Tuesday, March 11, 2025

हनुमान , ब्रम्हदेव मुर्ती शास्त्र

 

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ब्रह्मा


ब्रह्मा

ब्रह्मा हिन्दू धर्म के त्रिदेवों में से एक हैं। ये सृष्टिकर्ता हैं जो पालनहार नारायण एवं संहारक शिव के साथ त्रिमूर्ति को पूर्ण करते हैं। इन्हे हिरण्यगर्भ कहा जाता है क्यूँकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्म-अण्ड (ब्रम्हांड) से मानी जाती है। समस्त सृष्टि का सृजन करने के लिए इन्हे परमपिता भी कहा जाता है। हालाँकि ये त्रिदेवों में एक हैं लेकिन आधुनिक युग में इन्हे अन्य दो देवों विष्णु एवं शिव के जितना महत्त्व और सम्मान नहीं दिया जाता जो कि बिलकुल भी सही नहीं है। रही सही कसर आज कल के फालतू धार्मिक टीवी शोज ने पूरी कर दी है।

वास्तविकता ये है कि वेदों एवं पुराणों में ब्रह्मा का महत्त्व विष्णु एवं शिव से किसी भी मामले में कम नहीं है और इन तीनों को एक दुसरे का पूरक और समकक्ष माना जाता है। हालाँकि इनकी उत्पत्ति निर्विवाद रूप से शिव और विष्णु के बाद मानी गयी है लेकिन कहीं कहीं सदाशिव के साकार रूप रूद्र को ब्रह्मा से उत्पन्न माना गया है। ऐसी मान्यता है कि सदाशिव (परब्रह्म अथवा शिव का निराकार रूप) ने विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति के बाद स्वयं त्रिदेवों को पूर्ण करने के लिए एवं संहार का उत्तरदायित्व सँभालने के लिए रूद्र के रूप में उत्पन्न हुए।

ब्रह्मा को स्वयंभू माना गया है जिसका अर्थ है स्वयं उत्त्पन्न होने वाला। जब जगत में कुछ नहीं था, केवल अंधकार था तो ब्रम्हाण्ड रुपी अंडे को चीर कर एक अनंत प्रकाश रुपी पाँच सर एवं चार भुजाओं वाले ब्रह्मा का जन्म हुआ जो एक कमल पर विराजमान थे। अपने जन्म से आश्चर्यचकित ब्रह्मा ने अपने उत्पत्ति का कारण जानने के लिए उस कमल-दण्ड को पकड़ कर नीचे आरम्भ किया किन्तु १००० वर्षों तक लगातार चलने के बाद भी वे उसके अंत तक नहीं पहुँच सके। अंततः हार कर वे वापस उसी कमल पर अपने जन्म के कारण पर चिंतन करने लगे। 

तभी उन्हें एक स्वर सुनाई दिया "तपस... तपस..." उस स्वर से प्रभावित हो वे तपस्या में लीन हो गए। इस तपस्या को सृष्टि की पहली तपस्या का सम्मान प्राप्त है और इसे "आदि-तप" भी कहा गया है। अनंत काल तक (कहीं-कहीं १००० वर्षों का वर्णन है) तपस्या करने के पश्चात उन्हें अनंत क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर लेटे नारायण के दर्शन हुए।

नारायण ने उनसे कहा कि "हे आदिपुरुष! आपने अनंत तप कर समस्त प्रकार के ज्ञान को प्राप्त किया है। बुद्धि, बल और तेज में आप स्वयं मेरे समान ही हैं। मेरे दर्शन से आपमें सृजन की शक्ति आ गयी है अतः हे देव अब आप अपने मानस शक्ति से इस जगत की रचना करें।" भगवान विष्णु से एक प्रकार की प्रेरणा पाकर ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया। अपनी वाक्-शक्ति से उन्होंने सबसे पहले अपने चारो मुख से चार वेदों को उत्पन्न किया और अपने चार हाथों में स्वयं उसे धारण किया। 

उन्होंने इसके बाद कई बार अपने मानस शक्ति से ब्रम्हाण्ड की रचना करने का प्रयास किया किन्तु असफल रहे। ये देख कर उन्होंने एक बार फिर नारायण का ध्यान किया और उनसे सहायता माँगी। ब्रह्मदेव की व्यथा सुन कर भगवान विष्णु ने उन्हें मैथुनी सृष्टि बनाने का सुझाव दिया।

तब उन्होंने अपने प्रथम १६ मानस पुत्रों को उत्पन्न किया जो प्रजापति कहलाये। इनमे से सात प्रथम ऋषि सप्तर्षि कहलाये। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक कन्या शतरूपा की भी उत्पत्ति की। ये हैं - 

  1. मुख से अंगिरस
  2. नेत्र से अत्रि
  3. कर्ण से पुलस्त्य
  4. नाभि से पुलह
  5. हाथ से क्रतु
  6. प्राण से वशिष्ठ
  7. मन से मरीचि
  8. अंगूठे से दक्ष
  9. गोद से नारद
  10. छाया से कर्दम
  11. इच्छा से सनक 
  12. इच्छा से सनन्दन 
  13. इच्छा से सनातन 
  14. इच्छा से सनत्कुमार
  15. शरीर के दाहिने भाग से स्वयंभू मनु एवं वाम भाग से शतरूपा 
  16. ध्यान से चित्रगुप्त

सबसे पहले उन्होंने सनत्कुमारों को मैथुनी सृष्टि कर संतान उत्पत्ति करने की आज्ञा दी किन्तु नारद ने सनत्कुमारों को वैराग्य की शिक्षा देकर विरक्त कर दिया। इससे क्रोधित हो ब्रह्मा ने उन्होंने नारद को सदैव भटकते रहने का श्राप दे दिया। 

उन्होंने फिर से सृष्टि के निर्माण आरम्भ किया। वे ये समझ गए कि पुरुष और नारी के संयोग से ही सृष्टि का विस्तार हो सकता है। इसी कारण उन्होंने मनु और शतरूपा को विवाह कर संतानोत्पत्ति करने की आज्ञा दी। इन्ही की मैथुनी सृष्टि से हमारा जन्म हुआ और मनु के नाम पर ही हम मानव कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त दक्ष की पुत्रियों और कर्दम ऋषि की संतानों से संसार का अनंत विस्तार हुआ। 

ब्रह्मा पूरे जगत के पिता हैं अतः वे सभी के लिए सम्माननीय हैं। इसी कारण देव-दैत्य सभी अपनी समस्याओं के निदान हेतु उन्ही के पास आते हैं। सावित्री, सरस्वती और वेदमाता गायत्री को ब्रह्मा की पत्नी माना गया है। इनका वाहन हंस है। 

वेदों में कहा गया है कि जो कोई और नहीं दे सकता वो केवल त्रिदेवों से प्राप्त हो सकता है। ब्रह्मा, भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर के समान हर प्रकार वरदान देने में सक्षम हैं। यही कारण है कि कई दैत्य भी इनसे अमरता का वरदान पाने को लालायित रहते थे किन्तु उन्होंने कभी किसी को अमरता का वरदान नहीं दिया। ब्रह्मा ही समय-समय पर भगवान विष्णु को पृथ्वी के उद्धार के लिए अवतार लेने के लिया प्रेरित करते हैं।

हालाँकि भगवान विष्णु और भगवान शंकर की तरह ब्रह्मदेव अवतार नहीं लेते किन्तु फिर भी उनके कुछ अवतारों का वर्णन है। श्रीहरि के दशावतार की तरह ही ब्रह्मा के सप्तवतार प्रसिद्ध हैं, जिन्हे ब्रह्मवातार भी कहते हैं। ये हैं -

  1. वाल्मीकि अवतार
  2. कश्यप अवतार
  3. दत्तात्रेय अवतार
  4. लक्ष्मण अवतार
  5. व्यास अवतार
  6. बलराम अवतार
  7. कालिदास अवतार

ब्रह्मा का पाँचवा मस्तक और पूजा अधिकार से बहिष्कार

वैसे तो ब्रह्मा के पाँच सर का वर्णन आता है किन्तु उनका चार सर वाला स्वरुप ही प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त विष्णु एवं शिव की अपेक्षा उनकी पूजा बहुत कम की जाती है। ना ही वैष्णव अथवा शैव की तरह उनका कोई अपना संप्रदाय है। हालाँकि ब्रह्मा जी की उपासना का भी एक विशिष्ट सम्प्रदाय है, जो वैखानस सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इस वैखानस सम्प्रदाय की सभी सम्प्रदायों में मान्यता है। पुराणादि सभी शास्त्रों के ये ही आदि वक्ता माने गये हैं। भारत में उनका एकमात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में है। इसके पीछे कई कथा का वर्णन आता है।

  • कहा जाता है कि मनु की उत्पत्ति के बाद जब उन्होंने उसकी पत्नी के रूप में शतरूपा की रचना की तो उसकी सुंदरता पर मुग्ध हो गए। शतरूपा उनकी दृष्टि से बचने के इधर-उधर भागने लगी किन्तु वे जहाँ भी जाती ब्रह्मा अपने चारों सिरों से उसे देखते रहते। तब शतरूपा आकाश की ओर चली गयी जिस कारण ब्रह्मा ने आकाश की ओर अपना एक और सर उत्पन्न कर लिया जिस कारण शतरूपा का छिपा रहना असंभव हो गया। जब महादेव ने ब्रह्मा को अपनी पुत्री पर कुदृष्टि डालते देखा तो उन्होंने दण्ड-स्वरुप उनका पाँचवा सर काट दिया।
  • एक और वर्णन के अनुसार ब्रह्मा के पाँच सरों में से चार महादेव की स्तुति करते थे किन्तु एक सर उनकी निंदा करता था जिस कारण महादेव ने वो सर काट दिया। इस कारण ब्रह्मा का पुत्र दक्ष महादेव का घोर विरोधी हो गया और उसके द्वेष के कारण सती को अपने प्राण त्यागने पड़े।
  • एक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा एवं विष्णु में उनकी महानता को लेकर विवाद हो गया। तभी उनके बीच एक ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई की जो भी इसका छोर ढूढ़ लेगा वो महान कहलायेगा। ब्रह्मा हंस के रूप में ऊपर तथा विष्णु वराह के रूप में नीचे गए किन्तु हजारों वर्षों के बाद भी उन्हें उस शिवलिंग का छोर ना मिला। हारकर विष्णु ने कहा कि मैं छोर धुंध नहीं पाया किन्तु ब्रह्मा ने झूठ कह दिया कि उन्हें ऊपरी छोर मिल गया। उन्हें अपने मुख से असत्य कहते लज्जा आई इसी कारण उन्होंने अपना पाँचवा सर से झूठ बोला। तब महादेव ने असत्य वचन बोलने के कारण उनका वह मस्तक काट दिया और पूजित ना होने का श्राप दिया।
  • एक बार कामदेव ने ब्रह्मा द्वारा दिए काम-बाण उन्ही पर चला दिए जिससे वे अपनी पुत्री सरस्वती पर ही मुग्ध हो गए। तब शिव ने इस कृत्य के लिए उन्हें पूजित ना होने का श्राप दिया। चेतन होने पर ब्रह्मा ने भी कामदेव को महादेव के द्वारा भस्म होने का श्राप दे दिया।
  • एक कथा के अनुसार भगवान शिव और पार्वती के विवाह में ब्रह्मा ही ब्राम्हण रूप में विवाह करवा रहे थे। पार्वती ने अपना मुख घूँघट में ढका हुआ था किन्तु ब्रह्मा उनका मुख देखना चाहते थे। इस कारण उन्होंने हवनकुण्ड में गीली लकड़ी डाल दी जिससे धुआँ हुआ और देवी पार्वती ने अपना घूँघट उठा दिया। ब्रह्मा उनके सौंदर्य को देखते ही रह गए। जब शिव ने ऐसा देखा तो उन्होंने ब्रह्मदेव की पूजा ना होने का श्राप दे दिया।
  • एक बार ब्रह्मा पुष्कर में एक यज्ञ कर रहे थे जिसमे सरस्वती समय पर नहीं पहुँच पायी। बिना पत्नी के यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता था इसीलिए ब्रह्मा ने गायत्री की रचना की और उनसे विवाह किया। जब सरस्वती यज्ञ-स्थल पहुँची और वहाँ गायत्री को बैठे देखा तो क्रोध में उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया कि इस स्थान के अतिरिक्त आपकी पूजा और कही नहीं होगी।
  • एक और कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु ब्रह्मा के रूप पर आसक्त हो गए और मोहिनी रूप लेकर उनके आये। मोहिनी ने ब्रह्मा की तपस्या भंग कर दी और उससे बचने के लिए ब्रह्मा श्रीहरि को याद करने लगे। तभी वहां सप्तर्षि आये और उन्होंने पूछा कि ये कन्या क्यों यहाँ बैठी है? तब ब्रह्मा ने कहा कि ये नृत्य करते हुए थक गयी है और पुत्री भाव से मेरे पास बैठी है। तब मोहिनी ने क्रुद्ध होकर उन्हें श्राप दिया कि उनकी पूजा कही और नहीं होगी।
  • एक और कथा का वर्णन आता है जब ब्रह्मा के पांचवें सर ने भैरव के सामने महादेव का अपमान कर दिया। तब इससे क्रुद्ध होकर भैरव ने अपनी छोटी अंगुली के नाख़ून से ब्रह्मा का पांचवां सर काट दिया। 

ब्रह्मा की आयु

ब्रह्मा की आयु हिन्दू धर्म के सबसे रोचक तथ्यों में से एक है। यहाँ बस उसका सार दिया जा रहा है:

  • मनुष्यों के ३६० वर्षों का देवों और दैत्यों का १ वर्ष होता है जिसे "दिव्य वर्ष" कहते हैं।
  • १२००० दिव्य वर्षों का १ चतुर्युग होता है जिसे महायुग भी कहते हैं।
    • ४८०० दिव्य वर्षों का सतयुग होता है।
    • ३६०० दिव्य वर्षों का त्रेतायुग होता है।
    • २४०० दिव्य वर्षों का द्वापरयुग होता है।
    • १२०० दिव्य वर्षों का कलियुग होता है।
  • ७१ महायुग का १ मन्वन्तर होता है जिसमें एक मनु शासन करते हैं। 
  • १४ मन्वन्तरों या १००० महायुगों का १ कल्प होता है जो ब्रह्मा का दिन कहलाता है। इसी प्रकार १ कल्प की ब्रह्मा की रात्रि होती है। ब्रह्मा के आधे दिन (१ कल्प) में १४ मनु शासन करते हैं।
  • ७२० कल्पों का ब्रह्मा जी का १ वर्ष होता है जिसे ब्रह्मवर्ष कहते हैं। 
  • ५० ब्रह्मवर्षों का १ परार्ध होता है। 
  • २ परार्ध अथवा ब्रह्मा के १०० वर्ष को महाकल्प कहा जाता है। 
  • ब्रह्मा के १००० दिनों का विष्णु जी की १ घटी होती है। 
  • श्रीहरि के १२००००० घटियों का भगवान शिव की अर्धकला होती है। 
  • महादेव के १००००००००० अर्धकलाओं का एक ब्रह्माक्ष होता है।
  • हम अभी ब्रह्मा के ५१ वें वर्ष में, सातवें (वैवस्वत) मनु के शासन में, श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, अठ्ठाईसवें कलियुग के प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में विक्रम संवत २०७६ में हैं। इस प्रकार अब तक १५५५२१९७१९६१६३२ (पंद्रह नील पचपन खरब इक्कीस अरब सत्तानवे करोड़ उन्नीस लाख इकसठ हजार छः सौ बाइस वर्ष वर्तमान ब्रह्मा को सृजित हुए हो गये हैं।

ब्रह्मा के अस्त्र

ब्रह्मा के तीन सबसे प्रमुख अस्त्र माने जाते हैं:

  1. ब्रह्मास्त्र: ये सर्वाधिक प्रसिद्ध अस्त्र माना जाता है। ये ब्रह्मा के १ मुख का प्रतिनिधित्व करता है। प्राचीन काल में कई योद्धा ऐसे थे जिनके पास ब्रह्मास्त्र था। जिनके पास ब्रह्मास्त्र होता था वे सीधे महारथी की श्रेणी में आ जाते थे। इसका समकक्ष अस्त्र भगवान विष्णु का वैष्णव अस्त्र और भगवान शंकर का रुद्रास्त्र है। ब्रह्मास्त्र को केवल ब्रह्मास्त्र से ही रोका जा सकता था किन्तु जहाँ दो ब्रह्मास्त्र टकराते थे वहां १२ वर्षों तक भयानक दुर्भिक्ष पड़ता था। ऐसा ही एक मौका आया था जब अर्जुन और अश्वत्थामा ने अपने अपने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिए थे। महर्षि वेदव्यास और देवर्षि नारद ने उन्हें टकराने से बचाया। इस विषय में विस्तार से यहाँ पढ़ें। 
  2. ब्रह्मशिरा: ये ब्रह्मास्त्र से ४ गुणा अधिक शक्तिशाली अस्त्र था जो ब्रह्मा के ४ मुखों का प्रतिनिधित्व करता था। इतिहास में कुछ चुनिंदा योद्धा ही थे जिनके पास ये अस्त्र था। परशुराम उन्ही में से एक थे। कुछ ग्रंथों में द्रोण, अर्जुन और अश्वत्थामा के पास ब्रह्मशिरा होना बताया गया है किन्तु ये सत्य नहीं है। उनके पास ब्रह्मास्त्र थे, ब्रह्मशिरा नहीं। भगवान विष्णु का नारायणास्त्र और महादेव का पाशुपतास्त्र ब्रह्मशिरा के समक्ष महास्त्र थे। ऐसा वर्णित है कि जिस स्थान पर दो ब्रह्मशिरा अस्त्र टकराते हैं वहां १२ दिव्य वर्षों (४३२० मानव वर्षों) तक वर्षा नहीं होती थी।
  3. ब्रह्माण्ड अस्त्र: ये ब्रह्मास्त्र से ५ गुणा अधिक शक्तिशाली अस्त्र था जो ब्रह्मा के ५ मुखों का प्रतिनिधित्व करता है। इतिहास ने केवल महर्षि वशिष्ठ ही थे जिनके पास ये अस्त्र था। इसी अस्त्र से वसिष्ठ ने विश्वामित्र के ब्रह्मास्त्र को पी लिया था। भगवान विष्णु का विष्णुज्वर एवं महादेव का माहेश्वरज्वर (शिवज्वर) इसके समकक्ष दिव्यास्त्र हैं।

ऐसा माना जाता है कि पूरे विश्व में केवल पुष्कर में ब्रह्मा का मंदिर है किन्तु ये सत्य नहीं है। पुष्कर निश्चित रूप से ब्रह्मा का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण मंदिर है किन्तु इसके अतिरिक्त भी राजस्थान में ही बारमेर जिले के आसोतरा गांव में ब्रह्मा का एक मंदिर है जिसे खेतेश्वर ब्रह्मधाम तीर्थ कहते हैं। केरला के उथमार कोवली नमक जगह में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के साथ त्रिमूर्ति रूप में पूजे जाते हैं जिसे थ्रिपया त्रिमूर्ति मंदिर कहते हैं। 

तमिलनाडु के कुंबकोणम गांव में ब्रह्मा का ब्रह्मापुरीईश्वर मंदिर है। आंध्र प्रदेश के श्रीकालाहस्ती नामक स्थान पर ब्रह्ममंदिर है। इसके अतिरिक्त आंध्रप्रदेश के ही चेब्रोलू नमक जगह पर ब्रह्मा का चतुर्मुख मंदिर है। गोवा के करम्बोलिम नामक स्थान पर ब्रह्मा का एक तीर्थ है। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के मंगलवेढा गांव में तथा मुंबई के निकट नाला सुपारा में भी ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित है। इसके अतिरिक्त गुजरात के खेड़ब्रह्म, कानपुर में ब्रह्म कुटीर मंदिर, हिमाचल प्रदेश के खोखन, आँध्रप्रदेश के अनंतपुर एवं तमिलनाडु के होसुर में भी ब्रह्मदेव के उल्लेखनीय मंदिर हैं। यही नहीं विदेश में भी ब्रह्मा के मंदिर हैं। 

संसार के सबसे बड़े मंदिर कम्बोडिया के अंगकोरवाट मंदिर में ब्रह्मा की प्रतिमाएं हैं। इंडोनेशिया का प्रम्बानन मंदिर ब्रह्मा के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बैंकाक (थाईलैंड) के इरावन तीर्थ में ब्रह्मा का भव्य मंदिर है। थाईलैंड में ब्रह्मा को "फ्रा-फ्रॉम" के नाम से बुलाया जाता है। म्यानमार जिसका पुराना नाम बर्मा था वो ब्रह्मा के नाम पर ही रखा गया था जिसका प्राचीन नाम ब्रह्मदेश था। यही नहीं चीन के लोक-कथाओं में भी ब्रह्मा का वर्णन आता है जहाँ उन्हें "सिमीएनसेन" कहा जाता है और उनके कई मंदिर हैं।

।। जय ब्रह्मदेव ।।






Pushkar Mandir

हमारे देश में विष्णु जी और शिव जी के कई सारे मंदिर हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मा जी का पूरे भारत में केवल एक ही मंदिर है. ब्रह्मा जी का यह मंदिर राजस्थान के पुष्कर में स्थित है, जिसको ब्रह्मा मंदिर के नाम से जाना जाता है. ब्रह्मा जी को सृष्टि के रचयिता के रूप में जाना जाता है. तो चलिए जानते हैं कि आखिर क्यों पूरे भारत में यह ब्रह्मा जी का एक मात्र मंदिर है और क्या है इसके पीछे की कहानी. 

पुष्कर मंदिर की कहानी

पद्म पुराण के मुताबिक, एक बार धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था. उसके अत्याचार इतने बढ़ गए थे कि ब्रह्मा जी को तंग आकर उसका वध करना पड़ा. जब वो उसका वध कर रहे थे, तब ब्रह्मा जी के हाथों से धरती की तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा. जहां-जहां तीन कमल गिरे, वहां पर तीन झीलें बन गईं. उनमें से एक स्थान का नाम पुष्कर पड़ा. फिर संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने यहीं पर यज्ञ करने का फैसला किया.

यज्ञ करने के लिए ब्रह्मा जी पुष्कर पहुंच गए. इस यज्ञ में पत्नी का बैठना जरूरी था, लेकिन सावित्री को पहुंचने में देरी हो गई. पूजा का शुभ मुहूर्त बीतता जा रहा था. सभी देवी-देवता एक-एक करके यज्ञ स्थली पर पहुंचते गए. लेकिन सावित्री का कोई अता-पता नहीं था.

कहते हैं कि जब शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब कोई उपाय न देखकर ब्रह्मा ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ पूरा किया. उधर सावित्री जब यज्ञस्थली पहुंचीं, तो वहां ब्रह्मा के बगल में गायत्री को बैठे देख क्रोधित हो गईं और उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे दिया. सावित्री का गुस्सा इतने में ही शांत नहीं हुआ. उन्होंने विवाह कराने वाले ब्राह्मण को भी श्राप दिया कि चाहे जितना दान मिले, ब्राह्मण कभी संतुष्ट नहीं होंगे. गाय को कलियुग में गंदगी खाने और नारद को आजीवन कुंवारा रहने का श्राप दिया. अग्निदेव भी सावित्री के कोप से बच नहीं पाए. उन्हें भी कलियुग में अपमानित होने का श्राप मिला.

सभी ने माता सावित्री से विनती की कि वो इस श्राप को वापस ले लें. लेकिन उन्होंने नहीं लिया. जब उनका गुस्सा शांत हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी. अगर कोई दूसरा व्यक्ति आपका मंदिर बनाएगा तो उस मंदिर का विनाश हो जाएगा. इस कार्य में विष्णु जी ने भी ब्रह्मा जी की मदद की थी. इसी के चलते देवी सरस्वती ने भी विष्णु जी को श्राप दिया कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा. इसी कारण विष्णु जी ने श्री राम का अवतार लिया और 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था.

पुष्कर मंदिर की वास्तुकला

पूरे भारत में पुष्कर मंदिर ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर है. ब्रह्मा जी का यह मंदिर 2000 साल पुराना माना गया है. ऐसी मान्यता भी है कि मंदिर निकट स्थित पुष्कर झील ब्रह्मा जी द्वारा बनाई गई थी जिसमें लोग स्नान करते हैं.



Pushkar Brahma Temple: A Unique Temple for the Lord of Creation

V Subhadra

जगतपिता ब्रह्मा मंदिर , जिसे आमतौर पर ब्रह्मा मंदिर के नाम से जाना जाता है , राजस्थान के पुष्कर शहर में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है । इसे दुर्लभ माना जाता है क्योंकि यह भगवान ब्रह्मा, हिंदू सृष्टि के देवता को समर्पित बहुत कम मंदिरों में से एक है। अरावली पहाड़ियों की गोद में स्थित पुष्कर अजमेर शहर से 15 किलोमीटर दूर है।

यह मंदिर पवित्र पुष्कर झील के तट पर स्थित है और हर साल होने वाले जीवंत और पवित्र पुष्कर ऊंट मेले की मेज़बानी करता है । माना जाता है कि देवता और मंदिर की संरचना पौराणिक ऋषि विश्वामित्र द्वारा बनाई गई थी। आप सवारी के साथ पुष्कर में कार किराए पर लेकर इस मंदिर में जा सकते हैं और एक सुखद सवारी का आनंद ले सकते हैं। ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में करने के लिए चीजों के बारे में यह गाइड आपको इस पवित्र स्थान की यात्रा की योजना बनाने के लिए सभी आवश्यक जानकारी और विवरण प्रदान करेगी।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में करने योग्य गतिविधियाँ

विषयसूची

  1. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के बारे में
  2. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में करने योग्य गतिविधियाँ
  3. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में उत्सव
  4. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के निकट घूमने योग्य स्थान
  5. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के पास खाने की जगहें
  6. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर की यात्रा की योजना कैसे बनाएं?
  7. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर तक कैसे पहुंचें?
  8. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में होटल और रिसॉर्ट
  9. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर से ली गई सबसे ऊंची सड़क यात्राएं
  10. उपयोगी कड़ियां

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के बारे में

जगपिता ब्रह्मा मंदिर
जगपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर

पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर लगभग 2000 साल पुराना माना जाता है। पवित्र पुष्कर झील के साथ, यह “राजस्थान का गुलाब उद्यान” है। यह शहर अपने सर्वोत्कृष्ट राजस्थानी दृश्यों और वाइब्स के लिए जाना जाता है, मंदिरों और बाजारों से लेकर झीलों और विरासत स्थलों तक। 

पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर: इतिहास

पुष्कर में 500 से ज़्यादा मंदिर हैं, जिनमें 80 बड़े मंदिर और कई धार्मिक स्थल (मुगल बादशाह औरंगज़ेब के शासन के दौरान नष्ट किए गए मंदिरों से फिर से बनाए गए) शामिल हैं। केंद्रीय ब्रह्मा मंदिर का ' गर्भगृह ' - पत्थर और संगमरमर के स्लैब से बना है - 14वीं सदी का है। माना जाता है कि इस संरचना का निर्माण महान ऋषि विश्वामित्र ने किया था। आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार किया और रतलाम के महाराजा जावत राज ने वर्तमान संरचना को संशोधित किया। 

मंदिर में लाल रंग से रंगा हुआ शिखर (या पतला मंदिर का शीर्ष) है जिस पर हंस (हंस) की आकर्षक आकृति बनी हुई है। पुष्कर झील और ब्रह्मा मंदिर दुनिया भर में दस सबसे धार्मिक स्थलों में से एक हैं और हिंदुओं के पाँच पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक हैं।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के देवता

ब्रह्मा मंदिर देवता
ब्रह्मा मंदिर देवता

पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर भगवान ब्रह्मा को समर्पित है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मांड के निर्माता हैं। ब्रह्मा हिंदू देवताओं में पवित्र त्रिदेवों में से एक हैं - विष्णु, संरक्षक, और शिव, संहारक के साथ। 

मंदिर की ब्रह्मा की मूर्ति संगमरमर से बनी है। इसमें चार सिर वाले देवता (चार वेदों का प्रतीक) को दर्शाया गया है, जो एक पैर पर पैर रखकर बैठे हैं। मूर्ति में उनकी पत्नी गायत्री भी शामिल हैं, जो वेदों की देवी हैं। 

यात्रा पत्रिका: भारत अनमैप्ड

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर की यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय

ब्रह्मा मंदिर में जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी तक सर्दियों के महीनों के दौरान होता है, जब मौसम सुहावना और दर्शनीय स्थलों की यात्रा के लिए आदर्श होता है। यह अवधि पुष्कर ऊंट मेले के साथ भी मेल खाती है - जो इसे यात्रा के लिए एक रोमांचक समय बनाती है।

पुष्कर की गर्मियाँ बहुत गर्म होती हैं, अक्सर 40 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा; उन्हें हर कीमत पर टाला जाना चाहिए। जुलाई से सितंबर तक मानसून के मौसम में मध्यम बारिश होती है, लेकिन शहर में भीड़ कम रहती है - जो एक शांतिपूर्ण अनुभव प्रदान करता है।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर के बारे में कम ज्ञात तथ्य

राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर के बारे में कुछ कम ज्ञात तथ्य हैं:

  • ऐसा कहा जाता है कि पुष्कर झील भगवान ब्रह्मा के कमल की एक पंखुड़ी से बनी है, जो इसे मंदिर से अमिट रूप से जोड़ती है।
  • प्राचीन ग्रंथों में पुष्कर झील को “तीर्थ-राज” कहा गया है, जिसका अर्थ है पवित्र जल निकायों का राजा। इसके चारों ओर तीर्थयात्रियों के लिए 52 स्नान घाट हैं।
  • ब्रह्मा मंदिर के गर्भगृह में भगवान ब्रह्मा और उनकी पत्नी देवी गायत्री (सरस्वती नहीं) की छवि है। ब्रह्मा मंदिरों के लिए यह असामान्य बात है।
  • पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव में सन्यासियों की बड़ी भागीदारी होती है और हर साल दुनिया भर से हज़ारों श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं।
  • पुष्कर झील और ब्रह्मा मंदिर को विश्व के दस सर्वाधिक धार्मिक स्थलों में से एक तथा पांच पवित्र हिंदू तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। 

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में दर्शन का समय

ब्रह्मा मंदिर में दर्शन के समय को जानने से आपको मंदिर के आध्यात्मिक माहौल को इसके सबसे पवित्र क्षणों में अनुभव करने में मदद मिलती है। मंदिर का कार्यक्रम आगंतुकों को आरती, दर्शन आदि में भाग लेने और आशीर्वाद लेने के कई अवसर प्रदान करता है।

दर्शन प्रकार सुबह का समय शाम का समय
सामान्य दर्शन सुबह 5:30 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक दोपहर 3:00 बजे से रात 9:00 बजे तक
मंगल आरती सूर्योदय से पहले सुबह 5:30 बजे से सुबह 6:00 बजे तक
संध्या आरती सूर्यास्त के बाद शाम 6:30 बजे से शाम 7:30 बजे तक
विशेष पूजा 7:00 AM–9:00 AM 7:00 PM–8:00 PM

Things to Do in Brahma Temple, Pushkar

पुष्कर झील
Pushkar Lake

There are several things that tourists or devotees can do in Brahma Temple:

  • Attend the Aarti: Devotees can attend the daily aarti (prayer ceremony) at the famous Brahma Temple. It’s a peaceful and spiritual experience with rituals that uplift the mood and the soul.
    • Entry Fee: Nil
    • Timings: 6 AM–9 PM (Summers) and 6:30 AM– 9:30 PM (Winters)
    • Open Days: 7 days a week
  • Explore Pushkar Lake: Devotees visiting the Jagatpati Mandir should take a dip in the Pushkar Lake. This activity is believed to cleanse sins and bring good fortune, and it is a must for pilgrims and visitors.
    • Entry Fee: Nil
    • Timings: 9 AM–6 PM
    • Open Days: 7 days a week
  • Take a Temple Tour: Devotees should also visit temples like the Savitri Temple, the Varaha Temple, and the Pap Mochani Temple. Each has a unique history and significance, enriching one’s spiritual journey.
  • Go for a Camel Safari: Take a camel safari in the surrounding desert. This unique adventure offers stunning views of the Thar Desert and is a fun way to explore the beauty and simplicity of Rajasthan.
    • Price: INR 800/person (1 hour). Prices may vary.
    • Timings: Open 24×7
    • Open Days: 7 days a week
  • Participate in Festivals: Visit the Pushkar Camel Fair to enjoy vibrant festivities. The livestock and cultural festival mostly overlaps the months of October and November. Experience cultural performances and exciting competitions. Explore lively market stalls filled with unique items.
    • Entry Fee: Nil
    • Pushkar Camel Fair 2024 (Date): 9/11/2024–15/11/2024 
    • Timings: 9 AM–5 PM 

Brahma Temple, Pushkar: Dresscode

Even though there is no specific dress code for visiting the Brahma Temple, Pushkar, it’s essential to respect the sanctity of the temple and its customs. Here are some pointers to help you adhere to the dress code and make your visit comfortable:

  1. Wear a traditional uutfit: It is advisable to wear traditional Indian attire when visiting the Brahma Temple. Men can wear a kurta-pajama or dhoti, while women can choose sarees or salwar kameez.
  2. Avoid western wear: Avoid any kind of Western clothing, as it may not be appropriate for an Indian place of worship.
  3. Remove footwear: It’s customary to remove your shoes before entering the temple premises. You can store them in designated areas near the entrance.

Poojas and Sevas at Brahma Temple, Pushkar

The Brahma Temple is a spiritual hub where devotees connect with the deity through a series of unique poojas and sevas, including:

Pooja/Seva Name Significance Timings
Mangala Aarti Early morning prayers to seek Lord Brahma’s blessings, symbolizing the beginning of a new day and invoking divine grace. Morning: 5:00 AM–6:00 AM
Sandhya Aarti Evening prayers with lamps and incense, offering gratitude and seeking protection and blessings as the day ends. Evening: 6:30 PM–7:30 PM
Abhishekam Ritual bathing of the deity with sacred bathing ingredients, symbolizing purification and the removal of negativity. Morning: 7:00 AM–9:00 AM
Brahma Havan The fire ritual seeks prosperity, spiritual awakening, and the destruction of negative energies through the power of the sacred fire. Morning: 9:00 AM–10:00 AM
Purnahuti The culmination of rituals, marking the completion of specific sevas as well as symbolizing the fulfilment of vows and the attainment of blessings. Morning: After Brahma Havan
Shodashopachara Detailed worship with 16 offerings to Lord Brahma, encompassing all aspects of devotion and honor. Morning: 10:00 AM–11:30 AM
Annadanam Offering food to devotees and the needy, thereby promoting charity, compassion, and the importance of serving humanity. Daily from 12:00 PM onwards

Brahma Temple, Pushkar: Entry Fees and Pooja Charges

The Brahma Temple welcomes pilgrims and visitors—offering various rituals and poojas. Here’s a detailed breakdown of the costs:

Entry Fees:

  • General Entry: Free for all.
  • VIP Entry: Specific fees may be applicable for quicker access or special services.

Pooja Charges:

  • Mangala Aarti: A morning ritual, costing approximately INR 100.
  • Sandhya Aarti: An evening ritual, costing approximately INR 100.
  • Abhishekam: Ceremonial bathing of the deity, costing approximately INR 200.
  • Brahma Havan: Fire ritual dedicated to Lord Brahma, costing approximately INR 500.
  • Shodashopachara: Ritual involving sixteen steps, costing approximately INR 300.
  • Annadanam: Free food distribution, promoting charity and community welfare. Donations are voluntary.
  • Prasadam Distribution: No specific charge; voluntary donations are encouraged.

Please note that these costs are approximate and may vary over time. Confirm the current charges before your visit to ensure a seamless experience.

Festivals at Brahma Temple, Pushkar

The Brahma Temple is a popular hub for festivals, attracting pilgrims and visitors from around the globe. Infusing the temple town with culture, devotion, and tradition, these celebrations include:

  • Kartik Purnima (November): Celebrated during the full moon night of Kartik, the festival marks Lord Brahma performing a yajna at Pushkar. Pilgrims take a holy dip in Pushkar Lake and offer prayers at the temple.
  • Navratri (September/October): The nine-night festival dedicated to Goddess Durga. The devotional festivities are also accompanied by cultural programs.
  • Diwali (October/November): Diwali, the festival of lights, is celebrated here as lavishly as the rest of India. Devotees light lamps, perform special poojas, and participate in cultural programs.
  • Holi (March): Rajasthani Holis are legendary and, resultantly, the festival of colors at Pushkar is celebrated on a grand scale. Devotees play with colors and participate in special rituals.
  • Makar Sankranti (14th January): Celebrated with kite flying and special rituals, the Makar Sankranti festival marks the sun’s transition into the Tropic of Capricorn. 

These festivals offer a chance to witness the rich tapestry of Indian culture and spirituality. Visiting the Brahma Temple during these festivals provides a unique and vibrant experience (besides great photo walks and street food) that reflects the deep-rooted traditions of Rajasthan.

Places to Visit Near Brahma Temple, Pushkar

Exploring the surrounding areas of Pushkar can enhance your trip, offering a deeper insight into Rajasthan’s cultural and historical richness. Here are some of the places to visit near Brahma Temple, Pushkar:

Pushkar Lake 

Considered one of the most sacred lakes in India, Pushkar Lake is surrounded by 52 ghats (stone staircases). Pilgrims take a holy dip in the lake, believing it cleanses sins and brings good fortune. The lake is also a hub of activity during the Pushkar Camel Fair. This annual camel-trading festival is a cultural extravaganza. Devotees and tourists attend the festival to enjoy folk music and dance performances, camel race activities, and more. The fair also attracts visitors by hosting handicraft, textile, and jewelry shops. 

  • Timings: 9 AM–6 PM

Savitri Temple

सावित्री मंदिर

Located on a hilltop, the Savitri Temple is dedicated to Lord Brahma’s wife, Goddess Savitri. A trek up the hill provides panoramic views of Pushkar and the surrounding desert. 

  • Timings: 5 AM–12 PM and 4 PM–9 PM

Varaha Temple

This ancient temple is dedicated to Lord Vishnu’s avatar, Varaha (the boar). It is one of the oldest temples in Pushkar and is known for its intricate carvings and serene atmosphere.

  • Timings: 6 AM–12:30 PM and 4 PM–8 PM

Pap Mochani Temple

Dedicated to Ekadashi Mata, this temple is believed to absolve sins with blessings. It is located on a hill and offers a peaceful retreat from the bustling town below.

  • Timings: 6 AM–7 PM

Rangji Temple

This temple is unique for its blend of South Indian, Mughal, and Rajput architectural styles. It is dedicated to Lord Rangji, who is considered to be an incarnation of Lord Vishnu.

  • Timings: All day long

Ajmer Sharif Dargah 

अजमेर शरीफ दरगाह

Located about 15 km from Pushkar, the Ajmer Sharif Dargah is a famous Sufi shrine dedicated to Khwaja Moinuddin Chishti and one of the most popular places to see in Ajmer. It attracts pilgrims of all faiths from across the world. 

  • Entry Fee: Nil
  • Timings: Open 24×7
  • Open Days: 7 days a week

Ana Sagar Lake

Ana Sagar Lake is an artificial lake in Ajmer, popular for boating and picnics. The nearby Daulat Bagh gardens offer a pleasant place for a stroll.

  • Entry Fee: Nil
  • Timings: Open  8 AM–8 PM
  • Open Days: 7 days a week

Taragarh Fort

तारागढ़ किला

This ancient fort in Ajmer offers a glimpse into Rajasthan’s rich history. The fort provides panoramic views of Ajmer city and is known for its impressive architecture.

  • Entry Fee: INR 100
  • Timings: Open 24×7
  • Open Days: 7 days a week

Merta City

About 50 km from Pushkar, Merta City is known for its historical and religious significance. It houses the Meera Bai Temple, which is dedicated to the famous bhakti poet and saint Meera Bai. She was a devotee of Lord Krishna, and her kirtans are extremely famous.

Places to Eat Near Brahma Temple, Pushkar

राजस्थानी व्यंजन
Authentic Rajasthani Thali

Pushkar’s culinary scene is diverse and caters to all tastes and budgets. Here are some of the popular places to eat in Pushkar:

  • Raju Terrace Garden Restaurant, Main Market Road: Known for its traditional Rajasthani thali, this restaurant offers a cozy garden setting and a relaxed atmosphere.
  • Honey & Spice, Laxmi Market : This cafe is popular for its healthy and delicious vegetarian dishes. It’s a favorite among travelers looking for nutritious meals and a welcoming ambiance.
  • Sunset Cafe, Choti Basti: Located by Pushkar Lake, this cafe offers stunning views and a variety of dishes, including Indian, Italian, and Continental options. It’s a perfect spot for a meal with a view.
  • Out of the Blue, Brahm Chowk: Known for its eclectic menu and laid-back atmosphere, this restaurant is a great place to relax and enjoy a meal. The menu includes Indian, Continental, and Israeli dishes.

How to Plan a Trip to Brahma Temple, Pushkar

Planning a trip to Brahma Temple, Pushkar, involves a few key steps. Book your accommodation in advance, especially during the Pushkar Camel Fair. You can choose from several accommodation options ranging from budget hotels to luxury resorts. Create an itinerary that includes temple visits, exploring local markets, and sojourning through nearby attractions while leaving free time to relax.

Plan your transportation well. Enjoy local Rajasthani cuisine at popular eateries, and take care to include spiritual, cultural, and adventurous activities like the temple aarti, camel safaris, and yoga sessions into your trip for an immersive and unforgettable experience.

How to Reach Brahma Temple, Pushkar

Pushkar is easily accessible via different transportation modes: 

By Train

The nearest railway station to Pushkar is Ajmer Junction, which is well-connected to major cities like Delhi, Mumbai, and Jaipur. From Ajmer, Pushkar is a 30-minute drive, and you can easily hire a taxi service from Ajmer to Pushkar with Savaari. Trains like the Shatabdi Express and the Rajdhani Express connect Ajmer to major cities, making it a convenient option for travelers.

By Road

Pushkar is well-connected by road to various cities in Rajasthan and beyond. Regular buses operate from Jaipur, Ajmer, and other nearby towns. If you prefer to drive, Pushkar is about 150 km from Jaipur and 400 km from Delhi. Book a comfortable cab service from Jaipur to Pushkar with Savaari Car Rentals or from nearby cities like Delhi, Jodhpur, etc., for a comfortable experience. The roads are well-maintained, and the drive offers scenic views of the Rajasthani countryside.

By Flight

The nearest airport to Pushkar is the Jaipur International Airport, about 150 km away. From the airport, you can hire an airport taxi in Jaipur with Savaari to reach Pushkar. Jaipur has good connectivity with major cities across India, with regular flights being operated by various airlines.

Hotels and Resorts in Brahma Temple, Pushkar

Pushkar offers a range of accommodation options, from hotels to resorts, that suit all budgets and preferences. Here are some of the best hotels and resorts in Pushkar:

Hotel Name Address Phone Number
The Pushkar Bagh Railway Station, Motisar Link Road, Ghanehera, Pushkar – 302055 94140 30669
Hotel Brahma Horizon Panch Kund Road, Pushkar – 305022 81070 44285
Ananta Spa & Resorts Leela Sevri Village, Dev Nagar, Pushkar Road, Pushkar – 305022 0141 354 0500
Green Park Resort Bus Station, Vaam Dev Road Pushkar – 305022 97993 47220
Hotel Pushkar Palace Near Pushkar  Lake, Choti Basti, Pushkar – 305022 98280 60601

A  visit to the Brahma Temple in Pushkar is a journey of spirituality, culture, and natural beauty. Whether you are a devotee seeking blessings, a traveler exploring new places, or an adventurer looking for unique experiences, Pushkar offers something for everyone. This travel guide to Pushkar provides all the information you need to plan and enjoy a memorable trip to this enchanting town.

Highest Road Trips Taken from Brahma Temple, Pushkar

Even though Pushkar is a city that is worth exploring on its own, it does offer travel enthusiasts an opportunity to explore some nearby and famous places in Rajasthan. Some of the popular destinations that you can travel to from Brahma Temple, Pushkar, are:

Destination Distance by Road (approx.)
Brahma Temple to Jaipur 141 km
Brahma Temple to Jodhpur 180 km
Brahma Temple to Udaipur 278 km
Brahma Temple to Mount Abu 378 km
Brahma Temple to Jaisalmer 460 km

Download the Savaari mobile app to explore the best routes and get the best deals on cabs and rentals for a road trip from Pushkar.

Last Updated on December 16, 2024 by

A quick summary

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर में करने योग्य कार्य: एक सम्पूर्ण यात्रा गाइड

Article Name

Things to do in Brahma Temple, Pushkar: A complete travel guide

Description

Plan a journey to the revered Pushkar Brahma Temple, a rare place of worship dedicated to the Lord of Creation - Brahma. Learn about the lore and legends of this famous temple and the top things to do in Brahma Temple via this detailed travel guide.











ब्रह्मदेवाच्या मूर्ती शिवाय मंदिरात आणि मंदिर परिसरात इतर अनेक मूर्ती आहेत. त्यातील महत्वाची मूर्ती मेंढ्यावर बसलेल्या अग्निची आहे. अष्ट दिक्पालांपैकी आग्नेय दिशेचा देव अग्नी हा वेदकाळात पूजनीय होता. त्याच्या स्वाहा आणि स्वधा या दोन बायका आहेत. मूर्तीशास्त्राप्रमाणे अग्नीला दोन किंवा चार हात असतात तो मेंढ्यावर (मेषावर) बसलेला दाखवतात. त्याच्या हातात पंखा आणि तुपाचे भांडे दाखवतात. अग्नीची मुख्य खूण म्हणजे त्याच्या मागे असलेला ज्वालांचा पसारा. याशिवाय येथे सूर्याची सात घोडे असलेली मुर्ती, हरिहर , गणपती, महिषासूर मर्दीनी, उमा - महेश्वर , जैन अंबिका, गजलक्ष्मी, नंदी, सुरसुंदरी वेगवेगळ्या प्रकारचे वीरगळ/ समाधीचे दगड/ स्मृतीशिळा येथे पाहायला मिळातात.  यात साधूची आणि बौध्द दांपत्याची स्मृतीशिळा पाहायला मिळतात.











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क्या आप जानते हैं पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर से जुड़े ये रोचक तथ्य, ब्रह्म देव का सबसे पुराना मंदिर

Samvida Tiwari

हमारा देश भारत कई विविधताओं का संग्रह है। यहां कई अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती है और विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख देवताओं में से हैं ब्रह्मा ,विष्णु और महेश यानी शिव। वैसे तो मुख्य रूप से विष्णु और शिव की पूजा करने का विधान है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्म देव की पूजा क्यों नहीं की जाती है?

ब्रह्म देव के नाम पर पूरे विश्व में कुछ ही मंदिरों का निर्माण किया गया है। जिनमें से सबसे पुराना मंदिर है पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर। आइए जानें इस मंदिर से जुड़ी कुछ ख़ास बातों और ब्रह्मा की पूजा न करने के कारणों के बारे में।

टॉप स्टोरीज़

कब हुआ था मंदिर निर्माण

brahma temple pushkar

भगवान ब्रह्मा को समर्पित कुछ मंदिरों में से एक, इस पुष्कर मंदिर का निर्माण 14 वीं शताब्दी में किया गया था। इसमें एक सुंदर नक्काशीदार चांदी का कछुआ है, जो विभिन्न आगंतुकों द्वारा दान किए गए चांदी के सिक्कों के साथ संगमरमर के फर्श पर स्थापित किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में उनकी दुल्हन, गायत्री के साथ ब्रह्मा जी की चार मुखी मूर्ति है। पुष्कर में कई मंदिर हैं जो अन्य देवताओं को समर्पित हैं। वराह मंदिर एक जंगली सूअर (वराह) के अवतार में विष्णु को समर्पित है। आप्टेश्वर मंदिर एक भूमिगत शिव मंदिर है जिसमें एक लिंगम है। अंत में, ब्रह्मा की पत्नी सावित्री को समर्पित सावित्री मंदिर, ब्रह्मा मंदिर के पीछे एक पहाड़ी पर स्थित है, और झील के सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है।

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मंदिर की पौराणिक कथा

brahma dev temple

एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर भक्तों की भलाई के लिए यज्ञ का विचार किया। यज्ञ की जगह का चुनाव करने के लिए उन्होंने अपने एक कमल को पृथ्वी लोक भेजा और जिस स्थान पर कमल गिरा उसी जगह को ब्रह्मा ने यज्ञ के लिए चुना। ये जगह राजस्थान का पुष्कर शहर था, जहां उस पुष्प का एक अंश गिरने से तालाब बन गया था। उसके बाद ब्रह्मा जी ने यज्ञ करने के लिए पुश्कर पहुंचे, लेकिन उनकी पत्नी सावित्री ठीक पर नहीं पहुंची। यज्ञ का शुभ मुहूर्त बीतता जा रहा था, लेकिन सावित्री का कुछ पता नहीं था। सभी देवी-देवता यज्ञ स्थल पर पहुंच चुके थे। ऐसे में ब्रह्मा जी ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ शुभ समय पर शुरू किया। कुछ देर बाद सावित्री यज्ञ स्थल पर पहुंची और ब्रह्मा जी के बगल में किसी और स्त्री को देख क्रोधित हो गई। सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि इस पृथ्वी लोक में आपकी कहीं पूजा नहीं होगी। इस श्राप को देखते हुए सभी देवी -देवताओं ने जब सावित्री से आग्रह किया तब उन्होंने श्राप वापस लिया और कहा कि, धरती पर सिर्फ पुष्कर में ही ब्रह्मा जी की पूजा होगी। तब से इस मंदिर का निर्माण किया गया।

पुष्कर झील के किनारे स्थित

oushkar lake

यह मंदिर पुष्कर लेक के किनारे स्थित है और ब्रह्म देव के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर हर साल पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। कहा जाता है कि पुष्कर की खूबसूरती देखते हुए ब्रह्म देव ने स्वयं ही इस मंदिर को चुना था। प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक, पुष्कर दुनिया की इकलौती जगह है, जहां ब्रह्मा का मंदिर स्थापित है और इस जगह को हिंदुओं के पवित्र स्थानों के राजा के रूप में वर्णित किया गया है।

इसे जरूर पढ़ें:चलिए जानते हैं गुजरात में मौजूद द्वारकाधीश मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

कैसी है मंदिर की संरचना

temple inside view

पुराणों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण करीबन 2000 वर्ष पूर्व सम्पन्न हुआ था । लेकिन मंदिर की मौजूदा वास्तुकला के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। पुष्कर को मंदिर की नगरी भी कहा जाता है, लेकिन औरंगजेब के शासन के दौरान यहां अमूमन हिन्दू मन्दिरों को नष्ट कर दिया गया, लेकिन आज भी पुष्कर झील के किनारे ब्रह्मा मंदिर और अन्य मन्दिर ज्यों के त्यों स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि पुष्कर झील ब्रह्मा जी के कमल की एक पत्ती से बनी है, जो हिन्दुओं के लिए अत्यंत पवित्र झील है।

कई विशेषताओं को अपने आप में समेटे हुए ये मंदिर वास्तव में बेहद खूबसूरत है और आप सभी को इस मंदिर के दर्शन हेतु अवश्य जाना चाहिए।


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माता सावित्री के श्राप के कारण नहीं की जाती ब्रह्मा जी की पूजा, पुष्कर में है एक मात्र मंदिर

दैनिक भास्कर

माता सावित्री के श्राप के कारण नहीं की जाती ब्रह्मा जी की पूजा, पुष्कर में है एक मात्र मंदिर

धर्म डेस्क. हिंदू ग्रंथों और पुराणों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश को सृष्टि का निर्माता, पालनकर्ता और संहारक माना जाता हैं। लेकिन आप के मन में ये सवाल कई बार आता होगा कि विष्णु और महेश (शिव जी) के तो दुनियाभर में कई मंदिर हैं और लोग घर में भी इनकी स्थापना कर इनकी पूजा करते हैं। लेकिन ब्रह्मा की पूजा कभी नहीं की जाती। और उनका केवल एक ही मंदिर है, जो पुष्कर में है। ब्रह्माजी की पूजा करना वर्जित क्यों माना गया है‌? दरअसल देवी सावित्री के श्राप के कारण ही ब्रह्माजी की पूजा वर्जित मानी गई है।

देवी सावित्री ने दिया था श्राप - पुराणों के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी हाथ में कमल का फूल लिए हुए अपने वाहन हंस पर सवार होकर अग्नि यज्ञ के लिए उचित स्थान की तलाश कर रहे थे। - तभी एक जगह पर उनके हाथ से कमल का फूल गिर गया। फूल के धरती पर गिरते ही धरती पर एक झरना बन गया और उस झरने से 3 सरोवर बन गए।  - जिन जगहों पर वो तीन झरने बने उन्हें ब्रह्म पुष्कर, विष्णु पुष्कर और शिव पुष्कर के नाम से जाना जाता है। यह देखकर ब्रह्मा जी ने इसी जगह यज्ञ करने का निर्णय लिया।

कर लिया था दूसरा विवाह - यज्ञ में ब्रह्मा जी के साथ उनकी पत्नी का होना जरुरी था। भगवान ब्रह्मा की पत्नी सावित्री वहां नहीं थी और शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था।  - इस कारण ब्रह्मा जी ने उसी समय वहां मौजूद एक सुदंर स्त्री के विवाह करके उसके साथ यज्ञ संपन्न कर लिया।  - जब यह बात देवी सावित्री को पता चली। इससे नाराज होकर उन्होंने ब्रह्मा जी को यह श्राप दे दिया कि जिसने सृष्टि की रचना की पूरी सृष्टि में उसी की कहीं पूजा नहीं की जाएगी।  - पुष्कर को छोड़ कर पूरे विश्व में भगवान ब्रह्मा का कहीं मंदिर नहीं होगा। इसी श्राप की वजह से ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर पुष्कर में है।

ब्रह्मा जी ने यहीं रचा था ब्रह्माण - पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्माजी पुष्कर के इस स्थान पर दस हजार सालों तक रहे थे। इस दौरान उन्होंने सृष्टि की रचना की।  - इसके बाद उन्होंने पांच दिनों तक यज्ञ किया था। उसी यज्ञ के दौरान सावित्री पहुंच गई थीं। आज भी श्रद्धालु केवल दूर से ही ब्रह्मा जी से करते हैं। 

देवी सावित्री हैं विराजमान - पुराण के अनुसार गुस्सा कम होने के बाद सावित्री पुष्कर के पास मौजूद पहाड़ियों पर जाकर तपस्या करने चलीं गईं थीं।  - मान्यताओं के अनुसार सावित्री देवी मंदिर में रहकर भक्तों का कल्याण करती हैं।



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Pushkar - पुष्कर है भगवान ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर


गुलाबी शहर जयपुर से कुछ ही घंटों की दूरी पर पुष्कर शहर स्थित है। पुष्कर (Pushkar) हिंदूओं में इसलिए प्रसिद्ध है कि यहां विश्व का एक मात्र जगत पिता ब्रह्मा का मंदिर है। इसके अलावा यहां लगने वाला मेला भी पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है। आगे हम पुष्कर के पौराणिक महत्व और दर्शनीय स्थानों के बारे में जानेंगे।

पुष्कर का पौराणिक महत्व

पौराणिक रूप से पुष्कर (Pushkar) नगर के उद्भव का वर्णन हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथ पद्मपुराण में मिलता है। मान्यता है कि, पुष्कर आकर ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था। हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थानों में पुष्कर को भी गिना जाता है। क्योंकि यहां एक ऐसी जगह है जहां ब्रह्मा जी का प्राचीन मंदिर स्थापित है। यहीं ब्रह्मा जी का एक मात्र मंदिर क्यों है, इसके पीछे भी एक प्रचलित कथा है, कथा के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ करने का निश्चय किया। यह यज्ञ जगत पिता सबसे शुभ समय पर करना चाहते थे। परंतु उनकी पत्नी सरस्वती, जिनका यज्ञ के समय उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक था, उन्हें ब्रह्मदेव को इंतजार करने लिए कहा। जिससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने गायत्री नाम की एक ग्वालिन से विवाह कर लिया और उन्हें यज्ञ में बैठा दिया। भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर के दक्षिण में मध्यवर्ती क्षेत्र को यज्ञवेदी बनाया। इस यज्ञवेदी में उन्होंने ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर, तथा कनिष्ठ पुष्कर नामक तीन पुष्कर तीर्थ की रचना की। ब्रह्मा जी के यज्ञ में सभी देवता तथा ऋषि पहुंचे। ऋषियों ने यज्ञ स्थल से कुछ ही दूरी पर अपने आश्रम बनाए। भगवान शंकर भी कपालधारी बनकर पधारे। यज्ञ में सरस्वती जी ने जब अपने स्थान पर किसी और को देखा तो वे क्रोध से भर गयी और उन्होंने ब्रह्मा जी को शाप दे दिया। शाप यह था कि पृथ्वी के लोग ब्रह्मदेव को भूल जाएंगे और इनकी पूजा कभी नहीं करेंगे। किन्तु अन्य देवताओं की प्रार्थना पर वो पिघल गयी और कहा कि ब्रह्मा जी केवल पुष्कर में ही पूजे जाएंगे। इसी कारण यहां के अलावा और कहीं भी ब्रह्मा जी का मंदिर नहीं है।

पुष्कर के दर्शनीय स्थल

पुष्कर (Pushkar) के प्राचीन मंदिरों को मुगल सम्राट औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। ब्रह्मा के मंदिर के अतिरिक्त यहां पुष्कर झील, पुष्कर मेला और ऊटों की दौड़ देखने योग्य हैं। पुष्कर में स्थित झील के तट पर कई जगह पक्के घाट बने हैं। इन घाटों का निर्माण राजपूताना रियासतों के धनी व्यक्तियों द्वारा करवाया गया है।

ब्रह्मा मंदिर

पुष्कर नगर धार्मिक मिथों और विश्वासों से भरा है। यहां के आकर्षण का केंद्र ब्रह्मा का मंदिर है। ब्रह्मा मंदिर का निर्माण संगमरमर के पत्थर से किया गया है तथा इसे चांदी के सिक्कों से सजाया गया है। इन चांदी के सिक्कों पर दानदाताओं के नाम उकेरे गए हैं। इसके अलावा मंदिर के दीवारों पर भी दानदाताओं के नाम अंकित हैं। यहां मंदिर के फर्श पर एक सोने का कछुआ है। मंदिर में गायत्री देवी की एक छोटी प्रतिमा और किनारे पर ब्रह्माजी की चार मुखों वाली प्रतिमा स्थापित है जिसे चौमूर्ति कहा जाता है। मंदिर का प्रवेश द्वार संगमरमर का बना है और दरवाजा चांदी का बना है।

पुष्कर झील

पुष्कर झील अपनी पवित्रता और सुंदरता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि पुष्कर झील उतना ही पुराना है जितना कि सृष्टि। तीर्थयात्रा के रूप में यह प्राचीन काल से जाना जाता है। इस झील में नहाने के लिए के लिए 52 घाट बने हुए हैं। जहां श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं।

पुष्कर मेला

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार कार्तिक महीने के अष्टमी के दिन मेला शुरू होता है जो पूर्णिमा तक चलता है। मेले में पशुओं के व्यापार पर जोर रहता है। इस मेले में पशुओं तथा महिलाओं के श्रृंगार के सभी सामान एक ही जगह पर बिकते हैं।

ऊटों की दौड़

पुष्कर में आयोजित होने वाली ऊटों की दौड़ पशु प्रमियों में खूब लोकप्रिय है। प्रत्येक शाम को यहां राजस्थानी लोक नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता है। जिसमें खूब भीड़ जुटती है।

पुष्कर कैसे पहुंचे

पुष्कर सड़क, रेल एवं वायु मार्ग से पहुंचा जा सकता है।

वायु मार्ग

हवाई मार्ग से यहां आने पर आपको जयपुर हवाई अड्डे पर उतरना होगा। यही एयरपोर्ट पुष्कर से सबसे करीब है। इसके अलावा आप घूंघरा जो कि अजमेर में है और  देवनगर जो पुष्कर में स्थित है इन दोनों ही स्थानों पर हैलीपैड बने हुए हैं। जहां हेलीकॉप्टर से आने पर आप उतर सकते हैं।

रेल मार्ग

यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पुष्कर ही है लेकिन यहां आने के लिए सबसे उपयुक्त होगा की आप अजमेर जंकशन पर उतरे। यह स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां से आप आसानी से पुष्कर पहुंच सकते हैं।

सड़क मार्ग

जयपुर तथा अजमेर से टैक्सी या बस से आप पुष्कर पहुंच सकते हैं। राजस्थान के विभिन्न भागों से पुष्कर के लिए बस व टैक्सी चलती हैं। आप इस सुविधा का भी लाभ उठा सकते हैं। पुष्कर देश के चारों महानगरों से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा हुआ है।



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The Great Brahma Temple That's Been Revered Since The 12th Century

Renata Fernandes

राजस्थान के पुष्कर में भगवान ब्रह्मा को समर्पित मंदिर में साल भर में सैकड़ों, यदि हजारों नहीं, आते हैं।

दुनिया भर में कुछ से भी कम मंदिर पूरी तरह से वर्तमान हिंदू सृष्टि के देवता को समर्पित हैं , जिसके परिणामस्वरूप पुष्कर में इस स्थान के प्रति आकर्षण पैदा होता है।

लेकिन केवल कुछ भक्तों, या शायद आकस्मिक रूप से जिज्ञासु लोगों को यह याद रखना चाहिए कि यदि वे पुष्कर से भारत के पश्चिमी क्षेत्र में एक सीधी रेखा में चलते हैं, तो वे गोवा में एक और ब्रह्मा मंदिर के स्थान पर पहुँचेंगे।

गोवा-में-ब्रह्मा-मंदिर-कहाँ-है
छवि क्रेडिट – इयरहोटल्स

उत्तरी गोवा में सत्तारी तालुका के अंदरूनी हिस्से में, नागरगाओ गांव के पास, प्रकृति की आवाज़ों में डूबा हुआ, श्री ब्रह्मदेव का घर, ब्रह्मा-करमाली के गांव में स्थित है।

गर्भगृह के अंदर एक तीखे चेहरे वाले दाढ़ी वाले व्यक्ति की मूर्ति है, जिसे कदंब युग की कला के विशिष्ट विवरणों से सजाया गया है। किंवदंती है कि हिंदू पवित्र त्रिमूर्ति के निर्माता ब्रह्मा का राजस्थान के पुष्कर में केवल एक मंदिर था।

हालाँकि, बहुत कम लोगों को पता है कि एक और ब्रह्मा मंदिर है, यह गोवा के वालपोई में नागरगाओ के एक सुदूर गांव में छिपा हुआ है।

"इस मंदिर में ब्रह्मा की मूर्ति ऊंची और स्टाइलिश है। भगवान ब्रह्मा की मूर्ति उन सभी को आशीर्वाद देती है जो उनसे मिलने आते हैं। ब्रह्मा की खूबसूरती से गढ़ी गई मूर्ति कदंब काल की है और 12 वीं शताब्दी की है।

ब्रह्मा-मंदिर-तथ्य
छवि क्रेडिट – ट्रांसइंडियाट्रैवल

इस मंदिर और ब्रह्मा की मूर्ति का महत्व इस अकाट्य तथ्य में निहित है कि यह कदंब काल के दौरान काले पत्थर से तराशी गई पहली मूर्ति है।

मंदिर के अंदर भगवान ब्रह्मा की मूर्ति बीच में खड़ी है और दाढ़ी पहने हुए है। ब्रह्मा को त्रिमूर्ति रूप में दिखाया गया है जो ब्रह्मा - विष्णु - महेश की त्रिमूर्ति है।

गोवा के इतिहासकारों के अनुसार, यह 16 वीं शताब्दी की बात है जब पुर्तगालियों ने तिस्वाड़ी द्वीप पर कब्जा कर लिया था और मंदिर के नष्ट होने का भय था।

इसलिए 1541 में ब्रह्मा के भक्तों ने पुराने गोवा के करमाली गांव से देवता की मूर्ति की तस्करी की और गुप्त तरीके से उसे सत्तारी तालुका ले गए, जो उस समय पुर्तगाली शासन के अधीन नहीं था।

सत्तारी तालुका 1781 के अंत तक पुर्तगाली शासन के अधीन आ गया। उसके बाद भक्तगण मूर्ति को वालपोई गांव ले गए और वहां से नागरगांव के घने जंगल वाले इलाके में ले गए और एक नदी के किनारे एक छोटे से मंदिर

में मूर्ति स्थापित कर दी । बाद में इस छोटे से गांव को भगवान ब्रह्मा के नाम से जाना जाने लगा और इसलिए इसका मूल गांव करमाली (तिस्वाड़ी तालुका में) पड़ा और इसलिए इसका नाम ब्रह्मा करमाली पड़ा।


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यहां मौजूद है 3260 मीटर ऊंची चोटी पर भारत का दूसरा ब्रह्मा मंदिर

By Amrit Vichar

यहां मौजूद है 3260 मीटर ऊंची चोटी पर भारत का दूसरा ब्रह्मा मंदिर

नैनीताल, अमृत विचार। नैनीताल जनपद के पंगोट विनायक कुंजाखड़क मार्ग पर ब्रह्मदेव का मंदिर है। राजस्थान पुष्कर के बाद यह ब्रह्मा का दूसरा मंदिर है जहां लोग पूजा के लिए आते हैं। हालांकि इस मंदिर के विषय में कम लोगों को ही जानकारी है। 3260 मीटर ऊंची चोटी पर स्थित ब्रह्मा स्थली में 13वीं शताब्दी …

नैनीताल, अमृत विचार। नैनीताल जनपद के पंगोट विनायक कुंजाखड़क मार्ग पर ब्रह्मदेव का मंदिर है। राजस्थान पुष्कर के बाद यह ब्रह्मा का दूसरा मंदिर है जहां लोग पूजा के लिए आते हैं। हालांकि इस मंदिर के विषय में कम लोगों को ही जानकारी है। 3260 मीटर ऊंची चोटी पर स्थित ब्रह्मा स्थली में 13वीं शताब्दी में गर्ग ऋषि द्वारा तपस्या की गई थी, और उनके द्वारा इसी स्थान पर भगवान ब्रह्मा का मंदिर भी स्थापित किया गया।

नैनीताल में मौजूद ब्रह्मा जी का मंदिर

मंदिर के बाबा माधव मुनि ने बताया कि यह भारत में पुष्कर राजस्थान के बाद दूसरा भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। जिसकी स्थापना 13वीं शताब्दी में की गई थी। बताया कि जब गांवों में ग्रामीणों की गाय भैंस गर्भवती नहीं हो पाती थी तो यहां पर मन्नत मांगने से गाय भैंस गर्भवती हो जाती है और बाद में उनका दूध यहां पर बने कुंड में चढ़ाया जाता है।

बाबा ने बताया कि मंदिर निर्माण के लिए जब इस तपोवनी में खुदाई की गई थी तो उस दौरान धरती से चांदी का छत्र,सिक्के व कई प्राचीनकाल के अद्भुत पत्थर निकले थे।

जिला मुख्यालय नैनीताल से पंगोट मार्ग होते हुए
विनायक कुंजाखड़क मार्ग के बीच से करीब तीन किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ कर ब्रह्मा स्थली तक पहुँचा जाता है, काफी संख्या में ट्रैकर और श्रद्धालु भी यहां हर रोज पहुँचते है।

ब्रह्म स्थली का चमत्कार यही है कि तीन किमी खड़ी चढ़ाई के बाद तपोवनी में पहुँचते ही सारी थकान अपने आप गयाब हो जाती है। हालांकि व्यापक प्रचार प्रसार नहीं होने के चलते इस पवित्र स्थान की जानकारी स्थानीय लोगों के सिवा काफी कम लोगों को ही है। लेकिन अब ट्रैकर काफी संख्या में यहाँ पहुँचने लगे हैं।




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Puskar snan 2022 पुष्कर स्नान का महत्व और धार्मिक मान्यता

ETV Bharat

रायपुर : राजस्थान में एक छोटा सा कस्बा है पुष्कर यहां दुनिया का इकलौता ब्रह्मा जी का मंदिर पुष्कर स्थापित है. इस मंदिर की गिनती भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में होती है.अरावली की पहाड़ियों से घिरा पुष्कर बेहद खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा हुआ है. पुराणों में इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी कई कथाएं मौजूद हैं, लेकिन पद्म पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा जी ने धरती पर यज्ञ करना चाहा लेकिन उस वक्त पूरी धरती वज्रनाभ नामक राक्षस के आतंक से ग्रसित थी.Puskar snan 2022

ब्रह्मा ने किया राक्षस का वध : तब ब्रह्मा जी ने अपने प्रिय पुष्प कमल के एक वार से ही इस असुर का वध कर दिया था. जब ब्रह्मा जी द्वारा चलाया गया कमल का पुष्प उस राक्षस का वध कर धरती पर तीन जगह गिरा तो इन तीनों ही जगहों से पृथ्वी का सीना चीर कर जल की धारा बहने लगी और वहीं तीन झील बन गई. जिसमें पहले झील का नाम जेष्ठ पुष्कर, दूसरे झील का नाम मध्य पुष्कर और तीसरे झील का नाम कनिष्ठ पुष्कर रखा गया. इन्हीं में से जेष्ठ पुष्कर में ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था जिसे एक तीर्थ स्थल होने का गौरव प्राप्त हुआ. Importance and religious beliefs of Pushkar Snan

क्यों है पुष्कर की मान्यता : ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने इस सरोवर में कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक यज्ञ किया था इसीलिए यहां हर साल 5 दिनों तक एक धार्मिक मेला का आयोजन होता है जिसमें स्वर्ग से सभी देवी-देवता उतर कर शामिल होते हैं. माना जाता है कि इन 5 दिनों यानी कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक इस झील में स्नान करने वाले भक्तों को विशेष फल मिलता है उन्हें साल भर का पुण्य एक साथ ही इस झील में डुबकी लगाने मात्र से ही मिल जाता है.

पुष्कर में ही ब्रह्मा का इकलौता मंदिर :इस सृष्टि के निर्माता ब्रह्म देव की पूजा इस पृथ्वी पर केवल एक ही जगह हो यह अपने आप में ही एक अद्भुत सवाल है. दरअसल, एक बार ब्रह्मा जी पृथ्वी पर यज्ञ करना चाहते थे और उन्होंने अपनी पत्नी सरस्वती जी को अपने साथ यज्ञ में बैठने के लिए कहा, सरस्वती जी ने ब्रह्मा जी से कुछ देर इंतजार करने को कहा. ब्रह्मा जी सरस्वती जी का इंतजार कर रहे थे लेकिन जब कुछ वक्त तक सरस्वती जी पृथ्वी पर नहीं पहुंची तब ब्रह्मा जी ने वहीं एक ग्वालन से यज्ञ के लिए शादी कर ली. जब सरस्वती जी यज्ञ में बैठने पहुंची और अपनी जगह किसी और को देखा तो वह क्रोधित हो गईं और ब्रह्मा जी को यह श्राप दिया कि आज के बाद इस पृथ्वी पर तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी.हालांकि, जब सभी देवी देवताओं ने उनसे विनती की और उनका मन शांत हुआ तब उन्होंने कहा कि हे ब्रह्मदेव आपकी पूजा इस समग्र संसार में केवल एक ही जगह होगी और वह है पुष्कर.



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छत्तीसगढ़ के इस जिले में भगवान ब्रह्मा का इकलौता प्राचीन मंदिर, साल में एक बार लगता है भव्य मेला

अशोक नायडू, बस्तर

छत्तीसगढ़ के इस जिले में भगवान ब्रह्मा का इकलौता प्राचीन मंदिर, साल में एक बार लगता है भव्य मेला

बीजापुर के भैरमगढ़ तहसील के मिरतुर ग्राम में मौजूद इस मंदिर को आदिकाल में राजा महाराजाओं ने बनाया था. यहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश की प्राचीन मूर्ति स्थापित है. सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पूजा करने आते हैं.

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बस्तर को देवताओं का धाम कहा जाता है. बस्तर के रहवासी देवी  उपासना के साथ सदियों से भगवान विष्णु महेश और ब्रह्मा की पूजा करते आ रहे हैं. वहीं जगत पिता ब्रह्मा भगवान के भी बस्तर (Bastar) के आदिवासी आदिकाल से पूजा करते आ रहे हैं और यही वजह है कि छत्तीसगढ़ राज्य में एकमात्र ब्रह्मा जी का मंदिर बीजापुर (Bijapur) जिले के मिरतुर नामक गांव में मौजूद है. यहां हर साल मेला लगता है, जहां तेलंगाना, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से ब्रह्मदेव की पूजा करने श्रद्धालु पहुंचते हैं.

10वीं-11वीं सदी में बना होगा
दरअसल धराशाई हो चुके मंदिर के अवशेष और मूर्तियों की खोज कुछ साल पहले यहां के तहसीलदार ने की थी. यहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश की प्राचीन मूर्ति स्थापित है और सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पूजा पाठ करने आते हैं. ब्रह्मा जी की मूर्ति के साथ विष्णु महेश और गणेश, सूर्य देव की मूर्तियां दक्षिण भारतीय शैली में बनाई गई हैं. इस मंदिर को देखने पर ऐसा लगता है कि मंदिर तत्कालीन छिंदक नागवंशी राजाओं द्वारा 10वीं या 11वीं सदी में बनाया गया होगा.


छत्तीसगढ़ के इस जिले में भगवान ब्रह्मा का इकलौता प्राचीन मंदिर, साल में एक बार लगता है भव्य मेला

Ambikapur News: सरगुजा के वैज्ञानिक प्रशांत शर्मा की मेहनत रंग लाई, तालाब के गंदे पानी को बनाया पीने योग्य

देखरेख के अभाव में धराशाई
बीजापुर जिले के भैरमगढ़ तहसील के मिरतुर नामक ग्राम में मौजूद इस मंदिर को आदिकाल में राजा महाराजाओं ने बनाया था, लेकिन यह मंदिर देख रेख के अभाव में धराशाई हो चुका था. भैरमगढ़ के तहसीलदार रहे विजय शर्मा ने इस धराशाई हो चुके मंदिर के अवशेष और मूर्तियों की खोज की और ग्राम वासियों के सहयोग से बिखरी पड़ी ब्रह्मा, विष्णु, महेश और सूर्य देव की मूर्तियों को विशाल बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरा बनाकर स्थापित किया.

साल में एकबार लगता है मेला
ग्राम वासियों ने बताया कि साल में एक बार यहां मेला लगता है और सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु चारों राज्यों से भगवान ब्रह्मा के दर्शन के लिए आते हैं. हेमंत कश्यप ने बताया कि राज्य और केंद्र के पुरातत्व विभाग को इस जगह का संरक्षण और संवर्धन का दायित्व लेना चाहिए  क्योंकि भारत  में राजस्थान राज्य के पुष्कर को छोड़कर ब्रह्मा जी का मंदिर कहीं भी नहीं है और यह गौरव की बात है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में मिरतुर ग्राम में ब्रह्मा जी का यह सदियों पुराना मंदिर है.

संरक्षित करने की जरूरत
लोगों का यह भी कहना है कि इसे संरक्षित कर प्रचार प्रसार करना चाहिए और मूलभूत सुविधाओं को विकसित करना चाहिए जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. पर्यटकों के आने से क्षेत्र के लोग भी व्यापार कर सकेंगे. कालांतर में देखरेख के अभाव में धराशाई हुए इस मंदिर और वैभवशाली मूर्तियों को पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है. ब्रह्मदेव के मंदिर से पर्यटक विश्व प्रसिद्ध ढोलकाल शिखर में स्थापित गणेश जी सहित बैलाडीला की पर्वत श्रृंखलाओं का सौंदर्य भी निहार सकते हैं.

मंत्री ने क्या कहा
इधर हाल ही में बस्तर दौरे पर पहुंचे केंद्रीय राज्य संस्कृति मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि बस्तर के अधिकारियों से मीटिंग के दौरान उन्हें ब्रह्मा जी के मंदिर की जानकारी मिली है जिसे संरक्षित करने के लिए और इस मंदिर को ब्रह्मा जी का भव्य मंदिर बनाने के लिए पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से बात की जाएगी.

 
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The Most Famous Lord Brahma Temple in India

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A part of the Hindu trinity, Lord Brahma is famous as the svayambhu, the ‘uncreated creator’. Lord Vishnu and Lord Shiva are the other two deities from the trinity. Brahma is the source of all forms, causation, time and space. Even when Lord Brahma plays an important part in Hindu Mythology, He is never worshiped. Neither any major temple has His idol, nor does He have any re-incarnations. Also, unlike other Hindu deities, Lord Brahma doesn’t have any particular day dedicated in His name. Ever wondered why? Read on to know more!

Why isn’t Lord Brahma worshiped?

According to a famous myth, once there arose a conflict between Lord Brahma and Lord Vishnu regarding their importance. For settling the feud, Lord Shiva was approached. Lord Shiva set them a challenge, stating “whosoever managed to view Lord Shiva’s top of the head first, would become the winner”. Having set the challenge, Lord Shiva took on an enormous form spreading across several the universe.

It didn’t take long for Lord Vishnu and Lord Brahma to realize that the task was an impossible one. Brahma noticed a ketaki ( thazampu ) flower wafting by. When asked where it belonged to, the flower answered that it fell from the head of Lord Shiva many thousand years ago. Brahma convinced the ketaki flower to lie that He had seen the top of Lord Shiva’s head.

Having called upon Shiva to claim victory, Lord Brahma was outrightly caught lying and was hence cursed to never be worshiped.

Brahma Temples in India

As opposed to numerous temples dedicated to Shiva and Vishnu, Brahma has very few in his names. The most famous Brahma temple in India is in Pushkar, Rajasthan. While most of us might think that this is the only Brahma temple in India, there are 5 other as well.

  1. Khedbrahma Temple, Sabarkantha, Gujarat

Built in the 11th century, Brahma Temple in Khedgrahma is second to be built after the Pushkar temple. The temple is made with white sandstone and cement bricks. The temple is 57-feet long, 30-feet broad and 68- feet tall. The temple has an image of Brahma in his four faced form. The complex also has a step-well which is called Brahma Vav, built in grey granite stone and has a line of miniature shrines.

  1. Brahma Temple, Bangalore

Domlur’s Brahma Temple in Bangalore is home to India’s largest Brahma statue, measuring 7 feet. This temple with Chaturmukha (4 faced) statue of the Lord, is one of the oldest temples, said to have been built in the 10th century by the Cholas.The pillars of the temple have Lord Vishnu’s Dashavathars. The temple is believed to possess pranic energy, by the natives.

  1. Mithrananthapuram Temple, Kerala

In the Mithrananthapuram Temple, Lord Brahma is not worshiped alone, rather as a part of the trinity. The temple complex is situated close to the Sri Padmanabhaswamy temple and is one of the most famous Trimurti temples in India.

  1. Brahmapureeswarar Temple, Tiruchirappalli

The Brahmapureeswarar Temple, located near Trichy, is visited by numerous devotees every year to seek the blessings of Lord Brahma.The deities in this temple are worshiped in the form of Swayambu Lingam and Devi Brahma SampathGowri. There is also a separate temple of Lord Brahma, sitting in Padmasana on a lotus flower. The complex of the temple also features the Jeeva Samadhi of Yogi Patanjali.

  1. Brahma Temple, Carambolim

60 kilometers from Panaji and 7 kilometers from Valpoi, there is another temple dedicated to Lord Brahma in Carambolim. The images of the God in the temple have been said to be brought to Carambolim in the SatariTaluka by the devotees. The temple has carvings of Lord Brahma on a single black basalt stone. The sculpture has an image of the Lord with the beard and carrying a ladle, Vedas and Kamandalu with his all three hands, while the fourth hand is seen in Varamudra posture.


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Where is the temple of Brahmadev located?


Where is the temple of Brahmadev located?

Radhe Radhe

We have Only one single BrahmaDev’s Temple in this world where he is worshipped which is in Pushkar City of Rajasthan.

Jai Jai shri Pushkar Raj ki

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Brahma Temple, Pushkar (also known as Jagatpita Brahma Mandir) is a Hindu temple situated at Pushkar in the Indian state of Rajasthan, close to the sacred Pushkar Lake to which its legend has an indelible link.

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Where is the exact temple of Brahm Dev in India?

Not one , the Main Brahma Temple, Pushkar, in Rajasthan., but there are 6 more temples.in India

  1. Brahma mandir, Pushkar, Rajasthan
  2. Brahma temple , Kumbakonam , TN.
  3. Brahmapureeswarar Temple, Thiruppattoor,TN
  4. Brahma Temple, Panaji ,Goa
  5. Aadhi Brahma Temple, Khokan, Kulu valley,
  6. Brahma temple in Barmer, Rajasthan.
  7. Moovar koil / Bikshandaar koil on the outskirts of Trichy , TN, where the deities , Brahma , Vishnu and Sivan have separate sannidhi / altar/ shrines

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Sankaranarayanan, T

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Brahma Temples are few in number compared to Temples of other Hindu Gods.

Temple in Carambolim,Goa

Pushkar,Rajasthan.

Uttamarkovil,Tamil Nadu.

Ubud, Bali

Alampur,Telangana.

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The Temple of Brahmadev, also known as the Brahma Temple, is situated in Pushkar, Rajasthan, India. It is one of the few temples dedicated to Lord Brahma, the creator god in Hindu mythology. This temple is an important pilgrimage site and is often visited by devotees, especially during the Pushkar Camel Fair. The temple features a unique architectural style and is surrounded by the sacred Pushkar Lake, which is also a significant site for Hindu rituals and ceremonies.

Jagatpita Brahma Mandir is a temple dedicated to the Hindu God of Creation, Lord Brahma and is located close to the sacred Pushkar Lake. The ancient structure is about 2000 years old, although the current structure dates to the 14th century.

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There is only one temple dedicated to Lord Brahma in India, which is located in the city of Pushkar in the state of Rajasthan. The temple is known as the Brahma Temple and is believed to be one of the few existing temples in the world dedicated to Lord Brahma, who is believed to be the creator of the universe in Hindu mythology. The temple is a major pilgrimage site for Hindus. Thousands of people come here every year, especially during the annual Pushkar fair.

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First of all Lord Brahma means symbolical. Having four heads has its own meaning. His wife Saraswathi means, the knowledge of attaining salvation or self-realization by the persons living in this society and both Brahma and Saraswathi have got nothing to do with rishis who live in forests.

Lord Brahma is not worshipped as one of his face, which is in particular ethical, was mutilated by Lord Shiva long ago and so a mutilated Lord Brahma is not supposed to be worshipped, hence if worshipped he has to be worshipped with all four faces, if anybody is worshipping anywhere then it is a wrong procedu

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Brahma Temple in Pushkar is one of the most famous and only few of the temples dedicated to Lord Brahma in the holy city of Pushkar, Rajasthan.

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There are multiple temples dedicated to the deity Brahmā. Some of them are listed as follows.

Temples dedicated to the Agamist Puranic deity Brahmā —

In Agamist Purāṇas and allied literature, Brahmā is the creator deity, or the creative aspect of the formless Parabrahma (the all-pervading consciousness, the all existence itself).

Temples/Temple complexes with Brahmā as primary/presiding deity:

Jagatpita Brahma Temple, Pushkar, Rajasthan, India:

The prime attraction of the city, Brahma Temple, located near Pushkar lake houses a 4-faced, 4-armed icon of Brahmā. The present structure of the temple d

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Footnotes

Lord Brahma, the first among the tridevas Or trinity is worshipped through Yajnas in different parts of India and if you are asking about the temples then Yes you may visit Pushkar - The Land Of Shri Prajapati Brahma🙏

It is situated in Jharkhand state. It is called theBaidhya nath dham mandir . Thereis a railway line connecting NewDelhi and Howrah. There are twolines in fact 1 via Patna, & 2 direct w/o touching Patna. After Patna if you get down at Jasidhi station! It is 8 kms from the station, There are buses and autorickshaw saervice to the temple directly. There are good lodges in and around this temple in the temple town. As usual you get swarmed by pandaswho will assure you proper guidance but you may lose money. Be careful of pandas. ( I was told by a local that the pandas are capable of gluttoning ev

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The temple of Lord Brahma, known as the Brahma Temple, is located in the town of Pushkar in the state of Rajasthan, India. It is one of the very few temples dedicated to Lord Brahma in the world and is considered a highly significant pilgrimage site for Hindus. The temple is believed to be over 2000 years old and is built in the architectural style of the Rajasthani and Mughal eras.

In Hinduism Brahma-the creator deity is different from Brahman, the God head (devoid of attributes/the nirguna).

There is a lone Mandir/Temple for Brahma at Pushkar.

Temple dedicated to Brahma at Pushkar (in Rajasthan) is one of very few existing temples in India and remains the most prominent among them (International Business Times: 30 March 2009). It is also believed that Brahma himself chose the location for His temple. The legend is that Lord Brahma performed a Yagna here, along with all the gods and goddesses. Pushkar Lake and the Brahma temple are identified as one of the ten most religio

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The Brahma Temple is located in the town of Gokarna, in the Uttara Kannada district of Karnataka, India. It is one of the famous pilgrimage sites in India, and is considered to be one of the five sacred shrines dedicated to Lord Shiva. The temple is located on the banks of the Arabian Sea and is known for its scenic beauty and religious significance.

The only temple of Lord Brahma in the whole country is in Pushkar, Rajasthan..

In India, of course, there are more than one Brahma temple, but the one temple where he is the main or central deity is at Pushkar, near Ajmer Rajasthan.

Where is the only temple of Brahma in India?

The Brahma Temple in Pushkar is not the only Brahma Temple in India.

The temple at Pushkar may well be the most famous one in the world dedicated to Brahma but it certainly isn’t the only one. It is however the oldest temple dedicated to Brahma. Legend has it that Brahma, when compared to the other gods was a lot more lenient and would bless his devotees whole-heartedly. There were several instances when he’s bless devotees with boons without considering the repercussions of his blessings.

He is said to have blessed demons from Hiranyakashipu and Mahishasur to Ravana, causing them to torment peo

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There are a few Brahma temples, but people don’t generally feel the need for it as every temple is an educational institute. And every school and college is a temple of learning.

Brahma merely represents the ideal of wisdom that comes with perfect knowledge.

At ‘Pushkar' in Rajasthan where every year in the month of march Or April the very famous ‘ Pushkar mela' is organised which is also on the list of world haritage. 🙏🙏

the most famous temple of Brahma ji in India is located at Pushkar, Rajasthan. According to Padma Puran, it is the most favorite place of Brahma ji on earth.

Thank You

The temple of Lord Bramha is situated at Pushkar(Rajasthan) in India.

Hi,

It's an interesting question because of the very reason that lord Brahma is not supposed to be worshipped in a temple as per brugu Maharshi's Curse. But surprisingly, when I was touring East Godavari District of Andhra Pradesh, I found a temple for Lord Brahma in a village called *Brahma Samejam* which is approx.50 kms from a nearby town *Amalapuram*.

Pushkar,

Ajmer District

Rajasthan

puskar temple is located to Rajasthan. This temple is only one in Brahma temple

Brahma Temple, Pushkar (also known as Jagatpita Brahma Mandir) is a Hindu temple situated at Pushkar in the Indian state of Rajasthan.

The Brahma Temple is located behind govt school karivobanahalli in Nagasandra Post of Bangalore

One of the most well-known temples dedicated to Lord Brahma is the Brahma Temple located in Pushkar, Rajasthan, India.

The Brahma Temple is located in Pushkar, Rajasthan, India. It is one of the very few temples dedicated to the Hindu god Brahma.

It is in Pushkar in Rajathan.

Brahma Temple is located in the town of Hosanagara, Shimoga district in the Indian state of Karnataka.

Where is the only temple of Brahmaji located in India? What is the secret behind this?

The only Brahma temple is in Pushkar, Rajasthan.

According to the Hindu scripture Padma Purana there is a demon named “Vajranabha” (also known as Vajranash) who is trying to kill his children and harassing people, Brahma got angry with this action of demon he came to Earth and kill him with his Lotus Once the demon was killed 3 lotus petals fell on the ground at three places, creating 3 lakes: the Pushkar Lake or Jyeshta Pushkar (greatest or first Pushkar), the Madya Pushkar (middle Pushkar) Lake, and Kanishtha Pushkar (lowest or youngest Pushkar) lake.

Brahma then decided to perform a yagna (fi

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Which city is the only temple of Lord Brahma?

Apart from Pushkar temple Rajasthan, there is a temple in South India.The Brahmapureeswarar Temple is a Hindu temple in Thirupattur, near Trichy,Tamil Nadu, people believe that prayers to God Brahma in this temple can change their destiny and bad time. According to Hindu Mythology, Brahma being a Creator believed that he was the supreme god and hence more powerful than god Shiva.God Shiva got angry by Brahma’s arrogance, and he plucked his fifth head while cursing him for losing his ability to create.Upon Brahma’s prayer god Shiva asked him to take birth on earth as a human and travel all acro

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Which city is the only temple of Lord Brahma?

According to a famous myth, once there arose a conflict between Lord Brahma and Lord Vishnu regarding their importance. For settling the feud, Lord Shiva was approached. Lord Shiva set them a challenge, stating “whosoever managed to view Lord Shiva’s top of the head first, would become the winner”. Having set the challenge, Lord Shiva took on an enormous form spreading across several the universe.

It didn’t take long for Lord Vishnu and Lord Brahma to realize that the task was an impossible one. Brahma noticed a ketaki ( thazampu ) flower wafting by. When asked where it belonged to, the flower

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Where is the only temple of Brahma in India?

There are a few (probably half a dozen) built by dissenters who disregarded Shiva’s curse which barred Brahma from being worshipped (as the latter committed perjury in a dispute with Vishnu). The most well known one is at Pushkar.

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Where is lord Brahma located in this current universe at this current time?

He is situated in the topmost world called Satya-lok billions of miles above earth, in a gigantic form. Satya lok is the last world in a system of 14 worlds or lokas one above the other. One must note that the Earth extends 1 billion miles into space i.e. its radius is 1b miles. Thus, it must be clear that these ‘worlds’ are no joke in the larger scheme of things.

The sun, the moon, and the eight planets traverse in the plane of Svarga-lok - the 10th world from bottom. Although these planets are sentient in nature, we only see a dead outer covering in the form of a sphere.

Similarly, the world o

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Where is the biggest temple of Lord Brahma in India?

Pushkar( Rajasthan)

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Where is the only temple of Brahmaji located in India? What is the secret behind this?

From which region you need India’s only Brahma temple.

At my last count there are 6 Brahma temples across India now, those who are privy to such really do not consider these things as anything important. Find what is best in your locality, your region and enjoy it. Serve the locality with responsibility.

Where is the only temple of Brahma in India?

Jagatpita Brahma Mandir is a Hindu temple arranged at Pushkar in the Indian territory of Rajasthan, near the consecrated Pushkar Lake to which its legend has a permanent connection. The temple is one of not many existing templeries committed to the Hindu maker god Brahma in India and stays the most conspicuous among them.

The temple structure dates to the fourteenth century, incompletely modified l

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Where is the Mallikarjuna Mahadev Temple’s location?

Sri Bhramaramba Mallikarjuna Temple or Srisailam Temple is dedicated to the deities Lord Shiva and Goddess Parvati, and located at Srisailam in Andhra Pradesh. It is one of the 12 Jyotiling’s of Lord Shiva.

It is significant to the Hindu sects of both Shaivism and Shaktism as this temple is referred to as one of the twelve Jyotilingas of Lord Shiva and as one of the eighteen Shakti Peethas, centres of the Hindu Goddess. Shiva is worshiped as Mallikarjuna, and is represented by the Lingam . His consort Goddess Parvati is depicted as Bhramaramba.

Legend

When Shiva and Parvati decided to find suitab

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Where is the biggest temple of Lord Brahma in India?

The Brahma Temple in Pushkar, Rajasthan is the biggest temple of Lord Brahma in India. The temple is dedicated to the Hindu creator-god Brahma and is situated near the sacred Pushkar Lake.

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Where is the only temple of Brahma in India?

There are many Brahma temples in India and many people know about the temple present in Pushkar, Rajasthan. However there are other temples which are as famous as Brahma temple in Puskhar

  1. Brahma Temple, Kumbakonam - Tamil Nadu
  2. Brahmapureeswarar Temple, Thirupattur - Tamil Nadu
  3. chatrurmukha Brahma Lingeswara , Chebrolu - Andhra Pradesh
  4. Brahma Temple, Bangalore - Karnataka
  5. Mithrananthapuram Temple, Kerala

How many Brahma temples are there in the world?

