतांना काही लॉजिक असते का मूर्तिशास्त्रात ?
अर्थातच.
उदा. यज्ञात अग्नीला हवि अर्पण केला जातो. तो मुख्यतः बोकडाशी संबंधित असल्याने एडका हे अग्नीचे वाहन ठरवले गेले. " अजापुत्रम बली दद्यात" हे तर प्रसिद्धच आहे. वायूचे वाहन हरीण हे हरिणाच्या वेगाने धावण्याच्या असलेल्या पद्धतीमुळेच बनवले गेले. ऐरावत हा समुद्रमंथनातून बाहेर पडला आणि इंद्रानेते वाहन म्हणून स्वीकारले. वरुण ही जलदेवता, साहजिकच मगर हे त्याचे वाहन झाले.
येथे एक नमूद करावेसे वाटते, कुबेराचे वाहन हे मुंगूस नव्हे, मुंगूस हे धनाचे प्रतीक असल्याने ते कुबेरासोबत असते. कुबेर हा नरवाहन. तो यक्षांचा अधिपती.
एकंदरीत त्या त्या देवतांच्या स्वभावामुळे किंवा पौराणिक कथेत असलेल्या प्रसंगामुळे त्या त्या देवतांना विशिष्ट वाहने मिळाली आहेत.
कुबेराचे वाहन हे मुंगूस नव्हे, मुंगूस हे धनाचे प्रतीक असल्याने ते कुबेरासोबत असते. कुबेर हा नरवाहन. तो यक्षांचा अधिपती.
वल्ली उर्फ प्रचेतस, कुबेर या विषयावरच अधिक माहिती देणारा धागा काढावा ही विनंती ! तुम्ही दिलेल्या फोटोत धनाची थैली आणि मुंगस मला का दिसत नाही ते कळेना !
धागा नेहमी प्रमाणेच उत्तम आहे ! :)
जाता जाता :- का कोणास ठावूक परंतु लोक दिवाळीत लक्ष्मी पुजनाच्या दिवशी कुबेर पुजन करायचे विसरत चालले आहेत का ? असे वाटते.
या दिवशी गणपती-लक्ष्मी आणि कुबेर यांचे पुजन एकत्रीत करणे महत्वाचे असते.
तुम्ही दिलेल्या फोटोत धनाची थैली आणि मुंगस मला का दिसत नाही ते कळेना !
कुबेराच्या खांद्यावरुन डोक्यावरुन जाणारी एक फुगीर भाग असलेली लांबलचक माळ दिसेल तीच धनाची थैली. ह्याच्या एका टोकाला मुंगुसाचे शिर व दुसर्या टोकाला फुगीर भाग दाखवलेला आहे तीच धनाची थैली.
२४ अवतार म्हणजे २४ रुपांतरे. शंख, चक्र, गदा, पद्म या लक्षणांच्या क्रमानुसार त्यांची विविध नावे ठरतात.
उदा.
केशव- (डावीकडून)पद्म, शंख, चक्र, गदा
नारायण - शपगच
माधव-गचशप
अशी गोविंद, विष्णू, मधूसूदन अशी संध्येतील २४ नावे.
http://www.misalpav.com/node/50494

























































































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