There are at least sixteen dedicated Brahma temples in India, probably more - a tiny number compared to most other major Devatas. There are more in Thailand. The main one is in Pushkar, Rajasthan.

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Is there only one Brahma Temple?

No..!!!!

The Brahma Temple in Pushkar is not the only Brahma Temple in India.

The temple at Pushkar may well be the most famous one in the world dedicated to Brahma but it certainly isn’t the only one. It is however the oldest temple dedicated to Brahma. Legend has it that Brahma, when compared to the other gods was a lot more lenient and would bless his devotees whole-heartedly. There were several

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Where is the Mallikarjuna Mahadev Temple’s location?

Thanks for requesting us.

The MALLIKARJUNA MAHADEV Temple is located in Srisailam , Nandyala district.

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Where does Lord Brahma reside?

Brahma resides at his abode known as Satya loka which is the highest point of material manifestation.

Brahma's abode or Satyaloka is the highest among the fourteen realms of the material manifestation.

Hunger, thirst, and all types of fatigue disappear as soon as someone enters Brahma's abode.

The place is beautifully coloured and supported by large white pillars. Brahma's abode does not decay and remains eternal till the end of the creation.

Brahma's assembly hall shines with radiance that surpasses the beauty of the Sun and the Moon.

The rafters of Brahma's abode signify the zenith of the materia

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Where is Surya Temple located?

Surya Temple is a Hindu temple dedicated to the god Surya, the sun god. There are many Surya Temples located throughout India and Nepal, as Surya is a popular deity in Hinduism. Some notable Surya temples include the Konark Sun Temple in Odisha, India and the Martand Sun Temple in Jammu and Kashmir, India

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Where is the only temple of Brahma in India?

Where is the Mallikarjuna Mahadev Temple’s location?

The Mallikarjuna Mahadev Temple is a famous Hindu temple dedicated to Lord Shiva. However, there are multiple temples with this name in different parts of India. Without further

clarification, it is challenging to determine the exact location you are referring to. Mallikarjuna Mahadev temples can be found in various states such as Andhra Pradesh, Karnataka, and Uttarakhand, among others. Each of these temples has its own distinct significance and history. If you provide more details or specify a particular state or city, I can help you with more precise information.

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Where is the only temple of Brahma in India?

How many temples of Lord Brahma are in India?

  • Brahma temple,Pushkar (Rajasthan).

  • Brahma temple, Asotara (Rajasthan.)

  • Brahma temple, carambalim (Goa).

  • Brahmapureeswarar temple, Tiruchirapalli.

  • Brahma temple, Bangalore (karnataka).

  • Mithrananthapuram temple, Kerala.

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Where is Kalighat temple located?

The Kalighat Temple in West Bengal, India is dedicated to the Hindu Goddess Kali. It was located on the banks of the River Hooghly, but the waters have receded and taken a new course. The temple, now stands on the banks of a small canal which connects to the Hooghly. This shrine is considered as one of the Shakti Peethas of India and represents the spot where the toes of the right foot of Goddess Sati fell. The city of Calcutta takes its name from this shrine, and it was only recently that the name was changed to ‘Kolkata’. The worship conducted in the temple was carried out by a Monk named Ch

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Why not build a temple for Brahma Ji?

Although there are many temples of Brahmaji on earth, but worshiping Brahmaji there is considered prohibited. According to mythology, once Brahmaji thought of performing a yagya for the betterment of the earth. Now had to find a place for the Yagya.

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Where is the only temple of Brahma in India?

Yes pushkar is the famous brahma temple in India.

But not only pushkar ,there is another brahma temple in asotra barmer district Rajasthan which was built by rajpurohit community and late brahmarshi sant khetaramji maharaj.The idol of Shri brahmaji is made up marble and the carving is unique.

Why is there only one temple of Brahmaji in India?

To the best of my knowledge, there is only one temple, which is dedicated to Lord Brahma, the Lord of Generation and Creation, and that is in Pushkar, Rajasthan, India.

At the same time, there are millions of temples dedicated to Lord Vishnu, the Lord of Operation, Development, and Sustenance and Lord Shiva, the Lord of Dissolution, Maturation, and Regeneration.

According to Akhand Sutra, Lord Brahma, Lord Vishnu, and Lord Shiva represent the three critical stages of the formation of the objects of the universe and Nature.

As a result, they form the three most important integral parts of Trinity

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Why is there only one temple of Brahmaji in India?

Because of a curse by his wife, Savitri.

There's only one temple of Lord Brahma all over the world, which is Pushkar in Rajasthan, India.

I visited Pushkar in 2013, and a priest over there told us a story. Lord Brahma wanted to perform a yajna in Pushkar. However, at the time of yajna his wife, Savitri was not present, as she was waiting for Goddess Laxmi & Parvati to join her.

Since the auspicious time was passing away, Lord Brahma was enraged and asked Lord Indra to find him a suitable girl to marry, who will then perform the yajna with him as his wife. Lord Indra then found Gayatri, the daught

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Why is there only one temple of Brahmaji in India?

The reason for this is as follows.

Brham is known as chaturmukha Brahma and each head represents Chatur Vedas ie., for Vedas. So four heads represents for Vedas.

Secondly Vedas represents knowledge or Brahma Jynana or knowledge of Godhead. It is said that Brahma was the first person to know and understand about God through Chatur Vedas.

Thirdly, Vedas claim that any person who has understood Vedas has become part and parcel of goddess Saraswati or they call him Sarasvati putra. This being the case, the orthodox scholars got confused and created mayhem amongst Hindus and declared that Brahma marri

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Why is Lord Brahma rarely worshiped?

Brahma felt a deep connection with Shatarupa and became possessive of her. This lower and indecent behavior on the part of Lord Brahma angered Lord Shiva. So, Lord Shiva condemned Lord Brahma and chopped his fifth head as a punishment for Brahma’s unacceptable behavior towards his creation. Brahma was attached to temporary things (external beauty) and ignored the permanent reality, the soul. He turned materialistic from spiritual. Thus. Lord Shiva cursed Brahma not to be worshipped.

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Where is the Ratneshwar Mahadev Temple located?

It is located in Varanasi (Ka...

To the best of My knowledge > there is ONE and ONLY One Temple for BRAHMA in PUSHKAR Rajasthaan /I have NOT heard of any other Temple in the WORLD for Lord Brahma

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In Tamil Nadu > The Story is >

(1) No Body should say Any Separate Sloka for Bhagavan Brahma /They would be punished /Along With Lord Scivaa and Lord Vishnu they can include Lord Brahma => Guru Brahma ,Gurur Vishnu ,guru Devo Maheswarah

(2) Lord Brahma Idol can be On the LEFT side Wall >outside the santum sanctorum of Lord Sciva Lingam /or /on the Umbilicus of Lord Vishnu ,when Vishnu is Lying on Sesha Naag and doing Puja to SCIVA LINGAM/ Ther should bo NO Lord Brahma Idol in a separate enclosure > even in a temple ,where there are many deities

0*999 purity GOLD >Anantha Padmanaabha Swami

(3) NO Separate TEMPLE > Even a Very Small Separate Temple among Small Temples in a HUGE > SCIVA /or / Vishnu Temple > If any one attempts ,They will be punished

(4) No Separate Archna /Abhishekam /Homam for Brahma > Except “Passing Reference “ in Group Prayers

(5) Even Lord Raama /Lord Krishna /Lord Ganesa / Devi Sakthi /Lord Karthikeya (Muruga) /Lord Ayyappa can have > Separate temmples /Separate Pojjas +Separate Homams > But Not for Lord Brahma (risk of Punishment)

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(Why?)

https://www.quora.com/Where-is-the-temple-of-Brahmadev-located


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सिर्फ पुष्कर में ही नहीं भारत की इन जगहों में भी मौजूद है ब्रह्मा मंदिर, एक तो है देश की सबसे खूबसूरत जगह पर

Sapna Singh

पुष्कर में ब्रह्मा को समर्पित मंदिर दुनिया का सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हो सकता है, लेकिन ये निश्चित रूप से भारत का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर नहीं है। हालांकि, ये ब्रह्मा को समर्पित सबसे पुराना मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मा अन्य देवताओं की तुलना में काफी उदार थे, उन्होंने अपने आशीर्वाद के नतीजों पर बिना कोई विचार किए भक्तों को वरदान दिया है। कहा जाता है कि उन्होंने हिरण्यकश्यप और महिषासुर से लेकर रावण तक को आशीर्वाद दिया था, जिसकी वजह से उन्हें और कई देवताओं को नकारात्मक परिणाम सहने पड़े थे, इतनी कम संख्या में उनके कम मंदिर होने का यही कारण है। चलिए आपको आज हम भारत में मौजूद ब्रह्मा के उन 6 मंदिरों के बारे में बताते हैं।

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर - Brahma Temple, Pushkar in Hindi

ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर - Brahma Temple, Pushkar in Hindi

राजस्थान के अजमेर जिले में पुष्कर झील के पास स्थित ब्रह्मा मंदिर भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले ब्रह्मा मंदिरों में से एक है। मंदिर के दर्शन करने के लिए यात्री सबसे ज्यादा कार्तिक (नवंबर) महीने में आते हैं, जहां वे झील में डुबकी लगाते हैं और देवता की पूजा करते हैं। इस मंदिर को काफी खूबसूरत तरीके से बनाया गया है, आप इसके आसपास मोर भी देख सकते हैं।

(फोटो साभार : TOI.com)

असोत्रा ब्रह्मा मंदिर, बाड़मेर - Asotra Brahma Temple, Barmer in Hindi

असोत्रा ब्रह्मा मंदिर, बाड़मेर -  Asotra Brahma Temple, Barmer in Hindi

असोत्रा मंदिर राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है। यह एक और मंदिर है जो मुख्य रूप से ब्रह्मा को समर्पित है। इस मंदिर को गांव के राजपुरोहितों द्वारा स्थापित किया गया था, जिसका निर्माण जैसलमेर और जोधपुर के पत्थरों से किया गया है। हालांकि, देवता की मूर्ति संगमरमर से बनी है। आपको ये बात जानकार शायद हैरानी हो, यहां रोजाना 200 किलो से अधिक अनाज पक्षियों को खिलाया जाता है।

(फोटो साभार : wikipedia)

आदि ब्रह्मा मंदिर, खोखान, कुल्लू घाटी - Adi Brahma Temple, Khokhan, Kullu Valley

आदि ब्रह्मा मंदिर, खोखान, कुल्लू घाटी - Adi Brahma Temple, Khokhan, Kullu Valley

आदि ब्रह्मा मंदिर कुल्लू घाटी के खोखान क्षेत्र में स्थित है, जो कि देश की सबसे खूबसूरत जगह है। ऐसा कहा जाता है कि, मंदिर की पूजा मंडी और कुल्लू दोनों जिलों के लोगों द्वारा की जाती थी। हालांकि, जैसे ही दो राज्य विभाजित हुए, मंडी में दूसरी तरफ एक प्रतिकृति बनाई गई, जहां भक्तों को उस मंदिर में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो राज्य की सीमाओं के भीतर था। बौद्ध प्रभाव होने की वजह से इस मंदिर का आदि रखा गया। (सांकेतिक फोटो)

ब्रह्मा मंदिर, कुंभकोणम - Brahma Temple, Kumbakonam

ब्रह्मा मंदिर, कुंभकोणम - Brahma Temple, Kumbakonam

ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा को अपनी सृष्टि की शक्ति पर इतना घमंड हो गया था कि वो शिव और विष्णु के प्रति भी घमंडी हो गए थे। ब्रह्मा देव को इसका एहसास दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें डराने के लिए एक भूत बनाया। भयभीत होकर, वह मदद के लिए विष्णु के पास आए और अपने इस व्यवाहर को लेकर उनसे माफी मांगी। तब विष्णु ने उन्हें पृथ्वी पर तपस्या करने के लिए कहा। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान में जहां उनका मंदिर है, उसी जगह को ब्रह्मा ने ध्यान करने के लिए चुना था।

ब्रह्मपुरीश्वरर मंदिर, तिरुपत्तुरी - Brahmapureeswarar Temple, Tirupattur

ब्रह्मपुरीश्वरर मंदिर, तिरुपत्तुरी - Brahmapureeswarar Temple, Tirupattur

किंवदंती है कि शिव की पत्नी पार्वती ने एक बार ब्रह्मा को शिव समझ लिया था। इससे शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने ब्रह्मा का एक सिर काट दिया और उनकी शक्तियां छीन ली गई। शिव से माफी मांगने के लिए ब्रह्मा तीर्थयात्रा के लिए निकल गए थे। यात्रा के दौरान ब्रह्मा देव थिरुपत्तूर पहुंचे, जहां उन्होंने 12 शिव लिंग स्थापित किए और वहां शिव की पूजा की। उनसे प्रभावित होकर शिव ने उन्हें श्राप से मुक्त किया और उनकी सभी शक्तियां उन्हें वापस लौटा दी। शिव ने उन्हें मंदिर में पूजने का भी वरदान दिया, तब से इस मंदिर में ब्रह्मा की पूजा की जाती है।

ब्रह्मा करमाली मंदिर, पणजी - Brahma Karmali Mandir, Panaji

ब्रह्मा करमाली मंदिर, पणजी - Brahma Karmali Mandir, Panaji

ब्रह्मा करमाली मंदिर वालपोई से लगभग सात किमी और पणजी से लगभग 60 किमी दूर स्थित है। हालांकि यह मंदिर उतना पुराना नहीं है, लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह मूर्ति लगभग 11वीं शताब्दी की है। ब्रह्मा को समर्पित ये गोवा का एकमात्र मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर में रखी गई ब्रह्मा की काली पत्थर की मूर्ति को 20 वीं शताब्दी में गोवा के कैरम्बोलिम में लाया गया था।




























संदर्भ :-
१) jagran.com
२) www-alightindia-com
३) www-tamilnadutourism-tn-gov-in
४) kanyakumaritourism-in
६) en-m-wikipedia-org.
५) hanumanmandir.vayusutha.in
७ ) www-anjaneyaswami-com.
८ ) www-holidify-com.


            नवसाला नक्कीच पावणारा मारूती म्हणून भद्रा मारुतीची ओळख : शयनावस्थेत असलेल्या हनुमानाची मूर्ती

चैत्र पौर्णिमेच्या दिवशी सूर्योदयाच्या वेळी हनुमान जयंती साजरी केली जाते. या दिवशी हनुमानाच्या देवळात सूर्योदयाच्या आधीपासून कीर्तनाला प्रारंभ करतात. सूर्योदयाला हनुमानाचा जन्म होतो, त्या वेळी कीर्तन संपते आणि सर्वांना प्रसाद वाटला जातो. महाराष्ट्रात हनुमानाला मारुती म्हणतात. महाराष्ट्रात शनिवार, तर उर्वरित भारतात शनिवार आणि मंगळवार हे मारुतीचे वार मानले जातात. या दिवशी मारुतीला शेंदूर, तेल तसेच रुईची फुले आणि पाने अर्पण करण्याची प्रथा आहे. मारुतीला नारळ फोडण्याची रुढीही पूर्वापार चालत आलेली आहे.
 
खुलदाबाद हे भारताच्या महाराष्ट्र राज्यातील एक धार्मिक आणि ऐतिहासिक परंपरा असलेले गाव आहे. भद्रा मारुती या धार्मिक स्थळासोबतच या गावात सूफी संत आणि इतर काही इतिहासकालीन राजघराण्यांतील आणि सरदार घराण्यांतील व्यक्तींच्या कबरी आहेत. हे गाव औरंगाबाद जिल्ह्याच्या खुलताबाद तालुक्याचे मुख्य ठिकाण आहे. या गावाला ‘रत्‍नापूर’नावाने देखील ओळखले जाते. खुलताबाद येथे दरवर्षी ऊरूस भरतो. खुलताबाद येथे जर्जरीबक्ष दर्गा आहे.
 
खुलदाबाद हे ठिकाण हिंदू दैवत भद्रा मारूती संस्थान ह्यासाठी देखील विशेष परिचित आहे. भद्रा मारूती ह्या ठिकाणी हनुमानाची निद्रिस्त अवस्थेतील भव्य मूर्ती आहे. अशा प्रकारची निद्रिस्त मारुतीची मूर्ती भारतात केवळ तीन ठिकाणी आहे. त्यातील एक ठिकाण उत्तर प्रदेशातीलअलाहाबाद हे असून दुसरे खुलताबाद आहे व तिसरे ठिकाण मध्य प्रदेशातील जामसावळी येथे आहे. खुलताबाद येथे दरवर्षी हनुमान जयंती निमित्त भव्य यात्रा भरते. त्या दिवशी खुलताबाद येथे हजारो लोक औरंगाबाद व आसपासच्या गावातून पायी चालत येतात.

  खुल्ताबादचं मूळ नाव भद्रावती
खरं तर खुल्ताबादचं मूळ नाव भद्रावती. रत्नापूर म्हणून देखील खुल्ताबादला ओळखलं जात होतं. येथे असलेलं हे हनुमानाचे प्राचीन मंदीर. शयनावस्थेत असलेलं हे महाराष्ट्रातील एकमेव हनुमानाचं मंदीर. वेरूळच्या प्रसिद्ध लेण्यापासून फक्त तीन किलोमीटर अंतरावर हे मंदीर आहे. हिंदू धर्मियांसाठी अत्यंत महत्त्वाचं स्थान आणि नवसाला पावणारा मारूती म्हणून भद्रा मारुतीची ओळख आहे. शयनावस्थेत असलेल्या हनुमानाची भारतात फक्त तीन मंदिरे आहेत. एक खुल्ताबादमधील भद्रा मारूती. दुसरे प्रयगाराजमधील मंदीर आणि तिसरे मध्यप्रदेशमधील जाम सवाली येथील मंदीर.
भद्रावती येथे भद्रसेन नावाचा एक थोर राजा होता. हा रामाचा उत्कट भक्त होता आणि त्याच्या स्तुतीमध्ये गाणी गात असे. एके दिवशी हनुमानजी आकाशातून जात असतांना त्यांना ही गाणी ऐकू आली. रामाच्या स्तुतीमध्ये गायली जाणारी ही भक्तीगीते ऐकत त्या ठिकाणी उतरले. आणि ते मंत्रमुग्ध झाले. त्यांनी भव्य योगमुद्रा धारण केली त्यालाच 'भावसमाधी' म्हणतात. राजा भद्रसेनाने त्याचे गाणे संपवले तेव्हा तो हनुमानाची मुर्ती पाहून आश्चर्यचकित झाला. राजाने हनुमानजींचे दर्शन घेऊन त्यांना कायम तेथे वास्तव्य करण्याची मागणी केली तेव्हापासून हनुमान भद्र म्हणजे शांत मुद्रेत तेथे भक्तांना आशीर्वाद देण्यासाठी कायमचा थांबला आहे. तेव्हापासून हे स्थान भद्रा मारुती म्हणून ओळखलं जाऊ लागलं अशी आख्यायिका आहे.
 
तसं बघितलं तर हनुमान जयंती चैत्र पोर्णिमेच्या दिवशी भद्रा मारुतीची जत्रा असते. औरंगाबाद शहरापासून खुल्ताबादपर्यंत भाविक या यात्रेसाठी पायी रांगा लागलेल्या असतात. भद्रा मारुती म्हणजे हनुमान भक्तांसाठी शहराजवळ असलेलं मोठं मंदीर. तसं बघितलं तर खुल्ताबाद औरंगाबादमधून २५ किमी अंतरावर असेल पण हनुमान जयंतीच्या वेळी भाविक तेवढं अंतर चालत जातात. भद्रा मारुती संस्थान म्हणून आजही खुल्ताबादची ओळख प्रसिद्ध आहे.
 
मूळ भद्रावती असलेल्या या गावात मध्ययुगात मुघलांचं शासन होतं. औरंगजेबाने दख्खनमध्ये आल्यावर तो खडकी (सध्याचे औरंगाबाद) येथे वास्तव्याला होता. स्वराज्यावर डोळा ठेवून असलेल्या औरंगजोबाला मराठ्यांनी याच मातीत गाडले पण शेवटपर्यंत स्वराज्यावर ताबा मिळवण्याचे त्याचे स्वप्न पूर्ण होऊ दिले नाही. भद्रावती म्हणजे आजच्या खुल्ताबादेच्या मराठी मातीत मुघलांच्या अनेक कबरी आपल्याला दिसतात. आजही त्या ज्वलंत इतिहासाची साक्ष देतात.

 https://marathi.webdunia.com/article/hanumanjayanti-marathi/shri-bhadra-maruti-temple-khuldabad-123040600028_1.html
 
 

महाराष्ट्रातील एकमेव शयनावस्थेतील भद्रा मारुती, जाणून अख्यायिका

khultabad bhadra maruti : पौराणिक मान्यतेनुसार, भगवान शंकराचे अनेक अवतार आहे. त्यापैकी महत्त्वाचा अवतार म्हणजे हनुमानाचा आहे. श्रीराम भक्त हनुमानजींना मारुती, संकट मोचन, महाबली, बजरंगबली अशा विविध नावांनी ओळखले जाते. भगवान मारुतीच्या पूजेसाठी मंगळवार आणि शनिवारचा दिवस समर्पित आहे. शनिवारी विधिवत मारुती पूजन केल्याने व्यक्तीच्या जीवनातील संकटं दूर होतात, अशी मान्यता आहे.

bhadra maruti

bhadra maruti

Bhadra Maruti: हिंदू धर्मात देवांचे देव महादेवाला विशेष महत्त्व आहे. महादेव म्हणजेच भगवान शंकर. पौराणिक मान्यतेनुसार, भगवान शंकराचे अनेक अवतार आहे. त्यापैकी महत्त्वाचा अवतार म्हणजे हनुमानाचा आहे. हनुमानजींना मारुती, संकट मोचन, महाबली, बजरंगबली अशा विविध नावांनी ओळखले जाते. भगवान मारुतीच्या पूजेसाठी मंगळवार आणि शनिवारचा दिवस समर्पित आहे. शनिवारी विधिवत मारुती पूजन केल्याने व्यक्तीच्या जीवनातील संकटं दूर होतात. अशा या महाबली मरुतीला समर्पित शनिवारनिमित्त जाणून घेऊया महाराष्ट्रातील एकमेव शयनावस्थेतील भद्रा मारुतीविषयी काही खास गोष्टी.

राज्यातील एकमेव शयनावस्थेतील मारुती

राज्यातील एकमेव शयनावस्थेतील मारुती म्हणून भद्रा मारुतीची ओळख आहे. हे धार्मिकस्थळ खुलताबाद येथे आहे. खुलदाबादला धार्मिक आणि ऐतिहासिक अशी मोठी परंपरा लाभली आहे. खुलताबाद येथील भद्रा मारुती राज्यातच नाही तर देशभरात प्रसिद्ध आहे. औरंगाबाद जिल्ह्यातील तालुक्यातील मख्य ठिकाण असलेल्या खुलताबाद गावाला रत्‍नापूर नावाने देखील ओळखले जाते.
खुलदाबाद हे ठिकाण भद्रा मारूती संस्थानासाठी विशेष परिचित आहे. या ठिकाणी हनुमानाची निद्रिस्त अवस्थेतील भव्य मूर्ती आहे. अशा प्रकारची निद्रिस्त मारुतीची मूर्ती भारतात केवळ तीन ठिकाणी आहे. त्यातील एक ठिकाण उत्तर प्रदेशातील अलाहाबाद, दुसरे खुलताबाद आहे व तिसरे ठिकाण मध्य प्रदेशातील जामसावळी येथे आहे. खुलताबाद येथे दरवर्षी हनुमान जयंती निमित्त भव्य यात्रा भरते. त्या दिवशी खुलताबाद येथे हजारो लोक औरंगाबाद व आसपासच्या गावातून पायी चालत येतात.

अशी आहे अख्यायिका

खुल्ताबादचं मूळ नाव भद्रावती आहे. याला रत्नापूर म्हणून देखील ओळखलं जात होतं. येथे शयनावस्थेतील मारुतीचे प्राचीन मंदीर आहे. शयनावस्थेतील मारुतीचे हे महाराष्ट्रातील एकमेव मंदिर आहे. या ठिकाणावरुन काही आंतरावर वेरूळच्या प्रसिद्ध लेण्या आहे. हिंदू धर्मियांसाठी अत्यंत महत्त्वाचं स्थान आणि नवसाला पावणारा मारूती म्हणून भद्रा मारुतीची ओळख आहे.
एका अख्यायिकेनुसार, भद्रावती येथे भद्रसेन नावाचा एक थोर राजा होता. हा राजा रामाचा भक्त होता आणि रामाच्या स्तुतीमध्ये गाणी गात असे. एके दिवशी हनुमानजी आकाशातून जात असतांना त्यांना ही गाणी ऐकू आली. रामाच्या स्तुतीमध्ये गायली जाणारी ही भक्तीगीते ऐकत हनुमानजी त्या ठिकाणी उतरले आणि ते मंत्रमुग्ध झाले. त्यांनी भव्य योगमुद्रा धारण केली त्यालाच 'भावसमाधी' म्हणतात. राजा भद्रसेनाने जेव्हा गाणे संपवले तेव्हा तो हनुमानाची मुर्ती पाहून आश्चर्यचकित झाला. राजाने हनुमानजींचे दर्शन घेऊन त्यांना कायम तेथे वास्तव्य करण्याची विनंती केली तेव्हापासून हनुमानजी भद्र म्हणजे शयनावस्थेत याठिकाणी विराजमान होत भक्तांना आशीर्वाद देत आहेत. तेव्हापासून हे स्थान भद्रा मारुती म्हणून ओळखलं जातं.

इतिहासाची साक्ष देतं खुल्ताबाद

मूळ भद्रावती नाव असलेल्या या गावात मध्ययुगात मुघलांचं शासन होतं. औरंगजेबाने दख्खनमध्ये आल्यावर तो खडकी (सध्याचे औरंगाबाद) येथे वास्तव्याला होता. स्वराज्यावर डोळा ठेवून असलेल्या औरंगजोबाला मराठ्यांनी याच मातीत गाडले. भद्रावती म्हणजे आजच्या खुल्ताबादेच्या मातीत मुघलांच्या अनेक कबरी आपल्याला दिसतात. आजही त्या ज्वलंत इतिहासाची साक्ष देतात.

वेरूळ लेणी

खुल्ताबाद जवळच जगप्रसिद्ध वेरूळ लेणी आहे. पर्याटकांसाठी वेरुळ लेणीचे विशेष महत्त्व आहे. भद्रा मारुतीच्या दर्शनासाठी आलेल्या भाविकांना या लेण्या खुणवतात. यानिमित्ताने आध्यात्म आणि पर्यटन दोन्ही साध्य होते.
 https://marathi.timesnownews.com/spirituality/mythological-significance-of-khultabad-bhadra-maruti-article-105662469
 

Bhadra Maruti Temple Aurangabad: Timings, History & Darshan

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टीप: पूर्वी औरंगाबाद म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या शहराचे नाव बदलून छत्रपती संभाजीनगर असे करण्यात आले आहे. म्हणून, जेव्हा जेव्हा आपण औरंगाबादचा उल्लेख करतो तेव्हा ते छत्रपती संभाजीनगर असे समजले पाहिजे. या बदलाबद्दल अधिक माहितीसाठी, तुम्ही आमच्या ब्लॉगचा संदर्भ घेऊ शकता:  सविस्तर माहिती औरंगाबाद नवीन नाव

सामुग्री सारणी
औरंगाबाद जवळील प्रसिद्ध हनुमान मंदिर
औरंगाबादजवळील हनुमान मंदिराची ठळक वैशिष्ट्ये
भद्रा मारुती मंदिर: औरंगाबादमधील एक दिव्य हनुमान मंदिर
औरंगाबादमधील प्रसिद्ध मंदिरे: भद्रा मारुती मंदिर
भद्रा मारुती औरंगाबाद इतिहास: या ठिकाणाची पौराणिक लोककथा
भद्रा मारुती मंदिराच्या वेळा
भद्रा मारुती ते औरंगाबाद अंतर
भद्रा मारुती मंदिराचे स्थान
भद्रा मारुती मंदिर कसे पोहोचायचे
भद्रा मारुती मंदिराला भेट देण्यासाठी सर्वोत्तम वेळ
महाराष्ट्रातील छत्रपती संभाजीनगर (औरंगाबाद) येथील भद्रा मारुती मंदिराला भेट देताना टॅक्सीने भेट देण्यासाठी जवळील प्रेक्षणीय स्थळे.
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भद्रा मारुती मंदिराबद्दल वारंवार विचारले जाणारे प्रश्न (FAQs)

Famous Hanuman Temple Near Aurangabad

  • If you are searching for a Hanuman Temple near Aurangabad, the Bhadra Maruti Temple in Khuldabad is a must-visit. Dedicated to Lord Hanuman, a loyal devotee of Shri Ram, this temple is famous for its unique reclining idol of Hanuman. Aurangabad, Maharashtra is a well-known religious location that draws thousands of worshippers annually.

Bhadra Maruti Temple: A sacred temple of Lord Hanuman in Khuldabad, Chhatrapati Sambhajinagar.

  • This is one of the most important temples in honor of Hanuman. This temple is different from others as it has a unique sleeping idol of Lord Hanuman, said to fulfill the wishes of the devotees praying with true devotion.
  • The temple holds a rich history and culture, especially during festivals such as Hanuman Jayanti and Ram Navami, when thousands of pilgrims visit Khultabad. Bhadra Maruti Temple, with its spiritual ambiance, is one of the most visited places for those who seek peace and blessings.
  • Bhadra Maruti Temple is located close to other popular tourist attractions such as Verul Caves and Ghrishneshwar Temple, which is a part of Aurangabad’s tourist destinations.
भद्रा मारुती मंदिर

Highlights of the Hanuman Temple Near Aurangabad

  1. Historical Significance: The temple dates back to the Maratha period. According to legend, King Bhadrasen worshipped Shri Ram here, adding to its religious and cultural importance.
  2. Beautiful Architecture: The Bhadra Maruti Temple showcases traditional Indian craftsmanship, reflecting the skill and artistry of ancient times.
  3. Peaceful surroundings:  The Hanuman temple in Khultabad is surrounded by nature & provides a peaceful setting that is perfect for meditation and devotion.

Key Information

  • Location: Khuldabad, approximately 28 km from Aurangabad city center.

Bhadra Maruti Temple: A Divine Hanuman Temple in Aurangabad

Bhadra Maruti Temple: A Sacred Hindu Religious Site in Chhatrapati Sambhajinagar (Aurangabad), Maharashtra

Situated in the village of Khuldabad near Chhatrapati Sambhajinagar (Aurangabad), the Bhadra Maruti Temple is one of the most significant religious sites in Maharashtra. This iconic Bhadra Maruti Temple, dedicated to Lord Hanuman, is a must-visit destination for devotees and travelers. Known for its unique reclining idol of Lord Hanuman, the temple attracts thousands of visitors annually.

Famous Temples in Aurangabad: Bhadra Maruti Temple


Bhadra Maruti Temple, Aurangabad is a rare temple that houses a sleeping idol of Lord Hanuman. This sleeping idol of Hanuman is seen in only three places in India. 1) Shri Bade Hanuman Ji Temple Prayagraj (Uttar Pradesh) 2) Shri Hanuman Temple, Jam Savli (Madhya Pradesh), and Shri Bhadra Maruti Temple at Khultabad in Aurangabad are the places where you can see the sleeping idol of Hanuman.

This devotional idol of Hanuman in this position is rarely seen in India and this makes Bhadra Maruti Temple a unique spiritual place. This temple is one of the “famous temples in Aurangabad” which many devotees and tourists visit every year.

भद्रा मारुती मंदिर

We have curated a list of some famous temples in and around Aurangabad. These religious sites hold great significance for devotees and are perfect destinations to experience spiritual peace and serenity. Here’s a detailed guide to help you explore these divine places.

1. Bhadra Maruti Temple

  • Dedicated to Lord Hanuman, this temple is unique as it houses a reclining idol of the deity.
  • Located in Khuldabad, near Aurangabad.

2. Grishneshwar Jyotirlinga Temple

  • One of the 12 Jyotirlingas of Lord Shiva, making it a highly revered site for devotees.
  • Situated near the Ellora Caves.

3. Kailasa Temple (Ellora Caves)

  • An architectural marvel carved out of a single rock.
  • Dedicated to Lord Shiva, located within the Ellora Cave complex.

4. Shree Gajanan Maharaj Mandir

  • A sacred site devoted to the 19th-century saint, Gajanan Maharaj.
  • Located in Aurangabad city.

5. Khandoba Temple (Satara, Aurangabad)

  • A popular temple dedicated to Lord Khandoba, a form of Lord Shiva.
  • Located in the Satara area of Aurangabad.

6. Shree Sai Tekdi Temple

  • Dedicated to Sai Baba, this serene temple is a favorite among devotees.
  • Situated in Aurangabad city.

7. Ramakrishna Mission Temple

  • A spiritual center near Bajaj Hospital.
  • Known for its peaceful atmosphere and devotion to Swami Vivekananda’s teachings.

8. Balaji Mandir (Mahismal)

  • A tranquil temple dedicated to Lord Venkateswara (Balaji).
  • Located in Mahismal, a hill station near Aurangabad.

9. Karnapura Devi Mandir

  • A small yet revered temple of Goddess Karnapura.
  • Located near Baba Petrol Pump in Aurangabad.

10. Varad Ganesh Mandir (Samarth Nagar)

  • Dedicated to Lord Ganesha, known for granting wishes (Varad).
  • Located in Samarth Nagar, Aurangabad.

11. Renuka Mata Mandir

  • A temple dedicated to Goddess Renuka, situated on Bypass Road in Aurangabad.

12. Shree Khadkeshwar Mahadev Mandir

  • A famous Shiva temple is known for its cultural significance.
  • Located in Aurangabad.

13. Dhareswar Temple (Kachner, Aurangabad)

  • Dedicated to Lord Shiva, this temple is located in the quaint village of Kachner, near Aurangabad.

Bhadra Maruti Aurangabad History: Mythological Folklore of this Place

According to legend, the Bhadra Maruti Temple was established by King Bhadrasen, a devoted follower of Lord Ram. One popular tale recounts that King Bhadrasen was deeply engrossed in singing devotional bhajans dedicated to Lord Ram. Enchanted by the devotion and the melody of the bhajans, Lord Hanuman came to the spot and, overwhelmed by the spiritual atmosphere, reclined into a deep, peaceful rest.

When King Bhadrasen saw Lord Hanuman in this unique reclining posture, he requested him to stay there forever. The king also sought a boon from Lord Ram to make this a sacred site for devotees. Since that time, Lord Hanuman has been worshipped at this spot in his reclining form.

Even today, this temple attracts lakhs of devotees who come to seek blessings and admire the rare and unique idol of Lord Hanuman.

Days Opening Time Closing Time Special Notes
Monday to Friday 5:00 AM 9:00 PM Regular darshan timings.
Saturday 5:00 AM 9:00 PM The weekend crowd was expected.
Sunday 5:00 AM 9:00 PM Ideal for family visits.
Public Holidays 5:00 AM 10:00 PM Extended hours for devotees.
Special Festivals 4:00 AM Midnight Check local schedules for details.

Notes:

  • The temple remains open continuously during festivals like Hanuman Jayanti.
  • Visiting early morning or late evening is recommended to avoid rush hours.
  • Photography inside the temple premises is generally restricted.

Bhadra Maruti to Aurangabad Distance

  • Distance: The Bhadra Maruti Temple in Khuldabad is approximately 28 kilometers from the center of Chhatrapati Sambhajinagar (Aurangabad) city.
  • Travel Time: Since the route passes through the city, traffic can occur. Additionally, after passing Daulatabad Fort, the road enters a hilly area. Depending on traffic and the route you choose, the journey takes around 50 to 60 minutes.
  • Nearby Attractions: The temple is located near other popular tourist destinations like the Ellora Caves, Grishneshwar Temple, and Daulatabad Fort.
  • Accessibility: Due to its proximity, the temple is easily accessible for pilgrims and tourists visiting Aurangabad.

Bhadra Maruti Temple Location

Address of Bhadra Maruti Temple:

Bhadra Maruti Temple,
Khuldabad,
Near Ellora Caves,
Chhatrapati Sambhajinagar (Aurangabad), Maharashtra 431101, India.

Nearest Airport:
Aurangabad Airport (Chikkalthana Airport) – Approximately 35 km from Bhadra Maruti Temple.

Nearby Landmarks:

  • Located close to Ellora Caves, a UNESCO World Heritage Site.
  • Near Khuldabad market and Grishneshwar Temple, one of the 12 Jyotirlingas.

Additional Information:
Bhadra Maruti Temple is easily accessible by road and is a popular destination for devotees visiting Aurangabad spiritual and historical landmarks.

How to Reach Bhadra Maruti Temple

To visit Bhadra Maruti Temple, you first need to reach the Chhatrapati Sambhajinagar (Aurangabad) District of Maharashtra State. You can reach here in three ways:

  1. Air Travel:
    • Nearest Airport: Aurangabad Airport (approximately 10 km)
  2. Road Travel:
    • Nearest Bus Stand: Chhatrapati Sambhajinagar Central Bus Stand (approximately 200 Mtr)
  3. Rail Travel:
    • Nearest Railway Station: Aurangabad Railway Station (approximately 3.5 km)
  4. Taxi Service:
    • Taxi Service: Choose a taxi for convenient pickup from your location
औरंगाबाद विमानतळ

1. Air Travel

Aurangabad Airport is conveniently located and offers flights from major cities like Delhi, Mumbai, and Hyderabad.

  • Distance to Bhadra Maruti Temple: Approximately 35 km from Aurangabad Airport.

To reach Bhadra Maruti Temple, you will need to travel by road.

You have three options to reach Siddharth Garden and Zoo:

We recommend booking a taxi to travel from Aurangabad Airport to Bhadra Maruti Temple as it will save you time and provide a more comfortable journey.

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भद्र मारुती

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भद्रा मारुती मंदिर हे पवित्र स्थळ , श्रीरामभक्त श्रीहनुमानांचे प्राचीन मंदिर आहे. हे पवित्र स्थळ महाराष्ट्र राज्यातील छत्रपती संभाजीनगर जिल्ह्यामधील खुलताबाद येथे स्थित आहे. तसेच हे पवित्र प्राचीन मंदिर, वेरुळ येथील घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर व लेण्यांपासून जवळच काही किलोमीटर अंतरावर स्थित आहे.

हे प्राचीन मंदिर हिंदू धर्मियांसाठी अत्यंत महत्त्वाचे स्थान आहे. येथील भद्रा मारूती नवसाला पावणारा असून , हे अत्यंत जागृत असे पवित्र मंदिर आहे. येथील श्रीहनुमानांची मूर्ती शयनावस्थेत /निद्रावस्थेत आहे. शयनावस्थेत/ निद्रावस्थेत असलेल्या श्रीहनुमानांची अजून दोन ठिकाण भारतात आहे. ती म्हणजे प्रयागराज येथील मंदिर व आणि मध्य प्रदेशातील जाम सावली येथे आहे.[१] भद्रा मारुती मंदिर हे श्री, हनुमानजी यांच्या भक्तांसह, श्रीरामजी आणि देवाधिदेव महादेवजी यांच्या भक्तांचे देखील आकर्षण मानले जाते.

हनुमान जयंती चैत्र पौर्णिमेच्या दिवशी सूर्योदयाच्या वेळी आणि राम नवमी अशा शुभ प्रसंगी भद्रा मारुती मंदिर येथे श्रीहनुमानांची आणि श्रीरामांची , भक्ती करणारे लाखोंच्या संख्येने भक्त /भाविक , दर्शनासाठी या पवित्र मंदिरात येतात.

[२] त्याचप्रमाणे भारत देशासह महाराष्ट्र राज्यात श्रावण महिन्यात शंकराच्या पूजेला खूप महत्त्व असते. तसेच श्रीहनुमानजी हे महादेवांचे रूप असल्याने , शनिवारी शिवभक्त देखील लाखोंच्या संख्येने, दर्शनासाठी भद्रा मारुतींच्या दर्शनाला येतात.

भद्रा मारुती मंदिर, खुलताबाद

लोककथेनुसार भद्रावती (खुलताबाद) येथे भद्रसेन नावाचा एक थोर राजा होता. हा श्रीरामांचा भक्त होता आणि तो श्रीरामांची स्तुती, करणारी भक्ती गीत नेहमी गात असे. एके दिवशी श्रीहनुमानजी आकाशातून जात असतांना ,त्यांना श्रीरामांची स्तुती करणारी भक्ती गीते ऐकू आली. श्रीरामांची स्तुती करणारी भक्तीगीते ऐकून, श्री हनुमानजी त्या ठिकाणी उतरले. तेथे श्रीहनुमानजी हे श्रीरामांची स्तुती, करणारी भक्ती गीते ऐकून मंत्रमुग्ध झाले आणि , त्यांनी तेथे एक भव्य योगमुद्रा धारण केली. त्याला 'भाव समाधी' असे म्हणतात ( भाव समाधी ही योगिक मुद्रा आहे). राजा भद्रसेनने काही वेळेनंतर श्रीरामांची स्तुती करणारी गाणी संपवली, तेव्हा मात्र राजा भद्रसेन , प्रत्यक्ष श्रीहनुमानांची मूर्ती पाहून आश्चर्यचकित झाला. त्याने नमस्कार करून, श्रीहनुमानजी यांना येथेच कायमचे वास्तव्य करून , आपल्या आणि भगवान श्रीरामांच्या भक्तांना आशीर्वाद देण्याची विनंती केली. अशा रितीने श्रीहनुमानजी ,(भद्र) म्हणजे शांत मुद्रेत तेथे भक्तांना आशीर्वाद देण्यासाठी कायमचे, वास्तव्य करत आहे.

  • भद्रा मारुती संस्थान खुलताबाद येथे अनेक लोक नेहमी उपयोगी कार्ये करत असतात. यामध्ये गरीब रुग्णांना वैद्यकीय सेवा पुरवली जाते. तसेच येथे अत्याधुनिक तंत्राचा वापर करून भक्तांसाठी डिजिटल हनुमान ग्रंथ उपलब्ध करून दिलेला आहे. या डिजिटल ग्रंथामध्ये भक्ताला जो भाग ऐकायचा असेल, तो ऐकण्याची सुविधा आहे. तसेच सर्व भक्त या डिजिटल ग्रंथाचे वाचन सुलभ पद्धतीने करू शकतात.
  • उन्हापासून बचाव करण्यासाठी येथे निवारा उभारला गेला आहे.
  • येथे विविध महंतांच्या मदतीने उत्साहात रामकथांचे आयोजन होत असते. तेव्हा अन्न प्रसादाचे वाटप होते.
  1. ^ लोकसंख्या १२, उंची • ८५७ मी जिल्हा छत्रपती संभाजीनगर; Mh-20, ७९४कोड• पिन कोड• दूरध्वनी• आरटीओ कोड • ४३११०१• +०२४३७• (2019-04-19). "तीर्थक्षेत्र भद्रा मारुती - संत साहित्य - तीर्थक्षेत्र भद्रा मारुती". संत साहित्य (इंग्रजी भाषेत). 2021-02-06 रोजी पाहिले.
  2. ^ "श्रावणातल्या शनिवारी भद्रा मारुतीच्या दर्शनासाठी गर्दी | eSakal". www.esakal.com. 2021-02-06 रोजी पाहिले.
 

भद्रा मारुती! निद्रिस्त अवस्थेतेतील मारुतीची मूर्ती असणारं एकमेव ठिकाण

Team Lokshahi

Bhadra MarutiLokshahi News

Published on: 

सिल्लोड प्रतिनिधी|अनिल साबळे : भक्तांना पावणार निद्रिस्त अवस्थेतील महाराष्ट्र राज्यातील एकुलता एक मारुती म्हणजे खुलताबाद येथील भद्रा मारुती. खुलदाबाद हे ठिकाण हिंदू दैवत भद्रा मारूती संस्थान या तीर्थक्षेत्रासाठी देखील विशेष परिचित आहे. भद्रा मारूती या ठिकाणी हनुमानाची निद्रिस्त अवस्थेतील भव्य मूर्ती आहे. अशा प्रकारची निद्रिस्त मारुतीची मूर्ती भारतात केवळ तीन ठिकाणी आहे. त्यातील एक ठिकाण उत्तर प्रदेशातील अलाहाबाद हे असून दुसरे खुलताबाद आहे व तिसरे ठिकाण मध्य प्रदेशातील जामसावळी येथे आहे.

खुलताबादेत दरवर्षी हनुमान जयंतीनिमित्त भव्य यात्रा भरते. या दिवशी खुलताबादेत हजारो लोक औरंगाबाद व आसपासच्या गावातून पायी चालत येतात. "शयनमुद्रेतील ही मारुतीची मूर्ती पाहण्यासारखी आहे. त्यामुळे महाबली बलभीम भक्तांनी इथे आवर्जून भेट द्यायलाच हवी. इथला मारुती नवसाला पावतो अशी पंचक्रोशी मध्ये ख्याती आहे." असं मिठू पाटील बारगळ हे सांगतात.

चैत्र पौर्णिमेच्या दिवशी सूर्योदयाच्या वेळी हनुमान जयंती साजरी केली जाते. या दिवशी हनुमानाच्या देवळात सूर्योदयाच्या आधीपासून कीर्तनाला प्रारंभ करतात. सूर्योदयाला हनुमानाचा जन्म होतो, त्या वेळी कीर्तन संपते आणि सर्वांना प्रसाद वाटला जातो.

भद्रा मारुतीच्या दर्शनासाठी येणाऱ्या भाविकाची चांगली सोय संस्थांच्या वतीने ठेवली जाते. या भाविकांना फराळ, जेवणाची व्यवस्था करण्यात येते. तसेच आरोग्य सुविधा देखील पुरविल्या जातात. दूरच्या भाविकांच्या मुक्कामाच्या सोयीसाठी भक्त निवासही उभारण्यात आले आहे. एकंदरीत भद्रा मारुती संस्थानला दर्शनासाठी येणारा भाविक प्रसन्नपणे मनोभावे मारुतीची पूजाअर्चा करून मार्गस्थ होतो.

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

भद्रा मारुती मंदिर, औरंगाबाद - झोपलेला हनुमान


औरंगाबादजवळील खुलदाबाद येथे असलेले भद्रा मारुती मंदिर हिंदू देवता भगवान हनुमानाला समर्पित आहे. भारतातील अशा तीन मंदिरांपैकी हे एक आहे जिथे हनुमानाची मूर्ती भाव समाधी किंवा झोपेच्या स्थितीत दिसते, इतर दोन अलाहाबाद आणि मध्य प्रदेश येथे आहेत. प्रसिद्ध वेरूळ लेण्यांपासून फक्त ४ किमी अंतरावर असलेले भद्रा मारुती येथे भाविकांची गर्दी असते, विशेषतः मराठी कॅलेंडरनुसार "शरावण" महिन्यांत शनिवारी.

भद्रा मारुतीची आख्यायिका खुलदाबादचा माजी शासक राजा भद्रसेनशी संबंधित आहे, जो प्राचीन काळी भद्रावती म्हणून ओळखला जात असे. राजा रामाचा एक धार्मिक भक्त होता आणि त्याने त्याच्या स्तुतीमध्ये मधुर गाणी गायली ज्या ऐकून भगवान हनुमान एके दिवशी त्याच्या जवळ अवतरले. अशा मधुर सुरांनी मंत्रमुग्ध होऊन, हनुमानजी झोपेच्या स्थितीत (भाव समाधी) झोपले आणि राजाने त्यांना तिथे कायमचे राहण्याची विनंती केली आणि भगवान रामाच्या उत्साही भक्ताला आशीर्वाद दिला.

 
 








 
 
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Hanuman Garhi Temple

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हनुमान गढ़ी मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश में हनुमान का एक हिंदू मंदिर है। अयोध्या में स्थित , यह राम मंदिर और नागेश्वर नाथ जैसे अन्य मंदिरों के साथ शहर के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है । [ 1 ] यह मंदिर रामानंदी संप्रदाय और निर्वाणी अखाड़े के बैरागी महंतों के अधीन है ।

हनुमान गढ़ी मंदिर

अयोध्या में हनुमान गढ़ी मंदिर

धर्म
संबंधन हिन्दू धर्म
ज़िला अयोध्या
देव हनुमान
समारोह दशहरा , हनुमान जयंती , बड़ा मंगल , रामनवमी , दीपावली
जगह
राज्य उतार प्रदेश।
देश  भारत
नक्शा
वास्तुकला
पुरा होना। 10वीं शताब्दी
वेबसाइट
www.hanumangarhiayodhya.com

हनुमान गढ़ी मंदिर राम जन्मभूमि के पास स्थित है । 1855 में अवध के नवाब ने मंदिर बनाने के लिए भू-राजस्व प्रदान किया था। [ 2 ] [ 3 ] इतिहासकार सर्वपल्ली गोपाल ने कहा है कि 1855 का विवाद अयोध्या मंदिर विवाद के लिए नहीं बल्कि हनुमान गढ़ी मंदिर के लिए था। [ 2 ]

हनुमान गढ़ी मंदिर एक चार-तरफा किले के आकार का है जिसके प्रत्येक कोने पर गोलाकार प्राचीर है, जिसमें प्राथमिक देवता हनुमान को समर्पित मंदिर हैं। मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए 76 सीढ़ियाँ हैं, जहाँ चाँदी की नक्काशी से सुसज्जित गर्भगृह प्रतीक्षा कर रहा है। केंद्रीय में तीन जटिल रूप से डिज़ाइन किए गए दरवाज़े हैं जो आंतरिक कक्ष की ओर जाते हैं। भीतर, हनुमान का 6 इंच का देवता, जो उनके युवा (बाल) रूप में दर्शाया गया है, उनकी माँ अंजनी की गोद में बैठा है। [ 4 ] हनुमान को चांदी की तुलसी की माला पहनाई जाती है, जिस पर राम का नाम लिखा होता है। मंदिर की दीवारों पर हनुमान चालीसा के छंद अंकित हैं। मंदिर में एक विजय स्तंभ है, जिसे विजय स्तम्भ के नाम से जाना जाता है। [ 5 ]

  1. ^ लुटगेनडॉर्फ, फिलिप (11 जनवरी 2007)। हनुमान की कहानी: एक दिव्य बंदर के संदेश । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस। पी. 244. आईएसबीएन 978-0-19-804220-4.
  2. ^यहाँ जाएं: बी दत्ता, प्रभाष के (7 दिसंबर 2017)।"अयोध्या: जब वाजिद अली शाह ने बनवाया था हनुमान मंदिर"इंडिया टुडे 28 जुलाई 2020पुनःप्राप्त.
  3. ^ पिल्लई, मनु एस. (6 दिसंबर 2017)। "जब अयोध्या में एक मंदिर को घेर लिया गया था"लाइवमिंट 29 जुलाई 2020 को लिया गया ।
  4. ^ "हनुमान गढ़ी | अयोध्या | यूपी पर्यटन" . www.ayodhya.gov.in . संग्रहीत 5 जुलाई 2020 को मूल से । पुनः प्राप्त किया 29 जुलाई 2020 .
  5. ^ श्याम, राय (15 मार्च 2023)। "हनुमान गढ़ी अयोध्या: मंदिर का इतिहास | महत्व | वास्तुकला | त्यौहार | राय श्याम द्वारा"उत्सव ऐप: मेरा मंदिर और त्यौहार । 10 नवंबर 2023 को लिया गया
 
navbharattimes.indiatimes.com

अयोध्या में बसे हनुमानगढ़ी की कुछ ऐसी बातें जिसे जान हैरान रह जाएंगे, जानिए कुछ गुप्त बातें

सपना सिंह

अयोध्‍या में 22 जनवरी दिन इतिहास के पन्‍नों पर दर्ज होने वाला है। जल्‍द ही राम मंदिर में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा होने वाली है। इस दिन काे शायद ही कोई कभी भूल पाएगा। क्‍या आप जानते हैं कि अयोध्‍या को मूर्ति और मंदिरों का गढ़ कहा जाता है। यहां एक से बढ़कर एक मूर्तियां और करीब 8000 मठ और मंदिर हैं। इनमें सबसे मशहूर है हनुमानजी का मंदिर।
जिसे हनुमानगढ़ी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि हनुमानजी आज भी यहां वास करते हैं। इसलिए जब तक इस मंदिर के दर्शन न करो, रामलला के दर्शन अधूरे हैं। यह मंदिर कई गुप्‍त रहस्‍य लिए बैठा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। तो आइए हम आपको बताते हैं कि आखिर क्‍याें इतनी मान्‍यता है हनुमानगढ़ी की और क्‍या है इस मंदिर का गुप्‍त रहस्‍य।

बजरंग बली को राम की भेंट है हनुमानगढ़ी

बजरंग बली को राम की भेंट है हनुमानगढ़ी

इस मंदिर को लेकर कई कहानियां और मान्यताएं हैं। कहते हैं कि लंका से लौटने के बाद भगवान राम ने अपने प्रिय भक्‍त हनुमान को यह जगह रहने के लिए दी थी। इस लिए इस जगह को हनुमानजी का घर भी कहते हैं। अथर्ववेद के अनुसार, भगवान राम ने हनुमान जी को कहा था कि जब भी कोई अयोध्‍या में मेरे दर्शन करने आएगा, उससे पहले उसे तुम्‍हारे यानी हनुमानजी के दर्शन करने होंगे। इसलिए आज भी लोग रामलला के दर्शन से पहले हनुमानगढ़ी जाते हैं।

राजा के रूप में विराजमान हैं हनुमान

राजा के रूप में विराजमान हैं हनुमान

हनुमान जी अयोध्‍या के राजा के रूप में विराजमान हें। शायद यही वजह है कि बीतें दिनों अयोध्‍या में हुए आतंकी हमले के बाद भी राम जन्‍म भूमि सुरक्षित है। धार्मिक मान्‍यता के अनुसार, भगवान राम गुप्‍तार घाट के जरिए गोलुक गए, जब उन्‍होंने अयोध्‍या की जिम्‍मेदारी हनुमान को सौंपी थी और राम का आदेश हनुमानजी कभी टाल नहीं सकते थे। इसलिए आज भी अयोध्‍या की जिम्मेदारी हनुमान के हाथों में हैं।

300 साल पहले हुई थी मंदिर की स्‍थापना

300 साल पहले हुई थी मंदिर की स्‍थापना

इस मंदिर की स्‍थापना आज से 300 साल पहले स्‍वामी अभयारामदासी के निर्देश में सिराजुद्दौला ने की थी। यह मंदिर अयोध्‍या शहर के बीचों बीच ऊंचे टीले पर स्थित है। इसके दक्षिण में अंगद और सुग्रीव टीली भी बना हुआ है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए 76 सीढ़ियां

मंदिर तक पहुंचने के लिए 76 सीढ़ियां

इस मंदिर की महिमा इस कदर है कि लोग हनुमानजी के दर्शन करने के लिए 76 सीढ़ियां चढ़कर जाते हैं। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी आज भी यहां अयोध्‍या का पूरा कार्यभार संभालते हैं। सरयू नदी के दाहिने तट पर बसे हनुमानगढ़ी की दीवारों पर हनुमान चालीसा और चौपाइयां लिखी हुई हैं।

चोला चढ़ाने से हर दोष से मिलती है मुक्ति

चोला चढ़ाने से हर दोष से मिलती है मुक्ति

धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार, भगवान हनुमान जी अपने भक्‍तों की मनोकामना जरूर पूरे करते हैं। एक चोला चढ़ाने से व्‍यक्ति को हर दोष से मुक्ति मिल जाती है। पापा से मुक्ति पाने के लिए सरयू नदी में स्‍नान करने की भी मान्‍यता है, लेकिन इससे पहले लोगाें को बजरंगबली से आज्ञा लेनी पड़ती है।

आज भी बने हैं हनुमान निशान

आज भी बने हैं हनुमान निशान

हनुमानगढ़ी में हनुमान जी की प्रतिमा दक्षिणमुखी है। यहां दिखने वाले हनुमान निशान लोगों को आश्चर्यचकित कर देते हैं। यह एक चार मीटर चौड़ा और आठ मीटर लंबा ध्‍वज है, जो लंका से विजय का प्रतीक है। इसके साथ एक गदा और त्रिशूल भी रखा है। कोई भी शुभ कार्य करने से पहले अयोध्‍या में हनुमान निशान ले जाया जाता है। लगभग 20 लोग इस निशान को हनुमानगढ़ी से राम जन्‍म भूमि तक तक ले जाते हैं। पहले इसकी पूजा होती है और फिर किसी कार्य की शुरुआत की जाती है।

गुप्‍त रूप से बजरंग बली देते हैं दर्शन

गुप्‍त रूप से बजरंग बली देते हैं दर्शन

हनुमानगढ़ी जैसी गुप्‍त पूजा पद्धति बहुत‍ विशेष है। देश में ऐसी पूजा और कहीं नहीं होती। हनुमानगढ़ी में यह परंपरा सर्दियों से चली आ रही है। दरअसल, एक गुप्‍त पूजा होती है। जिसमें पुजारियों के अलावा किसी और को आने की अनमुति नहीं होती। यह पूजा सुबह 3 बजे होती है, जिसमें खुद पवन पुत्र हनुमान पूजा में सम्‍मलित 8 पुजारियों को साक्षात दर्शन देते हैं। यह पूजा करीब डेढ़ घंटे की होती है। सबसे अजीब बात तो यह है कि ये पुजारी न तो इस पूजा के बारे में किसी को कुछ बताते हैं और न ही कभी चर्चा करते हैं। क्‍योंकि उनकी भी एक मर्यादा है। बता दें कि मंदिर के पट सुबह 4 बजे श्रद्धालुओं के लिए खुल जाते हैं, जो रात 10 बजे तक खुले रहते हैं। अगर आप भी अयोध्या जाने की सोच रहे हैं, तो पहले रामजी के प्रिय भक्‍त हनुमान के दर्शन जरूर करें।

 
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Ayodhya: हनुमानगढ़ी की कहानी... नवाब ने करवाया था भव्य मंदिर का निर्माण, हनुमान जी के लिए 52 बीघा जमीन का दिया था दान - Ayodhya Hanuman Garhi Temple History Significance And Facts


रघुवरशरण, अयोध्या। रामलला की स्थापना के साथ उनके परम प्रिय दूत बजरंगबली की प्रधानतम पीठ हनुमानगढ़ी का भी मान बढ़ गया। पौराणिक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद श्रीराम के साथ अनेक वानर वीर भी श्रीराम के साथ अयोध्या आए। इनमें स्वाभाविक रूप से हनुमान जी भी शामिल थे। माता सीता की खोज से लेकर रावण के विरुद्ध सामरिक अभियान में हनुमान जी ने अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी इसी योग्यता के अनुरूप श्रीराम ने राजप्रासाद के आग्नेय कोण पर हनुमान जी को अयोध्या के रक्षक के रूप में स्थापित किया।

17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीन अखाड़ों का गठन

यह भी मान्यता है कि अजर-अमर के वरदान से युक्त हनुमान जी आज भी यहां सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं। एक मार्च 1528 को राम मंदिर तोड़े जाने जैसी घटनाओं के चलते घर-परिवार त्याग कर राम भक्ति में लीन रहने वाले विरक्त वैष्णव आचार्यों ने 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिन तीन अखाड़ों का गठन किया, उनमें से एक निर्वाणी अखाड़ा भी था। हनुमानगढ़ी इस अखाड़ा के विरक्त साधुओं के केंद्र के रूप में स्थापित हुई।

हनुमानगढ़ी के संतों ने चलाया रामजन्मभूमि मुक्ति का अभियान

पुजारी रमेशदास के अनुसार, इस निर्णय के पीछे हनुमान जी से भक्ति, वैराग्य, बल-विक्रम और रामकाज की प्रेरणा भी थी। ऐसी ही प्रेरणा और विरासत से प्रवाहमान हनुमानगढ़ी के संतों ने रामजन्मभूमि की मुक्ति का अभियान आगे बढ़ाया। यदि एक ओर इस पीठ की आध्यात्मिक विरासत अवध के नवाब मंसूर अली खां से प्रतिपादित है, दूसरी ओर महंत अभिरामदास से भी अनुप्राणित है।

नवाब ने करवाया था भव्य मंदिर का निर्माण

18वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में नवाब पुत्र की असाध्य बीमारी से क्लांत कातर हो यहां विराजमान बजरंगबली के अर्चक बाबा अभयरामदास के आशीर्वाद से यदि नवाब के पुत्र को असाध्य बीमारी से मुक्ति मिली, तो बदले में नवाब ने हनुमान जी का भव्य मंदिर निर्मित कराया और हनुमान जी के लिए 52 बीघा का परिसर दान कर दिया। हनुमानगढ़ी मुस्लिमों की भी आस्था के केंद्र में रही, किंतु जब भी रामजन्मभूमि मुक्ति के प्रति न्याय की बारी आई हनुमानगढ़ी हनुमानजी की विरासत के अनुरूप डटी मिली।

हनुमानगढ़ी भी फूली नहीं समा रही

22-23 दिसंबर 1949 की रात जिस महंत के पराक्रम से रामजन्मभूमि पर प्रकटे रामलला को हटाया नहीं जा सका, वह यहीं से जुड़े महंत अभिरामदास थे। कालांतर में उन्हीं के शिष्य महंत धर्मदास एवं यहीं से जुड़े एक अन्य शीर्ष महंत ज्ञानदास रामजन्मभूमि मुक्ति के लिए अपने-अपने स्तर से प्रयासरत रहे। आज जब रामजन्मभूमि पर सदियों बाद भव्य मंदिर निर्माण और उसमें रामलला की स्थापना का चिर स्वप्न साकार हो रहा है, तब हनुमानगढ़ी भी फूली नहीं समा रही है।

बजरंगबली का श्रृंगार

राम मंदिर निर्माण के साथ न केवल हनुमानगढ़ी के नवीनीकरण का प्रयास चल रहा है, समय-समय पर इस पीठ का उल्लास भी प्रस्फुटित होता है। रामलला की स्थापना के उत्सव में सोमवार के दिन बजरंगबली का श्रृंगार उनके प्रिय दिन मंगलवार की व्यवस्था के हिसाब से किया गया। उन्हें स्वर्ण छत्र, स्वर्ण मुकुट-कुंडल से सज्जित किया गया। जबकि गर्भगृह सहित हनुमानगढ़ी का संपूर्ण आंतरिक प्रांगण भांति-भांति के पुष्पों से सुशोभित रहा।

कनकभवन में विराजे कनकबिहारी के दर्शन का विधान

बजरंगबली का दरबार उन विशिष्ट जनों की श्रद्धा से भी सज्जित हुआ, जो रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होकर लौट रहे थे। यद्यपि सोमवार को अति प्रतिष्ठापरक समारोह में शामिल होने की आपाधापी अपवाद सिद्ध हुई, नहीं तो पहले हनुमान जी के दर्शन और उसके बाद उनके आराध्य रामलला अथवा कनकभवन में विराजे कनकबिहारी के दर्शन का विधान है। इस समीकरण के चलते रामलला के दर्शनार्थियों में दो से तीन गुणा वृद्धि के साथ हनुमान जी के दर्शनार्थियों में भी अपूर्व वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सोमवार को राम मंदिर में भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अपने संबोधन में हनुमानगढ़ी को प्रणाम किया।

 
 
 

हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस

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हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिन्दू धर्म
देवताबाल हनुमान
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिबाबा खड़कसिंह मार्ग,
कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
भौगोलिक निर्देशांक28°37′48″N 77°12′54″E / 28.63000°N 77.21500°Eनिर्देशांक: 28°37′48″N 77°12′54″E / 28.63000°N 77.21500°E[1]
वास्तु विवरण
शैलीहिन्दू स्थापत्यकला
निर्मातास्वयंभू
जीर्णोद्धारक - राजा मान सिंह और जयसिंह द्वितीय, आंबेर
स्थापित१७२४

नई दिल्ली के हृदय कनॉट प्लेस में महाभारत कालीन श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। यहाँ पर उपस्थित हनुमान जी स्वयंभू हैं। बालचन्द्र अंकित शिखर वाला यह मंदिर आस्था का महान केंद्र है।[1] इसके साथ बने शनि मंदिर का भी प्राचीन इतिहास है। एक दक्षिण भारतीय द्वारा बनवाए गए कनॉट प्लेस शनि मंदिर में दुनिया भर के दक्षिण भारतीय दर्शनों के लिए आते हैं।[2] प्रत्येक मंगलवार एवं विशेषतः हनुमान जयंती के पावन पर्व पर यहां भजन संध्या और भंडारे लगाकर श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इसके साथ ही भागीरथी संस्था के तत्वाधान में संध्या का आयोजन किया जाता है, साथ ही क्षेत्र में झांकी निकाली जाती है।[3]

बाल हनुमान की स्वयंभू प्रतिमा

दिल्ली का ऐतिहासिक नाम इंद्रप्रस्थ शहर है, जो यमुना नदी के तट पर पांडवों द्वारा महाभारत-काल[4] में बसाया गया था। तब पांडव इंद्रप्रस्थ पर और कौरव हस्तिनापुर पर राज्य करते थे। ये दोनों ही कुरु वंश से निकले थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार पांडवों में द्वितीय भीम को हनुमान जी का भाई माना जाता है। दोनों ही वायु-पुत्र कहे जाते हैं। इंद्रप्रस्थ की स्थापना के समय पांडवों ने इस शहर में पांच हनुमान मंदिरों की स्थापना की थी।[5][6] ये मंदिर उन्हीं पांच में से एक है।

मान्यता अनुसार प्रसिद्ध भक्तिकालीन संत तुलसीदास जी ने दिल्ली यात्रा के समय इस मंदिर में भी दर्शन किये थे। तभी उन्होंने इस स्थल पर ही हनुमान चालीसा की रचना की थी। तभी मुगल सम्राट ने उन्हें अपने दरबार में कोई चमत्कार दिखाने का निवेदन किया। तब तुलसीदास जी ने हनुमान जी की कृपा से सम्राट को संतुष्ट किया। सम्राट ने प्रसन्न होकर इस मंदिर के शिखर पर इस्लामी चंद्रमा सहित किरीट कलश समर्पित किया। इस कारण ही अनेक मुस्लिम आक्रमणों के बावजूद किसी मुस्लिम आक्रमणकारी ने इस इस्लामी चंद्रमा के मान को रखते हुए कभी भी इस मंदिर पर हमला नहीं किया।[5]

गर्भ गृह की दीवार, व हनुमान जी सहित अन्य देवता दक्षिण ओर देखते हुए

वर्तमान इमारत आंबेर के महाराजा मान सिंह प्रथम (१५४०-१६१४) ने मुगल सम्राट अकबर के शासन काल में बनवायी थी। इसका विस्तार महाराजा जयसिंह द्वितीय (१६८८-१७४३) ने जंतर मंतर के साथ ही करवाया था। दोनों इमारतें निकट ही स्थित हैं। इसके बाद भी इमारत में समय समय पर कुछ कुछ सुधार, बदलाव आदि होते रहे।[5][6][7][8] इस मंदिर का विशेष आकर्षण यहां होने वाले २४-घंटे का अटूट मंत्र जाप है। ये जाप "श्रीराम जय राम, जय जय राम॥" मंत्र का होता है और यह १ अगस्त, १९६४ से अनवरत चलता आ रहा है। बताया जाता है, कि ये विश्व का सबसे लंबा जाप है और इसकी रिकॉर्डिंग गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी अंकित है।[9]

कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के निकट स्थित एशिया के सबसे बड़े फूलों के बाजार में पिछले पंद्रह सालों से फूलों का बाजार भी लगता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष २००६-०७ में कुल ६४९.८४ करोड़ रुपये का निर्यात हुआ जबकि पिछले वर्ष यह २१०.९९ करोड़ रुपये का था। केवल दिल्ली से लगभग १०० करोड़ रुपये का निर्यात हुआ है।[10]

  1. प्राचीन हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली Archived 2012-07-23 at the वेबैक मशीन। हनुमान जयंती
  2. मंदिरों की राजधानी भी है दिल्ली। नवभारत टाइम्स। १८ अप्रैल २००७। पीयुष के जैन
  3. धूमधाम के साथ मनाई गई हनुमान जयंती Archived 2010-08-11 at the वेबैक मशीन। याहू जागरण।
  4. महाभारत के समय से दिल्ली के प्रसिद्ध मंदिर https://www.bhaktibharat.com/list/delhis-famous-temple-of-the-mahabharata-period Archived 2019-06-19 at the वेबैक मशीन
  5. इस तक ऊपर जायें: अ फ़िलिप लुट्जनडोर्फ़ (२००७). हनुमान्स टेल. ए टेल ऑफ टू टेम्पल्स. द्वारा ऑक्स्फ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस-US. पृ॰ २५३. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0195309219, 9780195309218. मूल से 20 अक्तूबर 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2009-05-07.
  6. इस तक ऊपर जायें: अ आर.वी.स्मिथ (२८ नवम्बर २००५). "मोर दैन जस्ट ए टेलपीस!". द हिन्दू. मूल से 4 नवंबर 2012 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २७ मई २००५.
  7. Y.D.Sharma (2001). Delhi and its Neighbourhood. Hanuman Mandir. नई दिल्ली: Archeological Survey of India. पृ॰ 99. मूल से 10 मार्च 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2009-04-24. Situtated on the Baba Khark Singh Marg Road (old Irwin Road) about 250 m south-west of Connaught Place is of little architectural importance. The residents of Delhi are, however, particularly devoted to it. The original temple appears to have been constructed by Maharaja Jai Singh about the same time as the Jantar Mantar, but has undergone large scale renewals since then.
  8. Lucy Peck (2005). Delhi - A thousand years of Building. Pre-existing buildings. नई दिल्ली: Roli Books Pvt Ltd. पृ॰ 263. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7436-354-8. मूल से 12 मार्च 2006 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 29 दिसंबर 2009. Hanuman Temple: This was rebuilt by Mansingh of Amber and has now been rebuilt in the 20th Century so the building is not historic, although the site is supposed to be of great ancient antiquity. It is always thronging with devotees
  9. "हनुमान टेम्पल". मूल से 2 जुलाई 2004 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2009-05-19.
  10. भारतीय फूलों का विदेशी बाजार में रुतबा बढ़ा[मृत कड़ियाँ] बिज़नेस भास्कर। २ अगस्त २००८
  • बाल हनुमान जी की स्वयंभू प्रतिमा

    बाल हनुमान जी की स्वयंभू प्रतिमा

  • चांदी के मुख्य द्वार

    चांदी के मुख्य द्वार

  • शिखर पर चंद्रमा सहित किरीट-कलश

    शिखर पर चंद्रमा सहित किरीट-कलश

  • मंदिर की मुख्य इमारत

    मंदिर की मुख्य इमारत

Hanuman Mandir: दिल्ली में फेमस हैं ये हनुमान मंदिर, यहां हर मुराद होती है पूरी

Avantika Jain

Famous Hanuman Temples Of Delhi: यूं तो भारत देश में अनेकों हनुमान मंदिर हैं, लेकिन दिल्ली में कुछ ऐसे मंदिर हैं जो बहुत फेमस हैं। माना जाता है यहां दर्शन करने से हर मुराद पूरी होती है।

Avantika Jain लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीMon, 22 April 2024 08:27 PM

Hanuman Mandir: दिल्ली में फेमस हैं ये हनुमान मंदिर, यहां हर मुराद होती है पूरी

वैसे तो भारत देश में अनेकों मंदिर हैं, लेकिन कुछ की मान्यता बहुत ज्यादा है। दिल्ली में भी कई ऐसे मंदिर हैं, जहां हर रोज हजारों की संख्या में लोग माथा टेकने आते हैं। हनुमान जंयती के खास मौके पर आप भी दिल्ली के कुछ फेमस हनुमान मंदिर के दर्शन करने के लिए जा सकते हैं। माना जाता है कि इन मंदिर में दर्शन करने से हर मुराद पूरी होती है। यहां जानिए दिल्ली के फेमस हनुमान मंदिरों के बारे में जहां आपको दर्शन के लिए जरूर जाना चाहिए-

दिल्ली के फेमस हनुमान मंदिर (Famous Hanuman Temples Of Dehi)

करोल बाग का हनुमान मंदिर
करोल बाग के हनुमान मंदिर में शहर की सबसे ऊंची भगवान हनुमान की मूर्ति है, जिसका एंट्री गेट काफी अलग है। हर साल हनुमान जयंती पर लाखों भक्त भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए इस मंदिर में आते हैं। मंदिर जाने के लिए आप झंडेवालान मेट्रो स्टेशन तक जाएं और फिर ये पैदल चलकर मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

कनॉट प्लेस का प्राचीन हनुमान मंदिर
दिल्ली कनॉट प्लेस के बीच में बाबा खड़क सिंह मार्ग पर प्राचीन हनुमान मंदिर है। ये शहर के सबसे बड़े और फेमस हनुमान मंदिरों में से एक है। माना जाता है कि यह महाभारत के समय मौजूद पांच मंदिरों में से एक है। मंदिर सुबह 5 बजे से रात 11 बजे के बीच खुला रहता है।

नोएडा का श्री हनुमंत धाम
श्री हनुमंत धाम दिल्ली एनसीआर के सबसे फेमस हनुमान मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में शहर की सबसे बड़ी हनुमान प्रतिमाओं में से एक है। भगवान हनुमान का आशीर्वाद लेने के लिए हजारों भक्त मंदिर में आते हैं। हनुमान जयंती पर आप भी इस मंदिर के दर्शन के लिए जा सकते हैं। 

 

दिल्ली के ये 5 प्राचीन हनुमान मंदिर हैं बेहद खास, दूर-दूर से मन्नत लेकर आते हैं लोग - Hanuman Jayanti 2024 Five Famous Hanuman Temples in Delhi you must visit on Hanuman Janmotsav


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। Hanuman Jayanti 2024: हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन हनुमान जयंती होती है, जो कि इस बार मंगलवार, 23 अप्रैल को मनाई जा रही है। ऐसे में अगर आप भी दिल्ली एनसीआर या इसके आसपास के इलाकों में रहते हैं और इस विशेष दिन पर बजरंगबली का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो ये आर्टिकल आप ही के लिए है। यहां हम आपको दिल्ली के ऐसे 5 प्राचीन हनुमान मंदिरों (Old Hanuman Mandir in Delhi) के बारे में बताएंगे, जिनका दर्शन करके आप भी इस दिन को यादगार बना सकते हैं। आइए जानें।

प्राचीन हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस (Pracheen Hanuman Mandir Dakshin Mukh)

दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में स्थित इस हनुमान मंदिर के स्वरूप में अब तक कई बदलाव हो चुके हैं, लेकिन खास बात ये है कि यहां स्थापित भगवान हनुमान की मूर्ति महाभारत काल के समय की है। कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। ऐसे में हनुमान जयंती पर दर्शन करने के लिए आप यहां विजिट कर सकते हैं।

नजदीकी मेट्रो स्टेशन- राजीव चौक (Rajiv Chowk)

हनुमान मंदिर, करोल बाग (Hanuman Mandir Karol Bagh)

दिल्ली के करोल बाग में स्थित हनुमान जी का मंदिर भी काफी प्राचीन है। यहां मौजूद भगवान हनुमान की प्रतिमा करीब 108 फीट ऊंची है। करोल बाग और झंडेवालन के आसपास से गुजरते हुए या कई टीवी सीरियल के सीन में आपने इस मूर्ति का दीदार जरूर किया होगा। इस भव्य मंदिर का दर्शन करने के लिए भी लोग दूर-दूर से आते हैं।

नजदीकी मेट्रो स्टेशन- झंडेवालान (Jhandewalan)

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मरघट वाले बाबा, यमुना बाजार (Marghat Hanuman Temple)

दिल्ली के यमुना बाजार में बना मरघट वाले बाबा का मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। हर मंगलवार और शनिवार यहां भक्तों का तांता लगा ही रहता है। यमुना नदी के किनारे स्थित इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति जमीन से करीब 10 फीट नीचे हैं। हनुमान जयंती पर यहां दर्शन करके भी आप मन की शांति पा सकते हैं। मान्यता है कि रामायण काल में जब हनुमान जी लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी लेकर जा रहे थे, तब इसी जगह विश्राम करने के लिए रुके थे।

नजदीकी मेट्रो स्टेशन- लाल किला (Lal Quila)

प्राचीन हनुमान मंदिर, चाणक्यपुरी (Prachin Hanuman mandir)

दिल्ली के चाणक्यपुरी में विनय मार्ग पर स्थित हनुमान जी का मंदिर भी काफी प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसके पास ही श्री बटुक भैरव का मंदिर भी है, ऐसे में आप एक ही साथ दोनों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। आस्था ऐसी है कि रोजाना बड़ी संख्या में लोग यहां मन्नत लेकर आते आते हैं। हनुमान जयंती पर यहां विजिट करना भी एक बढ़िया फैसला होगा।

नजदीकी मेट्रो स्टेशन- लोक कल्याण मार्ग (Lok Kalyan Marg)

श्री बालाजी बाबोसा मंदिर, रोहिणी (Shri Balaji Babosa Mandir)

दिल्ली के रोहिणी में स्थित श्री बालाजी बाबोसा मंदिर भी काफी खास है। कई भक्त यहां विराजमान हनुमान जी को भगवान विष्णु और श्री कृष्ण के रूप में भी पूजते हैं। साथ ही, यह मंदिर हनुमान जी के बाल रूप की आराधना करने के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां विजिट करने के लिए हनुमान जयंती के पावन मौके से ज्यादा बेहतर दिन भला और क्या हो सकता है।

नजदीकी मेट्रो स्टेशन- रिठाला (Rithala)

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Picture Courtesy: X

दिल्ली के करोल बाग में है दुनिया की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमा, कई मूवी में भी दिखाते हैं इसका शॉट

सपना सिंह

मूवी या सीरियल में दिल्‍ली के किसी हिस्‍से को दिखाने के लिए हनुमानजी की एक विशाल प्रतिमा जरूर दिखाई जाती है। दरअसल, यह प्रतिमा करोल बाग के हनुमान मंदिर की है। यूं तो देश में राम भक्‍त हनुमान की लाखों मूर्ति और लाखों मंदिर हैं, लेकिन करोल बाग में स्थित हनुमान मंदिर देश के सबसे मशहूर हनुमान मंदिरों में से एक है।
मंदिर को संकट मोचन हनुमान धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर अपनी 108 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा के जिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इसमें हनुमान जी सीना चीरकर राम लक्ष्‍मण और देवी सीता के दर्शन कराते हुए दिख रहे हैं। तो चलिए जानते हैं भगवान हनुमान के इस मंदिर के इतिहास और अन्‍य जरूरी बातों के बारे में।

​हनुमान मंदिर का इतिहास​

​<strong>हनुमान मंदिर का इतिहास</strong>​

बताते हैं कि इस जगह पर कभी एक छोटी हनुमान मूर्ति और भगवान शिव की धुना हुआ करती थी। एक बार स्वर्गीय महंत नाग बाबा सेवागीर जी महाराज वहां तपस्या कर रहे थे, तभी भगवान हनुमान उनके सामने प्रकट हुए। उन्‍होंने सपने में आकर अपनी एक बड़ी मूर्ति वहां स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की। इस सपने को देखने के बाद, उन्होंने इस जगह पर हनुमान मंदिर का निर्माण करने का निर्णय लिया। ऐसे में मंदिर 1994 में बनना शुरू हुआ और इसे बनने में करीब 13 साल लग गए।

​मंगलवार को होती है सबसे ज्‍यादा भीड़​

​मंगलवार को होती है सबसे ज्‍यादा भीड़​

मंगलवार को इस मंदिर में भक्‍तों की सबसे ज्‍यादा भीड़ देखने को मिलती है। हनुमान जयंती के दिन झंडेवालान हनुमान मंदिर दिल्ली का सबसे व्यस्त मंदिर होता है। हनुमान जयंती ही नहीं, बल्कि अन्य त्योहार जैसे राम नवमी, शिवरात्रि, नवरात्रि और जन्माष्टमी भी इस मंदिर में भव्य तरीके से मनाए जाते हैं।

​अद्भुत है मंदिर की वास्‍तुकला​

​<strong>अद्भुत है मंदिर की वास्‍तुकला</strong>​

आज के समय में इस मंदिर को कला, इंजीनियरिंग और तकनीक का अद्भुत नमूना माना जाता है। इसमें जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी की तरह ही एक गुफा भी है। इस गुफा में पिंडी नाम की एक पवित्र चट्टान है और गंगा नदी के रूप में यहां पानी बहता रहता है। मंदिर के प्रवेश द्वार एक राक्षस के खुले मुंह जैसा दिखता है। मूर्ति के चरणों के बगल में, देवी काली को समर्पित एक मंदिर भी बना हुआ है। हनुमान मंदिर में आने वाले भक्‍त काली मंदिर के दर्शन किए बिना नहीं लौटते।

​दो दिन देखने को मिलता है अद्भुत दृश्य ​

​<strong>दो दिन देखने को मिलता है अद्भुत दृश्य </strong>​

मंगलवार और शनिवार को यहां भव्‍य आरती होती है। आरती के बीच में, हनुमान की भुजाएं , जो उनकी छाती पर आड़ी होती हैं, पीछे की ओर जाने लगती हैं। शाम की आरती के दौरान, बड़ी संख्या में भक्त हनुमान जी के इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए इकट्ठा होते हैं। इस दौरान 108 फुट मूर्ति के हाथ छाती को खोलते हैं और भक्तों को भगवान राम और देवी सीता की मूर्तियों की झलक मिलती है।

​दिल्‍ली की पहचान है यह फोटो​

​<strong>दिल्‍ली की पहचान है यह फोटो</strong>​

इंडिया गेट और कुतुब मीनार की तरह अब भगवान हनुमान की विशाल प्रतिमा दिल्‍ली की पहचान बन गई है। विक्‍की डोनर, बैंड बाजा बारात, पा और बजरंगी भाईजान जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में यह शॉट दिखाया गया है।

​दिल्‍ली का एंट्री शॉट बन गई हनुमान मूर्ति​

​दिल्‍ली का एंट्री शॉट बन गई हनुमान मूर्ति​

आज से 16 -17 साल पहले फिल्‍म मेकर राकेश ओमप्रकाश मेट्रो में सफर कर रहे थे, तभी उन्‍हें झंडेवालान मेट्रो स्टेशन के पास हनुमान जी की विशाल प्रतिमा दिखाई दी। उन्‍होंने सबसे पहले 2009 में बनी फिल्म दिल्‍ली-6 में इसे दिखाया। और तब से कई मूवी और सीरियल में दिल्‍ली के एंट्री शॉट के रूप में इस मूर्ति को दिखाया जाने लगा। झंडेवालान की यह जगह सीरियल और फिल्मों की शूटिंग का फेवरेट स्पॉट बन गई है।

​कैसे पहुंचे हनुमान मंदिर​

​<strong>कैसे पहुंचे हनुमान मंदिर</strong>​

108 फ़ीट हनुमान मंदिर करोल बाग़ मेट्रो स्टेशन और झंडेवाला मेट्रो स्टेशन के बीच में पड़ता है। मंदिर तक जाने के लिए आप दोनों मेट्रो स्टेशन में से किसी एक पर उतर सकते है। वैसे सबसे नजदीक मेट्रो स्टेशन झंडेवालान का है। इस रूट के लिए आपको ब्लू लाइन मेट्रो लेनी होगी। अगर बस से सफर कर रहे हैं तो झंडेवालान बस स्टॉप उतरना होगा। यहां से आप प्राइवेट टैक्सी या ऑटो लेकर मंदिर तक पहुंच सकते है। ध्यान रहे , यह मंदिर सड़क के किनारे बना हुआ है , इसलिए यहां पार्किंग की सुविधा नहीं है।

डिस्क्लेमर :''इस लेख में बताई गई किसी भी जानकारी/सामग्री में निहित सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना के तहत ही लें।''

 
 
 

इसलिए मरघट वाले बाबा हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है ये मंदिर - mobile


इसलिए मरघट वाले बाबा हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है ये मंदिर

punjabkesari.in Monday, Nov 06, 2017 - 05:28 PM (IST)

कलयुग के भगवान हनुमान जी को बिगड़ी तकदीर बनाने वाला देवता अगर बोला जाए तो यह बात इनके लिए गलत नहीं होगी। हनुमान जी के दर पर अगर कोई सच्चे दिल से और तड़प से कोई चीज मांगता है तो हनुमान जी अपने उस भक्त को कभी निराश नहीं करते। हनुमान जी के कलयुग में मौजूद होने के कई साक्षात प्रमाण आज भी कई लोगों को मिलते रहते हैं। भारत देश के साथ-साथ कई बार तो हनुमान जी विदेशों में भी अपने होने के सबूत लोगों को दे चुके हैं। आज भी हनुमान जी के कई चमत्कार निरंतर घटित होते रहते हैं। दिल्ली में भी एक ऐसा ही मंदिर है जहां हनुमान जी आज से हजारों सालों पहले प्रकट हुए थे और तब भी उन्होंने सैंकड़ों बुरी आत्माओं को मुक्ति प्रदान की थी। आइये दिल्ली के एक शक्तिशाली और बेहद महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के बारे में जानें जहां बिगड़ी बनाने वाले हनुमान जी की उपस्थिति आज भी है:-


दिल्ली के जमुना बाजार में स्थित है ये प्राचीन मंदिर
यह शक्तिशाली हनुमान मंदिर दिल्ली के जमुना बाजार में स्थित है जो मरघट वाले बाबा हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है। दिल्ली के कश्मीरी गेट के पास विराजित हनुमान जी के दर्शन को दिल्ली के हजारों लोग प्रतिदिन आते हैं। मंदिर के बारें में बताया जाता है कि यहां भगवान हनुमान साक्षात प्रकट हुए थे।

इतिहास
इस मंदिर का इतिहास यह है कि जब भगवान हनुमान लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी का पहाड़ लेकर लंका जा रहे थे तो वह दिल्ली के इसी स्थान पर कुछ देर के लिए ठहरे थे। इस मंदिर का नाम मरघट वाले बाबा हनुमान मंदिर इस वजह से विख्यात हुआ, क्योंकि हनुमान जब पहाड़ लेकर जा रहे थे तो उन्होंने नीचे यमुना नदी को बहते हुए देखा और यमुना जी के किनारे कुछ देर के लिए हनुमान जी आराम करना चाहा। लेकिन जब हनुमान नीचे उतरे तो उन्होंने देखा कि यहां तो शमशान घाट है और उनके यहां उतरने से बुरी आत्माओं में हाहाकार मच गया था। यहां उस समय हनुमान की उपस्थिति ने सभी आत्माओं को मुक्ति प्रदान की थी।

साथ ही साथ जब भगवान हनुमान ने माता यमुना जी के दर्शन किये तो तब यमुना जी ने भी हनुमान जी को बोला कि आपके दर्शन करने में हर साल आया करुंगी और यहां आपका एक शक्तिशाली मंदिर होगा। 


हर साल यमुना नदी का जल स्तर बढ़कर मंदिर तक आता है। निर्माण कार्य होने के बाद यमुना जी की धारा मंदिर तक नहीं आ पाई लेकिन यहां के साधुओं का कहना है कि कुछ सालों के अंतराल बाद यहां बाढ़ आती ही आती है और जब यमुना जी का हनुमान जी के दर्शन करने का मन होता है तो वह विशाल रूप लेकर मदिर में आ जाती हैं। मंदिर के सामने आज भी शमशान घाट है और जो आत्मा यहां अंतिम यात्रा में आती है उसे बाबा हनुमान जी पार लगाते हैं।


हर मंगलवार और शनिवार को मरघट वाले बाबा हनुमान मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त आते हैं और अपनी बिगड़ी तकदीर को संवारने की प्रार्थना हनुमान जी से करते हैं।

 

इस वजह से मरघट वाले बाबा हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है दिल्ली का ये मंदिर, चमत्कारों से भरी है गाथा

Poonam Yadav

Marghat Wale Baba Hanuman Mandir
Marghat Wale Baba Hanuman Mandir

मरघट वाले हनुमान मंदिर पुरानी दिल्ली के यमुना बाजार इलाके में स्थित है। दरअसल यहां मंदिर के सामने ही मरघट है। ऐसी मान्यता है कि रामायण काल में हनुमान जी जब संजीवनी बूटी लेकर जा रहे थे। तब हनुमान जी ने यहां यमुना नदी बहते देखी। तब हनुमान जी ने यहां कुछ देर विश्राम करने की सोची। लेकिन जब हनुमान नीचे उतरे तो उन्होंने देखा कि यहां तो शमशान घाट है और उनके यहां उतरने से बुरी आत्माओं में हाहाकार मच गया था। यहां उस समय हनुमान की उपस्थिति ने सभी आत्माओं को मुक्ति प्रदान की थी। हनुमान जी ने सबको मुक्ति प्रदान की। तब यमुना जी ने भी हनुमान जी से कहा कि वो प्रतिवर्ष एक बार उनके दर्शन करने आएंगी। तब से इसे मरघट वाले हनुमान बाबा मंदिर कहा जाने लगा।

यमुना जी करती हैं हनुमान जी के दर्शन 

इस मंदिर में भगवान हनुमान की मूर्ति जमीन के अन्दर लगभग 7-8 फीट नीचे है। पहले यह मंदिर यमुना नदी के किनारे पर स्थित था। धीरे-धीरे यमुना नदी का पानी कम होता चला गया और यमुना नदी मंदिर से दूर हो गयी। हालांकि,  हर साल यमुना नदी का जल स्तर बढ़कर मंदिर तक आता है। यहां के साधुओं का कहना है कि जब यमुना जी का हनुमान जी के दर्शन करने का मन होता है तो वह विशाल रूप लेकर इस मंदिर में आ जाती हैं। मंदिर के सामने आज भी शमशान घाट है और जो आत्मा यहां अंतिम यात्रा में आती है उसे बाबा हनुमान जी पार लगाते हैं।

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मरघट वाला हनुमान मंदिर में भक्त बहुत बडी संख्या में मंगलवार और शानिवार के दिन दर्शन के लिए आते हैं। बाबा के दर्शनों के लिए आये भक्तों को 1-1 घंटे लाईन में लगना पड़ता है। इस मंदिर में हनुमान जयंति का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 

 
 
 
 

Marghat Wale Baba Mandir: ‘मरघट वाले बाबा’ मंदिर की कहानी, जहां शपथ लेने से पहले पहुंचीं...

Varun Kumar

Marghat Wale Baba Mandir: 'मरघट वाले बाबा' मंदिर की कहानी, जहां शपथ लेने से पहले पहुंचीं थीं दिल्ली की नई CM रेखा गुप्ता

Marghat Wale Hanuman Baba Mandir

Marghat Wale Hanuman Baba Mandir: दिल्ली को आज उसका नया मुख्यमंत्री मिल गया जब रेखा गुप्ता ने राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर शपथ ली. शपथ लेने से पहले सीएम रेखा गुप्ता ने परिवार के साथ दिल्ली के मरघट वाले बाबा हनुमान मंदिर पहुंचकर बजरंगबली का आशीर्वाद लिया. दिल्ली की नई सीएम पहले भी कई बार इस मंदिर में दर्शन के लिए आ चुकी हैं. ये मंदिर राजधानी के प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है. ये मंदिर दिल्ली के यमुना बाजार में स्थित है.आइए इस मंदिर के प्राचीन इतिहास के बारे में जानते हैं.

पौराणिक कथाओं के अनुसार…

पौराणिक कथाओं के अनुसार, रामायण काल में जब बजरंगबली संजीवनी बूटी लेकर लंका जा रहे थे तब उन्होंने यहां यमुना नदी बहती देखी. इसके बाद हनुमान जी ने थोड़ा रुककर यहां विश्राम करने के बारे में सोचा, लेकिन जैसे ही वो यहां उतरे तो उन्होंने शमशान घाट देखा. हनुमान जी के यहां उतरने से बुरी आत्माएं डर गईं. तब हनुमान जी के यहां रहने मात्र से सभी आत्माओं को मोक्ष मिल गया. इसके बाद यमुना जी ने बजरंगबली से कहा कि वो हर साल एक बार उनके दर्शन के लिए आएंगी. इसके बाद से ही ये मंदिर मरघट वाले बाबा हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाने लगा.

सात-आठ फीट जमीन के नीचे है प्रतिमा

इस मंदिर में हनुमान जी की प्रतीमा लगभग सात-आठ फीट जमीन के नीचे है. पहले ये मंदिर यमुना नदी के किनारे था, लेकिन फिर जैसै-जैसे यमुना नदी का पानी कम होता गया वो इस मंदिर से दूर हो गईं. हालांकि हर साल जब यमुना नदी के पानी का जलस्तर बढ़ता है, तो वो इस मंदिर तक अवश्य पहुंचता है. यहां के साधुओं का मानना है कि जब यमुना जी का बजरंगबली का दर्शन करने का मन होता है, तो विशाल रूप ले लेती हैं और मरघट वाले बाबा हनुमान मंदिर में आ जाती हैं.

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इस मंदिर के सामने आज भी शमशान घाट है. मान्यता है कि इस शमशान घाट में जो भी अंतिम यात्रा पर आता है उसे बजरंगबली की कृपा से मोक्ष प्राप्त होता है. मरघट वाले हनुमान मंदिर में मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. यहां बजरंगबली के दर्शन के लिए भक्त एक-एक घंटे तक लाइन लगती है. इस मंदिर में हनुमान जयंती के दिन बड़ी धूम देखने को मिलती है.

 

दिल्ली का मरघट वाले बाबा का मंदिर, क्या है इस मंदिर का इतिहास, जानें विशेषता

Hanuman Ji: हनुमान जयंती का पर्व साल 2024 में 23 अप्रैल को मनाया जाएगा. इस खास मौके पर पढ़ें क्यों प्रसिद्ध है दिल्ली का मरघट वाले बाबा का मंदिर.











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Hanuman Ji: हनुमान जयंती का पर्व साल 2024 में 23 अप्रैल, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा. मंगलवार और हनुमान जयंती का संयोग बहुत ही अद्भुत है.

हनुमान जी के प्रसिद्ध मंदिरों की सूची में शामिल है दिल्ली का मश्हूर मरघट वाले बाबा (Marghat Wale Baba) का मंदिर.

यह हनुमान जी (Hanuman Ji) का मंदिर है जो मरघट वाले बाबा (Marghat Wale Baba) के नाम से प्रसिद्ध है.

दिल्ली के यमुना बाजार (Yamuna Bazaar) में बना यह मंदिर जहां हर मंगलवार और शनिवार को हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने के लिए आते हैं.

क्यों कहते हैं इस मंदिर को मरघट वाले बाबा का मंदिर? (Kyu Kehte Hain Isse Marghat Wale Baba Ka Mandir?)

ऐसी मान्यता है कि रामायण काल में जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लक्ष्मण जी के लिए लेकर जा रहे थे, तब इसी जगह पर हनुमान जी विश्राम करने के लिए रुके थे.

उस समय हनुमान जी ने युमाना नदी (Yamuna River) को देखा और उन्होंने इस जगह पर विश्राम भी किया.

इस जगह पर मरघट यानि शमशान घाट है.

हनुमान जी के आने पर शमशान में बुरी आत्माओं  में हाहाकार मच गया, तब हनुमान जी ने सभी आत्माओं को मुक्ति प्रदान की.

इसीलिए इस जगह पर मरघट .यानि शमशान होने की वजह से इस मंदिर को मरघट वाले बाबा के नाम से जाना जाता है.

तब यमुना जी ने भी हनुमान जी से कहा कि वो प्रतिवर्ष एक बार उनके दर्शन करने आएंगी.

तब से इसे मरघट वाले हनुमान बाबा मंदिर कहा जाने लगा.

यह मंदिर यमुना नदी (Yamuna River) के किनारे स्थित है. इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति जमीन से करीब 7 से 8 फीट नीचे तक है.

इस विख्यात मंदिर के दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं. मान्यता है मरघट वाले बाबा इस जगह से सभी की नैय्या पार लगाते हैं.

हनुमान जी के इस प्रसिद्ध मंदिर में हनुमान जयंती के अवसर पर लोग दर्शन के लिए आते है.

 
 
 

Marghat Wale Baba, Mandir (मरघट वाले बाबा मंदिर, दिल्ली) - दिल्ली का चमत्कारी हनुमान मंदिर I Bhakt Vatsal


दर्शन समय

5 AM - 12:30 PM & 4 PM - 10 PM

मरघट वाले बाबा हनुमान के नाम से प्रसिद्ध है दिल्ली का ये मंदिर

दिल्ली के यमुना बाजार स्थित मरघट वाले बाबा का मंदिर चमत्कारी हनुमान मंदिरों में से एक है। यहां पर हनुमान जी को मरघट वाले बाबा हनुमान कहा जाता है। दिल्ली के यमुना बाजार में बना यह मंदिर जहां हर मंगलवार और शनिवार को हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। बाबा के दर्शन के लिए आये भक्तों को 1-1 घंटे तक लाईन में लगना पड़ता है। हर साल मंदिर में हनुमान जयंति का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 

मंदिर का इतिहास

पौराणिक कथा अनुसार, रामायण काल में जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर लक्ष्मण जी के लिए लेकर जा रहे थे, उस समय हनुमान जी ने युमना नदी को देखा और उन्होंने इस जगह पर विश्राम किया। जब हनुमान नीचे उतरे तो उन्होंने देखा कि यहां तो श्मशान घाट है और हनुमान जी के आते ही श्मशान के बुरी आत्माओं में हाहाकार मच गया, फिर हनुमान जी ने सभी आत्माओं को मुक्ति प्रदान की। यमुना जी ने भी हनुमान जी से कहा कि वो प्रतिवर्ष एक बार उनके दर्शन करने आएंगी। इसलिए इस जगह पर मरघट, यानी श्मशान होने की वजह से इस मंदिर को मरघट वाले बाबा के नाम से जाना जाता है। तब से इसे मरघट वाले हनुमान बाबा मंदिर कहा जाने लगा। 

मंदिर की विशेषता 

यह मंदिर यमुना नदी के किनारे स्थित है। बता दें कि इस मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति जमीन से करीब 7 से 8 फीट नीचे तक है। पहले यह मंदिर यमुना नदी के किनारे स्थित था। फिर धीरे-धीरे यमुना नदी का पानी कम होता गया और यमुना नदी मंदिर से दूर  होती गई। हालांकि, हर साल यमुना नदी का जल स्तर बढ़कर मंदिर तक आता है। मान्यता के अनुसार, यमुना जी ने हनुमान जी से कहा था कि वो प्रतिवर्ष एक बार उनके दर्शन करने आएंगी। इसलिए जब यमुना जी का हनुमान जी के दर्शन करने का मन होता है तो वह विशाल रूप लेकर इस मंदिर में आ जाती हैं। 

कैसे पहुंचे मरघट वाले बाबा मंदिर 

यह मंदिर कश्मीरी गेट के पास स्थित है। मंदिर तक पहुंचने का नजदीकी मेट्रो स्टेशन यमुना बाजार है। 

समय - सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:30 बजे, दोपहर 4:00 बजे से रात 10:00 बजे

डिसक्लेमर

'इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।

 
 
 

Bharat Jodo Yatra: ‘मरघट वाले बाबा’ के मंदिर पहुंचे राहुल गांधी, इंदिरा से लेकर संजय गांधी यहां झुकाते रहे हैं सिर; कुछ ऐसा है इतिहास

लाइफस्टाइल डेस्क

कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ (Bharat Jodo Yatra) 9 दिनों के ब्रेक के बाद फिर से शुरू हो गई है। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर पहुंचे। यहां दर्शन पूजन और हनुमान चालीसा के पाठ के बाद यात्रा शुरुआत की। गांधी परिवार का मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर से पुराना नाता रहा है और इस मंदिर पर गहरी आस्था है।

साल 1973 में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) पहली बार मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर पहुंची थीं। आगे भी सिलसिला बरकरार रहा। राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) और उनके चाचा संजय गांधी (Sanjay Gandhi) भी यहां आते रहे हैं।

कैसे पड़ा मंदिर का नाम?

मरघट वाले हनुमान जी का मंदिर (Marghat Wale Baba Mandir) कश्मीरी गेट के जमुना बाजार इलाके में स्थित है। तमाम लोग इस मंदिर को मरघट वाले बाबा के नाम से भी पुकारते हैं। कभी इस मंदिर के ठीक किनारे से यमुना नदी बहा करती थी, लेकिन धीरे-धीरे यमुना का पानी घटता चला गया और नदी, मंदिर से दूर हो गई। हालांकि अब भी जब कभी यमुना में बाढ़ आती है, तो कई बार यमुना का पानी मंदिर के दरवाजे तक आ जाता है। मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर में बजरंगबली की प्रतिमा जमीन तल से करीब 8 फीट नीचे है।

मंदिर के सामने आज भी है श्मशान घाट

मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर (Marghat Wale Hanuman Ji Ka Mandir) के ठीक सामने श्मशान घाट है, जहां आज भी शवों का दाह-संस्कार किया जाता है। बताया जाता है कि यह श्मशान रामायण काल का है। श्मशान की वजह से ही इस मंदिर का नाम मरघट वाले हनुमान जी का मंदिर पड़ा।

मंदिर को लेकर क्या हैं मान्यताएं?

मरघट वाले हनुमान जी के मंदिर को लेकर कई तरह की प्राचीन और पौराणिक मान्यताएं हैं। मंदिर के पुजारी दावा करते हैं कि यहां स्वयं हनुमान जी प्रकट हुए थे। सबसे पौराणिक और प्राचीन दावा रामायण (Ramayan) और महाभारत काल (Mahabharat Period) से जुड़ा बताया जाता। कहा जाता है कि मरघट वाले हनुमान जी का मंदिर उन पांच मंदिरों में से एक है जिन्हें महाभारत काल के दौरान पांडवों ने बनवाया था।

रामायण काल से जुड़ा है एक किस्सा

एक अन्य पौराणिक मान्यता है कि युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण मूर्छित हुए तो हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने इसी रास्ते से गए थे। उन्होंने यहीं रुक कर विश्राम किया था। धीरे-धीरे इस मंदिर की ख्याति बढ़ती चलती गई।

प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को यहां काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। तमाम राजनेता से लेकर फिल्मी हस्तियां भी अक्सर यहां आया करती हैं।

 
 

हनुमान का अद्भुत मंदिर जहां करीब 50 साल से गूंज रही है राम धुन -


आज आपको बताते हैं हनुमान जी के ऐसे मंदिर के बारे में जो राम धुन के चलते विश्‍व कीर्तिमान का हकदार बना।

By Molly SethEdited By: Updated: Tue, 24 Apr 2018 10:43 AM (IST)

हनुमान का अद्भुत मंदिर जहां करीब 50 साल से गूंज रही है राम धुन

गुजरात राज्‍य के जामनगर में जामनगर में रणमल झील के दक्षिण पूर्व में हनुमान जी का एक चमत्‍कारी मंदिर है। इस मंदिर की स्‍थापना सन् 1540 में जामनगर की स्थापना के साथ ही हुई थी। इस मंदिर की खासियत केवल इसका अति प्राचीन होना ही नहीं है, बल्‍कि आज लोग इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्डस का हिस्‍सा होने के चलते भी पहचानते हैं। मंदिर के संरक्षकों के अनुसार 1964 में श्री भिक्‍क्षु जी महाराज ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उसके तीन साल बाद उन्‍होंने ही श्रीराम धुन के निरंतर जाप की परंपरा प्रारंभ करवाई थी। इसी कारण इस मंदिर का विश्‍व कीर्तिमान में शामिल किया गया है।

यह विडियो भी देखें

50 साल से भी पुरानी परंपरा 

1 अगस्त 1964 में, यानि करीब 54 साल पहले महाराज जी के कहने पर हनुमान भक्‍तों ने 'श्री राम जय राम जय जय राम' मंत्र का जाप 7 दिनों तक लगातार 24 घंटों तक करने का निर्णय लिया। जो बाद में एक अंतहीन परंपरा बन गई और आज तक जारी है। इस राम धुन के जाप में एक अौश्र विशेषता है कि इसे गाने वाले सामान्‍य भक्‍तजन ही हैं कोई पेशेवर गायक नहीं। अब तो इनकी बाकयदा सूची बना कर एक दिन पहले नोटिस बोर्ड पर लगा दी जाती है। विशेष परिस्‍थितियों के चलते भी कोई विघ्‍न ना पड़े इसके लिए चार चार गायकों का नाम अतिरिक्‍त गायकों की लिए रखा जाता है। इसके साथ ही मंदिर में कोई भी भक्त स्वयं अपनी मर्जी से भी राम धुन भजन सभा में शामिल हो सकता है। 

भूकंप में भी अबाध रही सुर लहरी 

विशेष बात ये है कि मंदिर में आने वाले भक्‍तों ने अनथक प्रयास से करीब आधी सदी बीत जाने पर भी राम धुन की लहर को टूटने नहीं दिया है। यहां तक कि 2001 में गुजरात में आये विनाशकारी भूकंप के दौरान भी लोगों ने राम धुन का जाप निरंतर जारी रखा था। 

Bala Hanuman Mandir in Jamnagar, Gujarat - Temples in Gujarat

Gujarat Expert Team

Shri Bala Hanuman Mandir, one of the most ancient temples and one of the best places of tourist attraction was established around 1963-64 by the great saint Shri Prembhikshuji Maharaj. The temple is the most popular temple of Jamnagar, Gujarat as its name is in the famous Guinness Book of world record because of the chanting of ‘Sri Ram Jai Ram Jai Jai Ram’. The spectacularly designed temple has been the place for constant holy chanting for the past 54 years.

Location

The temple stands on the southeastern shore of the Ranmal Lake or Lakhota Lake in the Jamnagar city of Gujarat.

History

Bala Hanuman Mandir in Jamnagar

There is a history of the Bala Hanuman Temple Jamnagar. Shri Prem Bhushan Ji Maharaj was the man who established the Bala Hanuman temple during the years 1963-64. For this reason, the “ram dhun” is chanted in the name of Shri Prem Bhushan Ji Maharaj in many places. This temple is considered as one of the oldest ones that he has built.

Jamnagar itself is a history which dates way back to 1540 A.D. Jamnagar is also called as “Nawanagar” meanings “new city”. It was built by Shri Jam Raval who was a descendant of Jam Halla, regarded as one of the heirs of Lord Krishna. Apart from Bala Hanuman Mandir, Jamnagar is also famous for many other temples such as Kileshwar temple, Bhidbhanjan temple, Sidhnath Mahadev Temple etc. This city is beautifully designed with good roads and mesmerizing gardens and at one time in the past was also famously called as “Jewel of Kathiyawad”.

Shri Prem Bhushan Ji, in the later stages of his life, became a saint (sanyas). He was the person who started the tradition of Akhand which is the chanting of “Ram Nama” at Jamnagar and this tradition gradually spread across various areas of Dwarka, Porbandar, Rajkot, Junagadh and many more. The Bala Hanuman temple has the blend of aesthetic devotion. The atmosphere of purity and sanctity attracts pilgrims all over the world.

Temple Timings

The temple opens at 6.00am in the morning and closes at 9.00pm in the night. It is open for visitors all through the week.

Best Time to Visit

Pilgrims and tourists from all over the world are attracted to this devotional temple. There are different timings for different occasion every week which is otherwise known as Darshan Timing. The Darshan Timing of every week are- Mangal Darshan on Sundays at 6 am, Shangar Darshan on Mondays at 6.30 am, Mangala Aarti at Tuesdays at 7 am, Raj Bhog on Wednesdays at 12.00 pm, Utthapan on Thursdays at 4.30  pm, Sandhya Aarti on Fridays at 7.00 pm and Shayan Darshan on Saturdays at 10.00 pm.

How to Reach

Another reason for Bala Hanuman Temple to be a place of famous tourist attraction is its location with respect to transport. This temple can be accessed with all sorts of transportation system i.e. by rail, road and by air. By road, there are various state transport buses and private luxury coaches available that connect Jamnagar with various centres of Gujarat, by rail, the nearest railway station is the Hapa railway station which is 28 km away from the temple and by air if you wish to travel, you need to fly to Keshod airport that lies nearest to the temple

Where to Stay

The ideal places to stay during the visit to Bala Hanuman Temple are –

  • The Hotel Regency located on the Pandit Nehru Marg at Valkeshwari is a very reasonable place to stay with spacious rooms and delicious eatables.
  • Hotel Hanuman at Belgaum also offers well-suited accommodation at very attractive rates. It is a special place for its soothing atmosphere and advantageous position near the temple.
  • Hotel Viraj Inn at Jamnagar is known for its excellent service and impeccable room qualities.

Places of Interest
Some of the places of interest near Bala Hanuman Temple Jamnagar are:

  • The Bhidbhanjan temple is also a popular place to visit if you are planning to visit the Bala Hanuman temple. It is a divine place of Lord Shiva and is known for its famous architecture with the blend of western influence.
  • The Dwarkadhish temple, another important pilgrimage destination is worth paying a visit. It is a holy place of Lord Dwarkadhish or Lord Krishna. It is also famously called as Jagat Mandir. Its peaceful atmosphere indulges the feelings of divinity through peace offerings.
  • The BAPS Shri Swaminarayan temple at Indira Marg is yet another famous spot to visit. The effective management of the preparation of the daily meal is what which attract lots of tourists here. People also come here to visit its wonderful structure of innate beauty.

The temple is in of Bala Hanuman, as the name suggests is for Lord Hanuman. Come here and visit the devotional temple and feel the love of Lord Hanuman to Lord Rama and Sita.

Shri Bala Hanuman Mandir Map

List of Temples in Gujarat

Essential Information on Shopping in Gujarat

बाला हनुमान मंदिर, जामनगर | श्री राम धुन संकीर्तन मंदिर | विश्व प्रसिद्ध हनुमान मंदिर I Bhakt Vatsal


जामनगर का प्रसिद्ध बाला हनुमान मंदिर, जहां मंदिर के बाहर लगाई जाती है गायकों की सूची

जामनगर की रणमल झील के दक्षिण पूर्व में हनुमान जी का एक चमत्कारिक मंदिर प्राचीनता और अनोखी भक्ति भाव के चलते मशहूर है। बाला हनुमान मंदिर, जिसे श्री बाला हनुमान संकीर्तन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हनुमान जी को समर्पित यह मंदिर झील से एक चौड़ी सड़क द्वारा अलग है। साधारण दिखने वाले इस मंदिर में भगवान राम, भगवान लक्ष्मण, देवी सीता और हनुमान जी की मूर्तियां है। स्थानीय लोगों का मानना है कि ये मंदिर उन्हें प्राकृतिक आपदाओं से बचाता है।

मंदिर का इतिहास और वास्तुकला

इस मंदिर की स्थापना 1540 ईं में हुई थी, इस मंदिर का निर्माण श्री प्रेम भिक्षु जी महाराज ने 1 अगस्त 1964 में किया था। इस मंदिर के महाराज के कहने पर हनुमान भक्तों ने श्री राम धुन का जाप 7 दिन के लिए शुरू किया था जो लगातार इतने सालों से जारी है। बिना रुके बिना थके हनुमान भक्त श्री राम का जाप करते रहते हैं। 24 घंटे श्री राम, जयराम, जय जय राम के जाप के लिए इस का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। जामनगर का इतिहास 1540 ईं से जुड़ा हुआ है। जामनगर को नवानगर भी कहा जाता है जिसका अर्थ है नया शहर।

इसका निर्माण श्री जाम रावल ने करवाया था जो जाम हाला के वंशज थे, जिन्हें भगवान कृष्ण के उत्तराधिकारियों में से एक माना जाता है। यह मंदिर जटिल वास्तुकला को चित्रित करता है जिसमें जातीय डिजाइन शामिल है खंभे और अद्भुत नक्काशी है।

मंदिर में एक दिन पहले लगती है सूची

राम धुन यहां पर एक परंपरा बन गई है जो आज तक जारी है। इसे गाने वाले कोई पेशेवर गायक नहीं है सामान्य भक्तजन ही है। अब तो यहां पर सूची बनाकर एक दिन पहले नोटिस बोर्ड पर लगा दी जाती है। विशेष परिस्थितियों के चलते भी कोई विघ्न न पड़े इसके लिए चार गायकों का नाम अतिरिक्त गायकों की सूची में रखा जाता है। इसके साथ ही मंदिर में कोई भी भक्त स्वयं अपनी मर्जी से भी राम धुन भजन सभा में शामिल हो सकता है।

लोगों की गहरी आस्था

बाबा हनुमान मंदिर में लोगों की गहरी आस्था है, लोगों का मानना है कि यह मंदिर उन्हें विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं और अन्य परेशानियों से बचाता है। यहां आरती दिन में दो बार और शाम को होती है। शाम के समय होने वाली आरती में बड़ी संख्या में लोग हिस्सा लेते है।

मंदिर के त्योहार

बाला हनुमान मंदिर में हनुमान जयंती जैसे त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, निरंतर जप अपने आप में एक कार्यक्रम बन गया है, जिसमे दुनिया भर से लोग भाग लेने और धार्मिक भक्ति के लिए आकर्षित होते हैं।

बाला हनुमान मंदिर कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग - यहां का निकटतम हवाई अड्डा जामनगर एयरपोर्ट है जो शहर से केवल 9 से 10 किमी की दूरी पर है और मुंबई, अहमदाबाद, वडोदरा और अन्य गुजराती शहरों से जुड़ा हुआ है। यहां से आप टैक्सी के द्वारा मंदिर पहुंच सकते है।

रेल मार्ग - यहां का निकटतम रेलवे स्टेशन जामनगर पुराना रेलवे स्टेशन है जो मंदिर से लगभग 4 किमी दूर है। भारत के कई राज्यों से जामनगर तक नियमित और साप्ताहिक ट्रेनें आती है। स्टेशन से आप ऑटो या टैक्सी के द्वारा मंदिर पहुंच सकते है।

सड़क मार्ग - जामनगर विभिन्न राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आप आसानी से यहां तक पहुंच सकते हैं।

मंदिर का समय- ये मंदिर सुबह 6 बजे से लेकर रात 10 बजे तक खुला रहता है।

बाला हनुमान मंदिर जामनगर- गुजरात में मंदिर


बाला हनुमान मंदिर जामनगर, गुजरात

बाला हनुमान मंदिर, जिसे श्री बालहनुमान संकीर्तन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, जामनगर में रणमल झील (या लखोटा झील) के दक्षिण पूर्व की ओर स्थित है। भगवान हनुमान को समर्पित यह मंदिर झील से एक चौड़ी सड़क द्वारा अलग है। साधारण दिखने वाले इस मंदिर में भगवान राम, भगवान लक्ष्मण, देवी सीता और भगवान हनुमान की मूर्तियाँ हैं।

1 अगस्त, 1964 से मंदिर परिसर में दिन-रात राम धुन - 'श्री राम, जय राम, जय जय राम' का जाप होता रहता है। इस चौबीसों घंटे चलने वाले अनुष्ठान को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा मान्यता दी गई है और सूचीबद्ध किया गया है। स्थानीय लोगों की मंदिर में गहरी आस्था है और उनका मानना ​​है कि यह उन्हें प्राकृतिक आपदाओं और अन्य परेशानियों से बचाता है। आरती (पूजा की रस्म) दिन में दो बार (सुबह और शाम) होती है। शाम की आरती दिन की सबसे प्रतीक्षित घटना है।

लखोटा झील में पक्षियों की विभिन्न प्रजातियाँ आती हैं, खास तौर पर प्रवास के दौरान, जो समग्र वातावरण को और भी खास बना देता है। लखोटा किला और संग्रहालय झील के अंदर एक द्वीप पर स्थित हैं और दो रास्तों से पहुँचा जा सकता है जो उन्हें किनारे से जोड़ते हैं। झील के अंदर बोटिंग का मज़ा लेकर आप इस जगह का मज़ा बढ़ा सकते हैं।

बाला हनुमान मंदिर तक कैसे पहुंचें?

बस द्वारा: जामनगर विभिन्न राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जामनगर और गुजरात के अन्य शहरों (राजकोट, सोमनाथ, द्वारका, गांधीधाम, पोरबंदर, सूरत, भुज) के बीच कई राज्य और निजी बसें चलती हैं।

रेल मार्ग से: जामनगर पुराना रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग 4 किमी दूर है। आप भारत के कुछ राज्यों (जैसे दिल्ली और मुंबई) से जामनगर तक नियमित या साप्ताहिक ट्रेनें पा सकते हैं। गुजरात के कई शहरों (अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत) से जामनगर के लिए दैनिक ट्रेनें ली जा सकती हैं।

हवाई मार्ग से: जामनगर हवाई अड्डा शहर से 9/10 किमी दूर है और मुंबई, अहमदाबाद, वडोदरा और अन्य गुजराती शहरों से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, आप अहमदाबाद तक उड़ान भर सकते हैं और फिर कार, बस या ट्रेन से जामनगर पहुँच सकते हैं।

मंदिर के आसपास देखने लायक जगहें

  • नारारा मरीन नेशनल पार्क लगभग 55 किमी दूर है। ज्वार कम होने पर 'कोरल वॉक' करने के लिए सड़क मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है। घूमने का सबसे अच्छा समय दिसंबर से मार्च के बीच है।
  • द्वारकाधीश मंदिर यहां से लगभग 143 किमी दूर है।
  • मंदिर से 14 किमी की दूरी पर खिजड़िया पक्षी अभयारण्य आपको अद्भुत स्थानीय और प्रवासी पक्षियों के मनमोहक दृश्य दिखा सकता है। यहाँ आने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच है।
 

नकारात्मक शक्तियों की चपेट में आए व्यक्ति की हर पीड़ा समाप्त करते हैं सारंगपुर हनुमान, संपूर्ण वानर सेना के साथ हैं यहां विराजमान

तमन्ना जटवानी

SpeakingTree.in

<span class="OYPEnA text-decoration-none text-strikethrough-none">सारंगपुर हनुमान जी की कथा</span>


कष्टभंजन हनुमान मंदिर सारंगपुर, अहमदाबाद के भावनगर रेलवे लाइन पर स्थित वोटाद जंक्शन से करीब 12 मील दूर है। मंदिर में हनुमान जी की बलवान स्वरूप की मूर्ति स्थापित है। कष्टभंजन हनुमान मंदिर की स्थापना 1905 विक्रम संवत् में हुई थी। इस मंदिर की नींव अश्विन कृष्ण पक्ष की पंचमी में पड़ी थी। इस मंदिर को सदगुरु गोपालानंद स्वामी ने बनवाया था। जानकारों के अनुसार करीब 200 वर्ष पहले स्वामी नारायण मंदिर के स्थान पर सत्संग कर रहे थे। वे उस समय बजरंगबली की भक्ति में तल्लीन थे। तभी स्वामी नारायण को हनुमान जी के उस दिव्य रूप के दर्शन हुए। इसी के बाद मंदिर का निर्माण हुआ।

स्वामी नारायण के भक्त ने कराई स्थापना
कष्टभंजन हनुमान मंदिर का निर्माण स्वामी नारायण के भक्त गोपालानंद स्वामी ने कराया था। उन्होंने यहां बजरंगबली के बलशाली स्वरूप की मूर्ति की स्थापना कराई। मंदिर प्रशासन के अनुसार बजरंगबली की मूर्ति में साक्षात भगवान विराजमान है। मंदिर में मूर्ति की प्रतिष्ठा के समय स्वामी गोपालानंद ने इसे एक रॉड से इसे स्पर्श किया था। तभी मूर्ति में जान आ गई और वह हिलने लगी थी।

वानर सेना के साथ विराजमान
मंदिर में हनुमान जी की प्रभावशाली मूर्ति है। यहां बजरंगबली रौबदार मूछों के साथ एक महाराजा की तरह सिंहासन पर विराजमान है, जबकि उनके चारों ओर वानर सेना का दल है।

सोने और चांदी से बना सिंहासन

मंदिर में जिस सिंहासन पर बजरंगबली विराजमान है, उसमें 45 किलो सोना और 95 किलो चांदी का प्रयोग किया गया है, जबकि हनुमान जी के मुकुट में असंख्य हीरे-जवाहरात जड़े हुए हैं। सिंहासन के पास सोने की गदा रखी हुई है।

बजरंगबली के पैरों के नीचे शनि देव

यूं तो कर्मफलदाता शनि से सभी डरते हैं लेकिन शनिदेव खुद बजरंगबली से डरते हैं। सारंगपुर कष्टभंजन मंदिर में शनिदेव, हनुमान जी के पैरों के नीचे हैं। शनि देव यहां एक स्त्री के रूप में है। एक कथा के अनुसार भक्तों ने शनि देव के प्रकोप से रक्षा के लिये हनुमान जी की आराधना की। अपने भक्तों की पुकार सुनकर हनुमान जी ने शनिदेव को दंडित करने का निर्णय लिया.... ब्रह्मचारी होने की वजह से वे स्त्री पर हाथ नहीं उठा सकते, इस कारण उनसे बचने के लिए शनिदेव ने स्त्री का रूप धारण किया था।

श्रीराम के आदेश पर दमन किया
शनिदेव के प्रकोप से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान श्री राम ने हनुमान जी को निर्देश दिया था, जिस जातक पर शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती होती है वे शनिदेव के प्रभाव से बचने के लिये इस मंदिर में नारियल चढ़ाते हैं। कष्टभंजन मंदिर में भूत-प्रेत बाधा व अन्य नकारात्मक शक्तियों का भी नाश होता है। माना जाता है कि नकारात्मक ऊर्जाओं से पीड़ित को यहां बजरंगबली के सामने लाने व उनकी आंखों में देखने से समस्या दूर हो जाती है। इसके लिए यहां विशेष पूजा शनिवार के दिन होती है।

रॉड से छुआकर दूर हाते हैं कष्ट
जिन लोगों पर नकारात्मक शक्तियां हावी होती हैं और वे मानसिक रूप से विचलित होते हैं, ऐसे लोगों को बजरंगबली की मूर्ति के सामने खड़ा किया जाता है और उन्हें वो रॉड स्पर्श कराई जाती है। जिसका इस्तेमाल मूर्ति स्थापना के समय स्वामी गोपालानंद ने किया था।


1899 में हुआ विस्तार
मंदिर की देखरेख के लिए कोठारी गोरधन दास ने सन् 1899 में शास्त्री यंगनापुरुष को नियुक्त किया। शास्त्री ने अपने समयकाल में मंदिर प्रांगण का विस्तार किया। इसी के साथ मंदिर के पास में अपने आवास का भी निर्माण कराया।

लेखक के बारे में

"तमन्ना जटवानी पिछले 12 वर्षों से सक्रिय लेखन से जुड़ी हैं। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत ऑल इण्डिया रेडियो में प्रोडक्शन असिस्टेंट के रूप में की थी और बहुत ही जल्द उन्होंने डिजिटल मीडिया में काम करना आरंभ कर दिया। कॅरियर के शुरुआती समय में उन्होंने राजनीति, समाज, लाइफस्टाइल के साथ ज्वलंत मुद्दों पर काफी तार्किक और बेहतरीन लेख लिखे। लेखन के अलावा उन्हें नए-नए विषयों को समझने और उन पर रिसर्च करने में भी गहरी रुचि है। जहां तक हॉबीज की बात है तो तमन्ना घूमने-फिरने और मौज-मस्ती करने की शौकीन हैं, उन्हें फैमिली के साथ आउटिंग करना बहुत पसंद है। इसके अलावा म्यूजिक और रीडिंग का भी उन्हें क्रेज है। स्पीकिंग ट्री के साथ वे पिछले 9 वर्षों से जुड़ी हैं। इस प्लेटफॉर्म पर आकर उन्होंने लेखन की नई शैली विकसित की है। फिलहाल वे आध्यात्मिक विषयों पर लिख रही हैं।"

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श्री हनुमान मंदिर सारंगपूर संपूर्ण माहिती Shri Hanuman Mandir Sarangpur Information In Marathi » मराठी मोल

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Shri Hanuman Mandir Sarangpur Information In Marathi श्री हनुमान मंदिर हे सारंगपूर, गुजरात सारंगपूर  येथे स्थित एक हिंदू मंदिर आहे, जे स्वामीनारायण पंथाच्या वडताल गडीचे आहे. हे एकमेव स्वामीनारायण मंदिर आहे ज्यात पूजेची प्राथमिक देवता म्हणून स्वामीनारायण किंवा कृष्णाच्या मूर्ती नाहीत. या हनुमानाला कष्टभंजन म्हणून ओळखले जाते.

श्री हनुमान मंदिर सारंगपूर संपूर्ण माहिती Shri Hanuman Mandir Sarangpur Information In Marathi

मंदिराचा इतिहास:-

हे मंदिर स्वामीनारायण संप्रदायात अधिक प्रमुख आहे. सद्गुरू गोपालानंद स्वामींनी हनुमानाच्या मूर्तीची स्थापना केली. लेखक रेमंड विलियम्सच्या मते, अशी नोंद आहे की जेव्हा सद्गुरू गोपालानंद स्वामींनी हनुमानाची प्रतिमा स्थापित केली, तेव्हा त्यांनी त्यास लोखंडी काठीने स्पर्श केला आणि प्रतिमा जिवंत झाली आणि हस्तांतरित करण्यात आली. ही कथा या मंदिरात केल्या जाणाऱ्या उपचारांच्या विधींसाठी एक सनद बनली आहे.

हनुमानाची प्रतिमा हँडलबार मिशा असलेली एक भक्कम आकृती आहे, मादी राक्षसाला त्याच्या पायाखाली चिरडणे आणि दात काढणे, फळ देणाऱ्या माकड परिचारकांनी भरलेल्या मूर्तींमध्ये उभे राहणे. १८९९ मध्ये वडतालच्या कोठारी गोरधनदास यांनी मंदिराचे कामकाज सांभाळण्यासाठी शास्त्री यज्ञपुरुषांची नियुक्ती केली; त्यांच्या कार्यकाळात शास्त्री यज्ञपुरुषदास यांनी जागेचे नूतनीकरण केले, शेजारील बंगला बांधला आणि कॉम्प्लेक्सच्या सध्याच्या स्थितीत आणण्यासाठी अधिक जमीन संपादित केली.

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मंदिराची वास्तू:-

या मंदिराची प्रतिमा इतकी शक्तिशाली असल्याचे म्हटले जाते की त्यावर नजर ठेवल्याने वाईट आत्म्यांवर परिणाम होईल. शनिवार हा मानसिक आजार आणि इतर विकारांनी ग्रस्त लोकांसाठी विशेष विधीसाठी नियुक्त केलेला दिवस आहे. सद्गुरू गोपालानंद स्वामींनी प्रतिमेच्या प्रतिष्ठापना समारंभात वापरलेल्या काठीतून त्यांना मंदिरात आणले जाते.

ही काडी आता चांदीने झाकलेली आहे. मंदिर प्रशासनाने एका ब्राह्मण गृहस्थाला मंदिरात पुजारी म्हणून काम करण्यासाठी आणि हा विधी करण्यासाठी नियुक्त केले आहे. त्यानंतर, प्रभावित व्यक्तीला मंदिराची प्रदक्षिणा घालण्याची आणि अनेक भेटीनंतर त्याची पुनरावृत्ती करण्याचे निर्देश दिले जातात. काही लोक ठराविक वेळा किंवा असे करताना स्वामीनारायण महामंत्राचा जप करण्याचे विशेष व्रत घेतात.

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रोजची पूजा आणि उत्सव:-

सोमवार-शुक्रवार: सकाळी ९:०० ते १२:०० आणि संध्याकाळी ४:०० ते ८:००.

शनिवार, रविवार: सकाळी ९:०० ते रात्री ८:००.

अतिरिक्त माहिती:-

दरवर्षी साजरा होणाऱ्या काही प्रमुख सणांमध्ये राम नवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्री, होळी, गणेश चतुर्थी आणि दिवाळी यांचा समावेश होतो. हिंदू नववर्ष चिन्हांकित करून, दिवाळी हा हिंदूंच्या सर्वात मोठ्या सणांपैकी एक आहे आणि मंदिरात अनेक पाहुणे आणि भक्त आकर्षित करतात.

सारंगपूर हे BAPS श्री स्वामीनारायण शिखरबाधा मंदिरासाठी देखील प्रसिद्ध आहे, जे शास्त्री यज्ञपुरुषदास यांनी १९१६ मध्ये बांधले होते, जे गुजरातमधील दुसरे सर्वात उंच मंदिर आहे जे १०८ फूट (स्वामीनारायण संप्रदायातील शुभ क्रमांक १०८) आहे. हे नव्याने दाखल झालेल्या साधू (भिक्षु) साठी मुख्यालय आणि प्रशिक्षण केंद्र आहे.

हे निबंध सुद्धा अवश्य वाचा :-

Meenakshi Amman Temple Information In Marathi

FAQ

सारंगपूर मंदिर कशासाठी प्रसिद्ध आहे?

हे मंदिर मूळ स्वामीनारायण संप्रदायातील प्रमुख मंदिरांपैकी एक आहे. हनुमानाच्या मूर्तीची स्थापना गोपालानंद स्वामींनी केली होती. लेखक रेमंड विल्यम्सच्या म्हणण्यानुसार, सद्गुरु गोपाल आनंद स्वामींनी हनुमानाच्या मूर्तीची प्रतिष्ठापना केली तेव्हा त्यांनी तिला काठीने स्पर्श केला आणि मूर्ती जिवंत झाली आणि हलली.

सारंगपूर हनुमान मंदिर किती जुने आहे?

सालंगपूर हनुमान मंदिर म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या कष्टभंजन हनुमान मंदिराचा इतिहास विस्तृत आणि आकर्षक आहे. हे एकोणिसाव्या शतकात प्रसिद्ध संत गोपालानंद स्वामी यांनी बांधले होते आणि तेव्हापासून भगवान हनुमानाचे अनुयायी वारंवार भेट देत आहेत.

सारंगपूर हनुमान मंदिरची रोजची पूजाची वेळ किती असतो?

सोमवार-शुक्रवार: सकाळी ९:०० ते १२:०० आणि संध्याकाळी ४:०० ते ८:००.
शनिवार, रविवार: सकाळी ९:०० ते रात्री ८:००.




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जाखू मंदिर शिमला (समय, इतिहास, प्रवेश शुल्क, चित्र, पूजा / आरती, स्थान और फ़ोन)

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जाखू मंदिर, शिमला पर्यटक आकर्षण

जाखू मंदिर शिमला प्रवेश शुल्क

  • कोई प्रवेश शुल्क नहीं

जाखू मंदिर शिमला फ़ोन

0177 2652561

जाखू मंदिर शिमला पता : जाखू मंदिर पार्क, जाखू , शिमला , हिमाचल प्रदेश , 171001 , भारत

शिमला टूर पैकेज

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जाखू मंदिर शिमला का समय

दिन समय
सोमवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
मंगलवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
बुधवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
गुरुवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
शुक्रवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
शनिवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक
रविवार सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक

लिंक: | नक्शा


शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं की जीवंत सुंदरता के बीच बसा जाखू मंदिर एक प्राचीन हनुमान मंदिर है जो "पवन पुत्र" के भक्तों को एक रहस्यमयी अनुभूति प्रदान करता है। शिमला के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में से एक , यहाँ भगवान हनुमान की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति है, जो हिंदू समुदाय के अलावा सभी उम्र के छुट्टियों के लिए आने वाले लोगों को आकर्षित करती है।

पास के शहर संजौली के ऊपर स्थित जाखू मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में अद्भुत नज़ारे देखने को मिलते हैं जो इस जगह को और भी शानदार बनाते हैं। यह विस्मयकारी सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद लेने के लिए एक शानदार जगह है और ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए एक साहसिक ड्राइव है। इसके अलावा, हरे-भरे घुमावदार रास्ते प्रकृति प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन अनुभव हैं।

जाखू मंदिर, शिमला का इतिहास

जाखू मंदिर से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कहानी है। आम तौर पर कहा जाता है कि रामायण के युद्ध के दौरान, राम के छोटे भाई लक्ष्मण एक शक्तिशाली तीर से घायल हो गए और बेहोश हो गए। कई प्रयासों के बावजूद उन्हें होश में नहीं लाया जा सका। तब, एक प्रसिद्ध पुजारी ने भगवान राम से कहा कि उन्हें वापस जीवन में लाने के लिए एक विशेष संजीवनी जड़ी-बूटी की आवश्यकता है। हनुमान को हिमालय से जड़ी-बूटी लाने का काम सौंपा गया।

हिमालय की ओर जाते समय, हनुमान को पहाड़ी की चोटी पर ऋषि याकू मिले। हनुमान ने पहाड़ पर बैठकर जड़ी-बूटी के बारे में उनके संदेह को दूर किया। पर्वत उनका वजन सहन नहीं कर सका और चपटा होकर आधा रह गया। जड़ी-बूटी के बारे में पर्याप्त जानकारी एकत्र करने के बाद, उन्होंने याकू से वादा किया कि लंका वापस जाते समय वे उनसे मिलेंगे।

हालाँकि, वापस लौटते समय उन्हें कालनेमि नामक राक्षस से युद्ध करना पड़ा, जिसने उन्हें बेवकूफ़ बनाने की कोशिश की, जिसमें उनका बहुत सारा कीमती समय बर्बाद हो गया। समय पर लंका पहुँचने के लिए, उन्होंने ऋषि से न मिलकर सबसे छोटा रास्ता चुना। जब ऋषि निराश हुए, तो उन्होंने उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने और वादा तोड़ने का कारण बताने का सोचा।

जैसे ही हनुमान उस स्थान से चले गए, पहाड़ी पर उनकी एक मूर्ति प्रकट हो गई। भगवान की यात्रा के सम्मान में याकू ने वहां एक मंदिर बनवाया। आज भी यह माना जाता है कि मंदिर में हनुमान के पैरों के निशान हैं और मंदिर के आसपास रहने वाले बंदर भगवान हनुमान के वंशज हैं।

Image Gallery of Jakhu Temple Shimla

Architecture of Jakhoo Temple, Shimla

Positioned at the highest peak in Shimla, Jakhoo Temple offers several reasons to visit this place. Surrounded by lofty mountains and deodar trees, the trail up to the temple lets you soak in the mesmerizing beauty – with gorgeous views at your backdrop.

The premises hold several paintings that represent the story of Hanuman during Ramayana. Installed in 2010, the 108 feet long idol of Hanuman is an attraction in itself and has enticed a huge number of tourists throughout the years. Illuminated with lights in the night, it is a grand sight to watch on your Shimla tour and is visible from anywhere in Shimla.

Things to do in Jakhoo Temple, Shimla

Apart from its religious significance, Jakhoo Temple also keeps its tourists occupied with many things to do in Shimla. Here is a list of top 6 places to visit in and around the temple -

Jakhoo Hill – Surrounded by Alpine trees, snow-capped Himalayan mountains and the evergreens valleys, Jakhoo Hill is a favorite escape for visitors wanting to relax away from the city life. Here you can spend hours just by looking at the clouds or simply capture the breathtaking scenery. This place is also famous for its trekking activity. It is only 0.4 km away from Jakhoo Temple.

Lakkar Bazaar – Widely known as the popular shopping street of Shimla, Lakkar Bazaar is an old wooden market from where you can bring some wooden handicrafts back home. In addition, the local market is also famous for selling handmade artifacts, key chains, Himachali woollen items at competitive prices. It is only 0.6 km away from Jakhoo Temple.

Sky Jumper Trampoline Park – Have an unparalleled experience with your family and children at Sky Jumper Trampoline Park. From gaming arcade to dash cars, basketball, volleyball and other recreational activities, the amusement park takes care of everyone’s enjoyment. It is only 0.8 km away from Jakhoo Temple.

The Ridge – An ideal place for tourists to spend some leisure evenings, The Ridge lets you breathe in the fresh air while you click some pictures on your Shimla tour. It offers more of a laid-back atmosphere to overlook the panoramic beauty and has an array of fine-dining restaurants, bars and shops – to make your experience an unforgettable one. It is only 1 km away from Jakhoo Temple.

Christ Church – For all those who are after a mix of peace and spirituality, Christ Church is a great place to visit. Perfect for history lovers and archaeological fanatics, the Christ Church allows you to go back in time and re-cherish the past memories. It is only 1.3 km away from Jakhoo Temple.

काली बाड़ी मंदिर - शिमला में आने पर काली बाड़ी मंदिर से आशीर्वाद लेना न भूलें। 1845 में निर्मित यह मंदिर देवी काली के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग है। अपने खाली समय में आश्चर्यजनक परिदृश्य देखें या कैंटीन में मुंह में पानी लाने वाले बंगाली भोजन का आनंद लें। मंदिर में पर्यटकों की सुविधा के लिए एक गेस्ट हाउस भी है। यह जाखू मंदिर से केवल 1.7 किमी दूर है।

जाखू मंदिर, शिमला में प्रवेश शुल्क और समय

शिमला में जाखू मंदिर में प्रवेश के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। यह प्रतिदिन सुबह 7 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है।

जाखू मंदिर, शिमला के लिए यात्रा सुझाव

  • यह सुनिश्चित करें कि जूते-चप्पल मंदिर परिसर के बाहर ही छोड़ें।
  • मंदिर में जाते समय अपने हाथ में कुछ भी न ले जाएँ। यहाँ के बंदर आपसे चीज़ें छीनने के लिए मशहूर हैं।
  • अपने रास्ते में बंदरों से नज़रें मिलाने से बचें। आप उन्हें दूर रखने के लिए 10 रुपये की छड़ी भी किराए पर ले सकते हैं।

जाखू मंदिर, शिमला कैसे पहुंचें?

चूंकि जाखू मंदिर शहर के केंद्र से थोड़ी ही दूरी पर है, इसलिए अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए 2 किमी का खूबसूरत रास्ता पैदल चलना बहुत आसान है। सड़क मार्ग पर शिवालिक पर्वतमाला और खड़ी ढलानों का आनंद लेने के लिए आप टैक्सी या शेयर्ड कैब भी किराए पर ले सकते हैं।

हालांकि, शिमला में जाखू मंदिर तक पहुंचने का सबसे आसान तरीका एक नया रोपवे है जो आपको 5 मिनट में रिज से सीधे मंदिर तक ले जाता है। मंदिर में आने वाले पर्यटकों को हवा में ऊपर से सुंदर परिदृश्य और ब्रिटिश युग की वास्तुकला को देखने का जीवन भर का मौका मिलता है। दो-तरफ़ा यात्रा की लागत लगभग 500 रुपये प्रति व्यक्ति (वयस्कों के लिए) और 400 रुपये प्रति व्यक्ति (बच्चों के लिए) है।

  • शिमला बस स्टैंड से जाखू मंदिर की दूरी: 3.4 किमी
  • शिमला रेलवे स्टेशन से जाखू मंदिर की दूरी: 3.2 किमी

यदि आप सड़क मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं, तो आप शिमला में शीर्ष कार किराये की कंपनियों में से किसी एक से निजी वाहन भी किराये पर ले सकते हैं ।


चाहे आप प्रकृति प्रेमी हों, फ़ोटोग्राफ़र हों या हनुमान भक्त हों, शिमला के जाखू मंदिर में जाना आइसक्रीम पर चेरी लगाने जैसा है। यह स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी कुछ समय के लिए सांसारिक दुनिया से खुद को अलग करने के लिए एक आदर्श स्थान है।

शिमला टूरिज्म में हम, हॉलिडे डीएनए के एक विभाग में, हर किसी की ज़रूरतों और बजट सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, अपने ग्राहकों को शिमला टूर पैकेज की एक विस्तृत विविधता जेब-अनुकूल कीमतों पर पेश करते हैं। आप अपनी छुट्टी का अधिकतम लाभ उठाने के लिए सबसे अच्छा सौदा चुन सकते हैं। छूट और उपलब्ध सभी समावेशी पैकेजों के बारे में अधिक जानने के लिए, कृपया हमसे संपर्क करें फ़ॉर्म भरें। हमारे टूर प्रतिनिधियों में से एक जल्द ही आपसे संपर्क करेगा।

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Hanuman Jayanti: अमिताभ बच्चन की बेटी ने बनवाई है जाखू मंदिर में 108 फीट ऊंंची हनुमान की मूर्ति, संजीवनी ला...

Vinod Kumar Katwal

हिंदी समाचार / photo gallery / himachal-pradesh / Hanuman Jayanti: अमिताभ बच्चन की बेटी ने बनवाई है जाखू मंदिर में 108 फीट ऊंंची हनुमान की मूर्ति, संजीवनी लाते वक्त यहां रुके थे बजरंग बलि

Hanman Jayanti 2023: 108 फीट ऊंचाई इस हनुमान जी की मूर्ति का निर्माण बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नन्दा और दामाद निखिल नन्दा ने करवाया है. साल 2010 में पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल ने इस उद्घाटन किया था.

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शिमला. हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है. यहां पर देवी-देवताओं का वास है. शिव-पार्वती से लेकर भगवान राम सीता और हनुमान से कई जुड़ी किवदंतियां यहां देखने और सुनने मिलती है. क्योंकि आज हनुमान जंयती है ऐसे में हम आपको हिमाचल प्रदेश के शिमला के प्रसिद्ध जाखू मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं. (सभी फोटो-इशू ठाकुर, शिमला)

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इसके अलावा मंदिर की सजावट गेंदे और अन्य फूलों से की गई है. सुबह 7:00 बजे आरती के बाद हनुमान को रोट, हलवे और भंडारे का भोग लगाया गया है.

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पहाड़ी की रानी शिमला शहर की सबसे ऊंची चोटी जाखू हिल्स में 108 मीटर ऊंची हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की गई है.

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कहा जाता है कि जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने जा रहे थे, तब उन्होंने जाखू पहाड़ी पर विश्राम किया था. थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हनुमान अपने साथियों को यहीं छोड़कर अकेले ही संजीवनी बूटी लाने के लिए निकल पड़े थे.

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इस मंदिर को हनुमान जी के पैरों के निशान के पास बनाया गया है. खास बात यह भी है कि इस मंदिर को रामायण काल के समय का बताया जाता है. जाखू मंदिर में जो समुद्र तल से 8040 फुट की ऊँचाई पर जाखू पहाड़ पर स्थित है.

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श्वेता नंदा और अखिल नंदा ने बनवाया है मूर्तिः 108 फीट ऊंचाई इस हनुमान जी की मूर्ति का निर्माण बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नन्दा और दामाद निखिल नन्दा ने करवाया है. साल 2010 में पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल ने इस उद्घाटन किया था. इस दौरान मौके पर अभिनेता और श्वेता के भाई अभिषेक बच्चन मौजूद रहे थे.

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शुक्रवार को जाखू हनुमान मंदिर में हनुमान जयंती पर डेढ़ क्विंटल का रोट चढ़ाया गया है. जयंती पर सुबह 4:00 बजे ही मंदिर के कपाट खुल गए और इसके बाद हनुमान का शृंगार दिल्ली से मंगवाएं कमल, जैसमीन और गुलाब के फूलों से किया गया.

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जाखू मन्दिर

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जाखू मंदिर

जाखू मंदिर का सामना

धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिंदु धर्म
देवताहनुमान
त्यौहारदशहरा
अवस्थिति जानकारी
अवस्थितिजाखू पहाडी, शिमला, हिमाचल प्रदेश
ज़िलाशिमला
राज्यहिमाचल प्रदेश
देशभारत

जाखू मन्दिर is located in हिमाचल प्रदेश

जाखू मन्दिर

हिमाचल प्रदेश के मानचित्र पर अवस्थिति

भौगोलिक निर्देशांक31°06′04″N 77°10′55″E / 31.1011706°N 77.1818317°Eनिर्देशांक: 31°06′04″N 77°10′55″E / 31.1011706°N 77.1818317°E
वास्तु विवरण
शैलीकाठ कुनी वास्तुकला
ऊँचाई (अधि.)108 फ़ुट.

जाखू मंदिर, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में "जाखू" पहाड़ी पर स्थित हनुमान का एक मंदिर है। धार्मिक पर्यटन के अलावा यह स्थान ट्रैकिंग के लिए भी प्रसिद्ध है।

पौराणिक कथा के अनुसार, रामायण की लड़ाई के दौरान, जब लक्ष्मण को एक तीर से बेहोश कर दिया गया था, वैद्य सुशेन के अनुरोध पर, भगवान राम ने उन्हें ठीक करने के लिए अपने भक्त हनुमान से हिमालय से संजीवनी बूटी लाने के लिए कहा। जब हनुमान संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, रास्ते में उन्होंने एक ऋषि को एक पहाड़ पर ध्यान करते हुए देखा। संजीवनी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, हनुमान उस पर्वत पर उतरे और "यक्ष" ऋषि से मिले।

ऋषि यक्ष द्वारा निर्देशित पाकर हनुमान ने उनसे हिमालय लौटने का वादा किया। लेकिन हनुमान को रास्ते में कालनेमि राक्षस ने युद्ध को ललकारा। राक्षस को युद्ध में परास्त कर हनुमान मे संजीवनी प्राप्त की लेकिन इस कारण हुए विलंब के कारण हनुमान "यक्ष" ऋषि से मिलने वापस नहीं जा सके। जब हनुमान नहीं लौटे तो ऋषि चिंतित हो गए। तो हनुमान स्वयं ऋषि के सामने पर्वत पर प्रकट हुए। ऐसा कहा जाता है कि ऋषियों ने उसी स्थान पर हनुमान की एक मूर्ति स्थापित की थी। आज भी यह मूर्ति मंदिर में स्थापित है।

ऋषि "यक्ष" के नाम पर पर्वत को शुरू में "यक्ष" नाम दिया गया था। लेकिन यह "यक्ष" के "याक", "याक" के "याखू" और "याखू" के "जाखू" में भ्रष्ट हो गया था। हनुमान के पदचिन्हों को संगमरमर में उकेरा गया है और संरक्षित किया गया है। पर्यटक आज भी इसे देखने आ सकते हैं।

यह मंदिर समुद्र तल से 8048 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। वर्ष 2010 में हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार ने यहां 108 फीट की हनुमान प्रतिमा स्थापित की थी। यह भारत की दूसरी सबसे ऊंची मूर्ति है। इस मूर्ति को पूरे शिमला से देखा जा सकता है। यहां पैदल, निजी कार या रोपवे से पहुंचा जा सकता है। पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश द्वार के पास लकड़ी के डंडे का इंतजाम किया गया है. इसका उपयोग लकड़ी के डंडे पर चढ़ने और बंदरों को भगाने के लिए किया जाता है।

रोपवे से यात्रा करने वाले पर्यटक शिमला में "रिज" नामक स्थान से मंदिर तक पहुंच सकते हैं। शिमला के प्रसिद्ध माल रोड से जाखू मंदिर तक पहुंचने की भी व्यवस्था की गई है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन "शिमला" है। हिमाचल परिवहन के अधिकार क्षेत्र में निकटतम बस अड्डा "शिमला" बस अड्डा है। पर्यटक वहां जल्दी पहुंचने के लिए हवाई मार्ग से भी जा सकते हैं। "जब्बारहट्टी" हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है। हवाई अड्डा शिमला से 22 किमी की दूरी पर बनाया गया है। "दिल्ली" से "जब्बारहट्टी" हवाई अड्डे के लिए उडाने उपलब्ध हैं।

हिमाचल प्रदेश की राज्य सरकार हर साल इस पर्वत पर पर्वतारोहण कार्यक्रम आयोजित करती है। ताकि इस पर्वत का विकास हो सके और इसकी ख्याति पूरी दुनिया में फैले। 

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Jakhu Temple in Shimla - Hanuman Temple in Himachal Pradesh


शिमला में जाखू मंदिर

जाखू मंदिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला की जीवंत सुंदरता में स्थित है। यह शिमला में एक पुराना या प्राचीन मंदिर है जो हिंदू भगवान "हनुमान" को समर्पित है। यह पवित्र मंदिर "पवन पुत्र" यानी हनुमान जी के भक्तों को एक रहस्यमयी अनुभव प्रदान करता है।

जाखू मंदिर में भगवान हनुमान की पूरी दुनिया में सबसे बड़ी मूर्ति है जो पूरे साल कई पर्यटकों या तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती है। यह सुंदर सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद लेने के लिए एक शानदार जगह है। जाखू मंदिर तक पैदल, टैक्सी, घोड़े और रोपवे द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। जाखू पहाड़ी से न केवल शिमला के नज़ारे दिखते हैं बल्कि भव्य शिवालिक पर्वत श्रृंखला का भी सुंदर नज़ारा दिखता है।

जाखू मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय

जाखू मंदिर में किसी भी दिन जाया जा सकता है क्योंकि यह सप्ताह में 7 दिन खुला रहता है और आप पूरे साल यहां आ सकते हैं। यहां का मौसम पूरे साल सुहाना रहता है। दिसंबर से फरवरी के महीने में यहां बर्फबारी होती है। हमारा सुझाव है कि आप मानसून में यहां आने से बचें।

जाखू मंदिर ट्रेक के लिए लघु यात्रा कार्यक्रम

दिन 1:- शिमला आगमन और जाखू मंदिर तक ट्रेक

शिमला पहुंचकर होटल में चेक-इन करें और थोड़ा आराम करें। जाखू मंदिर के लिए अपनी यात्रा शुरू करें। अगर आप यात्रा करने में सक्षम नहीं हैं तो आप घोड़े, टट्टू, कुली आदि किराए पर ले सकते हैं। जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए रोपवे की सवारी भी उपलब्ध है। जाखू मंदिर पहुँचने के बाद, भगवान हनुमान जी से कुछ आशीर्वाद लें और जाखू पहाड़ी की चोटी से सुंदर दृश्य देखें। शिमला वापस ट्रेक करें। शिमला में डिनर और रात भर रुकें।

दिन 2:- प्रस्थान

नाश्ते के बाद शिमला से प्रस्थान। हमारी सेवाएँ यहीं समाप्त हो जाएँगी।

जाखू मंदिर का स्थान और कैसे पहुंचें

हवाई मार्ग से:-  जाखू मंदिर ट्रेक तक पहुँचने के लिए जुब्बड़हट्टी हवाई अड्डा सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा है। यह शिमला से 22 किमी की दूरी पर स्थित है। आप निजी टैक्सी किराए पर लेकर या किसी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करके आसानी से शिमला पहुँच सकते हैं।

रेल द्वारा:  शिमला रेलवे स्टेशन जाखू मंदिर ट्रेक के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है। दिल्ली और कलकत्ता जैसे शहरों से यहाँ के लिए काफी अच्छी संख्या में ट्रेनें उपलब्ध हैं। आप कालका रेलवे स्टेशन से टॉय ट्रेन की सवारी भी कर सकते हैं। आप निजी टैक्सी किराए पर लेकर या किसी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करके आसानी से शिमला पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग से:-  शिमला चंडीगढ़, दिल्ली, देहरादून और कालका जैसे शहरों से सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। शिमला पहुँचने के लिए आप टैक्सी और सीधी बसें किराए पर ले सकते हैं। दिल्ली से आप कुछ लग्जरी बसें और कैब भी ले सकते हैं जो आरामदायक यात्रा प्रदान करेंगी।

शिमला कैसे पहुंचें गाइड पढ़ें ।

जाखू मंदिर किस लिए प्रसिद्ध है?

जाखू मंदिर निम्नलिखित गतिविधियों/रुचियों के लिए लोकप्रिय स्थान है - लंबी पैदल यात्रा , तीर्थयात्रा , धार्मिक , मंदिर


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जाखू मंदिर, शिमला

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जाखू मंदिर, शिमला

जाखू मंदिर, शिमला
जाखू मंदिर, शिमला
विवरण 'जाखू मंदिर' भगवान श्रीराम के भक्त हनुमान को समर्पित है। शिमला के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है, जिसकी बड़ी मान्यता है।
राज्य हिमाचल प्रदेश
ज़िला शिमला
निर्माता ऋषि याकू
निर्माण काल रामायण काल
भौगोलिक स्थिति 'जाखू पहाड़ी' पर समुद्र तल से 8048 फीट की ऊँचाई पर स्थित।
प्रसिद्धि हिन्दू धार्मिक स्थल
संबंधित लेख हनुमान, हिमाचल प्रदेश, शिमला विशेष 'जाखू मंदिर' में हनुमान की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है, जिसकी ऊँचाई 108 फीट है। ये प्रतिमा वर्ष 2010 में स्थापित की गई थी। इससे पहले केवल आंध्र प्रदेश में ही 135 फीट की ऊँचाई वाली मूर्ति स्थापित है।
अन्य जानकारी शिमला के सबसे लोकप्रिय स्पॉट मॉल मार्ग से 'जाखू मंदिर' के लिए रास्ता बना है। घने देवदार के पेड़ों के बीच 'जाखू मंदिर' हनुमान का ऐतिहासिक मंदिर है।

जाखू मंदिर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह प्रसिद्ध मंदिर 'जाखू पहाड़ी' पर स्थित है। भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान को समर्पित यह मंदिर हिन्दू आस्था का मुख्य केंद्र है। मंदिर परिसर में बहुत से बंदर रहते हैं। पहाड़ी पर राज्य सरकार द्वारा विभिन्न ट्रैकिंग और पर्वतारोहण गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। जाखू मंदिर की चोटी से शिमला शहर का विहंगम नज़ारा देखने का आनंद ही कुछ और है। यहाँ आने वाले पर्यटक 2100 मीटर से अधिक की ऊंचाई से कई किलोमीटर दूर तक परमपिता की अभिनव चित्रकारी का आनंद उठा सकते हैं।

स्थिति

जाखू मंदिर, जाखू पहाड़ी पर समुद्र तल से 8048 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यह बर्फीली चोटियों, घाटियों और शिमला शहर का सुंदर और मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। भगवान हनुमान को समर्पित यह धार्मिक केंद्र 'रिज' के निकट स्थित है। यहाँ से पर्यटक सूर्योदय और सूर्यास्त के लुभावने दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।

मान्याता

पौराणिक कथा के अनुसार राम तथा रावण के मध्य हुए युद्ध के दौरान मेघनाद के तीर से भगवान राम के अनुज लक्ष्मण घायल एवं मूर्छित हो गए थे। उस समय सब उपचार निष्फल हो जाने के कारण वैद्यराज सुषेण ने कहा कि अब एक ही उपाय शेष बचा है। हिमालय की संजीवनी बूटी से लक्ष्मण की जान बचायी जा सकती है। इस संकट की घड़ी में रामभक्त हनुमान ने कहा प्रभु मैं संजीवनी लेकर आता हूँ। हनुमानजी हिमालय की और उड़े, रास्ते में उन्होंने नीचे पहाड़ी पर 'याकू' नामक ऋषि को देखा तो वे नीचे पहाड़ी पर उतरे। जिस समय हनुमान पहाड़ी पर उतरे, उस समय पहाड़ी उनका भार सहन न कर सकी। परिणाम स्वरूप पहाड़ी जमीन में धंस गई। मूल पहाड़ी आधी से ज्यादा धरती में समा गई। इस पहाड़ी का नाम 'जाखू' है। यह 'जाखू' नाम ऋषि याकू के नाम पर पड़ा था।

हनुमान ने ऋषि को नमन कर संजीवनी बूटी के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की तथा ऋषि को वचन दिया कि संजीवनी लेकर आते समय ऋषि के आश्रम पर ज़रूर आएंगे। हनुमान ने रास्ते में 'कालनेमी' नामक राक्षस द्वारा रास्ता रोकने पर युद्ध करके उसे परास्त किया। इस दौड़धूप तथा समयाभाव के कारण हनुमान ऋषि के आश्रम नहीं जा सके। हनुमान याकू ऋषि को नाराज नहीं करना चाहते थे, इस कारण अचानक प्रकट होकर और अपना विग्रह बनाकर अलोप हो गए। ऋषि याकू ने हनुमान की स्मृति में मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर में जहां हनुमानजी ने अपने चरण रखे थे, उन चरणों को संगमरमर पत्थर से बनवाकर रखा गया है। ऋषि ने वरदान दिया कि बंदरों के देवता हनुमान जब तक यह पहाड़ी है, लोगों द्वारा पूजे जाएंगे।

अन्य किवदंति

शिमला के सबसे लोकप्रिय स्पॉट मॉल मार्ग से जाखू मंदिर के लिए रास्ता बना है। घने देवदार के पेड़ों के बीच जाखू मंदिर हनुमान का ऐतिहासिक मंदिर है। एक अन्य किवदंति के अनुसार हनुमान जब संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, तब उन्होंने जाखू मंदिर पर विश्राम किया था। बूटी के लिए जाते समय बजरंगबली ने शिमला की उक्त पहाड़ी पर विश्राम किया था। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हनुमान अपने साथियों को यहीं पर छोड़ कर अकेले ही संजीवनी बूटी लाने के लिए निकल पड़े थे। ऐसा माना जाता है कि उनके वानर साथियों ने यह समझकर कि बजरंगबली उनसे नाराज होकर अकेले ही गए हैं, उनका यहीं पहाड़ी पर वापस लौटने का इंतजार करते रहे। इसी के परिणामस्वरूप आज भी यहाँ व्यापक संख्या में वानर पाए जाते हैं।

विशाल प्रतिमा

जाखू मंदिर में अब हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा भी लगी है, जिसकी ऊँचाई 108 फीट है। ये प्रतिमा वर्ष 2010 में स्थापित की गई थी। इससे पहले केवल आंध्र प्रदेश में ही 135 फीट की ऊंचाई वाली मूर्ति स्थापित है। शिमला में कहीं से भी आपको हनुमान जी दिखाई देते हैं। मंदिर के गेट पर बंदरों से बचने के लिए छड़ी भी मिलती है। लेकिन बंदरों से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाये तो ही अच्छा है। बताया जाता है कि जाखू मंदिर परिसर में सदियों से बंदरों की टोलियां रहती हैं।

पर्वतारोहण

पहाड़ी पर राज्य सरकार द्वारा विभिन्न ट्रैकिंग और पर्वतारोहण गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। ट्रैकिंग मार्ग मनोरम पाइन के जंगलों से घिरा हुआ है। आगंतुक जाखू मंदिर तक पहुँचने के लिए 'पोनी' (टट्टू) भी किराए पर ले सकते हैं। जाखू पहाड़ी के आधार क्षेत्र में बहुत-सी दुकाने हैं, जो ट्रैकर्स को ऊपर चढ़ाने में मदद के लिए वॉकिंग स्टिक्स आदि प्रदान करती हैं। 

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जाखू मंदिर, हनुमान ने लिया संजीवनी का ज्ञान, आज भी हैं चरण चिन्ह I Bhaktvatsal


लक्ष्मण को बचाने हनुमान ने जाखू मंदिर में लिया था संजीवनी का ज्ञान, आज भी मौजूद हैं चरण चिन्ह 

हनुमान जी को समर्पित जाखू मंदिर, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में जाखू पहाड़ी पर स्थित है। धार्मिक पर्यटन के अलावा ये स्थान ट्रैकिंग के लिए भी प्रसिद्ध है। 108 फीट ऊंची इस प्रतिमा को शिमला के किसी भी कोने से देखा जा सकता है। जाखू मंदिर की चोटी से शिमला शहर का विहंगम नजारा देखा जा सकता है। 

ऋषि याकू से जुड़ी जाखू मंदिर की कहानी

जाखू मंदिर से एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। रामायण के युद्ध में जब शक्ति अस्त्र से लक्ष्मण मृ्त्यु शय्या पर थे, तब हनुमान को संजीवनी बूटी  लेने के लिए हिमालय भेजा गया था। हिमालय की ओर जाते हुए हनुमान जी की मुलाकात पहाड़ी की चोटी पर ऋषि याकू से हुई। हनुमान ने पहाड़ पर बैठकर जड़ी-बूटी के बारे में उनके संदेह को दूर किया। जड़ी बूटी के बारे में पर्याप्त जानकारी इकट्ठा करने के बाद उन्होंने याकू से वादा किया कि वे लंका वापस जाते समय उनसे मिलेंगे। हालांकि वापस आते समय उन्हें कालनेमि नामक राक्षस से युद्ध करना पड़ा। इसमें उनका बहुत सारा समय बर्बाद हो गया। समय से लंका पहुंचने के लिए, उन्होंने ऋषि से न मिलने का विकल्प चुना और सबसे छोटा रास्ता चुना।

जब ऋषि निराश हुए, तो हनुमान व्यक्तिगत रूप से मिलने और वचन तोड़ने का कारण बताने पहुंचे। जब हनुमान वहां से चले गये तो पहाड़ी पर उनकी एक मूर्ति प्रकट हुई। भगवान की यात्रा की सम्मान करने के लिए याकू ने वहां एक मंदिर बनवाया। आज भी माना जाता है कि मंदिर में हनुमान के पैरों के निशान है और मंदिर के आसपास रहने वाले बंदर भगवान हनुमान के वंशज है। हनुमान जी की ये स्वयंभू प्रतिमा आज भी मंदिर के आंगन में स्थापित है।

108 फीट ऊंचे हनुमान आकर्षण का केंद्र

मंदिर परिसर में कई पेंटिंग है जो रामायण के दौरान हनुमान की कहानी को दर्शाती हैं। 2010 में स्थापित हनुमान जी की 108 फीट लंबी मूर्ति आकर्षण का केन्द्र है। सालों से बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित किया है। यह पैदल, निजी कार या रोपवे से पहुंचा जा सकता है। पैदल चलने वालो के लिए प्रवेश द्वार के पास लकड़ी के डंडे का इंतजाम किया गया है। रोपवे से यात्रा करने वाले पर्यटक शिमला में रिज नामक स्थान से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

जाखू मंदिर जाने से पहले जानने योग्य बातें

मंदिर जाते वक्त अपने हाथ में कुछ न रखें क्योंकि यहां के बंदर आपसे चीजे छीनने के लिए बहुत मशहूर है। वहीं जाते वक्त बंदरों से नजरे न मिलाये। आप उन्हें दूर करने के लिए छड़ी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।

एस्केलेटर से पहुंचे मंदिर

एस्केलेटर को मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर 108 फीट ऊंचा मूर्ति तक बनाया गया है। इस एस्केलेटर को दो हिस्सों में बनाया गया है, एक एस्केलेटर की लंबाई करीब 11 मीटर है। एक घंटे के अंदर इस एस्केलेटर से लगभग 6 हजार लोग मंदिर तक जा सकते हैं। बता दें, इसे बनाने में करीब डेढ़ साल लगे, और इसकी लागत 8 करोड़ रुपये आई है। अब एस्केलेटर की मदद से करीब डेढ़ मिनट में आप ये सफर पूरा कर सकते हैं।

जाखू मंदिर कैसे पहुंचे

हवाई अड्डा - हवाई मार्ग द्वारा शिमला आसानी से पहुंचा जा सकता है। जुब्बरहट्टी नाम की जगह पर इसका अपना हवाई अड्डा है, जो मुख्य शहर केंद्र से 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नई दिल्ली, चंडीगढ़ और कुल्लू से उड़ाने दैनिक आधार पर संचालित है। आप हवाई अड्डा से टैक्सी से मंदिर तक जा सकते हैं।

रेल मार्ग - रेलमार्ग से भी शिमला देश के बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। शिमला की रेल लाइन अपनी सुंदरता के लिए विश्व विख्यात है। कालका-शिमला रेल लाइन को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा प्राप्त है। 

सड़क मार्ग - शिमला उत्तर भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। चंडीगढ़, शिमला से निकटतम प्रमुख शहर है जो यहां से 120 किमी की दूरी पर है। दिल्ली से शिमला की दूरी लगभग 380 किमी है, लेकिन दिल्ली से शिमला पहुंचने के लिए कई सारे साधन उपलब्ध हैं। 



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सालासर बालाजी

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सालासर बालाजी

सालासर बालाजी

सालासर बालाजी के मंदिर में स्थापित बालाजी की मूर्ति

धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धताहिन्दू धर्म
देवताहनुमान
अवस्थिति जानकारी
ज़िलाचुरू
राज्यराजस्थान
देशभारत

सालासर बालाजी is located in राजस्थान

सालासर बालाजी

राजस्थान में सालासर बालाजी मंदिर की स्थिति

भौगोलिक निर्देशांक27°43′N 74°43′E / 27.72°N 74.71°Eनिर्देशांक: 27°43′N 74°43′E / 27.72°N 74.71°E
वेबसाइट
https://shreesalasarbalajimandir.com

सालासर बालाजी मंदिर भगवान हनुमान के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है। यह राजस्थान के चुरू जिले में जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर स्थित है।[1] [2]वर्ष भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। [3]हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। भारत में यह एकमात्र बालाजी का मंदिर है जिसमे बालाजी के दाढ़ी और मूँछ है। सालासर धाम में आने वाले सभी यात्रियों की सुविधा व धाम का विकास “श्री बालाजी मंदिर” के माध्यम से “श्री हनुमान सेवा समिति” द्वारा समुचित रूप से किया जाता है। यहाँ रहने के लिए कई धर्मशालाएँ और खाने-पीने के लिए कई जलपान-गृह (रेस्तराँ) हैं। श्री सालासर बालाजी मंदिर सालासर कस्बे के ठीक मध्य में स्थित है। यहाँ की मान्यता है की मात्र नारियल बांधने से बालाजी महाराज सभी इच्छाओं को पूरी करते है।

सालासर कस्बा, राजस्थान में चूरू जिले का एक हिस्सा है और यह जयपुर - बीकानेर राजमार्ग पर स्थित है।[4] यह सीकर से 57 किलोमीटर, सुजानगढ़ से 24 किलोमीटर और लक्ष्मणगढ़ से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सालासर कस्बा सुजानगढ़ पंचायत समिति के अधिकार क्षेत्र में आता है और राजस्थान राज्य सड़क परिवहन निगम की नियमित बस सेवा के द्वारा दिल्ली, जयपुर और बीकानेर से भली प्रकार से जुड़ा है। इंडियन एयरलाइंस और जेट एयर सेवा जो जयपुर तक उड़ान भरती हैं, यहाँ से बस या टैक्सी के द्वारा सालासर पहुँचने में 3.5 घंटे का समय लगता है। सुजानगढ़, सीकर, डीडवाना, जयपुर और रतनगढ़ सालासर बालाजी के नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। https://www.travelkiduniyaa.info/2024/06/Salasar-Mein-Ghumne-Jagah.html 'दोस्तो आज के इस लेख में आपको सालासर में घूमने लायक जगह (Salasar Mein Ghumne ki Jagah) के बारे में बताएंगे। जिनको आप सालासर में जाने के बाद इस लेख में बताई गई जगह को घूमना बिल्कुल भी ना भूलें। दोस्तो इस लेख में बताई गई जगह सभी पर्यटक को बहुत ही सुन्दर वा आकर्षक लगती है।' https://www.travelkiduniyaa.info/2024/06/Salasar-Mein-Ghumne-Jagah.html : श्री सालासर बालाजी मंदिर श्री अंजनी माता मंदिर श्री राम जानकी मंदिर सेठानी का जोहरा खाटू श्याम जी [5][6]

संत शिरोमणी, सिद्धपुरूष, भक्त प्रवर श्री मोहनदास जी महाराज की असीम भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं रामदूत श्री हनुमान जी ने मूर्ति रूप में विक्रम संवत् 1811 (सन् 1755) श्रावण शुक्ला नवमी शनिवार, आसोटा ग्राम में प्रकट होकर अपने परम भक्त मोहनदास जी महाराज की मनोकामना पूर्ण की। अपने आराध्य से प्राप्त आशीर्वाद के फलस्वरूप श्री मोहनदास जी ने विक्रम संवत 1815 (सन् 1759) में सालासर में उदयराम जी द्वारा मंदिर-निर्माण करवाकर श्री उदयराम जी एवं उनके वंशजों को सेवा-पूजा का कार्य सौंपकर स्वयं जीवित समाधिस्थ हो गये।[7][8][9]

श्रावण शुक्लपक्ष नवमी, संवत् 1811 - शनिवार को एक चमत्कार हुआ। नागौर जिले में असोटा गाँव का एक किसान अपने खेत को जोत रहा था।अचानक उसके हल से कोई पथरीली चीज़ टकरायी और एक गूँजती हुई आवाज पैदा हुई। उसने उस जगह की मिट्टी को खोदा और उसे मिट्टी में सनी मूर्त्ति मिलीं। उसकी पत्नी उसके लिए भोजन लेकर वहाँ पहुँची। किसान ने अपनी पत्नी को मूर्त्ति दिखायी। उन्होंने अपनी साड़ी (पोशाक) से मूर्त्ति को साफ़ की। यह मूर्त्ति बालाजी भगवान श्री हनुमान की थी। उन्होंने समर्पण के साथ अपने सिर झुकाये और भगवान बालाजी की पूजा की और उसने अपनी पत्नी द्वारा भोजन में लाए गए बाज़रे के चूरमे का भोग लगाया और तभी से आज तक श्री बालाजी महाराज को बाज़रे के चूरमे का भोग लगाते हैं। भगवान बालाजी के प्रकट होने का यह समाचार तुरन्त असोटा गाँव में फ़ैल गया। असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी। बालाजी ने उसके सपने में आकर उसे आदेश दिया कि इस मूर्त्ति को चूरू जिले में सालासर भेज दिया जाए। उसी रात भगवान हनुमान के एक भक्त, सालासर के मोहन दासजी महाराज ने भी अपने सपने में भगवान हनुमान यानि बालाजी को देखा। भगवान बालाजी ने उसे असोटा की मूर्त्ति के बारे में बताया। उन्होंने तुरन्त आसोटा के ठाकुर के लिए एक सन्देश भेजा। जब ठाकुर को यह पता चला कि आसोटा आये बिना ही मोहन दासजी को इस बारे में ज्ञान है, तो वे चकित हो गये। निश्चित रूप से, यह सब सर्वशक्तिमान भगवान बालाजी की कृपा से ही हो रहा था। इधर अपने आराध्य की कृपा से मोहनदास जी को यह सब भान (ज्ञात) हो जाने के कारण, अपने प्रभु की अगवानी करने के लिए उन्होंने सालासर से प्रस्थान किया। मूर्ति सम्मानपूर्वक लाई गई। महात्मा मोहनदास जी ने निर्देशित किया कि “बैल जहाँ पर भी रूकेंगे, वहीं पर मूर्ति की स्थापना होगी”| कुछ समय पश्चात बैल रेत के टीले पर जाकर रूक गये तो उसी पावन-पवित्र स्थान पर विक्रम संवत् 1811 श्रावण शुक्ला नवमी (सन् 1755) शनिवार के दिन श्री बालाजी महाराज की मूर्ति की स्थापना की गई। मूर्त्ति को सालासर भेज दिया गया और इसी जगह को आज सालासर धाम के रूप में जाना जाता है। विक्रम संवत् 1815 (सन 1759) में नूर मोहम्मद व दाऊ नामक कारीगरों से मंदिर का निर्माण करवाया गया, जो कि साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारे का अनुपम (अनूठा) उदाहरण हैं।

अपने आराध्य ईष्ट को साक्षात् मूर्तिस्वरूप में पाकर उनकी सेवा-पूजा हेतु श्री मोहनदास जी ने अपने शिष्य/भांजा उदयराम को अपना चोगा पहनाकर उन्हें दीक्षा दी। तत्पश्चात् उसी चोगे को गद्दी के रूप में निहित कर दिया गया। श्री हनुमान जी की मूर्ति का स्वरूप दाड़ी व मूंछ युक्त कर दिया क्योंकि सालासर आने से पूर्व श्री हनुमान जी ने स्वप्न में श्री मोहनदास जी को इसी स्वरूप में दर्शन दिये थे। मंदिर प्रांगण में ज्योति प्रज्जवलित की गई जो विक्रम संवत् 1811 (सन् 1755) से अद्यावधि पर्यन्त अखण्ड रूप से अनवरत दीप्यमान है। भक्त शिरोमणी मोहनदास जी महाराज अपने तपो बल से विक्रम संवत् 1850 (सन् 1794) वैशाख शुक्ला त्रयोदशी को प्रातःकाल जीवित समाधि लेकर ब्रह्म में लीन हो गये।[10]

सालासर बालाजी मंदिर दो प्रमुख उत्सव “श्री मोहनदास जी महाराज का श्राद्ध दिवस (श्राद्ध पक्ष में त्रयोदशी) एवं “श्री बालाजी महाराज का प्राकट्य दिवस” (श्रावण शुक्ला नवमी) बहुत ही हर्षोल्लास व उत्साह के साथ मनाता है, जिसमें बाबा के हजारों अनन्य भक्त व श्रद्धालुजन भाग लेते हैं।

सिद्धपुरूष महात्मा मोहनदास जी महाराज के वचनानुसार भक्त की मनोकामना-पूर्ति हेतु श्री बालाजी महाराज का समर्पित भाव से ध्यान लगाकर “मनोति” (मनोकामना) का नारियल बांधा जाता है। भगवान के भक्तों द्वारा बांधे गये “मनोती” के नारियलों के प्रति यहाँ बहुत अधिक श्रद्धा है, अतः इनका किसी अन्य प्रयोजन में इस्तेमाल नहीं किया जाता है।[11]

दिल्ली से: 1.) नयी दिल्ली -> गुरुग्राम (गुड़गाँव) -> रेवाड़ी -> नारनौल -> चिडावा -> झुंझुनू -> मुकुंदगढ़ -> लक्ष्मणगढ़ -> सालासर बालाजी (318 किलोमीटर)

(आपको रेवाड़ी रोड़ से राष्ट्रीय राजमार्ग-8 को छोड़कर रेवाड़ी से झुंझुनू जाने वाला रास्ता लेना होगा) (सबसे छोटा रास्ता और सबसे अच्छा रास्ता )


2.) नयी दिल्ली -> गुरुग्राम -> बहरोड़ -> नारनौल -> चिडावा -> झुंझुनू -> मुकुंदगढ़ -> लक्ष्मणगढ़ -> सालासरबालाजी (335 किलोमीटर)

(ऊपर बताये गये रास्ते से यह मार्ग बेहतर है, आपको बहरोड़ से राष्ट्रीय राजमार्ग-8 छोड़ना होगा, यह भी छोटा और बहुत अच्छा मार्ग है)


3.) नयी दिल्ली -> गुरुग्राम -> बहरोड़ -> कोटपुतली -> नीमकाथाना -> उदयपुरवाटी -> सीकर -> सालासर बालाजी (335 किलोमीटर) (आपको कोटपुतली से राष्ट्रीय राजमार्ग-8 छोड़ना होगा)

4.) नयी दिल्ली -> गुरुग्राम -> बहरोड़ -> कोटपुतली-> शाहपुरा-> अजीतगढ़ -> सामोद -> चोमूँ -> सीकर -> सालासर बालाजी (392 किलोमीटर) (आपको शाहपुरा से राष्ट्रीय राजमार्ग-8 छोड़ना होगा) इसे सामोद मार्ग के रूप में भी जाना जाता है।

5.) नयी दिल्ली -> गुरुग्राम -> बहरोड़ -> कोटपुतली-> शाहपुरा -> चंदवाजी -> चोमूँ -> सीकर -> सालासर बालाजी (399 किलोमीटर) (आपको शाहपुरा से राष्ट्रीय राजमार्ग-8 छोड़ना होगा) इसे चंदवाजी मार्ग भी कहा जाता है। हालाँकि यह मार्ग लम्बा है, इसकी लम्बाई लगभग 225 किलोमीटर है, परन्तु राष्ट्रीय राजमार्ग-8 एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाकर आराम से जा सकते हैं।


6.) नयी दिल्ली -> बहादुरगढ़ -> झज्झर -> चरखीदादरी -> लोहारू -> चिडावा -> झुंझुनू -> मुकुंदगढ़ -> लक्ष्मणगढ़ -> सालासर बालाजी (302 किलोमीटर) यह नया रास्ता है जिसे कम भक्त जानते हैं।


7.) नयी दिल्ली -> रोहतक -> हिसार -> राजगढ़ -> चुरू -> फतेहपुर -> सालासर बालाजी (382 किलोमीटर)

वैसे तो श्री बालाजी महाराज भाव के भूखे हैं। भाव से तो कुछ भी उन्हें अर्पित किया जा सकता है। लेकिन उनके कुछ प्रमुख भोग भी हैं जिन्हें अर्पित करने से श्री बालाजी महाराज अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं। वे भोग हैं :

  • बूंदी के लड्डू - बूंदी के लड्डुओं का भोग श्री बालाजी महाराज को बाल्यकाल से ही बेहद प्रिय है। अधिक्तर भक्त सवामणी में भी लड्डू का ही भोग लगाते हैं।
  • बाज़रे का चूरमा / सादा चूरमा - बाज़रे का चूरमे का भोग श्री बालाजी महाराज को उस किसान द्वारा श्री बालाजी महाराज को लगाया गया था जिसके खेत से उनकी मूर्ति प्रकट हुई थी। भक्तों द्वारा आज भी इन्हें बाज़रे के चूरमे का भोग लगाया जाता है।
  • पेड़े - पेड़ों का भोग भी श्री बालाजी महाराज को बेहद प्रिय है। केसर पेड़े का भोग श्री बालाजी महाराज को प्रिय है।
  • बेसन की बर्फी - बेसन के लड्डू और बेसन की बर्फी श्री बालाजी महाराज को पसंद है। भक्त बेसन की बर्फी की सवामणी भी श्री बालाजी महाराज को लगाते हैं।

मोहनदास जी का धूंणा वह जगह है, जहाँ महान भगवान हनुमान के भक्त मोहनदास जी के द्वारा पवित्र अग्नि जलायी गयी, जो आज भी जल रही है।श्रद्धालु और तीर्थयात्री यहाँ से पवित्र राख ले जाते हैं। श्री श्री मोहनदास जी और की दादी की समाधी(मोहनदास जी की बहन), बालाजी मंदिर के बहुत ही पास स्थित है, यह इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि मोहनदास जी और कनिदादी के पैरों के निशान यहाँ आज भी मौजूद हैं।इस स्थान को इन दोनों पवित्र भक्तों का समाधि स्थल माना जाता है।पिछले आठ सालों से यहाँ निरंतर रामायण का पाठ किया जा रहा है।

अंजनी माता का मंदिर लक्ष्मणगढ़ की ओर सालासर धाम से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अंजनी माता भगवान हनुमान या बालाजी की माँ थी।

शयनन माता मंदिर, जो यहाँ से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर रेगिस्तान में एक अद्वितीय पहाड़ी पर स्थित है, माना जाता है कि यह 1100 साल पुराना मंदिर है, यह भी दर्शन के योग्य है।

श्री हनुमान जन्मोत्सव का उत्सव हर साल चैत्र शुक्ल चतुर्दशी और पूर्णिमा को मनाया जाता है।श्री हनुमान जन्मोत्सव के इस अवसर पर भारत के हर कोने से लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं।

प्रमुख मेले - आश्विन शुक्लपक्ष चतुर्दशी और पूर्णिमा को मेलों का आयोजन किया जाता है और बड़ी संख्या में भक्त इन मेलों में भी पहुँचते हैं। भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्दशी और पूर्णिमा पर आयोजित किये जाने वाले मेले भी बाकी मेलों की तरह आकर्षक होते हैं। इन अवसरों पर नि:शुल्क भोजन, मिठाईयों और पेय पदार्थों का वितरण किया जाता है। 


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देश में यहां है मूंछ- ढाढ़ी वाले हनुमान, नारियल से पूरी होती है मन्नत, पढ़िये 268 साल पुराने इस धाम की कहानी


चूरू : राजस्थान में हनुमान जन्मोत्सव (Hanuman janamutsav 2023 ) का खास उत्साह दिख रहा है। राजस्थान में हनुमान मंदिर के तौर पर खास पहचान रखने वाले सालासर बालाजी धाम पर इसी के चलते जबरदस्त भीड़ देखने को मिल रही है। यहां देश के हर राज्य से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। हनुमान जयंती के अलावा यहां शरद पूर्णिमा पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। शरद पूर्णिमा को यहां मेला भरता है, जिसका लोगों के बीच खास उत्साह रहता हैं।

​यहां हैं ढाढ़ी- मूंछ में हनुमान​

​यहां हैं ढाढ़ी- मूंछ में हनुमान​

सालासर बालाजी मंदिर राजस्थान के चुरू जिले से सुजानगढ़ क्षेत्र में हैं। संभवत : यह देश का अकेला ऐसा मंदिर है, जहां हनुमान जी की प्रतिमा ढाढ़ी- मूंछ में हैं। ढाढ़ी- मूंछ में यहां भगवान की मूर्ति होने के पीछे एक खास और रोचक कहानी है। बताया जाता है कि एक संत मोहन दास महाराज अपनी बहन कान्ही बाई के घर भोजन कर रहे थे। इसी दौरान बालाजी (हनुमान जी) ने उन्हें साधु के वेश में दर्शन दिए। इसके बाद मोहन दास महाराज ने बालाजी को दाढ़ी-मूंछ में देखा तो उन्होंने दाढ़ी-मूंछ वाले बालाजी की प्रतिमा का ही शृंगार किया। यही मूर्ति अब सालासर मंदिर में विराजमान हैं।

​मूर्ति स्थापना हुई 268 साल पहले​

​मूर्ति स्थापना हुई 268 साल पहले​

सालासर धाम की स्थापना करीब 268 साल पहले हुई थी। संत मोहन दासजी महाराज ने बालाजी के चढ़ावे में आए पांच रुपए से मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर बनाने के पीछे का मकसद भी श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। संवत 1811 श्रावण शुक्ला नवमी शनिवार के दिन बालाजी महाराज की मूर्ति स्थापित हुई थी। इसके बाद में संत मोहन दासजी ने फतेहपुर के नूर मोहम्मद और दाऊ नामक कारीगरों को मंदिर निर्माण के लिए बुलाया। सम्वत् 1815 में निर्माण पूरा हुआ। वर्तमान में मंदिर परिसर लंबे-चौड़े क्षेत्रफल में फैला हुआ है और सभी सुविधाएं भी हैं। देशभर में सालासर धाम अलग पहचान रखता है। कई राज्यों से यहां श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने आते हैं।

​नारियल से पूरी होती है मनौती​

​नारियल से पूरी होती है मनौती​

सालासर बालाजी धाम में नारियल चढ़ावे में खास तौर से रखा जाता है। माना जाता है कि भगवान नारियल के भेंट स्वीकार कर लोगों की मनोकामना पूरी करते हैं। हर साल करीब 25 लाख नारियल मंदिर में चढ़ाए जाते हैं। खास बात यह भी है कि यहां मनौती के इन नारियलों का दोबारा उपयोग में नहीं लिया जाता है। उन्हें खेत में गड्‌ढा खोदकर दबा दिया जाता हैं।

नारियलों को फेंका नहीं जाता

नारियलों को फेंका नहीं जाता

यहां करीब करीब 200 सालों से श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही लगे खेजड़ी के एक पेड़ पर लाल कपड़े में नारियल बांधकर जाते हैं । इन नारियलों को फेंका नहीं जाता है। ना ही जलाया जाता है और ना ही कोई अन्य उपयोग होता है। इसके पीछे भी एक रोचक कथा है। नारियलों को सालासर बालाजी मंदिर से करीब 11 किलोमीटर दूर मुरड़ाकिया गांव के पास करीब 250 बीघा खेत में गड्ढा करके दबा दिया जाता है। यशोदा नंदन पुजारी ने बताया कि शुरुआती दिनों में इन नारियलों को धूने की ज्योत में डालकर जला दिया जाता था। लेकिन तीसरी पीढ़ी के पुजारी परिवार के मुखिया को एक सपना आया।

ऐसे रखा नारियलों को सुरक्षित रखने का फैसला

ऐसे रखा नारियलों को सुरक्षित रखने का फैसला

इस सपने में पुजारी ने देखा कि नारियलों के साथ भक्तों की मनोकामनाएं भी जल रही हैं। पुजारी ने अपने परिवारजनों को इकट्ठा कर यह बात बताई। इसके बाद मन्नतों के इन नारियलों को सुरक्षित रखने का फैसला किया गया।

​अभी दिन रात खुले रहेंगे पट​

​अभी दिन रात खुले रहेंगे पट​

हनुमान जन्मोत्सव पर चैत्र पूर्णिमा के तीन दिवसीय मेले में आयोजन किया गया है। तीन लाख से ज्यादा लोग बालाजी के दर्शन करेंगे। मेले के दौरान मंदिर रोज 19 घंटे खुला रहेगा। पुजारी ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए मेले के दौरान मंगलवार को रात तीन बजे पट खोले गए।

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Salasar Balaji Mandir: बेहद प्रसिद्ध है सालासर बालाजी मंदिर, दर्शन करने से मनोकामनाएं होती हैं पूरी - Salasar Balaji Mandir The Mystery of Salasar Balaji Temple


राजस्थान के चुरू जिले में हनुमान जी का सालासर बालाजी मंदिर (Salasar Balaji Mandir) बेहद प्रसिद्ध है। इस मंदिर में अधिक संख्या में श्रद्धालु हनुमान जी की पूजा और दर्शन करने के लिए आते हैं। यह भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां हनुमान जी गोल चेहरे के साथ दाढ़ी और मूंछ में विराजमान हैं। इसके पीछे एक रोचक कहानी है।

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Salasar Balaji Mandir: बेहद प्रसिद्ध है सालासर बालाजी मंदिर, दर्शन करने से मनोकामनाएं होती हैं पूरी

HighLights

  1. सालासर बालाजी का मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक है।
  2. सालासर बालाजी मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है।
  3. मान्यता है कि इस मंदिर में नारियल के चढ़ावे सालासर बालाजी खुश हो जाते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Salasar Balaji Mandir: देश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के भक्त हनुमान जी को समर्पित ऐसे में कई मंदिर हैं, जो अपने रहस्य की वजह से बेहद प्रसिद्ध हैं। इनमें सालासर बालाजी मंदिर भी शामिल है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर में पूजा और दर्शन करने से साधक की सभी मनोकामना पूरी होती है और इंसान को हर तरह की बीमारियों से छुटकारा मिलता है। ऐसे में आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में विस्तार से।

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राजस्थान के चुरू जिले में हनुमान जी का सालासर बालाजी मंदिर बेहद प्रसिद्ध है। इस मंदिर में अधिक संख्या में श्रद्धालु हनुमान जी की पूजा और दर्शन करने के लिए आते हैं। यह भारत का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां हनुमान जी गोल चेहरे के साथ दाढ़ी और मूंछ में विराजमान हैं। इसके पीछे एक रोचक कहानी है।

सालासर बालाजी मंदिर के बारे में ऐसा बताया जाता है कि यहां हनुमान जी ने पहली बार महात्मा मोहनदास महाराज के नाम के व्यक्ति को दाढ़ी मूंछों वाले रूप में दर्शन दिए थे। तब मोहनदास ने बालाजी को इसी रूप में प्रकट होने की बात कही थी। इसलिए इस मंदिर में हनुमान जी की दाढ़ी और मूछों में मूर्ति स्थापित है।

इस मंदिर में हनुमान जी को प्रसाद के रूप में नारियल अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि नारियल के चढ़ावे से श्रद्धालु की बजरंगबली सभी मनोकामना पूरी करते हैं।

ये है कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक किसान खेत जोत रहा था। तभी अचानक से हल किसी नुकीली पथरीली चीज से टकरा गया और उसने देखा तो यहां एक पत्थर था, जो एक मूर्ति हनुमान जी और दूसरी मूर्ति बालाजी की थी। बताया जाता है कि एक बार रात में बालाजी ने सपने में आकर किसान को मूर्ति को चुरू जिले के सालासर में स्थापित करने के लिए कहा था। तभी से एक मूर्ति सालासर और दूसरी मूर्ति पाबोलाम में विराजमान है।

salasarbalaji.org

मंदिर का इतिहास


सीकर के रुल्याणी ग्राम के निवासी पं. लछीरामजी पाटोदिया के सबसे छोटे पुत्र मोहनदास बचपन से ही संत प्रवृत्ति के थे। सतसंग और पूजन-अर्चन में शुरू से ही उनका मन रमता था। उनके जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर यह बालक तेजस्वी संत बनेगा और दुनिया में इसका नाम होगा। मोहनदास की बहन कान्ही का विवाह सालासर ग्राम में हुआ था। एकमात्र पुत्र उदय के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही वह विधवा हो गई।

मोहनदास जी अपनी बहन और भांजे को सहारा देने की गरज से सालासर आकर उनके साथ रहने लगे। उनकी मेहनत से कान्ही के खेत सोना उगलने लगे। अभाव के बादल छंट गए और उनके घर हर याचक को आश्रय मिलने लगा। भांजा उदय भी बडा हो गया था, उसका विवाह कर दिया गया। एक दिन मामा-भांजे खेत में कृषि कार्य कर रहे थे, तभी मोहनदास के हाथ से किसी ने गंडासा छीनकर दूर फेंक दिया। मोहनदास पुन: गंडासा उठा लाए और कार्य में लग गए, लेकिन पुन: किसी ने गंडासा छीनकर दूर फेंक दिया। ऐसा कई बार हुआ। उदय दूर से सब देख रहा था, वह निकट आया और मामा को कुछ देर आराम करने की सलाह दी, लेकिन मोहनदास जी ने कहा कि कोई उनके हाथ से जबरन गंडासा छीन कर फेंक रहा है। सायं को उदय ने अपनी मां कान्ही से इस बात की चर्चा की। कान्ही ने सोचा कि भाई का विवाह करवा देते हैं, फिर सब ठीक हो जाएगा। यह बात मोहनदास को ज्ञात हुई तो उन्होंने कहा कि जिस लडक़ी से मेरे विवाह की बात चलाओगी, उसकी मृत्यु हो जाएगी। और वास्तव में ऐसा ही हुआ। जिस कन्या से मोहनदास के विवाह की बात चल रही थी, वह अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हो गई। इसके बाद कान्ही ने भाई पर विवाह के लिए दबाव नहीं डाला। मोहनदास जी ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करने लगे।

एक दिन कान्ही, भाई और पुत्र को भोजन करा रही थी, तभी द्वार पर किसी याचक ने भिक्षा मांगी। कान्ही को जाने में कुछ देर हो गई। वह पहुंची तो उसे एक परछाई मात्र दृष्टिगोचर हुई। पीछे-पीछे मोहनदास जी भी दौडे अाए थे, उन्हें सच्चाई ज्ञात थी कि वह तो स्वयं बालाजी थे। कान्ही को अपने विलम्ब पर बहुत पश्चाताप हुआ। वह मोहनदास जी से बालाजी के दर्शन कराने का आग्रह करने लगी। मोहनदास जी ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह दी।

लगभग डेढ-दो माह पश्चात किसी साधु ने पुन: नारायण हरि, नारायण हरि का उच्चारण किया, जिसे सुन कान्ही दौडी-दौडी मोहनदास जी के पास गई। मोहनदास द्वार पर पहुंचे तो क्या देखते हैं कि वह साधु-वेशधारी बालाजी ही थे, जो अब तक वापस हो लिए थे। मोहनदास तेजी से उनके पीछे दौड़े और उनके चरणों में लेट गए तथा विलम्ब के लिए क्षमा याचना करने लगे। तब बालाजी वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले- मैं जानता हूं मोहनदास, तुम सच्चे मन से सदैव मुझे जपते हो। तुम्हारी निश्चल भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण करूंगा, बोलो।

मोहदनास जी विनयपूर्वक बोले- आप मेरी बहन कान्ही को दर्शन दीजिए। भक्त वत्सल बालाजी ने आग्रह स्वीकार कर लिया और कहा- मैं पवित्र आसन पर विराजूंगा और मिश्री सहित खीर व चूरमे का भोग स्वीकार करूंगा। भक्त शिरोमणि मोहनदास सप्रेम बालाजी को अपने घर ले लाए और बहन-भाई ने आदर सहित अत्यन्त कृतज्ञता से उन्हें मनपसंद भोजन कराया। सुंदर और स्वच्छ शैय्या पर विश्राम के पश्चात् भाई-बहन की निश्छल सेवा भक्ति से प्रसन्न हो बालाजी ने कहा कि कोई भी मेरी छाया को अपने ऊपर करने की चेष्टा नहीं करेगा। श्रद्धा सहित जो भी भेंट की जाएगी, मैं उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण करूंगा और अपने भक्त की हर मनोकामना पूर्ण करूंगा एवं इस सालासर स्थान पर सदैव निवास करूंगा। ऐसा कह बालाजी अंतर्ध्यान हो गए और भक्त भाई-बहन कृत कृत्य हो उठे।

इसके बाद से मोहनदास जी एकान्त में एक शमी के वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गए। उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया। लोग उन्हें पागल समझ बावलिया नाम से पुकारने लगे। एक दिन मोहनदास शमी वृक्ष के नीचे बैठे धूनी रमाए तपस्या कर रहे थे कि एकाएक वह वृक्ष फलों से लद गया। एक जाट पुत्र फल तोडने के लिए उसी शमी वृक्ष पर चढा तो घबराहट में कुछ फल मोहनदास जी पर आ गिरे। उन्होंने सोचा वृक्ष से गिरकर कहीं कोई पक्षी घायल न हो गया हो, लेकिन आंखें खोलीं तो जाट पुत्र को वृक्ष पर चढे पाया। जाट पुत्र भय से कांप उठा था। मोहनदास जी ने उसे भय मुक्त किया और नीचे आने को कहा।

नीचे आने पर जाट पुत्र ने बताया कि मां के मना करने पर भी पिता ने उसे शमी फल लाने की आज्ञा दी और कहा कि वह पागल बावलिया तुझे खा थोडे ही जाएगा। तब बाबा मोहनदास जी ने कहा कि अपने पिता से कहना कि इन फलों को खाने वाला व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। लेकिन जाट ने बाबा की बात को खिल्ली में उडा दिया। कहते हैं कि फल खाते ही जाट की मृत्यु हो गई। तब से लोगों के मन में बाबा मोहनदास के प्रति भक्ति भाव का बीज अंकुरित हुआ, जो आगे की अनेक चमत्कारिक घटनाओं के बाद वृक्ष बनता चला गया।

एक बार भांजे उदय ने देखा कि बाबा के शरीर पर पंजों के बडे-बडे निशान हैं। उसने पूछा तो बाबा टाल गए। बाद में ज्ञात हुआ कि बाबा मोहनदास और बालाजी प्राय: मल्लयुद्ध व अन्य तरह की क्रीडाएं करते थे और बालाजी का साया सदैव बाबा मोहनदास जी के साथ रहता था। इस तरह की घटनाओं से बाबा मोहनदास की कीर्ति दूर पास के ग्रामों में फैलती चली गई। लोग उनके दर्शन को आने लगे।

तत्कालीन सालासर बीकानेर राज्य के अधीन था। उन दिनों ग्रामों का शासन ठाकुरों के हाथ में था। सालासर व उसके निकटवर्ती अनेक ग्रामों की देखरेख का जिम्मा शोभासर के ठाकुर धीरज सिंह के पास था। एक दिन उन्हें खबर मिली कि डाकुओं का एक विशाल जत्था लूटपाट के लिए उस ओर बढा चला आ रहा है। उनके पास इतना भी वक्त नहीं था कि बीकानेर से सैन्य सहायता मंगवा सकते। अंतत: सालासर के ठाकुर सालम सिंह की सलाह पर दोनों, बाबा मोहनदास की शरण में पहुंचे और मदद की गुहार की।

बाबा ने उन्हें आश्वस्त किया और कहा कि बालाजी का नाम लेकर डाकुओं की पताका को उडा देना, क्योंकि विजय पताका ही किसी भी सेना की शक्ति होती है। ठाकुरों ने वैसा ही किया। बालाजी का नाम लिया और डाकुओं की पताका को तलवार से उडा दिया। डाकू सरदार उनके चरणों में आ गिरा। इस तरह मोहनदास जी के प्रति दोनों की श्रद्धा बलवती होती चली गई। बाबा मोहनदास ने उसी पल वहां बालाजी का एक भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प किया। सालम सिंह ने भी मंदिर निर्माण में पूर्ण सहयोग देने का निश्चय किया और आसोटा निवासी अपने ससुर चम्पावत को बालाजी की मूर्ति भेजने का संदेश प्रेषित करवाया। यह घटना सन 1754 की है।

इधर, आसोटा ग्राम में एक किसान ब्रह्ममुहूर्त में अपना खेत जोत रहा था। एकाएक हल का फल किसी वस्तु से टकराया। उसने खोदकर देखा तो वहां एक मूर्ति निकली। उसने मूर्ति को निकालकर एक ओर रख दिया और प्रमोदवश उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वह पुन: अपने काम में जुट गया। एकाएक उसके पेट में तीव्र दर्द उठा और वह वहां गिरकर छटपटाने लगा। उसकी पत्नी दौडी-दौडी अाई। किसान ने दर्द से कराहते हुए प्रस्तर प्रतिमा निकालने और पेट में तीव्र दर्द होने की बात बताई।

कृषक पत्नी बुद्धिमती थी। वह प्रतिमा के निकट पहुंची और आदरपूर्वक अपने आंचल से उसकी मिट्टी साफ की तो वहां राम-लक्ष्मण को कंधे पर लिए वीर हनुमान की दिव्य झांकी के दर्शन हुए। काले पत्थर की उस प्रतिमा को उसने एक पेड क़े निकट स्थापित किया और यथाशक्ति प्रसाद चढाकर, अपराध क्षमा की प्रार्थना की। तभी मानो चमत्कार हुआ, वह किसान स्वस्थ हो उठ खडा हुआ।

इस चमत्कार की खबर आग की तरह सारे गांव में फैल गई। आसोटा के ठाकुर चम्पावत भी दर्शन को आए और उस मूर्ति को अपनी हवेली में ले गए। उसी रात ठाकुर को बालाजी ने स्वप्न में दर्शन दिए और मूर्ति को सालासर पहुंचाने की आज्ञा दी। प्रात: ठाकुर चम्पावत ने अपने कर्मचारियों की सुरक्षा में भजन-मंडली के साथ सजी-धजी बैलगाडी में मूर्ति को सालासर की ओर विदा कर दिया। उसी रात भक्त शिरोमणि मोहनदास जी को भी बालाजी ने दर्शन दिए और कहा कि मैं अपना वचन निभाने के लिए काले पत्थर की मूर्ति के रूप में आ रहा हूं। प्रात: ठाकुर सालम सिंह व अनेक ग्रामवासियों ने बाबा मोहनदास जी के साथ मूर्ति का स्वागत किया और सन 1754 में शुक्ल नवमी को शनिवार के दिन पूर्ण विधि-विधान से हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की गई।

श्रावण द्वादशी मंगलवार को भक्त शिरोमणि मोहनदास जी भगवत् भजन में इतने लीन हो गए कि उन्होंने घी और सिंदूर से मूर्ति को पूर्णत: श्रृंगारित कर दिया और उन्हें कुछ ज्ञात भी नहीं हुआ। उस समय बालाजी का पूर्व दर्शित रूप जिसमें वह श्रीराम और लक्ष्मण को कंधे पर धारण किए थे, अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर दाढी-मूंछें, मस्तक पर तिलक, विकट भौंहें, सुंदर आंखें, पर्वत पर गदा धारण किए अद्भुत रूप के दर्शन होने लगे।

इसके बाद शनै:-शनै: मंदिर का विकास कार्य प्रगति के पथ पर बढता चला गया।


सालासर बालाजी मंदिर: यहां दाढ़ी मूंछों के साथ विराजमान हैं हनुमान जी, जानिये इस दाढ़ी मूंछ होने का कारण

राजस्थान के सालासर बालाजी धाम में विराजमान हनुमान जी की बहुत मान्यता है और कहते हैं कि यहाँ आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है। लेकिन यहाँ के हनुमान जी देश के मंदिरों में स्थापित हनुमान से बहुत अलग हैं क्योंकि यहाँ उनकी मूंछ और दाढ़ी है। ऐसा क्यों है और सालासर बालाजी मंदिर की क्या-क्या खासियत है, चलिए जानते हैं...

हाइलाइट्स

  • जब आप सालासर बालाजी मंदिर में आकर हनुमान जी की मूर्ति देखें, तो शायद वो आपको परिचित ना लगे
  • सालासर बालाजी मंदिर बनने का इतिहास
  • मान्यताओं के अनुसार, राजस्थान में श्रावण शुक्लपक्ष नवमी, संवत् 1811, शनिवार को एक चमत्कार हुआ
  • ये वही धूणी है जो भक्त मोहनदास ने 300 साल पहले जलाई थी, जो आज भी अखंड ज्योत के रूप में जल रही है




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सालासर बालाजी मंदिर: यहां दाढ़ी मूंछों के साथ विराजमान हैं हनुमान जी, जानिये इस दाढ़ी मूंछ होने का कारण
सालासर बालाजी मंदिर: यहां दाढ़ी मूंछों के साथ विराजमान हैं हनुमान जी, जानिये इस दाढ़ी मूंछ होने का कारण
राजस्‍थान के चुरू ज‌िले में स्थित सालासर बालाजी धाम का हनुमान भक्तों के लिए बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में दर्शन और पूजा करने से बजरंग बलि हर मनोकामना पूरी करते हैं। लेकिन जब आप सालासर बालाजी मंदिर में आकर हनुमान जी की मूर्ति देखें, तो शायद वो आपको परिचित ना लगे क्योंकि यहाँ आपको हनुमान जी का एक अलग ही रूप देखने को मिलेगा। यहां हनुमान जी के चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ भी है। इस दाढ़ी-मूंछ के पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है...

सालासर बालाजी मंदिर बनने का इतिहास
मान्यताओं के अनुसार, राजस्थान में श्रावण शुक्लपक्ष नवमी, संवत् 1811, शनिवार को एक चमत्कार हुआ। नागौर जिले में असोटा गाँव का एक किसान अपने खेत को जोत रहा था कि उसके हल से कोई पथरीली चीज़ टकरायी। उसने उस जगह की मिट्टी को खोदा, तो उसे मिट्टी में सनी मूर्त्ति मिली। जब उसकी पत्नी उसके लिए भोजन लेकर वहाँ पहुँची, तो किसान ने अपनी पत्नी को मूर्त्ति दिखायी। दोनों ने जब मूर्ति साफ़ की, तो देखा यह मूर्त्ति हनुमान जी की थी। उन्होंने भगवान बालाजी की पूजा की और उसने अपनी पत्नी द्वारा भोजन में लाए गए बाज़रे के चूरमे का भोग लगाया। तब से सालासर बालाजी मंदिर में बाजरे के चूरमे का ही भोग लगाया जाता है। भगवान बालाजी के प्रकट होने का यह समाचार तुरन्त असोटा गाँव में फ़ैल गया। उसी रात भगवान हनुमान के एक भक्त, सालासर के मोहन दासजी महाराज ने भी अपने सपने में हनुमान जी को देखा। भगवान बालाजी ने उसे असोटा की मूर्त्ति के बारे में बताया। उन्होंने तुरन्त आसोटा के ठाकुर के लिए एक सन्देश भेजा। जब ठाकुर को यह पता चला कि आसोटा आये बिना ही मोहन दासजी को इस बारे में ज्ञान है, तो वे चकित हो गये। वो समझ गए कि यह सब भगवान बालाजी की कृपा से ही हो रहा था। महात्मा मोहनदास जी ने मूर्ति लाने को कहा और यह भी कहा कि बैल जहाँ पर भी रूकेंगे, वहीं पर मूर्ति की स्थापना होगी। कुछ समय पश्चात बैल रेत के टीले पर जाकर रूक गये तो उसी पावन-पवित्र स्थान पर विक्रम संवत् 1811 श्रावण शुक्ला नवमी (सन् 1755) शनिवार के दिन श्री बालाजी महाराज की मूर्ति की स्थापना की गई। इसी जगह को आज सालासर धाम के रूप में जाना जाता है। महात्मा मोहनदास महाराज को हनुमान जी ने दाढ़ी मूंछों वाले वेश में ही दर्शन दिए थे, इसलिए बाद में मूर्ति में दाढ़ी और मूंछों भी लगाए गए। यहाँ की धूनी भी चमत्कारी बताई जाती है। ये वही धूणी है जो भक्त मोहनदास ने 300 साल पहले जलाई थी, जो आज भी अखंड ज्योत के रूप में जल रही है।

हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। इस मंदिर में यह भी मान्यता है कि सालासर बालाजी जी बस नारियल के चढ़ावे मात्र से खुश हो जाते हैं। इसलिए, यहाँ भक्त गण नारियल के साथ उन्हें ध्वजा भी चढ़ाते हैं। इस मंदिर में हर साल तकरीबन 25 लाख नारियल चढ़ाए जाते हैं। इन नारियलों का दोबारा इस्तेमाल न हो सके, इसके लिए इन्हें खेत में गड्‌ढा खोदकर दबा दिया जाता है। करीब 200 सालों से भक्त मंदिर परिसर में ही लगे खेजड़ी के पेड़ पर अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए लाल कपड़े में नारियल बांधते आ रहे हैं। 









 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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हनुमान जन्माची 'ही' रहस्ये माहिती आहेत? वाचा

प्रियंका वाणी

Hanuman Birth Facts In Marathi: हनुमानाची जयंती गुरुवार, ६ एप्रिल २०२३ रोजी साजरी केली जात आहे. चैत्र शुद्ध पौर्णिमेला अंजनी मातेच्या पोटी हनुमानाचा जन्म झाला. त्यामुळे चैत्र शुद्ध पौर्णिमा हनुमान जयंती म्हणून साजरी केली जाते. मात्र, हनुमानाच्या जन्माविषयी काही रहस्ये सांगितली जातात. हनुमानाच्या जन्माविषयी विविध मान्यता आहेत, जाणून घेऊया...

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।। शक्ती आणि बुद्धीचा सर्वोत्तम संगम असलेल्या हनुमानाची जयंती गुरुवार, ६ एप्रिल २०२३ रोजी साजरी केली जात आहे. चैत्र शुद्ध पौर्णिमेला अंजनी मातेच्या पोटी हनुमानाचा जन्म झाला. त्यामुळे चैत्र शुद्ध पौर्णिमा हनुमान जयंती म्हणून साजरी केली जाते. हनुमानाला मारूती, बजरंगबली, रामभक्त, आंजनेय, महावीर, पवनपुत्र, पवनसुत, केसरीनंदन अशा अनेक नावाने संबोधले जाते. हनुमानाचे शस्त्र गदा हे आहे. हनुमंताला मारूती म्हणण्याची पद्धत केवळ महाराष्ट्रातच आढळून येते. हनुमानाला तेल, शेंदुर, रूईची फुले, पाने अर्पण करण्याची परंपरा आहे. हनुमानाला महादेव शिवशंकाराचा अवतार मानले जाते. दशरथाच्या राण्यांप्रमाणेच तपश्चर्या करणार्‍या अंजनीलाही पायस मिळाले होते व त्यामुळेच मारुतीचा जन्म झाला होता. मात्र, हनुमानाच्या जन्माविषयी काही रहस्ये सांगितली जातात. हनुमानाच्या जन्माविषयी विविध मान्यता आहेत, जाणून घेऊया.

​हनुमान जन्मविषयी विविध मान्यता

रामभक्त हनुमानाच्या जन्मस्थळाविषयी नेमकी स्पष्टता नाही. संपूर्ण भारतात हनुमानाच्या जन्मतिथीबद्दल अनेक मतमतांतरे आहेत. उत्तर भारतात आणि दक्षिण भारतात हनुमान जयंती वेगवेगळ्या तारखेला साजरी केली जाते. तामिळनाडू आणि केरळात मार्गशीर्षात, तर ओडिसामध्ये वैशाख महिन्याचा पहिल्या दिवशी साजरी केली जाते. वाल्मिकी ऋषींच्या रामायणानुसार, हनुमानाचा जन्म कार्तिक महिन्यातील कृष्ण पक्षाच्या चतुर्दशीला मंगळवारी झाला. चैत्र महिन्यातील तिथी विजय महोत्सव आणि कार्तिक महिन्यातील तिथी वाढदिवसाच्या रूपात साजरी केली जाते, असे म्हटले जाते.

​चिरंजीव हनुमान

एका मान्यतेनुसार, हनुमानाची भक्ती आणि समर्पण वृत्ती पाहून सीता मातेने त्याला अमरत्वाचे वरदान दिले. हा दिवस नरक चतुर्दशीच्या होय. सूर्याला गिळंकृत करण्यासाठी गेलेला हनुमान इंद्राच्या वज्रामुळे जखमी झाला. या घटनेमुळे वायुदेव क्रोधीत झाले. अखेर सर्व देवतांनी हनुमंताला अस्त्रे, शस्त्रे आणि चिरंजीवत्वाचे वरदान दिले, असेही म्हटले जाते. हनुमानाच्या व्रात्यपणामुळे एक ऋषिंनी हनुमानाला शक्तीच्या विस्मृतीचा शाप दिला होता. सीताशोधार्थ समुद्र ओलांडून जाण्यापूर्वी जाम्बुवंतांनी हनुमानाला त्याच्या शक्तीची आठवण करून दिली. मात्र, यादरम्यान हनुमंतांनी बुद्धीची अनेक कामे केल्याचे सांगितले जाते.

​ब्राह्मतेज व क्षात्रतेजाचे प्रतीक

हनुमंताच्या गळ्यातील जानवे हे ब्राह्मतेजाचे प्रतीक असून, हनुमंत हा महादेवाचा अवतार असल्याने त्यात लय करण्याचे सामर्थ्य आहे. रामभक्‍ती करतांना त्याच्यात विष्णुतत्त्व आल्यामुळे त्यात स्थितीचेही सामर्थ्यही आले. हनुमानामध्ये ब्राह्मतेज व क्षात्रतेज दोन्ही असल्याने युद्धावेळी आवश्यकतेनुसार तो त्यांचा वापर करत असे, असे सांगितले जाते. महाभारत युद्धात श्रीकृष्णाने हनुमंताला अर्जुनाच्या रथावर स्थान दिले. तेव्हा हनुमंताने रथ व अर्जुन यांच्यावर येणारी अस्त्रे व शस्त्रे हवेतच नष्ट केली होती.

​बुद्धी व शक्तीचा संगम

हनुमान शक्ती, सामर्थ्यासाठी जेवढा प्रसिद्ध आहे, तेवढाच बुद्धीसाठीही तो प्रसिद्ध आहे. लहानपणी हनुमानाने गुरुकुलात जाऊन अनेक विद्या आत्मसाद केल्या. वानरांची युद्ध करण्याची विशिष्ट पद्धतीही त्याने शिकून घेतली. वेद, उपनिषदे त्याने लहानपणीच तोंडपाठ केली होती. हनुमानाला अनेक भाषा येत होत्या. म्हणूनच राम-लक्ष्मणाची खबर काढण्यासाठी सुग्रीवाने हनुमानाला पाठवले होते. तसेच सीतेचा शोध घेण्यासाठी हनुमाला पाठवण्यात आले होते. तसेच समुद्र लांघणे, समुद्र सेतू उभारणे, राक्षसांचा नाश, लक्ष्मणासाठी संजीवनी आणणे, यातून हनुमानाच्या शक्तीची प्रचिती येते. जन्मत:च मारुतीने सूर्याला गिळण्यासाठी उड्डाण केले अशी जी कथा आहे, त्यातून वायूपुत्र मारुति तेजतत्त्वाला जिंकणारा होता, हे लक्षात येते.

​हनुमानाविषयी अन्य महत्त्वाच्या गोष्टी

हनुमान चिरंजीवी असल्याने तो आजदेखील अस्तित्वात असल्याची मान्यता भाविकांमधे आहे. हनुमानाला लावण्यात येणारा शेंदुर अत्यंत पवित्र मानला जातो. शरीर सौष्ठव कमविण्याची आवड असणाऱ्यांनी हनुमानाची आराधना करावी, असे मानले जाते. हनुमान स्तोत्र व हनुमान चालिसा म्हणणाऱ्यांना आत्मिक समाधानाची प्राप्ती होते, असे म्हटले जाते. साडे साती सुरू असलेल्या व्यक्तींनी दररोज किंवा किमान प्रत्येक मंगळवारी व शनिवारी मारूतीचे दर्शन घ्यावे, असे सांगितले जाते. हनुमानाला शक्ती, स्फुर्ती आणि ऊर्जेचे प्रतिक मानण्यात आले आहे.
 
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हनुमानाच्या नावाचा इतिहास माहिती नसेल तर 'हे' वाचा

खासदार नवनीत राणा यांना एका मुलाखतीत भगवान हनुमानाचं खरं नाव काय आहे ? असा प्रश्न विचारण्यात आला होता. त्याला राणा यांना उत्तर देता आले नाही. तर नेमकं भगवान हनुमानाचं नाव हनुमान कसं पडलं ? चला तर त्याविषयी जाणून घेऊ या...
भगवान हनुमान यांच्याशी संबंधित अनेक पुराणकथा तुम्ही वाचले किंवा ऐकले असेल. मात्र अशा काही गोष्टी आहेत, ज्या विषयी जाणून तुम्ही हैराण व्हाल. येथे आम्ही अशाच काही गोष्टींविषयी माहिती देणार आहोत. ती प्रत्येक हनुमान भक्ताला माहित असायला हवी. 'ब्रह्मांडपुराणा'त सांगितले आहे, की भगवान हनुमान (Lord Hanuman) यांचे पिता केसरी आहेत. भगवान हनुमान आपल्या भावंडांमध्ये मोठे होते. माता अंजनी यांच्या पोटातून जन्म घेणारे भगवान हनुमान पहिले पुत्ररत्न होते.
- 'हनुमान' शब्दाचा संस्कृत अर्थ म्हणजे ज्या व्यक्तीचा मुख किंवा जबडा बिघडलेला. हनुमान नावाबाबत एक कथा सांगितली जाते, की इंद्रदेवाच्या वज्र प्रहारामुळे बालक हनुमानाची हनुवटी तुटली होती. यानंतर त्यांना हनुमान नाव मिळाले. प्रचलित कथेनुसार भगवान हनुमान यांच्या जन्मानंतर एका दिवशी त्यांची आई फळ आणण्यासाठी त्यांना आश्रमात सोडून गेली. जेव्हा बाल हनुमानाला भूक लागली, तेव्हा ते उगवत्या सूर्याला फळ समजून त्याला पकडण्यासाठी आकाशात उडू लागले. त्यांच्या मदतीसाठी पवनही वेगाने वाहू लागला. दुसरीकडे भगवान सूर्य नारायणाने त्यांना नादान बालक समजून सूर्य प्रकाशाने जळू दिले नाही. ज्यावेळी हनुमान सूर्याला पकडण्यासाठी उडी घेतली, त्यावेळी राहू सूर्याला ग्रहण लावू इच्छित होता. भगवान हनुमान यांनी सूर्याच्या वरच्या भागात जेव्हा राहुला स्पर्श केले तेव्हा तो घाबरुन पळून गेला. इंद्राजवळ जाऊन त्याने तक्रार केली की देवराज तुम्ही मला भूक शमवण्यासाठी सूर्य आणि चंद्र दिले होते. आज अमावस्याच्या दिवशी जेव्हा मी सूर्य गिळण्यासाठी गेलो तेव्हा पाहिले की दुसरा राहु सूर्याला पकडण्यासाठी जात आहे. राहुची हकीकत ऐकून इंद्र देव घाबरले आणि त्याला घेऊन सूर्याकडे निघाले. राहु पाहून भगवान हनुमान सूर्याला सोडून राहुला मारण्यास सुरुवात केली. राहुने इंद्राला संरक्षणासाठी आवाहन केले. त्यांनी भगवान हनुमानावर वज्रायुधाने प्रहार केला. यात हनुमान एका पर्वतावर पडले व त्यांची डावी हनुवटी तुटली. हनुमानाची ही अवस्था पाहून वायूदेवाला राग आला. त्यांनी त्याच क्षणी वाऱ्याचा वेग थांबवला. यामुळे सर्व प्राणीमात्रांना श्वास घ्यायला त्रास सुरु झाला. तेव्हा सूर, असूर, यक्ष, किन्नर आदी ब्रह्मदेवाकडे गेले. ब्रह्मदेव त्या सर्वांना घेऊन वायूदेवाकडे केले. ते हनुमानाला कुशीत घेऊन बसले होते. बह्मदेवाने त्यांना जीवित केले. त्यानंतर वायुदेवाने वायूचा संचार पुन्हा सुरु केल्याने सर्व प्राणीमात्रा पूर्ववत झाली. मग ब्रह्मदेव म्हणाले, की कोणतेही शस्त्र त्याच्या अंगाला इजा पोहोचू शकत नाही. इंद्रदेव म्हणाले, याचे शरीर वज्रापेक्षाही कठोर असेल. सूर्यदेव म्हणाले, त्याला आपला तेजाचे शतांश प्रदान करेल आणि राहस्य जाणून घेण्याचेही आशीर्वाद दिले. वरुण देव म्हणाले, पाश आणि जल आदीपासून हा बालक सदा सुरक्षित राहिल. यमदेवाने अवध्य आणि निरोगी राहण्याचे आशीर्वाद दिले. यक्षराज कुबेर, विश्वकर्मा आदी देवतांनीही वरदान दिले.
- महाभारतात पांडू पुत्र राजकुमार भीम आपल्या ताकदीसाठी ओळखला जातो. म्हटले जाते की तो भगवान हनुमानाचा भाऊ होतं.
- हनुमानाला ब्रह्मचारी म्हटले जाते. मात्र त्यांचा एक मुलगाही आहे. त्याचे नाव 'मकरध्वज' असे सांगितले जाते. मकरध्वज भगवान हनुमान यांच्या घामातून जन्माला आला होता.
- भगवान हनुमानाला पाच भावंडे होती.
- ब्रह्मांडपुराणात म्हटले आहे, की बजरंगबली यांच्या नंतर मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान ही त्यांच्या भावंड्यांची नावे आहेत.
- एका कथेनुसार एकदा हनुमानाने प्रभू रामाच्या आठवणीत आपल्या पूर्ण शरारीला शेंदूर लावले होते. कारण एकदा त्यांनी सीता मातेला शेंदूर लावताना पाहिले होते. जेव्हा त्यांनी शेंदूर लावण्याचे कारण सीता मातेला विचारले तेव्हा त्या म्हणाल्या, श्रीरामाच्या प्रति प्रेम आणि सन्मानाचे प्रतिक आहे.
 
 
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हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? ती हनुमानाला कोणी दिली होती? कोणत्या धातूची आहे?

हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? ती हनुमानाला कोणी दिली होती? कोणत्या धातूची आहे?

हनुमान आणि गदा हे समीकरण ठरलेलं आहे, हनुमानाची एकही मूर्ती आपण गदेशिवाय पाहिली नसेल. यावर तुम्ही कधी विचार केला आहे का की, ही गदा हनुमानाला कोणी दिली असेल? हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? आणि ती कोणत्या धातूपासून बनवलेली आहे. ज्योतिषी आणि वास्तु सल्लागार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा या विषयावर अधिक माहिती देत आहेत.

हनुमानाला गदा कशी मिळाली? धार्मिक ग्रंथानुसार, एकदा बाल हनुमान सूर्याला फळ समजून खायला निघाला होता. त्यावेळी इंद्राच्या वज्रप्रहारामुळे हनुमान मूर्च्छित झाले. त्यामुळे संतप्त झालेल्या वायुदेवाने आपली हालचाल थांबवली आणि संपूर्ण त्रैलोक्य दुःखी झाला. त्यानंतर ब्रह्मदेवाने हनुमानाला जिवंत केलं आणि सर्व देवतांनी हनुमानाला काही ना काही वरदान दिले. देवतांनी त्यांच्या दैवी शस्त्रांपासून निर्भय राहण्याचे वरदानही दिले होते. त्यावेळी भगवान कुबेरांनी बाल हनुमानाला गदा दिली होती, असे मानले जाते.


हनुमानाला गदा कशी मिळाली? धार्मिक ग्रंथानुसार, एकदा बाल हनुमान सूर्याला फळ समजून खायला निघाला होता. त्यावेळी इंद्राच्या वज्रप्रहारामुळे हनुमान मूर्च्छित झाले. त्यामुळे संतप्त झालेल्या वायुदेवाने आपली हालचाल थांबवली आणि संपूर्ण त्रैलोक्य दुःखी झाला. त्यानंतर ब्रह्मदेवाने हनुमानाला जिवंत केलं आणि सर्व देवतांनी हनुमानाला काही ना काही वरदान दिले. देवतांनी त्यांच्या दैवी शस्त्रांपासून निर्भय राहण्याचे वरदानही दिले होते. त्यावेळी भगवान कुबेरांनी बाल हनुमानाला गदा दिली होती, असे मानले जाते.

हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? धार्मिक ग्रंथानुसार रामभक्त हनुमानाच्या गदाचे नाव कौमोदकी गदा असे आहे. ही गदा त्यांना कुबेर देव यांच्याकडून मिळाली होती. अगस्त्य ऋषी सांगतात की, हनुमानजींच्या पंचमुखी अवतारात खडग, खटवांग, पर्वत, अंकुश, त्रिशूल, पाश, मुठी, स्तंभ, गदा आणि वृक्ष आहेत. पण बजरंगबलीमध्ये अफाट सामर्थ्य होते त्यामुळे त्यांनी कधीही लोखंडी सळी, पर्वत आणि झाड याशिवाय दुसरे कोणतेही शस्त्र वापरले नाही.


हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? धार्मिक ग्रंथानुसार रामभक्त हनुमानाच्या गदाचे नाव कौमोदकी गदा असे आहे. ही गदा त्यांना कुबेर देव यांच्याकडून मिळाली होती. अगस्त्य ऋषी सांगतात की, हनुमानजींच्या पंचमुखी अवतारात खडग, खटवांग, पर्वत, अंकुश, त्रिशूल, पाश, मुठी, स्तंभ, गदा आणि वृक्ष आहेत. पण बजरंगबलीमध्ये अफाट सामर्थ्य होते त्यामुळे त्यांनी कधीही लोखंडी सळी, पर्वत आणि झाड याशिवाय दुसरे कोणतेही शस्त्र वापरले नाही.

ही गदा कोणत्या धातूची होती? पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा सांगतात की हनुमानाला कुबेर देव यांनी सोन्याची गदा भेट दिली होती. जी आकाराने खूप मोठी आणि खूप जड होती. हनुमानाला आपल्या गदेने अनेक राक्षसांना मारले असाही उल्लेख आहे.

ही गदा कोणत्या धातूची होती? पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा सांगतात की हनुमानाला कुबेर देव यांनी सोन्याची गदा भेट दिली होती. जी आकाराने खूप मोठी आणि 

खूप जड होती. हनुमानाला आपल्या गदेने अनेक राक्षसांना मारले असाही उल्लेख आहे.

हनुमान कोणत्या हातात गदा ठेवतात? तुम्ही हनुमानाच्या मूर्तीत किंवा चित्रात डाव्या हातात गदा धरलेले पाहिले असेल. डाव्या हातात गदा धरल्यामुळे त्याला वामहस्तगदायुक्तम् असेही म्हणतात. धार्मिक ग्रंथांनुसार कुबेरांनी हनुमानाला जेव्हा गदा दिली होती, त्यावेळी त्यांनी वरदान दिले होते की, ही गदा हातात घेऊन तुम्ही कधीही युद्धात पराभूत होऊ शकत नाही. हनुमानाला भूत आणि आत्मेदेखील घाबरतात.

हनुमानाच्या गदेचे नाव काय? ती हनुमानाला कोणी दिली होती? कोणत्या धातूची आहे?

हनुमानाला गदा कशी मिळाली? धार्मिक ग्रंथानुसार, एकदा बाल हनुमान सूर्याला फळ समजून खायला निघाला होता. त्यावेळी इंद्राच्या वज्रप्रहारामुळे हनुमान मूर्च्छित झाले. त्यामुळे संतप्त झालेल्या वायुदेवाने आपली हालचाल थांबवली आणि संपूर्ण त्रैलोक्य दुःखी झाला. त्यानंतर ब्रह्मदेवाने हनुमानाला जिवंत केलं आणि सर्व देवतांनी हनुमानाला काही ना काही वरदान दिले. देवतांनी त्यांच्या दैवी शस्त्रांपासून निर्भय राहण्याचे वरदानही दिले होते. त्यावेळी भगवान कुबेरांनी बाल हनुमानाला गदा दिली होती, असे मानले जाते.

 

Hanuman jayanti: हनुमान जन्म कथा

Hanuman Birth Story
 
  श्री हनुमानजींचा जन्म चैत्र शुक्ल पक्षाच्या पौर्णिमेच्या दिवशी आई अंजनाच्या पोटातून झाला. त्यामुळे चैत्र पौर्णिमेच्या दिवशी हनुमान जयंती साजरी केली जाते. वनराज केसरी आणि अंजना यांनी भगवान शंकराची घोर तपश्चर्या केली होती. त्याच्या तपश्चर्येवर प्रसन्न होऊन भगवान शिवाने त्यांना वरदान दिले की ते अंजनाच्या पोटी जन्म घेतील .या कारणास्तव हनुमानजींना भगवान शंकराचा 11वा रुद्र अवतार म्हटले जाते.
 महावीर हनुमान हे प्रभू श्री रामाचे परम भक्त आहेत. हनुमानजींचा जन्म वानर जातीत झाला. त्यांच्या आईचे नाव अंजना (अंजनी) आणि वडील वानरराज केशरी. या कारणास्तव त्यांना अंजनय आणि केसरीनंदन इत्यादी नावांनी संबोधले जाते. दुसऱ्या मान्यतेनुसार, हनुमानजींच्या जन्मात पवन देव यांचीही भूमिका होती.
 एकदा अयोध्येचे राजा दशरथ आपल्या पत्नींसोबत पुत्रष्टी हवन करत होते. पुत्रप्राप्तीसाठी हा हवन केला जात होता. हवन संपल्यानंतर गुरुदेवांनी तिन्ही राण्यांमध्ये अल्प प्रमाणात खीरचा प्रसाद वाटला. अंजनी माँ तपश्चर्या करत असलेल्या ठिकाणी एका कावळ्याने खीरचा एक भाग सोबत नेला. हे सर्व भगवान शिव आणि पवनदेवाच्या इच्छेनुसार घडत होते. तपश्चर्या करत असलेल्या अंजनाच्या हातात खीर आल्यावर तिने ती खीर भगवान शिवाचा प्रसाद मानून स्वीकारली. या प्रसादामुळे हनुमानाचा जन्म झाला.
हनुमानाच्या जन्माची कथा: र्याच्या आशीर्वादाने सोन्याचे बनलेले सुमेरूमध्ये केसरीचे राज्य होते  त्यांची अंजना नावाची एक अतिशय सुंदर बायको होती. एकदा अंजनाने स्वच्छ आंघोळ केली आणि सुंदर कपडे आणि दागिने घातले. त्या वेळी पवनदेवाने तिच्या कर्णपटलात प्रवेश करताना तिला परत येताना असे आश्वासन दिले की तुला सूर्य, अग्नी आणि सोन्यासारखा तेजस्वी, वेदांमध्ये पारंगत, विश्ववंद्य महाबली असा पुत्र होईल  आणि तसेच घडले.
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीच्या महानिषेला अंजनाच्या पोटी हनुमानजींचा जन्म झाला. दोन तासांनंतर सूर्य उगवताच त्याला भूक लागली. आई फळे आणायला गेली. येथे हनुमानजींनी लाल रंगाच्या सूर्याला फळ मानले आणि ते  घेण्यासाठी आकाशात झेप घेतली. त्या दिवशी अमावास्येमुळे राहू सूर्याला गिळंकृत करण्यासाठी आला होता, पण हनुमानजींना दुसरा राहू समजून राहूने तिथून पळ काढला.  
तेव्हा इंद्राने हनुमानजींवर वज्राने जोरदार हल्ला केला. त्यामुळे त्यांची हनुवटी वाकडी झाली, त्यामुळे त्यांना हनुमान म्हटले गेले. इंद्राच्या या वाईट कृत्याला  शिक्षा देण्यासाठी पवन देवतेने सर्व प्राणिमात्रांचे वायू परिसंचरण बंद केले. तेव्हा ब्रह्मदेवांसह सर्व देवांनी हनुमानाला वरदान दिले.
ब्रह्माजी उत्तमआयू चे,इंद्राने वज्राने इजा न होण्याचे, सूर्याने सामर्थ्याने परिपूर्ण आणि सर्व शास्त्रांमध्ये जाणकार असण्याचे, वरुण ने पाश आणि पाण्यापासून निर्भय राहण्याचे, यमाने यमदंडाने अवध्येने पाश ने नाश न होण्याचा, कुबेरांनी शत्रुंमर्दिनी गदा पासून असे निर्भय राहण्याचे , शंकराने प्रमत्त आणि अजिंक्य योद्ध्यांना जिंकण्याचे , विश्वकर्माने मय पासून तयार केलेले दुर्बोध्य आणि असह्य,अस्त्र शस्त्र आणि यंत्रापासून कोणतीही इजा न होण्याचे वरदान दिले.
अशा वरदानांच्या प्रभावामुळे, हनुमानजींनी केलेली अफाट शौर्याची सर्व कर्मे हनुमानजींच्या भक्तांमध्ये प्रसिद्ध आहेत आणि जी न ऐकलेली किंवा अज्ञात आहेत, ती रामायण, पद्म, स्कंद आणि वायू इत्यादी विविध प्रकारच्या पुराणांमधून ज्ञात होऊ शकते.
 
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हनुमान जयंती

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          मित्रांनो, आज आपण दूरचित्रवाणीवर अनेक मालिका पहातो. त्यात शक्तीमानसारखे एखादे काल्पनिक पात्र दाखवले जाते. ते पाहून आपल्याला वाटते की, आपणही असे शक्तीमान व्हावे. अनेक मुले अशा पात्रांना खरे समजून तशी कृती करण्याचाही प्रयत्न करतात; पण हे सर्व खोटे आणि काल्पनिक असते. यापेक्षा आपल्या देवता पुष्कळ शक्तीमान आणि सर्वार्थाने आदर्श आहेत. मारुतिराया पुष्कळ शक्तीमान होता. त्याने केवळ एका हातावर द्रोणागिरी पर्वत उचलला, तसेच समुद्रावरून उड्डाण करून लंकेत प्रवेश केला. मित्रांनो, आपल्याला अशा सर्वशक्तीमान हनुमानासारखे व्हायला आवडेल कि खोटे पात्र असलेल्या शक्तीमान आणि स्पायडरमॅनसारखे व्हावेसे वाटेल ?

         आपल्या मनात प्रश्‍न आला असेल की, हनुमान एवढा शक्तीमान कसा ? याचे उत्तर म्हणजे हनुमानाने श्रीरामाची भक्ती केली. भक्तीनेच शक्ती मिळते. भक्ती केली, तर आपणसुद्धा मारुतिरायासारखे शक्तीमान होऊ. विद्यार्थी मित्रांनो, आपल्याला सर्वशक्तीमान आणि महापराक्रमी व्हावेसे वाटते ना ? आपणही मारुतिरायाचा आदर्श समोर ठेवून राष्ट्र आणि धर्म यांचे रक्षण करण्यास सिद्ध होऊ. आज आपण हनुमान जयंतीच्या निमित्ताने सर्वशक्तीमान हनुमानाचा जन्म आणि इतर माहिती समजून घेऊ, तसेच कोणत्या गुणांमुळे तो श्रीरामाचा आवडता आणि परमभक्त झाला, हेही पाहू.

१. मारुतीच्या जन्माचा इतिहास आणि त्याला हनुमान असे नाव मिळण्याचे कारण

         राजा दशरथाने पुत्रप्राप्तीसाठी यज्ञ केला होता. त्या यज्ञातून अग्नीदेव प्रसन्न झाला आणि त्यांनी दशरथाच्या राण्यांना पायस, म्हणजेच खिरीचा प्रसाद दिला. दशरथ राजाच्या राण्यांप्रमाणेच तपश्‍चर्या करणार्‍या अंजनीला म्हणजे मारुतिरायाच्या आईलाही हा प्रसाद मिळाला. त्यामुळे अंजनीला मारुतिरायासारखा पुत्र लाभला. त्या दिवशी चैत्र पौर्णिमा होती. तो दिवस हनुमान जयंती म्हणून साजरा केला जातो. मारुतिरायाने जन्मतःच उगवता सूर्य पाहिला आणि त्याला ते फळ आहे, असे वाटून त्याने सूर्याच्या दिशेने उड्डाण केले. त्या वेळी सूर्याला गिळण्यासाठी राहू आला होता. इंद्रदेवाला मारुति राहूच आहे, असे वाटले आणि त्याने मारुतीच्या दिशेने वज्र फेकले. ते मारुतिरायाच्या हनुवटीला लागले आणि त्याची हनुवटी छाटली गेली. तेव्हापासून त्याला हनुमान हे नाव पडले.

२. कार्य आणि वैशिष्ट्ये

२ अ. महापराक्रमी : हनुमंताने जंबू, माली, अक्ष, धूम्राक्ष, निकुंभ या मोठमोठ्या विरांचा नाश केला. त्याने रावणालासुद्धा बेशुद्ध केले. समुद्रावरून उड्डाण करून लंकादहन केले आणि द्रोणागिरी पर्वतही उचलून आणला. मित्रांनो, या सर्व गोष्टींवरून आपल्याला मारुतिराया किती महापराक्रमी होता, हे लक्षात आले असेल.

२ आ. निस्सीम भक्त : मित्रांनो, मारुतिराया केवळ पराक्रमी नव्हता, तर रामाचा भक्तही होता. देवासाठी प्राण देण्याची त्याची सिद्धता होती. तो सतत देवाचे नामस्मरण करत असे. देवाच्या नामातच शक्ती आहे, हे त्याला ठाऊक होते. आपणही सतत नामस्मरण करून देवाचे भक्त होऊया अन् देवाची शक्ती मिळवूया. मारुतिरायाला देवाच्या सेवेपुढे सर्व तुच्छ वाटत असे. असा भक्तच देवाला आवडतो. आपणही त्याच्यासारखे भक्त होण्याचा प्रयत्न करायला हवा.

२ इ. अखंड साधना : युद्ध चालू असतांना मारुतिराया थोडावेळ बाजूला जाऊन ध्यान लावे आणि प्रत्येक क्षणाला देवाचे स्मरण करत असे.

२ ई. बुद्धीमान : मारुतिरायाला सर्व व्याकरणसूत्रे ठाऊक होती. त्याला अकरावा व्याकरणकार मानले जाते. तो एवढा बुद्धीमान कसा ? मित्रांनो, जे भक्ती करतात, त्यांची बुद्धी सात्त्विक होते. आजपासून आपणही मारुतिसारखी भक्ती करून बुद्धीमान होऊया !

२ उ. जितेंद्रिय : मारुतीचे आपल्या इंद्रियांवर नियंत्रण होते. तो सीतेच्या शोधासाठी लंकेत गेला. तेथे त्याने राक्षस कुलातील अनेक स्त्रिया पाहिल्या; पण एकाही स्त्रीविषयी त्याच्या मनात कोणताच वाईट विचार क्षणभरसुद्धा आला नाही; कारण त्याने आपल्या सर्व विकारांवर नियंत्रण मिळवले होते. मित्रांनो, देवाची भक्ती करणारा खरा भक्तच आपल्या विकारांवर, म्हणजेच वाईट विचारांवर नियंत्रण मिळवतो. तो विकारांच्या आहारी जात नाही. आज आपण पुष्कळ शिक्षण घेतो; पण आपले विकार जात नाहीत. याचे कारण आपण देवभक्त नाही.

२ ऊ. भाषणकलेत निपुण असणारा : मारुति उत्तम वक्ता होता. त्याने रावणाच्या दरबारात भाषण केल्यावर सारा दरबार थक्क झाला.

  मित्रांनो, वरील सर्व गुण आपल्यात येण्यासाठी आपण मारुतीला प्रार्थना करूया, हे मारुतिराया, आम्हाला तुझ्यासारखी भक्ती करण्याची शक्ती आणि बुद्धी दे. तुझे सर्व गुण आमच्यात येण्यासाठी आमच्याकडून प्रयत्न होऊ देत, हीच तुझ्या चरणी प्रार्थना आहे.

३. मारुतीच्या मूर्तीचा रंग शेंदरी असण्याचे आणि त्याला शेंदूर लावण्याचे कारण

३ अ. प्रभु श्रीरामावरील निस्सीम भक्तीचे प्रतीक म्हणून सर्वांगाला शेंदूर लावणे : मारुतीचा रंग शेंदरी असण्याविषयी एक गोष्ट आहे. एकदा सीतेने स्नानानंतर कपाळाला शेंदूर लावला. तेव्हा हनुमानाने त्याचे कारण विचारले. सीता म्हणाली, रामाचे आयुष्य वाढावे; म्हणून मी शेंदूर लावते. मित्रांनो, मारुतिराया रामाचा निस्सीम भक्त होता. तो म्हणाला, माझ्या स्वामींचे आयुष्य याने वाढणार असेल, तर मी सर्व अंगालाच शेंदूर लावतो. असे म्हणून त्याने स्वतःच्या पूर्ण अंगाला शेंदूर लावला. हे प्रभु श्रीरामाला समजल्यावर  तो प्रसन्न झाला आणि म्हणाला, मारुतिराया, तुझ्यासारखा माझा अन्य कुणीच भक्त नाही. तेव्हापासून मारुतीचा रंग शेंदरी आहे.

३ आ. मारुतीला शेंदूर लावणे आणि तेल वाहणे : हनुमान द्रोणागिरी पर्वत घेऊन जात असतांना भरताने त्याला बाण मारला. तेव्हा त्याच्या पायाला दुखापत झाली आणि ती शेंदूर आणि तेल लावल्यामुळे बरी झाली, त्यामुळे हनुमानाला शेंदूर वाहतात आणि तेल लावतात.

४. मारुतीची रूपे

४ अ. प्रताप मारुति : एका हातात द्रोणागिरी पर्वत आणि दुसर्‍या हातात गदा, असे याचे रूप असते. यातून मारुतीची सर्वशक्तीमानता पहायला मिळते.

४ आ. दासमारुति : श्रीरामापुढे हात जोडून उभा असलेला, मस्तक झुकलेले आणि शेपटी भूमीवर रुळलेली, असे याचे रूप आहे. यातून हनुमान किती नम्र आहे, हे आपण शिकायचे आहे.

४ इ. वीरमारुति : हा सतत लढण्याच्या पवित्र्यात उभा असतो. आपणही याच्यासारखे अन्यायाच्या विरोधात लढले पाहिजे. हनुमान जयंतीच्या निमित्ताने आपण निश्‍चय करूया की, आम्ही अन्यायाविरुद्ध लढायला मारुतीप्रमाणे सिद्ध राहू.

४ ई. पंचमुखी मारुति : आपण पुष्कळ ठिकाणी पंचमुखी मारुतीच्या मूर्ती पहातो. गरुड, वराह, हयग्रीव, सिंह आणि कपिमुख अशी मूर्तीची मुखे असतात. पंचमुखीचा अर्थ आहे, पाच दिशांचे रक्षण करणारा. मारुति पूर्व, पश्‍चिम, दक्षिण, उत्तर आणि ऊर्ध्व या पाच दिशांचे रक्षण करतो.

५. पूजाविधी

          मारुतीच्या पूजाविधीत शेंदूर ,तेल आणि रुईची पाने वापरतात; कारण या वस्तूंमध्ये महर्लोकापर्यंतची देवतांची शक्ती आकर्षित करण्याची क्षमता अधिक असते.

         आता आपण हनुमान जयंतीला करावयाच्या पूजाविधीची शास्त्रीय माहिती देणारा दृकश्राव्यपट (व्हिडिआे) पाहूया.

​६. पूजा करतांना करावयाच्या कृती

अ. मारुतीला अनामिकेने (करंगळीच्या जवळील बोट) शेंदूर लावावा.

आ. त्याला रुईची पाने आणि फुले पाच किंवा पाचच्या पटीत वहावीत.

इ. मारुतीला केवडा, चमेली किंवा अंबर यांच्या २ उदबत्त्या घेऊन ओवाळावे.

उ. पाच किंवा पाचच्या पटीत प्रदक्षिणा घालाव्यात.

ऊ. समर्थ रामदास स्वामींनी रामाचा तेरा कोटी जप केल्यावर त्यांच्यासमोर मारूति प्रकट झाला आणि त्याने सांगितले, या स्तोत्राचे भक्तीपूर्ण पठण करणारा निर्भय होईल. मित्रांनो, आपणही हनुमान जयंतीच्या निमित्ताने प्रतिदिन मारुतिस्तोत्राचे पठण करण्याचा निश्‍चय करूया.

७. सर्वशक्तीमान आणि महापराक्रमी देवतेचे म्हणजे हनुमानाचे होणारे विडंबन रोखा !

७ अ. हनुमानाचे चित्र असलेला पुठ्ठा (पॅड) वापरू नका ! : काही मुले परीक्षेला जातांना हनुमानाचे चित्र असलेला पुठ्ठा वापरतात. यांतून आपण देवतेचा अपमान करतो. मित्रांनो, आपण असा अपमान करायचा का ? असे करणे पाप असल्याने आपण ते करायला नको आणि आपल्या मित्रांनाही ते करण्यापासून रोखूया. यामुळे आपल्यावर हनुमानाची कृपा होईल.

७ आ. हनुमानाचे चित्र असलेले टी शर्ट घालणे बंद करा ! : काही मुले हनुमानाचे चित्र असलेले शर्ट घालतात. हेसुद्धा आपल्या देवतेचे विडंबन आहे. ते आपण रोखायला हवे. टी शर्ट धुतांना तो चुरगळला जातो आणि आपण तो कुठेही काढून ठेवतो. यांतून देवतेचा अपमान होतो. असे करणे पाप आहे, हे लक्षात ठेवा.

        मित्रांनो, आपल्या आदर्श आणि सर्वशक्तीमान अशा देवतांचे विडंबन आपण सहन करायचे का ? नाही ना ? तर आजपासून आपण हनुमानाचे होणारे विडंबन रोखण्याचा प्रयत्न करूया आणि  कुणी करत असेल, तर त्यालाही समजून सांगूया.

        आज आपल्याला मारुतिरायाविषयीची माहिती समजली, त्याविषयी कृतज्ञता व्यक्त करूया आणि यातील प्रत्येक कृती आचरणात येण्यासाठी मारुतिरायाकडे शक्ती मागूया.

– श्री. राजेंद्र पावसकर (गुरुजी), पनवेल.

 
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हनुमान जयंती : हनुमानाचा जन्म नेमका कुठे झाला? हनुमानाच्या जन्मस्थळावरून वाद का? - BBC News मराठी


हनुमान जयंती : हनुमानाचा जन्म नेमका कुठे झाला? हनुमानाच्या जन्मस्थळावरून वाद का?

हनुमान

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  • Author, अनघा पाठक
  • Role, बीबीसी मराठी

सध्या हनुमान चालिसा या एका मुद्द्यावरून राजकारण तापलं आहे. मात्र या हनुमानाचा जन्म कुठे झाला, हे जाणून घेऊ या.

हनुमान या हिंदू देवतेचा जन्म अंजनाद्री पर्वतात झाला, असा दावा तिरुमला तिरुपती देवस्थाननं 2021मध्ये केला होता.

चार सदस्यांच्या समितीने अहवाल दिल्यानंतर ही घोषणा देवस्थानने केली होती. पौराणिक आणि पुरातत्त्वीय पुराव्यांचे आधारे हा निष्कर्ष काढण्यात आला, असं अहवालात म्हटलं होतं.

पण या दाव्याला कर्नाटकातल्या धार्मिक संस्थांनी विरोध केला. हनुमानाच जन्म कर्नाटकातल्या हंपीजवळ झाला, असा त्यांनी दावा केला.

त्यामुळे मग रामायणात उल्लेख असलेल्या हनुमानाचा जन्म नक्की कुठे झाला याबद्दल कर्नाटक आणि आंध्र प्रदेश या दोन राज्यांमध्ये वाद होत असतो.

कारण, हनुमानाचा जन्म आपल्याकडे झाला असा दावा या दोन्ही राज्यांनी केला.

डिसेंबर 2020 मध्ये तिरुपती मंदिराचं व्यवस्थापन पाहाणाऱ्या तिरुमला तिरुपती देवस्थानम् या संस्थेने एक तज्ज्ञांची समिती नेमली. या समितीनं 21 एप्रिल 2021 रोजी आपला अहवाल सादर केला होता.

मुळची नाशिककर असल्यामुळे माझा आजवर असा समज होता की हनुमानाचा जन्म आमच्या नाशकात अंजनेरीत झाला.

पण आता दोन राज्य रितसर भांडतायत आणि त्यात महाराष्ट्राचा काही दावा नाही हे म्हटल्या या पौराणिक व्यक्तिरेखेचं जन्मस्थान नक्की कुठे असावं, त्याबद्दल तज्ज्ञ काय म्हणतात आणि पुराणात याचे काय दाखले आहेत ते ताडून पाहू ठरवलं.

यावर काही दिवसांपूर्वी प्रसिद्ध केलेली बातमी हनुमान जयंतीच्या निमित्तानं पुन्हा शेअर करत आहोत.

हिंदू धर्मात अशी मान्यता आहे की हनुमानाने रामाला रावणाविरुद्ध झालेल्या युद्धात मदत केली होती. हनुमानाने आपल्या शेपटीने रावणाची लंका जाळल्याचेही उल्लेख पुराणात आहेत. हनुमान एकनिष्ठ रामभक्त, रामसेवक होते असंही मानलं जातं त्यामुळे हिंदुधर्मीयांमध्ये हनुमानाला देवाचं स्थान प्राप्त आहे.

हनुमानाची आणि रामाची भेट सीतेच्या अपहरणानंतर झाली. नाशिककरांचा विश्वास असा आहे की, सीतेचं अपहरण नाशिकमधून झालं. राम, लक्ष्मण, सीता नाशिकमधल्या पंचवटीत राहात होते. इथेच काळाराम मंदिर आहे, सीतागुंफा आहे, आणि जटायू-रामाची भेट झाली ते टाकेद क्षेत्रही इथेच आहे. इतकंच नाही तर लक्ष्मणाने शुर्पणखेचं नाक इथेच कापलं म्हणून या गावाला 'नासिक' असं नाव पडलं ज्यांचं पुढे 'नाशिक' झालं असाही इथे प्रवाद आहे.

हनुमानाचा जन्म नाशिक जिल्ह्यातल्या त्र्यंबकेश्वर तालुक्यातल्या अंजनेरी डोंगरावर झाला असं इथल्या लोकांना वाटतं. अंजनेरी हे नाव हनुमानाची आई अंजनीमातेच्या नावावरून पडलं. इथे डोंगरावर अंजनी मातेचं आणि हनुमानाचं मंदिरही आहे.

नाशिकच नाही, महाराष्ट्रातल्या लोकांची श्रद्धा आहे की, राम-सीता-लक्ष्मण नाशिकमधल्या पंचवटीत राहात होते, हनुमानाचा जन्म इथल्या अंजनेरी डोंगरावर झाला आहे.

असं असताना हनुमानाच्या जन्मस्थळावरून कोणत्या दोन राज्यांमध्ये वाद सुरू आहे?

आंध्र प्रदेश - कर्नाटक वाद

हनुमानाचा जन्म आपल्याकडे झाला असा दावा दक्षिणेकडच्या दोन राज्यांनी केला.

कर्नाटकचं म्हणणं आहे की हनुमानाचा जन्म हंपीजवळच्या किष्किंधामधल्या अंजेयानाद्री/अंजनाद्री टेकड्यांमध्ये झाला आहे, तर आंध्र प्रदेशचं म्हणणं आहे की तिरुमलाच्या सात टेकड्यांमध्ये (सप्तगिरी) असलेलं अंजनाद्री हे हनुमानाचं खरं जन्मस्थान आहे.

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महाराष्ट्राने या वादात उडी घेतलेली नाही, किंवा हनुमानाच्या जन्माबाबत कोणता दावाही केलेला नाही.

डिसेंबर 2020 मध्ये तिरुपती मंदिराचं व्यवस्थापन पाहाणाऱ्या तिरुमला तिरुपती देवस्थानम् या संस्थेने एक तज्ज्ञांची समिती नेमली. यात वैदिक अभ्यासक, पुरातत्व शास्त्र अभ्यासक आणि इस्रोचे वैज्ञानिक यांचा समावेश आहे.

तिरुमला तिरुपती देवस्थानम् समितीचे कार्यकारी अधिकारी केएस जवाहर रेड्डी यांनी बीबीसी तेलुगूच्या शंकर यांच्याशी बोलताना सांगितलं की, "तिरुमलाच्या सात टेकड्या पुराणात आणि कहाण्यांध्ये शेषाद्री, निलाद्री, गरुडाद्री, अंजनाद्री, वृषभाद्री, नारायणाद्री आणि वेंकटाद्री म्हणून ओळखल्या जातात. अंजनाद्री या टेकड्यांचा भाग आहे, ही गोष्ट अंजनेयाचा (हनुमानाचा) जन्म इथे झाला होता ही गोष्ट सिद्ध करेल. आम्ही नेमलेल्या समितीने याचा पूर्ण अभ्यास केला आहे."

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रेड्डी यांच्यामते तज्ज्ञांच्या समितीकडे ऐतिहासिक पुरावेही आहेत. "अयोध्येत रामाचं मंदिर बांधलं जात असताना आता हनुमानाचं जन्मस्थळ निश्चित करणं महत्त्वाचं आहे," असंही त्यांनी बीबीसीशी बोलताना सांगितलं.

दुसरीकडे कर्नाटकचं म्हणणं आहे की, उत्तर कर्नाटकातल्या हंपीजवळ अंजेयानाद्री डोंगरावर हनुमानाचा जन्म झालेला आहे. इथे रामाची, लक्ष्मणाची आणि हनुमानाची सीतेच्या अपहरणानंतर भेट झाली होती असा उल्लेख रामायणात आहे असं कर्नाटकचे कृषीमंत्री बीसी पाटील यांनी माध्यमांशी बोलताना सांगितलं होतं.

या डोंगरावर हनुमान जन्मभूमी आहे म्हणून भक्तिस्थळ उभारणार असल्याचंही त्यांनी म्हटलं होतं.

रामायणात किष्किंधा नगरीचे उल्लेख येतात. ही किष्किंधा नगरी म्हणजे हंपीजवळ असलेलं किष्किंधा आहे असं कर्नाटकच्या लोकांचं म्हणणं आहे.

आंध्र प्रदेशातल्या आनंदम चिंदबरा यांनी आरापल्ली इथे हनुमान अध्यात्मिका केंद्र स्थापन केलं आहे. ते एका संस्कृत शाळेचे निवृत्त मुख्याध्यापक आहेत आणि धार्मिक प्रवचनही देतात. त्यांनी हनुमानच्या जन्मस्थळावर संशोधन प्रकाशित केलं आहे.

आनंदम चिंदबरा यांनाही हंपीजवळचं किष्किंधा म्हणजे रामायणात उल्लेख असलेला प्रदेश आहे हे मान्य आहे. वाली आणि सुग्रीव या भावंडांचं त्यावर राज्य होतं हेही ते म्हणतात. पण हनुमानाचा जन्म इथे झाला हे त्यांना मान्य नाही.

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"हनुमानाचा जन्म तिरुमला डोंगररांगेतल्या अंजनाद्री डोंगरावरच झाला. अंजनीमातेने नंतर हनुमानाला सुग्रीवाच्या सैन्यात सहभागी व्हायला पाठवलं हे खरं. ते किष्किंधेला आले होते हेही खरं, पण त्यांचा जन्म हंपीजवळ झालेला नाही," ते म्हणतात.

हनुमानाचा जन्म नक्की कुठे झाला हे समजून घ्यायचं असेल तर भविष्योत्तर पुराण, स्कंद पुराण आणि पराशर संहितेचा अभ्यास करायला हवा. रामायणात परिपूर्ण हनुमंत चरित्र नाहीये. त्यामुळे पराशर संहितेत पराशर ऋषींनी हनुमानाचं संपूर्ण चरित्र लिहिलं आहे. त्यातही सप्तगिरीमधल्या अंजनाद्रीचा उल्लेख हनुमानाचं जन्मस्थळ म्हणून केला आहे. हंपीचा उल्लेख कोणत्याही पुराणात नाहीये, असंही मत ते व्यक्त करतात.

चिंदबंरा पुढे म्हणतात "वाल्मिकी रामायणातल्या किष्किंधा कांडात सुग्रीव अंजनाद्रीवरूनही वानरसेना बोलवून घ्या असं म्हणतात असा उल्लेख आहे. आता हंपी म्हणजेच किष्किंधा आणि तिथेच अंजनाद्री/अंजेयानाद्री असेल तर तिथून सैन्य का बोलवायचं? सैन्य तर तिथेच असेल ना, म्हणजेच हा अंजनाद्री वेगळा आहे. हा अंजनाद्री म्हणजे सप्तगिरी (तिरुमला डोंगररांगा) मधला डोंगर. याचाच अर्थ हनुमानाचा जन्म सप्तगिरी डोंगररांगांमध्ये झाला होता. पुत्रप्राप्तीसाठी अंजनादेवीने सप्तगिरीत (तिरुमला डोंगररांगा) तप केल्याचाही पुराणात उल्लेख आहे."

या दोन जागांव्यतिरिक्त आणखी तिसऱ्या एका जागेची भर या वादात पडली आहे. शिवमोगा जिल्ह्यातल्या रामचंद्रपुरा मठाचे अधिपती राघवेश्वरा भारती यांनी दावा केला आहे की हनुमानाचा जन्म कर्नाटकच्या किनारी भागात गोकर्ण इथे झाला आहे.

ते दावा करतात की, वाल्मिकी रामायणातल्या संदर्भांवरून लक्षात येतं की गोकर्ण ही हनुमानाची जन्मभूमी होती तर हंपीजवळचं अंजेयानाद्री कर्मभूमी. वाल्मिकी रामायणात हनुमान स्वतः सीतेला माझी जन्मभूमी गोकर्ण असल्याचं सांगतो असे उल्लेख आहेत, असंही राघवेश्वरा भारती म्हणतात.

हनुमान

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अर्थातच आनंदम चिंदबरा हे दावे खोडून काढतात. "गोकर्ण हनुमानाचं जन्मस्थळ आहे ही चुकीची धारणा आहे. त्या स्वामीजींनी वाल्मिकी रामायणाचा उल्लेख केला आहे. सुंदरकांडात एक श्लोक आहे, ज्यात हनुमान सीतेला म्हणतो, 'अहं केसरिणः क्षेत्रे'. आता हनुमानाचे पिता केसरी गोकर्णचे होते, त्यामुळे त्या स्वामींनी या श्लोकाचा असा अर्थ काढला की हनुमानाने सीतेला सांगितलं मी केसरीच्या क्षेत्राचा आहे. हा अर्थ चुकीचा आहे.

इथे 'क्षेत्रज' या अर्थाने हा शब्द वापरला गेला आहे. आता 'क्षेत्रज म्हणजे काय तर महाभारतात कुंतीला पांडूच्या परवानगीने इतर देवतांपासून पुत्र प्राप्त झाले होते. म्हणजे पांडव हे पांडूचे पुत्र नाहीत तर 'क्षेत्रज'. तसंच अंजनीमातेला वायुदेवापासून हनुमानासारखा पुत्र प्राप्त झाला म्हणून ते केसरीचे 'क्षेत्रज'. मग हनुमानाचा जन्म गोकर्णला झाला असण्याचा प्रश्नच येत नाही."

मग नाशिकचा काय संबंध?

राज्य, भौगोलिक प्रदेश आणि याच्या अवतीभवती गुंफलेल्या कथा जरी वेगवेगळ्या असल्या तरी अंजनेरी, अंजनाद्री आणि अंजेयानाद्री तिन्ही ठिकाणांमध्ये समान धागा म्हणजे हनुमानाची आई अंजनीचं नाव.

रमेश पडवळ नाशिकमधले पत्रकार आणि इतिहास अभ्यासक आहेत. त्यांनी नाशिकच्या इतिहासावर पुस्तकंही लिहिली आहेत. या नावांमधल्या सारखेपणाबदद्ल ते आपल्या खास शैलीत सांगतात, "मी कुठेही गेलो तरी उमेचा मुलगा म्हणूनच ओळखला जाईन, तसंच हनुमानाचं जन्मस्थळ म्हणून जेवढ्या जागा प्रसिद्ध आहेत सगळ्या अंजनीमातेच्या नावानेच ओळखल्या जातील. खुद्द हनुमानही अंजनीपुत्र म्हणूनच ओळखले जातात."

अंजनेरी

पुराणात उल्लेखलेल्या अनेक जागा या ना त्या नावाने नाशिकमध्ये आहेत. नाशिकमध्ये लक्ष्मणाने सीतेसाठी आखलेली लक्ष्मणरेषाही आहे, राम-लक्ष्मण-सीता कुंडही आहेत, सीतागुंफाही आहेत आणि जटायूने प्राण सोडला ती जागा. काळाराम मंदिर आणि पंचवटीला भेट देण्यासाठी इतर राज्यातूनही भाविक इथे येत असतात.

मग नक्की काय खरं असा प्रश्न पडतो. इतिहासकार आणि व्याख्याते सच्चिदानंद शेवडे म्हणतात, "हजारो वर्षांपूर्वी घडलेल्या गोष्टींबद्दल स्थानिक लोकांमध्ये कालानुरूप काही मान्यता तयार होत असतात आणि त्या मान्यता त्या लोकांसाठी खऱ्याच असतात. हनुमानाचा जन्म नक्की कुठे झाला याबदद्ल लिखित स्वरूपात कुठे काही उपलब्ध नाही. पण महाराष्ट्रातले लोक नाशिकजवळच्या अंजनेरी पर्वतावर हनुमानाचा जन्म झाला असंच मानतात."

रमेश पडवळही या मताला दुजोरा देतात.

"अहो इंडोनेशियातही पंचवटी आहे, मग तुम्ही काय म्हणाल? भारतात नसेल अशी रामकथा तिथल्या विमानतळावर चितारली आहे. चीनमध्ये रामायणाचे उल्लेख सापडतात. हरियाणात रामायणात उल्लेख केलेल्या जागा आहेत, गुजरातमध्ये आहेत. म्हणजे ही जी रामायणाची कथा आहे, ही प्रत्येक प्रदेशाने आपआपल्या पद्धतीने स्वीकारली आहे आणि त्याला आपआपल्या पद्धतीने नावं दिली आहेत. या कथेच्या प्रत्येक आवृत्तीत त्या त्या भागातली भौगोलिक ठिकाणं आहेत," ते सविस्तर सांगतात.

नाशिकमध्येही एक किष्किंधा आहे असं त्यांनी मला सांगितलं. इतकी वर्षं नाशिकमध्ये राहूनही मीही हे नाव ऐकल्याचं मला आठवत नाही. "नाशिकमध्ये किष्किंधा नावाचं एक कुंड आहे. नाशिकमध्ये जी ठिकाणं आहेत ती सगळी तुम्हाला कर्नाटक आंध्रमध्ये पण सापडतील," रमेश म्हणतात.

अंजनेरी

त्या लोकांची या ठिकाणांमध्ये भावनिक गुंतवणूक आहे, पण त्याबद्दल ठोस पुरावे नाहीत म्हणून वाद उद्भवतात असंही ते सांगतात.

"पुराणांमध्ये एखाद्या जागेचा उल्लेख आहे, पण त्या जागेचं नक्की लोकेशन काय, अचूक भौगोलिक स्थान काय असे उल्लेख नाहीत. त्यामुळे लोकांनी आपआपल्या भागात ठरवून टाकलं आहे की ही जागा म्हणजे पुराणात उल्लेख केलेलं हे स्थळ. एखाद्याला रामायणाची कथा भावली. त्याने आपल्या भाषेत, आपल्या अभिव्यक्तीत लिहिली आणि आपल्या समोर दिसणाऱ्या भौगोलिक गौष्टींचं वर्णन केलं इतकंच."

 

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श्री हनुमान जयंती - अंजनेय यांची जन्म कथा आणि जीवनातील काही रहस्य

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हनुमान जयंती ही चैत्र शुद्ध पौर्णिमेला येते (इंग्रजी कॅलेंडरनुसार एप्रिल महिन्यामध्ये). श्री हनुमानांचा जन्म सूर्योदयाच्या वेळी झालेला आहे. या धरतीवरील ७ चिरंजीवांपैकी (कधीच मृत्यू न होणारे) एक हे श्रीराम भक्त हनुमान आहेत. श्री हनुमान हे महारुद्राचे ११ वा अवतार आहेत.

श्री हनुमान जन्म कथा 

राजा दशरथ यांनी जेव्हा पुत्र प्राप्तीसाठी पुत्र कामेष्टी यज्ञ केला, त्यातून जो पायस प्रसाद मिळाला तो प्रसाद राजा दशरथ यांनी त्यांच्या तीन राण्या कौशल्या, सुमित्रा आणि कैकयी यांना दिला. सगळ्यात आधी मला प्रसाद का दिला नाही म्हणून कैकयी राजा दशरथ यांच्याबरोबर बोलत असताना कैकयीच्या हातून तो प्रसाद घारीने पळविला.

घारीने तो प्रसाद अंजनेरी पर्वतावर ( नाशिक येथील त्रंबकेश्वर जवळ हा पर्वत आहे) पुत्र प्राप्तीसाठी तप करत असलेल्या माता अंजनीच्या हातामध्ये टाकला ( ही घार स्वर्गातील एक अप्सरा होती. ब्रह्मदेवाच्या शापाने तिला घारीचा जन्म मिळाला आणि जेव्हा ही घार कैकयीच्या हातामध्ये असलेला पायस प्रसाद उचलून अंजनी मातेच्या हातामध्ये टाकेल तेव्हा ती शाप मुक्त होईल असे ब्रह्मदेवाने तिला सांगितले ).

अंजनी मातेने तो प्रसाद ग्रहण केला. श्री हनुमान हे महारुद्राचे ( महादेव ) ११ वा अवतार आहेत. भगवान शिवांनी वायुद्वारे त्यामध्ये आपला दिव्यआत्मा ठेवला. चैत्र शुद्ध पौर्णिमेला सूर्योदयाच्या वेळी अंजनी माता यांना मारुती हा पुत्र झाला.

श्री हनुमान यांच्या आई आणि वडिलांबद्दल माहिती. 

श्री हनुमान यांच्या वडिलांचे नाव केसरी व आईचे नाव अंजनी आहे. श्री हनुमान यांचे वडील केसरी हे सुमेरू पर्वताचा राजा होते. माता अंजनी या पुंजीकस्थला नावाची एक अप्सरा होती. परंतु ऋषी शापामुळे त्यांना वानर जन्म मिळाला. कुंजीर या वानराच्या इथे त्यांचा जन्म झाला. त्यानंतर राजा केसरी यांच्याबरोबर विवाह झाल्यानंतर त्यांचे नाव अंजना झाले. मारुती यांच्या आईचे नाव अंजनी असल्यामुळे त्यांना अंजनेय या नावाने देखील ओळखले जाते.

श्री मारुतीरायांचे नाव हनुमान का झाले?

जन्म झाल्यानंतर मारुतीरायांना खूप भूक लागली. आकाशीमध्ये लाल लाल अग्नीचा गोळा म्हणजे सूर्याला बघून मारुतीरायांना असे वाटले की ते एक फळ आहे. त्यामुळे त्यांनी ते फळ खाण्यासाठी आकाशामध्ये झेप घेतली. श्री मारुतीरायांनी असे केले असता संपूर्ण सृष्टी वरती संकट आले असते.

म्हणून इंद्रदेवाने त्यांना शस्त्र फेकून मारले. हे शस्त्र त्यांच्या हनुवटीला लागले आणि ते बेशुद्ध पडले. वायू देवतेने त्यांना हातावरती झेलून घेतले. वायुदेवतेने इंद्रदेव आणि इतर देवांना शासन केले आणि सर्व देव वायुदेवांना शरण आले. मारुतीच्या हनवटीला इंद्र वज्र लागल्यामुळे त्यांना हनुमान हे नाव देण्यात आले आणि मारुतीरायांना अनेक आशीर्वाद देखील देवतांनी दिले.

मारुतीरायांनी सूर्यदेवता यांच्याकडून ज्ञानग्रहण केले आणि त्यानंतर मारुतीराय किष्किंधेमधे सूर्यपुत्र वाली आणि सुग्रीव यांच्या जवळ राहू लागले. 

श्रीराम आणि हनुमान यांची पहिली भेट केव्हा व कुठे झाली?

सुग्रीव आणि वाली या दोन्ही भावांमध्ये झालेल्या वादानंतर हनुमंतराय हे सुग्रीवसह, जांबुवंत, नळ आणि  निळ या त्यांच्या मित्रांसोबत ऋष्यमुक या पर्वतावरती राहू लागले.

मारुतीराय जेव्हा लहान होते त्यावेळेस माता अंजनी यांनी मारुतीरायांना सांगितलेले होते की, “जो महापुरुष तुझी ब्रह्मकौपिन ओळखील ते तुझे सद्गुरु आहेत असे तो समज”. सीता शोध घेत असताना श्रीराम आणि लक्ष्मण हे ऋष्यमुक पर्वतावरती आले. विश्राम करण्यासाठी ते एका झाडाखाली बसले.

सुग्रीव यांना असा संशय आला की हे दोन मनुष्य वालीने आपणास मारण्यासाठी पाठवलेले असावे म्हणून त्याने मारुतीरायांना त्यांच्याबद्दल शोध घेण्यासाठी पाठवले. मारुती राम – लक्ष्मण ज्या झाडाखाली बसलेले होते त्या झाडाच्या वरती जाऊन बसले. त्यावेळेस श्रीराम म्हणाले “हे लक्ष्मणा! झाडावरती बसलेले हे वानर ब्रह्मकौपिन असलेले दिव्यआत्मा आहे.” प्रभू श्रीरामांच्या मुखा मधून हे शब्द ऐकताच मारुतीरायांना अंजनी मातांनी सांगितलेले शब्द आठवले.

मारुतीरायांनी आपल्या सद्गुरूची परीक्षा घेण्याचे ठरवले. मारुती यांनी झाडावरची एक फांदी तोडून प्रभू श्रीरामांच्या अंगावरती फेकली. प्रभू श्रीरामांनी बाण मारून ती फांदी तोडली आणि त्या बाणाच्या वेगामुळे मारुतीराया बेशुद्ध पडले. वायू देवतेने मारुतीरायांना प्रभू श्रीरामांच्या चरणी ठेवले आणि “याचा संभाळ करा” अशी विनंती केली. प्रभू श्रीरामांनी त्यानंतर मारुतीरायाला अनुग्रह दिला आणि सुग्रीव व राम यांच्यामध्ये मैत्री झाली. 

श्री हनुमान यांना आपली शक्ती विसरण्याचा शाप कोणी दिला?

लहानपणी मारुती हे अतिशय खोडकर होते. जंगलातील ऋषीमुनी जेव्हा तपसाधना करत असे तेव्हा ते त्यांना त्रास देत होते. परंतु मारुती हे लहान असल्यामुळे ऋषीमुनी त्यांच्याकडे दुर्लक्ष करत. मारुतीच्या खोडकरपणामुळे त्यांचे आई वडील देखील चिंतेत होते. त्यांनी ऋषीमुनींना विनंती केली की मारुती हे लहान आहे तुम्ही त्यांना माफ करावे.

परंतु मारुतीरायांच्या या खोडकर वृत्तीला कमी करण्यासाठी ऋषी अंगिरा आणि भृगुवंशच्या मुनींनी त्यांना त्यांची शक्ती विसरण्याचा सौम्य शाप दिला. या शापामुळे मारुतीराय यांच्यामधील खोडकरपणा कमी झाला. मारुतीरायांना जर कोणी त्यांच्या शक्ती बद्दल स्मरण करून दिले तरच त्यांना त्यांच्यामधील शक्ती आठवत असे. 

श्री हनुमान यांच्या मुलाचे नाव व त्याचा जन्म कसा झाला?

रामायणातील सर्व घटनेतील एक विशेष महत्त्वाचे म्हणजे मारुतीराय ब्रह्मचारी असून त्यांना एक पुत्र देखील होता. लंका दहन केल्यानंतर जेव्हा मारुती राय आपल्या शेपटीची आग विझवण्यासाठी समुद्रकिनारी गेले त्यावेळेस त्यांनी त्यांचा घाम टिपून फेकला आणि तो एका मगरीने गिळला.

हनुमानाच्या त्या घामापासून त्या मगरीला मकरध्वज नावाचा एक मुलगा झाला. मकरध्वज पाताळलोकमध्ये राहत होता. रावणाचा भाऊ अहिरावण जो पाताळ लोकच राजा होता याने त्याचा सांभाळ केला होता.  

११ मारुतींची नावे व ते कुठे आहेत?

समर्थ रामदास स्वामींनी चाफळ आणि त्याच्या आजूबाजूंच्या गावांमध्ये या ११ मारुतींची स्थापना केलेली आहे.

१. चाफळ – दास व प्रताप मारुती
२. उंब्रज- मठातील मारुती
३. पारगाव – पारगावाचा मारुती
४. मसूर – मसूरचा मारुती
५. शहापूर – शहापूरचा मारुती / चुन्याचा मारुती
६. बत्तिसशिराळे – शिराळ्याचा मारुती
७. शिंगणवाडीचा मारुती – खडीचा मारुती
८. मनपाडळे – मनपाडळेचा मारुती
९. माजगाव – माजगावचा मारुती
१०. बाहे -बहे बोरगावचा मारुती
११. पाडळी – पाडळीचा मारुती

 

तुम्हाला माहिती आहे का? कलियुगात कोठे राहतात हनुमान

दिव्य मराठी

श्रीहनुमान, श्रीराम भक्तांचे परमधार, रक्षक आणि श्रीराम मिलनाचे अग्रदूत आहेत. रुद्रावतार श्रीहनुमानाचे बळ, पराक्रम, उर्जा, बुद्धी, सेवा आणि भक्तीच्या अद्भुत व विलक्षण गुणांनी भरलेले चरित्र संसारिक जीवनासाठी आदर्श मानले जाते. याच कारणामुळे शास्त्रामध्ये हनुमानाला 'सकलगुणनिधान' संबोधण्यात आले आहे. हिंदू पौराणिक मान्यतेनुसार श्रीहनुमान चिरंजीव आहेत.

हनुमान उपासनेचा महापाठ श्रीहनुमान चालीसामध्ये गोस्वामी तुलसीदासांनी लिहिले आहे की - 'चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।'

या चौपाईतून असा स्पष्ट संकेत मिळतो की, श्रीहनुमान प्रत्येक युगात कोणत्या न कोणत्या रुपात शक्ती आणि गुणांसोबत जगासाठी संकटमोचक रुपात उपस्थित राहतील. येथे जाणून घ्या, कोणत्या युगात कशाप्रकारे जगासाठी संकटमोचक ठरले हनुमान आणि विशेषतः कलियुगात हनुमानाचे वास्तव्य कोठे आहे...

सतयुग - श्रीहनुमानाला रुद्र अवतार मानण्यात आले आहे. महादेवाचे दुःख दूर करणारे रूप म्हणजेच रुद्र आहे. यामुळे सतयुगात हनुमानाचे शिव रूप हे जगासाठी कल्याणकारी आणि संकटनाशक ठरले.

 
हनुमंताच्या जीवनातील 5 महत्त्वाचा कहाण्या
 
वाल्मिकी रामायणाशिवाय जगभरातील रामायणात हनुमानजीशी संबंधित शेकडो कथांचे वर्णन आढळते. त्यांच्या बालपणापासून ते कलियुगापर्यंतच्या हजारो कथा वाचायला मिळतात. हनुमानजींना कलियुगातील संकट निवारक देवता म्हटले आहे. केवळ त्याची भक्ती फलदायी असते. चला जाणून घेऊया असे कोणते 5 प्रसंग आहे जे आजही प्रचलित आहेत.
 
1. चारों जुग परताप तुम्हारा : लंकावर विजय मिळवून अयोध्या परतल्यावर जेव्हा श्रीराम त्यांना युद्धात मदत करणारे विभीषण, सुग्रीव, अंगद इतरांना कृतज्ञतेचे प्रतीक म्हणून भेटवस्तू देतात तेव्हा हनुमानजी श्री रामाची प्रार्थना करतात.- ''यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।''
 अर्थात : 'हे वीर श्रीराम! जोपर्यंत या पृथ्वीतलावर रामाची कथा प्रचलित होत राहील, तोपर्यंत माझा प्राण या देहात वास करावा.' यावर श्रीराम त्यांना आशीर्वाद देतात- 'एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।'

अर्थात् : 'हे कपिश्रेष्ठ, असेच घडेल, यात शंका नसावी. जोपर्यंत माझी कथा जगात प्रचलित आहे, तोपर्यंत तुझी कीर्ती अमिट राहील आणि तुमच्या शरीरात प्राण राहतील जोपर्यंत हे लोक बनले राहतील, तोपर्यंत माझी कथा देखील स्थिर राहील.' चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
 
2. संजीवनी पर्वत दोनदा उचलले : बालपणी एकदा हनुमानजींनी देवगुरु बृहस्पतीच्या आज्ञेवरून वडिलांसाठी समुद्रातून संजीवनी पर्वत आणला. हे पाहून त्याची आई खूप भावूक होते. यानंतर राम-रावण युद्धात रावणाचा पुत्र मेघनाद याने शक्तीबाणाचा वापर केला तेव्हा लक्ष्मणासह अनेक वानर बेहोश झाले. जामवंताच्या सांगण्यावरून हनुमानजी संजीवनी वनौषधी घेण्यासाठी द्रोणाचल पर्वताकडे निघाले. वनौषधी ओळखू न आल्याने त्यांनी डोंगराचा एक भाग उचलला आणि परत जाऊ लागले. वाटेत त्याला कालनेमी राक्षसाने अडवले आणि युद्धासाठी आव्हान दिले. कालनेमी हा रावणाचा अनुयायी होता. कालनेमी रावणाच्या सांगण्यावरूनच हनुमानजींचा मार्ग अडवण्यासाठी गेला होता. पण रामभक्त हनुमानाला त्याच्या कपटाची जाणीव झाली आणि त्याने लगेचच त्याचा वध केला.
 
3. विभीषण आणि राम यांची भेट घडवून दिली : जेव्हा हनुमानजी सीतामातेच्या शोधात विभीषणाच्या महालात जातात. विभीषणाच्या महालावर कोरलेली रामाची खूण पाहून ते प्रसन्न होतात. तिथे विभीषण यांना भेटतात. विभीषणला परिचय विचारतात स्वत: रघुनाथाचा भक्त म्हणून ओळख करून देतो. हनुमान आणि विभीषण यांचे दीर्घ संभाषण झाल्यावर हनुमानजींना माहित पडतं की हे कामाचे व्यक्ती आहे.
यानंतर श्रीराम लंकेवर आक्रमण करण्याच्या तयारीत असताना, विभीषणाचा रावणाशी वाद सुरू होता, शेवटी विभीषण राजवाडा सोडतात आणि रामाला भेटण्यासाठी आतुरतेने समुद्राच्या या बाजूला येतात. विभीषण येताना पाहून वानरांनी शत्रूचा एक खास दूत असल्याचे जाणून त्यांच्यावर कोणी विश्वास ठेवत नाही.
सुग्रीव म्हणतात - 'हे रघुनाथजी! ऐका, रावणाच भाऊ भेटायला आला आहे' प्रभु म्हणतात - 'हे मित्र! तुम्हाला काय वाटतं ?' वानरराज सुग्रीव म्हणतात - 'हे नाथ! राक्षसांची माया कळून येत नाही. इच्छेने रूप बदलणारा हा कोणत्या कारणाने आला आहे हे माहीत नाही.' अशात हनुमानजी सर्वांचे सांत्वन करतात आणि राम सुद्धा म्हणतात की आश्रयाची भीती दूर केली पाहिजे हे माझे व्रत आहे. अशाप्रकारे श्रीराम-विभीषणाची भेट हनुमानजींमुळेच निश्चित झाली.
 
4. सर्वप्रथम रामायण लिहिले : धर्मग्रंथानुसार, विद्वानांचे म्हणणे आहे की हनुमानजींनी प्रथम रामकथा लिहिली आणि तीही आपल्या नखांनी खडकावर. ही रामकथा वाल्मिकीजींच्या रामायणाच्याही आधी लिहिली गेली होती आणि ती 'हनुमद रामायण' म्हणून प्रसिद्ध आहे. ही घटना घडली तेव्हा श्रीराम प्रभु रावणावर विजय मिळवल्यानंतर श्रीराम अयोध्येत राज्य करू लागले होते आणि श्री हनुमानजी हिमालयात जातात. तेथे ते शिव तपश्चर्येदरम्यान रोज खडकावर नखांनी रामायणाची कथा लिहीत असे. अशा प्रकारे त्यांनी भगवान श्रीरामाच्या महिमाचा उल्लेख करणारे 'हनुमद रामायण' रचले.
काही काळानंतर महर्षी वाल्मिकींनीही 'वाल्मिकी रामायण' लिहिले आणि ते लिहिल्यानंतर त्यांना ते भगवान शंकरांना दाखवून त्यांना अर्पण करण्याची इच्छा झाली. ते रामायण घेऊन शिवाचे निवासस्थान असलेल्या कैलास पर्वतावर पोहोचले. तेथे त्यांना हनुमानजी आणि त्यांनी लिहिलेले 'हनुमद रामायण' पाहिले. हनुमद रामायण पाहून वाल्मिकीजी निराश झाले.
वाल्मीकिजींना निराश बघून हनुमानजींनी त्यांना निराश होण्याचे कारण विचारले तेव्हा महर्षी म्हणाले की त्यांनी अथक परिश्रमानंतर रामायण लिहिली. पण तुमचं रामायण पाहिल्यावर आता माझ्या रामायणाकडे दुर्लक्ष होईल असं वाटतं, कारण तुम्ही जे लिहिले आहेस त्या तुलनेत माझे रामायण काहीच नाही. त्यानंतर वाल्मिकीजींची चिंता दूर करण्यासाठी श्री हनुमानजींनी हनुमद रामायण पर्वत शिला एका खांद्यावर उचलून आणि महर्षी वाल्मिकींना दुसऱ्या खांद्यावर बसवून आपली रचना श्रीराम यांना अर्पण करून समुद्रात विसर्जित केली. तेव्हापासून हनुमानाने रचलेले हनुमद रामायण उपलब्ध नाही. ती अजूनही समुद्रात पडून आहे.
 
5. हनुमान आणि अर्जुन : आनंद रामायणात वर्णित आहे की अर्जुनाच्या रथावर हनुमान विराजित होण्यामागील देखील कारण आहे. एकदा रामेश्वरम तीर्थमध्ये अर्जुनाचे हनुमानांशी मिलन होतं. या पहिल्या भेटीत अर्जुन हनुमानजींना म्हणाला- 'अरे, राम आणि रावणाच्या युद्धाच्या वेळी आपण तिथे होतास?'
हनुमानजी - ‘होय’, तेव्हा अर्जुन म्हणाला - ‘आपले गुरु श्री राम हे धनुष्यधारी होते, मग त्यांना समुद्र पार करण्यासाठी दगडी पूल बांधण्याची काय गरज होती? जर मी तिथे हजर असतो तर मी समुद्रावर बाणांचा पूल बनवला असता, ज्यावर चढून तुमची संपूर्ण वानर सेनेने समुद्र पार केली असती.’
यावर हनुमानजी म्हणतात - ‘अशक्य, बाणांचा पूल तेथे कोणतेही काम करू शकला नसता. आमचा एक ही वानर चढला असता तर तर बाणांचा पूल तुटला असता.
अर्जुन म्हणाला - ‘नाही, बघा हे समोर सरोवर आहे आणि आता मी त्यावर एक पुल निर्माण करतो. आपण या पुलावरुन सहज सरोवर पार करु शकता.’
हनुमान म्हणाले - ‘अशक्य’
तेव्हा अर्जुनने म्हटले - ‘तुमच्या चालण्याने पूल तुटला तर मी आगीत प्रवेश करीन आणि तो तुटला नाही तर तुम्हाला आगीत जावे लागेल.’
हनुमानाने हे स्वीकार केले की जर माझी दोन पावले सहन केली तर मी पराभव स्वीकारेन.’
तेव्हा अर्जुनाने आपल्या प्रचंड बाणांनी सेतू तयार केला. सेतू निर्माण होयपर्यंत हनुमान लघु रुपात होते परंतु सेतू तयार झाल्यावर त्यांनी विराट रूप धारण केले.
रामाचे स्मरण करून हनुमान त्या बाणांच्या पुलावर चढले. पहिले पाऊल टाकताच संपूर्ण पूल डळमळू लागला, दुसरे पाऊल टाकताच तो कोसळू लागला आणि तिसरे पाऊल टाकताच तलावाचे पाणी रक्तमय झाले.
तेव्हा श्री हनुमान सेतुहून खाली उतरले आणि अर्जुनाला अग्नी तयाराला सांगितले. अग्नी पेटल्यावर हनुमान आगीत उडी मारू लागले तेवढ्यात भगवान श्रीकृष्ण प्रकट झाले आणि म्हणाले 'थांबा!' अर्जुन आणि हनुमानाने त्यांना नमस्कार केला.
देवाने संपूर्ण प्रसंग जाणून घेतल्यावर म्हटले की ‘हे हनुमान, आपले तिसरे पाऊल सेतुवर पडला असताना मी कासव बनून सेतूखाली निजलेला होतो. आपल्या शक्तिमुळे पाय ठेवताच माझ्या कासव रुपातून रक्त निघू लागले. मी कासव रुपात नसतो तर हा सेतू तर आपल्या पहिल्या पावलातच तुटला असता’
हे ऐकून हनुमानाला कष्ट झाला आणि त्यांनी क्षमा मागितली‘मी आपल्या पाठीवर पाऊल ठेवल्यामुळे मोठा गुन्हेगार ठरलो. माझा हा गुन्हा कसा दूर होईल देवा?'' तेव्हा कृष्ण म्हणाले, हे सर्व माझ्या इच्छेने झाले आहे. काळजी करु नकोस आणि अर्जुनाच्या रथाच्या ध्वजावर तुला स्थान मिळावे अशी माझी इच्छा आहे.
 
 

Maruti Janma Katha : समर्थ रामदास स्वामी यांंनी रचलेल्या श्री मारुती स्तोत्रात हनुमानाची महती सांगण्यात आली आहे. यावरूनच हनुमानाची भव्यता आणि वेग यांची प्रचिती येते. मात्र याच मारुतीचा जन्म कसा झाला हे आपल्याला माहिती आहे का.

हनुमान जयंती
हनुमान जयंती (हिंदुस्तान टाइम्स)

प्रभू श्रीराम नवमी आपण थाटात साजरी केला आणि आता येत्या ६ एप्रिल २०२३ रोजी आपण रामभक्त हनुमानाचा जन्म दिवस साजरा करणार आहोत. हनुमान अर्थात मारुती हे शौर्याचं आणि प्रामाणिकपणाचं आगळं वेगळं प्रतीक आहे. ही देवता वानर रुपात असूनही श्रीरामांच्या रावणावरील विजयात आणि रावणाचा अहंकार सर्वात प्रथम मोडण्यात मारुतीला पाहिलं जातं.

मनासी टाकीले मागे, गतीसी तुलना नसे

अणूपासोनि ब्रम्हांडाएवढा होत जातसे

असं समर्थ रामदास स्वामी यांंनी रचलेल्या श्री मारुती स्तोत्रात म्हटलं आहे. यावरूनच हनुमानाची भव्यता आणि वेग यांची प्रचिती येते. मात्र याच मारुतीचा जन्म कसा झाला हे आपल्याला माहिती आहे का. आज आपण हनुमान जन्माची कथा वाचणार आहोत.

वाल्मिकी रामायणाच्या म्हणण्यानुसार हनुमानाचे वडील केसरी हे बृहस्पतीचे पुत्र होते आणि ते वायुअंश आहेत असं सांगितलं गेलं आहे. तर माता अंजनी ही स्वर्गातील अप्सरा होती. तपस्वी ऋषी दुर्वास, यांच्या शापाने ती वानर राजकन्या म्हणुन जन्माला आली होती. वायुअंश केसरी हे वानरराज होते, त्यांच्या बरोबर अंजनीचा विवाह झाला.

त्यावेळेस अंजना आणि केसरी यांनी आपल्याला एक पुत्र व्हावा अशी शिवशंकराला प्रार्थना केली. त्यांच्या भक्तीने भगवान शिव प्रसन्न् झाले आणि त्यांना वरदान देताना माझा अंश तुमच्यापोटी जन्माला येईल असा वर दिला.

दुसऱ्या एका आख्यायिकेनुसार, त्रेतायुगात दशरथ राजाच्या तीन राण्या होत्या मात्र काही केल्या त्यांना संतानप्राप्ती होत नव्हती. मग पुत्रप्राप्तीसाठी हवन करण्यात आला. हवन संपल्यानंतर गुरुदेवांनी राजा दशरथाच्या तीन राण्या कौशल्या, सुभद्रा आणि कैकेयी यांना प्रसादाच्या खीरीचं वाटप केलं. त्यावेळी खीरीचा थोडासा भाग एका पक्ष्याने पळवून नेला होता.

तो पक्षी उडत अंजनीच्या आश्रमात गेला.माता अंजना जिथे तपश्चर्या करत होती तिथेच त्या पक्ष्याच्या चोचीतली ती खीर माता अंजनीच्या हातात सांडली. ती खीर भोलेनाथाचा प्रसाद आहे असं मानून अंजनीने ती खीर खाल्ली आणि त्यातून शिवाचा अंश असलेल्या हनुमानाचा जन्म झाला असं सांगण्यात येतं. तो दिवस चैत्र महिन्याच्या शुक्ल पक्षाच्या पौर्णिमेचा दिवस होता म्हणून या दिवशी हनुमान जयंती साजरी केली जाते.

(Disclaimer : या लेखात देण्यात आलेली माहिती ही सर्वसामान्य ज्ञानावर आधारित असून 'हिंदुस्तान टाइम्स मराठी याची पुष्टी करत नाही. अवलंब करण्यापूर्वी तज्ज्ञांचा सल्ला घ्यावा.)

 
 

हनुमान रामायणातील एक लोकप्रिय व्यक्तिरेखा असून तो रामाचा महान भक्त, दास, दूत मानला जातो. त्याचा जन्म अंजनी या वानरीच्या पोटी अंजनेरी येथे झाला होता. तो पवनपुत्र व महाबली होता व त्याला अनेक शक्ती जन्मतःच प्राप्त होत्या. लहानपणी त्याला सूर्याला पकडण्याची इच्छा झाली. म्हणून त्याने सूर्याच्या दिशेने झेप घेतली. ते बघून इंद्रासहित सर्व देवांना काळजी वाटू लागली. सूर्याला व पृथ्वीला वाचविण्यासाठी इंद्राने आपले वज्र हनुमानाच्या दिशेने फेकले. त्या प्रहाराने हनुमान मूर्च्छित झाला. नंतर देवांनी त्याला 'तुला आपल्या सर्व शक्तींचा विसर पडेल' असा शाप दिला.
पुढे श्री राम वनवासात असताना त्याची व हनुमानाची भेट झाली व तो रामाचा निस्सीम भक्त बनला. रावणाने सीतेचे अपहरण केले तेव्हा हनुमानाने उड्डाण करून लंका गाठली आणि रामाचा निरोप सीतेकडे पोचवला. ते वर्ष इ.स.पू. ५०६७ होते असे दिल्लीच्या इन्स्टिट्यूट ऑफ सायंटिफिक रिसर्च येथील संशोधकांचे म्हणणे आहे. रावणाच्या सैनिकांनी त्याला पकडून रावणासमोर उभे केले व त्याच्या शेपटीला आग लावली. तेव्हा त्याने आपल्या शेपटीने पूर्ण लंकेला आग लावली आणि परत जाऊन सीतेचे वर्तमान रामास कळवले. रामाने आपली वानरसेना लंकेला नेली आणि रावणाशी युद्ध केले. या युद्धात हनुमानाने रामाला मोठी मदत केली. जेव्हा लक्ष्मण बाण लागून बेशुद्ध पडला होता, तेव्हा त्याच्या उपचारांसाठी हनुमानाने हिमालयात झेप घेतली आणि द्रोणागिरी पर्वत उचलून आणला. त्या पर्वतावर आढळणाऱ्या संजीवनी नावाच्या वनौषधीने लक्ष्मण परत शुद्धीवर आला व त्याचे प्राण वाचले. हनुमान हे चिरंजीव आहेत म्हणजे ते अजूनही जिवंत आहेत, अशी मान्यता आहे. जगात ज्या ज्या ठिकाणी, जेव्हा जेव्हा रामाचे नाव घेतले जाते तेथे मारुती हजर असतो, असे म्हणतात. या माहितीच्या आधाराने कवी [तुळशीदास]]ाने मारुतीला शोधून काढले.

हनुमान

हनुमान
शस्त्रगदा
वडीलकेसरी
आईअंजनी
अन्य नावे/ नामांतरेहनुमंत, मारुती , बजरंगबली, आंजनेय
या अवताराची मुख्य देवताशिव
मंत्रमारुतिस्तोत्र
नामोल्लेखरामायण
विशेष माहितीरामाचा दूत व भक्त,
वानर

मारुतीचा उल्लेख महाभारतात देखील येतो. तो महाभारत युद्धदरम्यान अर्जुनाच्या ध्वजावर बसून होता.

जन्मतिथी

  • चैत्र पौर्णिमेला मारुतीचा जन्म झाला असे महाराष्ट्रात मानले जाते, त्यामुळे त्यादिवशी हनुमान जयंती साजरी हॊतॆ.
  • हनुमानाचा जन्म नरक चतुर्दशीच्या दिवशी झाला असे उत्तर भारतात समजले जाते. या दिवशी महाराष्ट्रात आश्विन कृष्ण चतुर्दशी आणि उत्तर भारतात कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी असते.
 
 राम भक्त हनुमान अमर असल्याचं काय आहे कारण? बऱ्याच लोकांना माहिती नाही!


रामभक्त श्री हनुमान म्हणजे बल अर्थात शक्ती देणारी देवता. जीवनात कोणत्याही प्रकारचं संकट आलं तर त्याच्या निवारणासाठी श्री हनुमानाची भक्ती करण्याचा सल्ला दिला जातो. श्री हनुमानाचं आणखी एक वैशिष्ट्य म्हणजे ते अमर आहेत. यामागे एक कथा आहे. त्यानुसार प्रत्येक युगात श्री हनुमान अस्तित्वात असल्याचं सांगितलं गेलं आहे. श्री हनुमान अमर असण्यामागे नेमकं कोणतं कारण आहे?

आपल्या भक्तांना बुद्धी, शक्ती आणि ज्ञानाचं वरदान देणारे श्री हनुमान हे अमर आहेत, हे सर्वांना माहिती आहे; पण श्री हनुमानाला अमरत्व कोणी बहाल केलं याबाबत फार कमी जणांना माहिती आहे. श्री हनुमान हा भगवान शंकराचा अवतार मानला जातो. विश्वात श्री हनुमानाच्या शाश्वत अस्तित्वाचा एक उद्देश आहे. यासाठी त्यांच्या बालपणीची एक घटना कारणीभूत मानली जाते. त्रेतायुगात श्री हनुमानाचं नाव प्रभू श्रीरामासोबत जोडलं गेलं. द्वापार युगात श्रीकृष्णासोबत श्री हनुमानाचं नाव आलं. महाभारतात युद्धावेळी श्रीकृष्णाच्या सल्ल्यानुसार अर्जुनाने श्री हनुमानाकडं मदत मागितली होती. तेव्हा श्री हनुमानाने त्याला त्याच्या रथावरच्या ध्वजावर स्वार होण्याचं आश्वासन दिलं होतं. कलियुगात गोस्वामी तुळशीदास म्हणतात, 'मला प्रभू श्रीरामाचं चरित्र हे स्वतः हनुमानानं ऐकवलं, त्यामुळे मी इतकी सुंदर रचना करू शकलो.'

श्री हनुमानाच्या अमरत्वाबाबत एक कथा सांगितली जाते. त्यानुसार, हनुमान लहान होते, तेव्हा सकाळच्या वेळी ढगांच्या आड गेलेल्या लाल रंगाच्या सूर्याला ते फळ समजले आणि उड्डाण करत त्याच्याजवळ पोहोचले. ते सूर्याला पकडणार तेवढ्यात इंद्राचं लक्ष त्यांच्याकडे गेलं. इंद्रानं त्याच्या वज्रास्त्रानं बालहनुमानावर वार केला. यामुळे हनुमानाचा तोल गेला आणि तो जमिनीवर कोसळला. ही गोष्ट हनुमानाचे पिता पवनदेव यांना समजली तेव्हा ते संतापले आणि त्यांनी जगातला वायू रोखून धरला.

वायू थांबल्याने जगातले सर्व जीवजंतू अस्वस्थ झाले. त्या वेळी सर्व देवांनी पवनदेवाला वायू पूर्ववत करण्याची विनंती केली आणि हनुमानाला बरं केलं; पण वज्रास्त्रामुळे हनुमानाची हनु अर्थात हनुवटी थोडी वाकडी झाली. त्यामुळे त्याचं नाव हनुमान असं पडलं. या प्रसंगी सर्व देवतांनी हनुमानाला अनेक वर आणि शक्ती दिल्या. त्यात या विश्वाच्या अंतापर्यंत जिवंत राहण्याचं अर्थात अमरत्वाचं वरदानदेखील श्री हनुमानाला मिळालं.
 
 
 राम भक्त हनुमान अमर असल्याचं काय आहे कारण? बऱ्याच लोकांना माहिती नाही!


रामभक्त श्री हनुमान म्हणजे बल अर्थात शक्ती देणारी देवता. जीवनात कोणत्याही प्रकारचं संकट आलं तर त्याच्या निवारणासाठी श्री हनुमानाची भक्ती करण्याचा सल्ला दिला जातो. श्री हनुमानाचं आणखी एक वैशिष्ट्य म्हणजे ते अमर आहेत. यामागे एक कथा आहे. त्यानुसार प्रत्येक युगात श्री हनुमान अस्तित्वात असल्याचं सांगितलं गेलं आहे. श्री हनुमान अमर असण्यामागे नेमकं कोणतं कारण आहे?

आपल्या भक्तांना बुद्धी, शक्ती आणि ज्ञानाचं वरदान देणारे श्री हनुमान हे अमर आहेत, हे सर्वांना माहिती आहे; पण श्री हनुमानाला अमरत्व कोणी बहाल केलं याबाबत फार कमी जणांना माहिती आहे. श्री हनुमान हा भगवान शंकराचा अवतार मानला जातो. विश्वात श्री हनुमानाच्या शाश्वत अस्तित्वाचा एक उद्देश आहे. यासाठी त्यांच्या बालपणीची एक घटना कारणीभूत मानली जाते. त्रेतायुगात श्री हनुमानाचं नाव प्रभू श्रीरामासोबत जोडलं गेलं. द्वापार युगात श्रीकृष्णासोबत श्री हनुमानाचं नाव आलं. महाभारतात युद्धावेळी श्रीकृष्णाच्या सल्ल्यानुसार अर्जुनाने श्री हनुमानाकडं मदत मागितली होती. तेव्हा श्री हनुमानाने त्याला त्याच्या रथावरच्या ध्वजावर स्वार होण्याचं आश्वासन दिलं होतं. कलियुगात गोस्वामी तुळशीदास म्हणतात, 'मला प्रभू श्रीरामाचं चरित्र हे स्वतः हनुमानानं ऐकवलं, त्यामुळे मी इतकी सुंदर रचना करू शकलो.'

श्री हनुमानाच्या अमरत्वाबाबत एक कथा सांगितली जाते. त्यानुसार, हनुमान लहान होते, तेव्हा सकाळच्या वेळी ढगांच्या आड गेलेल्या लाल रंगाच्या सूर्याला ते फळ समजले आणि उड्डाण करत त्याच्याजवळ पोहोचले. ते सूर्याला पकडणार तेवढ्यात इंद्राचं लक्ष त्यांच्याकडे गेलं. इंद्रानं त्याच्या वज्रास्त्रानं बालहनुमानावर वार केला. यामुळे हनुमानाचा तोल गेला आणि तो जमिनीवर कोसळला. ही गोष्ट हनुमानाचे पिता पवनदेव यांना समजली तेव्हा ते संतापले आणि त्यांनी जगातला वायू रोखून धरला.

वायू थांबल्याने जगातले सर्व जीवजंतू अस्वस्थ झाले. त्या वेळी सर्व देवांनी पवनदेवाला वायू पूर्ववत करण्याची विनंती केली आणि हनुमानाला बरं केलं; पण वज्रास्त्रामुळे हनुमानाची हनु अर्थात हनुवटी थोडी वाकडी झाली. त्यामुळे त्याचं नाव हनुमान असं पडलं. या प्रसंगी सर्व देवतांनी हनुमानाला अनेक वर आणि शक्ती दिल्या. त्यात या विश्वाच्या अंतापर्यंत जिवंत राहण्याचं अर्थात अमरत्वाचं वरदानदेखील श्री हनुमानाला मिळालं.
 
 
 
 
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हनुमान : एक अध्ययन

लोकप्रभा टीम

हनुमानाची दैवत म्हणून उपासना होत असली, हनुमान जयंती साजरी होत असली तरी हनुमानाबद्दल तपशीलवार माहिती असतेच असं नाही.

हनुमानाला मारुती, महावीर, बजरंगबली, अंजनेय, महारुद्र, पवनपुत्र अशा अनेक नावांनी संबोधिले जाते. या दैवताचा उगम काय, त्याचा विकास कसा झाला, साहित्यात त्याचे काय स्वरूप आहे हे थोडक्यात अभ्यासणे हा या लेखाचा प्रमुख हेतू आहे.

व्युत्पत्ती : वैदिक साहित्यात कुठेही हनुमानाचा उल्लेख नाही.

हनुमंत हा शब्द तमिळचे संस्कृत रूप असावे असे पार्जीटर, डॉ. सुनीतीकुमार चतर्जी, शिवशेखर मिश्र इ. अभ्यासकांचे मत आहे. द्रविड शब्दाचे संस्कृत रूप बनविताना बहुतेक प्रारंभी ‘ह’कार जोडण्याची पद्धती आहे. तमिळ आणमंदि (आण= वानर, मंदि= नर) शब्दाचे संस्कृतीकरण म्हणजे हनुमंत होय. तमिळमध्ये अनुमंद असे म्हणतात. म्हणजे संस्कृतातील हाकार इथे लोप पावतो. अनुमान (तमिळ), हनुमंथूडू (तेलगु), अनोमन (इंडोनेशियन), अन्दोमान (मलेशियन) आणि हुंलामान (लाओस) अशी विविध नावे आहेत. परंतु विसाव्या शतकातील भाषाशास्त्री मरे इमानु जे द्राविडी भाषांचे तज्ज्ञ आहेत, त्यांचे असे मत आहे की, संगम साहित्यानुसार मंदि हा शब्द फक्त वानरीला उद्देशून वापरला जातो; वानराला नाही.

26-lp-hanumanकेमिली बुल्के त्यांच्या ‘रामकथा: उत्पत्ती आणि विकास’ या ग्रंथात म्हणतात की मध्य भारताच्या आदिवासी जमातीत हनुमानाचे मूळ सापडते. छोटा नागपूरमध्ये राहणाऱ्या उरांव व मुंड या आदिवासींमध्ये तिग्गा, हलमान, बजरंग व गडी अशी गोत्रे आढळतात. या सर्वाचा अर्थ वानर असा आहे. त्याचप्रमाणे रेद्दी, बरई, बसौर, भना व खुंगार या जातींमध्येही वानरसूचक गोत्रे आहेत. सिंगभूममधले भूईया जातीचे लोक आपण हनुमंताचे वंशज असल्याचे सांगतात. यावरून हनुमान आदिवासी जमातीचा देव असावा असे वाटते.

हनुमानाची विविध नावं : अंजनेय, अंजनीपुत्र, केसरीनंदन, मारुतीनंदन, पवनपुत्र इ.

हनुमानाच्या विविध उपाधी : रामरक्षेत हनुमानाची विविध विशेषणे सांगितली आहेत. ती अशी-मनोजवं, मारुततुल्यवेगम्, जितेन्द्रियं, बुद्धीमतावरिष्ठम्, वानरयुथमुख्यं, श्रीरामदूतं इ.

चरित्र :

वाल्मीकी रामायणात हनुमंताचे चरित्र तीन ठिकाणी आले आहे. (कििष्कधा-कांड ६६-६७, युद्ध-कांड २८ आणि उत्तर-कांड ३५-३६).

कििष्कधा कांडात जाम्बवानाने याचे चरित्र पुढीलप्रमाणे निवेदन केले आहे. पुंजीकस्थला नावाची एक सुंदर व श्रेष्ठ अप्सरा होती. ऋषीच्या शापामुळे ती वानर योनीत जन्माला आली. स्वेच्छेप्रमाणे रूप धारण करण्याचे सामथ्र्य तिच्या ठायी होते. महात्मा कुंजर या वानराची ती मुलगी होती आणि पुढे केसरी वानराची अंजना नामक पत्नी झाली. अंजना एकदा सुंदर स्त्रीचे रूप धारण करून पर्वतावर िहडत असाता वायूने तिला पाहिले आणि तो तिच्यावर आसक्त झाला. अंजनेला तो आिलगन देत असताना गोंधळून गेलेली ती पतिव्रता म्हणाली, ‘माझे पातिव्रत्य भ्रष्ट करण्याची कोण इच्छा करत आहे?’ त्यावर वायू तिला म्हणाला,

‘‘मनसाऽस्मि गतो यत्त्वां परिष्वज्य यशस्विनि

वीर्यवान् बुद्धिसम्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति

महासात्त्वो महातेजा महाबलपराक्रम:

ल.न प्लवने चव भविष्यति मया सम’’

(कििष्कधा ६६.१८-१९)

अर्थ : हे यशस्विनी, तुला आिलगन देऊन ज्या अर्थी मी मानसिक उपाभोगाच्या इच्छेने तुझ्या ठायी आपले तेज ठेवले आहे, त्याअर्थी तुला वीर्यवान व बुद्धिसंपन्न पुत्र होईल. तो पुत्र महाधर्यवान, महातेजस्वी, महाबलाढय़ व महापराक्रमी होऊन, मार्ग उल्लंघून जाण्यात आणि उडी मारण्यात माझी बरोबरी करील.

हा वर मिळाल्यावर संतुष्ट झालेली अंजना एका गुहेमध्ये प्रसूत झाली आणि तिने हनुमंताला जन्म दिला.

पुराणे :

विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण अशा काही पुराणातील चरित्राचा सारांश – ब्रह्मगिरीजवळच्या अंजन पर्वतावर केसरी वानर राहत होता. त्याला अंजनी व अद्रिका नावाच्या दोन बायका होत्या. अंजना वानरमुखी असून, अद्रिका मार्जार्मुखी होती. त्या दोघीही पूर्वजन्मीच्या अप्सरा असून, इंद्राच्या शापामुळे त्यांना पृथ्वीवर जन्म घ्यावा लागला होता. एकेदिवशी केसरी वानर तिथे नसताना अगस्त्य ऋषी तिथे आले. त्या दोघींनी त्यांचा चांगला आदरसत्कार करून बळवंत वा सर्वलोकोपापकारक अशा पुत्राच्या प्राप्तीचा वर मागितला. तसा वर त्यांना देऊन अगस्त्य ऋषी दक्षिणेकडे निघून गेल्यावर वायूने अंजनीला आणि निर्ऋतीने अद्रिकेला पाहिले आणि ते त्यांच्याशी रममाण झाले. पुढे अंजनीला हनुमान आणि अद्रिकेला पिशाचराज झाला.

शिवपुराणात थोडी भिन्न कथा आहे – एकदा शिवाने विष्णूचे मोहिनीरूप पाहिले, त्यामुळे शिव कामासक्त झाला आणि त्याचे वीर्यपतन झाले.

सप्तर्षीनी ते वीर्य पानावर घेऊन कर्णद्वारे गौतामिकांया अंजनीच्या ठिकाणी स्थापन केले. त्या वीर्यामुळे अंजनी गर्भवती झाली व तिने हनुमानाला जन्म दिला.

एकनाथी भागवतात महाराष्ट्रात प्रचलित असलेली कथा दिली आहे. दशरथाने पुत्रकामेष्टी केला. त्या वेळी पायसाचा एक भाग घारीने पळवला आणि पर्वतावर ध्यान करत असलेल्या अंजनीची पदरात टाकला. तिने पायस भक्षण केले आणि कालांतराने हनुमानाला जन्म दिला.

जन्मतिथी : साऱ्या भारतभर हनुमान जयंती साजरी होत असली तरी रामायण-महाभारतात हनुमानाच्या जन्मतिथीचा उल्लेख नाही. आनंद रामायणात (आ.रा. १.१३,१६२-१६२) चत्र शुद्ध एकादशीच्या दिवशी मघा नक्षत्रावर हनुमानाचा जन्म झाला असे म्हटले आहे. अगस्त्य संहितेत काíतक वद्य चतुर्दशी, मंगळवारी, स्वाती नक्षत्रावर मेष लग्नावर अंजनीच्या पोटी स्वत: शिवानेच जन्म घेतला असे म्हटले आहे. उत्सव सिंधू, व्रतरत्नाकर या ग्रंथातही हीच तिथी सांगितली आहे. सूर्य संहितेत मात्र काíतक वद्यातील तिथी सांगून वार शनिवार दिला आहे. याच्या जन्मातिथीबद्दल महिना, वार, तिथी वा वेळ यात मतभेद असल्यामुळे भारतात निरनिराळ्या प्रांतात निरनिराळ्या दिवशी हनुमान जयंती साजरी करतात. महाराष्ट्रात चत्र पौर्णिमेला हनुमान जयंती साजरी होते.

जन्मस्थान :

  • कर्नाटकातील हम्पी येथील अंजनेय पर्वत.
  • गुमला येथून १८ किमीवरील अंजन नावाचे खेडे
  • नाशिक जिल्ह्य़ातील त्र्यंबकेश्वरपासून सात किमीवरील अंजनेरी पर्वत
  • अंजन्धामानुसार, राजस्थानातील चुरू जिल्ह्य़ातील सुजानगढजवळ लक्षका पर्वत.
  • पुरी धामानुसार, भुवनेश्वरजवळ खुर्द येथील दाट जंगल.

बालपण :

किष्कधा कांड ६६-६७ : अंजना सूर्योदयाच्या वेळी प्रसूत झाली. नंतर नुकत्याच उगवलेल्या सूर्याला पाहून, हे फळ आहे, असे हनुमान समजला व ते घेण्यासाठी त्याने उडी मारली. ते पाहून इंद्र रागावला आणि त्याने त्याला वज्र फेकून मारले. त्यामुळे त्याची डावी हनू मोडली. तेव्हापासून तो हनुमान या नावाने प्रसिद्ध झाला. आपल्या मुलावर वज्रप्रहार झाल्याचे पाहून वायू क्रुद्ध झाला आणि त्याने आपले वाहणे बंद केले. त्यामुळे सर्व देव घाबरून वायूला प्रसन्न करण्यासाठी धडपडू लागले. मग वायू प्रसन्न झाल्यावर ब्रह्मदेवाने हनुमंताला वर दिला की युद्धात शस्त्राने तुझा वध होणार नाही. नंतर इंद्र म्हणाला की हा इच्छामरणी होईल.

27-lp-hanumanयुद्ध-कांड २८ : रामसन्याचा परिचय करून देताना हनुमानाचे लघुचरित्र सांगताना शुक म्हणतात- हा लहान असताना याला भूक लागली. पृथ्वीवरील पदार्थानी आपली भूक भागणार नाही या विचाराने त्याने सूर्याकडे झेप घेतली. परंतु सूर्यासमीप न जाताच तो उदयांचल पर्वतावर पडला आणि त्याची हनूू किंचित दुखावली, म्हणून तो हनुमान या नावाने प्रसिद्ध झाला.

गृहस्थ हनुमान : हनुमान ब्रह्मचारी मानला जात असला तरी तो गृहस्थ असल्याचीही कल्पना केली गेली आहे.

आनंदारामायण सार-कांड अध्याय ११ येथे अशी कथा आहे. लंकादहनानंतर हनुमान समुद्रात स्नान करून परत फिरला असता, त्याचा घाम एका मगरीने गिळला. त्यापासून ती गर्भवती झाली आणि तिला मकरध्वज नावाचा मुलगा झाला. अहिरावण-महिरावण वधाच्या प्रसंगात हनुमानाची आणि मकरध्वजाची भेट झाली.

विदेशी रामकथांमध्येही बव्हंशी हनुमान गृहस्थ म्हणून रंगवला आहे, या रामकथांचा मूलाधार भारतीय रामकथा आहे.

जैन साहित्य : ‘पउमचरिय’ या जैन रामकथेत हनुमंताला एक सहस्र बायका असल्याचा उल्लेख आहे. त्यात वरुणाची मुलगी सत्यवती, चन्द्रनाखाच्या अनाग्कुसुमा, नलनंदिनी, हरिमालिनी वा सुग्रीवकन्या पद्मरागा या प्रमुख होत्या. स्वयंभू देवाच्या पउमचरित हनुमानाच्या बायकांची संख्या ८००० आहे. रविषेणाच्या पद्मपुराणातही अशीच मोठी संख्या आहे.

हनुमानाचे गुणविशेष :

शौर्य /पराक्रम : रामायण आणि महाभारत यात हनुमानाच्या पराक्रमाचे गोडवे गायले आहेत. उत्तरकांड ३५.३-५ येथे हनुमानाच्या पराक्रमाची मुक्तकंठाने प्रशंसा करताना रामाने म्हटले आहे-

शौर्य दाक्ष्यं बलं ध्रय प्राज्ञता नायासाधानाम्

विक्रमश्च प्रभावश्च हनुमती कृतालाया:

दृष्ट्वैव सागरम वीक्ष्य सीदन्तीं कापिवाहिनीम्

समाश्वास्य महाबाहुर्योजनाना शतं प्लुत:

धश्र्यीत्वा पुरीं लङ्कां रावणान्तपुरं तदा

दृष्टा सम्भाषिता चापि सीता ह्य़ाश्वासिता तथा

या श्लोकात शौर्य, दक्षता, बल, धर्य, बुद्धिमता, राजनीती, राजकीय कृत्य शेवटाला नेण्याची हातोटी, पराक्रम वा प्रभाव या गुणांची प्रशंसा केली आहे.

महाभारतातील वनपर्वात १४७.११ येथेही हनुमंताच्या शौर्याची गाथा वर्णिली आहे.

बुद्धिमत्ता : वा.रा. उत्तरकांड ३६.१४ येथे बालपणाचे वर्णन करताना म्हटले आहे – बाल हनुमंताला आपल्या तेजाचा शंभरावा भाग देताना सूर्याने म्हटले की सर्व शास्त्रांचे अध्ययन करण्याची बुद्धिमत्ता मी याला देतो. त्यामुळे हा श्रेष्ठ वक्ता होईल. वाल्मीकी उत्तराकांडात ३६.४४-४६ येथे म्हणतात व्याकारांचे अध्ययन करण्याच्या उद्देशाने हा उदयाचलापासून अस्ताचलापर्यंत िहडत राहिला. व्याकारांसुत्रे, सुत्रावृत्ती, वाíतक, भाष्य आणि संग्रह या सर्वाचे अध्ययन करून इतर शास्त्रांमध्येही हा प्रवीण झाला आहे. सत्र आणि वेदार्थ निर्णय याविषयी याची बरोबरी करणारा या जगात कुणी नाही.

राजनीतिज्ञ : हनुमंताने स्वत:च मंत्र्याच्या कर्तव्याची जाणीव करून देताना सुग्रीवाला म्हटले आहे –

नियुक्र्तेमत्रिभिर्वाच्यो ‘वश्यं पार्थिवो हितम्

इत एव भयं त्यक्त्वा ब्राविम्यावाधृतम वच:

युद्धकांडातील (युद्ध. ११२) सीतेला शोधून काढण्याची जबाबदारी त्याच्यावर सोपवली होती. अयोध्येत येत असण्याची खबर भरताला सांगण्याची कामगिरी त्याच्यावर होती. (उत्तर ४०.२३) यावरून तो एक कुशल दूत होता हे लक्षात येते.

हनुमंताला संगीतशास्त्राचा एक प्रवर्तक मानतात. संगीत् पारिजात (१.९), संगीत् रत्नाकार (१,१७) इ. ग्रंथांतून प्राचीन संगाचार्याबरोबर अन्जानेयाचा उल्लेख येतो. आंजनेय् संहिता अथवा हनुमानत्संहिता या ग्रंथाचा उल्लेख तंजौरच्या रघुनाथ नामक राजाने आपल्या ‘संगीत् सुधा’ ग्रंथात केला आहे. संत रामदासांनी त्याची गायनी कला ध्यानात घेऊन त्याला संगीतज्ञानमहानता असे संबोधले आहे.

28-lp-hanumanहनुमान आणि रुद्र : हनुमानाला रुद्राचा अवतार मानतात. पुराणकाळात हे नाते विकसित झाले. स्कंद पुराण (अवंतीखंड ८४), ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखंड ६२), नारदपुराण (पूर्वखंड ७९), शिवपुराण (शातारुद्रसंहिता २०), भविष्यपुराण (प्रतिसर्ग पर्व १३०), महाभागावात्पुरण (३७) इ.ठिकाणी रुद्र व हनुमान हे नाते स्पष्ट केले आहे. हनुमानाची एकादश रुद्रांत गणना होते. भीम हे एकादश रुद्रांतील एक नाव आहे. म्हणूनच समर्थानी त्याला भीमरूपी महारुद्र म्हटले आहे. हनुमानच्या पंचमुखी मूíत रुद्रशिवाच्या पंचमुखी प्रभावातून आली आहे. रुद्रावतारी पंचमुखी हनुमंकॅहा मंत्र असा- ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय पंचवदनाय पूर्वमुखे सकलशत्रुसंहारकाय रामदूताय स्वाहा.

हनुमान आणि शनी : हनुमत्सहस्रनाम स्तोत्रात शनी हे हनुमानाचे एक नाव सांगितले आहे. सूर्य संहितेत हनुमानाचा जन्म शनिवारी झाला असे म्हटले आहे. शनी हा रुद्र आहे. हनुमानही कुठे कुठे शनीप्रमाणे काळ्या रंगाचा असतो. त्यामुळे नकळत शनी व हनुमान यांचे साधम्र्य लोकमानसांत रुजले असावे आणि शनिवारी हनुमानाची पूजा वा शनिवारव्रतात त्याची उपासना सुरू झाली असावी. परंतु शनी व हनुमान यांच्यात भेदही आहेत.-

  • शनी हा सूर्यपुत्र तर हनुमान वायुपुत्र आहे.
  • शनी व सूर्य यांच्यात वितुष्ट आले तर हनुमानाने सूर्याकडून सर्व विद्या ग्रहण केल्या. सूर्याने आपल्या तेजाचा १०० वा भाग हनुमानाला दिला.
  • शनी पापग्रह आहे, तर हनुमान हा लोकप्रिय देव आहे.
  • दोघेही ब्रह्मचारी असले तरी शनी देवाच्या मंदिरात स्त्रियांना प्रवेश निषिद्ध तर स्त्रिया हनुमानाची पुत्रप्राप्तीसाठी आराधना करतात.
  • शनिवारी तेलाची खरेदी-विक्री करू नये असा कोकणात संकेत आहे तर हनुमानाला शनिवारीच तेल वाहण्याची रुढी आहे.

हनुमान आणि यक्ष : हनुमानचा यक्षोपासनेशी जवळचा संबंध आहे. वीर हनुमान हे यक्षोपासनेतूनच आला आहे. वीर मारुती युद्धाच्या पावित्र्यात असतो. वीर आणि अद्भुत हे शब्द यक्षवाची आहेत. हनुमान हा महावीर आहे. कपिलऊम्बीर या नावाने हनुमंताची बावन्न वीरात गणना केलेली आहे. महाराष्ट्रात फाल्गुन मासात अनेक ठिकाणी वीर मिरवतात. त्या वेळी हे वीर मारुतीच्या दर्शनाला चाललेले असतात. या परंपरेतून मारुतीचा वा यक्ष परंपरेचा जवळचा संबंध सूचित होतो. मथिली लोकगीतांमध्ये व ब्रज मंडलात अनेक गीतांमध्ये हनुमंतासाठी वीर हाच शब्द वापरतात. याशिवाय यक्ष संस्कृतीची अनेक लक्षणे स्पष्ट करणारे गुणविशेष हनुमंताच्या ठायी आहेत.

यक्षनिवास पाण्याच्या ठायी असतो. राजस्थानातील बहुतेक गावी विहिरीजवळ हनुमंताच्या गढय़ा असतात. हरयाणात विहीर खणायला प्रारंभ करताना तिथे प्रथम मारुतीची गढी उभारतात.

चुरमा हे यक्षांचे विशेष खाद्य आहे आणि राजस्थानात चुरम्याशिवाय हनुमानाचा नवेद्य होऊ शकत नाही.

यक्ष हे रोग, भूतबाधा, वांझपण घालवतात अशी समजूत आहे. हनुमानाची उपासना याचसाठी केली जाते. राजस्थान, पंजाब या प्रदेशात आजारी माणसाला बरे वाटण्यासाठी हनुमानाच्या मंदिरात नेण्याची प्रथा आहे. महाराष्ट्र, गुजरात या प्रदेशात साथीचे रोग सुरू झाले असता ते घालवण्यासाठी हनुमानाची पूजा करतात. रोगमुक्तीसाठी वीर-हनुमान मंत्राचा प्रयोग करतात. भूतबाधा झाली असता त्याला हनुमानाच्या मंदिरात नेतात किंवा हनुमान मंत्र-स्तोत्रे म्हणतात.

स्त्रिया पुत्रप्राप्तीसाठी मारुतीची उपासना करतात. निपुत्रिक स्त्री िभतीवर सिंदुराने मारुतीची आकृती काढून त्याची पूजा करते. त्याच्यापुढे चढते-उतरते, कणकेचे दिवे लावते. शनिवारी त्याच्या गळ्यात रुईच्या पांची किंवा फुलांची माळ घालून त्याला उडीद वा मीठ अर्पण करते.

हनुमान आणि तंत्रोपासना : हनुमानाची तांत्रिक उपासना मनोकामना पूर्ण करणारी आणि लौकिक सिद्धी प्राप्त करून देणारी आहे, असा लोकांचा विश्वास आहे. या तांत्रिक उपासनेत द्वादाशाक्षरी मंत्राला महामंत्रराज म्हणतात –

हौं हृस्फें हूख्फें ह्सौं हनुमते नम:

या मंत्राचा ऋषी राम आहे. छंद जगाती असून, देवता हनुमान आहे. ह्सौं हे त्याचे बीज असून हृस्फें त्याची शक्ति आहे. या मंत्राचा यथाविधी प्रयोग केल्यावर राजभय, शत्रूभय उरत नाही. विषारी पाणी शुद्ध करण्याचे सामथ्र्य या मंत्रात आहे. तसेच जारणमारण, उच्चाटन इ. जीवघेण्या संकटातून माणूस मुक्त होऊन त्याला इच्छित प्राप्ती होते.

हनुमान आणि नाथसंप्रदाय : नाथसंप्रदायाचे बारा उपपंथ असून, हनुमान हा त्यातील ध्वजानाथ पंथाचा प्रवर्तक मानला जातो. या पंथाचे लोक हनुमानाचे परम उपासक आहेत. तांत्रिक मेळ्यातून मत्स्येन्द्रनाथाला गोरक्षाने सोडल्याची कथा प्रसिद्ध हे. त्या वेळी हनुमान आणि गोरक्षनाथ यांचे युद्ध होऊन हनुमानाला गोरक्षनाथांचा प्रभाव मानावा लागला. त्यातूनच हनुमंताच्या पूजेवर नाथसंप्रदायाचा प्रभाव पडला असावा आणि या सांप्रदायिकांनी वीर स्वरूपात त्याला आपलासा केला असावा.

या सर्व विवेचनावरून असे म्हणता येईल की हनुमान उपासनेचे दोन प्रमुख प्रवाह आहेत. रामायणातून नि राम परंपरेतून दिसणारा पराक्रमी, बुद्धिमंत, रामभक्त हनुमान आणि लोकपरंपरेतून दिसणारा रुद्रावतार, शनीशी साधम्र्य दाखवणारा, यक्षोपासनेशी जवळीक साधणारा, तंत्रोपासनेतही असणारा हनुमान. साधारण उत्तर भारतात वैष्णव परंपरेतला दास-हनुमान आणि लोक परंपरेतला वीर हनुमान प्रकर्षांने जाणवतो तर महाराष्ट्रात समर्थ परंपरेतला हनुमानाचा पगडा जाणवतो. असे असले तरीही महाराष्ट्रात लोक परंपरेतला हनुमानही आपले अस्तित्व टिकवून आहे. हनुमान ही लोकमान्य, आपली वाटणारी देवता आहे. त्यामुळे तिची बलोपासना आणि संकटमोचन प्रतिमा आजही तरुण भजतात हे जाणवते.
डॉ. प्राची मोघे – response.lokprabha@expressindia.com

 
 
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Panchmukhi Hanuman : बजरंगबलीने भव्य पंचमुखी हनुमानाचा अवतार का घेतला? अशी आहे आख्यायिका

News18 Desk

मराठी बातम्या / अध्यात्म / Panchmukhi Hanuman : बजरंगबलीने भव्य पंचमुखी हनुमानाचा अवतार का घेतला? अशी आहे आख्यायिका

मुंबई, 19 जुलै : भगवान हनुमान हे बजरंगबली, अंजनी पुत्र, पवनपुत्र, रामभक्त आणि इतर अनेक नावांनी प्रसिद्ध आहेत, त्यांना कलियुगातील देवता मानलं जातं. धार्मिक मान्यतांनुसार, एखाद्या व्यक्तीला जीवनात अनेक संकटांनी घेरले असेल आणि त्यातून मार्ग काढता येत नसेल, तर बजरंगबलीचा अवतार असलेल्या पंचमुखी हनुमानाची पूजा केली पाहिजे. भोपाळमध्ये ज्योतिषी आणि पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा यांनी दिलेल्या माहितीनुसार पंचमुखी हनुमानाची पूजा केल्याने व्यक्तीच्या आयुष्यात येणाऱ्या अनेक समस्या दूर होतात. आज आपण पौराणिक कथांच्या माध्यमातून जाणून घेणार आहोत की बजरंगबलीने पंचमुखी हनुमान अवतार कसा (Panchmukhi Hanuman Avatar) घेतला. पंचमुखी हनुमान अवतार कथा - पौराणिक मान्यतेनुसार, पंचमुखी हनुमान हे बजरंगबलीचे सर्वात शक्तिशाली रूप मानले जाते. रावणाच्या मायावी शक्ती संपवण्यासाठी रावणाशी युद्ध करताना हनुमानजींनी पंचमुखी हनुमानाचा अवतार घेतला होता. त्याची आख्यायिका जाणून घेऊया. पौराणिक कथेनुसार, भगवान रामाशी झालेल्या युद्धादरम्यान रावणाला जाणवलं की, या युद्धात त्याचा पराभव होऊ शकतो. आपला पराभव टाळण्यासाठी त्याने मग मायावी शक्तींचा वापर सुरू केला. या युद्धात रावणाने आपला मायावी भाऊ अहिरावण याची मदत घेतली. अहिरावणाची आई भवानी यांना तंत्र-मंत्र माहीत होते. याच कारणामुळे अहिरावण हा तंत्रविद्येतही पारंगत होता. युद्धादरम्यान त्यांनी अशी माया केली की, भगवान रामाची सेना हळूहळू युद्धभूमीवर झोपू लागली. भगवान राम आणि लक्ष्मण देखील या मायावी चालीपासून वाचू शकले नाहीत आणि ते देखील झोपी गेले. हे वाचा -  ताण-तणाव, चिंता कमी करण्यासाठी फायदेशीर आहेत ही 5 ड्रिंक्स; ट्राय करून बघा भगवान राम आणि लक्ष्मण झोपी जाताच अहिरावणाने त्यांचे अपहरण करून अधोलोकात नेले. काही काळानंतर मायेचा प्रभाव ओसरला, मग सेनादल जागे झाले आणि त्यांनी पाहिले की भगवान राम आणि लक्ष्मण तिथे नाहीत. विभीषणाला ही मायावी चाल समजली आणि त्यांनी हनुमानाला राम आणि लक्ष्मणाला वाचवण्यासाठी अधोलोकात जाण्यास सांगितले. भक्त हनुमान अधोलोकात पोहोचताच तेथे मकरध्वजाने हनुमानाला अडवण्याचा प्रयत्न केला. यादरम्यान हनुमानजींचे मकरध्वजाशी युद्ध झाले आणि मकरध्वजाचा पराभव करून हनुमान आतमध्ये गेले, तेथे भगवान राम आणि लक्ष्मण यांना बंधक बनवले गेले होते. हनुमानजींनी पाहिले की पाच दिशांना पाच दिवे जळत आहेत. ही तांत्रिक विद्या त्या भवानीने केली होती. हे पाच दिवे एकत्र विझवल्यावरच अहिरावण संपुष्टात येईल हे हनुमानजींना माहीत होते. त्यासाठी बजरंगबलीने पंचमुखी हनुमानाचे रूप धारण करून अहिरावणाचा वध केला. हे वाचा -  डायबिटीजची लागण झाल्याचे कळल्याबरोबर आहारात करा असा बदल; वाढणार नाही शुगर पंचमुखी हनुमानाची रूप - बजरंगबलीच्या पंचमुखी रूपात उत्तरेला वराह मुख, दक्षिणेला नरसिंह मुख, पश्चिमेला गरुड मुख, पूर्वेला हनुमान मुख आणि आकाशाकडे हयग्रीव मुख आहे.

 
 
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तुम्हाला माहिती आहे का, हनुमानाचा मुलगा मकरध्वजचा जन्म कसा झाला होता

दिव्य मराठी

सर्वांनाच हे माहिती असेल की, भगवान श्रीरामाचे परमभक्त आणि महादेवाचे 11 वे रुद्र अवतार श्रीहनुमान बालब्रह्मचारी होते. परंतु फार कमी लोकांना हे माहिती असावे की, शास्त्रामध्ये हनुमानाच्या एका मुलाचेही वर्णन आढळून येते. हनुमानाच्या मुलाचे नाव मकरध्वज होते. एका माशापासून मकरध्वजचा जन्म झाला होता. संपूर्ण जगात केवळ 2 मंदिर असे आहेत, जेथे हनुमान आणि मकरध्वज यांची पूजा केली जाते.


असा झाला होता मकरध्वजचा जन्म
धर्म शास्त्रानुसार, हनुमान सीतेच्या शोधात लंकेला पोहचल्यानंतर मेघनादने त्यांना पकडून रावणाच्या दरबारात प्रस्तुत केले. तेव्हा रावणाने हनुमानाच्या शेपटीला जाळून टाकण्याचे आदेश दिले आणि हनुमानाने त्याच जळत्या शेपटीने संपूर्ण लंका जाळून टाकली. जळलेल्या शेपटीमुळे हनुमानला तीव्र वेदना होत होत्या. वेदना शांत करण्यासाठी हनुमान समुद्राच्या पाण्याने शेपटीचा अग्नी शांत करण्यासाठी पोहचले. त्यावेळी त्यांच्या घामाचा एक थेंब समुद्राच्या पाण्यात पडला जो एका मत्स्य कन्येने गिळून घेतला. त्याच घामाच्या थेंबाने मत्स्यकन्या गर्भवती राहिली आणि तिच्यापासून एक पुत्र उत्पन्न झाला. त्या मुलाचे नाव मकरध्वज ठेवण्यात आले. मकरध्वजसुद्धा हनुमानाप्रमाणे पराक्रमी, तेजस्वी होता. अहिरावण याने मकरध्वजला पाताळ लोकचा द्वारपाल म्हणून नियुक्त केले होते.


जेव्हा अहिरावणने श्रीराम आणि लक्ष्मण यांना देवीसमोर बळी देण्यासाठी पाताळात आणले तेव्हा श्रीराम आणि लक्ष्मणाला मुक्त करण्यासाठी हनुमान पाताळलोकात पोहचले. त्याठिकाणी त्यांची भेट मकरध्वजशी झाली. मकरध्वजने आपल्या उत्पत्तीची कथा हनुमानाला सांगितली. त्यांनतर हनुमानाने अहिरावण याचा वध करून श्रीराम आणि लक्ष्मण यांची मुक्तता केली. त्यानंतर श्रीरामाने मकरध्वजला पाताळ लोकचा अधिपती नियुक्त केले आणि त्याला धर्माच्या मार्गावर चालण्याची प्रेरणा दिली.

 
 
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2 फुटाची हनुमान मूर्ती 50 वर्षांत झाली 6 फूट, महाराष्ट्रातील या मंदिरात खरं काय घडतंय?

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पूर्वी मंदिर लहान बांधले होते आणि आताचं हे मंदिर आणि गाभारा तिसऱ्यांदा बांधला आहे.

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वर्धा -आर्वी मार्गावर असलेल्या सेवा येथील महारुद्र हनुमान देवस्थानाची ख्याती सर्व दूर पसरलेली दिसून येते. सेवा येथील मारुती मंदिराला अंदाजे 70 ते 75 वर्षांचा इतिहास असल्याचं सांगितलं जातं. या मंदिरातील हनुमानाची मूर्ती ही दिवसेंदिवस वाढत असून मूर्तीवर नैसर्गिक रित्या काही बाण दिसून येतात आणि या बाणांची वाढ होत असल्याचं सांगितलं जातं. मंदिरात नतमस्तक होऊन हनुमान चरणी प्रार्थना केल्यानंतर आपल्या मनोकामना पूर्ण होतात,अशी भाविकांची श्रद्धा आहे.

वर्धा जिल्ह्यातील वर्धा -आर्वी मार्गावर असलेल्या सेवा येथील महारुद्र हनुमान देवस्थानाची ख्याती सर्व दूर पसरलेली दिसून येते. सेवा येथील मारुती मंदिराला अंदाजे 70 ते 75 वर्षांचा इतिहास असल्याचं सांगितलं जातं. या मंदिरातील हनुमानाची मूर्ती ही दिवसेंदिवस वाढत असून मूर्तीवर नैसर्गिक रित्या काही बाण दिसून येतात आणि या बाणांची वाढ होत असल्याचं सांगितलं जातं. मंदिरात नतमस्तक होऊन हनुमान चरणी प्रार्थना केल्यानंतर आपल्या मनोकामना पूर्ण होतात,अशी भाविकांची श्रद्धा आहे.

02

अंदाजे 50 वर्षांच्या आधी सेवा येथील शेती परिसरात एक अगदी साधं छोटंसं मंदिर होतं. मंदिरात त्याकाळी हीच मूर्ती 2 ते अडीच फूट इतकीच होती. तेव्हा याठिकाणी मूर्तीवर 2-3 बाण होते मात्र आता मूर्तीची उंची सहा ते सात फूट असून मूर्तीवर 11 बाण दिसून येत आहे, अशी माहिती मंदिराचे सचिव संजय सराफ यांनी दिली.

अंदाजे 50 वर्षांच्या आधी सेवा येथील शेती परिसरात एक अगदी साधं छोटंसं मंदिर होतं. मंदिरात त्याकाळी हीच मूर्ती 2 ते अडीच फूट इतकीच होती. तेव्हा याठिकाणी मूर्तीवर 2-3 बाण होते मात्र आता मूर्तीची उंची सहा ते सात फूट असून मूर्तीवर 11 बाण दिसून येत आहे, अशी माहिती मंदिराचे सचिव संजय सराफ यांनी दिली.

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आम्ही कॉलेजमध्ये असताना सगळे मित्र मंदिरात जायचो तेव्हा हे मंदिर आम्हाला दिसलं. तेव्हापासून आम्हाला सतत तिथे जावंस वाटत होतं. म्हणून नेहमी जायचो दर्शन घ्यायचो. त्याकाळी मंदिरात जायला रस्ताही नव्हता. मात्र आता कालांतराने परमेश्वराच्या कृपेने हळूहळू सगळं वाढत गेलं आहे.

आम्ही कॉलेजमध्ये असताना सगळे मित्र मंदिरात जायचो तेव्हा हे मंदिर आम्हाला दिसलं. तेव्हापासून आम्हाला सतत तिथे जावंस वाटत होतं. म्हणून नेहमी जायचो दर्शन घ्यायचो. त्याकाळी मंदिरात जायला रस्ताही नव्हता. मात्र आता कालांतराने परमेश्वराच्या कृपेने हळूहळू सगळं वाढत गेलं आहे.

पूर्वी मंदिर लहान बांधले होते आणि आताचं हे मंदिर आणि गाभारा तिसऱ्यांदा बांधले गेले आहे. कारण मूर्ती वाढत जाईल ह्याचा अंदाज नव्हता आणि आता बांधलेलं मंदिर हे पुढच्या 100 वर्षांच्या अंदाजाने बांधले आहे. मंदिराचा कळस देखील तिसरा कळस आहे.

 
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Statue of Union: महाबली हनुमानाची सर्वात उंच मूर्ती भारतात नाही तर ‘या’ देशात; काय आहेत या मूर्तीची वैशिष्ट्य?

एक्स्प्लेण्ड डेस्क

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हे शिल्प अमेरिकेच्या सांस्कृतिक आणि आध्यात्मिक वर्तुळातील मैलाचा दगड आहे. त्याच पार्श्वभूमीवर या भव्य मूर्तीविषयी आणि तिच्या भारतीय संस्कृतीशी असलेल्या संबंधाविषयी जाणून घेणे नक्कीच समयोचित ठरणारे आहे.

Updated:

90-foot tall bronze statue of Lord Hanuman becomes new landmark in Texas
(PTI photo)

90-foot tall bronze statue of Lord Hanuman: अलीकडेच अमेरिकेच्या टेक्सासमध्ये महाबली हनुमानाच्या ९० फूट उंचीच्या कांस्य मूर्तीचे अनावरण करण्यात आले. या भव्य मूर्तीचे नामकरण स्टॅच्यू ऑफ युनियन असे करण्यात आले आहे. कुठूनही बघितले तरी नजरेस पडणारी ‘स्टॅच्यू ऑफ युनियन’ ही मूर्ती अमेरिकेतील तिसरी सर्वात उंच मूर्ती ठरली आहे. या भव्य पुतळ्याच्या अनावरण सोहळ्यादिवशी आयोजकांनी सांगितले की, हे शिल्प अमेरिकेच्या सांस्कृतिक आणि आध्यात्मिक वर्तुळातील मैलाचा दगड आहे. त्याच पार्श्वभूमीवर या भव्य मूर्तीविषयी आणि तिच्या भारतीय संस्कृतीशी असलेल्या संबंधाविषयी जाणून घेणे नक्कीच समयोचित ठरणारे आहे.

 
 
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हनुमान | Discover Maharashtra

Discover Maharashtra

हनुमान –

मूर्तीकलेत जो हनुमान पाहायला मिळतो तो इसवीसनाच्या पाचव्या-सहाव्या शतकानंतर मिळतो. गुप्तपूर्व काळात रामकथेतही अंकन मिळत नाही. कथा मिळते पण अंकन मिळत नाही. त्याच्या प्रतिकृतीचं वर्णन अर्जुनाच्या रथावर असल्याचं आपणास महाभारतात मिळतं. पण ती त्याची प्रतिकृती आहे. मूर्ती नाही.

गुप्त काळ आणि गुप्तनंतरच्या काळात दिसतो तो देवगड, नचनाकुठार, चौसा (बिहार) या ठिकाणी शिल्पांकित केलेल्या रामकथांमधून. पण पूजावह अशी मूर्ती आठव्या शतकात मिळते. ज्या मूर्तीची पूजा व्हायला लागली अशी मूर्ती तेव्हा प्रत्यक्षात आली. तो प्रतिहार राजांचा काळ आहे. म्हणजेच आठव्या शतकातला. अशी मूर्ती आता लखनौच्या वस्तूसंग्रहालयात पाहायला मिळते.

उत्तर मध्ययुगीन काळातील मूर्ती ११-१२ व्या शतकात दिसून येते. त्या काळातील मारुतीच्या मूर्तीच्या गळ्यात वनमाला आहे, क्वचित यज्ञोपवीत आहे, लांब गुंडाळलेलं शेपूट आहे आणि ही मूर्ती चपेटदान मुद्रा स्वरूपात आहे. चपेटदान मुद्रा म्हणजे हात उंचावलेला, चापट मारण्याच्या स्थितीतील मूर्ती. अशा मूर्तीच्या पायाखाली राक्षस असतो, तर काही ठिकाणी त्याच्या पायाशी राक्षसीणदेखील दिसून येते. याबद्दल असे म्हटले जाते की ती लंकेची ग्रामदेवता आहे. तिला मारून मारुतीने लंकेवर स्वारी केली. बंगालमध्ये, पन्हाळ्याच्या पायथ्याला, बीड येथे अशा मूर्ती आहेत. या राक्षसीणीला तिथे पनवती म्हणतात. मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बंगालमध्ये साडेसातीला पनवती शब्द आहे. हा शब्द स्त्रीलिंगी असल्यामुळे ती राक्षसीण दाखवलेली आहे असे मानले जाते. वस्तुत: शनिवार आणि मारुतीचा काहीही संबंध नाही. पण मग शनिवारी का मारुतीची पूजा करतात, तर मारुती साडेसातीला पायाखाली ठेचतो, नियंत्रण करतो म्हणून त्याची पूजा केली जाते. बंगालमध्ये अशा मूर्ती अधिक ठिकाणी पाहायला मिळतात. – गो. ब. देगलूरकर.

 

Hanuman Jayanti 2024 : भारतातील १० प्रसिद्ध हनुमान मंदिरे कोणती? जाणून घ्या

हनुमान जयंतीच्या निमित्ताने भारतातील १० प्रसिद्ध हनुमान मंदिरांची माहिती जाणून घेऊयात.

 
 
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हनुमानाची उलटी मुर्ती* .


*हनुमानाची उलटी मुर्ती*                   .      

 नंदूरबार(शैलेंद्रचौधरी):-भारतात भगवान हनुमान यांची खुप आणि सर्वत्र मंदिरे आहेत पण भगवान हनुमानाचे एक खास मंदिर आहे,जो सावेर नावाच्या ठिकाणी आहे. या हनुमान मंदिराचे वैशिष्ट्य म्हणजे हनुमानजीची उलटी मूर्ती स्थापित केलेली आहे आणि या कारणास्तव हे मंदिर मालवा प्रदेशात उलटा हनुमानाच्या नावाने प्रसिद्ध आहे.येथे हनुमान मंदिरातील स्थापित मूर्तीच्या अगदी खाली पाताळ लोकाकडे जाण्याचा मार्ग आहे असे सांगितले जाते. येथील हनुमानजी स्थापित केलेल्या मूर्तीचे मुख हे जमिनीकडे आणि पाय आकाशासारखे आहेत. तसेच या मूर्तीचे वैशिष्ट्य म्हणजे ही मूर्ती रामायण काळातील आहे. इंदूर शहरापासून 30 किमी अंतरावर सावेर गावात हे अद्भुत हनुमान मंदिर आहे. या प्राचीन मंदिरातील हनुमानजीची मूर्ती जगातील एकमेव उलटी मुर्ती आहे आणि ती लोकांमध्ये श्रद्धेचे प्रमुख केंद्र मानली जाते. येथील लोकांच्या मते, जर एखादी व्यक्ती या मंदिरात बजरंगबलीच्या दर्शनासाठी 3 ते 5 मंगळवार सतत येत असेल तर त्याचे सर्व दु: ख दूर होतात.तसेच त्याच्या सर्व इच्छा पूर्ण होतात.रामायण काळात जेव्हा भगवान श्री राम आणि रावण यांच्यात यु-द्ध सुरु होते, तेव्हा राक्षसांचा राजा रावणाने एक युक्ती करून स्वत: चे रूप बदलुन भगवान रामाच्या सै-न्यात सामील झाला. मग यानंतर, जेव्हा रात्रीच्या वेळी सर्वजण झोपल्यानंतर रावणाने श्री राम आणि लक्ष्मण यांना आपल्या सामर्थ्याने बेशुद्ध केले आणि त्यांचे अपहरण केले आणि आपल्या बरोबर त्यांना पाताळ लोकात घेऊन गेला. जेव्हा ही गोष्ट वानर सै-न्याला कळली तेव्हा सर्वत्र खळबळ उडाली. परंतु हनुमानजी भगवान श्री राम आणि लक्ष्मण यांना पाताळ लोकामधून शोधून काढले आणि तेथे अहिरावणांचा पराभव करून त्याचा व-ध केला. मग पाताळ लोकातून भगवान राम आणि लक्ष्मण जी यांना परत आणले.असे म्हणतात की हनुमान सावेर या ठिकाणाहून पाताळ लोक मध्ये गेले होते. त्यावेळी, हनुमान जीचे पाय आकाशाकडे, मुख जमीनीच्या दिशेने होते, त्या कारणास्तव त्यांच्या उलट्या मूर्तीचे पूजन अजूनही या ठिकाणी केले जाते.
आजही या ठिकाणी दरवर्षी लाखो भाविक दर्शनासाठी येत असतात. तसेच काही रिसर्च नुसार ही मूर्ती रामायण काळातील आहे हे सिद्ध देखील झाले आहे.

 
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Hanuman Temple: भारतातील अनोखे मंदिर! इथे स्त्री रुपात होते हनुमानाची पूजा, हजारो वर्षांचा इतिहास

Ramesh Patil

Last Updated:

Hanuman Temple: या मंदिरात हनुमानाची मूर्ती स्त्री रूपात आहे. मूर्तीमध्ये हनुमानाला चार हात आहेत. त्याच्या दोन हातात चक्र आणि गदा आहे, तर इतर दोन हातात कमळ आणि वरदान मुद्रा आहे.

News18
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मुंबई : भारतात असंख्य मंदिरं आहेत. काही मंदिरांच्या आख्यायिका इतक्या प्रसिद्ध आहेत की लोक दुरून दर्शनाला जातात. या मंदिरात दर्शन घेतल्याने सर्व मनोकामना पूर्ण होतात, असे समजले जाते. भारतात धर्म आणि श्रद्धा यांचा अनोखा संगम आहे. देशाच्या कानाकोपऱ्यात असलेल्या मंदिरांमध्ये विविध देवदेवतांची वेगवेगळ्या रूपात पूजा केली जाते. यापैकी एक अनोख्या मंदिरात हनुमानजींची स्त्री रूपात पूजा केली जाते.

हे अद्भुत मंदिर छत्तीसगड राज्यातील बिलासपूर जिल्ह्यात आहे. या मंदिराचे नाव गिरजाबंध हनुमान मंदिर आहे. हे मंदिर आपल्या अनोख्या स्थापत्य कला आणि भगवान हनुमानाच्या मूर्तीमुळे देशभरात प्रसिद्ध आहे.

हे मंदिर का खास आहे?

या मंदिरात हनुमानाची मूर्ती स्त्री रूपात आहे. मूर्तीमध्ये हनुमानाला चार हात आहेत. त्याच्या दोन हातात चक्र आणि गदा आहे, तर इतर दोन हातात कमळ आणि वरदान मुद्रा आहे. मूर्तीची मुद्रा अतिशय शांत आणि आकर्षक आहे.

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मंदिराचा इतिहास

या मंदिराचा इतिहास खूप जुना आहे. असं मानलं जातं की हे मंदिर 10 हजार वर्षांपूर्वी बांधण्यात आलं होतं. राजा कुष्ठरोगाने ग्रस्त होता, एके रात्री हनुमानजी त्याच्या स्वप्नात आले आणि त्यांनी राजाला मंदिर बांधण्याचे आदेश दिले. राजाने ताबडतोब मंदिराचे बांधकाम सुरू केले. मंदिर जवळपास बांधून झाल्यावर राजाला पुन्हा हनुमानजींचे दर्शन झाले. यावेळी हनुमानजींनी राजाला मंदिराजवळ असलेल्या एका रहस्यमय कुंंडाबद्दल सांगितलं. त्यांनी राजाला या तलावातून मूर्ती काढून मंदिरात स्थापना करण्यास सांगितलं.

स्त्री रूपात सापडला हनुमान?

हनुमानाने सांगितल्याप्रमाणे राजाने तलावातून मूर्ती बाहेर काढली, पण ती मूर्ती पाहून सर्वांना आश्चर्याचा धक्का बसला. कारण हनुमानजी एका सुंदर स्त्रीच्या रूपात मूर्तीमध्ये प्रकट झाले होते. राजाने ही अद्भूत मूर्ती विधीपूर्वक मंदिरात स्थापन केली.

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स्थानिक लोकांची श्रद्धा

या मंदिरात दर्शन केल्याने सर्व मनोकामना पूर्ण होतात अशी स्थानिक लोकांची श्रद्धा आहे. भगवान हनुमान इथे येणाऱ्या सर्व भक्तांचे रक्षण करतात, असं ते समजतात. मंदिरात येणारे भाविक इथे पूजा करून नैवेद्य चढवतात.

पर्यटनाचे केंद्र

हे मंदिर केवळ धार्मिकच नाही तर पर्यटनाच्या दृष्टिकोनातूनही महत्त्वाचे आहे. दरवर्षी हजारो भाविक आणि पर्यटक इथे दर्शनाला येतात. मंदिराच्या आजूबाजूला अनेक हॉटेल्स आणि रेस्टॉरंट्स आहेत, जे पर्यटकांना सुविधा पुरवतात.

 
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हनुमान संगमच्या काठावर का पडून आहेत, जाणून घ्या या मंदिराचे रहस्य

टीम मटा ऑनलाइन

हनुमान संगमच्या काठावर का पडून आहेत, जाणून घ्या या मंदिराचे रहस्य

Authored byटीम मटा ऑनलाइन | महाराष्ट्र टाइम्स.कॉम | Updated: 18 Jan 2021, 10:00 pm

जाणून घ्या या मंदिराचे रहस्य

महाराष्ट्र टाइम्स.कॉमहनुमान संगमच्या काठावर का पडून आहेत, जाणून घ्या या मंदिराचे रहस्य
हनुमानजी म्हणजे चमत्काराचे दुसरे नाव. पौराणिक काळापासून बजरंगबलीचे नाव चमत्कारांशी संबंधित आहे. छातीत असलेल्या राम-जानकीचे दर्शन असो वा लक्ष्मणजीला जिवंत करण्यासाठी संजीवनी बूटी आणायचीअसो. पौराणिक कालखंडच नव्हे तर कलियुग देखील हनुमानजींच्या चमत्कारांनी सजविला गेला आहे. आपल्या देशात हनुमानजीची प्राचीन चमत्कारी मंदिरे आहेत. यातील एक संगमच्या काठावर हनुमानाचे मंदिर आहे. या मंदिरात हनुमानाची मुर्ती उभी नाही तर ती झोपलेली आहे. शेवटी, या पहुडलेल्या हनुमानजींच्या मूर्तीचे रहस्य काय आहे. संगमच्या काठावर वसलेल्या या मंदिराबद्दल असे म्हणतात की, आंघोळीनंतर संगमच्या या मंदिराचे दर्शन घेतले नाही तर स्नान अपूर्ण मानले जाते. हनुमानजींच्या या पुतळ्याचे रहस्य काय आहे आणि या मंदिराची स्थापना कशी आहे हे जाणून घेऊया ...

​अशी आहे मान्यता...

हनुमानजींची ही विचित्र मूर्ती दक्षिण मुखी आणि २० फूट उंच आहे. असे मानले जाते की ते भू-पातळीपासून कमीतकमी ६-७ फूट खाली आहे. संगम शहरात त्यांना मोठे हनुमानजी, किल्लेदार हनुमानजी, पहुडलेले हनुमानजी आणि बांधवाले हनुमानजी म्हणून ओळखले जाते. या पुतळ्याच्या डाव्या पायाखाली कामदा देवी आणि उजव्या पायाखाली अहिरावणा असल्याचे मानले जाते. त्याच्या उजव्या हातात राम-लक्ष्मण आणि डाव्या हातात गदा आहे. बजरंगबली येथे येणाऱ्या सर्व भाविकांच्या मनोकामना पूर्ण करतात.

तुमचा जन्म जर या नक्षत्रात झाला असेल, तर स्वतःच्या बळावर जीवनात यशस्वी व्हाल

​म्हणूनच येथे पहुडले हनुमानजी

असे सांगितले जाते की, जेव्हा हनुमानजी लंकेवर विजय मिळवताना परत येत होते तेव्हा त्यांना वाटेत थकवा जाणवू लागला. म्हणून सीता मातेच्या सांगण्यावरून ते येथे संगमच्या काठावर झोपले. हे लक्षात घेऊन येथे झोपलेल्या हनुमानजीचे मंदिर बांधले गेले.

जाणून घ्या कोणत्या महिन्यात काय खावे आणि काय खाणे टाळावे..

​मंदिराचा इतिहास

हे मंदिर किमान ६००-७०० वर्ष जुने असल्याचे मानले जाते. असे म्हणतात की कन्नौजच्या राजाला मूल नव्हते. त्याच्या गुरूंनी यावर उपाय म्हणून सांगितले की, 'राम लक्ष्मणला नागाच्या विळख्यातून सोडवण्यासाठी पाताळात गेलेल्या हनुमानजींची प्रतिमा निर्माण कर. भगवान हनुमानाचा हा पुतळा विंध्याचल पर्वतावरुन आणला गेला पाहिजे.’ जेव्हा कन्नौजच्या राजाने असे केले आणि विंध्याचल येथून बोटीने हनुमानजीची मूर्ती घेऊन आले. तेव्हा अचानक बोट तुटली आणि ही मूर्ती पाण्यात बुडाली. हे पाहून राजा फार दु:खी झाला आणि आपल्या राज्यात परतला. या घटनेनंतर कित्येक वर्षानंतर जेव्हा तिथे गंगेचा पाण्याचा प्रवाह कमी झाला तेव्हा तिथे प्रयत्न करणारे रामभक्त बाबा बालागिरी महाराज यांना हा पुतळा मिळाला. त्यानंतर तेथील राजाने मंदिर बांधले.

स्वप्नात 'या' गोष्टी दिसणंमानलं जातं खूप शुभ

​मुघल सैनिक मूर्ती हलवू शकले नाहीत

प्राचीन काळी मुघल राज्यकर्त्यांच्या सांगण्यावरून हिंदू मंदिरे तोडण्याचा क्रम चालू होता, परंतु येथे मोगल सैनिक हनुमानजीचा पुतळा हलवू शकले नाहीत. त्यांनी पुतळा उचलण्याचा प्रयत्न करताच, पुतळा जास्तीत जास्त जमिनीत रुतत चालला होता. हेच कारण आहे की हा पुतळा जमिनीच्या पृष्ठभागाच्या इतका खाली आहे. 
 
 
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तुम्ही पाहिला आहे का कधी हनुमान मंदिरात नंदी? या मंदिरातील मूर्तीला आहे 900 वर्षांचा इतिहास - Nandi Bull Statue In Hanuman Temple

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तुम्ही पाहिला आहे का कधी हनुमान मंदिरात नंदी (Reporter)

अमरावती Nandi Bull Statue In Hanuman Temple : महादेवाचं मंदिर म्हटलं की मंदिरातील शिवलिंगासमोर नंदी हमखास असतोच. मात्र अमरावती जिल्ह्यात दर्यापूर तालुक्यात येणाऱ्या महिमापूर या गावात चक्क हनुमानाच्या मंदिरात हनुमानाच्या मूर्तीच्या अगदी समोर नंदी विराजमान आहे. एकाच दगडात सुबक कलाकृतीद्वारे घडवण्यात आलेला हा नंदी सुमारे 900 वर्षांपूर्वी महिमापूर इथं बांधण्यात आलेल्या ऐतिहासिक पाय विहिरीत गावकऱ्यांना खोदकामादरम्यान सापडला. गावातील अतिशय जुन्या अशा हनुमान मंदिरात अगदी हनुमंताच्या गाभाऱ्यासमोर हा चार फूट लांब आणि तीन फूट उंच असा भला मोठा नंदी ठेवण्यात करण्यात आला. हनुमानाच्या मंदिरात चक्क नंदी असणारं कदाचित महिमापूरचं हे हनुमान मंदिर एकमेव असावं. हनुमान मंदिरातील या नंदीचा नेमका इतिहास उलगडण्याचा' ईटीव्ही भारत' नं प्रयत्न केला.

Nandi Bull Statue In Hanuman Temple

Nandi Bull Statue In Hanuman Temple (Reporter)

ऐतिहासिक पाय विहिरीत सापडला नंदी : महिमापूर या गावाच्या मध्यभागात भलीमोठी पाय विहीर आहे. ही पाय विहीर यादवकालीन किंवा बहामणीकालीन असावी, असे दोन मतप्रवाह आहेत. या विहिरीचं संपूर्ण बांधकाम हे तांबूस रंगाच्या दगडात आहे. चौकोनी आकाराची ही विहीर 80 फूट खोल असून विहिरीची रुंदी 400 मीटर इतकी आहे. तळघरात जसा किल्ला बांधला असावा, असा थाट या विहिरीचा पाहायला मिळतो. तळघरात अनेक मजले या विहिरीला आहेत. विहिरीत उतरण्यासाठी 88 पायऱ्या असून या पायऱ्या उतरताना एखाद्या किल्ल्यात आपण प्रवेश करत आहोत, असा अनुभव येतो. विहिरीच्या प्रवेशद्वारांवर दगडात कोरलेली दोन फुलं ही सर्वांचं लक्ष वेधतात. पायऱ्यांद्वारे विहिरीत खाली उतरताना विश्रांतीसाठी काही टप्पे दिले आहेत. या विहिरीत चारही बाजूनं फिरता येईल, बसता येईल, अशी व्यवस्था आहे. या ऐतिहासिक विहिरीतून शिवलिंग सापडलं. एकाच दगडात घडवण्यात आलेला भला मोठा नंदी देखील याच पाय विहीरमधून बाहेर काढण्यात आला.

अशी आहे नंदी बैलाची मूर्ती : "महिमापूर इथल्या ऐतिहासिक विहिरीत आढळलेली नंदी बैलाची मूर्ती जेव्हा बाहेर काढण्यात आली, त्यावेळी एकाच काळ्या दगडात घडवण्यात आलेल्या नंदीचं तोंड, शिंग आणि शेपूट खंडित केलं असल्याचं आढळून आलं. ग्रामस्थांनी या नंदीचं तोंड शिंग आणि शेपूट पुन्हा व्यवस्थित केलं. त्यावेळी मंदिराच्या अगदी शेजारीच हनुमानाच्या जुन्या मंदिरात या नंदीची प्राणप्रतिष्ठा करण्यात आली. या नंदीबैलाचं वैशिष्ट्य म्हणजे पोळ्याला ज्याप्रमाणे बैलाला सजवलं जातं, अगदी तसंच या नंदीला विविध आभूषणांनी सजवण्यात आलं आहे. अगदी खरा जिवंत नंदी असा भास हनुमानाच्या मंदिरातील या नंदीला पाहून होतो. काळ्या दगडात घडवण्यात आलेल्या या नंदीला ग्रामस्थांनी रंगरंगोटी केली. हनुमानाच्या मंदिरात असणारा हा नंदी पाहण्यासाठी अनेकजण येतात," अशी माहिती महिमापूर येथील रहिवासी तुळशीदास काळे यांनी 'ईटीव्ही भारत'शी बोलताना दिली. या ठिकाणी विहिरीत छोट्या आकाराची पिंड देखील सापडली, ती मंदिराच्या बाहेर ठेवण्यात आली, असं तुळशीदास काळे यांनी सांगितलं.

चोळ काळातला नंदी असल्याचा अंदाज : "इ. स. दहाव्या शतकात भारताच्या दक्षिणेकडं चोळांचं राज्य होतं. चोळांच्या राज्यात शिवलिंग पूजेचं महत्त्व वाढलं आणि अनेक भागात शिवालय उभारण्यात आली. शिवलिंगासमोर नंदीची स्थापना देखील प्रत्येक शिवालयात करण्यात आली. महिमापूर या ठिकाणी देखील चोळांनी असंच शिव मंदिर उभारलं. पुढं यादवांच्या काळात देखील हे मंदिर सुरक्षित होतं. चौदाव्या शतकात बहामनी साम्राज्यात देखील हिंदूंच्या मंदिरांचं नुकसान झालं नाही. मात्र चौदाव्या शतकानंतर उत्तरेकडून मुस्लिमांचं आक्रमण वाढलं आणि या काळात अनेक मंदिरं नष्ट करण्यात आली. त्याच काळात महिमापूरच्या शिवालयातील शिवलिंग आणि नंदी या ऐतिहासिक विहिरीमध्ये विसर्जित करण्यात आले, किंवा लपवण्यात आले असावे," असा अंदाज इतिहासाचे अभ्यासक प्रा. डॉ वैभव मस्के यांनी ईटीव्ही भारतशी बोलताना व्यक्त केला. महिमापूर इथं खोदकाम करण्यात आलं, तर या भागात अनेक ऐतिहासिक वस्तू, मूर्ती आढळून येतील असंही प्रा. डॉ. वैभव म्हस्के म्हणाले.

ऐतिहासिक पाय विहिरीची सुरू आहे डागडुजी : महिमापूर इथल्या ऐतिहासिक पाय विहिरीची भारतीय पुरातत्व विभागाच्या वतीनं डागडुजी केली जात आहे. ही पाय विहीर आता दोन वर्षांसाठी बंद करण्यात आली आहे. या विहिरीचं ज्या प्रकारे बांधकाम आहे, अगदी त्याच स्वरूपात तिचं जतन व्हावं, या दृष्टीनं पुरातत्व विभागाच्या वतीनं खबरदारी घेतली जात आहे. या पाय विहिरीच्या डागडुजीसाठी पाय विहिरीला पूर्वी असणाऱ्या विशिष्ट विटा आणि दगड मध्यप्रदेशातून आणण्यात आले आहेत.

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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Shri Lete Hanuman Ji | Lete Hanuman Mandir in Prayagraj


लेटे-हनुमान-जी

श्री लेटे हनुमान जी (बडे हनुमान जी, बांधवा) मंदिर अलाहाबाद किल्ल्याजवळ त्रिवेणी संगम जवळ आहे. हे भारतातील प्राचीन मंदिरांपैकी एक आहे जिथे भगवान हनुमानाबद्दल खूप पवित्र श्रद्धा आहे. हे एकमेव मंदिर आहे जिथे हनुमानाची मूर्ती झोपलेल्या स्थितीत आहे. या झोपलेल्या हनुमानाच्या मूर्तीचे पाय दक्षिणेकडे आणि डोके उत्तरेकडे आहे. मंदिराचे व्यवस्थापन बाघंबरी गद्दी करतात. मंदिरात विशेषतः मंगळवार आणि शनिवारी भाविकांची गर्दी असते. जरी लोक इतर दिवशीही मंदिरात येतात. श्री लेटे हनुमान जी प्रयागराज सर्व इच्छा पूर्ण करतात आणि त्यांना निशाण (बांबूने फडकवलेला ध्वज) अर्पण केले जाते.

हनुमान हा रामाचा दूत आहे आणि तो वाऱ्यासारखा वेगवान आहे. त्याला अतुलनीय शक्ती, ज्ञान आणि संकटांपासून मुक्त करणारा (संकट) मानला जातो. मंदिरातील मूर्ती वीरमुद्रेत किंवा अंथरुणावर आहे. ही मूर्ती कशी अस्तित्वात आली याची कथा रोमांचक आहे. असे म्हटले जाते की कन्नौज येथील एका श्रीमंत पण निपुत्रिक व्यापाऱ्याने विंध्याचल टेकड्यांमध्ये सापडलेल्या दगडांपासून हनुमानाची मूर्ती बनवली. त्याने अनेक तीर्थस्थळे किंवा तीर्थस्थानांवर या मॉडेलला स्नान घालण्याचा निर्णय घेतला. जेव्हा तो संगम येथे पोहोचला तेव्हा त्याला स्वप्न पडले की जर ही मूर्ती येथेच राहिली तर त्याच्या सर्व इच्छा पूर्ण होतील. तो तसे करून कन्नौजला परतला आणि त्याच्या पत्नीने त्याला एक मुलगा दिला. लवकरच ती मूर्ती वाळूत बुडवली गेली. ती एका पूजनीय संत महात्मा बालगिरी यांनी शोधून काढली. ती मूर्ती जिथे सापडली तिथेच स्थापित करण्यात आली आणि मंदिर किल्ल्यावर प्रसिद्ध झाले. तेव्हापासून त्याची पूजा लेटे (झोपलेले) हनुमान म्हणून केली जाते.

श्री लेटे हनुमान जी चा इतिहास

प्रयागराज येथील झोपलेल्या हनुमान मंदिराबद्दल सुमारे ७०० वर्षांपूर्वीची श्रद्धा आहे. प्राचीन कथेनुसार असे म्हटले जाते की कन्नौजचा राजा ही मूर्ती गंगा नदीतून एका बोटीने विंध्याचलहून आपल्या राज्यात घेऊन जात होता. वाटेत तो रात्रीच्या मुक्कामासाठी प्रयाग येथे थांबला. रात्री बोट बिघडली आणि मूर्ती नदीत बुडाली. राजा अस्वस्थ झाला आणि हातानेच आपल्या घरी परतला.

नंतर, अनेक वर्षांनंतर, श्री बालगिरी जी महाराजांना धुणी (पूजेसाठी पवित्र स्थळ) खोदताना वाळूखाली ही मूर्ती सापडली. त्यांनी या मूर्तीची पूजा करण्यास सुरुवात केली. हळूहळू, हे ठिकाण "श्री लेटे हनुमान मंदिर प्रयागराज" म्हणून लोकप्रिय झाले आणि विविध ठिकाणांहून लोक येथे भेट देऊन पूजा करू लागले.

मुघल सम्राट अकबराच्या काळात असेही म्हटले जाते की किल्ल्याच्या सीमा बांधताना अलाहाबाद किल्ला बांधण्यात आला होता. या मंदिरामुळे सीमा भिंतीत अडथळा निर्माण झाला होता. अकबरने हनुमानजींना खोदून ते वर करण्याचा प्रयत्न केला आणि ती सीमा सरळ बांधता यावी म्हणून ती दुसरीकडे कुठेतरी ठेवली, परंतु जेव्हा त्यांनी हनुमानजींना वर करण्याचा प्रयत्न केला तेव्हा ते जमिनीत अधिक स्थिरावले. अनेक प्रयत्नांनंतर त्यांनी हार मानली आणि भिंत बांधली.

नंतर औरंगजेबाच्या राजवटीत जेव्हा त्याला मंदिराबद्दल कळले तेव्हा त्याने श्री लेटे हनुमानजी प्रयागराजची मूर्ती फेकून देण्याचा आदेश दिला. याच काळात संपूर्ण देशभरातील हिंदू मंदिरे पाडण्यात आली. औरंगजेब आणि त्याचे सैनिक मोठ्या प्रयत्नांनंतरही हनुमानजींची मूर्ती उचलू शकले नाहीत. त्यांनी जितक्या वेळा हनुमानजींना उचलले तितके वेळा ते जमिनीत खाली बसले. हनुमानजींची मूर्ती जमिनीखाली ६ ते ७ फूट असल्याने हेच कारण आहे.

प्रयागराज (अलाहाबाद) येथील रहिवाशांचा असा विश्वास आहे आणि असेही दिसून आले आहे की दरवर्षी पुराच्या वेळी गंगा नदीची पाण्याची पातळी वाढली की ती हनुमानजींना पवित्र पाण्यात स्नान करायला लावते. लोक म्हणतात की गंगामैया येऊन हनुमानजींना स्नान घालतात आणि नंतर पाण्याची पातळी कमी करायला लागतात. याचा अर्थ हनुमानजींनी स्नान केल्यानंतर पाण्याचे थेंब कमी होऊ लागतात.

मंदिराच्या परिसरात स्वतःची मिठाईची दुकाने आणि रुद्राक्ष, कवच, यंत्र इत्यादी भक्तीपर वस्तू आहेत. सध्या महंत नरेंद्र गिरी जी महाराज आहेत.

श्री लेटे हनुमानजींना कसे पोहोचायचे

लोक रेल्वे, रस्ते किंवा हवाई मार्गाने वापरत असलेल्या कोणत्याही भूपृष्ठीय वाहतुकीद्वारे तुम्ही श्री लेटे हनुमानजींपर्यंत सहज पोहोचू शकता.

त्रिवेणी संगमला पोहोचण्यासाठी तुम्ही शेअर्ड टॅक्सी, ऑटो वापरू शकता किंवा कॅब बुक करू शकता (ऑनलाइन किंवा ऑफलाइन).

महत्त्वाच्या रेल्वे स्थानकांपासून आणि विमानतळापासून लेटे हनुमान जी पर्यंतचे अंतर:

प्रयागराज जंक्शन: अंदाजे ७-८ किमी.
प्रयागराज चेओकी: अंदाजे १० किमी.
नैनी जंक्शन: अंदाजे ८ किमी.
प्रयाग जंक्शन: अंदाजे ७-८ किमी.
प्रयागराज संगम: अंदाजे २.५ किमी.

प्रयागराज नागरी विमानतळ : अंदाजे १७ किमी.

लेटे हनुमान मंदिर वेळ:- सकाळी ५:३० ते दुपारी २, संध्याकाळी ५:०० ते रात्री ८:००

आरतीची वेळ:- संध्याकाळी ५:०० वाजता

भोग/प्रसाद:- भेटीच्या वेळेत

प्रवास माहितीसाठी आम्हाला +९१ ९५६९४०९७०५ वर कॉल करा.

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
हनुमान :-
         सीतेचा शोध लाऊन लंकेची राखरांगोळी करणारा हनुमान आज आसेतुहिमाचल प्रसिद्धी पावला आहे. दास्य भक्तीचा आचार्य, मल्लांचे उपास्य, प्रेत व पिशाच्च बार्धेपासून सोडविणारा, तांत्रिकांचे एक दैवत अशा अनेक रूपात मारुती हा भारतीयांचा कंठमणी झाला आहे. जवळ जवळ प्रत्येक गावांत एखाद्या पिंपळाखाली शेंदूर फासलेला मारुतिराय असतोच. सुमारे तीनशे वर्षांपूर्वी हनुमंतोपासनेला समर्थांनी चांगला उजाळा दिला, त्याचप्रमाणे उत्तर भारतात गोस्वामी तुलसीदास यांनी हनुमंतोपासनेचा भरपूर प्रचार केला.
       हनुमंताचा उल्लेख रामायणांत विपुल रूपाने येत असला तरी त्याची उपासना फार जुनी असल्याची ग्वाही मूर्तिशास्त्र देत नाही. ज्याप्रमाणें गुप्तकाळांत रामाच्या स्वतंत्र प्रतिमा मिळत नाहीत त्याचप्रमाणें मारुतीच्याही मूर्तीचा अभावच दिसतो.
        पौराणिक क्षेत्राकडे वळल्यास मारुतीच्या पित्याचे नांव केसरी आणि आईचे अंजनी असे दिसते. पुत्रांकरिता अंजनी शिवाचे आराधना करीत बसली असतां तिच्या ऑजळीत आकाशात उडणाऱ्या एका घारीने पायस पिंड टाकला. हा पायसपिंड म्हणजे राजा दशरथाचे पुत्र कामेष्टी यज्ञ करून पुत्र प्राप्तिस्तव मिळविलेल्या पायसातील भाग होता. कैकयीने तो खाण्यास उशीर केल्यामुळे घारीने तो पळविला. पण तिच्या चोचीतून तो सुटला आणि अंजनीला मिळाला, अंजनीने

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       हो भक्षण केला आणि अकराव्या रुद्राने मारुतीच्या रूपाने तिच्या पोटी अवतार घेतला. पुढे अंजनीचा हा प्रबल पराक्रमी आणि महा बुद्धिमान मुलगा, सुग्रीवाचा मंत्री या नात्याने रामाला मिळाला व नंतर रामाकडेच राहिला. हा चिरंजीव म्हणून प्रसिद्ध आहे.
       मास्तीची प्रतिमा सुमारे ८-९ व्या शतकांपासून मिळू लागते. अशी एक खंडित प्रतिमा लखनऊ संग्रहालयात अहे (सं.सं. ५१.८७). आज ही मूर्ती खंडित असली तरी मुळात ही फारच सुंदर असली पाहिजे. कीर्तिमुखाच्या अलंकरणाने अलंकृत केश, गळ्यातील वनमाला आणि छातीवरील श्रीवत्स चिन्ह या उल्ले‌खनीय वस्तू होत. हनुमंताच्या अभिलिखित प्रतिमांत खजुराहो (म.प्र.) येथून हर्ष संवत् ३१६-सन् ९२२ ची मिळालेली मूर्ती जुनी म्हणून महत्त्वाची आहे. दुसरे उदाहरण म्हणून हरसोद अभिलेखाचे (वि.सं. १२५५= सन् १९९८) देता येईल ज्यात एका व्यापाऱ्याने हनुमानाची स्थापना केल्याचा उल्लेख आहे. उत्तर भारतात कलचुरी आणि चन्देल (रे. चि. एकेचाळीस ३) राजवंशाच्च्या नाण्यांवर हनुमान दिसतो. दक्षिणेत यादव, कदंब आणि होयसाळ यांचे हनुमान हे राजचिन्ह होते. पांड्याच्या नाण्यांवर तो आढळतो (रे.चि. एकेचाळीस ५, ६). विशेष म्हणजे अर्काटचा नवाब महम्मद अली वलजा याने ही 'हनुमान' चिन्हाचा वापर केला होता. सुमारे बाराव्या शतकांतील हनुमंताची खंडित मूर्ती अल्हाबादच्या संग्रहालयात आहे (अल्हाबाद कॅट. सं. २३४). येथें मारुतीचे तोंड पसरलेले असून डावा हात अर्धवट मूठ वळून छातीशी ठेवला आहे. याच्या कमरेत एक सुरा ही खोवलेला आहे.
वर्गीकरण :
       नंतरच्या काळांत मारुतीच्या बऱ्याच मूर्ती मिळतात. दक्षिणेंत हा आंजनेय या नावाने पूजला जातो. हनुमत्प्रतिमांचे वर्गीकरण खालीलप्रमाणें करता येईल.
१) वीरमारुती - एका हातात गदा व दुसऱ्या हातात द्रोणागिरी घेऊन उड्डाण करणारा मारुती. मारुतीच्या प्रतिमेचा हा सर्व साधारण प्रकार आहे. यांत थोडे फार फरक ही आढळतात. कुठें याच्या पायाखाली राक्षस असतात, तर कुठे भरत खालून बाण मारीत असतो.
२) वीरमारुती (दुसरा प्रकार) डाव्या हातात गदा घेतलेल्या मारुतीने उजवा हात जणु की काय थप्पड मारण्याकरिता उगारलेला दिसतो.
३) वीरहनुमान (तिसरा प्रकार) यात मारुतीच्या उजव्या हातात गदा, डाव्यात कमळ व खांद्यावर राम लक्ष्मण असतात.
४) दासमारुती - रामासमोर हात जोडून उभा असलेला मारुती. येथे नमस्कार मुद्रेत जोडलेल्या हातातच गदाही लोंबताना दिसते. नागपूरला हा मारुती बऱ्याच ठिकाणी दिसतो.
५) द्रोणाचल नेत असताना भरताकडून बाण मारला जाणारा मारुती (रे. चि. एकेचाळीस ७).
६) पंचमुखी मारुति - मारुतीची ही स्वतंत्र प्रतिमा पांच तोंडाची असून तांत्रिक पूजेसाठी वैध आहे.
पाच मुखे असलेल्या हनुमंताच्या प्रतिमा गुजराथ, राजस्थान, वगैरे भागांतून मिळाल्या आहेत. ही पाच तोंडे म्हणजे मुख्य वानरमुख सोडून वराह, घोडा, सिंह आणि गरुडाची असतात. हात मात्र कधी चार तर कधी आठ दिसतात.

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P.C. Bhargave, South Intan Bronzes from Rajasthan, research XVI, XV, 1995 P60
(स्त्री) या मुसिक रूपाने पंचात कभी कभी तो चाहानाचा असून त्याच्या माच्या
काही प्रतिमा हनुमंताचा संगीत संबंध दाखवतात तैतिल करोडदेवता का मंदिर' यूवा कोर्ट क येथील एका धातुपतिमेत दोन हाताचा एक भोलेपन आहे. (रे. चि.३.५).
PC. Bhargava, Ibid, pl. XILL, p. 60
अफजलपुर (सर) म.प्र.सुभायकालातील पंखाखवले आहेत.
-के. सी. पांडेय, हमारा मंदसोर जिला २००६५.२९क्षिण भारतीय शिल्पात काही किणी मा हातात शिवलिंग दिसले, रामेश्वरस्थस्थल पुराणांप्रमाणे रामाने शिवल आणण्याचे काम सांगितले होते.
G. Sethuraman, Rameshvaram Temple, Madural, 1998, p. 175
 
 
 

भारत के साथ-साथ विदेशों में भी मारुति के अनेक मंदिर स्थित हैं। इनमें से प्रत्येक मंदिर में मारुति की मूर्ति का रंग और रूप भिन्न है। मूर्तियों के रंग और रूप में अंतर मारुति की विशिष्ट विशेषताओं से संबंधित है। इस लेख में हम मारुति के रंग और रूप के आधार पर उनकी विभिन्न विशेषताओं के बारे में विस्तार से बताएंगे।

 

१. हनुमानजी की मूर्ति का रंग

हनुमान जी की मूर्ति का रंग अधिकतर लाल होता है और कभी-कभार ही काला होता है। शनि के प्रभाव के कारण ही उनका रंग काला हुआ है। हनुमान जी सिंदूर से लदे हुए हैं। सिंदूर के प्रति उनके प्रेम की कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं।

एक बार स्नान के पश्चात सीता ने अपने माथे के बीचोंबीच लाल रंग का सिंदूर लगाया। हनुमान ने जब इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा, ‘इससे आपके स्वामी की आयु बढ़ती है।’ इससे हनुमान इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। यह देखकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और कहा, ‘आपके समान श्रेष्ठ कोई भक्त नहीं है’ और उन्होंने हनुमान को अमरता प्रदान की। इस प्रकार हनुमान सप्त अमरों में से एक बन गए।

एक बार जब हनुमान द्रोणागिरी पर्वत उठाकर लंका जा रहे थे, तब भरत ने उन्हें बाण मारा था, जिससे उनका पैर घायल हो गया था। तेल और सिंदूर लगाने से यह घाव ठीक हो गया, इसलिए हनुमान को ये बहुत प्रिय हैं।

 

2. फॉर्म

हनुमान की मूर्तियाँ उनके आकार और चेहरे के प्रकार के आधार पर निम्न प्रकार की देखी जाती हैं।

ए. प्रताप मारुति

प्रताप मारुति

प्रताप मारुति का स्वरूप बहुत विशाल है। इस रूप में वे एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ में द्रोणागिरी धारण करते हैं।

बी. दासमारुति (मारुति एक विनम्र सेवक के रूप में)

दशमरुति

दशमारुति श्रीराम के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए खड़े हैं। उनका सिर थोड़ा आगे की ओर झुका हुआ है और पैर आपस में जुड़े हुए हैं। इस रूप में उनकी पूंछ ज़मीन पर टिकी हुई है।

सी . वीरमारुति

वीरमारुति

वीरमारुति की मुद्रा योद्धा की है। इस मूर्ति के बाएं हाथ में गदा है। बाएं हाथ को बाएं पैर पर टिकाया गया है, जिसे मोड़कर आगे लाया गया है। बाएं हाथ में पकड़ी गई गदा कंधे पर टिकी हुई है। दाहिना पैर घुटने से मुड़ा हुआ है और दाहिना हाथ निर्भयता प्रदान करने वाली मुद्रा में है। वीरमारुति की पूंछ उठी हुई है और कभी-कभी उनके पैरों के नीचे एक राक्षस दिखाया जाता है। नकारात्मक शक्तियों के कारण होने वाले कष्टों को दूर करने के लिए वीरमारुति की पूजा की जाती है। वीरमारुति से दैवीय शक्ति निकलती है, जबकि आध्यात्मिक भावना और दिव्य चेतना दसमारुति से निकलती है क्योंकि वह श्रीराम में एक हो गई है।

D. पंचमुखी मारुति (पांच मुखी मारुति)

मारुति की कई पंचमुखी मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं। ये पाँच मुख गरुड़, सूअर (वराह), घोड़ा (हयग्रीव), सिंह (सिंह) और बंदर (कपि) के हैं। इस मूर्ति की दस भुजाएँ हैं, यह एक ध्वज, खड्ग (एक काँटेदार और चौड़ा हथियार), एक पाश और अन्य हथियार धारण करती है। पाँच मुख वाले देवता का अर्थ है कि यह सतर्कता बनाए रखता है और पाँच दिशाओं - उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और ऊपर की दिशा को नियंत्रित करता है।

ई. दक्षिणमुखी मारुति (दाहिनी ओर मुख करके)

दक्षिणमुखी मारुति

'दक्षिण' शब्द का प्रयोग दो सन्दर्भों में किया जाता है, दक्षिण दिशा और दाहिनी ओर।

दक्षिण दिशा की ओर मुख करने का निहित अर्थ

इस मूर्ति का मुख दक्षिण दिशा की ओर है इसलिए इसे 'दक्षिणमुखी मारुति' के नाम से जाना जाता है।

दाएँ पक्ष का निहित अर्थ

मारुति का मुख उनके दाहिनी ओर है। उनकी सूर्यनाड़ी सक्रिय है। सूर्यनाड़ी दीप्तिमान है तथा ऊर्जा प्रक्षेपित करती है। (देवता गणपति तथा मारुति में सुषुम्ना नाड़ी सदैव सक्रिय रहती है; परंतु जब उनका स्वरूप परिवर्तित होता है, तो उसमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन होता है तथा तदनुसार सूर्य अथवा चंद्र नाड़ी कुछ सीमा तक सक्रिय हो जाती है।) दाहिनी ओर मुख किए हुए मारुति आक्रामक होते हैं (ऊर्जा प्रक्षेपित करते हैं), ठीक वैसे ही जैसे गणपति की सूंड दाहिनी ओर होती है। कष्टदायक शक्तियों के प्रतिकूल प्रभावों पर विजय पाने के लिए इसकी पूजा की जाती है।

एफ. वाममुखी (बाएं मुख करके) मारुति

वाममुखी मारुति

'वाम' का अर्थ है बाईं ओर या उत्तर दिशा

उत्तर दिशा की ओर मुख करने का निहित अर्थ

इस मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर है।

बायीं ओर का निहित अर्थ

मारुति का मुख उनके बायीं ओर है। उनकी चंद्रनाड़ी सक्रिय है। चंद्रनाड़ी शीतल और सुखदायक है। साथ ही उत्तर दिशा आध्यात्मिक साधना के लिए पूरक है।

जी. अकरामुखी मारुति (ग्यारह मुखी मारुति)

मारुति की इस मूर्ति के बाईस हाथ और दो पैर हैं। सौराष्ट्र में ऐसी ही एक मूर्ति है।

 
 
 
 
 चित्र
Travel Baba
)

 
 अंजली मूद्रेतील हनुमान आणि गरूड
आपल्याकडे हनुमानाची मूर्ती म्हणजे शेंदूर फासलेला दगड. अगदी देखणी कोरीव मूर्ती कुठे दिसत नाही. द्रोणागिरी पर्वत हाती घेवून उडणारा पवनपुत्र अशी मूर्ती मंदिरात आढळून येते. पण ही मूर्ती हात जोडलेली म्हणजेच अंजली मुद्रेतील आहे. या हनुमानाच्या अंगावर बारीक अशी वस्त्रे प्रावरणे आणि आभुषणे कोरली आहेत. त्याची गती दाखविण्यासाठी कोपरावरून मागे सोडलेले वस्त्राचे गोंडे जमिनीला समांतर असे उडताना दाखवले आहेत. कानातले कुंडलेही छान आहेत.
बाजूची मूर्ती गरूडाची आहे. हा गरुडही अंजली मूद्रेत आहे. त्याचे बाकदार नाक उठून दिसते.एरवी भेदक दिसणारे त्याचे नेत्र शांत दिसत आहेत. पंख पसरलेले रेखीव असे कोरले आहेत. खाली त्याच्या वस्त्राची टोकं कोरलेली आहेत. हे वस्त्रही कलाकुसरयुक्त आहे कारण गरूड विष्णुचे म्हणजेच ऐश्वर्यसंपन्न देवतेचे वाहन आहे. याचा मुकूटही देखणा आहे.
या दोन्ही मूर्ती शेंदूरवादा येथील विठ्ठल मंदिरात विठ्ठल मूर्तीच्या डाव्या उजव्या बाजूस ठेवलेल्या आहेत. विठ्ठल देवता वैष्णव देवता आहे. स्वाभाविकच गरूड तिथे असणं समजू शकतो. विठ्ठलाला विष्णुचा ९ वा अवतार मानलं जातं. पण हनुमानाची मूर्ती इथे का? याचं कोडं उलगडत नाही.  (यावर राहूल देशपांडे या मित्राने केलेला खुलासा समर्पक व समाधानकारच आहै. .. दास मारुती हा कायम भागवत पंथात आराध्य देवतेसमोर उभे असण्याचा उल्लेख आहे."गरुड हनुमंत पुढे उभे राहती..." हे वाक्य आहेच आरती मध्ये.)
मध्वमुनीश्वरांच्या काळापासूनचे (इ.स. १६६०) हे विठ्ठल मंदिर आहे. तेंव्हा या मूर्तीही ३६० वर्षांपासूनच्या आहेत. खाम नदीच्या काठी औरंगाबादपासून अगदी जवळ ३० किमी. अंतरावर गंगापूर तालूक्यात हे गांव आहे.
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
ब्रह्मा :- 

आरंभ
   उत्तर भारतांतील ब्रह्मदेवाच्या प्रतिमा 
ब्रह्मदेवाच्या दक्षिण भारतीय मूर्ती
संयुक्त प्रतिमा, त्रिमूर्ति, दत्तात्रेय
हरि-हर-सूर्य-पितामह
दिक्पाल लक्षणें
इंद्र
अग्नी
यम
निऋती
वरुण
वायु
कुबेर
ईशान किंवा ईश
यक्ष प्रतिमा
नाग
कुषाण कालीन नागांची वैशिष्ट्ये
गरुड
कुषाण कालीन वैशिष्ट्ये
हनुमान
वर्गीकरण
नंदी, वृष
आयुधपुरुष व आयुधस्त्रिया
समुद्र
ईहामृग, किन्नर, सुपर्ण, वगैरे
हरिहरपुत्र, आर्य
***

 ब्रह्मा :-

आरंभ :

एका काळी विष्णू व शिव यांच्या प्रमाणे ब्रह्मदेवाचाही मान होता व त्याची पूजा होत असे. आनैसर्गिक बीज आणि विष्णुरूप योनी त्यांच्या संयोगाने एक सोन्याचे अंडे (हिरण्यांड) प्रगट झाले व त्यातून ब्रह्मदेवाची उत्पत्ती झाली अशी एक कथा आहे. याशिवाय त्याच्या उत्पत्तीच्या आणीक ही कथा आहेत. उदाहरणार्थ कूर्म पुराणांतील कथा पहा. एकार्णवस्थितींत विष्णू झोपलेला असता त्याच्या नाभीतून विशाल कमल उत्पन्न झाले. त्यावेळी ब्रह्मदेवही तेथे आला व विष्णू आणि ब्रह्मा यांनी एकामेकांस तू कोण? असा प्रश्न केला. बोलणे वाढत गेले आणि विष्णूने ब्रह्मदेवाचे पोटांत प्रवेश केला. तेथे त्याला 'सदेवासुरमानुषम्' असे त्रैलोक्य पाहून आश्चर्य वाटले व तो ब्रह्मदेवाच्या तोंडातून बाहेर पडला. त्यानंतर ब्रह्मदेवाने विष्णूचे उदरांत प्रवेश केला. त्यालाही तेथे अनेक लोक दिसले व आदि अन्ताचा पत्ता लागला नाही. त्या बरोबरच बाहेर निघावयाचे सारे मार्गही अवरुद्ध झालेले आढळले. शेवटी तो विष्णूच्या नाभिद्वारांतून बाहेर पडला व तेथून उगवलेल्या कमळांतून प्रगट झाला. दुसऱ्या एका कथेप्रमाणे तो जल आणि आकाश तत्त्वापासून वराहरूपाने प्रगट झाला.' पुढे त्याने स्वतःपासून प्रजापती उत्पन्न केले. या प्रजापतीनी सृष्टी निर्माण केली म्हणून ब्रह्मदेव साहाजिकच जगाचा आजा झाला. यामुळेच त्याला 'पितामह' अशी संज्ञा प्राप्त आहे. धाता, प्रजापती, विधाता, कमलासन, चतुर्मुख विरिञ्चि, वगैरे त्याची इतर नांवे आहेत. कूर्मपुराणांत त्याला पहिला 'शरीरी' म्हटले आहे.'' व परामूर्ती प्रजापती, हिरण्यगर्भ, वेदार्थवेदी भगवान् व रजोगुणमय अशी त्यांची चार रूपें सांगितली आहेत.
      सृष्टी, स्थिती आणि लय या तीन कार्यात प्रथम कार्याची जिम्मेदारी ब्रह्मदेवाकडे आहे हा रजोगुणांचा प्रतीक आहे, उत्पादन करणे याचे मुख्य कार्य असल्यामुळे याने कुणाशी युद्ध करून संहार केल्याचे फारसे ऐकिवात नाही. देव आणि असुर या दोघांनाही हा वंदनीय होता. कित्येक राक्षस, असुर व दैत्य यांनी ब्रह्मदेवांची खडतर आराधना करून उत्तमोत्तम वर मिळविले होते. जवळ जवळ हा पौराणिक कथांचा क्रमच दिसतो की ब्रह्मदेवाने वर द्यायचे, वरानी असुर उन्मत्त व्हावयाचे व मग त्या वरातून पळवाट काढून विष्णूने व कधी शंकराने असुरांचा नाश करून देवांना त्यांची समृद्धि परत मिळवून द्यायची.
       ब्रह्मदेवाची पूर्वी आराधना करीत, पण पुढे त्याचे मानाचे स्थान पूजेच्या बाबतीत ढळले. त्रिदेवाच्या मधे दोघांपेक्षा को खाली देवाची पूर्वी आराधानाभिकमलांपासून उद्भूत झाल्यामुळे तो विष्णूचा भार अर्थात, त्यापेक्षा खालच्या देर्वाचा मानला जाऊ लागला. लिंगोद्भव मूर्तीच्या कथेमधे (त्रोटक कथा मागे आली आहे, पहा पान १८९) तो शिवापेक्षा खाली गेलेला दाखविला आहे शिवाय या कथेत तो खोटेही बोलताना दिसतो, शिवाचे वरचे टोक मी पाहिले

३८०

अशी सर्रास थाप तो ठोकतो. दुसऱ्या एका कथेप्रमाणें ब्रह्मदेवाला पांच डोकी होती व शिवाशी त्यांचा विरोध झाल्यामुळे शंकराने त्याचे पांचवे डोके तोडले. ती कथा अशी :
     मेरूवर बसलेल्या ब्रह्मदेवाला एकदा मी लोककर्ता म्हणून गर्व झाला. वेदांनी शंकराचा महिमा सांगितला पा ब्रह्मदेवाला ते पटेना. तेव्हा तेथे एका महाज्योतींचा प्रादुर्भाव झाला व तिच्या ज्योतिमंडळांत एक नीललोहित पुरुष प्राप् झाला. देव त्याला म्हणाला की 'माझ्या ललाटापासून तू उत्पन्न झाला आहेस, तेव्हां तू मला शरण ये.' ब्रह्मदेवाचे रे घमेण्डखोर बोलणे ऐकून तो पुरुष म्हणजे शंकर चिडला व त्याने ब्रह्मदेवाला योग्य धडा देण्यांकरिता भैरवाला पाठविले भैरवाने ब्रह्मदेवाचे पांचवे डोके तोडले. पुढे ब्रह्मदेवाने शंकराचे स्तवन केले व शंकर प्रसन्न झाला. भैरव ते कपाल घेऊन ब्रह्महत्येचे प्रायश्चित्त म्हणून भिक्षा मागण्या करिता निघून गेला.
        तिसरी एक कथा असे सांगते की यज्ञांचे वेळी ब्रह्मदेवाने आपल्या पत्नीस पाचारण केले, पण काही कारणामुळे ती लवकर येऊ शकली नाही तेव्हा त्याने रागावून दुसरी बायको गायत्री तेथे आणून बसविली व कार्य चालू केले. साहाजिकच सावित्रीस राग आला व तिने ब्रह्मदेवाला 'अपूज्य होशील' म्हणून शाप दिला. याहीपेक्षा वरचढ कथा म्हणजे ब्रह्मदेवांपासूनच एका मुलीचा उद्भव दाखवून पुढें तो तिच्यावरच म्हणजे आपल्या मुलीवरच आसक्त झाला अतएव तो अपूज्य ठरला!
          पौराणिक वाङ्मयांतील या आणि अशाच प्रकारच्या निरनिराळ्या कथा स्पष्टपणे दाखवितात की ब्रह्मदेव आपल्या वरच्या स्थानापासून ढळला आणि अतुरास प्रोत्साहन, असत्य भाषण आणि कन्यासक्ती यामुळे तो लोकांच्या देव्हाऱ्यातून बाहेर पडला. आज शिव, विष्णू, शक्ती, गणपती व सूर्य यांचे आहेत तसा केवळ ब्रह्मदेवाचेच पोवाडे गाणारा कोणताही संप्रदाय नाही. पुष्कर (राजस्थान) खेडब्रह्म (गुजरात) वगैरे ठिकाणी ब्रह्मदेवाची मंदिरें आहेत. पण अशा स्थानाची संख्या फारच तुरळक आहे.
         पूर्वी ही स्थिती नव्हती. रामायण महाभारताच्या वेळी ब्रह्मदेवाची उपासना होती. तशीच ती नंतरही होती. ललितविस्तर आणि दिव्यावदान' या बौद्ध ग्रंथात उपास्य देवताच्या ज्या याद्या मिळतात, त्यात ब्रह्मदेवाचा उल्लेख आहे. पण एवढे मात्र खरे की पुढे ही उपासना फोफावली नाही व मध्यकाळांपर्यंतही बरीचशी अस्तंगत झाली. उत्तरेंत ब्रह्मदेवाचे स्थान शिव, शक्ती व विष्णू यांच्या प्रभावांत लुप्त झाले तर दक्षिणेंत ते कित्येक ठिकाणी ते 'ब्रह्मशास्त्या' नें म्हणाजे स्कंदाने घेतले.
       ब्रह्मदेव हा ब्राह्मण, वेदांचा स्रोत आणि यज्ञाचा पुरस्कार करणारा आहे. त्याने आपल्या चार तोंडांनी चार वेदांना प्रगट केले. (जुन्या भारतीय परंपरेप्रमाणें वेद हे अपौरुषेय असून, ते प्रगट झाले, त्यांचे कोणी निर्माण केले नाही.) त्याला चार हात असून तो कमळावर बसतो, तसें त्याचे वाहन हंस आहे. त्याच्या हातांत पुस्तक, माळा, कमंडलू, यज्ञपात्रे व वराभय मुद्रा असतात. संहाराशी त्याचा संबंध नसल्यामुळे त्याच्या हातांत शस्त्र दिसत नाही. त्याचे पोट किंचित सुटलेले व शरीर थोडे स्थूल दाखवतात. याप्रमाणें संक्षेपांत लक्षणांचा विचार करून आता प्रत्यक्ष प्रतिमांकडे वळू.

उत्तरभारतांतील ब्रह्मदेवाच्या प्रतिमा : (रे. चित्र सदतीस १)
        संग्रहालयातील एक मूती (सं. सं. १४.३८२) होय असे काही जुन्या विद्वानांचे मत होते, पण ते आतां तितकेसे ग्राह्य नाही. महन मिळालेल्या गुप्तकालीन ब्रह्मदेवाच्या दोन प्रतिमा कलकत्ता (२५१०९ रे. चित्र सदतीस २) व वाराणसी (भा.क.भ.स. ६६) याया संग्रहालयांत आहेत.

३८१

दुर्दैवानें दोन्ही बऱ्याच खंडित असल्याकारणानें त्यांच्या हात व आयुधांविषयी काहीच सांगता येत नाही. समोरून मुखें मात्र तीन दिसतात, मस्तकांवर जटाजूट आहे व गळ्यांत जानवेही आहे. दाढी दिसत नाही. दुसरा गुप्तकालीन ब्रह्मदेव देवगढच्या शेषशायी विष्णुप्रतिमेंत कमळावर बसलेला दिसतो. वरील प्रतिमांशी याचे साम्य आहे. हात फक्त दोनच असून एकात घट व दुसरा अभयमुद्रेत असावा असे दिसते.
         बंगाल व उत्तर भारताच्या इतर भागांत चतुर्भुज ब्रह्मदेवाच्या प्रतिमा जास्त दिसतात. 'आजोबा' म्हणून अंकित ब्रह्मदेव मोठ्या पोटाचा व स्थूल शरीराचा दाखवतात तसेंच मधल्या मुखांस साधी किंवा गाठ मारलेली दाढी असते. आयुधांत माळा व कमंडलू तर आहेच. त्याबरोबरच सुक् आणि सुवा किंवा पुस्तक असते. आजूबाजूस दोन स्त्रिया दिसतात त्यांना गायत्री व सावित्री असें म्हणता येईल. बंगालच्या काही प्रतिमांत एक स्त्री वीणा घेतलेली दिसते. ही सरस्वती असू शकेल. ब्रह्मदेवाचा हंस मात्र त्याचे पायाजवळ नक्कीच दिसतो.
ब्रह्मा, वेदांसह ::
      कश्मीरमध्ये मिळालेल्या ७व्या शतकातील एका सुंदर प्रतिमेत (तूर्त बर्लिन संग्रहालय) एकमुखी चार हाताचा ब्रह्मदेव उभा आहे. हातात माळा, अभयमुद्रा, दंड आणि कमंडलू आहे. विशेष म्हणजे त्याच्या पायाशी चार मानव प्रतिमा दिसतात. त्यापैकी एकाच तोंड घोड्याचे आहे, हा सामवेद आहे. उरलेले तीन ऋग्वेद, यजुर्वेद आणि अथर्ववेद आहेत.
  G. Bhattacharya, Deva Caturmukha, Pancamukha, Brahma and Siva, Shastric Traditions in Indian arts, Heidelberg, 1989, p. 53
G. Bhattacharya, EBHJI, Dhaka 2000, pl. 21.3
ब्रह्मा सावित्री :
          या दोघांचे एकत्र उमामहेश्वराप्रमाणे अंकन करणाऱ्या दोन प्रतिमा झाशी, उ.प्र. च्या राणीमहाल संग्रहालयात आहेत (सुमारे १०-११वे शतक) त्रिमुख ब्रह्मा (चौथे मुख पाठीकडे असल्यामुळे अदृश्य) हंसावर सावित्रीसह आलिंगन मुद्रेत बसला आहे. एका प्रतिमेत देवाच्या डावीकडे यज्ञपात्र (सुक्/सुवा) घेतलेले व उजवीकडे काही तरी लांब वस्तू (पोथी?) घेतलेले पुरुष आढळतात. हे ब्रह्मदेवाचे आयुध पुरुष असू शकतील.
- सी.पी. २०१ व सी.बी. २०२ संख्यक या प्रतिमा बहुतेक अप्रकाशित आहेत.
ब्रह्मा-सावित्री-सरस्वती :"
    आसाममधील दोन प्रतिमात ब्रह्मदेवाबरोबर दोन स्रिया दिसतात. या अनुक्रमे सावित्री व सरस्वती असणे शक्य आहे. सावित्री व सरस्वतीचे ब्रह्मदेवाच्या डावीकडे अंकन मत्स्यपुराणांत मान्य आहे. (मत्स्य. २५९.४०-४५) दुसरे म्हणजे तेजपुर जिल्ह्यातून आलेल्या ब्रह्मदेवाच्या मूर्तीत पादपीठावर सात हंस दाखवले आहेत. लेखिकेच्या मताप्रमाणे आसामचा ब्रह्मदेव कालिकापुराणाच्या आधारावर आकारलेला आहे.
Parimita Deo, Iconographical study of Brahma in the art of Pragjyotisa, Kala VI, 1999-2000, pp. 81-85
हरियाणा व बिहार येथून मिळालेल्या काही शिल्पांत दर्शनी भागावर ब्रह्मा, व पाठीमागे विष्णू, स्कंद अथवा गरुडाचेही दर्शन होते.

३८२

D. Handa, Add... image of Hari-Brahma, JGSV, XLI, January-December 1-4, 1988. pp. 193-97
     सरस्वती-ब्रह्मा यांची आलिंगन प्रतिमा कमी दिसते पण अप्राप्य आहे असें मात्र नाही. उदाहरणार्थ राजा केळया संग्रहालय, पुणे येथे अशी एक मूर्ती आहे (चित्र १५४). दुसरी मूर्ती लेखकाने वाराणसीच्या 'मिसिरपोखरा' तलावाच काठी पाहिली आहे. ही मध्यकालीन असून बरीच खंडित आहे."
    स्वतंत्र रूपांशिवाय ब्रह्मदेव वैष्णव व शैव प्रतिमाच्या रथिकाबिंबाचे रूपांत, विष्णूंच्या अनंतशायी मूर्तीत तसेच शिवाच्या कल्याणसुंदर मूर्तीत आढळतो (चित्र ६२ ).
 ब्रह्मदेवाच्या दक्षिण भारतीय मूर्ती :
         दक्षिणेंत मंदिराच्या उत्तरी भागांवर ब्रह्मदेवाच्या मूर्ती आढळतात. अशी आख्यायिका आहे कीं मेरुपर्वतावर असलेल्या ब्रह्मदेवाचा कमंडलू पुरांत सापडला व तो दक्षिणेंत ज्या ठिकाणी अडकून पडला ती जागा म्हणजे कावेरीच्या तटावर असलेले कुम्भकोणम् हे स्थान होय. दक्षिणेशी ब्रह्मदेवाचा संबंध दाखविणारी दुसरी कथा अशी आहे की कंडियूर (तिरुकण्डियू, तंजावरपासून ७ मैल) येथे ब्रह्मदेवाला सरस्वती वर आसक्त झालेला पाहून शंकराने त्याचे पांचवे मस्तक तोडले."
      दक्षिण भारतांतही ब्रह्मदेव प्रथम पूज्य होता, पुढे त्याला अपूज्यत्व आले. श्री. पी. आर. श्रीनिवासन यांच्या मते इसवीसनाच्या दहाव्या शतकाच्या सुमारांस ब्रह्मदेवाची पूजा लुप्त होऊन तिचे स्थान सुब्रह्मण्याने घेतले. प्रारंभिक चोळ काळांत निर्माण झालेल्या नर्तमल्लई आणि तिरुकत्तलईच्या मंदिरात ब्रह्मदेवाला स्वतंत्र अस्तित्व होते.
     ब्रह्मदेवाच्या मूर्ती बदामी आणि एहोळेच्या कलेपासून मिळू लागतात. मुंबईच्या संग्रहालयांत असलेला बदामीचा विशाल ब्रह्मदेव चतुर्भुज असून त्याचे हातांत प्रदक्षिणाक्रमानें माळा, सुक् व घट अशा वस्तू असून डावा वरदमुद्रेत आहे. हा कमलासनावर बसला असून जवळ हंस आहे व ऋषी स्तुती करीत आहेत. एहोळेच्या प्रतिमेंत पाश किंवा मौजीबंधन हे सुकेच्या जागी दिसते. इतर आयुधं तशीच आहेत. एहोळची दुसरी प्रतिमा हंसारूढ आहे व येथें एक नवी वस्तू म्हणजे 'कूर्च' दिसते. बरेचसे ऋषी स्तवन करतांना दाखविले आहेत.
   धारवाड, सोपारा, वगैरे भागांकडे मिळणाऱ्या ब्रह्मदेवाना दाढ्या दिसतात, पण साधारणपणें दक्षिणेंत दाढीचा प्रघात फारच कमी दिसतो. (रे.चि. सदतीस ४)
     सुदूर दक्षिणेंत मिळणाऱ्या ब्रह्मदेवाच्या स्थानक व आसन प्रतिमांचा डॉ. अश्विन लिप्पी यांनी बारीक अभ्यास केला आहे. त्यांनी यांना दोन वर्गात वाटले आहे.' प्रथम वर्गातील मूर्तीना दृश्यमान अशी तीनच तोंडे असून त्याचा उजवा हात अभयमुद्रेत व डावा कट्यवलंबी किंवा मांडीवर ठेवलेला असतो. मागील हातात माळा व घट दिसतात. या वर्गात स्थानक मूर्ती जास्त आहेत. दुसऱ्या वर्गातील प्रतिमा चित्र पद्धतीच्या (carved in round) असून त्यांत ब्रह्मदेवाचे चौथे तोंडाशी पाठीकडे दाखविले आहे. पाठीमागचा उजवा अभयमुदेत आहे. पाठीमागच्या डाव्यात माळा आहे व सामान्य डावा मांडीवर उताणा ठेवला आहे. या वर्गात अलंकाराचेही बाहुल्य आहे. ब्रह्मदेवाचे साधे जानवे मुक्ता यज्ञोपवीत म्हणून झळकते व त्याच्या पायांतही अलंकार दिसतात. प्रथम वगपिक्षा दुसऱ्या वर्गाच्या प्रतिमा नक्कीच नंतरच्या आहेत. पण या कोणत्याही गटांत ब्रह्मदेवाला दाढी दिसत नाही व त्याचा हंसही आढळत नाही. या प्रतिमा ९-१० व्या शतकातल्या आहेत.

३८३
संयुक्त प्रतिमा, त्रिमूर्ती, दत्तात्रेयी :
    एकटा ब्रह्मदेव जरी अपूज्य झाला असला तरी इतरांबरोबर त्याला पूजेचा हक्क मिळत होताच. या रूपांत प्रथम त्रिमूर्ती ब्रह्मा, विष्णू व शिव यांचा विचार करू. उत्तर भारतात अशा प्रकारचे पट्ट मिळतात. येथे एका ओळीत हे तिन्ही देव कोरलेले असतात (ल.सं.सं.जी ५७ चित्र १५५). खजुराहो कलेत ही अशा प्रकारचे अंकन पहावयास मिळते. यांत बहुतेक मधोमध विष्णू असून आजुबाजूला ब्रह्मदेव व शंकर आपापल्या वाहनांबरोबर असतात.
     महाराष्ट्रीय परंपरेप्रमाणे या तीन देवांचे एकत्र अंकन म्हणजे दत्तात्रेयाची प्रतिमा होय. लक्ष्मी, सरस्वती व पार्वती यांच्या चिथावणीमुळे तिन्ही देव आत्रि ऋषीची बायको अनुसूया हिच्या पावित्र्याची परीक्षा पाहण्यांकरिता तिच्या आश्रमांत गेले पण तिच्या तेजांमुळें त्यांना तान्ही मुले बनून तेथे रहावे लागले. पुढे अत्रींनी यांना त्यांची मुळ रूपे दिली पण तिघे एकत्र स्वरूपाने आत्रेयदत्त या नांवानी त्या आश्रमात राहिले. उपासनेच्या क्षेत्रांत दत्ताचा योगशास्त्राशी जवळचा संबंध आहे. दत्ताच्या प्रतिमेला तीन डोकी व सहा हात असून त्यांत माळा, कमंडलू, शंख, चक्र, त्रिशूल व डमरू अशी आयुधें असतात. काही ठिकाणी कुत्रे ही जवळ असल्याचे वर्णन आहे. दत्त प्रतिमा उत्तर भारतात फारशा दिसत नाहीत. ज्या आहेत त्यापैकी जास्त महाराष्ट्रीयांनीच स्थापन केलेल्या आहेत. मूर्तीशास्त्राच्या दृष्टीने हा संप्रदाय फारसा जुना असावा असें दिसत नाही.
हरि-हर-सूर्य-पितामह :
मध्य काळात हरि-हर-ब्रह्मदेव या बरोबरच सूर्यासही गुंफून हरि-हर-पितामह या नांवाने प्रतिमा घडविल्या जात. खजुराहोच्या कलेत अशा प्रतिमा दिसतात. अपराजितपृच्छेप्रमाणे अशा मूर्तीला चार तोंडे व आठ हात असावेत व त्यांत अनुक्रमें दोन कमळें, खट्वांग, त्रिशूल, चक्र, शंख व कमंडलू-माळा अशी आयुधें असावीत. काही प्रतिमात फक्त ब्रह्मदेव, सूर्य व शंकर दाखवितात (चित्र १५६). येथे सूर्य व नारायण यांचे एकत्व कल्पिले आहे.
 
 
 
 

ब्रह्म


चित्र क्र. २४: ब्रह्मदेव, देवगड

मंदिराच्या निर्मितीचे प्रयोजन हे अत्यंत विकसित अवस्थेत पोहोचलेल्या शिल्पकलेन जनसामान्यांपर्यंत पोहोचविण्याचे माध्यम म्हणून होते. या शिल्पांमध्ये प्रामुख्याने देवदेवतांची शिल्प असतात, ज्यामध्ये मुख्य देवता, उपदेवता आणि इतर देवतांचा समावेश केलेला असतो. परंतु मंदिरावरील सर्व शिल्पे ही फक्त देवांचीच नसतात. त्यात काही अन्य शिल्पांचाही समावेश केलेल दिसतो. यामध्ये यक्ष, गंधर्व, दिक्पाल, नवग्रह इ., सुरसुंदरी, नायिका, व्याल आणि कामशिल्पे बांच अंतर्भाव असतो.
ब्रह्मदेव :-
   पूजेमध्ये असलेले ब्रह्मदेवाचे स्वतंत्र राजस्थानामधील पुष्करतीर्थ येथे एक देऊळ आहे. मुळ देवळाचा जीर्णोद्धार झाल्यामुळे आज तेथे थोड्या नवीन धाटणीचेच मंदिर दिसते. मूळ मंदीर इ.स. १८०२ मध्ये बांधले होते. (बॅनर्जी : १९४१) हा अपवाद सोडल्यास प्राचीन मंदिरांमध्ये ब्रह्मदेव मंदिरे दुधही आणि खजुराहो (म.प्र.), खेड ब्रह्मा (इडर, गुजराथ), वसंतगड (राजस्थान), उन्का (हुबळीजवळ, कर्नाटक) आणि गौड (माल्डा, बंगाल)  येथे आहेत. यातील खजुराहोचे मंदिर, ब्रह्माचे नसून शिवाचे आहे. गर्भागृहामध्ये असलेल्या चतुर्मुखी लिंगामुळे त्या मंदिराला ब्रह्मा मंदिर हे नाव दिले गेले. सर्व मंदिरांमध्ये ब्रह्मदेवाचे शिल्प मात्र आढळते. साधारणतः सर्व ठिकाणी तीन तोंडाची ही पुरुषाची मूर्ती बसलेली किंवा उभी असते. चौथे तोंड हे मागच्या बाजूला असल्याने दर्शकाने ते असल्याचे गृहीत धरायचे असते. मधल्या मुखाला लांब दाढी असते आणि ही मूर्ती कमळावर बसलेली असते. डाव्या खांद्यावर यज्ञोपवीत व काही शिल्पांमध्ये मृगाजिन असते. या मूर्तीला चार हात असतात आणि उजव्या खालच्या हातामध्ये अक्षमाला, उजव्या वरच्या हातामध्ये स्रुवा, डाव्या खालच्या हातामध्ये कमंडलू असते आणि डाव्या वरच्या हातामध्ये पुस्तक (पोथी). काही मूर्तीमध्ये खालचा उजवा हात अभय किंवा वरद मुद्रेतही असतो. त्याचे वाहन हंस असते आणि त्याच्याबरोबर एक स्त्री (सावित्री) किंवा दोन स्त्रिया (सावित्री आणि गायत्री किंवा सावित्री आणि सरस्वती) असतात.

चित्र क्र. २५ :ब्रह्मदेव सावित्री, पाटण

ब्रह्मदेव हा ब्राह्मण, वेदांचा स्रोत आणि यज्ञाचा पुरस्कार करणारा आहे. त्याने आपल्या चार तोंडांनी चार वेदांना प्रकट केले. संहाराशी त्याचा संबंध नसल्यामुळे त्याच्या हातात शस्त्र दिसत नाही. त्याचे पोट किंचित सुटलेले व शरीर थोडे स्थूल दाखवतात. (जोशीः १९७९) चार मुखे ही चार वेदांचे प्रतीक मानली जातात. काही प्रतिमांमध्ये त्याच्या पायाशी चार मानव प्रतिमा दाखवल्या जातात, जे चार वेदांचे प्रतिनिधित्व करतात. ब्रह्मदेवाचे शिल्पांकन काही संयुक्त प्रतिमांमध्येही दिसते. यामध्ये हरी-हर-सुर्य-पितामह किंवा ब्रम्हेशानजनार्दनार्क, (ब्रम्हदेव, ईशान (शिव), जनार्दन ( विष्णु ) अर्क ( सुर्य ) या प्रकारच्या मूर्तीमध्ये चार मुखांची आणि आठ हातांची देव प्रतिमा असते ज्यामध्ये दोन कमले, खट्‌वांग, त्रिशूल, शंख व कमंडलू -माला अशी आयुधे दिसतात. विष्णु, शंकर, सूर्य आणि ब्रह्मदेवाचे एकत्रित शिल्पांकन असते. याशिवाय लिंगोद्भव शिव या मूर्तीतही ब्रह्मदेवाचे शिल्पांकन असते. शेषशायी विष्णू या शिल्पांमध्ये विष्णूच्या नाभीतून उगवलेल्या कमळावर बसलेली ब्रह्मदेवाची छोटी प्रतिमा दिसते. तसेच वामन त्रिविक्रम या शिल्पातही विष्णूने स्वर्ग व्यापायला उचललेल्या पायाशी ब्रह्मदेवाची मुर्ती दिसते. 
 
चित्र क्र. २६ : ब्रह्मेशानजनार्दनार्क, देलमाल 

ब्रह्म देवाची चार मुखे ही चार वेद, चार उपवेद (आयुर्वेद, धर्नुवेद, गांधर्ववेद आणि स्थापत्यवेद) चार युगे, चार ऋत्विज (होता, उद्‌गाता, अद्वर्यु आणि ब्रह्मा स्वतः), चार धर्म (विद्या, दान, तप आणि सत्य), चार आश्रम, चार यज्ञद्वय (षोडशी आणि उक्थ, चयन आणि अग्निस्तोम, आप्तोर्याम आणि ऐतरात्र, वाजपेय आणि गोसव), चार दिशा अशा अनेक गोष्टींचे प्रतिनिधित्व करतात. (भागवत पुराण ३,१२,३४-४१)

   दक्षिण भारतामध्ये आढळणाऱ्या ब्रह्मदेवाच्या मूर्तीना दाढी दिसत नाही आणि काही ठिकाण पायापाशी हंस देखील नसतो.
 
 
 
ब्रह्मदेव – वारसा ठाण्याचा
पंकज समेळ,
हिंदूधर्मातील त्रिदेवांपैकी एक देव ब्रह्मा. ब्रह्माच्या उत्त्पतीच्या अनेक कथा आहेत. एका कथेनुसार अनैसर्गिक बीज आणि विष्णुरूप योनी यांच्या संयोगाने एक सोन्याचे अंडे प्रगट झाले आणि त्यातून ब्रह्मदेवाची उत्पत्ती झाली. कूर्मपुराणानुसार विष्णूच्या नाभीतून उगवलेल्या कमळातून ब्रह्मा प्रकट झाला. कूर्मपुराणातील दुसऱ्या कथेनुसार जल आणि आकाश तत्वापासून वराहरुपात ब्रह्मा प्रगट झाला. नंतर त्याने स्वतःपासून प्रजापती उत्पन्न केले. या प्रजापतींनी सृष्टी निर्माण केली. म्हणून ब्रह्मदेवाला ‘पितामह’ या नावाने ओळखले जाते. धाता, प्रजापती, विधाता इ. त्याची इतर नावे आहेत. कूर्मपुराणात ब्रह्माची परामूर्ती प्रजापती, हिरण्यगर्भ, वेदार्थवेदी भगवान आणि रजोगुणमय अशी चाररूपे सांगितली आहेत.
ब्रह्मदेव हे रजोगुणांचे प्रतिक आहे. निर्मिती करणे हे मुख्य कार्य असल्यामुळे ब्रह्माने युध्द केल्याच्या, कोणाचा संहार केल्याच्या कथा ऐकायला मिळत नाहीत. देव आणि असुर या दोघांनाही ब्रह्मा वंदनीय होता. असुरांनी ब्रह्मदेवाची खडतर तपश्चर्या करून उत्तमोत्तम वर मिळवल्याच्या कथा पुराणात वाचायला मिळतात आणि यामुळेच ब्रह्मदेवाने असुरांना वर द्यायचे, वरामुळे असुर उन्मत्त होऊन सर्वत्र हाहाकार माजवायचे व नंतर मग त्या असुरांना रोखण्यासाठी वरातून पळवाट काढून विष्णु व शंकर असुराचा नाश करणार असा क्रम असलेल्या अनेक पुराणकथा वाचायला मिळतात. त्याचबरोबर त्रिपुरासुराबरोबरच्या युध्दात ब्रह्माने शंकराच्या रथाचे सारथ्य केले, तसेच शिव-पार्वती यांच्या विवाहात त्याने पुरोहिताची भूमिका पार पाडली होती.
विष्णु आणि शंकर यांच्या जोडीने ब्रह्माची पूजा होत होती. परंतु ब्रह्मदेवाची स्तुती करणारा विशिष्ट संप्रदाय नसणे, असुरास प्रोत्साहन, असत्य कथन, सावित्रीचा शाप, कन्यासक्ती इ. कारणांमुळे मध्यकाळापर्यंत ब्रम्हपूजा अस्तंगत झाली. ललितविस्तार आणि दिव्यावदान या बौध्द ग्रंथात ब्रह्मदेवाचा उपास्य देवता म्हणून उल्लेख आलेला आहे.
ब्रह्मदेवाला पूर्वी पाच डोकी होती. पण ब्रह्माने शिवाचा विरोध केल्यामुळे भैरवाने त्यांचे डोके तोडले. पुढे ब्रह्मदेवाने शिवाचे स्तवन करून शिवास प्रसन्न करू घेतले. ब्रह्महत्येचे प्रायश्चित म्हणून भैरव ते कपाल घेऊन भिक्षा मागण्याकरिता निघून गेला. रुपमण्डण ग्रंथानुसार चार वेद, चार युगे आणि चार वर्ण यांचे प्रतिक म्हणजे ब्रह्माची चार मस्तके.
मूर्तिशास्त्रानुसार ब्रह्माला चार हात असतात. वाहन हंस असून तो कमळावर बसलेला असतो किंवा उभा असतो. हातात पुस्तक, माळा, कमंडलू, यज्ञपात्रे, वरदअभय मुद्रा असतात. ब्रह्मा संहारकर्ता नसल्यामुळे त्याच्या हातात कोणतेही शस्त्र नसते. शरीर थोडे स्थूल असून पोट थोडे सुटलेले असते.
भारतात ब्रह्माची मंदिरे फार कमी आहेत. त्यापैकी पुष्कर (राजस्थान) आणि खेडब्रह्म (गुजरात) ही मुख्य ठिकाणे मानायला हरकत नाही.
ऐतिहासिकदृष्ट्या महत्त्वाची आणि ठाण्याचा वारसा असलेली ब्रह्मदेवाची मूर्ती काही वर्षांपूर्वी सिध्देश्वर तलावातील गाळ काढताना मिळाली. मूर्तीचा निश्चित काळ सांगता येत नसला तरी मूर्ती साधारणपणे ८००-१००० वर्ष जुनी आहे. या संपूर्ण परिसरावर इ.स. ८०० ते १२५० अशी साधारणपणे ४५० वर्षे शिलाहार राजघराण्याची राजवट होती. एवढी सुंदर मूर्ती कोणत्याही राजाश्रयाशिवाय निर्माण करणे शक्यच नाही. त्यामुळे ही मूर्ती शिलाहारकालीन आहे असे गृहीत धरायला हरकत नाही. शिलाहार राजघराण्याची पहिली राजधानी पुरी आणि दुसरी राजधानी श्रीस्थानक म्हणजे सध्याचे ठाणे.
उत्तरकोकण वर राज्य करणारे शिलाहार राजे राष्ट्रकूट राजघराण्याचे मांडलिक होते. कान्हेरी लेण्यात उत्तर शिलाहारांचा पहिला ज्ञात शिलालेख आहे. शके ७८५ मधील या लेखात पुल्लशक्तीने महासामंत हे बिरूद लावलेले आहे. तसेच आपले वडील कपर्दिन यांना महासामंत आणि कोकणवल्लभ ही बिरुदे राष्ट्रकुट राजा अमोघवर्ष याच्यामुळे प्राप्त झाली असे सांगतो.
शिलाहार राजघराण्याने ठाणे आणि परिसरात अनेक सुंदर मंदिरे बांधली. ठाण्यातील तलावपाळीजवळील कौपिनेश्वर मंदिर, अंबरनाथ येथील शके ९८२ मधील सुप्रसिद्ध शिवमंदिर, लोणाड येथील शिवमंदिर इ. मंदिरांचे बांधकाम शिलाहारकालात झाले हे निश्चितपणे सांगता येते. तसेच शिलाहारांच्या शिलालेखातूनसुध्दा अनेक मंदिराचे उल्लेख वाचायला मिळतात (उदा. व्योमेश्वर, षोंपेश्वर). त्याचबरोबर आटगाव येथील भग्नशिवमंदिर पण शिलाहारकालातील असावे असे त्याच्या स्थापत्यशैलीवरून वाटते.
सिध्देश्वर राममंदिरातील ब्रह्मदेवाची मूर्ती सुमारे ५ फुट उंच, समभंग अवस्थेत आणि कमळावर उभी आहे. समभंग म्हणजे दोन्ही पायावर सरळ उभी असणारी आणि शरीराला कोठेही बाक नसणारी मूर्ती. मूर्तिशास्त्रात मूर्तीच्या उभे राहण्याच्या स्थितीवरून समभंग, अभंग, त्रिभंग आणि अतिभंग असे चार प्रकार असतात.
मूर्तीचे चारी हात भंगले असल्यामुळे कोणत्या हातात काय धारण केले असावे हे सांगता येत नाही.मूर्तिशास्त्राप्रमाणे हातात अक्षमाला, वेद, कमंडलू व यज्ञपात्रे किंवा वेद, यज्ञपात्रे व दोन हात वरदअभय मुद्रावस्थेत असावेत. मूर्तीला चार डोकी असून तीन दर्शनी भागात, तर चौथे डोके मागच्या बाजूला आहे. सर्व तोंडास दाढी आणि मिशी दाखवली आहे. डोक्यावर कोरीवकाम केलेला जटामुकुट आहे. कानात कुंडले, यज्ञोपवीत आणि कटीसूत्र धारण केले आहे. अंगावर वेगवेगळे अलंकार दाखवले आहेत. मूर्तीला कोरलेल्या भुवया नाजूक आणि एकमेकांना जोडलेल्या आहेत. मूर्तिशास्त्रानुसार ब्रह्माचे शरीर स्थूल आणि पोटथोडे सुटलेले असते. पण शिल्पकारांनी मूर्ती तयार करताना ह्या गोष्टीला छेद दिलाआहे.
मुर्तीच्या दोन्ही बाजूला स्त्रिया दाखवल्या असून त्या बहुदा सावित्री व गायत्री किंवा गायत्री व सरस्वती असाव्यात. दोन्ही बाजूंना हंस हे वाहन कोरले आहे. मूर्तीच्या मागे कलाकुसरयुक्त सुंदर प्रभावळ असून तिच्यावर किर्तीमुखे कोरलेली आहेत.
सिध्देश्वर तलाव परिसरात ब्रह्मदेवाचे मंदिर असावे. या मूर्तीची नित्यनेमाने पूजा होत असावी. काळाच्या ओघात मंदिर नष्ट झाले आणि नंतर मुर्तीभंजंकापासून मूर्ती वाचवण्यासाठी मंदिराजवळ असलेल्या तलावात (आताच्या सिध्देश्वर तलावात) लपवून ठेवली असावी. परंतु ही मूर्ती कोणत्या राजवटीच्या काळात तलावात लपवून ठेवली आणि महाराष्ट्रात ब्रह्मदेवाची पूजा कधी बंद झाली हे निश्चितपणे सांगता येत नाही . नालासोपारा येथील चक्रेश्वर मंदिरात असलेल्या ब्रह्मदेवाच्या मूर्तीची स्थानिकांकडून अजूनही नित्य पूजा केली जाते ही उल्लेखनीय गोष्ट आहे.
ब्रह्मदेवाच्या मूर्तीच्या समोर असलेल्या राममंदिराच्या मागे ३-४ मूर्तींचे अवशेष पडलेले आहेत. पण त्या मूर्ती कोणाच्या आहेत हे काही कळून येत नाही. एका मूर्तीच्या गळ्यात कोरलेला हार अप्रतिम आहे. दुसऱ्या एका मूर्तीच्या आजूबाजूला जैन तीर्थंकरसदृश्य मुर्त्या कोरलेल्या आहेत. दुर्दैवाने ती मूर्ती कोणाची आहे हे समजून येत नाही.
सद्यस्थितीत ठाण्याच्या सांस्कृतिक आणि ऐतिहासिक वारसा असलेल्या ह्या मूर्तीला संवर्धनाची गरज आहे. हिंदू धर्मशास्त्राप्रमाणे खंडित झालेल्या मूर्तीची पूजा केली जात नाही. परंतु अजूनही काही भाविक ह्या मूर्तीची पूजा करतात. या मूर्तीला शेंदूर, फुले, हळदकुंकू इ. घटकांमुळे हानी पोचत आहे. त्यामुळे मूर्तीला आणि इतर अवशेषांना संग्रहालयात हलवणे ही काळाची गरज आहे किंवा सध्याच्या जागी त्यांचे योग्य संवर्धन करणे.
संदर्भ
भारतीय मूर्तिशास्त्र, डॉ. नी. पु. जोशी
Elements of Hindu Iconography, T. A. Gopinatha Rao
 
 

ब्रम्हदेव, सिद्धेश्वर राम मंदिर, ठाणे

ब्रम्हदेव, सिद्धेश्वर राम मंदिर, ठाणे

हि मूर्ती काही वर्षांपूर्वी सिद्धेश्वर तलावातील गाळ काढताना मिळाली. मूर्ती साधारणपणे ८व्या शतकातील म्हणजे शिलाहारकालीन आहे. महाराष्ट्रात शिलाहारांच्या ३ शाखा – उत्तर कोकणाचे शिलाहार, दक्षिण कोकणचे शिलाहार आणि कऱ्हाड / कोल्हापूरचे शिलाहार. आता काहींना प्रश्न पडेल, शिलाहारांच्या तीन शाखा, मग हि मूर्ती कोणत्या शिलाहार शाखेने तयार करून घेतली आणि ती कोणत्या मंदिरात होती?

उत्तर कोकणचे शिलाहार या राजघराण्याने हि मूर्ती तयार करून घेतली. याच राजघराण्याने इ.स.१०६० मध्ये अंबरनाथचे सुप्रसिद्ध शिवमंदिर बांधले. हे राजघराणे राष्ट्रकूट राजघराण्याचे मांडलिक. इ.स. ८०० ते १२५० अशा साधारणपणे ४५० वर्षांचा त्यांचा काळ. या शिलाहार राजांची राजधानी होती श्रीस्थानक (सध्याचे ठाणे).

सिद्धेश्वर तलाव परिसरात ब्रम्हदेवाचे मंदिर असावे आणि हि मूर्ती त्या मंदिरातील गाभाऱ्यात असावी. तसेच मूर्तीची नित्यनेमाने पूजा होत असावी. काळाच्या ओघात मंदिर नष्ट झाले असावे आणि नंतर मुर्तीभंजंकापासून मूर्तीला वाचवण्यासाठी तिला मंदिराजवळ असलेल्या तलावात (म्हणजे आताच्या सिद्धेश्वर तलावात) लपवून ठेवली असावी.

ह्याचाच अर्थ असा निघतो कि ८व्या शतकापर्यंत महाराष्ट्रात ब्रम्हदेवाची पूजा होत होती. अशीच दुसरी एक ब्रह्मदेवाची मूर्ती नालासोपारा येथील मंदिरात आहे.
मूर्ती सुमारे ५ फुट उंच आणि उभी आहे. मूर्तीचे चारी हात भंगले असल्यामुळे हातात काय असावे हे कळायला मार्ग नाही. मुर्तीशास्त्राप्रमाणे अक्षमाला, वेद, कमंडलू आणि माला असावी. मूर्तीला चार डोकी असून तीन दर्शनी भागात, तर चौथे डोके मूर्तीच्या मागच्या आहे. सर्व तोंडास दाढी आणि मिशी दाखवली आहे. डोक्यावर अप्रतिम कोरीवकाम केलेला मुकुट आहे. कानात कुंडले असून जानवे आणि करगोटा धारण केले आहे. अंगावर वेगवेगळे अलंकार दाखवले आहेत. मुर्तीच्या उजव्या बाजूला सावित्री आणि डाव्या बाजूला सरस्वती खोदलेली आहेत. दोन्ही बाजूंना हंस हे वाहन कोरले आहे. मूर्तीच्या मागे कलाकुसरयुक्त सुंदर प्रभावळ आहे.
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ब्रम्हा, विष्णु आणि गरुडाची मुर्ती
ब्रह्मदेवाची अतिशय दुर्मिळ आणि सुंदर कोरीव मुर्ती .  ब्रम्हदेवाच्या पुतळ्याखाली सावित्री व सरस्वती आहे. अश्या पद्धतीची ब्रम्ह देवाची प्राचीन मूर्ती राजस्थानातील पुष्कर येथे आहे. लोणार























दिक्पाल 
    वर आणि खाली (ऊर्ध्वाधर) अशा दोन दिशा सोडल्या तर एकूण दिशा आठ होतात. दिशेच्या अधिपतीला दिक्पाल अशी संज्ञा आहे, व त्याप्रमाणें आठ दिशाचे आठ दिक्पाल खालीलप्रमाणे आहेत
पूर्व - इंद्र,
आग्नेय अग्नी (दक्षिण पूर्व),
दक्षिण - यम,
नैऋत्य - निर्ऋति (द. पश्चिम),
पश्चिम वरूण,
वायव्य - वायू (उत्तर पश्चिम),
उत्तर - कुबेर,
ईशान्य - ईश्वर, ईश (उ. पूर्व)
       या आठ दिक्पालांपैकी इंद्र, कुबेर, अग्नी, वरुण व शंकर रूपांत ईश्वर यांची स्वतंत्र पूजा इसवीसनाच्या प्रारंभिक शतकापासून चालू होती. इंद्र, अग्नी व वरुण हे तर वेद काळातील अत्यंत श्रेष्ठ असे देव होत. पौराणिक काळांत पंचदेवोपासनेला असा जसा रंग चढत चालला तसतसे हे एका काळचे प्रमुख देव मागे पडले. व वरुणासारखे फक्त एका दिशेचे अधिपती होऊन बाजूला झाले. कुबेर व निर्ऋति हे राक्षस होत. कुबेर तर रावणाचा मोठा भाऊ होता. अर्थातच यांना पुढे देवांत स्थान मिळाले व हे दिक्पालांच्या हुद्यांवर चढले.
३८४
      दिक्पालांच्या संबंधाने हे लक्षात ठेवले पाहिजे की फार जुन्या परंपरेत यांच्या नांवात व संख्येत फरक आढ हरिवंशरित एका ठिकाणी 'दिक्पाल' म्हणून प्रजापती-पुत्रांची खालीलप्रमाणें एक यादी दिली आहे व हे राजे अबूली शासन करीत आहेत असे सांगितले आहे. ""
पूर्व             -        वैराज प्रजापतीचा मुलगा सुधन्वा
पश्चिम       -        रजस प्रजापतीचा मुलगा अच्युत किंवा केतूमान्
उत्तर         -        दुर्धर्ष प्रजापतीचा मुलगा हिरण्यरोमा
दक्षिण       -        कर्दम प्रजापतीचा मुलगा शंखपाल
जैन शास्त्राचे दशदिक्पाल थोडे निराळे आहेत. मात्र अग्नी, इंद्र, यम आणि वरुण हा गट इतरांपेक्षा जुना आहे.
बौद्धांनी चार दिशांचे अधिपती किंवा चतुर्महाराज म्हणून धृतराष्ट्र (पूर्व), विरुढक (दक्षिण), विरूपक्ष (पश्चिम) ३ वैश्रवण (उत्तर) यांची कल्पना केली आहे. पुढच्या पानावर दिलेला दिक्पालांच्या लक्षणाचा तक्ता प्रचलीत समजुतीना धरून तयार केलेला आहे. तिकडे हष्टिक्षेप करून प्रत्यक्ष प्रतिमांकडे वळू.

रेखाचित्र
१. सपत्नीक कुबेर
३८६
इंद्र :-
     इंद्राला सोम, विश्वपुरुष किंवा प्रजापती यांच्यापासून उद्भूत मानतात. वज्र आणि अङ्‌कुश ही त्याची मुख्य आयुचे होत. वृत्राला मारण्याकरिता दधिचि ऋषीच्या अस्थिपासून परंपरेला अनुसरूनच की काय पण गांधार कलेतील बौद इंद्राच्या हातांतील वज्र हे हाडांप्रमाणेच दिसते. इतरत्र मात्र वज्राचा आकार खाली आणि वर तीन टोकें असलेल्या लहानश्या दांड्याप्रमाणे झाला. ऐरावत हत्ती हे इन्द्राचे वाहन होय. उष्णीष किंवा उंच मुगुट हे इन्द्राला ओळखण्याचे दुसरे महत्त्वाचे चिह्न होय.
     पौराणिक वाङ्मयांत इन्द्र हा स्वर्गाचा अधिपती असून, सर्व देवांचा तो स्वामी आहे. तो आपल्या पदाला नेहमीच जपत असतो. पाऊस पाडणे हे इंद्राचे प्रमुख कार्य होय. एके काळी इंद्रपूजेचा बराच विस्तार होता. इंद्रध्वजोत्सव राजे लोक मोठ्या प्रमाणात करीत असत." वर्षप्रतिपदेच्या दिवशी आपण जी घरोघरी गुढी उभारतो तो प्रकार इंद्रध्वजपूजनाचे लघु संस्करण म्हणता येईल.
     आता इंद्राच्या प्रत्यक्ष प्रतिमेचे पूजन लुप्तप्राय झाले आहे, पण मध्यकालीन कलेत त्याच्या प्रतिमा मिळतात. भरपूर दागिने, पायाजवळ हत्ती व हातात सुरक्षित असले तर वज्र ही त्याची प्रमुख चिन्हें होत. तो द्विभुज आणि चतुर्भुज दोन्हीं रूपात दिसतो.
    इंद्राची बायको शची. विष्णुधर्मोत्तर पुराणांप्रमाणे त्याची प्रतिमा शचीसह आलिंगन मुद्रेत घडवावयास हवी." लखनऊ संग्रहालयांत (सं.सं.एच्. २६) असलेल्या एका प्रतिमेत इंद्र शचीसह उभा आहे व पाया जवळ ऐरावत दिसतो.
 खजुराहो येथील चंदेल कलेत शची-इंद्राच्या आलिंगन प्रतिमा विद्यमान आहेत."
       दक्षिणेंत इंद्राचे अंकन भाजे येथून मिळण्यास प्रारंभ होतो. येथे तो पागोटे घातलेला आहे. वेरूळ येथील इंद्रसभा गुंफेतील त्याची हत्तीवर बसलेली प्रतिमा 'देवराज' पदाची साक्ष पटवते. 
अग्नी :-
    वैदिक देवतांत इंद्रानंतर अग्नीचे स्थान आहे. देवांना आहार पोचविण्याचे काम अग्नीचे आहे. अग्नीच्या तीर रूपांची-गार्हपत्य, आहवनीय आणि दाक्षिणात्य-कल्पना जुनी आहे, त्याचप्रमाणे त्याला तीन आवास असलेला, तीन प्रकाश असलेला किंवा तीन तडेचा मानला आहे पण त्या वर्गीकरणाचा अग्नीच्या प्रतिमेशी संबंध नाही. कर्मकांडात आजकाल आपण अग्नीचे ज्यां मत्रांने ध्यान करतो त्यात त्याला सात हात, चार शिंगे, सात जिह्वा, दोन डोकी, तीन पाच असलेला व उजवी आणि डावीकडे क्रमाने स्वाहा आणि स्वधा अशा क्षार शिंगे, सात जिह्वा, दोन डोकी आहे. मंत्राप्रमाणे त्याच्या हातात शक्ती, अन्न, सुक्, सुवा, तोमर, पंखा आणि तुपाचे भांडे अशा वस्तू आहेत. लक्षणग्रंथ या ध्यानाची फारशी पुष्टी करीत नाहीत आणि जुन्या प्रतिमाही तशा दिसत नाहीत.
    लखनऊ (सं.सं. जे. १२३ चित्र १५७) मथुरा संग्रहालयांत (सं.सं. ४०.२८८०) आहेत. येथे अग्नीला काहीसा अंग सुटलेल्या ब्राह्मणासारखा दाखवतात, हात दोनव असतात, डोक्यावर केसांची गाठ असते व गळ्यांत का म्हणजे त्याच्या पाठीमागे दिसणारा ज्वालांचा पसारा ही होय.
३८७
      हरिवंशात नारदाची तुलना अग्नीशी करीत असताना पेटलेला (ज्वलित), डावीकडे केसाची मोठीशी गाठ असलेला (सव्यापवृत्त विपुल जटामंडल) आणि उगवत्या सूर्याप्रमाणे डोळे असणारा (बालार्क सदृशेक्षणः) अशी पढ़ें वापरली आहेत. ही कुषाण प्रतिमांना बऱ्याच अंशी लागू पडतात.
    अग्नीचा कार्तिकेयाशी संबंध असल्यामुळे कधी कधी दोघांचे बरोबरच अंकन केले जाते. कुषाणकाळाची अशी प्रतिमा मथुरेत आहे (सं.सं. ४०.२८८३) व मध्यकालांतील तोच विषयअंकित करणारी प्रतिमा सारनाथ (वाराणसी) येथील संग्रहालयांत आहे.
    अग्नीच्या मध्यकालीन मूर्ती द्विभुज आणि चतुर्भुज दोन्ही प्रकारच्या मिळतात. वर अभय मुद्रा आणि कमंडलूया त्याच्या सामान्य गोष्टी होत. खजुराहो येथील प्रतिमा प्रायः चार हाताच्या आहेत व तेथे वर/अभय या मुद्रां बरोबरच अक्षमाला, खुक्, पुस्तक आणि कमंडलू या वस्तू दिसतात. ज्वाला फारशा दिसत नाहीत.
   बंगाल व बिहार कडील प्रतिमांत अक्षमाला आणि कमंडलू यांचे प्राधान्य आहे. ज्वालामंडल भरपूर दिसते (चित्र १५८). लंबकूर्च किंवा दाढी इकडील अग्नीला बऱ्याच ठिकाणीं दाखवितात.
 अग्नीचे सामान्य वाहन मेष आहे, पण बकऱ्याशी ही त्याचा जवळचा संबंध आहे. खजुराहो येथील काही शिल्पांत त्याचे वाहन म्हणून बकराच अंकित केला आहे. २२ कधी कधी हा बकरा मानवरूपात असतो (म.सं.सं.डी. २४).
   कल्याणसुंदरमूर्तीत अग्नीचे प्रामुख्याने अंकन केले जाते. बऱ्याच ठिकाणी तो ज्वाला रूपात दिसतो पण काही शिल्पांत (उदा. भा.क्र.भ. वाराणसी सं. १७५) त्याचे मानवी मुख दाखवून ब्रह्मदेव त्यातच आहूती देत आहे असे चित्रण करतात.
 स्वाहा-अग्नीच्या आलिंगन प्रतिमा दुर्मिळ असल्या तरी तो प्रकार खजुराहो येथील कलेत पाहण्यास मिळतो. 
   दक्षिण भारतात सात हात, दोन डोकी व तीन पायांच्या प्रतिमा मिळतात. श्री. राव यांनी दिलेल्या उदाहरणांत एकीत तर मानव मुखें आहेत, पण दुसरीत मात्र अग्नीची तोंडें मनुष्याची नसून बोकडाची आहेत. दुसरे म्हणजे अग्नीचे वाहन म्हणून एका ठिकाणी मेष तर दुसऱ्या नमुन्यात बैल दाखविला आहे. रुद्र व अग्नी यांचे एकीकरण जुन्या काळापासून मान्य होते, त्याचाच हा प्रभाव दिसतो.
    मध्यकालीन कलेत अग्नीच्या काही विशेष प्रकारच्या प्रतिमा आढळतात. सारनाथ (वाराणसी) येथील पुरातत्त्व संग्रहालयातील एका शिल्पांत अग्नीच्या पायाजवळ आजूबाजूला मोर आणि कोंबडाजवळ असलेले पुरुष आहेत. हे अग्नीचे कार्तिकेयाशी सान्निध्य दाखवतात. (रे.चि.उ.१)
      K. Kumar, Some Brahmanical Sculptures in the Sarnath Museum, Bharat, V.S. Agrawala volume, B.H.U.Varanasi, 1968-71, nos. 12-14, pl. IV pp. 142-43
     ग्वाल्हेरच्या संग्रहालयांत स्थापित एका प्रतिमेत देवाच्या हातांत वरदाक्षमाला, खुसुक्, कमंडलू, आणि पोथी या वस्तू दिसतात. अग्नीचे वेदाशी असलेल्या सान्निध्याचे हे संकेत होत.
      S.K. Dikshit A Guide to the central Archaeological Museum, Gwalior, 1962, p. 53 याच संग्रहालयात असलेली दुसरी अग्नी प्रतिमा विष्णूशी नैकट्य दाखवते. येथे देवाच्या डोक्यावर मुकुट आहे,
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हातांत स्वस्तिक मुद्रेसह पद्म, गदा आणि कमंडलू आहेत. त्याचबरोबर पायाशी बकरा ही आहे. या प्रतिमेला 'अफ्रिनारायाण' असे ही म्हणता येईल.
Ibid, pp. 53-54
     अग्नी आणि वृष किंवा बैलाचे साम्य दाखवणारी एका नंदीची विलक्षण प्रतिमा महाराष्ट्रात सातार जवळच्या पाटेकर येथील अधीमंदिरात आहे. येथे बसलेल्या बैलाच्या पुढच्या भागाला यातव मुख, सात हात, चार शिंगे, तीन पाय व हातांत वर, पुष्प, सुक् (?), पंखा / धनुष्य आणि अक्षमाला अशी आयुधें दिसतात. (रे.चि.उ.२).
   N.P. Joshi, A note on the Image of Agni-Vrusa, Kala, XIII, 2007-08, pp. 106-08
   हातांत धनुष्य घेतलेली सुमारे ८व्या शतकातील अग्नीची एक स्थानक मूर्ती सत्यवोलू गावातील रामलिंगेश्वर मंदिर (आंध्रप्रदेश) येथे आहे. हिला हात फक्त दोनच आहेत. डाव्यात धनुष्य असून डावा खंडित आहे.
   M. Krishna Kumar, A rare type of Image of Agni from Ramalingesvara Temple Satyavolu (A.P.) Kala XV 2009-10, pl. 1, pp. 56-60
यम :-
   अग्नी प्रमाणे यमही वैदिक देव आहे. हा सूर्य किंवा विवस्वान याचा मुलगा आणि यमी-पुराणातील यमुना-हिचा भाऊ. स्वतः प्रथम मरून दुसऱ्याला मृत्युची वाट दाखविणारा हा देव धर्माचे ही प्रतीक मानला गेला आहे. दक्षिण दिशेचा हा अधिपती असून याच्या प्रधानाचे नाव चित्रगुप्त असे आहे. शाम व शबल हे याचे दोन कुत्रे आहेत. पौराणिक मान्यतेप्रमाणे प्राण्यांना इहलोकातून परलोकांत नेणे, त्याच्या पाप पुण्याचा झाडा घेणे व त्यांना योग्य तो दंड देणे ही यमधर्माची कार्ये होत. सावित्री सत्यवानाच्या कथेत यमाचे कार्य व स्वरूप याचे चांगले चित्रण आहे.
    यमाची मुख्य लक्षणें म्हणजे त्याचे हातांतील दंड व पाश आणि वाहन महिष ही होत. विष्णुधर्मोत्तर पुराणाप्रमाणे दण्ड, खड्ग, त्रिशूल आणि अक्षमाला ही त्याची आयुधे आहेत. खजुराहो येथे त्याला चतुर्भुज दाखविला असून तेथे कुक्कुट, डमरू, कपाळ, घंटा, वगैरे आयुधं दिसतात पण त्यांना फारसा शास्त्रीय आधार उपलब्ध नाही. साधारणपणे यम हा द्विभुज व दंडधर दिसतो (चित्र १५९).
दक्षिणेच्या मार्कंडेयानुग्रह किंवा कालारि प्रतिमेत यम दिसतो.
निर्ऋति :-
    निर्ऋतिचे नांव ऋग्वेदांत आढळते पण पुढे त्याबद्दल फारशी माहिती मिळत नाही. हा राक्षस कुलातील असून कूर्मपुराणांने शंकराची एक विभूती असें याचे वर्णन केले आहे." आगमानुसार याचे मनुष्य हे वाहन आहे, पण विष्णुधर्मोला मात्र याचे वाहन गाढव होय असें सांगते." याच ग्रंथांप्रमाणे देवी, कृष्णांगी कृष्ण वदना आणि कृष्ण पाशा अरण निऋतीच्या चार बायका सांगितल्या आहे, पण खरे म्हणजे ही एकीचीच तीन विशेषणें दिसतात.
   निर्मतीच्या प्रतिमा खजुराहोत बऱ्याच मिळतात इतरत्र त्या अगदी मोजक्या आहेत. खजुराहो येथे झा दिक्पालांप्रमाणे हा ही चार हाताचाच दाखविला आहे व हातात खड्ग, नरमुंड, उमा, आहेत, सुरा, साप, खेटक पुस्तक, वगैरे वस्तू आपल्या रुचिप्रमाणे दिल्या आहेत. याची विकराल आणि सौम्य अपारू कमळ, सूची मुखे दिसतात.
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जवळच त्याचे वाहन मनुष्यही असतो, काही शिल्पात मनुष्याचे ऐवजी कुत्रा दिसतो.
दक्षिणेंतील नरवाहन निऋतीचे चित्र श्री. राव यांनी आपल्या ग्रंथात दिले आहे. 
वरुण :-
     वैदिक देवता संघांत इन्द्र-अग्नि-वरुण ही त्रयी प्रसिद्ध आहे. पौराणिक काळात जसे इन्द्र व अग्नीचे स्थान ढळले तिच गती वरुणाचीही झाली. आता तो फक्त 'यादसांपति' (जल जंतूंचा स्वामी) जसें नाव धारण करून पश्चिम दिशेचा अधिपती म्हणून राहिला आहे. नरसिंहपुराणांप्रमाणें अदितीचा मध्यमपुत्र वरुण हा बारा आदित्यांपैकी 'मध्यम' होय. पश्चिम समुद्राच्या पलीकडे असलेली विश्वावती याची नगरी आहे. आज वरुणांचा असा कोणताही संप्रदाय नसून त्याचे पूजन फक्त कर्मकांडापर्यंत सीमित राहिले आहे. त्यात देखील वरुणाची प्रतिमा घडवीत नसून कलशावर त्याचे आवाहन होते.
    पौराणिक परंपरेप्रमाणे पाश हे वरुणाचे मुख्य आयुध आणि मगर हे वाहन. त्याला ओळखण्याची हीच दोन प्रमुख चिन्हें होत. विष्णूधर्मोत्तरपुराणांप्रमाणे हा किंचित सुटलेला आणि मोत्यादिकांचे दागिनें घालणारा असावा.
    वरुणाच्या मध्यकाळातील प्रतिमाच जास्त मिळतात. लखनऊ संग्रहालयांत असलेला वरूण हा चतुर्भुज असून मगरांवर बसलेला आहे. पण चारी हात खंडित असल्यामुळे आयुधायिकांविषयी काहीच सांगता येत नाही (ल.सं.सं.जी. २०४). खजुराहो येथील अधिकांश वरुण प्रतिमा चतुर्भुज आहेत व त्यांत वरदाभय मुद्रंशिवाय कमल, पाश, पुस्तक, मकर, केतु, वगैरे वस्तू दिसतात. भारत कला भवन, वाराणसी येथील प्रतिमेंत (चित्र १६०) वर, पाश, कमळ व घट घेतलेला आहे.
   मुंबईच्या संग्रहालयांत वरुणांची एक सुंदर सपत्नीक प्रतिमा आहे (सं.सं. बीबीआएएस् ७५). याच्या उजव्या हातातील वस्तू स्पष्ट नाही, डावा मांडीवर आहे. हा मगरावर बसलेला आहे. त्याच मगरावर पाठीशी त्याची पत्नी उजव्या हातात आपल्या स्वामीचे आयुध म्हणजे पाश घेऊन बसली आहे (रे.चि. सदतीस ५).
वायू  :-
       वायव्य दिशेचा अधिपती वायू हा जीवनांच्या दृष्टीने अत्यंत महत्त्वाचा असला तरी प्रतिमाशास्त्र आणि उपासना या क्षेत्रात फारच किरकोळ आहे. पौराणिक काळात दुसरा पाण्डव भीम आणि रामदूत हनुमान यांचे जनकत्व वायुकडे गेले. आज वायूची मंदिरें किंवा त्याची उपासना कोठेही नाही.
    असें जरी असले तरी कुषाण काळात त्याची उपासना रूढ असावी, अन्यथा शिव, सूर्य, चंद्र, स्कंद, वगैरे देवांप्रमाणे त्याला नाण्यावर 'ओएडो' किंवा वात या नावाखाली स्थान मिळाले नसते. कुषाण नाण्यावर दिसणारा वायू हात उंच करून धावताना दिसतो. त्याचा चेहरा उग्र असून केस उभं असतात. या प्रतिमा हरिवंशातील वर्णनाची आठवण करवितात जेथें वायूला 'उत्तमभूत', 'अशरीरी', 'आकाश' आणि 'शीघ्रग' अशी नावें दिली आहे." गती हेच वायूचे खरे चित्रण होय.
    मूर्तीच्या क्षेत्रांत वायूचे अंकन मध्यकाळात व तेही दिक्पालांचे प्रसंगीच दिसते. खजुराहोत इतर दिक्पालांप्रमाणें वायूच्याही चौभुजी प्रतिमा आहेत व त्याच्या हातात ध्वज, पुस्तक, कमळाची कळी अक्षमाला व कमंडलू या वस्तू आपल्या रुचिप्रमाणें दिल्या आहेत. 
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कुबेर
      उत्तर दिशेचा दिक्पाल काही ठिकाणी सोमाला मानले आहे व काही ठिकाणी कुबेराला. कुबेर हा वैश्रवण वा नावानेही प्रसिद्ध आहे. विशेषतः, बौद्धांनी हे नाव जास्त उचलून धरले. पुलस्त्य ऋषीचा मुलगा विश्रवा आणि विश्रव्याचा वैश्रवण अशी याची व्युत्पत्ती आहे. वैश्रवण कुबेराचे नाव अथर्ववेदांत येते. हा मूळचा राक्षस, पण याने शंकराचे सख्यन्च मिळविले व त्याबरोबरच याला उत्तर दिशेचे अधिपत्य, अलका नांवाची नगरी आणि सर्व यक्षांचे स्वामित्व मिळाले. पहिल्यांदा हा लंकेत रहात असे पण देवसंस्कृतीकडे याचा कल असल्याने रावणाने याला तेथून हुसकावले व हा उत्तरेत अलकेत राहू लागला.
     बौद्धांनी दिक्पालांचे ठिकाणी जी चातु महाराजांची कल्पना केली आहे त्यांत उत्तरेचा स्वामी यक्षाचा राजा वैश्रवण हाच मानला आहे. कुबेर शब्दाचा अर्थ आहे 'कुसित बेरं शरीरं यस्य सः' वाईट अथवा बेडोल शरीराचा तो कुबेर!! यामुळे याच्या प्रतिमेची कल्पना करीत असतांना पोट सुटलेल्या स्थूलकाय पुरुषाची मूर्ती समोर आली असावी. रामायणांत तर त्याला 'एकाक्ष' ही म्हटले आहे. पण मूर्तीत मात्र त्याला तसे दाखवीत नाहीत. कुबेर हा धनपती आहे. तेव्हा त्याला शेटजीचे रूप देणे शास्त्रोचित ठरले असावे, कारण कुषाणकालीन कुबेर हा गळ्यांत कंठा, कानांत कुंडले व डोक्यावर पगडी घातलेल्या ढेबर पोट्या शेटा सारखा हातात मुंगसाची पिशवी (नकुल नकुलक= नकुली = पिशवी, कसा) घेतलेला दाखवितात. शेटजीना पायी चालणे कठिणच ते नेहमीच भोयांनी उचललेल्या पालखी व मेण्यात बसणार. कुबेराच्या वाच वैशिष्ट्यांमुळे त्याला नरवाहन अशी संज्ञा मिळाली. मध्यकालीन काही प्रतिमांत त्याला नरवाहनच दाखविला आहे.
     कुषाणकाळांत कुबेराच्या परंपरेत ग्रीकदेव बेकस यांच्या परंपरेचे मिश्रण झालेले दिसते. बेकस हा मद्याचा देव, अर्थात् धनपती कुबेराजवळ मद्याचे अनुष्ठान असणें मुळीच अस्वाभाविक नव्हते. कुबेराच्या काही कुषाणकालौर प्रतिमांत त्याचे हातात मद्याचा पेलाही असतो. (रे.चि. तेहतीस १८) थोडक्यात कुषाण कालीन कुबेर प्रतिमांची -मुख्यतः मथुरेत - खालील वैशिष्ट्ये सांगता येतील-
१) कुबेर हा लंबोदर व तुंदिल वपु असून त्याने डोक्यावर पागोटें किंवा तुरेदार मुगुट, कानांत कुंडले व गळ्यात कंठा घातलेला असतो.
२) पहिल्या प्रकारांत त्याचा उजवा हात अभय मुद्रेत असून डाव्यांत मुंगुसाच्या आकाराचा पैशांचा कसा असतो. दुसऱ्या व जास्त सामान्य प्रकारांत त्याच्या एका हातात मद्याचा पेला व दुसऱ्यांत कसा असतो (म.सं.सी. २५, २६, ३१ वगैरे).
३) कुबेराच्या बायकोचे नांव भद्रा. बौद्ध परिसरांत ही हारिती म्हणून ओळखली जाते. काही प्रतिमांत ही कुबेराबरोबर बसलेली असते. तिच्या एका हातात कमळ व मांडीवर मूल असते.
४) कुराबरोबर तस्वीरले अंकन सक्तिसांगतच होय. काही शिल्पात (म. सं. सं. सी. ३०) कुबेर, लक्ष्मी व भा एकाच ओळीत बसलेले दिसतात. येथे लक्ष्मीच्या हातात कमळ व म.स.सी. ३०) कुबेरचा पेला दिसतो
५) एका प्रतिमेत कुबेर संगीताचाही रस घेताना दिसतो (म.सं.सं. १८.१५३८):
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६) कुबेराचे कोणत्याही प्रकाराचें वाहन दिसत नाही. थोडक्यात म्हणजे कुषाण काळचा मथुरेचा कुबेर हा विलासी धनिकाचे खरे चित्र उभे करतो.
     कुबेराचे पूजन व मंदिरें पतंजलीच्या काळांपासून म्हणजे कुषाणांच्या पूर्वी पासूनच अस्तित्वांत होती." ललितविस्तराच्या यादीत पूजनीय देवतांत वैश्रवणांचे नांव आहेच व मथुरेत प्रचुर संख्येत मिळणाऱ्या त्याच्या प्रतिमाही या गोष्टीची साक्ष देतात.
      गुप्तकाळांत मथुराकलेंत कुबेराच्या प्रतिमांचा आकडा रोडावलेला दिसतो, पण ज्या एकट्या (म.सं.सं. १५.१११८) किंवा सपत्नीक (म.सं.सं. १५.९९१) प्रतिमा आहेत त्यांची घडण जुन्या धर्तीवरच झालेली आहे. सुमारे सातव्या शतकांतील कुबेराची एक सुंदर प्रतिमा अल्हाबादच्या पभोसा गांवातून मिळाली आहे (ल.सं.सं.जी ५६, चित्र - १६१). पूर्वी प्रमाणेच येथे ही तो नरवाहन नसून त्याचे हातात एक वाटी आणि मुंगुसाची पिशवी आहेत. कुषाणमूर्तीतील मद्यचषकाची जागा येथे वाटीने घेतली आहे. मूर्तिशास्त्राच्या दृष्टीने महत्त्वाची नवी वस्तू म्हणजे कुबेराच्या पायाखाली ठेवलेले दोन घट होत. हे घट तोंडापर्यंत भरलेले असून कुबेराजवळच्या निधीचे प्रातिनिध्य करतात. ५०
     येथेच बौद्ध कुबेर, ज्याला जंभल असे म्हणतात, आणि ब्राह्मण धर्माचा कुबेर यातील फरक लक्षात घेणे आवश्यक आहे, व तो फरक घागरी ठेवण्याच्या पद्धतींतच आहे. जंभलाच्या पायाजवळील घागर लवंडलेली असते, व तिच्यातून रत्नादि बाहेर पडत असतात, या उलट ब्राह्मण कुबेराच्या पायांजवळ भरलेल्या घागरी सरळ ठेवलेल्या असतात. मुंगुसाची पिशवी दोघांच्याही जवळ असते.
    मध्यकालीन कलेंत कुबेराच्या द्विभुज प्रतिमा तर मिळतातच, पण त्याबरोबर चतुर्भुज प्रतिमा दिसू लागतात. द्विभुज प्रतिमांत तो बहुतेक पिशवी व पात्र घेतलेला असतो (अल्हाबाद कॅट. सं. २५६). त्यांच्या आजुबाजूस दोन सेविकाही दाखवितात, पैकी एकीच्या हातात मद्याचा घट असतो तर कुठे ती कुबेराच्या पेल्यात मद्य ओतीत असते. (रे.चि. अडतीस १) खजुराहोकलेत चतुर्भुज प्रतिमा बऱ्याच दिसतात. येथे पिशवी व पेल्या शिवाय कमळ, गदा, अक्षमाला, फळ, पुस्तक, वगैरे वस्तूही कुबेराजवळ आढळतात. ५२ खजुराहो येथे भद्रा किंवा ऋद्धी व कुबेर याची आलिंगन प्रतिमाही मिळते. एका दुसऱ्या मूर्तीत कुबेराची परिवार देवता म्हणून हाथ जोडून बसलेला मानवाकार हत्ती दिसतो. ते त्यांचे वाहन असणे संभव आहे. तसेच घागरीच्या बाबतींतही काही शिल्पात ब्राह्मण व बौद्ध परंपरांचे संमिश्रण आहे. एका शिल्पांत कुबेराचे पायाजवळ तीन घागरी ठेवलेल्या मिळतात. पैकी दोन उभ्या आहेत आणि एक लवंडलेली दिसते. लवंडलेल्या घागरींचा प्रकार शक्ती गणेशाच्या काही मूर्तीत ही दिसतो (राणी दुर्गावती संग्रहालय, जबलपुर, सं. १३३).
   दक्षिणेंत उत्तरेच्या मानाने कुबेराचे अंकन कमी दिसते. ऐहोळे येथील कलेत दिक्पालांच्या ओळीत तो दिसतो, पण येथे त्याचे वाहन घोडा आहे. 
कुबेर, सूर्य, कुबेरचंद्र : -
खजुराहो व काही इतर ठिकाणी कुबेर आणि सूर्य यांच्या संयुक्त प्रतिमा मिळतात. चार हाती देवाच्या हातांत कमळे आणि पिशवी (नकुलक) दिसते, त्याचप्रमाणे राजस्थान मधून कुबेर व चंद्राच्या संयुक्त प्रतिमा समोर आल्या आहेत. मेनाल येथील शिल्पांत देव चतुर्भुज आहे, पण जहाजपुर येथून मिळालेल्या मूर्तीत तो द्विभुज आहे मस्तकामागे चंद्रकोर आणि हातांत पिशवी आहे.
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- आर.सी. अग्रवाल, 'चंद्रकुबेर व सूर्य कुबेर प्रतिमाएँ', एक असाधारण अभिव्यक्ति', वैचारिकी, भारतीय विद्या मंदिर शोध संस्थान, बीकानेर. २४.३, अक्टुबर-दिसंबर, २००८, पृ.२८.
 
 
 मुख्य मंदीराच्या बाह्य अंगावर सर्वात खाली पीठ, आम्रभंजीकांनी अलंकृत केलेला वेदीबंध, भिंतीच्या भागावर तीन जंघा पट्ट आणि कपोतालीच्या वर लतिन शिखर आहे. कोपर्यावर असणार्या शिखरावर भुमी आमलक असून मुख्य मंदीराच्या शिखरावर असे सहा भुमीआमलक दिसतात. पीठावर जाड्यकुंभ, अंतरपत्र, कणी आणि त्यावर वेदीबंध असे थर आहेत. गर्भगृहाच्या मागील हरिहरपितामहार्क तर उरलेल्या दोन भद्रावर नृत्य करणारा भैरव आणि बसलेला दशभुज सदाशिव, कोपर्यावरील पट्टावर दिकपाल आणि वसु दाखवले आहेत. तसेच कोण आणि भद्र यांच्यामधील भागात अप्सरा दाखवल्या आहेत. 

 याशिवाय इथे आणखी एक आवर्जून बघण्यासारखी गोष्ट म्हणजे व्याल. व्याल म्हणजे संयुक्त प्राणी ( hybrid) एका प्राण्याचे धड आणि दुसर्या प्राण्याचे शीर.अधीक गुण अथवा ताकद दर्शविण्यासाठी असा प्रयोग केला आहे. हे व्याल विवीध प्रकारचे आहेत.जसे नरव्याल, गजव्याल, शुकव्याल वगैरे. खजुराहोच्या मंदीरातही असे व्याल आहेत. बहुतेक संस्कृतीत कोणत्या ना कोणत्या प्रकारचे व्याल दिसतातच. जसे इजिप्तमध्ये जगप्रसिध्द स्किंफ व्यालच आहे. या मंदिरावर इतके वेगवेगळ्या प्रकारचे व्याल दाखविले आहेत कि प्रत्येक व्याल वेगळ्या प्रकारचा आणि अद्वितीय आहे. कदाचित शिल्पकाराची कल्पनाशक्ती आटली तेव्हा मधूनमधून साधू दाखवले आहेत. 

ईशान सपत्निक


ईशान सपत्निक .पत्नीच्या हातात कमलनाल आहे.
 
ती
पुर्व दिशेचा अधिपती इंद्र,उजव्या पाठीमागच्या हातात वज्र आहे.सपत्निक शचि सह.वाहन हत्ती पायाशी दाखवले आहे.
एकटा ईशान-त्रिशूल,अक्षमाला,त्रिमुखी नाग,कमंडलू.
जटामुकुट, पायाशी बैल.
 
 हेत.


      देवदेवतांची शिल्प रौद्र आणि शांत मुद्रेत आहेत. येथे पार्वतीही दिसते आणि चंद्रीकाही दिसते. रुद्रही दिसतो आणि इश्वरही गरजेप्रमाणे रुप धारण करतो. हेच शिल्पकारांना सांगायचे असेल. प्रमुख देवतांची शिल्प देवकोष्टात दिसतात. प्रत्येक देवदेवतेच्या पायाशी वाहन कोरले आहे. त्यामुळे देवाची ओळख सहज पटते. मंदीराच्या प्रवेशद्वाराशी चित्र प्रकारची ( free standing ) दोन शिल्प आहेत.

नाग कथा :-
     सोख (मथुरा) येथून मिळालेल्या एका कुषाण कालीन शिलापट्टावर एक नागकथेचे सुंदर दृश्य कोरले आहे. मधोमध नागराज आणि त्याची राणी उच्चासन वर बसलेले आहेत. मागे उजवीकडे छत्र चामर घेतलेल्या नागिणी आणि नाग सेवक आहेत. डावीकडे अर्थात् राजा राणीच्या समोर सात जण भेटीला आलेले दिसतात. समोरच्या माणसाच्या हातांत एक लांब वस्त्राचे टोक आहे व त्याचे दुसरे टोक नागराजाच्या डाव्या हातांपर्यंत आहे. इतर मंडळीमध्ये साताशिवाय चार मुलें ही आहेत. या संपूर्ण दृश्याची पार्श्वभूमी अजून उकललेली नाही. (रे.चि.उ. ३).
    Herbert Hartel, Excavations at Sonkh, Berlin 1993, illustration on p. 420, discussion on pp. 429-30
 
 

नाग पंचमी - कला आणि सांस्कृतिक संदर्भ



भारतीय लोक धर्मामध्ये नाग पूजनाची परंपरा प्राचीन काळापासून लोकप्रिय असल्याचे दिसून येते. परिणाम स्वरूप भारताच्या विविध भागात नागाची अनेक स्वतंत्र मूर्ती पाहावयास मिळतात. भारतातील कुठल्याही शहरात अथवा लहानातील लहान खेड्यात गेल्यास नाग शिल्पे दृष्टीस पडणार नाहीत असे गाव मिळणे विरळच. एखादे मंदिर, झाड, तलावाच्या शेजारी किंवा घाटावर एका सपाट शिळेवर वळसे दार शरीर असलेल्या नागांचे शिल्प हमखास असतेच. त्यावर कधी हळद, कुंकू तर कधी शेंदूर लावलेले दिसते. काही ठिकाणी 'नाग युगल' एकमेकांना वेटोळे घातलेली शिल्पे पाहावयास मिळतात. नागांशी संबंधित असंख्य कथा या देशात अस्तित्वात आहेत. आदिवासी, अवैदिक, वैदिक समाजात वेगवेगळ्या कथांची गुंफण असून अशा कथातून भारतीय संस्कृती भक्कमपणे उभी आहे. नागाशी संबंधित असलेले अनेक शिल्पे असून सूर्य व नागाचे अनन्य संबंध सर्वश्रुत आहेतच. लोकजीवनातील नागांच्या महात्म्या मुळेच हिंदू, जैन आणि बौद्ध धर्मामध्ये ही उपदेवतेच्या रुपाने नागांना मान्यता मिळालेली दिसते. विविध धर्मातील प्रमुख देवते सोबत त्यांचा संबंध जोडलेला दिसून येतो. असे मानले जाते की नागांची उत्पत्ति श्रावण मास मधील शुक्ल पक्षातील पंचमीच्या दिवशी झालेली आहे. संपूर्ण देशात या दिवशी नागाची विधिवत पूजा होत असते. यास 'नागपंचमी' या नावाने ओळखले जाते. बंगालमध्ये नागदेवी 'मनसा' तिचे पूजनही मोठ्या उत्साहाने साजरे केली जाते. कश्मीरी ग्रंथ 'नील मत पुराण' यात विविध ठिकाणी जवळपास पाचशे वेळेस नागदेवतेचा उल्लेख आलेला आहे.

 प्राचीन काळापासून भारत निसर्गपूजक देश असल्याने सूर्य पूजेचे उल्लेख ऋग्वेदात आलेली आहेत. सादृश्यधिष्टीत कल्पनेच्या जोरावर नाग आणि सूर्याच्या अनेक कथा गुंफण्यात आलेल्या आहेत. नाग हा सूर्या प्रमाणेच गायब होतो, सूर्या प्रमाणेच विद्युल्लता नागाच्या ठायी दिसते, सूर्याची दाहकता व नागाचे विष यांची तुलना, सूर्याचे तेज व नागाचा लखलखीतपणा यातील साम्यस्थळे पाहून नाग आणि सूर्य यांचे एकत्रीकरण पौराणिक कथेतून शिल्पकलेत उतरलेले दिसते. त्यासोबतच नागाचा लिंग सदृश्य आकारही त्यास लैंगिक प्रतीक बहाल करते.

 नाग पूजेची सुरुवात सर्वप्रथम इजिप्तमध्ये झाली असे मत सी. एफ. ओल्डहॅम यांनी आपल्या The sun and the Serpent a contribution to the History of Serpent Worship या ग्रंथात मांडले आहे. तर ग्राफिटन एलीएट स्मिथ यांनी, 'Geographical Distribution of the Practice of Mummification.' यात संशोधनपर अभ्यास करताना सूर्य पूजा आणि सर्प पूजा यांचा जन्म ईजिप्तमध्ये झाला असल्याचे सूचित केले आहे. जगात जिथे जिथे या पूजा केल्या जातात. त्या इजिपशीयन प्रभावातून केल्या जातात असेही ते मानतात. परंतु या मताला लायन कॅप यांनी मात्र विरोध दर्शविला आहे. ते Lost continent's the Atlantis the me in History science and literature या ग्रंथात असे म्हणतात, "संस्कृतीचे एकच एक केंद्र असते व तिथून ती संस्कृती जगात प्रसरण पावते असे समजणे योग्य नाही. वास्तविक संस्कृतीचे विशेष जगात अन्यत्र पसरत असतात. म्हणून इजीप्तच्या लोकांना किंवा अन्य कोणत्याही लोकांना अशी श्रेय देणे योग्य होणार नाही."

        ll भीती मधून नाग पूजा ll

 जगभरातील सर्वच प्राथमिक धर्मामध्ये व आदिम समाजांमध्ये नागपूजा प्रचलित असल्याचे आढळते. भारतात सर्वत्र नागपूजा प्रचलित आहे. वेदपूर्व काळापासून भारतात नागपूजा प्रचारात होती. मोहोनजोदाडो येथील उत्खननामध्ये सुद्धा नाग मूर्ती आढळल्या आहेत. नाग विषारी असल्यामुळे मनुष्याला त्याची फार भीती वाटते. ऋग्वेदामध्ये नागाचा उल्लेख 'अहि' या शब्दाने केला असून तेथे त्याची क्रूर, घातकी व भयंकर असे वर्णन केलेली आहेत. नागाची स्तुती करून त्याला वश करून घेतले तर त्यापासून भय राहणार नाही. या कल्पनेने यजुर्वेदात नाग स्तुतीपर मंत्र आढळतात. नागपूजा नागापासून वाटणाऱ्या भयातून सुरू झाली असावी. शतपथ ब्राह्मणात नाग माता कद्रू हिला पृथ्वीचे प्रतीक समजून पूज्य मानले आहे. सर्प वेध या नावाचा अथर्ववेदाचा एक उपवेद आहे. त्यात सर्पाचे विष उतरविण्यासाठी, त्यांना वश करण्यासाठी अनेक मंत्र सांगितले आहेत. करकोटक नागाचे स्मरण करणे हे पापनाशक आहे असे मानले जाते. नागांना संतुष्ट करण्यासाठी सर्पबळी , नागबळी इत्यादी विधी गृह्यसूत्र मध्ये सांगितलेले आहेत. अशाप्रकारे नागापासून आपले संरक्षण व्हावे, या उद्देशाने प्राचीन काळापासून नागपूजा भारतात प्रचारात आली आहे.

 मराठीत नागशीला म्हणून संबोधन केल्या जाणाऱ्या या शिला सारा भारत नागपूजक होता हे सिद्ध करतात. नागाला विषारी दंश असल्याने मानवजातीला त्याची प्रारंभी पासूनच भीती होती. त्याचे हे अस्त्र किती घातक आहे. याची प्रचिती सातत्याने मानवाने घेतलेली असल्याने तो या नागां पासून दूर राहात असे. भीतीतून आकर्षणाचा जन्म झाला. या सर्प योनीची भीती इतकी जबरदस्त होती की, त्यातून तो नागपूजेकडे वळला. नागाचे जमीन आणि पाण्यात ही वास्तव्य, कात टाकून द्विजत्व प्राप्त करून घेणे, त्याच्या द्विजिव्हा, हस्त - पाद - पंख विरहित शरीर, आश्चर्यकारक संभोग, अप्रतिम नागफना, त्याचा फुत्कार, त्याची भेदक नजर या सर्वांमुळे नाग मानवजातीत कुतूहल आणि आदराचा विषय बनला व त्यातूनच वेगवेगळ्या समजुती प्रचलित होऊन नागपूजा अस्तित्वात आली असावी. लोक धर्मात नागांचा उल्लेख अर्धमानव रूप आणि इच्छेनुसार कोणतेही रूप धारण करणारा अशी ही तयार झाली. लोकपरंपरेत नाग पूजनाची असलेल्या प्रबळ लोकप्रियते मुळे नाग शिव, बौद्ध आणि जैन तीर्थनकार सारख्या महत्वपूर्ण देवते सोबत संबंध जोडला गेला. ही प्रक्रिया शुंग - कुशान काळापर्यंत पूर्ण झाली होती. सृष्टीच्या संहार कार्याशी संबंधित म्हणूनच शिवाच्या गळ्यात तसेच हातातील भूषणाच्या रूपात नागाला विशिष्ट स्थान प्राप्त झाले. शिवा सोबत असलेला नाग हा काल किंवा मृत्यूचा सूचक म्हणून एक चेतावनीच्या रूपाने पाहता येते. बौद्ध परंपरेत नंद, उपनंद् आणि मुचलिंद या नागांचा उल्लेख येतो. तर जैन परंपरेत सुपार्श्वनाथ आणि पार्श्वनाथ यांचे लांछन नाग आहे. पार्श्वनाथाची यक्ष, यक्षिणी हे सुद्धा नागराज धरणेद्र आणि त्याची राणी पद्मावती यांच्या रूपाने आहेत. मथुरा, भरहुत, सांची आणि अमरावती येथे शुँग, कुषाण, सातवाहनकालीन बौद्ध स्तूपावर नागांचे प्रचुर अंकन मिळते.

 नाग पूजेचा प्रारंभ नेमका कधी झाला याचा निश्चित पुरावा अद्याप सापडलेला नाही. नाग पूजा निर्मिती पाठीमागे मनोवैज्ञानिक भीती, पौराणिक साहित्यातील उल्लेख तर कुठे जनजातीय संस्कृती आणि तांत्रिक प्रतिकाच्या रूपातून तर कुठे भौगोलिक परिस्थितीच्या कारणाने भारतात नागपूजा अस्तित्वात आली असावी. लोक धर्मात ज्या स्थानीय देव- देवता असतात. त्यात नागाने आपले अस्तित्व नेहमीच टिकून ठेवले आहे. भारतीय तंत्रशास्त्रात नागाचे विशिष्ट महत्त्व असून योगातील 'कुंडलिनी' शक्तीचे प्रतीकही नागाला समजले जाते. नाग पूजेचे धागेदोरे शोधत असताना एक बाब निश्चितपणे जाणवते ती ही की, नागाची पूजा हा भारतीयांचा आत्मा असावा. उत्तरेपासून दक्षिणेपर्यंत, पूर्वेकडून पश्चिमे पर्यंत, मैदान असो की उंच पर्वते, लोक परंपरेचे आद्यरूप एक सारखीच दिसून येतात. मानवी हतबलता आणि प्राण्यांमध्ये असलेलं बल यामुळे प्राण्या मधल्या असलेल्या अज्ञात शक्तीला घाबरून त्याची पूजा अर्चना सुरू झाली असावी असे वाटते. नागपूजा कदाचित अतिप्राचीन पूजेमध्ये येत नसावी. तरी नाग पूजेचे पदचिन्ह जगातल्या सर्वच संस्कृतीत आणि कानाकोप-यात पाहायला मिळतात. आणि भारतात तर मूर्ती पूजेच्या स्वरूपात नाग पूजेचे विशेष महत्त्व आहे. भारतीय साहित्यामध्ये तीन प्रकारचे स्वरूप पाहायला मिळतात.

1. देवता गंधर्व अप्सरा हे सात्विक प्रकारात येतात.

2. यक्ष, किन्नर आणि दैत्य हे राजस प्रकारांमध्ये मोडतात

3. राक्षस, नाग, प्रेत हे तामस प्रकारांमध्ये मानले जातात.

भारतीय साहित्यात नाग हा शब्दप्रयोग देवत्व प्राप्त झालेल्या सापांसाठी वापरला असावा असे वाटते. श्रीमद् भगवद् गीतेतील दहाव्या अध्यायात 28 आणि 29 व्या श्लोका मध्ये सर्प आणि नाग असे वेगवेगळे शब्द आलेले आहेत. काही जण अनेक फणा असलेल्यांना नाग, तर एक फणा असलेला सर्प असे मांनले आहे. महाभारतातील आस्तिक उपाख्याना नुसार हे समानार्थी शब्द असावेत असे वाटते. नाग आणि सर्प यात विषधर आणि विषहीन असाही भेद असावा असे काही जणांचे म्हणणे आहे. नागवंशी हा शब्दप्रयोग त्या राजवंश यांनी केला असावा जे स्वतःचा वंश नाग माता -  पित्यापासून निर्मित मानतात. किंवा जे नागपूजेशी संबंधित आहेत त्यांनाही नाग लोक म्हणत असावेत. काहीही असले तरी शेवटी भारतीय राजनेतिक इतिहासात नागांचे महत्त्वपूर्ण योगदान राहिलेले आहे.

          II नाग पूजा स्वरूप II 

 भारतात कोब्रा सापाला नाग मानले जाते. पौराणिक कथेनुसार नाग सामान्य सर्प जाती नसली तरी आज व्यवहारिक रूपाने कोब्रालाच नाग मानले जाते. उत्तर भारतात काही ठिकाणी नाग म्हणजे पूर्वज असे मानले जातात. नागाचे रूप घेऊन ते आपल्या घर परिवाराची सुरक्षा करीत असतात. नागपंचमीच्या दिवशी घरातल्या कुठल्याही एका कोपऱ्यात वाटीभर दूध ठेवले जाते. यासोबतच काही भागात पुत्र प्राप्ती नंतर बाळाचे जावळ काढल्यानंतर घरात किंवा घराच्या बाहेर पाच सर्पाकृती काढल्या जातात. दुसऱ्या पुत्र प्राप्ति नंतरच हे प्रतीक मिटवून नवीन प्रतीके निर्माण केली जातात. राजस्थानातील काही भागात ऋषीपंचमीच्या दिवशीच नाग पूजा केली जाते. गढवाल लोक परंपरेनुसार अलकनंदा नदीच्या परिसरात नाग वास्तव्य करतात, असे मानतात. इलाहाबादच्या दारागंज मध्ये वासुकी नागाचे प्रसिद्ध मंदिर आहे. प्रतिवर्ष नागपंचमीला येथे यात्रा भरते. बिहारमधील नालंदा परिसरात अनेक नागमूर्ती आढळून आले आहेत. इथेच चतुर्मुखी नागफणा असलेली स्त्री मूर्ती मिळाली आहे. तामिळनाडूमध्ये शेष नागाची पूजा केली जाते. नागपंचमी पश्चात जन्मलेल्या मुला, मुलींची नावे नागराज किंवा नागमणी असे ठेवली जातात. काठीयावड मध्येही मंदिरे आहेत. औरंगाबाद जवळील पैठण ही क्षेत्रही नाग वंशाची संबंधित आहे. ब्राह्मण कन्या गोदावरी नदीत स्नानाला गेल्यावर शेषनाग तिच्या सौंदर्यावर मुग्ध झाला. त्यांच्या प्रेमाचा परिणाम म्हणजे राजा शालिवाहन चा जन्म होय. नाग पूजेच्या संदर्भाने बत्तीस शिराळा या गावी घडलेली घटना महाराष्ट्रात सर्वदूर प्रसिद्ध आहे. नाग पंचमीला शेतात नांगर फिरविल्याने नागाची पिल्ले दगावली. त्यामुळे क्रोधित नागिन संबंधिताच्या घरातील सर्वांनाच दंश केला. सासरी असलेल्या मुलीला ही दंश करण्यासाठी ती गेली असता. ती नाग पूजेत भक्तिभावाने मग्न असलेली दिसून आली. तेव्हा नागीनीने प्रसन्न होऊन सर्वांना जिवंत केले. नागपंचमीला महाराष्ट्रात मुलीला सासरी ठेवत नाहीत. लोकपरंपरेत असे म्हटले जाते की,

आता नागपंचमीच I

नाग आल्याची खेळायला I

मी ग भैय्याला सांगयितु I

बारा सणाला नेऊ नको I

पंचमीला र ठेवू नको I 

तर

 पंचमीचा सण आला डोळे माझे ओले

 बांधिले ग सख्यांनी झाडाला हिंदोळे ( तारा भवाळकर, लोक संचित )

हे सारे नाग पंचमीचे महत्व अधोरेखित करतात.

 ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, गृह्यसूत्र, रामायण, महाभारत, मैत्रेयी सहिता आणि पुराणात नागांचे अनेक उल्लेख आढळतात. ते ही वेगवेगळ्या समानार्थी शब्दाने. नाग पूजेच्या  संदर्भाने भारतीय साहित्यात विविध विधी सांगितलेल्या आहेत. अथर्ववेदात नागाला चारी दिशांचा दिक्पाल म्हटलेले आहे. ललितविस्तार या बौद्ध ग्रंथात नागाला लोकपाल रुपात मान्यता दिलेली दिसते. नागराजा तक्षकाने स्वेच्छेने राजा परिक्षितला दंश केला नव्हता. तर ऋषीच्या शापाला पूर्ण करण्यासाठी तो दंश होता. असे नारदाने परीक्षित पुत्र जनमेंजय यास सांगून सर्पसत्र किंवा नागयज्ञ बंद करावयास लावला. त्यावेळी राजा जन्मेजय याने प्रायश्चित करण्याची तयारी दर्शविली. तेव्हा नारद मुनी ने सांगितले की, " सामूहिक रुपाने तुझ्या प्रजेने प्रतिवर्ष नागांची पूजा करावयास हवी. " असे म्हणतात की तेव्हापासून नागपंचमीला सुरुवात झाली. नाग संबंधी अनेक मिथके आपल्याला पाहावयास मिळतात. पंचतंत्राच्या कथित नागा संबंधी भरपूर लिखाण आढळून येते. नल दमयंती कथेत ही नल राजाने नागाची केलेली प्राण रक्षा आणि त्यातून नागाने केलेले सहकार्य वाचावयास मिळते.

         ll नाग नगरे ll

 भारताचे अतिशय प्राचीन नगर जे वायव्य सीमेवर भारताच्या प्रवेशद्वारावर वसलेले नगर म्हणजे तक्षशिला होय. जगातील विद्या अभ्यासाचं प्राचीनतम केंद्र, भारतीय लोक परंपरेनुसार ही नागराजा तक्षकाची नगरी. उत्तर प्रदेशातील अहिच्छत्र नगरी ही परंपरेने नागांची जोडल्या जाते. तिचे नावच अही म्हणजे नाग. हा तिचा नागाची संबंध सांगणारे आहे. मध्य प्रदेशात गोलियर जवळ हे शहर होते. प्राचीन पद्मावती नगरी ही पुराण प्रसिद्ध नगर. पुराणात येथील नागवंशी राज्यांची विस्तृत वर्णने आहेत. येथील नागसेन नामक राजाचा उल्लेख सम्राट हर्षवर्धन याचा राजकवी बाणभट्ट याने आपल्या हर्षचरित्रात केला आहे. नागद, नागपूर, नागापूर, नागग्राम, नागठाणा, नाग हल्ली, नागुर, नागझरी अशी नाग नामक गावे भारतात सर्व प्रांतात आहेत. हल्लीचे पद्म पवया हे ग्वालियर जवळ आहे. पूर्वी पद्मावती या नावाने प्रसिद्ध होते. येथे वृषनाग, भीम नाग, स्कंद नाग, वसू नाग, व्याग्र नाग आदी राजांची नाणी सापडली आहेत.

          ll नाग वंश ll 

 नाग वंशाच्या उत्पत्तीच्या अनेक कथा तील ही एक कथा आहे की, कश्यप ऋषी ला कद्रू व वनिता नावाच्या पत्नी होत्या. कद्रूच्या पोटी जी संतान झाली ती नाग या नावाने प्रसिद्ध झाली. अनेक पुराणांमध्ये थोड्याफार फरकाने आली आहे. वासूकी हा नाग राजा होता त्याची राजधानी भोगावती नगरी होती. या वासुकी नंतर देवदत्त पर्यंत अनेक महान नागराजे होऊन गेले. या नागांना विविध पुराणानुसार एक, पाच किंवा सात पासून हजार पर्यंत फणा असल्याचा उल्लेख मिळतो. अनंत हा सहस्त्र फणा असलेला नाग होता. त्यावर विष्णू झोपलेला आहे असे मानतात. विष्णू त्यावर झोपला म्हणजे नागा वर विष्णूने वर्चस्व निर्माण केले असेही मानले जाते. तर नाग शिवाच्या गळ्यात असल्याने नाग लोकांचा आणि शिवाचा अनन्यसाधारण संबंध स्पष्ट होतो. नंदीवर शिव प्रसन्न झाल्यावर नंदीचा सन्मान करण्यासाठी आलेल्या नाग मंडळींची यादी वराहा पूराणात दिली आहे. नागांच्या संबंधाने सर्वात विस्तृत वर्णन माया शिल्प या ग्रंथामध्ये उपलब्ध होते. या ग्रंथात वासुकि, तक्षक, कारकोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल आणि कुलिक या सात प्रमुख नागांच्या लक्षणांचे वेगवेगळे उल्लेख केलेले आहेत. तक्षकाच्या मस्तकावर स्वस्तिक आणि महापद्म याच्या मस्तकावर त्रिशुल असायला हवा. अंशुमदभेदागम मध्ये चतुर्भुज आणि त्रिनेत्र नाग देवतांचे उल्लेख आढळून येतात.

 धार्मिक ग्रंथानुसार, कुण्या व्यक्तीच्या कुंडलीमध्ये कालसर्प दोष असल्यास नागपंचमीच्या दिवशी भगवान शिव आणि नागदेवतेची पूजा करावी. असा उल्लेख आढळून येतो. या अर्थी नाग ही देवता सामाजिक, धार्मिक आणि ज्योतिषीय दृष्टिकोनातूनही रूढ झाली म्हणावी लागेल. हिंदू धर्म मान्यतेनुसार पृथ्वी शेषनागाच्या फण्यावर विराजमान आहे. पौराणिक मान्यतेनुसार असलेल्या प्रमुख नागांचा तपशील पुढील प्रमाणे -

 शेष - अनंत या नावानेही शेष नागाचा ओळखले जाते. शेषनागाने गंधमादन पर्वतावर तपस्या केल्यानंतर ब्रह्माजीच्या वरदानाने पृथ्वीचा भार सांभाळण्याचे काम त्याच्याकडे सोपविण्यात आले. हरिवंश पुराणानुसार ब्रह्मदेवाने वासुकीला नागांचा राजा, तक्षकाला सापांचा राजा आणि शेषाला सर्वच विषदंती प्राण्यांचा राजा बनविला. यावरून शेषनागाचे महत्त्व सिद्ध होते. धार्मिक ग्रंथानुसार लक्ष्मण आणि बलराम शेषनागाचे अवतार रूप आहेत. हाच शेषनाग विष्णू चा सेवक म्हणून क्षीरसागरा मध्ये आहे. विष्णू विश्राम मुद्रेत शेष नागच्या वेटोळ्यावर झोपलेले असतात. श्रीकृष्ण जन्म समयी वासुदेव कृष्णाला यमुना पार करत असताना प्रचंड वर्षा होत होती. त्यावेळी शेषनागाने आपला फणा कृष्णा वर धरून यमुना पार करण्यास मदत केली होती.

 वासुकी - हा समस्त नागांचा राजा. वासुकी हा शिवाच्या कंठास लपेटलेला असतो असेही म्हणतात. समुद्रमंथनाच्या वेळी दोरीच्या रूपाने वासुकीचा उपयोग केला गेला होता. शिवाच्या त्रिपुरांतक अवतारात शिवाने एकाच बाणात असुरांची तीन पुरे नष्ट केली होती. त्यावेळी धनुष्यबाणाची प्रत्येंचा वासुकी बनला होता. कथासरित्सागर या ग्रंथानुसार लता देशाचा राजा वासुकीच्या संबंधाने आदर भाव प्रकट करण्यासाठी प्रति वर्ष उत्सव करीत असे. 

 तक्षक - शृंगी ऋषीच्या शापाची अंमलबजावणी करण्यासाठी तक्षक नागाने राजा परीक्षिताला डसले होते. त्यामुळे तक्षकाचा बदला घेण्यासाठी परीक्षित पुत्र जनमेंजयने सर्प यज्ञ केला होता. तेव्हा सर्व साप यज्ञात येऊन पडू लागले. त्यावेळी आस्तिक मुनीने तक्षकाची रक्षा केली. तक्षकच शिवाच्या गळ्यात असलेला नाग आहे असे ही मानले जाते. तक्षकाचा पुत्र अश्वसेन पाताळात राहत असे. खांडव वन अग्निकांड पासून तो अर्जुनाचा विरोधी होता. त्यामुळे कुरुक्षेत्र रणभूमीवर अश्वसेन कौरवांच्या बाजूने सामील झाला होता. अथर्व वेदा नुसार तक्षक हा सर्वाधिक विष असलेला नाग होता असे म्हटले आहे. कौशिक सूत्रानुसार गृहरक्षे साठी तक्षका समोर बळी द्यावा असे म्हटले आहे. असे म्हटले जाते की, तक्षशिला येथे तक्षक संप्रदायाचा प्रभाव होता. मध्यप्रदेशात तक्षकेश्वर या नावाने इंदोर जवळ नवाली गावात एक मंदिर आहे.

 करकोटक - यास शिवाचा गण असेही म्हणतात. हरिवंश पुराणात या नागाचा विशेष उल्लेख मिळतो. नल-दमयंती कथेतही करकोटक येतो. आपल्या आईच्या शापातून मुक्त होण्यासाठी महाकाल वनात शिवलिंगाची पूजा केली होती.

 कालिया - याचा निवास आपल्या कुटुंबासह यमुना नदी मध्ये होता. त्यामुळे यमुने मध्ये विष पसरले होते. कृष्णाने कालियाला युद्ध करून यमुना सोडण्यास भाग पाडले.

 सिंधू संस्कृतीत नागांची असलेली शिक्के, भरहुत सांची आणि अमरावती येथील नागांचे शिल्पांकन यासोबतच पुढे गुप्त काळामध्ये नाग मूर्तीचे तीन प्रकारे शिल्पांकन व्हायला सुरुवात झाली.

1) मानवाकार मूर्ती ( डोक्यावर नागफणा )

2) मानव सर्प विग्रह ( कमरेच्या वर मानव रूप )

3) पूर्ण नाग रूप.

महाराष्ट्रातील काही वंशाची नावे 'शेष' अशी आहेत. प्रख्यात शिंदे घराणे हेही नागपूजकच होते. कर्नाटक, महाराष्ट्रात अनेक शिंदे घराणे आहेत. राष्ट्रकूट नृपती गोविंद तृतीय याच्या नेसरी ताम्रपटात त्याचा सामंत नाग हस्ती याचा उल्लेख येतो. कर्नाटक राज्यातील चंद्रवल्ली, बागलकोट, भैरवमट्टी, हरिहर, मात्रहल्ली येथील शिलालेखात नागवंशी राज्यांचे अनेक उल्लेख येतात. पुणे जिल्ह्यातील जुन्नर येथे ही नागवंशीय शिंदे यांची एक शाखा राज्य करीत होती. पैठणचे सातवाहन हे नाग वंशियच राजे होते. महाराणी नागनिका ही नाग कन्याच.

          ll नाग प्रतीके ll

 भारतीय कलेने भावना प्रकट करण्यासाठी प्रतीकांना जन्म दिला. जसे नाग कश्यप आणि कद्रू यांचे पुत्र असल्याचे पुराणात उल्लेख आहेत. पौराणिक नाग लोकांमधील अनंत, वासुकी, शेष हे नाग मानवा अनुकूल होते. तर तक्षक, कारकोटक, कालिया हे मानव वैरी होते. नाग हा वारूळात राहतो आणि वारूळ हे भू देवतेचे प्रतीक मानले आहे. त्यामुळे भूमीच्या सृजन शक्तीशी त्याचा संबंध जोडला गेला. शिव आणि विष्णु या दोघांचाही नागाशी संबंध आहे. नागफणी धारण करणारी कालिकादेवी आहे. त्याचप्रमाणे गणेशाच्या पोटावर ही नागबंध आवळलेला असतो. कंसाच्या कैदेतून बाहेर पडल्यानंतर पावसापासून रक्षण करण्यासाठी वासुकी नागाने कृष्णावर फना छत्र धरलेले होते. बुद्धांच्या जन्मानंतर नंद व उपनंद या नागांनी स्नान घातले होते. तर ज्ञान प्राप्ती नंतर मुचलिंग नागाने त्यांच्यावर आपला संरक्षक असे फनाछत्र धरले होते. जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ यांचे नाग हेच अभिज्ञान चिन्ह आहे. कामठा किंवा मेघमालि हा पूर्वजन्मीचा पार्श्वनाथाचा भाऊ जो वैरी बनला होता. त्याच्या हल्ल्यापासून यक्ष धरणेद्र हा आपल्या सात फण्याचे छत्र पार्श्वनाथच्या डोक्यावर धरले असल्याचे शिल्प वेरूळ लेणीत आहे.

श्रवणबेलगोळ येथील गोमटेश्वराच्या प्रचंड मूर्ती भोवती अनेक वारुळे निर्मिले असून त्यातून नाग बाहेर येत आहेत असे शिल्पात दाखवले आहे. नाग हे योगाचे ही प्रतिक मानले जाते. त्या कारणाने शिवाची योगी राजत्व दाखविण्यासाठी नाग शिवा जवळ सातत्याने दाखविला जातो. अशी ही पौराणिक मान्यता आहे.

    ll आयुध रूपातील नाग प्रतीक ll

 बहुतांश देवतेसमोर नाग हे चिन्ह आयुध म्हणून दाखवण्यात येत असले तरी, प्रत्यक्षात शिवा सोबत सर्प / नाग हे लांछान कायमस्वरूपी जोडले गेलेले आहे. प्रतिमा लाक्षणिक विवरण पाहता विष्णुधर्मोत्तर पुराण, मत्स्यपुराण, मानसार, मयमत, कामिकागम, अंशुमतभेदागम, देवता मूर्ती प्रकरण, आदी शिल्प शास्त्रीय ग्रंथात शिवाच्या आयुधात कृष्णमृग, खडग, खेटक, वज्र, परशु, त्रिशूल, खट्वांग, डमरू, पाश, हस्ती चर्म, दंड, कपाल, अक्षमाला, धनुष्य, शंख, चक्र, गदा आणि सर्प किंवा नाग सांगितला आहे.

    ll नाग आणि लैंगिक काम प्रतीक ll 

 नाग किंवा साप यांना लैंगिक भावनेचे प्रतीक मानण्यात येते. ज्यावेळी एखादा साप खांबाला वेढा देऊन बसतो तेव्हा तो खांब प्रेरित झालेले लिंग वाटतो. साप हा पुरुषवाचक शब्द म्हणून वापरला जातो. या सरपटणाऱ्या प्राण्यात लिंगाची रचना असल्यामुळे ते वासनेचे प्रतीक आहे. त्यासाठी त्याला वैशेयिक मन, संभोग इच्छा आणि संभोग इच्छा कमी होणे इत्यादीचे प्रतिनिधित्व सरपटणारे प्राणी करतात. ज्या वेळी स्त्री व पुरुष उत्तम परिस्थितीत व तंदुरुस्त शरीराने एकमेकांकडे आकर्षित होतात. त्यावेळी त्यांच्या लिंगाची व योनीची स्थिती एखाद्या वळवळणाऱ्या प्राण्या सारखी होते. ग्रीक कथेत एडम व इव्हा यांच्याजवळ साप हे प्रतीक यामुळेच दाखवण्यात येते. प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रॉइड याने सुद्धा नागाला काम प्रतीक मानले आहे. त्यांच्या मतानुसार, आदिम समाजातील स्त्रिया नागाची पूजा काम प्रतिकाच्या रूपानेच करत असत. कदाचित यामुळेच जगभरात आणि विशेषतः भारतामध्ये नागपूजा या स्त्रियाच करतात. नागाची पुत्रप्राप्तीसाठी आराधना करणे किंवा शिवा सारखा श्रेष्ठ पती मिळावा यासाठी शिवपूजन करणे या पाठीमागे ही कामभावना प्रेरित असावी असेही मानले जाते. वांझ स्त्रिया पुत्र प्राप्ती साठी नागशिळेची पूजा करतात. नागाच्या काम रूपा संदर्भाने कश्मीरी लोक कथेनुसार, सुरिनसर किंवा सुनासर ही झील अध्यात्मिक बाबतीत  पवित्र मानली जाते. हा संदर्भ महाभारत काळाशी जोडला जातो. वनवासात असतांना पांडव जम्मू येथे गेले होते. ज्यावेळी नागकन्या उलुपी सोबत अर्जुनाचा विवाह झाला होता. तसेच माणिपूर राज्याची राजकन्या चित्रगंधा हिच्यासह ही अर्जुनाने विवाह केला होता. कालांतराने त्यांना बब्रुवाहन नामक वीर पुत्र जन्माला आला. अर्जुनाचे वास्तव्य तिथे अल्पकाळ असल्याने पुत्र जन्माची वार्ता अर्जुना पर्यंत पोहोचली नाही. महाभारताच्या युद्धसमाप्तीनंतर पांडवांनी अश्वमेध यज्ञ केला होता. यज्ञाचा अश्व बब्रुवाहन यांनी रोखून धरला होता. तो सोडविण्याचा प्रयत्न अर्जुनाने केला असता. युद्ध कौशल्यात अर्जुन कमी पडला. त्यामुळे अर्जुनाला मूर्च्छा आली. ही वार्ता चित्रगंधा हिला कळाली असता ती रणभूमीवर आली आणि पुत्र बब्रुवाहन यावर ती क्रोधित झाली. वडिलाला जिवंत करण्यासाठी बब्रुवाहन यांनी वैद्यची मदत घेतली. वैद्यांनी उपचार सांगितला की, पाताळ लोकातून नागमणी (वनौषधी) आणावी लागेल. त्यासाठी बब्रुवाहन याने पाताळ लोकात बाण मारला. त्या बाणाने इच्छित नागमणी आणला. त्या साठी नागकन्या उलुपीने साह्य केले. त्या नागमणीच्या सह्याने अर्जुन जागा झाला. ज्या मार्गाने बाण गेला आणि ज्या मार्गाने बाण परत आला तिथे दोन्ही बाजूने झील तयार झाली असे मानले जाते. तेव्हा पासून नवविवाहिता या झीलची तीन वेळा परीक्रमा करून नाग देवतेचा आशीर्वाद घेऊन वैवाहिक जीवनाला प्रारंभ करते.

 वारूळ हे भूमीचे - भूमीच्या सृजनेंद्रीयचे याचे प्रतीक आहे. नर नाग हे पुरुषी तत्त्वाचे प्रतीक आहे. त्याची उपासना प्राधान्याने संतान दाता देव म्हणूनही होते. दक्षिणेत अनेक जमातीत वधूने व विवाहित स्त्रियांनी नाग पूजा करण्याची चाल आहे. काही ठिकाणी विवाहित स्त्रिया वारुळाची पूजा करतात. संतान प्राप्तिची अपेक्षा करणाऱ्या स्त्रिया नागाच्या अथवा नाग युगालाच्या मूर्तीची पूजा करतात. नवस फेडण्यासाठी नागमूर्ती तयार करून मंदिराच्या आवारात अथवा झाडांच्या पायथ्याशी प्रतिष्ठित करतात.

 नागाचे संतान दायी सामर्थ्य भारतीय जनमानसातील अनेक धारणांमधून व्यक्त होत असते. दक्षिणेतील सर्व प्रमुख क्षेत्रपाल देव आपले नागरूपात्व सांभाळून आहेत. ग्रामीण भागातून आजही अशी दृढ समजूत आहे की, एखाद्या गर्भवती स्त्रीने साप पाहिला असता, त्याचे तत्क्षणी डोळे जातात आणि ती स्त्री प्रसूत झाल्यावर तिच्या नान्ही घराचा गंध अनुभवल्यावर तो नाग पुन्हा डोळस होतो. ती गरोदर असताना त्या स्त्रीचा आणि पुरुषाचा संबंध येऊ नये किंवा समागम घडू नये, असा निषेध त्यात अभिप्रेत असावा. सर्व पुरुष नागाचे प्रतिनिधी आहेत आणि नाग हे पुरुषी तत्त्वाचे प्रतीक आहे. म्हणून वारुळाची पूजा भूमीच्या सृजनेंद्रीयचे प्रतीक म्हणून केली जाते. वारूळास पृथ्वीची योनी म्हणतात. योनी रूपिनी भुदेवी आहे. योनी प्रतीक म्हणून नैसर्गिक वारूळची उपासना अति प्राचीन काळापासून आजपर्यंत दक्षिण भारतात तरी अखंड प्रचलित आहे. वारूळ ही फारच नाजूक असल्यामुळे वारूळ सादृश्य घडीव शीला मूर्तीचे प्रचलन क्वचित कोठे असल्याचा पुरावा उपलब्ध आहे. वारुळाच्या शीला रूप प्रतिकृती नंतर नाभी पर्यंतच्या योनी मूर्ती घडविल्या जाऊ लागल्या. तसेच प्रसवा बरोबरच पोषणाचा ही मातृत्वाशी संबंध असल्यामुळे योनि प्रमाणेच स्थानांना उठाव देणाऱ्या स्कंदा पर्यंतच्या मूर्तीची निर्मिती होत गेली. भू देवीच्या सर्जक आणि पोषक इंद्रियांच्या मूर्तीचा हा वारूळ ते योनी - स्तन - युक्त मूर्ती पर्यंतचा क्रमविकास श्री रा. चि. ढेरे यांनी सिद्ध केला आहे.

 II काम शास्त्रीय ग्रंथानुसार नाग II

कल्याणमल्ल, कोक्कोक, दीक्षित श्यामराज, श्री प्रोढदेवराज, मथुरा प्रसाद दीक्षित यांनी नायिकेच्या माणस प्रकृतीचा ही उल्लेख केलेला आहे. देव सत्वा, यक्ष सत्वा, मनुष्य सत्वा, पिशाच्च सत्वा, नाग सत्वा, काक सत्वा, वानर सत्वा आणि खर सत्वा असे प्रकार सांगण्यात आलेले आहेत. सत्व या शब्दाचा अर्थ शील असा होतो. अर्थात नायिकेच्या चारित्र्य आणि वागणुकीवरून हे सत्वाचे प्रकार दिलेले आहेत. त्यानुसार जी नेहमी एखादी घटना किंवा काम विसरते, विसराळू स्वभावाची जी नेहमी व्याकुल, घाबरलेली असते, सापाप्रमाणे दीर्घ श्वास घेणारी, नेहमी निद्राधीन राहणारी, नेहमी जांभळी देणारी ती नाग सत्वा जाणावी. असे म्हंटले आहे.

 वरील विवेचनावरून असे म्हणता येईल की,

1) सर्वच प्राचीन मानवी सभ्यतेत नागा विषयी भीतीतून आदरभाव निर्माण झाला.

2) नाग सादृश्यधिष्टीत कल्पनेच्या जोरावर सूर्या सोबत संबंध जोडून कथा निर्मिती केल्या गेल्या.

3) नाग हे अत्यंत जहाल विष बाळगून असल्यामुळे आमचाही वंश नागसम आहे. हे दाखविण्यासाठी कुळवंश प्रतिकाच्या रूपाने नाग हे 'कुलचिन्ह' म्हणून ज्या जमातींनी किंवा राज वंशानी स्वीकारले त्यास नागलोक या नावाने ओळखण्यात येते.

4) नागाची शरीर रचना ही पुरुष लिंगाप्रमाणे असल्यामुळे आणि वारूळ स्त्री लिंग अथवा भूमिचे / सृजनाचे प्रतीक म्हणून स्वीकारले गेले असावे.

5) दक्षिणेतील अनेक क्षेत्रपाल देवता आपले नागरूप प्रकट करताना दिसतात.

6) आशीर्वाद देत असताना हाताची मुद्रा ही पाच फडा असलेल्या शेषनागाची मुद्रा मानली जाते. यज्ञोपवीतातील एका सूत्राचे नाव नाग तंतू असे आहे.


( संदर्भ ग्रंथ कर्त्यांचे आभार, फोटो स्त्रोत :- श्री प्रवीण योगी यांच्या कडून मिळाले.)

डॉ. अरविंद सोनटक्के,

दिगंबरराव बिंदू महाविद्यालय, भोकर. जि. नांदेड.

(9423139676)

 
 
 
 
 
 
 
 
 

ईशान किंवा ईश
   हे शिवाचेच स्वरूप असल्यामुळे या प्रतिमा एकट्या उभ्या शंकरासारख्याच दिसतात. जवळच त्याचे वाहन बैलही असतें.
 
 अष्टदिक्पाल


प्राचीन मंदिरांच्या बाह्य भिंतींवर, प्रवेशद्वारांवर, तसेच सभामंडपामध्ये, अंतराळात आपणास अनेक मूर्ती कोरलेल्या दिसतात - शिव, विष्णू, देवी आदी देवता, सुरसुंदरी, नर्तक, वादक ह्याशिवाय सर्वसाधारणपणे हटकून दिसतात त्या लोकपालांच्या अर्थात दिक्पालांच्या मूर्ती. हे दिक्पाल त्या त्या विशिष्ट दिशांचे आणि उपदिशांचे पालन करतात, असे मानले जाते. इंद्र, अग्नी, वायू, यम, कुबेर, वरुण, ईशान आणि निर्ऋती ह्या त्या दिशांच्या देवता. मुख्य दिशांच्या देवतांची नावे वेगळी, मात्र उपदिशा आणि त्यांच्या देवता यांची नावे एकमेकांना समांतर असलेलीच आढळून येतात. उदा. आग्नेयेचा दिक्पाल अग्नी, नैर्ऋत्येचा निर्ऋती, ईशान्येचा ईशान आणि वायव्येचा वायू. ही उपदिशांची नावे त्या त्या देवतेपासूनच पडलेली आहेत, हे उघड आहे. इंद्र, अग्नी, वायू, यम, वरुण आणि ईशान ह्या वैदिक देवता आहेत, कुबेर हा यक्षांचा अधिपती, तर निर्ऋती हा चक्क राक्षस आहे. अगदी क्वचित ह्या दिक्पालांच्या मूर्ती त्यांच्या शक्तीसहदेखील आढळतात. दिक्पाल मूर्ती ओळखणे तसे सोपे आहे. त्यांची वाहने आणि हातातील आयुधे यावरून ते सहज जाणून घेता येते. चला तर मग, आता एकेक दिक्पालाची विस्ताराने माहिती घेऊ.

इंद्र (पूर्व दिशेचा अधिपती)

हा देवतांचा राजा. ऐरावत हत्ती हे त्याचे वाहन. वेदांतील सर्वाधिक प्रसिद्ध देवता म्हणजे इंद्रच. इंद्राची पूजा पूर्वी इंद्रध्वजाच्या रूपाने जनमानसात प्रचलित असे. ह्या इंद्रध्वजाच्या पूजेचे वर्णन माझ्या 'गुढीपाडवा - शक्रोत्सवातील इंद्रध्वजपूजेचे प्राचीन साहित्यातील वर्णन' ह्या लेखात विस्ताराने दिलेले आहे. इंद्राची पत्नी शची. काही ठिकाणी इंद्र शचीसह दिसतो. इंद्राची मूर्ती ओळखणे अगदी सोपे. हत्तीवर स्वार किंवा पायाशी हत्ती अशा पद्धतीने इंद्र दाखवला जातो. हातातील आयुधे म्हणजे वज्र, अंकुश.

कायगाव टोके मंदिरात असलेली इंंद्राची मूर्ती - हातात अंकुश, गदा, अक्षमाला आणि कमंडलू आहेत, तर वाहन हत्ती हे पायाशी आहे.

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वेरुळ येथील धुमार लेणीत शिल्पपटात असलेली इंद्राची मूर्ती

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरातली हत्तीवर स्वार इंद्राची मूर्ती, हाती वज्र आणि अंकुश आहेत.

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पेडगाव येथील लक्ष्मीनारायण मंदिरातील इंद्राची मूर्ती

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अग्नी (आग्नेयेचा अधिपती)

वैदिक देवतांत इंद्रानंतर कोणाचे स्थान असेल तर ते अग्नीचे. यज्ञाच्या माध्यमातून देवांना हवी पोहोचवण्याचे काम करणारा तो अग्नी. अग्नीची मूर्ती ओळखायची सर्वात सोपी खूण म्हणजे त्याचे वाहन एडका. यज्ञात अजापुत्राला अर्थात बोकडाला यज्ञपशू म्हणून महत्त्वाचे स्थान असल्याने अग्नीचे ते वाहन असल्यास नवल नाही. अग्नीच्या इतर लक्षणांमध्ये त्याची आयुधे म्हणजे ध्वज, कमंडलू, अ़क्षमाला, शक्ती. आयुधात बर्‍याच वेळा पोथी, गदा, स्रुक, स्रुवा अशी भिन्नताही आढळते.

कायगाव टोके येथील अग्नीचे शिल्प

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरावरील बाह्य भिंतीवर असलेली एडक्यावर स्वार अग्नी मूर्ती

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पेडगावच्या लक्ष्मीनारायण मंदिराच्या बाह्य भिंतीवरील अग्नी शिल्प

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वेरुळच्या प्रवेशद्वारावर कोरलेली अग्नी मूर्ती

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ह्याशिवाय पाटेश्वर येथील लेणीत अग्नीची एक वेगळीच प्रतिमा बघायला मिळते.
ऋग्वेदातील चौथ्या मंडलातील ५८व्या सूक्तातील तिसर्‍या श्लोकात अग्नीचे वर्णन पुढील प्रकारे आले आहे -

चत्वारि शर्ङगा तरयो अस्य पादा दवे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य |
तरिधा बद्धो वर्षभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आ विवेश ||

अग्नी हा ४ शिंगे, ३ पाय, २ मस्तके, ७ हस्त आणि ३ ठिकाणी बांधलेला एक वृषभच आहे.

चार शिंगे म्हणजे चार वेद, ३ पाय म्हणजे दक्षिण, गार्हपत्य आणि आहवनीय हे तीन प्रकारचे अग्नी, २ मस्तके म्हणजे एक मानवाचे (हवन करणार्‍या ऋषीचे) आणि दुसरे वृषभाचे (हे बांधलेल्या यज्ञपशूचे प्रतीक), ७ हस्त म्हणजे काली, कराली इत्यादी सात प्रकारच्या ज्वाला. असा हा अग्निवृष.

पाटेश्वर येथील अग्निवृष

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अग्निवृष

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वरुण (पश्चिम दिशेचा अधिपती)

वरुण ही जलदेवता. पश्चिमेकडील बाजूस समुद्र असल्याने साहजिकच हा पश्चिमेचा अधिपती झाला. पाश हे वरुणाचे प्रमुख आयुध आणि जलदेवता असल्याने मकर हे त्याचे वाहन झाले. जलदेवता असल्याने काही वेळा एका हातात तर काही वेळा दोन्ही हातात कमळे आढळतात. समुद्रच नव्हे, तर सरोवरे, नद्या जिथे जिथे जल असेल त्यांचा स्वामी वरुण बनला.

कायगाव टोके येथील वरुणाची मूर्ती

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पेडगाव येथील वरुणाची मूर्ती, मकर हे वाहन पायापाशी दिसेल.

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वेरुळ येथील कैलास लेणीतील वरुणाची मूर्ती

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरातील मकरारूढ वरुण

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वायू (वायव्येचा अधिपती)

वैदिक ग्रंथांत वायूस महत्त्वाचे स्थान नाही, मात्र महाभारत, रामायण हा महाकाव्यांत अनुक्रमे भीम आणि हनुमान यांचा जनक म्हणून मानाचे स्थान आहे, तर वायूच्या आराधनेसाठी वायुपुराणही निर्मिले गेले. वायूच्या मूर्तीच्या निर्मितीत त्याच्या अंगभूत लक्षणांचा पुरेपूर वापर केला गेल्याचे आपणास दिसते. वायूच्या दोन्ही हातात फडफडत्या पताका/ध्वज दिसतात, वायूचे वस्त्रदेखील फडफडताना दिसते, वायुमूर्ती ओळखण्याचे सर्वात महत्त्वाचे लक्षण म्हणजे त्याचे वाहन हरीण. वेगाने धावत असल्याने हरीण हेच वायूचे वाहन बनल्यास त्यात काहीच नवल नाही.

कायगाव टोके येथील दोन्ही हातांत फडफडत्या पताका, कमंडलू, अक्षमाला आणि वाहन हरीण यांनी युक्त अशी वायुमूर्ती

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पेडगावच्या लक्ष्मीनारायण मंदिरातील बाह्य भिंतीवरील वायुमूर्ती

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वेरुळ लेण्यातील वायुमूर्ती

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यम (दक्षिण दिशेचा अधिपती)

यम ही वैदिक देवता. सूर्याचा पुत्र. मृतांना स्वर्गास अथवा नरकास पोहोचवणारा हा देव. मृतांना नेण्यास हा आपल्या दूतांना पाठवतो. दक्षिण दिशा मृतांची मानली गेली आहे, साहजिकच यमाकडे दक्षिणेचे आधिपत्य आले किंवा यमाकडे दक्षिण दिशेचे आधिपत्य आहे, म्हणूनही दक्षिण दिशेस मृतांची दिशा मानले गेले असावे. ऋग्वेदातील १० मंडलातील यम-यमी संवाद हे संवादसूक्त अतिशय प्रसिद्ध आहे. तर महाभारतात पतिव्रतोपाख्यानात सत्यवान-सावित्री आणि यम यांची कथा विस्ताराने आली आहे. मार्कंडेयास नेण्यास आलेल्या यमाचे पारिपत्य करणार्‍या शिवाची कथा तर प्रसिद्धच आहे. कालारी शिव अर्थात मार्कंडेयानुग्रह मूर्तीत शिव आणि यमाचे शिल्पांकन केलेले आढळते. यम हा काळाचे/मृत्यूचे प्रतीक, साहजिकच त्याचे वाहन रेडा हेच आहे. इतर लक्षणांत पाश, दंड, खड्ग, अक्षमाला/कमंडलू ही आयुधे अंतर्भूत आहेत.

कायगाव टोके येथील यमाची प्रतिमा - हाती दंड, यमपाश, अक्षमाला आणि पापपुण्याची नोंदवही आहे.

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिराच्या स्वर्गमंडपातील यमाचे शिल्प

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कैलास लेणे, वेरुळ येथील यमाचे शिल्प

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कुबेर (उत्तर दिशेचा अधिपती)

कुबेर हा विश्रव्याचा पुत्र असल्याने याला वैश्रवण असेही म्हणतात. हा यक्षांचा अधिपती. साहजिकच यक्षांप्रमाणेच ह्याचे शरीरही स्थूल दाखवले जाते. 'कुसित बेरं शरीरं यस्य सः' - अर्थात ज्याचे शरीर कुरूप, बेढब असा तो कुबेर. अर्थात कुबेराच्या सर्वच मूर्ती स्थूल आहेत असेही नाही. त्याच्या मूर्ती सडपातळही आहेत. कुबेर हा जैन आणि बौद्धांमध्येही आढळतो. बौद्धांमध्ये तो जंभाल होतो. त्याची पत्नी भद्रा ही बौद्धांमध्ये हरिती होते.

कुबेराची मूर्ती ओळखणे तसे अवघड, कारण कुबेराची लक्षणे एकसारखी नाहीत. त्याचे प्रमुख वाहन नर. स्थूल असल्याने पालखीद्वारे हा उचलला जात असल्याने कुबेराला नरवाहन म्हणतात. काही वेळा कुबेराचे वाहन हत्ती किंवा घोडा हेसुद्धा दाखवल्याचे दिसते. मात्र कुबेर ओळखण्याचे एक हमखास लक्षण म्हणजे त्याच्या हाती असलेली धनाची पिशवी आणि मुंगूस. कुबेर हा देवांचा धनाध्यक्ष. साहजिकच त्याच्या हाती धनाची पिशवी असते, तर मुंगूस हेसुद्धा धनाचे प्रतीक. मुंगूस दिसल्यावर धनलाभ होतो असे आजही मानतात. मात्र मुंगूस हे कुबेराचे वाहन नव्हे.

कायगाव टोके येथील कुबेर प्रतिमा. येथे वाहन हे हत्ती असून हाती धनाची पिशवी घेतलेली आहे.

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरातील घोड्यावर बसलेल्या कुबेराची प्रतिमा

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पेडगाव येथील मुंगूस आणि धनाची पिशवी हाती घेतलेला कुबेर

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वेरुळ येथील क्र. २०च्या लेणीतील तुंदिलतनू असलेला कुबेर

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वेरुळ येथील बौद्ध लेणीतील जंभाल आणि हरितीची प्रतिमा

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निर्ऋती (नैर्ऋत्येचा अधिपती)

निर्ऋतीचे नाव ऋग्वेदात आढळते, मात्र त्याबद्दल अधिक माहिती मिळत नाही. वेदात हा राक्षस म्हणूनच ह्याचा उल्लेख येतो. काही पुराणे निर्ऋतीला स्त्रीरूपी मानतात आणि अलक्ष्मी म्हणूनही निर्ऋतीचे नाव येते. वेदोक्त देवतांच्या रूपांमध्ये विविध कथापुराणांद्वारे हळूहळू बदल होत जाताना निर्ऋतीला दिशाधिपतीचे काम आले असावे, असे म्हणता येते. निर्ऋतीच्या मूर्तीही तुलनेने मोजक्याच आढळतात, ज्या मंदिरांमध्ये दिक्पाल मूर्ती आहेत, तिथेही काही वेळा निर्ऋतीची मूर्ती नसते. मात्र निर्ऋतीची मूर्ती जिथे असेल तिथे ती ओळखणे मात्र सोपे आहे. निर्ऋती हा प्रेतवाहन किंवा नरवाहन. हाती खड्ग, खेटक, नरमुंड ही सर्वसाधारण लक्षणे आणि चेहरा उग्र, दाढा विचकलेल्या असे रूप.

कायगाव टोके येथील निर्ऋतीची मूर्ती. हाती खड्ग, खेटक (ढाल), नरमुंड आणि एक हात अभयमुद्रेत आहे.

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खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरातील नरवाहन निर्ऋतीची मूर्ती

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खिद्रापूरच्याच कोपेश्वर मंदिरातील प्रेतवाहन निर्ऋतीची मूर्ती

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ईशान (ईशान्येचा अधिपती)

ईशान हे शिवाचेच एक रूप आहे, त्यामुळे ह्याच्या मूर्तीची लक्षणे जवळपास सर्वच शिव आणि भैरवासारखीच आहेत. हाती डमरू, कमंडलू, त्रिशूळ, नाग. याचे वाहन बैल. भैरवमूर्ती आणि ईशान यांच्यामधील फरक म्हणजे भैरव रौद्र आणि काही वेळा नग्न असतो आणि भूतगण, नरमुंडही बाजूला असतो, तर ईशान मूर्ती सौम्य असते.

कायगाव टोके येथील ईशान मूर्ती

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पेडगाव येथील ईशान मूर्ती

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पिंपरी दुमाला येथील सोमेश्वर मंदिरातील ईशान मूर्ती

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यक्ष :-
     प्राचीन वाङ्मयांत भूत, किन्नर, राक्षस, गंधर्व, किम्पुरुष, नाग, दानव, इत्यादि बरोबरच यक्षांचा उल्लेख मिळतो. वेद, ब्राह्मण, उपनिषदें, सूत्र, पौराणिक वाङ्मय, जातकादि पालिग्रंथ, जैनांचे आगम साहित्य व संस्कृत कथासरित्सागरादि काव्यकथाग्रंथांत यक्षांचे उल्लेख इतस्ततः पसरलेले आहेत. आज जरी यक्षपूजा उघडपणे मावळली असली तरी निरनिराळ्या प्रांतात लोकोपासनेच्या रूपाने ती आज ही आसेतु हिमाचत प्रचलित आहे. समर्थांनी आपल्या दासबोधांत प्रसंगोपात्त रूपाने ठिकठिकाणी महाराष्ट्रांतील लोकदैवतांचा याद्या दिल्या आहेत. त्यात जाखमाता (यक्षिणीमाता), जखिणी, झोटिंग, वेताळ, मानविणी, सटी, वीरेदेव, मुंज्या, वगैरे पैकी कित्येक जुन्या यक्षमंडळीची नवी संस्करणें आहेत. उत्तरप्रदेशांतील वीर, ब्रह्मा, वगैरे लोकदैवते याच कोटीतील आहेत. अस्तु
     यक्षाला पालीत यक्ख व प्राकृतांत जक्ख म्हटले आहे. यक्षाच्या उत्पत्तिविषयी थोडा मतभेद आहे. रामायणांप्रमाणे जलाच्या संरक्षणासाठी प्रजापतीने विशिष्ट सृष्टी निर्माण केली व त्यांना आज्ञा दिली, 'रक्षध्वम्'. त्यापैकी काहीनी सांगितले 'रक्षामः' व काहींनी उत्तर दिले 'यक्षामः'. 'रक्षामः' म्हणणारे राक्षस, 'यक्षमः' म्हणणारे यक्ष झाले. अर्थात् यक्ष आणि राक्षस यांचा गोतावळा एकच होय. ५८
    जुन्या काळापासूनच यक्षाच्या दोन प्रकारच्या स्वरूपाची कल्पना केली गेली होती. एक रूप अत्यंत सुंदर अद्भुज सामर्थ्यवान व लोकांचे कल्याण करणारे असे मानले जात असे तर दुसरे रूपांत " बटबटीत डोळे, पसरलेले तोंड, आखुड माण्ड्या, सुटलेले पोट, अशा भयंकर देहाची कल्पना केली जात असे. प्रथम अर्थात अग्नी, इंद्र, कृष्ण बलराम, स्कंद, वगैरे देवांना यक्ष या नावाने संबोधित केले आहे." यक्षांप्रमाणेच यक्षिणी देखील फारच सामर्थ्य असणाऱ्या सुंदर व मायेत पटु अशा स्त्रिया समजल्या जात. बरोबरच याच अर्थात 'यक्षिणीची कांडी' हा मराठीचा वाक्प्रचार आजही रूढ आहे. जुन्या वाङ्मयांत लक्ष्मी, एकानंशा, वगैरे देवी व ताटके सारख्या मायाविनींना यक्षिणी म्हटलेले आहे.

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    आपल्या दुसच्या रूपात विकृत असल्यामुळे यक्ष हैं हास्याचे आलंबनही मानले गेले. वामनपुराणांत अशी कथा के की यक्ष पंचालिकाने शंकराची जांभई आणि उन्माद या दोन गोष्टी आपल्यावर ओढून घेतल्या व लोकांना हसविणा होण्यांचा वर मिळविला."
    यक्षांच्या मंदिरांना किंवा 'स्थानांना' यक्षायतन किंवा यक्षस्थान म्हणत. चौरस्त्यावर त्यांचे पूजन करीत. यक्ष हे लोकदैवत असल्यामुळे ब्राह्मण, बौद्ध व जैन तिन्ही धर्मात यांचा सहज प्रवेश होता. एवढेच की महाविलयनपद्धतीप्रमाणे तिन्हीं धर्मात यांना उपदेवतांचेच स्थान मिळत गेले. ब्राह्मण धर्माप्रमाणे यक्षांचा तांडा कुबेराचे अधिकारात होता. बौद्ध परंपरेप्रमाणे चार महाराज (राज शब्द हा यक्षाचाच पर्यायवाची होता) 'चातु महाराज' या नांवानी चार दिशांचे अधिपती मानले गेले आहेत." जैनांत तीर्घ‌ङ्कराचे शासन देव म्हणून कित्येक यक्ष विद्यमान आहेत. यक्षांचा सुळसुळाट गुप्तकाळांपासून कमी व्हायला लागतो.
यक्षांसंबंधी एवढी पार्श्वभूमी समजून घेतल्यानंतर आता त्यांच्या प्रतिमाकडे वळू.

यक्ष प्रतिमा :-
     यक्षांच्या दोन प्रकारच्या स्वरूपांविषयी वर चर्चा केली आहेच. मूर्तिकारांनी तोच क्रम उचलणे स्वाभाविक आहे. प्रथम प्रकारचे यक्ष व यक्षिणी देव कोटीत जात असल्यामुळे त्यांना भव्य, उत्तम पोषाख घातलेले व साधारण लोकांना एकदम प्रभावित करतील असे दाखविणे योग्य होते. इसवीसनांपूर्वी सुमारे तिसऱ्या ते पहिल्या शतकांत उत्तर भारतात भल्या मोठमोठ्या यक्ष व यक्षिणीच्या प्रतिमा विखुरलेल्या होत्या (र.चि. एकोणचाळीस १-२). शतकानुशतके यांचे परंपरागत पूजन होत असे, या यक्षपूजनाने लोकाच्या मनांची इतकी जबरदस्त पकड घेतली होती, कि आजच्या शतकांत संग्रहालयात ठेवण्याकरिता म्हणून यक्षमूर्ती हलविल्या नंतर देखील मथुरेच्या परखम नांवाच्या गावी अजूनही त्या यक्षानिमित्त 'जात' किंवा यात्रा भरते. आजपर्यंत एकूण मोठ्या आकाराच्या अंशा चोवीस यक्षमूर्ती आपणांस मिळाल्या आहेत. निरनिराळ्या संग्रहालयांत असणाऱ्या किंवा मूल स्थानांवर उभ्या या विशाल प्रतिमा शिवाय कित्येक अजून अज्ञात असण्याची दांडगी शक्यता आहे. या चोवीस पैकी एकच सोपारा येथे मिळालेली आहे. या यक्ष व यक्षिणी प्रतिमांची खालील वैशिष्ट्ये लक्षांत घेण्यांसारखी आहेत :
१) सर्वच प्रतिमा आकाराने भव्य, पूर्ण परिपुष्ट व बलशाली दिसतात.
२) डोक्यावर केसांची भली मोठी गाठ किंवा पागोटे, गळ्यात जाडसर नक्षीदार कंठा, कानांत भारी कुंडले, दंडावर अंगद, कायबंधनाने आवळलेले नेसूचे धोतर हा यक्षाचा व निराळ्या प्रकारचे दागिने, सुंदरशी वेणी व वस्त्र हा यक्षिणीचा पोषाख दिसतो.
३) या प्रतिमा 'चित्र शैलीच्या' अर्थात पुढून व पाठीमागूनही कोरलेल्या असतात.
४) यक्षिणी द्विभुजच असतात बहुतेक यक्षांच्या हातात पिशवी असते. ही समृद्धी, धन, ऐश्वर्य, वगैरेचा संकेत करते, काहीं यक्षाजवळ शंख असतो. या शिवाय कमरेला लहानशी सुरी ही खोवलेली असते. (पहा ग्वाल्हेर संग्रहालय, मणिभद्र यक्ष लखनऊ संग्रहालय, पलवल यक्ष, विदिशा यक्ष (रे.चि. एकोणचाळीस १) नोह यक्ष, वगैरे).

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५) या पैकी कित्येक मणिभद्र यक्षाच्या प्रतिमा आहेत. हा कुबेराचा मित्र व तसाच प्रभावशाली होता.
    वरील चोवीस तर मोठे यक्ष आहेत जे कलिंग देशापासून शूर्पारक क्षेत्रांपर्यंत पसरलेले होते. याशिवाय मुंबई, मथुरा, लखनऊ, अलाहाबाद, कलकत्ता वगैरे संग्रहालयांत ठेवलेल्या लहान आकाराच्या यक्ष यक्षिणी वेगळ्याच आहेत. यामध्ये घण्टाकर्ण (म.सं.सं. १५.५९०), शंकुकर्ण (म.सं.सं.जे २), मुद्गरपाणि (म.सं.सं.सी. १), मणिभद्र (म.सं.सं.सी.१) वगैरे विशिष्ट यक्ष पाहता येतात.
      दुसऱ्या प्रकारचे अर्थात् बटबटीत डोळ्यांचे व बेडोल आकाराचे यक्ष देव कोटीतले नव्हते (रे. चि. एकोणचाळीस ३). याचा उपयोग सेवकांच्या, परिवारदेवताच्या किंवा अलंकरणाच्या रूपाने केलेला आढळतो. भारवहन करणे हे ही यक्षांचे एक प्रमुख कार्य होय. सांचीस्तूपाच्या एका द्वारावर एक भारवाही यक्ष डोक्यावर उचललेल्या अत्यंत कष्टी झालेला दिसत आहे.
     प्रथम प्रकारच्या यक्ष प्रतिमा त्यावेळच्या शिष्ट पुरुषांना डोळ्यासमोर ठेवून घडविल्या होत्या व पुढे त्यांच्याच धर्तीवर बोधिसत्व, विष्णू, शिव, कार्तिकेय, वगैरे देवाच्या प्रतिमा आकारल्या गेल्या.
      गुप्तकाळ व त्याच्यापुढे यक्षांचे हे रूप तर मावळले, पण सेवाकार्य करण्याकरिता काही खुजी माणसें काढली जाऊ लागली व त्यांना कीचक, वामनक, अशी नांवे मिळाली. छत्र, विड्याचा करंडा, फुलांचा हारा, खाद्यात्रांची ताटें वगैरेसारख्या वस्तू उचलण्याकरितां या वामनकांचा वापर केलेला दिसतो.

नाग :- 
     भारतीय लोकधर्माचे नागपूजन हे एक जुनें रूप आहे. नागांचा उत्सव 'नागमह' या नांवानें ओळखला जात असे. आज जरी हजारो वर्षे उलटून गेली असली तरी नागाची पकड अजून ढीली झालेली नाही, तिची रूपें मात्र किती तरी बदलत गेली. यक्षपूजेंप्रमाणेंच नागपूजेचाही जैन, ब्राह्मण व बौद्ध धर्माशी दाट समन्वय झाला; व याची फलश्रुती म्हणून यांना प्रत्येक धर्मात उपदेवतांची पण महत्त्वाची स्थानें मिळाली. यक्षांचा शिष्ट संमत संप्रदायांशी झगडा झाल्याचे दिसत नाही, पण नागांचे मात्र बरेच झगडे झाले आहेत. कृष्णाने केलेला कालिया नागाचा पराभव, गरुड व नागांचे वैर, तक्षकाचा परीक्षिताशी संबंध, जनमेजयाचा नागयज्ञ व त्यांत नागांचा संहार अशी कितीतरी उदाहरणे मिळतील, अशीच उदाहरणें बौद्ध व जैन कथांतही आढळतात, पण या सर्वांची फलश्रुती नागांचा पाडाव व त्यांचे आर्य दैवतांच्या छत्राखाली येणें याच रूपांत समोर आली.
     नाग हे सर्पपूजक मानव असावेत असे फर्ग्यूसन आणि ओल्डहॅम यांचे मत आहे." मुळांत सर्प हे त्यांचे वंशचिन्ह, पण पुढे त्यांचे नाग किंवा साप याच्याशी तादात्म्य झाले. मूर्तिशास्त्रांत हे तादात्म्य स्पष्ट दिसते. नागाशी संबंध असलेल्या देवांना मानव रूपांसह नागरूपांत दाखविण्याची पद्धत इसवीसनाच्या कमीत कमी दोन शतकें आधीपासून होती. भरहून, सांची, अमरावती, वगैरे ठिकाणच्या कलाकृतींत सर्पफण असलेले नाग किंवा नागस्त्रिया किती तरी दिसतात. मधुरा हे कुषाण काळांत नागपूजेचे एक मोठे केंद्र होते. मधुरेजवळ सोंख येथे डॉ. हर्बट हर्टल यांनी जे उत्खनन केले त्यांत तेथे कुषाणकाळांत एक सुंदर नागमंदिर असल्याचा भक्कम पुरावा हाती आला आहे. हे नाग मंदिर विटांचे असून अर्धलंब वर्तुळाकार होते. येथून उत्कृष्ट नागशिल्पेही मिळाली आहेत."
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कुषाणकालीन नागांची वैशिष्ट्ये : -
 कुषाणकाळांत मिळणाऱ्या नागमूर्तीची खालील वैशिष्ट्ये डोळ्यांत भरण्यांसारखी आहेत :
१) पुरुषाकार नागांच्या पाठीमागे सर्पाची वेटोळी, किंवा उभा साप दाखवितात. ह्या सापाची कणा छत्रासारखी मस्तकांवर उभारलेली असते. (रे.चि. चाळीस १,३,४)
२) पाठीमागे अंकित केलेल्या सर्वांचे शरीरांवर आभोगांवर निरनिराळ्या आकाराचे खवले दाखवतात (रे. चि. चाळीस ५). तसेच त्याच्या फणेवर स्वस्तिकादि अष्टमंगल चिन्हें आणि तोंडाबाहेर सळसळणाऱ्या जिभा दाखवितात६७ (चित्र १६२). नागांचे 'लेलिहः' हे नांव या सळसळणाऱ्या जिभांकडे किंवा सळसळणाऱ्या गतीकडे संकेत करते.
३) मस्तकांवर दिसणाऱ्या सर्प फणांची संख्या त्या पुरुषांच्या किंवा स्त्रियेच्या सामाजिक हुद्यांवर अवलंबून असते. सामान्य नागांना एकच फणा असते, पण वरच्या नागांना तीन, पांच, किंवा सात फणांचा क्रम असतो. वाङ्मयांत शेषाच्या सहस्रफणा सांगितल्या आहेत.
४) नागांना त्याच्या ध्यानवैशिष्ट्यांप्रमाणे दोन किंवा चार हात असतात.
५) नागांचा पाण्याशी जवळचा संबंध आहे. पुष्कळदा त्याच्या हातांत घट व जवळ कमळ दिसते. कुषाणकाळांतील कित्येक नाग प्रतिमा पुष्करिणी किंवा तलावाचे काठांवर स्थापित होत्या."
६) सोंख येथील उत्खननांत मिळालेल्या एका नाग प्रतिर्मेत मानव मुखाच्या पाठीमागें नागफणा न दाखवता पुरते मुखच सर्पाचे दाखवून खालचा भाग पुरुषाचा आहे. याच्या हातांत एक गुंडाळलेली पोथी आहे. शेषनागाचा व्याकरण शास्त्राशी असलेला संबंध प्रसिद्ध आहे. (म.सं.सं.एस्.ओ. ४ ३२७)
          कुषाणकाळानंतर मिळणाऱ्या नागप्रतिमांत वरील बरीचशी वैशिष्ट्ये लुप्त होतात. मानवाकार प्रतिमेत आतां फक्त मस्तकाच्या मागील सर्पफणा तेवढी दिसते. मध्यकाळांतही तशीच स्थिती असते. वेटोळी घातलेला नैसर्गिक साप बराच दिसतो. भारतीय मूर्तिशास्त्रांत विशेष करून मध्यकाळाचे सुमारांस सर्पकुंडले, सर्पयज्ञोपवीत, सर्पाड्द, सर्पवलये, सर्पमेखला, सर्पाचे केशबंधन, सर्पाचा पाश, हातांत घेतलेले साप, त्रिशूळावर गुंडाळलेले सर्प, मूर्तीतील प्रभावळीच्या टोकांवर सर्प रूपांनी नागांचे दर्शन होत असते. एकाच दगडावर कोरलेल्या नाग-नागीण शिल्पांस दक्षिणेत 'नाग-कल' असे म्हणतात."

गरुड  :-
      आज गरुड हा विष्णूचे वाहन म्हणून प्रसिद्ध आहे, पण कलेत विष्णुमूर्तीचे दर्शन घडण्याच्या कदाचित आधीच गरुडाचे आगमन, झालेले होते. महाभारतांप्रमाणें वजनदार वस्तूंना घेऊन उडणारा तो गरुड अशी या शब्दाची व्युत्पत्ती आहे.
       सूर्याच्या घोड्याचा रंग कोणता या पैजेंत नागांच्या षडयंत्रामुळे विनता हिला नागमाता कद्रूचे दास्य पत्करावे लागले. दास्यातून सुटण्याची अट स्वर्गातून अमृतकुंभ आणून नागांस द्यावा अशी होती. विनता ही पक्षी कुळाची जननी

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    होती. हिला पुढे कश्यपांपासून अत्यंत तेजस्वी व पराक्रमी असा गरुड नांवाचा मुलगा झाला. जन्मांपासूनच याने सर्वत वैर बाळगले पण आईला दास्यांतून मुक्त करण्यांकरितां नागांना अमृत सुलभ करून देणे जरूर होते. तेवढ्यासाटी क इंद्रादिदेवाशी युद्ध झाले. देव हरले, शेवट तडजोड अशी झाली की गरुडाने अमृतकुंभ नागांचे हवाली करावा, बच् इंद्रादिदेवानसि भूत लागण्याच्या आतच इंद्राने तो पळवावा. नागांना अमृतघट मिळाल्यामुळे विनतेची सुटका झाली तो दर्भावर ठेवला असतांनाच इंद्राने संधी साधून पळवला व नागांच्या तोंडाला पार्ने पुसली.
विष्णूचेही प्रथम गरुडांशी युद्ध झाले व शेवटी सामोपचारांत विष्णूने त्याला आपल्या ध्वजावर स्थान दिले व गरुद्वारे विष्णूचे वाहन होणें पत्करले.
       या साहित्यिक पार्श्वभूमीच्या आधारावर गरुड प्रतिमांचा विचार करू, गरुडांचे वर्णन करीत असतांना हरिवंश असे सांगतो की काश्यप गरुडाला खग असून सुद्धा शिखा व चूडा होती. सुंदर पंख हेच त्याचे वस्त्र होते व तो कानांत नेहमी सोन्याची कुण्डलें घालीत असे. हरिवंशाचे हे वर्णन कुषाणकालीन गरुडांना बरेच लागू पडते. कुषाण गरुड प्रतिमांची खालील वैशिष्ट्ये नोंद करण्यासारखी आहेत.

कुषाणकालीन वैशिष्ट्ये :-
       १) पक्षी रूपांत असून देखील गरुडांचे दोन्ही कान व त्याच्यातील कुंडले दिसतात. (चित्र १६३)
      २) काही शिल्पांत त्याचे पंजे हातांसारखे दाखविले आहेत. ज्यात त्यानें सर्प रूपांत नाग, अथवा मानव सर्पिणीचे रूपांत नाग स्त्रीला धरले आहे. (ल.सं.सं. ५९.१७०, म.सं.सं ४१.२९१५ चित्र १६४) गरुडाच्या चोचीतील सर्प हरिवंशातही वर्णित आहे, पण सर्पिणीसाठी मात्र वाङ्‌मयीन आधार हाती आलेला नाही.
      ३) सर्प आणि गरुडाचे वैर कुषाण कलाकारांनी काही ठिकाणी फारच खुबीने दाखविले आहे (ल.सं.सं.जे. ५४७ एकेचाळीस १).
      ४) या काळांत गरुडाला मोरासारखा तुरा (शिखा किंवा चूडा) ही दाखविला आहे. (चित्र १६३)
      गुप्तनाण्यांवरील गरुड पक्षी रूपांतच पंख पसरलेला (विततपक्ष) असतो. गुप्त राजे परम भागवत असल्यामुळे त्यांनी आपल्या नाण्यांवर गरुड बराच वापरला आहे. मूर्तिकलेत मात्र गरुडाचे रूप बदलले दिसते. देवगढ़ (उत्तरप्रदेश) येथील गजेन्द्रमोक्षाच्या दृश्यात विष्णूचा गरुड पंख असलेल्या मनुष्याच्या रूपात आहे.
        विष्णुधर्मोत्तरपुराणांप्रमाणे मनुष्य रूपात असलेल्या गरुडाचे अणकुचीदार नाक असावे. त्याला चार हात असून एकटा असला तर त्याच्या हातात छत्र व कुंभ असावा व दोन अंजलि मुद्रेत जोडलेले असावेत; पाठीवर विष्णू असल्यास छत्र व कुंभ असू नयेत. त्या दोन हातानें त्याने विष्णूंचे पाय धरावेत. श्रीतत्त्वन्निधीप्रमाणें मात्र तो दोनच हाताचा असावा.
        उत्तर भारतातील बऱ्याचशा गरुड प्रतिमा दोनच हाताच्या असून टोकदार नाक, पसरलेले किंवा मिटलेले पंख व भरपूर दागिने ही त्याची वैशिष्ट्ये दिसतात. कधी कधी त्याच्या हातांत सर्प दिसतो. महाभारतातील उद्योगपर्वाच्या एका कर्थेप्रमाणे विष्णु व इंद्राच्या सांगण्यावरून गरुडाने सुमुख नांवाच्या एका सर्पाला सदैव आपल्या हातात ठेवण्यांचे कबूल केले होते. नेपाळ कलेत बऱ्याचशा गरुड प्रतिमा उजव्या पायाची खुरमांडी घालून नमस्कार मुद्रेत बसलेल्या आढळतात. हात दोनच असतात व गळ्यात भला मोठा साप असतो. नाक मात्र कित्येक ठिकाणी विशेष अणकुचीदार न दाखवितां ते

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साधारण माणसासारखेच असते. त्याचे एक कारण हे ही असू शकेल की कित्येकदा विष्णुभक्त राजाच स्वतःला नमस्कार मुद्रेत विष्णू समोर गरुडाचे रूपांत अंकित करवीत असे. उदाहरणार्थ हाडीगाऊ येथील गरुड म्हणजे गुप्त राजा अनुपरम हा आहे. तसेच लिच्छवी राजा मानदेव हा चांगुनारायण येथील गरुडाचे रूपात आढळतो.
वृषार्ध गरुड :
       राष्ट्रीय संग्रहालय, नवी दिल्ली येथे असलेल्या सुमारे ९००इ.स. च्या एका खंडित शिल्पात जालीढ मुदेत असलेला एक द्विभुज पुरुष दिसतो. हाथ खंडित आहेत, उजवा वर उचलेला होता, विशेष म्हणजे याच्या डोक्यावर उजव्या बाजूला जटाजूट आणि डाव्या भागावर मुकुट आहे. या शिल्पाची ओळख हरिहराच्या संयुक्त मूर्तीप्रमाणे दोघांच्या वाहनांचे संयुक्तरूप 'वृषार्ध गरुड' अशी करण्यात आली आहे (रे.चि.उ.४). - ईशान शिव गुरु पद्धतीत याचा उल्लेख आढळतो.
     P.K. Agarawala, A composite figure of Garuda and Vrsa BMA., 51-52, 1993, p. 39 ff. दक्षिणेत द्विभुज आणि चतुर्भुज दोन्ही प्रकारचे मानव गरुड दिसतात. बादामी येधील जाड बांध्याचा गरुड उजव्या हातात सर्प घेऊन आहे, बंगलोर संग्रहालयांतील विष्णु प्रतिमेत असलेला गरुड चतुर्भुज असून त्याने मागच्या दोन हाताने विष्णूचे पाय सावरले आहेत. पण सामान्य दोन हातांत अमृत कुंभ धरलेला आहे. राष्ट्रकूट राजांच्या ताम्रपटांबरोबर मिळालेल्या राजमुद्रेत सर्प घेतलेला मनुष्याकृती गरुड दिसतो. हे राजे स्वतःच्या गरुड लांछनाचा उल्लेख करतांना आढळतात.
वैष्णव मंदिरांत विशेष करून महाराष्ट्रात देवाच्या द्वाराचे आजुबाजूला गरुड व हनुमंत स्थापित करण्यांची पद्धत आहे. येथे गरुड दोनच हाताचा असून नमस्कार मुद्रेत बसलेला किंवा उभा असतो (चित्र १६५).


प्राचीन मंदिरों के वास्तु शिल्प में नागांकन

सर्प एवं मनुष्य का संबंध सृष्टि के प्रारंभ से ही रहा है। यह संबंध इतना प्रगाढ एवं प्राचीन है कि धरती को शेषनाग के फ़न पर टिका हुआ बताया गया है। इससे जाहिर होता है कि धरती पर मनुष्य से पहले नागों का उद्भव हुआ। वैसे भी नाग को काल का प्रतीक माना जाता है। जो शिव के गले में हमेशा विराजमान रहता है। कहा गया है - काल गहे कर केश। इसके पीछे मान्यता है कि काल धरती के जीवों का कभी पीछा नहीं छोड़ता और हमेशा उसके गले में बंधा रहता है। इस मृत्यू के प्रतीक को मनुष्य ने हमेशा अपने समक्ष ही रखा और मानव जीवन में भी महत्वपूर्ण स्थान दिया। 
राजा रानी मंदिर के द्वार पर स्थापित नागप्रहरी - भुवनेश्वर उड़ीसा
शासकों के कुल भी नागों से चले, नागवंशी, छिंदक नागवंशी, फ़णीनागवंशी इत्यादि राजकुलों की जानकारी हमें मिलती है। इसके साथ ही हमें मंदिरों के द्वार शाखा एवं भित्तियों पर अधिकतर नाग-नागिन का अंकन मिलता है। वासुकि नाग एवं पद्मा नागिन का पाताल लोक के राजा-रानी के रुप में वर्णन मिलता है। नागों को एक दूसरे से गुंथित या नाग-वल्लरी के रुप में दिखाया जाता जाता है भारतीय शिल्पकला में इन्हें देवों के रुप में प्रधानता से स्थान दिया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि मंदिर के प्रवेश के समय इनके दर्शन करना शुभ एवं सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप स्तंभ पर अंकित नागपाश

प्रागैतिहासिक शैलचित्र कला में नाग का चित्रण, मोहनजोदड़ो, हड़प्पा से प्राप्त मुद्राओं पर नागों का अंकन हुआ है, जो नागपूजा का प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव प्राचीन काल से नागपूजा कर रहा है। नाग का भारतीय धर्म एवं कला से घनिष्ठ संबंध रहा है। कहा जाए तो नागपूजा हड़प्पा काल से लेकर वर्तमान काल तक चली आ रही है। इसके पुरातात्विक एवं साहित्य प्रमाण प्रचुरता में मिलते हैं। मंदिरों की द्वार शाखाओं पर नागाकृतियों का उत्कीर्ण किया जाना, विष्णु की शैय्या के रुप में, शिव के गले में, बलराम एवं लक्ष्मण को शेषावतार के रुप में प्रदर्शित किया जाना। 

राजीवलोचन मंदिर राजिम छत्तीसगढ़ के मंडप के द्वार शीर्ष पर शेष शैया
वासुकिनाग का समुद्र मंथन के साथ उल्लेख, वराहावतार का प्रतिमा के साथ नाग का आबद्ध होना, भारतीय संस्कृति में नागपूजा एवं उसके महत्व को प्रदर्शित करता है। जैन परम्परा में भी तीर्थंकर पार्श्वनाथ एवं सुपार्श्वनाथ के साथ पांच फ़न एवं सप्तफ़न के नाग लांछन का प्रयोग किया जाता है, जो जैन संस्कृति में नाग के महत्व को उजागर करते हैं।
छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर सिरपुर से उत्खनन में प्राप्त जैन तीर्थांकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा

पूर्व मध्यकाल एवं उत्तरमध्यकाल से लेकर आज तक लगभग प्रत्येक ग्राम में नागदेवताओं की किसी न किसी रुप में पूजा की जाती है। इसकी प्रतिमाएं आज भी गांवों में मिलती है तथा नागपंचमी का त्यौहार तो वर्ष में एक बार मनाया ही जाता है। इस विषधर जीव की जितने मुंह उतनी कहानियां मिलती हैं। शायद मनुष्य ने भयभीत होकर इस काल के प्रतीक की पूजा प्रारंभ की होगी और कई परिवारों में इसे कुलदेवता के रुप में मान्यता मिली हुई है, मनुष्य आज तक इसके महत्व एवं उपस्थिति के साथ बल को नकार नहीं सका है।
 
 
 

बाजारपेठेतील_शिळेवरील_शेषनाग

#बाजारपेठेतील_शिळेवरील_शेषनाग 🐍
किल्ले रायगडवर हुजूरबाजाराची म्हणजेच बाजारपेठ बसवून नुकतीच सुरुवात झाली होती, आता हिंदुस्तानातील अनेक व्यापारांना अभय देऊन आणि सन्मानाने आमंत्रण देऊन त्यांना या बाजारपेठेत स्थायिक करणे गरजेचे होते. कारण तसे न केल्यास परकीय शत्रुंना यांचा गैरफायदा घेणे सोयीचे झाले असते. यासाठी महाराजांना कोणीतरी सन्माननीय आणि भरवशाचा व्यक्ती आवश्यक होता जो ह्या बाजारपेठेचा संपूर्ण कारभार बघेल आणि सर्व व्यापाऱ्यांचा विश्वास जिंकून घेईल, तेव्हा शिवरायांना आठवण झाली ती म्हणजे बाबाजीनाईक पुंडे यांची. नगर जिल्हातील श्रीगोंदे येथील परंपरागत सावकार घराण्यातील बाबाजी शिवरायांच्या पदरी सन्मानाने आश्रित होते. विजापूरच्या आदिलशाहीशी शिवरायांच्या झालेल्या तहानुसार ते विजापूर दरबारी १६६७ पासून स्वराज्याचे वकील म्हणून काम पाहत होते. १६७२ मध्ये तह मोडल्यामुळे ते पुन्हा विजापूर येथून निघून रायगडावर येण्यास निघाले. श्रीगोंदे येथील नाईक यांचा परंपरागत सावकारीचा पेशा असल्यामुळे महाराजांना यांची बाजारपेठेसाठी सावकार किवा महाजन पदी नियुक्ती करणे सोयीस्कर ठरले. कारण कोणा लबाड लांडगा, शत्रूचा हेर यास गाळा देऊन बाजारपेठेत निवास देणे धोक्याचे होते. त्यावेळी बाबाजीनी विचार केला, छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या आश्रयाखाली त्यांना हे सोन्याचे दिवस लाभले आहेत ते फक्त आणि फक्त त्यांच्या आजोबांमुळे “शेषाबानाईक पुंडे”. बाबाजीना ही आपल्या आजोबांची पुण्यायी वाटू लागे. त्यामुळेच बाबाजीनी आपल्या आजोबांचे ऋण लक्षात घेऊन ७ व्या किवा ८ व्या दुकानाच्या मधल्या शिळेवर शेशाबाची स्मृती म्हणून त्यांनी “शेषनाग” कोरवुन घेतला. यापुढे बाबाजीनाईक यांचे अस्तित्व दर्शवणारा तो शेषनाग हुजुरबाजाराचे वैभव दर्शवू लागला. आजही आपण त्या बाजारपेठेत फेरफटका मारताना त्या शेषनागाच्या शिळेजवळ क्षणभर थांबतो आणि त्याचे दर्शन घेतो. आपण जर नीट निरीक्षण करून पाहिल्यास असे दिसते कि हा एक फणा असलेला साधा नाग नसून छोटे छोटे असे सात फणे असलेला शेषनाग आहे. भोसले घराण्याशी प्रामाणिकता दर्शवणाऱ्या शेषाबानाईक यांची ती स्मृती आहे...!
 
 http://maharashtra-bhakti-shakti.blogspot.com/2019/06/blog-post.html







नंदी, वृष :-
        शिव आणि त्याचा बैल याचा संबंध त्यापासून दिसतो. काही अपवादात्मक उदाहरणे व तर शिवाचे वाहन बैल होय असे सर्वांना आहे. सिंधुभ्यामोठेवाड असलेला बैल शंकराशी संबंधित होता किया नाही हे जरी थोडे विवादास्पद असले तरी यांच्या काळात येता येता बैलाचा शिवाशी संबंध चांगल झाला होता व तो तसाच आजपर्यंत आहे. शिवाबरोबर बैल नाण्यावर दिसतो मातीच्या शावर दिसतो व मूर्तिकले दिसतोच दिसतो (रे. चि. बावीस १२.४८).
    ह्या वृषाची स्थापना शिवलिंगासमोर करतात समोर बसलेल्या पिंडीची पूजा साधारणपणे आहे, त्यामुळे आसेतुहिमाचल शिवाचे मंदिरात सभामंडपात असलेला बैल हा अवश्य दिसतो.
     आज आपण शंकराच्या बैलालानंदी या नांवाने ओखतो व वाङ्मयातही तसे प्रयोग आहे ठेवले पाहिजे की शिवाच्या एका प्रसिद्ध गणांचे नांव नंदी होतेपुराणात्यात व चार हात असून क मुगुटांवर चंद्र आहे. त्याच्या बायकोचे नांव सुयशा होय. शंकराचे जवळच यांचे पूजन करावयाचे असते राधा हा वारमुख आहे."
   शिवपुराणांत शंकराच्या वृषाची नंदीबैलाची कथा विस्ताराने दिलेली आहे. हा सिलीचा मुला

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      शंकराचे वाहन झाला. कूर्मपुराणांप्रमाणे शिलाद ऋषीला भूमी नांगरत असतांना शंकराच्या कृपेने हा मुलगा मिळाला याचे नांव नंदी. याने शिवाची आराधना केली व गणांचे आधिपत्य मिळवले, शंकरानेच मरुताच्या मुलीशी याचा विदार करून दिला. कलेच्या क्षेत्रांत नंदीची दोन रूपें दिसतात. एक तर पूर्ण बैलाचे व दुसरे बैलाचे तोंड असलेल्या मनुष्याच बैलाच्या रूपात तो जरी दक्षिणेत व उत्तरेत उभय सामान्य असला तरी दक्षिण भारतीय कलेत त्यांच्या मूर्तीचा जसा विका झाला आणि शेवटी नीटनेटके आणि भव्य असे रूप मिळाले, तसे उत्तरेत मिळाले नाही.
श्री. ढाकी यांनी दक्षिण भारतीय नंदी वृषाचा बारकाईने अभ्यास केला आहे. त्यांच्या म्हणण्यांप्रमाणे तेथे नंदीचे अंकन खालील तीन प्रकाराने केले जाते :
१) द्राविड मंदिरात अर्धमंडपाच्या तो बहुतेक बाहेर दिसतो, जागा नसलीच तर त्याला आत घेतात.
२) मंदिर शिल्पांत विमानाच्या वरच्या तळावर चारी कोपऱ्यांना शैव मंदिरांचे प्रतीक म्हणून तो दिसतो.
३) महाबलीपुरम् येथील समुद्रतटांवर असलेल्या मंदिरात तो मंदिरांचे आवारावर (प्राकारांवर) अलंकरण म्हणून ओळीने बसविलेला असतो.
      उत्तरेपेक्षा दक्षिण भारतातील नंदी प्रतिमा फार भव्य असतात. या प्रतिमांचा तौलनिक दृष्टीने अभ्यास केल्यास असे दिसते कीं पल्लव कलेंत आठव्या शतकाच्या मध्यापर्यंत नंदीला अगदीच नेमके दागिने घालीत, काही शिल्पांत तर ते मुळीच घातलेले नाहीत. सुमारे ८०० ते ९५० च्या दरम्यान गळ्यातील माळा वगैरे आल्या. दहाव्या शतकाच्या मध्यांत त्याच्या गळ्यातील सर्वांत मोठी माळा वाशिंडांला वळसा देत घातली जात असे (चित्र १६७). सुमारे १०७० च्या जवळ पास गळ्यातील माळांबरोबरच गुडघ्यातील व पायातील दागिने ही आले; अणि बाराव्या शतकांच्या मध्यापर्यंत पोचता पोचता शिवाचा बैल आंगभर दागिन्यांनी नटलेला दिसू लागला." मैसूरच्या चामुंडी पर्वतावरचा जगप्रसिद्ध नंदी तर गळ्यांत शिवलिंगही घालून आहे (चित्र १६८) बसवप्पा किंवा बसवाचार्य या नावाने ओळखला जाणारा शैवाचार्य नंदीचा अवतार समजतात. तिकडे बसव हे वृषाचेच नाव आहे ज्यात ब्रह्मा, सदाशिव व विष्णू या तिघांच्या आद्याक्षराचा समावेश झालेला आहे.
         दक्षिणेत मानवरूपांत नंदी शंकरासारखा दिसतो व अधिकार नंदी या नांवाने सपत्नीक शिवमंदिरात असतो." उत्तरेत वृषभाचे तोंड असलेला हा आपल्या पत्नीसह आलिंगन मुद्रेत उभा दिसतो. अष्टभुजा (जिल्हा मिर्जापूर, उत्तर प्रदेश) मंदिरांतून अशा प्रकारच्या बऱ्याच प्रतिमा मिळाल्या आहेत. त्यापैकी काही लखनऊच्या संग्रहालयात (ल.सं.सं.जी. ३८५) तर काही वाराणसीच्या संस्कृत विश्वविद्यालयाच्या संग्रहालयात आहेत. (चित्र १६९)

आयुधपुरुष व आयुधस्त्रिया :-
      मागील पृष्ठात वेळोवेळी आयुधपुरुषाची चर्चा आलेली आहे, येथे साकल्याने त्यांचा संक्षिप्त आढावा घेतो. विष्णुधर्मोत्तर आणि उत्तरकामिकागमांत वज्र, दंड, खड्ग, पाश, अंकुश, त्रिशूल, पद्म, चक्र, गदा आणि तसेच शंख, भिन्दी (भिन्दीपाल), शर, धनू, यांना मानवाकारात दाखविण्यांबद्दल विधान केले आहे." यात गदा, शक्ती, धनुष्य यांना स्त्रीरूपांत व इतर पुरुषरूपांत दाखवावे असेही सांगितले आहे. मुख्य पुरुषाचे बाजूला आयुधपुरुषाचे स्थान असे ही गोष्ट महाभारतांतील एका उल्लेखानेही सिद्ध होते. अर्जुनाला पाशुपत अस्त्र मिळताच ते 'अग्नीप्रमाणे दैदीप्यमान रूपानें मूर्तिमान होऊन त्याच्या बाजूला (पाश्वें) स्थित झाले' हे वर्णन या दृष्टीनें महत्त्वाचे आहे. "

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कलेत आयुधांचे मानव रूपांत अंकन गुप्तकाळांपासून प्रारंभ झाले व नंतरही ते चालू होते. दक्षिणेपेक्षा उत्तर भारतीय कलेत आयुध पुरुष जास्त दिसतात. मध्यकाळातील शिल्पात एक नवा पायंडा पडलेला दिसतो. तो असा की मुख्य शिल्प किंवा श्रीमूर्ती जर देवीची असेल तर पुरुष रूपांत दाखवली जाणारी आयुधे ही स्त्री रूपांतच दाखवावीत. उदाहरणार्थ महिषमर्दिनी दुर्गेच्या काही प्रतिमांत बाणाचा भाता घेतलेली स्त्री दिसते (भा.क.भ. वाराणसी, सं.सं. १७७, १५३). या उलट मनवा (उ.प्र.) येथून मिळालेल्या विष्णूत हे कार्य करणारा पुरुष आहे. त्याला आपण 'बाण पुरुष' म्हणू शकतो. हीच गोष्ट त्रिशूलाबद्दलही आहे. त्रिशूल पुरुष शंकराबरोबर आढळतो तर त्रिशूल बाहिनी स्त्री कनौजहून मिळालेल्या देवी शिल्पांत आढळते (ल.सं.सं. ५५.२८७रे. चि. आठ १). आजपर्यंत एकूण आपल्याला खालील आयुधे पुरुष किंवा स्त्रीरूपांत मिळाली आहेत :
१) गदा : एक अपवाद वगळल्यास स्त्रीरूपांत (र.चि. सात ४).
२) चक्र : पुरुष रूपांत (रे.चि. सात ६)
३) शंख: पुरुष रूपांत, पण कचित स्त्री रूपांत (चित्र १७०)
४) पद्म: पुरुष रूपांत, पण कमीच
५) खड्ग: पुरुष रूपांत, कमीच विशेष करून देवगढच्या अनन्तशायी प्रतिमेत (रे.चि. नऊ २)
६) त्रिशुल : पुरुष रूपांत (र.चि. आठ २, ६) पण सिंहवाहिनी देवीच्या हातात एका शिल्पांत स्त्री रूपांत." (रे.चि. आठ १) याशिवाय दक्षिण भारतीय धातुप्रतिमांतही त्रिशूलाच्या मध्यभागांत त्रिशूल देवी आढळते."
७) खट्वांग : पुरुष रूपांत, (रे.चि. नऊ १) पण मोजक्या शिल्पांतच दिसते.
८) शक्ती : कार्तिकेय प्रतिमांत ही स्त्री रूपांत दिसते. (रे.चि. आठ ७)
९) धनुष्य आणि बाण: शास्त्रीय विधानाप्रमाणें स्त्री रूपांत व बाण पुरुष रूपांत असावयास पाहिजे, पण मनवा (सीतापूर जिल्हा उत्तर प्रदेश) येथून मिळालेल्या एका विश्वरूप विष्णूच्या प्रतिमेत दोघेही पुरुष रूपातच दाखविले आहेत. (रे.चि. आठ ४,५)
१०) वज्र : काही विद्वानांच्या मते राजा माउएस (Maues) च्या नाण्यांवर वज्रपुरुष दिसतो. पण हे विधान स्वीकारतांना लक्षांत असू द्यावे की हा राजा बराच आधीचा आहे. वेरुळ येथील बौद्ध लेण्यांत वज्रपाणीचा आयुधपुरुष म्हणून वज्र पुरुष दिसतो. (या माहितीसाठी लेखक नागपूर विद्यापीठाचे डॉ. जी. बी. देगलूरकर यांचा आभारी आहे.)

समुद्र :-
     उत्तर भारतात कित्येक ठिकाणी मध्यकालीन मंदिराच्या उंबऱ्यांच्या खालच्या बाजूस पायशिळेवर दोन दोन पुरुष सर्व अलंकार घालून हातात घागरी घेऊन बहुतेक मगरावर बसलेले दिसतात. (रे.चि. बेचाळीस १) हे चार पुरुष म्हणजे चार समुद्र होत. ते गर्भगृहांतील देवाचे पाय धुण्यास उपस्थित झालेले असतात. मानरूपी चार समुद्रांचा उल्लेख हरिवंशात आढळतो. हे चार समुद्र म्हणजे दधि, क्षीर, लवण आणि मधु समुद्र असावेत. कालिदासाने पृथ्वीचे वर्णन करतांना देखील 'चतुस्समुद्रांतसलीलमेखला' असे शब्द घातले आहेत. शिलालेखांत ही असे वर्णन आढळते.

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इहामृग, किन्नर, सुपर्ण वगैरे :-
     कित्येक शिल्पांत अर्धा मानव अर्घा पशु अथवा अर्घा मनुष्य तर अर्धा पक्षी, अथवा पशूत पक्ष्याचे किंवा पक्ष्यांत पशूचे मिश्रण केलेले दिसते. शुंग कुषाण कलेत हे खूपच आढळतात. पुढे मात्र रोडावत जातात या काल्पनिक जीवाना इहामृग, कित्रर, सुपर्ण, वगैरे नावांनी ओळखतात (रे.चि. चाळीस १-३).

हरिहर पुत्र, आर्य :-
      मागे हरिहराचे विवेचन करीत असताना मोहिनीचे रूप घेतलेल्या विष्णूच्या पाठीमागे शंकर लागला या कथेचा उल्लेख केलेला आहे (पान १४९) द्रविड परंपरेप्रमाणे त्या उभयतांच्या संयोगापासून जो पुत्र झाला त्याला मल्याळम मुलुखाचे स्वामित्व मिळाले. हा हरिहर पुत्र, आर्य, ऐय्यनार, किंवा शास्ता या नांवाने प्रसिद्ध आहे. उत्तरेला मुळीच माहीत नसलेला हा देव मल्याळी लोकांचा लाडका आहे. ज्याप्रमाणे तमिळ देशांत सुब्रह्मण्याची भरपूर मंदिरें आहेत. त्याचप्रमाणे मल्याळम् देशाच्या प्रत्येक शैव किंवा वैष्णव मंदिरात शास्ता असतोच.      
     आगमग्रन्थांप्रमाणे शास्त्याला चार हात असून सामान्य हात अभय आणि वरद मुद्रेत असावेत आणि मागच्या हातात खड्ग व ढाल ही आयुधे द्यावीत काहीच्या मते तो फक्त दोनच हाताचा असावा व त्याच्या हातात वाकलेली काठी (तमिळ-शेण्डु) आणि फळे व पार्ने असावीत. हा मांडी घालून बसलेला किंवा सुखासनात असावा. शास्त्याच्या प्रतिमा अर्थातच त्याच भागांत मिळतात, पण नुकतीच त्याची एक प्रतिमा वाराणसीत दक्षिण भारतीय लोकांनी स्थापित केली आहे.

देवपट्ट/तीर्थपट्ट :-
      साधारणपणे आपण शिल्पांत एकट्या दुकट्या किंवा वाहन, सेवक, गंधर्व, व इतर परिकर मूर्तीसह उत्कीर्ण अशा मोठ्या लहान प्रतिमा आपण पाहतो. याशिवाय नवग्रह, सप्तमातृका, दशावतार वगैरेचे सामूहिक अंकन करणारे शिलापट्ट ही दिसतात. या सर्वां व्यतिरिक्त शिल्पांत एक वेगळा प्रकार ही आढळतो. येथे संपूर्ण तीर्थाचे प्रातिनिधिक अंकन हा मुख्य विषय असतो. क्वचित थोडे विषय परिवर्तन ही आढळते. अशा पट्टाची आपण येथे संक्षिप्त चर्चा करणार आहोत. महत्त्वाची गोष्ट अशी की वाराणसी पट्टाशिवाय इतरांची फक्त एक एकच शिल्पेंसमोर आली आहेत. असो.

वाराणसीपट्ट :-
       मध्यप्रदेशातून मिळालेला सुमारे ११-१२ शतकांतील हा चौकोनी शिलापट्ट ग्वाल्हेरच्या गूजरीमहाल संग्रहालयांत होता. तो आतां भोपाळ संग्रहालयात गेला आहे असे ऐकतो (रे.चि.दे.१) हा आडव्या रेषेत चार भागांत विभागलेला आहे. मधोमध खालून वर जाणारी एक नदी आहे. ही गंगा, गंगेचे नदी रूपात अंकन इतरत्र आढळत नाही. पटाच्या अगदीवर किंवा वरून पहिल्या भागात ओळीने १४ शिवलिंगे आहेत. वरून दुसऱ्या भागांत नदीच्या उजव्या बाजूला सात सूर्य, डाव्या बाजूला दोन उपासकांसह प्रलंब पादासनांत बसलेला शिव असून उरलेला भाग पुनः दोन आडव्या भागांत वाटलेला आहे. वर पाच चौकोनी शाळुकांत प्रत्येकी पाच अशी एकूण २५ लिंगे आहेत. खाली काही देवमूर्ती आहेत. वरून तिसऱ्या भागांत गंगेच्या उजवीकडे सहा विष्णू आहेत. डावीकडे ललितासनांत बसलेली देवी हातांत दंड घेऊन बसलेला पुरुष आणि त्या पलीकडे पुनः सहा विष्णू आहेत. अगदी खालच्या भागात पाच गणपती, बसलेले स्रीपुरुष व कलश, माळा घेतलेले सेवक दिसतात. नदीत मगर, मासा, कासव वगैरे जलचर आहेत.

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        भुवनदेवाचायनि आपल्या अपराजितपूच्छा या ग्रंथात (अपरा. ७४.२०-२५ पा. १८४-८५) 'पट्टशाला वाराणर्मा या नांवाने वाराणसीच्या अंकनाची चर्चा करीत असे विधान केले आहे की अशा पट्टाचे पूजन केल्यास प्रत्यक्ष गंगास्नान कात्याचे पुण्य मिळून मोक्षप्राप्ती होते. या उल्लेखाचा आधार घेऊन स्कंद पुराणांतील काशीखंडात नमूद केलेल्या याश क्रमांतील देवतांचा तुलनात्मक विचार केला तर या शिलापट्टाचा बराचसा उलगडा होतो.
         पहिली १४ लिंगे काशीतील १४ 'सिद्धलिंगे' किंवा 'महालिंगे' आहेत. यांच्या चार याद्या मिळतात. पाच शाळुंकातील २५लिंगे शंकराच्या 'पञ्चविंशति तत्त्वात्मा' या नांवाची सार्थकता दाखवतात. सात सूर्य हे काशीतील बारा आदित्यांचे प्रतिनिधी असावेत. त्याचप्रमाणे १२विष्णू हे तेथील आदिकेशवादि बारा केशव आणि पाच गणपती तेथील पंच विनायक आहेत. यांच्या ही पाच याद्या मिळतात. अपराजितपृच्छेप्रमाणे गंगेच्याजवळ बसलेली देवी स्वतः वाराणसी आहे. काशी खंडात हिला 'विग्रहवनी वाराणसी' असे संबोधन आहे. तिच्याजवळ दंडपाणी शिवाचे स्थान युक्तिसंगत आहे (रे.वि.दे. १-३)
        वाराणसीचे शिलापट्टीय अंकन पुण्यप्रद ठरल्यानंतर असे पट इतरत्र ही निर्माण होत असावेत हा तर्क क्रमप्राप्त आहे. व तो खरा ही ठरतो. स्थूल रूपाने या देवताच्या बरोबर इतर ही देवतांचे अंकन करणारे दोन पट झाशी येथे राणीमहाल संग्रहालयांत आहेत. यांत 'वाराणसी' आहे. पण गंगा 'नदी' मात्र नाही. (रे.चि.दे. २,३) एवढेच नव्हे तर वाराणसी पटाला आधार घेऊन पण केन्द्रीय देवतेचे मात्र परिवर्तन दाखवणारे इतर ही काही पट तयार करीत असत असे दिसते. कालंजर (बांदा) उ.प्र. येथील 'वैकुंठ पट्ट' (रे. चि.दे.४) लखनऊ संग्रहालयात असलेला फक्त अर्धा असा विष्णूपट्ट, विदिशा संग्रहालयांत विद्यमान एक खंडित पट्ट अशी काही उदाहरणे दाखवता येतील. (रे.चि.दे.४)
N.P. Joshi, Varanasi Silapattas and Somilar slabs in Medi...... sculptures of Central India, S.S. II, 1989, pp. 143 ff.

त्रिपुरी पट्ट :-
      जबलपुर, मध्यप्रदेश जवळील त्रिपुरी या नर्मदातटावरील क्षेत्राचे अंकन करणारा हा पट देखील अशाच प्रकारचा आहे. पटाच्या तीन बाजूला धावणारी नर्मदा व तिच्यातच तिची लहानशी मूर्ती देखील आहे. मुख्य दोन अंधकासुराचा वध करणारा शिव 'अंधकासुरवध मूर्ती' च्या रूपांत आहे. नर्मदेच्या नागमोडी प्रवाहांत सहा शिवलिंगे आणि खाली आडव्या रेषेत विभागलेल्या पाच भागांत विष्णू, नंदीवर उमामहेश्वर, देवी, गणपती, दिक्पाल, नाग, वगैरेची अंकने आहेत. (र.चि.दे.५)
V.S. Pathak and S.K.Sullerey, Tripuri Tirtha-patta, a sculptures mythical representation of Tripuri, Art of Kalachuris
For illustration - P.K. Agrawala, Dr. XXXIX, 2, 1977, pl. 14, p. 151

प्रयागपट्ट :-
   मध्यभारतांत मिळालेल्या (तूर्त ब्रिटिश म्यूझियम, लंडन) सुमारे ९-१० व्या शतकाचा हा पट महत्त्वाचा आहे (रे.चि.दे.६) यांत मुख्य आकृती एका सुंदर मत्स्याची आहे. मत्स्याच्या पाठीवर एक स्थंडिल आणि त्यावर शंकराची घट घेतलेली आवक्षमूर्ती आहे. तिच्या डोक्यावर शिवलिंगाचा भाग दिसतो. हे लिंग एका विशाल झाडाखाली आहे. हा वटवृक्ष असावा, कारण शिवाचे आणि वडाच्या झाडाचे जवळचे संबंध आहेत. लिंगाच्या आजुबाजूला सेवक, सेविका दिसतात. लिंगाच्या डावीकडे एक भला मोठा त्रिशूळ उभा आहे. झाडावर एक पुरुष चलायमान स्थितीत दिसतो.
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      सवाबीच पुनः त्रिशूळाच्या टोकावर झेप घेणारी अधोमुख आकृती दिसते. अर्थात् झाडावरून विशूळावर उडी टाकून आत्महत्या करण्याचे हे उघड दृश्य आहे. या अंकनासगट सम्पूर्ण पट आठ आडव्या भागात वरून विशळावर उदी चाकान प्रिरनिराळे देवादिक विद्यमान आहेत. यांत शेषशायी विष्णु, अग्री, बाळासह मातृका, कुंभोदर यक्ष, वायू, बसलेला तपस्वी, सूर्य, ऋषी, कुबेर, पंख पसरलेला गरुड, यज्ञ वराह, आठ नाग, समुद्र, वगैरेचा समावेश आहे. अगदी खालच्या भागांत डाव्या टोकाला दोन सारखे घट आहेत, पण त्यापैकी एकावर सर्प दिसतो.
एकूण या शिलापट्टावर अंकित असलेली दृश्यें प्रमुख मत्स्य व इतर देवतासंघ याचा परस्पर कार्यकारणभाव समजून लेण्यांस पुराणाची मदत घेणे अपरिहार्य आहे. त्याची एक किल्ली आत्महत्येच्या दृश्यात आहे. सामान्यतः आत्महत्या कारणे हे घोर पाप मानले जाते, पण त्याला प्रयागक्षेत्र हे अपवाद आहे. तेथे अग्रीत प्रवेश करून, झाडावरून उडी टाकून, पाण्यात प्रवेश करून, वगैरे पाच प्रकाराने देहत्याग करणे पुण्यकार्य समजतात. तेथे असलेल्या अक्षयवटावरून उड़ी ठाकणे (भृगुपतन) या प्रकाराचे येथे अंकन आहे. मत्स्याचा आणि प्रयाग क्षेत्राचा संबंध सांगणारी कथा स्कंदपुराणाच्या वैष्णव खंडात (स्कंद वैष्णव., १३.२४-४८) आणि पद्मपुराणांत (पद्य, उत्तरखंड, अध्याय ९१-९२) आहे. संक्षेपात विष्णूने मत्स्यावतार घेतला, शंखासुराचा वध केला व त्यानंतर बदरीवनाला जाऊन त्याने ऋषीगणांना समुद्रांत हरवलेले वेद शोधून त्यासह प्रयागला येण्यांस सांगितले, व स्वतः देखील तेथे गेला. ठरल्याप्रमाणे वेदांचा संग्रह करून यज्ञासह सर्व प्रयागला आले. संतुष्ट झालेल्या ब्रह्मदेवाने तेथे 'प्रकृष्टयागा'ची व्यवस्था केली म्हणून या क्षेत्राला 'प्रजापतिक्षेत्र' किंवा 'प्रयाग' अशी नांवे मिळाली. वर दिसणारा पंख पसरलेला गरुड आणि खाली डाव्या टोकावर असलेले दोन घट यांचा संबंध गरुडाने आपल्या आईला विनतेलस कद्रूच्या दास्यातून सोडवण्यासाठी स्वर्गातून आणलेला अमृतकुंभ व नंतर नरागांना तो मिळू नये एवढ्यासाठी इन्द्राने तो पळवून त्याचे ठिकाणी विषकुंभ ठेवण्याच्या कथेशी आहे (पद्म. सृष्टी., अध्याय ४९, महाभारत, आदि, अध्याय ३४, वगैरे) प्रयाग क्षेत्राचे अंकन करणारा दुसरा पट्ट आमच्या पाहण्यात नाही. (रे.चि.दे.६)
-नी.पु. जोशी, 'तीर्थावतार पट्ट के रूप में प्रयाग का अंकन',
प्राग्धारा, १,१९९०-९१, पृ.१५-२१, चित्र १-७.
N.P. Joshi Aksaya....... pp. 203-12

अंतरिक्ष / व्योमपट्ट :-

धुबेला संग्रहालय (छतरपुर), म.प्र. येथे असलेला सुमारे १०-११व्या शतकातील हा पट्ट अगदी निराळ्या स्वरूपाचा आहे. येथे कोणत्याही तीर्थाची मांडणी नसून आकाशातील देवतांचे वर्तुळाकार अंकन आहे. मूळ दगड चौकोनी आहे. पण त्याचा वरील डावा कोपरा तुटलेला आहे. मधोमध एक पोकळ गोल भोक असून त्याच्या भोवताल एक रूंद वर्तुळ आहे. याच वर्तुळात स्थूल रूपाने तीन रांगात आकाशांत प्रत्यक्ष दिसणारे, तसेच अप्रत्यक्ष पण पुराणादिकांत उल्लेख असलेले देवतागण दाखवले आहेत. यांत मेषादि दहा राशी, सूर्यासह नवग्रह, बैलाचे तोंड असलेले आठ वसू, दोघे अश्विनी कुमार, स्पष्टपणे ओळखता येतात. ध्रुव आणि त्याच्या भोवती फिरणारे सप्तर्षी ही दिसतात. या शिवाय खाली नमूद केलेल्या काही अंकनांची तकनि संगती लावता येते. केंद्रात असलेली शून्याकार पोकळी. ही आकाशाची द्योतक असावी, कारण आकाश म्हणजे संपूर्ण पोकळी. शिवाय आकाशाचे 'शून्य' असेही एक नाव आहे.

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भला मोठा शंख : -
    पंचमहाभूतांपैकी आकाश हे प्रथम भूत असून 'शब्द' ही त्याची तन्मात्रा आहे. शब्द किंवा ध्वनी या तन्मात्रेचा द्योतक हा शंख वाटतो. तसा शंखाचा आकाशाशी प्रत्यक्ष संबंध नाही.
त्रिशंकु :-
       नमस्कार मुद्रेत बसलेल्या दोन स्रियांच्यामध्ये पाठमोरा बसलेल्या पुरुषाला 'त्रिशंकु' म्हणता येईल. वाल्मीकीय रामायणांत त्रिशंकुची कथा आहे. (वा.रा., बाल.अ.६) इक्ष्वाकु वंशातील या राजाला विश्वामित्राने आपल्या तपसार्मथ्याने सदेह स्वर्गाला पाठवले. इंद्र रागावला व देव त्याला खाली लोटू लागले. विश्वामित्राने त्याला तेथे तसेच थांबवले व स्वतः प्रतिसृष्टी निर्माण करू लागला. आतां देव घाबरले, तडजोडीची भाषा सुरु झाली. शेवटी विश्वामित्राने तोपर्यंत केलेली प्रतिसृष्टी तशीच राहील व त्रिशंकुही तशाच रूपात पण देवत्वाच्या सन्मानासह स्वर्गात राहील. या अटीवर तडजोड झाली. या कथेच्या आधारावर लोटला जाणारा म्हणून पाठमोरा, पण देवस्त्रियांकडून नमस्कृत दिसणाऱ्या या पुरुषाला 'त्रिशंकु' म्हणून ओळखता येईल.

तीन मानव पाउलें : -
       यांना ओळखण्याचे दोन पर्याय देता येतील. एक तर ऋग्वेदांतील पुरुष सूक्तांत (ऋ. १०.९०.३) म्हटल्याप्रमाणे विराट् पुरुषाची 'दिव' येथे असणारी तीन पाउलें (त्रिपाद तीन चतुर्थांश भाग = पर्यायाने पाउलें) असावीत. दुसरे समाधान खगोल शाखाच्या आधारे देता येईल. या शास्रात 'श्रवण' नक्षत्राचे रूप 'एका ओळीत उभी माणसाची तीन पाउलें' असे दाखवतात (गुणाकारमुळे, तारों भरा आकाश, दिल्ली, २००४, पान ७४ नक्षत्रांच्या आकृती).

छोट्या वर्तुळाभोवती सात पुरुष :-
       हे ध्रुवाभोवती फिरणारे सप्तर्षी असावेत. हा ध्रुव म्हटला तर ही उत्तर दिशा ठरते. व येथून वर डावीकडे म्हणजे पूर्वेकडे सूर्य (इतर आठ ग्रहांसह) आढळतो.
      या व्योयपट्टातील इतर अंकनाची संयुक्तिक ओळख पटलेली नाही, पण खाली मोठ्या वर्तुळाबाहेर दिसणारे नमस्कारात बसलेले दोघे जण दिसतात. अर्थात् हा पट्ट पूजनीय व वंदनीय असा आहे.
           वाङ्मयाकडे वळलो तर विष्णुधर्मोत्तर पुराणांत (वि.ध. खखख.७५.१-९) 'सर्वदेवमय' अशा 'व्योमरूपा'चे वर्णन असून त्याची पूजा म्हणजे सर्व 'चराचरा'ची पूजा असून ती 'सर्वकामाना (इच्छाना) पूर्ण करणारी आहे. असे असले तरी त्या व्योमस्वरूपाचा आपल्या व्योमपट्टाशी जोडता येणार नाही. कारण दोघांचे आकार व मांडणी अगदी वेगळी आहे. फक्त एवढेच म्हणता येईल की या पुराणाच्या काळापासून (सुमारे ६-७वे शतक) व्योमाकाराचे निर्माण व त्याचे पूजन लोकमान्य होते.








हे.




गुढ शिल्पे (गोकुळेश्वर, चारठाणा)
काही मंदिरांवर तंत्रमार्गी, अघोरपंथी, शाक्तपंथी अशी शिल्पे कोरलेली आढळून येतात. त्यांचा अर्थ त्या संप्रदायातील एखाद्या कृतीशी निगडीत असतो. पण सामान्य दर्शकाला मात्र कळत नाही.
हे शिल्प चारठाणा (ता. जिंतूर जि. परभणी) येथील गोकूळेश्वर मंदिराच्या मुखमंडपाच्या स्तंभावरील आहे. यात एकुण पाच मानवी आकृती दिसून येतात. पण पाय मात्र ८ आहेत. दोन्ही टोकाच्या दोन स्त्रीया आहेत. अगदी मधला पुरूष आहे. पण त्या बाजूचे दोन कोण हे चटकन कळत नाहीत. कारण त्यांचे केस स्त्रीयांसारखे मागे बांधलेले आहेत. पण छाती सपाट दाखवली असल्याने त्यांना स्त्री संबोधता येत नाही.
मधल्यांनी बाजूच्यांच्या डोक्यावर हात ठेवले आहेत. शिवाय सर्वात मधल्याचे वाटणारे दोन्ही हात बाजूच्या स्त्रीयांच्या हातात आहेत. हेच हात मधल्या पुरूषांचेही भासतात. पायासोबतच हाताचीही संख्या आठच आहे.
यातील टोकाच्या स्त्रीया स्वतंत्र आहेत. मधले तीनही एकमेकात अडकलेले आहेत. एक तर्क असा मांडता येतो. पुरूषाच्या उजव्या बाजूस त्याची शक्ती असते आणि डाव्या बाजूस पत्नी (वामांगी). बहूतेक देवतांच्या बाबत हे शिल्पांकित केलेले आढळून येते. येथे सामान्य पुरूषाच्या बाबतीतही हे सुचित केले असावे. आणि आज कार्टून काढताना जशी चलचित्र (animation) काढली जातात तसे उजवीकडचे चित्र पहिले, दूसरे चित्र दोन्ही स्त्रीयांचे हात हाती घेतलेले. आणि तिसरे मग पूर्णत: डावीकडच्या स्त्रीच्या डोक्यावर हात ठेवला असे. मधला पुरूष एकच असावा. फक्त तीन अवस्थांत दाखवला आहे. याला एक गती आहे. ही नृत्यातीलही एक गतीमान अशी मुद्रा असू शकते. कारण डाव्या बाजूच्या स्त्रीच्या हातात टिपरी सारखे काही दिसत आहे.
याचा तंत्रमार्गातही काही वेगळा अर्थ असू शकेल. केसांची आणि पायांची रचना यातून पुरूषांत स्त्रीचा अंश आहे असेही सुचवायचे असावे.
Laxmikant Sonwatkar
तूमच्या सारख्या अभ्यासकांनी यावर प्रकाश टाकावा. Dr-Arvind Sontakke हे तूम्हा अभ्यासकांना आव्हान ठरणारे विषय आहेत.

-श्रीकांत उमरीकर, औरंगाबाद, 9422878575.


छायाचित्र सौजन्य
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तोरण शिल्पाचा 3D नमुना
होट्टल (ता. देगलुर जि. नांदेड) येथील मंदिरांचा विविध पैलूंनी बारीक विचार झाला पाहिजे. आता हे जे शिल्प आहे ते गर्भगृहाच्या द्वारशाखेवरील तोरणाचे आहे. समोरून पाहताना हातात माळा घेतलेले यश किन्नर दिसतात. त्यांच्या हातातील माळांची सुरेख अशी नक्षी बनलेली आढळून येते. या भागात सहसा अंधार असतो त्यामुळे संपूर्ण शिल्पाकडे लक्ष जात नाही. पण या तोरणावर प्रकाश टाकला आणि खालची बाजू बघितली तर आपण चकित होतो. हे शिल्प 3D आहे. आपल्याला दिसते ती छाती पासून वरची बाजू दर्शनी प्रतलात आहे. पण कमरेपासून खालची बाजू दूसर्या प्रतलात आहे. ९० अंशाचा कोन करून या मानवी आकृत्या वळवलेल्या आहेत. शिल्पकलेतील हे मोठं आव्हानात्मक काम आहे. अशाच पद्धतीने द्वारशाखेवर नृत्य करणारे स्त्री पुरूष दाखवलेले आहेत. म्हणजे शिल्पकलेत एकाच प्रतलाचा वापर न करता दोन दिशा दोन प्रतलात शिल्प कोरलेली आढळून येतात. हे केवळ सौंदर्यपूर्णच आहे असे नाही तर गणिताचा अभ्यास करून निर्माण झालं आहे.
प्राचीन मंदिरांबाबत अशा काही बाबी खरंच आचंबीत करतात. वास्तुशास्त्र, शिल्प सौंदर्य, विज्ञान, गणित असा अद्भुत संगम इथे पहायला मिळतो. दगडाची प्रतवारी शोधून मगच शिल्प कोरले जाते. दगडी चिर्यांची रचना नुसती सौंदर्यपूर्ण नसते तर त्यात शास्त्रही सांभाळलेले असते.
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अशा अवघड जागी वर चढून फोटो काढल्या बद्दल धन्यवाद मित्रा.



युद्ध शिल्पे
घोटण (ता. शेवगांव, जि. नगर) येथील मल्लिकार्जूनेश्वर मंदिरावर पशु पक्षांची वैशिष्ट्यपूर्ण शिल्पं असल्याचे याच मालिकेत पूर्वी लिहिलं होतं. याच मदिराच्या स्तंभांवर युद्ध आणि युद्ध सराव अशी काही शिल्पे आढळून आली. ही शिल्पे पण वैशिष्ट्यपूर्ण आहेत. पहिल्या शिल्पात तलवार घेवून लढणारे दोन योद्धे दिसत आहेत. त्यांनी शिरस्त्राण घातलेले आहेत. प्रत्यक्ष युद्धापेक्षा हा युद्ध सराव असावा. दूसरे शिल्प कुस्तीचे आहे. खेळा सोबतच युद्धाची तयारी म्हणून प्रशिक्षणाचा भाग असावा.
तिसर्या शिल्पात हत्ती आणि घोडा आहे. हत्तीने सोंडेत एक माणूस पकडला आहे. समोरचा घोडा उधळलेला आहे. हत्तीवर माहूत नाही. प्रत्यक्ष युद्धातीलच एक क्षण शिल्पात फोटोसारखा पकडला आहे. चौथे आणि शेवटचे शिल्पही असेच गतीमान आहेत. यात दोन अश्वस्वार दिसत आहेत. दोघांच्याही हातात भाले दिसत आहेत. दोघांच्या मध्ये जमिनीवर एक योद्धा आहे. घोडे मागील दोन पायांवर आहेत. युद्धाचा जोर इथे दिसून येतो. वीररसात ही शिल्पे न्हावून निघाली आहेत.
छायाचित्र सौजन्य
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-श्रीकांत उमरीकर, औरंगाबाद, 9422878575


व्याल मूर्ती

 February 9, 2021

मंदिरांच्या भीतीवर, स्तंभांवर, द्वारशाखांवर दिसणारा अक्राळ विक्राळ चेहऱ्याचा हा प्राणी म्हणजेच ‘व्याल‘ होय. यालाच वारालक, वराल, वीराल,व्रलीका, वरालीक, अशी नावे आहेत. दक्षिण भारतात ‘याली‘ तर ओरिसात याला “बीडाल” म्हणतात.
व्याल निर्मिती नेमकी कधीपासून चालू झाली यावर अभ्यासकांत दुमत आहे. मात्र व्याल ही संकल्पना सिथीयन किंवा ऍकमेनिडियन(इराणी) शिल्पकलेतून गांधार स्थापतींच्या माध्यमातून मौर्यकालखंडात भारतात आली असावी. गुप्तकाळात आणि नंतर मध्ययुगात व्यालाचा वापर वाढला होता. मूळ इराणी परंपरेतील व्यालाला असलेले पंख मात्र भारतीय शिल्पात दिसून येत नाहीत. सांची स्तूपावरील आणि जुनागढ(क्षत्रप काळ) संग्रहालयातील व्याल हे पंखयुक्त आहेत.

नंतरच्या होयसळ, चौल, पल्लव या सर्वच स्थापत्यकारांनी व्यालाचा पुरेपूर वापर केला. दहाव्या शतकातील ब्रह्मपुरीश्वर मंदिरात व्यालाचा सर्वोत्कृष्ट आविष्कार बघायला मिळतो. या नंतरच्या विजयनगर स्थापत्यात व्याल मूर्ती सर्वाधिक वापरल्या गेल्या. कलात्मक दृष्ट्या खुजुराहो च्या व्यालमूर्ती डोळ्यात भरतात.
शिल्पशास्त्रातील अभ्यासक याला एक कल्पनाविलास मानतात, याच संकल्पनेतून विष्णूचा हायग्रीव, वराह अवतार, हत्तीची सोंड असलेला श्री गणेश, हनुमान, या देवता सुद्धा उत्क्रांत झालेल्या आहेत.
हीच पशु-मानव संकल्पना मूर्तिकारांनी मंदिरांच्या सुशोभिकरणासाठी वापरली आहे.
सुळे व जीभ बाहेर आलेली, आखूड कान, बटबटीत डोळे, उग्र अविर्भाव असे अर्ध मानव अर्ध प्राणी असलेले. माणसाचे धड त्यावर सिंहाचे शीर,सोबतच हत्ती, साप, वाघ, माकड, हरीण, कोंबडा, मोर अश्या अनेक प्राण्यांचे शरीरापासून बनलेले जवळपास विसपेक्षा जास्त प्रकारच्या व्यालमूर्ती श्री ढाके यांनी त्यांच्या प्रबंधात मांडल्या आहेत. वास्तुशिल्पात गजव्याल, अजव्याल, वृषव्याल, अश्वव्याल, सर्पव्याल, नरव्याल,सिंहव्याल, मेशव्याल,खरवव्याल, गंडकीव्याल, अशे अनेक प्रकारचे व्याल आपल्याला भारतात पाहायला मिळतात.
व्याल हे सहसा एकटे खोदले जात नाहीत, कधी ते हत्तीवर आरूढ झालेले, कधी हत्तीच्या पायाखाली चिरडले गेलेले, कधी आपल्या पाठीवर एखादी सुरसुंदरी वाहणारे, कधी झेप घेण्याच्या पवित्र्यात, कधी कोण्या योध्यासोबत युद्ध करताना, तर कधी द्वारशाखेत एकमेकांवर एक असे सलग व्याल खोदले जातात.

सोबत दिलेल्या छायाचित्रांमध्ये असेच काही व्याल मूर्ती दाखवलेले आहेत, पैकी तामिळनाडूच्या धारसुरम इथल्या मंदिरात स्तंभ तोलणारे व्याल किंवा याली हे विशेष असून, सिंहाचे शरीर, हत्तीची सोंड, शिंगे, गाईची शेपटी अस त्यांचं स्वरूप आहे.


सोळाव्या शतकानंतर मात्र मंदिरं स्थापत्यातील बाह्य नक्षीकाम मंदावले आणि आपसूकच व्यालमूर्ती सुद्धा मंदिर स्थापत्यातुन नाहीश्या झाल्या.

व्यलशाखा – भुलेश्वर मंदिर, यवत
व्याल – भुलेश्वर मंदिर, यवत
द्वारशाखेवरील व्यालशाखा – श्री गोदेश्वर मंदिर, सिन्नर, नाशिक
गजव्याल-सिंहव्याल, भुलेश्वर मंदिर, यवत
योध्याशी युद्ध करणारा व्याल
स्तंभ तोलणारे गजव्याल -ऐरावतेश्वर मंदिर, तमिळनाडू
हत्तीवर आरूढ व्याल – गोदेश्वर मंदिर, सिन्नर, नाशिक

महेश तानाजी देसाई

मिथक शिल्पे – किन्नर किन्नरी

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>> आशुतोष बापट

ग्रीक पुराणकथांमधील पंखधारी घोडा अर्थात पेगॅससबद्दल काही कथा आपण बघितल्या. याच पंखधारी घोडय़ाबद्दल अजून एक बाब म्हणजे कॉरिन्थच्या नाण्यांवर पंख असलेल्या पेगॅससचा छाप दिसून येतो. इ.स.पूर्व 4 थ्या शतकातील कॉरिन्थच्या चांदीच्या नाण्यावर पंखधारी पेगॅसस कोरलेला आहे. त्याच कालखंडात निर्माण झालेल्या लाम्पसॅकसच्या नाण्यांच्या मागच्या बाजूवरसुद्धा पंखधारी अश्वाचे शिल्प बघायला मिळते. म्हणजेच कलेमध्ये या पंखधारी घोडय़ाचे स्थान जसे शिल्पांमध्ये आहे तसेच ते नाण्यांवरसुद्धा दिसून येते. पंखधारी घोडय़ासारखा अजून एक चमत्कारिक प्राणी आपल्याला दिसतो तो म्हणजे पंखधारी हत्ती.

अमरावती, सांची, नागार्जुनकोंडा इथल्या उडणाऱया हत्तींची शिल्पे बुद्धजन्माच्या चमत्काराची घटना दाखवतात. या शिल्पांमधे जरी हत्तींना पंख दाखवले नसले तरीसुद्धा त्यांच्या शिल्पांवरून ते आकाशात विहार करताहेत हे स्पष्टपणे समजून येते. अर्थात हत्तींना पंख दाखवणे हे काही हिंदुस्थानी कलाकारांना अगम्य नव्हते. अमरावती इथल्या शिल्पांमधून आपल्याला पंख असलेले हत्ती शिल्पांकित केलेले बघायला मिळतात.





 

पुणे परिसरातील योग-साधना व संबंधित शिल्पे

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आधुनिक जीवनशैलीमुळे आरोग्यसंबंधीच्या निर्माण झालेल्या अनेक समस्या तसेच दिवसेंदिवस वाढत चाललेला ताण-तणाव, यांवरती उपाय म्हणून योगसाधनेकडे जग मोठया आशेने पाहत आहे. दैनंदिन जीवनात आरोग्य विषयीचे महत्त्व आपल्या पूर्वजांनी फार पूर्वीपासूनच ओळखले होते. यासाठी त्यांनी योगसाधनेला आपलेसे केले. अनेक ऋषी-मुनींनी योगविद्येच्या बळावर आपले व इतरांचे जीवन आरोग्यदायी बनविण्याचा प्रयत्न केला. जागो-जागी असणारे सांप्रदायिक मठ तसेच गुहा-कंदरांमध्ये ही साधना चालत असे. वरचेवर यात नवनवीन प्रयोग झाल्याने ही विद्या भरभराटीस आली. कित्येक प्राचीन मंदिरांवरती शिल्पकलेच्या रुपात आपल्याला याचे पुरावे मिळतात.


अर्ध-मत्स्येंद्रासन, ब्रह्मनाथ मंदिर, पारुंडे
आपला हा प्राचीन वारसा अनेक ग्रंथ व मौखिक परंपरेने तर जपला गेला आहेच, परंतु हा एवढया पुरताच मर्यादित न राहता शिल्पकलेच्या माध्यमातूनही जोपासण्याचा प्रयत्न झाला. योगविषयीची अनेक आसने, मुद्रा, प्राणायामांचे प्रकार शिल्पबद्ध केले गेले. पुणे परिसरात व जिल्ह्यात इतरत्र अशा प्रकारची शिल्पे व अवशेष आपल्याला पहावयास मिळतात.
आज पुणे शहरातील ‘अय्यंगार योग संस्था’ तसेच लोणावळ्यातील ‘कैवल्यधाम’ व ‘लोणावळा योग संस्था’ योगविद्येच्या प्रचार व प्रसारासाठी कार्यरत असल्या तरी, ही परंपरा पुण्यासाठी नवीन नाही. इसवीसन १७५४ ते १७७० या काळात सोमवार पेठेत बांधल्या गेलेल्या त्रिशुंड गणपती मंदिर व मठात योगविद्येची साधना केली जात असे. साधकांना योग्य प्रकारे साधना करता यावी म्हणून विशिष्ट खोल्यांची रचनाही येथे केली गेली होती. येथे ‘धुम्रपान’ नावाची एक विशिष्ट साधना होत असे. त्यामध्ये हठयोगाचे साधक स्वतःला छताला उलटे टांगून घेत व खाली निखाऱ्यामध्ये काही औषधी वनस्पती टाकल्या जात व त्यापासून निघालेला धूर ते नाकाद्वारे घेत असत. यामध्ये संभवतः दशनामी गोसावी पंथातील साधक हठयोगाची साधना करीत. येथे काही योगसाधकांच्या समाध्याही आहेत. अशा या योग-स्मारकाचे संवर्धन करून त्याचा विकास करणे अगत्याचे आहे.
पुण्यापासून साधारणतः ५४ किमी अंतरावर पिंपरी-दुमाला नावाचे गाव आहे. येथील सोमेश्वर मंदिरावर कुंडलिनी योग विषयीचे महत्त्व सांगणारे दुर्मिळ शिल्प आहे. सुमारे सातशे वर्षांपूर्वी हे मंदिर बांधले गेले. या मंदिराच्या प्रदक्षिणामार्गावर संभवतः आदिनाथांची एक अतिशय दुर्मिळ प्रतिमा आहे. आदिनाथ अर्थात शिव. यामध्ये ते समाधिस्थ योगीच्या रुपात साकारले गेले असून ते पद्मासनात बसले आहेत. त्यांचा उजवा हात ‘सूची’ मुद्रेत आहे. सर्वात वैशिष्ट्यपूर्ण गोष्ट म्हणजे शिल्पकाराने त्यांच्या डोक्यावर अर्धवट उमललेले कमळ दाखविले आहे. हे कमळ योग साधनेत खूप महत्त्वाचे प्रतिक मानले जाते. मानवी शरीरात कुंडलिनीरूपाने ‘शक्ती’ सुप्त अवस्थेत असते तसेच मस्तकातील सहस्रारांत शिवाचा निवास असतो. कुंडलिनीचा प्रवास मेरुदंडाजवळील मूलाधार चक्रापासून सुरु होऊन त्यानंतर स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र आणि आज्ञा चक्र अशा सहा चक्रांना ओलांडून सहस्रारांत संपतो. योगी ह्या कुंडलिनीरुपी शक्तीला जागृत करून सुषुम्ना नाडीच्या माध्यमातून शक्ती व शिवाचे मिलन सहस्रारांत घडवून आणतो आणि हे सहस्रार रुपी कमळ उमलले जाते अर्थात योग्यास परमानंदमय समाधी प्राप्त होते. असे हे अनन्यसाधारण शिल्प येथील मंदिरावर कोरण्यात आले आहे. पुणे परिसरात योगसाधनेचा प्रचार-प्रसार किती मोठ्या प्रमाणात झाला होता याचे हे उत्तम उदाहरणच होय. सोमेश्वर मंदिरांवरील या शिल्पांमध्ये नाथ संप्रदायातील इतर हठयोगीही दाखविले आहेत. यामध्ये मत्स्येंद्रनाथ व गोरक्षनाथांची शिल्पे या भागात दुर्मिळच म्हणावी लागतील. योगसाधनेच्या उज्ज्वल परंपरेमध्ये पिंपरी-दुमाला येथील मंदिरावरील हठयोगाच्या महान गुरूंची शिल्पे राष्ट्रीय संपदा ठरावीत अशी आहेत.

कुंडलिनी योग संबंधीचे शिल्प, पिंपरी-दुमाला
कुंडलिनी योगाचे ज्ञानेश्वरांनी आपल्या ग्रंथात भरपूर विवेचन केले आहे. आळंदी येथे इंद्रायणी काठी तर ८४ सिद्धांचा मेळा भरत असे. या सिद्धांपैकी काही सिद्ध हे हठयोगी होते. ज्ञानेश्वरांच्या परंपरेतील नाथ-योग्यांच्या समाध्या आजही ज्ञानेश्वर मंदिर परिसरात पहावयास मिळतात.
पुण्यापासून साधारणतः ५४ किमी अंतरावर प्रसिद्ध असणाऱ्या प्राचिन भुलेश्वर मंदिरातही सिद्धांची बरीच शिल्पे आहेत. त्यांना पद्मासन, सिद्धासन यांसारखी विभिन्न आसने व मुद्रांमध्ये दर्शविले आहे. किंबहुना येथील एक सुंदर शिल्प विशिष्ट अशा द्विपादशिरासनात असून साधकाने यात आपल्या पाठीमागे दोन्ही पाय एकमेकांत अडकविले आहेत. 
द्विपादशिरासन/पाशिनी मुद्रा, भुलेश्वर मंदिर
जुन्नरपासून साधारणतः १० किमी अंतरावरील पारुंडे गावातील ब्रह्मनाथ मंदिराच्या खांबांवरती विविध ध्यान-धारणा व आसनातील अनेक शिल्पे कोरण्यात आली आहेत. उर्ध्व-धनुरासन, गरुडासन, नौकासन, प्रसारित-पादोत्तानासन, गोमुखासन, पाद-पश्चिमोत्तानासन, अनंतासन, अर्ध-मत्स्येन्द्रासन, क्रौंचासन अशा किती तरी आसनांचे प्रकार येथे कोरले गेले आहेत.
पाद-पश्चिमोत्तानासन, ब्रह्मनाथ मंदिर, पारुंडे
येथूनच पुढे हरिश्चंद्रगडावर प्रसिद्ध योगी चांगदेव यांनी ‘तत्त्वसार’ नावाचा ग्रंथ लिहिला होता. त्यामुळे हा परिसर एकेकाळी योग साधकांच्या गर्दीने फुलून गेलेला असावा असे दिसते. अशा या दर्जेदार वारशामुळे सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्षेत्रांबरोबरच योगसाधनेच्या परंपरेतही पुणे परिसर व जिल्ह्याचे महत्त्व ठळकपणे दिसून येते.
योग विद्येचे जागतिक महत्त्व ओळखून या स्थळांचे व्यवस्थितरित्या संगोपन व संवर्धन होणे गरजेचे आहे. योगसाधनेच्या परंपरेत आपणासही असा प्राचीन वारसा लाभला आहे, याचा अभिमान सर्वांनी बाळगायला हवा. या अवशेषांचे अस्तित्त्व टिकून राहणे म्हणजे आपले व आपल्या पूर्वजांचे अस्तित्त्व टिकून राहण्यासारखे आहे. हा अनमोल ठेवा नाहिसा होण्याअगोदर त्याची माहिती सर्वदूर पोहोचवून त्याचे महत्त्व जगासमोर मांडणे गरजेचे आहे. संपूर्ण विश्व योगसाधनेला जवळ करीत असताना आपणही या निमित्ताने आपल्या पूर्वजांप्रमाणे योगविद्येला अंगीकारून आपल्या जीवनाचा अविभाज्य घटक बनवायला हवे. आपल्या भारतीय योगपरंपरेचे हे प्राचीन दुर्मिळ पुरावे निश्चितच संपूर्ण जगासाठी मार्गदर्शक व प्रेरक ठरतील व आपल्या पूर्वजांचे महान कार्य शिल्परूपाने बोलू लागतील.
 
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मिथक शिल्पे – किन्नर किन्नरी

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ग्रीक पुराणकथांमधील पंखधारी घोडा अर्थात पेगॅससबद्दल काही कथा आपण बघितल्या. याच पंखधारी घोडय़ाबद्दल अजून एक बाब म्हणजे कॉरिन्थच्या नाण्यांवर पंख असलेल्या पेगॅससचा छाप दिसून येतो. इ.स.पूर्व 4 थ्या शतकातील कॉरिन्थच्या चांदीच्या नाण्यावर पंखधारी पेगॅसस कोरलेला आहे. त्याच कालखंडात निर्माण झालेल्या लाम्पसॅकसच्या नाण्यांच्या मागच्या बाजूवरसुद्धा पंखधारी अश्वाचे शिल्प बघायला मिळते. म्हणजेच कलेमध्ये या पंखधारी घोडय़ाचे स्थान जसे शिल्पांमध्ये आहे तसेच ते नाण्यांवरसुद्धा दिसून येते. पंखधारी घोडय़ासारखा अजून एक चमत्कारिक प्राणी आपल्याला दिसतो तो म्हणजे पंखधारी हत्ती.

अमरावती, सांची, नागार्जुनकोंडा इथल्या उडणाऱया हत्तींची शिल्पे बुद्धजन्माच्या चमत्काराची घटना दाखवतात. या शिल्पांमधे जरी हत्तींना पंख दाखवले नसले तरीसुद्धा त्यांच्या शिल्पांवरून ते आकाशात विहार करताहेत हे स्पष्टपणे समजून येते. अर्थात हत्तींना पंख दाखवणे हे काही हिंदुस्थानी कलाकारांना अगम्य नव्हते. अमरावती इथल्या शिल्पांमधून आपल्याला पंख असलेले हत्ती शिल्पांकित केलेले बघायला मिळतात.

 हिंदुस्थानी पौराणिक कथांमधील इंद्राचा ऐरावत हा हत्ती आणि बौद्ध धर्मातला ऐरावत हे दोन्हीही हत्ती खूप उंच, अगदी स्वर्गापर्यंत भरारी घेतात असेच समजलेले आहे. याच ऐरावताच्या रूपावरून प्राचीन हिंदुस्थानी कलाकारांना हत्तींना पंख दाखवण्याची कल्पना सुचली असावी. पावर्ती सम्राटाची सात लक्षणे म्हणून जी रत्ने दाखवतात, त्यापैकी हत्ती हे एक रत्न आहे. ज्याला ‘उपोसतन श्रेणीचे’ रत्न समजले जाते. कलिंगबोधी जातकामधील राजपुत्र हत्तीवर बसून आकाशात फिरून येतो अशी कथा येते, तर वेस्संतर जातकानुसार पाऊस पाडणारा हत्ती हा एक स्वर्गीय हत्ती दाखवला असून तो उडू शकतो असे उल्लेख येतात. उडणे ही ािढया पक्ष्यांशी संबंधित असल्यामुळे शिल्पांमध्ये जमिनीवरील प्राण्याच्या शरीराला पक्ष्याचे पंख जोडलेले दाखवून तो एक उडणारा प्राणी म्हणून दाखवला जातो. हत्ती, हत्तीशास्त्र यावर ग्रंथनिर्मितीसुद्धा झालेली आहे. त्यातलाच एक ‘मातंगलीला‘ हा हत्तीशास्त्रावरील महत्त्वाचा ग्रंथ. या ग्रंथात हत्ती आणि त्यांना असलेल्या पंखांची चित्रे काढलेली आहेत. तंजावर इथल्या सरस्वती महाल ग्रंथालयात हा ग्रंथ बघायला मिळतो.

पंखधारी हत्तींनंतर एक महत्त्वाचा प्रकार आपल्याला बघायला मिळतो तो म्हणजे किन्नर आणि किन्नरी हा होय. त्यांच्याबद्दल खूप रंजक अशा कथा प्रसिद्ध आहेत.

किन्नर आणि किन्नरी

किं-नर? म्हणजे हे नर आहेत का ? किन्नर या नावातच हा प्रश्न विचारला आहे. माणसासारखे दिसणारे, पण मनुष्यप्राणी नाहीत असे हे जीव आहेत. अर्धा माणूस, अर्धा घोडा आणि पक्षी असे स्वरूप असणारे हे किन्नर. हे किन्नर यक्ष, गंधर्व या श्रेणीत मोडतात. प्राचीन हिंदुस्थानी कलेमध्ये किन्नरांचे आकर्षक शिल्पांकन केले आहे. तिथे त्यांचे दर्शन अनेकदा होते. सांची, भारहूत, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, मथुरा इथल्या शिल्पांमधून आपल्याला बऱयाच ठिकाणी किन्नर शिल्पे दिसून येतात. अजिंठा चित्रकलेतही किन्नरांचे चित्रांकन केलेले आहे. बऱयाचदा हे किन्नर, स्तूपाच्या भोवती कोरलेले दिसतात. इथे ते स्तूपाची पूजा करताना दाखवलेले असतात. हातात फुलांचा हार किंवा हातात तबक आणि त्या तबकात फुले घेऊन ते स्तूपाच्या पूजेला जाताना दाखवतात. ते बोधीवृक्ष, धर्मपा यांच्या समवेत दिसतात, तर काही ठिकाणी ते हातात तंतुवाद्य घेतलेले दिसतात. प्राचीन हिंदुस्थानी कलेत किन्नरांचे शिल्पांकन विपुल प्रमाणात बघायला मिळते.
किन्नरींची शिल्पे ही किन्नरांच्या इतकी विपुलतेने दिसत नाहीत. किन्नरी ही सर्वसाधारणपणे किन्नरासोबतच दाखवलेली असते. अजिंठय़ाच्या चित्रकलेत किन्नर-किन्नरींची चित्रे फार सुरेख चितारलेली आहेत. अजिंठय़ाच्या भित्तीचित्रात हातात झांजा घेतलेल्या किन्नरीचे चित्र फारच लक्षवेधक आहे. विष्णुधर्मोत्तर पुराणात किन्नराचे वर्णन अर्धा माणूस आणि अर्धा घोडा असे आलेले आहे, परंतु बौद्ध धर्मीयांच्या समजुतीनुसार किन्नर म्हणजे अर्धा माणूस आणि अर्धा पक्षी होय. बोधगयेला एका यक्षाचे शिल्प आहे. तिथे त्या यक्षाचे डोके घोडय़ाचे आहे. वस्तुत ही एक किन्नरी असून जातकातील चित्रकथेनुसार तिला गंधर्व मानले गेले आहे. जातकातील नोंदीनुसार किन्नर हे परी वर्गातले असून ते नेहमी जोडीने जाताना दाखवतात. त्यातून त्यांचे एकमेकांप्रती प्रेम आणि निष्ठा दाखवली जाते. चंद किन्नर जातकात अशाच एकनिष्ठ प्रेमाचा दाखला दिलेला आहे. किन्नर हे दीर्घायुष्यासाठीदेखील प्रसिद्ध आहेत. जातकांमधून किन्नरांचे वर्णन करताना त्यांना निष्पाप आणि निरुपद्रवी दाखवतात. ते निरागसपणे पक्ष्यांसारखे उडय़ा मारतात, संगीत आणि गाण्याचे त्यांना वेड असते. किन्नरी झांजा वाजवते तर किन्नर बासरी वाजवतात. जातक 481 मध्ये या निरागस जिवांबद्दल अजून एक वर्णन आले आहे. त्यानुसार किन्नरांना पकडले जाते आणि पिंजऱयात बंदिस्त करून नजराणा म्हणून राजाला सादर केले जाते, तर जातक 504 मधे एका किन्नराचे आत्मचरित्रच वाचायला मिळते. महाकवी कालिदास आपल्या ‘कुमारसंभव’ या नाटकात किन्नरांचे वर्णन करताना म्हणतो की, यांचा अधिवास हा हिमालयात असतो, तर जातक 485 मध्ये असे सांगितले आहे की हे किन्नर पंडारक, त्रिकुटक, मल्लनगिरी, चंदपबट आणि गंधमादन या पर्वतांवरसुद्धा राहतात.
किन्नरांबद्दल अजून काही गमतीशीर गोष्टी आहेत. त्या पुढच्या भागात बघू या.
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मिथक शिल्पे – आकाशगामी

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मागील लेखात आपण आकाशगामी म्हणजेच व्योमचरिन् या वर्गातले प्राणी बघायला सुरुवात केली होती. या प्रकारात एकापेक्षा एक आकर्षक आणि विस्मयकारक प्राणी भरलेले आहेत. त्यातल्या ग्रिफिनपर्यंत आपण येऊन पोचलो होतो. भारतीय कलेच्या बाबतीत बोलायचं झालं तर ग्रिफिन हे नंतरच्या काळात दिसणाऱया श्येन, गरुड आणि शुक-व्याल या संकल्पनेचे प्राथमिक रूप म्हणता येईल. भारतीय कलेत दिसणाऱया ग्रिफिनच्या शिल्पासारखेच ग्रिफिनचे एक शिल्प मिलेटस इथल्या ग्रीक देवता अपोलोच्या मंदिरातील एका स्तंभावर कोरलेले दिसते. त्याशिवाय इ.स.पूर्व 4-5 व्या शतकातील तिओस आणि थ्रेसच्या नाण्यांवरसुद्धा ग्रिफिनचे शिल्प आढळून येते.

ग्रिफिनबद्दल काही सुरस कथा प्रसिद्ध आहेत. ग्रिफिन हे जगाच्या उत्तर टोकावर हायपरबोरीयनचे शेजारी म्हणून वास्तव्याला असतात. ते सोन्याच्या खजिन्याचे राखणदार असतात. या खजिन्यावर एकच डोळा असलेल्या अरिमास्पियन्सचे लक्ष असते. ते हा खजिना चोरण्याच्या प्रयत्नात असतात. ग्रिफिन, हायपरबोरीयन आणि अपोलो यांचेसुद्धा सुरेख संबंध या कथांमधून येतात. अपोलो या ग्रीकांच्या देवतेने हायपरबोरीयनसमवेत काही काळ घालवला होता. त्यामुळे हायपरबोरीयन्स हे पवित्र समजले गेले. कालांतराने अपोलो आणि हेलीयस या सूर्यदेवतांचे एकत्रीकरण झाले किंवा अपोलोलाच पुढे हेलीयस असे संबोधले जाऊ लागले तेव्हा हे ग्रिफिन हेलीयसचे सारथी झाले होते. हेलीयसचा रथ हे ग्रिफिन आकाशमार्गे ओढून नेतात असे वर्णन अनेक कथांमधून येते.

 एखाद्या प्रांतातल्या लोकप्रिय झालेल्या लोककथा, त्यातले संदर्भ तसेच ठेवून किंवा त्यात काही जुजबी बदल करून जगाच्या विविध भागात प्रसारित होत असतात. ग्रिफिनच्या बाबतीत प्रसिद्ध असलेल्या अशाच काही कथांमधून ग्रिफिन्सचे वास्तव्य उत्तर भारतात असल्याचेही उल्लेख आलेले आहेत. उत्तर भारतात ग्रिफिन्सचे वास्तव्य होते. तिथे त्यांनी वाळवंटातून सोनेरी वाळू खणून काढली. त्यामुळे साहजिकच त्यांच्या शेजाऱयांचे त्या सोन्याच्या वाळूवर लक्ष गेले. ती वाळू त्यांना चोरायची तर होती, पण त्याच्या रक्षणासाठी बसलेले हे ग्रिफिन्स फारच उग्र आणि भयंकर होते. पण त्या शेजाऱयांना तर ती सोनेरी वाळू हवी होती. मग या ग्रिफिन्सच्या शेजाऱयांनी सोनेरी वाळू चोरण्यासाठी एक शक्कल लढवली. त्यांनी ग्रिफिन्सना आवर्जून खायला आणून दिले आणि जेव्हा ग्रिफिन्स खाण्यात व्यग्र होते, तेव्हा त्यांनी ती सोनेरी वाळू चोरून नेली.

पंखधारी हरीण किंवा काळवीट

पंखधारी हरीण किंवा काळविटाची दोन शिल्पे आपल्याला सांचीला दिसतात. सांची स्तुपाच्या उत्तर तोरणावर पाठीला पाठ लावून बसलेल्या या दोन पंखधारी हरणांचे शिल्प आहे. टोकदार शिंगे असलेल्या या हरणांनी आपले पंख उंचावलेले आहेत. अतिशय मोहक आणि आकर्षक असे हे शिल्प आहे. यांनाच पुढे हरीण-व्याल म्हणून संबोधले जाऊ लागले. याच तोरणाच्या मागच्या बाजूवर पंखधारी काळविटाचे एकमेव शिल्प आहे. यालासुद्धा हरीण-व्याल असेच म्हणतात. सांचीसारखेच अमरावती आणि मथुरा इथे आपल्याला पंखधारी हरीण (हरीण-व्याल) शिल्पांकित केलेले दिसून येतात.

पंखधारी घोडा 

उडणारे घोडे किंवा पंख असलेल्या घोडय़ाचे उल्लेख भारतीय आणि परकीय साहित्यातून जरी विपुल प्रमाणात दिसत असले, तरी त्या मानाने त्यांचे कलेमध्ये शिल्पांकन फारच थोडे दिसते. अशी शिल्पे दुर्मीळच म्हणायला हवीत. मात्र एक सुंदर शिल्प आपल्याला सांची स्तुपाच्या कठडय़ावर दिसते आणि दुसरे शिल्प अमरावती कलेमधे दिसून येते. हिंदू पौराणिक कथांमधून दिसणारा ‘उच्चैश्रवा’ नावाचा घोडा, हा या पंखधारी घोडय़ाचे मूळ रूप असण्याची शक्यता आहे.

बौद्ध साहित्यात बर्याच जातक कथा आहेत. या कथांमधून गौतम बुद्धाचे पूर्वीचे जन्म आणि त्यात त्याने समाजासाठी केलेले योगदान सांगितलेले असते. त्या जातक कथांच्या विषयानुसार त्यांना विविध नावे दिलेली आहेत. अशाच एका ‘वलहंस जातका’त या पंखधारी घोडय़ाचा उल्लेख येतो. या घोडय़ाचा संदर्भ बौद्ध संकल्पनेतील एका रत्नाशी आहे. तो असा की, बौद्ध संकल्पनेनुसार चक्रवर्तीपदाची काही लक्षणे आहेत. ज्यानुसार चक्रवर्ती हा सप्त रत्नांनी सुशोभित केलेला असतो. म्हणजेच त्याच्या बाजूने सात रत्ने दाखवलेली असतात. त्यातील एक रत्न म्हणजे वलह श्रेणीतला एक घोडा असतो. आणि म्हणून हा घोडा या जातककथेत दिसून येतो. या जातककथेनुसार हा घोडा, ‘विदुरपंडित’ जातकातल्या पुणक यक्षासारखा आकाशात उडू शकतो. बहुदा या कथांमधून आलेल्या उडणाऱया घोडय़ांच्या कल्पनेवरून, शिल्पकारांना प्रेरणा मिळाली असावी आणि म्हणून त्यांनी पुढे अशा उडणाऱया घोडय़ांची शिल्पे निर्माण केली असावीत.

ग्रीक पुराणकथांमधूनही उडणाऱया घोडय़ाचे उल्लेख येतात. तिथे पेगॅसस नावाच्या पंख असलेल्या घोडय़ाची कथा आहे. पॉसिडॉनचा मुलगा असलेला हा पेगॅसस. या पेगॅससचा एका पाण्याच्या झऱयाशी संबंध आलेला आहे. त्याच्या जन्माची कथा मोठी रंजक आहे. त्याच्या आईचे डोके पर्सियसने कापले. त्यानंतर तिच्या रक्तबंबाळ शरीरातून हा पेगॅसस जोरदार उसळी मारून बाहेर पडला. तो फारच उत्तेजित झालेला होता. जन्माला आल्यावर त्याने आकाशात उंच झेप घेतली. तो पहिल्यांदा जिथे विश्रांतीसाठी थांबला ते ठिकाण म्हणजे कॉरीन्थचे एक्रोपोलीस होते. नंतर तो जेव्हा पेरेनाच्या कारंज्यापाशी पाणी पिण्यासाठी थांबला तेव्हा अथेन आणि पॉसिडॉनच्या मर्जीने बेलेरोफोन याने पेगॅससला शांत केले आणि तो त्याच्यावर स्वार झाला. याच पेगॅससवर आरूढ होऊन बेलेरोफोनने युद्धात मोठमोठे विजय मिळवले. चिमेरावर मिळवलेला विजय हा त्यातल्याच एक होय. पुढे पेगॅससने त्याच्या बेलेरोफोन या स्वाराला धुडकावून लावले आणि तो उंच उंच उडत पार स्वर्गात गेला. तिथे त्याने झ्यूसबरोबर वास्तव्य केले. वीज आणि ढगांचा गडगडाट आणण्याच्या कामात त्याने झ्यूसला मोलाची मदत केली. काही लेखकांनी पेगॅससला इरॉस किंवा म्युझेसचा अश्व म्हणून संबोधले आहे. पेगॅससने ज्या ठिकाणी हेलीकॉनला आपल्या खुराने मारले, त्या ठिकाणी पाण्याचा झरा उत्पन्न झाला. ज्याला ‘अश्वाचा झरा’ असे नाव पडले. ट्रोजनजवळ असलेला हिप्पोक्रीन नावाचा झरा आणि अक्रोकोरीन्थस जवळचा पिरेन झरा यांच्या उत्पत्तीची कथासुद्धा अशीच सांगितली जाते.

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मिथकशिल्पांचे प्रकार

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आपण बघितले की, के. कृष्णमूर्तींनी त्यांच्या पुस्तकात हे इहामृग, व्याल किंवा जे काल्पनिक प्राणी वर्णन करून सांगितले आहेत, ते साधारणत तीन प्रकारांत विभागले आहेत. आकाशगामी प्राणी (व्योमचरिन्), जमिनीवरचे प्राणी (भूचरिन्) आणि पाण्यातले प्राणी (जलचरिन्). काल्पनिक प्राणी चित्रित किंवा शिल्पांकित करताना त्या प्राण्यांना दाखवलेल्या विशिष्ट अवयवांवरून त्यांचे वर्गीकरण तीन प्रकारांत केलेले आहे. मूलत तो प्राणी कोण आणि त्याला कुठले अवयव जोडले आहेत याचा विचार करून हे प्रकार ढोबळमानाने ठरवले गेले आहेत. प्राणी कुठल्या गटात बसतो वगैरे तांत्रिक बाबी सोडल्या जरी असल्या तरी यातली नाटय़मयता, प्राण्यांचे नवीन रूप, काही प्राण्यांचे परकीय कलेशी असलेले साधर्म्य यांचा ऊहापोह के. कृष्णमूर्तींनी केलेला आहे. या तीन वर्गीकरणांतला पहिला प्रकार आहे तो आकाशात उडणारे प्राणी. त्यांना ‘व्योमचरिन्’ असे म्हटले आहे.

आकाशगामी (व्योमचरिन्) – आकाशगामी म्हटले की, साहजिकच उडणे ही क्रिया अपेक्षित आहे आणि उडणे या क्रियेशी जोडला गेलेला अवयव म्हणजे पंख. त्यामुळे प्राणी जरी संमिश्र असला तरी त्याला पंख दाखवले की, तो उडणारा आहे हे लगेच समजून येते. ‘आकाशगामी’ या नावातच स्पष्ट होतं की, असे संयुक्त, काल्पनिक प्राणी (व्याल) ज्यांना पंख दाखवलेले असतील, त्यामुळे या प्रकारात जे प्राणी समाविष्ट केले आहेत त्यांचे प्रकार पुढीलप्रमाणे बघता येतील. यामध्ये पंखधारी सिंह, पंखधारी आणि शिंग असलेले सिंह, ग्रिफिन म्हणजे पंखधारी गरुडरूपी सिंह, पंखधारी हरीण, काळवीट, पंखधारी घोडे, पंखधारी हत्ती, किन्नर आणि किन्नरी, पंखधारी आणि हत्तीमुखी बैल म्हणजे पंखधारी गरुडरूपी सिंह, पंखधारी पाणमांजर, पंखधारी बकरी, सिंहमुखी कोंबडा, पंखधारी आणि सिंहाचे शरीर असलेले पुरुष आणि स्त्राr, पाच फणे असलेला नाग आणि गरुड, पक्ष्याचे शरीर असलेली स्त्राr. एवढय़ा विविधतेचे प्राणी आपल्याला ‘आकाशगामी’ म्हणजे ‘व्योमचरिन्’ या श्रेणीमध्ये सापडतात. या प्राण्यांचे शिल्पांकन किंवा चित्रांकन कुठे केलेले आहे तेसुद्धा बघू या.

 पंखधारी सिंह – पंखधारी सिंह दाखवताना सिंहाच्या पुढच्या पायाच्या बाजूने बाहेर आलेले पंख दाखवलेले असतात. त्यामुळे हे जणू आकाशातून विहार करणारे कुणी राक्षसच असावेत असा बघणाऱयाला भास होतो. हे पंखधारी सिंह शक्यतो कुठल्या तरी खांबांच्या शीर्षस्थानी कोरलेले असतात. शीर्षस्थानी कोरल्यामुळे उंचावर असलेले त्यांचे अस्तित्व ते प्राणी आकाशगामी असल्याचे दर्शवतात. अशा उंचावर कोरल्यामुळे या प्रजातीचे वास्तव्य अंतरिक्षात असते असे शिल्पकाराला ठळकपणे दाखवून द्यायचे असते. शिल्पकलेमधे पंखधारी सिंह हा बऱयाच ठिकाणी आढळतो. त्यातही विशेषकरून बघायचे झाल्यास सांची इथले शिल्प, भारहूत, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, मथुरा इथली शिल्पे आपल्याला प्रामुख्याने विचारात घ्यावी लागतील. यातही एक आश्चर्यकारक गोष्ट दिसून येते ती म्हणजे वाकाटक-गुप्त काळात हा प्रकार कलाकारांमध्ये फारसा लोकप्रिय नव्हता असे दिसते. कारण या काळातील अजिंठा लेण्यांमधील चित्रकलेत असे पंखधारी सिंह कुठेही दिसत नाहीत. तस गांधार कलेच्या कलाकारांनीसुद्धा यांचे शिल्पांकन आपल्या शिल्पकलेत केलेले दिसत नाही.

हिंदुस्थानी साहित्यात याचा उल्लेख ‘वाल्मीकी रामायणा’त ‘सिंहा: पक्षगम:’ असा केलेला आहे (रामायण, किष्किंधा 42, 16) त्या उल्लेखानुसार या पंखधारी सिंहांचे वास्तव्य जिथे सिंधू नदी समुद्राला मिळते त्या ठिकाणी असलेल्या सोमगिरी पर्वतावर होते. या स्थानाला पश्चिम दिशेचे टोक म्हणजे शेवटचे स्थान असे म्हटलेले आहे. यावरून असाही एक अंदाज बांधता येतो की, लेखकाने इराण, मेसोपोटेमिया इथल्या पारंपरिक कलाकृतींच्या पार्श्वभूमीवर हे लेखन केले असावे. कारण त्या प्रदेशात अशा अजस्र आकाराची शिल्पनिर्मिती केली जात असे. या शिल्पकृतींच्या कथा त्या देशांतून समुद्रमार्गे येणारे व्यापारी आणि प्रवासी यांच्याकडून लेखकाने ऐकलेल्या असणार आणि त्यानुसार त्याने आपल्या लिखाणात त्यांचा उल्लेख केलेला असणार. याचेच काही नमुने एका उत्खननात सापडले आहेत. इ.स.पूर्व 5 व्या शतकातल्या अॅकिमेनिड काळातला तो नमुना आहे. इकबाटन इथे झालेल्या उत्खननात काही सोन्याची भांडी मिळाली, ज्यावर पंखधारी सिंहाचे शिल्प कोरलेले सापडले. हमादान इथल्या उत्खननात कपडय़ावर लावायच्या सोन्याच्या बटणाच्या रूपात पंखधारी सिंह सापडले. तसेच पर्सिपोलीस इथल्या उत्खननात तलवारीच्या म्यानावर पंखधारी सिंहाची आकृती कोरलेली मिळाली.

पंखधारी शिंग असलेला सिंह – प्राचीन हिंदुस्थानी मूर्तींमध्ये अशा प्रकारच्या सिंहाचे शिल्प अगदी क्वचितच आढळते, पण जी शिल्पे उपलब्ध आहेत, त्यातले सर्वात सुंदर असे शिल्प सांची इथे आहे. पंखधारी, शिंग असलेला हा सिंह असून त्याच्या पाठीवर एक स्वार बसला आहे. त्या स्वाराने हातात लगाम धरलेला दाखवलेला आहे. काहीसा उग्र दिसणारा हा प्राणी आपल्याला सांची इथे बघायला मिळतो. याच्या तुलनेत अमरावती आणि नागार्जुनकोंडा इथे असलेले पंखधारी शिंग असलेले सिंहाचे शिल्प अगदीच साधे आहे.

ग्रिफिन (पंखधारी गरुडरूपी सिंह)
सिंहाचे शरीर, गरुडाची किंवा पोपटाची चोच आणि गरुडाचे पंख असलेला हा संमिश्र प्राणी. या प्राण्यांचे शिल्पांकन आपल्याला सांची इथे बऱयाच प्रमाणावर आढळते. चारही पाय दुमडून बसलेला हा प्राणी आपले पंख फुलवून मागे वळून बघतो आहे असे हे शिल्प. इथे सिंहाची आयाळ ठसठशीतपणे दाखवलेली आहे. सांची स्तूपाच्या पश्चिम तोरणावर समोरच्या बाजूला एकतर मागच्या बाजूला दोघे पाठीला पाठ लावून बसलेले ग्रिफिन आपल्याला दिसतात. इथेच 2 ाढमांकाच्या स्तूपाच्या कठडय़ावर अशा ग्रिफिनचे शिल्पांकन केलेले आहे. अशाच प्रकारचा एक ग्रिफिन मथुरा कलेमध्येसुद्धा बघायला मिळतो.

हिंदुस्थानी कलेच्या बाबतीत बोलायचं झालं तर ग्रिफिन हे नंतरच्या काळात दिसणाऱया श्येन, गरुड आणि शुक-व्याल या संकल्पनेचे प्राथमिक रूप म्हणता येईल. या ग्रिफिनच्या काही सुरस कथा आहेत. त्या पुढच्या भागात बघू या.

 

मिथक शिल्पे – शिल्प आणि चित्रांचा संदर्भ

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साहित्यातील संदर्भ पाहिल्यानंतर आपण या काल्पनिक विश्वातील प्राण्यांचे अजून कुठे कुठे संदर्भ येतात हे शोधायला गेलो की, अर्थातच कलेमध्ये त्याचे पडलेले प्रतिबिंब स्पष्ट दिसून येते. मुळात साहित्यात जे संदर्भ आले आहेत त्याचे रूपांतर कलेत होणे हे अगदी क्रमप्राप्तच आहे म्हणा. ‘मिथीकल अॅनिमल्स इन इंडियन आर्ट’ या आपल्या पुस्तकात श्री. के. कृष्णमूर्ती यांनी या संकल्पनेचा सगळा ऐतिहासिक आढावा घेतलेला आहे. त्या पुस्तकावर आधारित असलेले आणि अजून बरेच निरनिराळे संदर्भ जोडून प्रसाद प्रकाशनाने ‘मिथक शिल्पे’ हे पुस्तक प्रकाशित केले. या पुस्तकात के. कृष्णमूर्ती यांनी विचारात घेतलेली ‘इहामृग’ ही संकल्पना, त्याचे कलेत पडलेले प्रतिबिंब हे मांडले आहेच, पण त्याशिवाय श्री. ढाकी यांनी पुढे मांडलेली ‘व्याल’ ही संकल्पना आणि त्याचे हिंदुस्थानी कलेत दिसणारे रूप याचासुद्धा विचार केला आहे. तसेच के. कृष्णमूर्ती यांनी सांची, अमरावती, नागार्जुनकोंडा इथली शिल्पे आणि अजिंठा लेणीतील भित्तिचित्रे यांचाच समावेश त्यांच्या पुस्तकात केला आहे. मात्र मराठी पुस्तकात विविध लेण्यांमध्ये दिसणारे हे काल्पनिक प्राणी आणि पुढे मंदिरांवर विपुल प्रमाणावर दिसणाऱया व्याल प्रतिमा यांचासुद्धा समावेश केलेला आहे.

के. कृष्णमूर्ती यांनी त्यांच्या पुस्तकात म्हटले आहे की, त्यांनी फक्त इ.स.च्या 6व्या शतकापर्यंतचा कालावधी लक्षात घेऊन त्या कालावधीत आढळणारी मिथक शिल्पे विचारात घेतली आहेत. कारण पुढे श्री. ढाकी यांनी ‘व्याल’ ही संकल्पना त्यांच्या पुस्तकातून विस्तृतपणे उलगडून दाखवली. त्यांनी ‘द व्याल फिगर्स ऑन द मेडिएव्हल टेंपल्स ऑफ इंडिया’ या त्यांच्या पुस्तकात ‘व्याल’ या संकल्पनेबद्दल खूप सखोल अभ्यास मांडला आहे. त्यांच्या म्हणण्यानुसार अंदाजे इ.स.च्या 4थ्या शतकापासून ‘व्याल’ ही संकल्पना विकसित झाल्याचे दिसून येते.

 वर म्हटल्याप्रमाणे श्री. के. कृष्णमूर्ती यांनी इहामृगाचे कलेतील संदर्भ शोधण्यासाठी भारहूत, सांची, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, मथुरा आणि गांधार इथली शिल्पे आणि अजिंठा लेण्यांतली चित्रे यांचा विचार इथे केला आहे. हिंदुस्थानी कलेवर परदेशी कलेचा किती प्रभाव पडतो हेसुद्धा इथे दिसून येते. शिल्पातून दिसणारे हे इहामृग म्हणजे कलाकारांच्या अफलातून कल्पनाशक्तीतून निर्माण झालेला एक सुंदर कलाविष्कार आहे. प्राचीन कलेत अशा काल्पनिक किंवा पौराणिक प्राण्यांची विविधता फार मोठी आहे. ते प्राणी किती आहेत आणि कोणकोणते आहेत याची एक झलक बघायची म्हटली तर आपल्या समोर कलेचे एक मोठे दालनच उघडले जाते. ज्यात पंख असलेला सिंह, चोच असलेला सिंह, शिंग असलेला सिंह, किन्नर-किन्नरी, चेहरा माणसाचा आणि शरीर सिंहाचे किंवा हत्तीचे असा प्राणी, अर्धा माणूस आणि अर्धा घोडा, हत्तीचे तोंड असलेला माणूस, बकरीचे तोंड असलेला माणूस, सिंह-मगर-माशाची शेपूट असा संयुक्त प्राणी, पंख असलेले हरीण, पंख असलेला बैल, हत्तीचे तोंड आणि पंख असलेला बैल, पंख असलेली बकरी, गरुडाचे शरीर आणि पंख असलेला पुरुष किंवा स्त्री, नरसिंह आणि त्याला पंख, सिंह-मगर, हत्ती-मासा, हरणाला माशाची शेपूट, बकरीला माशाची शेपूट, हत्तीला विंचवाची शेपूट, सिंहाचे पंजे असलेला बैल आणि त्याला माशाची शेपूट, माशाची शेपूट असणारी जलपरी, घोडय़ाचे तोंड असलेला समुद्री मासा ज्याला हॉर्सफिश असे म्हणतात, पंख असलेली बकरी आणि तिला माशाची शेपूट असे अक्षरश अगणित व्याल प्रकार आपल्या प्राचीन हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात.

या काल्पनिक संमिश्र प्राण्यांबद्दल कलाकारांच्या मनात काय कमालीचे आकर्षण होते आणि त्याचबरोबर त्यांच्या कल्पनाशक्तीची झेप किती अफाट होती हे यावरून दिसून येते. कुठल्याही दोन भिन्न प्राण्यांच्या शरीराचे विशिष्ट भाग एकत्र करून एक नवीनच प्राणी सादर करायचा असा जणू छंदच त्यांना जडला होता. या संकल्पनेचे कलेमध्ये सादरीकरण करताना या कलाकारांची कल्पनाशक्ती किती अचाट होती याची जाणीव, हे सगळे व्याल बघताना आपल्याला प्रकर्षाने होते. हे सगळे इतक्या मोठय़ा संख्येने असलेले आणि विविध प्रकारचे प्राणी आपल्यासमोर सांगताना त्यांची वैशिष्टय़ानुसार निरनिराळ्या गटात विभागणी केली आहे. हे एवढे सगळे विविध प्रकार एकत्र करताना त्यांची काही वैशिष्टय़े लक्षात घेऊन ती इथे सादर केली आहेत. त्यांचे अवयव किंवा कुठल्या प्राण्याचे अवयव त्यांना जोडले आहेत हे विचारात घेऊन त्यांचे साधारण वर्गीकरण केले आहे. के. कृष्णमूर्तींनी त्यांच्या पुस्तकात हे इहामृग किंवा व्याल मांडताना ते साधारणत तीन प्रकारांत विभागले आहेत. आकाशगामी प्राणी (व्योमचरिन्), जमिनीवरचे प्राणी (भूचरिन्), आणि पाण्यातले प्राणी (जलचरिन्) असे हे तीन प्रकार होत. या प्राण्यांना दाखवलेल्या विशिष्ट अवयवांमुळे त्यांचे वर्गीकरण अशा तीन प्रकारांत केलेले आहे. यातले काही प्राणी दोन गटांतसुद्धा मोडतात. मूलत तो प्राणी कोण आहे आणि मग त्याला कुठले अवयव जोडले आहेत याचा विचार इथे केला आहे. मूलत तो प्राणी जर जमिनीवरचा असेल आणि त्याला पंख जोडले असतील तर त्याचा समावेश आकाशगामी प्राण्यात केला आहे. त्याचे बदललेले रूप कोणते आहे यावर तो कुठल्या गटात बसतो हे ठरवले आहे. या काही तांत्रिक बाबी जरी असल्या तरी यातली नाटय़मयता, त्या प्राण्यांचे नवीन तयार झालेले रूप, त्यातल्या काही प्राण्यांचे परकीय कलेशी असलेले साधर्म्य किंवा पूर्णपणे परदेशी कलेतच त्यांचा असलेला आढळ यांचा ऊहापोह त्या त्या वेळी केलेला आहे. के. कृष्णमूर्तींनी तर अनेक प्राण्यांच्या कथा, लोककथा यांचे खूप रंजक वर्णन केले आहे. यातल्या प्रत्येक प्रकारातील गमतीशीर प्राणी आपण इथे बघणार आहोत.

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मिथक शिल्पे – इहामृग

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मिथक शिल्पे म्हणजे प्राणी वा पक्ष्यांचे एकत्रीकरण किंवा त्यांचे संमिश्र रूप. थोडक्यात काय तर एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया प्राण्याचे शरीर अशी संयुक्त रचना करून तयार केलेली शिल्पे. अशी शिल्पे आपल्याला फार प्राचीन काळापासून भारतीय कलेमधे दिसून येतात. या प्रकाराला सरसकट ‘व्याल’ असे सध्या जरी म्हणत असले तरी ‘व्याल’ हा शब्द इ.स.च्या साधारण 6 व्या शतकानंतर वापरला जाऊ लागला. संयुक्त प्राणी ज्याला इंग्रजीत ‘मिथीकल अॅनिमल’ असं म्हटलं गेलं आहे. हे अशा प्रकारचे काल्पनिक प्राणी कलेत दाखवणे ही कलाकाराच्या कल्पनाशक्तीची उत्तुंग भरारी म्हणावी लागेल. कलाकारांच्या या कल्पनाशक्तीला जोड मिळाली ती या प्राण्यांच्या साहित्यातून येणाऱया वर्णनांची आणि त्याचबरोबर परकीय कलेच्या प्रभावाची. भारतीय कलेमध्ये अशा संयुक्त प्राण्यांच्या वापराचे संदर्भ आपल्याला अगदी प्राचीन साहित्यातून मिळतात. साहित्यात अशा प्राण्यांना ‘इहामृग’ असे म्हटले गेले आहे.

‘इहामृग’ याचा शब्दश अर्थ ‘इच्छाधारी हरीण’ असा होतो किंवा त्याचा अर्थ एक काळवीट असा आहे. मात्र ‘इहामृग’ हा शब्द काही विशिष्ट हेतूनेच वापरला जातो. काही प्राचीन साहित्यात काही ठिकाणी असेही उल्लेख सापडतात की, माणसाचा तोंडावळा हा कुठल्या तरी प्राण्याच्या किंवा पक्ष्याच्या रूपाशी साम्य दाखवतो. मग यातूनच पुढे माणसाचे शरीर आणि कुठल्याशा प्राण्याचे किंवा पक्ष्याचे तोंड असलेला प्राणी दाखवणे किंवा दोन भिन्न प्राण्यांचे एकत्रीकरण करून एखादी काल्पनिक कलाकृती करणे हे कसब कलाकारांनी साधले. यालाच पुढे ‘इहामृग’ असे म्हणू लागले. थोडक्यात काय तर ‘इहामृग’ म्हणजे कलाकाराच्या डोक्यातून आलेली कुठल्याशा संमिश्र प्राण्याची एक विलक्षण काल्पनिक प्रतिमा होय.

 साहित्यातले संदर्भ

प्राचीन भारतीय साहित्यात इहामृगाचे खूप संदर्भ सापडतात. या संदर्भांचे धागेदोरे अगदी ऋग्वेदापर्यंत गेलेले आहेत. ऋग्वेदात ‘इहामृग’ असा शब्द येत नाही, तर ‘यातु’ असा शब्द आहे. उलुकयातु म्हणजे घुबड, स्वयातु म्हणजे कुत्रा, कोकायातु म्हणजे कोकिळा, सुपर्णयातु म्हणजे गरुड तर गृध्रयातु म्हणजे गिधाड. ऋग्वेदात या सगळ्यांचा इंद्राशी संबंध जोडलेला दिसतो. ऋग्वेदात इंद्राला ‘नृयातु’ असा शब्द आहे.

माणसाचे शरीर आणि प्राण्याचे शरीर हे अर्थातच भिन्न-भिन्न साच्यांतून तयार झालेले आहे. या दोन भिन्न साच्यांच्या एकत्रीकरणातून म्हणा किंवा दोन भिन्न गोष्टींच्या संयोगातून काही काल्पनिक प्रकार उदयाला आले. कलेमध्ये असे एकत्रीकरण दाखवण्याची कल्पना हळूहळू विकसित होत गेली आणि त्यातूनच गणपती, हयग्रीव, हनुमान, वृक्षकपी, नृसिंह, नृवराह असे निरनिराळे आकार, आकृतिबंध किंवा प्रारूपे विकसित होत गेली. ऋग्वेदात अशा काही चमत्कारिक प्रारूपांचे किंवा आकृतिबंधांचे संदर्भ आलेले आहेत. जसे की चार शिंगे, दोन डोकी, तीन पाय, सात हात असलेला बैल दिसतो. तिथे त्याला ‘अग्नी’ असे संबोधले गेले आहे. तसंच ऋग्वेदात कुणा चार शिंगांच्या रेडय़ाचेसुद्धा वर्णन येते. अथर्ववेदात दहा डोकी असलेल्या ब्राह्मणाचा उल्लेख येतो. ‘दशशीर्ष दस्य’ असे त्याला म्हटलेले आहे, तर ‘शतपथ ब्राह्मणा’त दहा डोक्यांचे वासरू आणि दोन तोंडांचा गरुड यांचा उल्लेख आलेला आहे. हे सगळे प्रकार ‘इहामृग’ या संकल्पनेत गणले गेलेले आहेत. थोडक्यात काय तर प्राचीन काळी कुठल्याही अद्भुत किंवा चमत्कारिक प्राण्याला ‘इहामृग’ म्हणत असत असं दिसतं.

‘वाल्मीकी रामायणा’त इहामृगाचं चित्रमय वर्णन येते. त्यातील उल्लेखानुसार या इहामृगांचे शिल्पांकन अत्यंत सुबकतेने राजवाडय़ाच्या खांबांवर कोरलेले आहे. मात्र हे आकृतिबंध त्या खांबांवर नक्की कुठे आणि कशा प्रकारे कोरले होते याबद्दल रामायण काही बोलत नाही. त्यामुळे हे इहामृगांचे कोरीवकाम नेमके कुठे केले असेल याबद्दल निव्वळ अंदाजच बांधावा लागतो. वरील उल्लेख रामायणाच्या ‘सुंदरकांडा’त काही ठिकाणी आलेले आहेत. महाभारतातसुद्धा इहामृगासंबंधी काही संकल्पना येतात. ‘मीनवजी’ किंवा ‘गजवक्रतजश’ अशा नावाने येणारे ते उल्लेख होत (इशानाम गजवत्रानाम मुलुकानाम ततैवच मीनवाजी स्वरूपानाम). याचा अर्थ हत्तीचे किंवा घुबडाचे डोके असलेले मासे ‘मत्स्यअश्व’ या कल्पनेशी जवळीक दाखवतात.

वैदिक साहित्य किंवा रामायण, महाभारतासारखी महाकाव्ये यातून ‘इहामृग‘ ही संकल्पना कशी डोकावते, याचे थोडे थोडे विस्कळीत का होईना, पण काही संदर्भ आणि त्याची उदाहरणे आपल्याला दिसतात. यावरून ही संकल्पना तत्कालीन कलाकारांना माहिती तर होतीच, शिवाय ती त्यांच्या आवडीचीही असावी हे म्हणायला जागा आहे.

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मिथकशिल्पे – भारतीय कलेतील पौराणिक प्राणी

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>> आशुतोष बापट

प्राचीन भारतीय मंदिरे, लेणी हे आपले स्थापत्य वैभव. आपल्या पूर्वसुरींनी निर्माण केलेले हे स्थापत्य आज आपल्याला त्यांच्या कर्तृत्वाची, सामर्थ्याची आणि वैभवाची गाथा सांगतात. मंदिरे, मूर्ती, मंदिरांची रचना, त्यांचे स्थापत्य अशा अनेक विषयांवर विविध अभ्यासकांनी विपुल लेखन केले आहे. मंदिर स्थापत्य आणि मूर्तिशास्त्र हा विषयच मुळी असा आहे की, त्यावर विविधांगांनी अभ्यास करता येतो. त्यावर लेखन करता येते आणि मग त्यातले निरनिराळे पैलू उलगडून दाखवता येतात. मंदिर हे केवळ त्या देवाचे निवासस्थान न राहता ती एक सामाजिक संस्था होऊन जाते. समाजात घडणाऱया विविध गोष्टींचे प्रतिबिंब मंदिरांवर निरनिराळ्या शिल्पांच्या रूपाने आपल्याला बघायला मिळते. मग कधी ही शिल्पे युद्धाची असतात, कधी माणसाच्या दैनंदिन जीवनात घडणाऱया प्रसंगांची असतात, कधी देवदेवतांची असतात, तर कधी कामशिल्पेसुद्धा मंदिरावर कोरलेली आढळतात. या प्रत्येक शिल्पाच्या तिथे असण्याला काहीतरी अर्थ असतो, त्याचे काहीना काही प्रयोजन असते. उगाचच जागा आहे म्हणून कुठलेसे शिल्प मंदिरावर कोरले आहे असे अजिबात होत नाही. मग त्या शिल्पामागे कुठलीशी पौराणिक कथा असेल, त्या-त्या विशिष्ट देवतेचे महत्त्व समजावून सांगण्यासाठी त्या देवतेचे सामर्थ्य दाखवणारी ती शिल्पे असतील किंवा कुठल्या तत्त्वज्ञानाची ओळख त्या विशिष्ट शिल्पाच्या माध्यमातून करून दिलेली असेल. प्रत्येक शिल्प हे काहीतरी प्रयोजन घेऊनच मंदिरावर विराजमान झालेले असते. त्यामुळे या शिल्पांमध्ये खूप मोठय़ा प्रमाणावर विविधता दिसून येते. त्यांचे विषय वेगळे, त्यांची शैली वेगळी, त्यांची तऱ्हाच निराळी.

मंदिरांवर, लेणींमध्ये किंवा विविध स्थापत्यावर दिसणाऱया विविध शिल्पांमध्ये प्राणी आणि पक्ष्यांचे शिल्पांकन बघायला मिळते आणि यातसुद्धा संमिश्र प्राणी आणि पक्षी कोरलेले जेव्हा दिसून येतात तेव्हा ते बघून नक्कीच आश्चर्य वाटते. काय प्रयोजन असेल असे संमिश्र प्राणी-पक्षी इथे कोरण्याचे हे समजून येत नाही. वाघ, सिंह, मोर, गरुड, नंदी असे प्राणी आपण समजू शकतो. विविध देवतांची ती वाहने म्हणूनसुद्धा त्यांचे शिल्पांकन मंदिरावर केलेले आढळते. मात्र कधी कधी माणसाचे तोंड आणि सिंहाचे शरीर किंवा शिंग असलेला सिंह आणि पंख असलेला बैल असे जेव्हा शिल्पांकन केलेले दिसते तेव्हा मात्र यामागचे कारण काय असेल ते समजत नाही. ही शिल्पे उगाचच कोरली असतील का? की ही शिल्पे म्हणजे कलाकारांचा निव्वळ कल्पनाविलास असेल? फक्त भारतातच अशी शिल्पकला दिसून येते की जगभर हा प्रकार दिसतो? अशा संमिश्र शिल्पांना काय म्हणतात? यांचे संदर्भ कुठे साहित्यात म्हणा किंवा शास्त्रग्रंथात दिसून येतात का? असे असंख्य प्रश्न आपल्या समोर येऊन उभे राहतात आणि मग त्या प्रश्नांची उत्तरे शोधायला गेलो की, एकेक सुंदर आणि आश्चर्यकारक गोष्टी समोर येऊ लागतात. शिल्पकलेतील एक निराळेच दालन आपल्या समोर उघडले जाते. थक्क करणाऱया विविध कथा समोर येतात आणि मग आपण शिल्पकलेतील या रंजकतेचा मागोवा घेऊ लागतो. संमिश्र प्राणी, काल्पनिक प्राणी किंवा पौराणिक प्राणी अशी विविध नावे घेऊन ही शिल्पे आपल्या समोर येतात आणि त्यांचे अंतरंग उलगडू लागतात.

 या लेखमालेत आपण मंदिरांवर, लेणींमध्ये आणि विविध स्थापत्यांवर कोरलेले पौराणिक प्राणी किंवा काल्पनिक संमिश्र प्राणी यांची माहिती घेणार आहोत. इंग्रजीत या प्राण्यांना ‘मिथिकल अॅनिमल’ असे संबोधले जाते. याचा शब्दश अर्थ ‘पौराणिक प्राणी’ असा होतो. मात्र याचा पौराणिक प्राण्यांबरोबरच काल्पनिक प्राणी असाही उल्लेख असायला हवा. कारण महाकाव्ये, पुराणे यातून उल्लेख आलेले हे प्राणी मुळात काल्पनिक आहेत. माणसाच्या कल्पनाविलासातून त्यांची निर्मिती झाली आहे. साहित्यात त्यांची निर्मिती होताना मुख्यत्वे दोन विविध प्राण्यांचे एकत्रीकरण करून एखाद्या प्राण्याचे चित्रण केले गेले आहे. एका प्राण्याचे डोके आणि दुसऱया प्राण्याचे धड यांच्या एकत्रीकरणातून असे प्राणी कल्पिले गेले.

प्राचीन भारतीय कलेचा अभ्यास करताना, विशेषत शिल्पकला आणि चित्रकला या कला विविध विषयांनी, देवदेवतांच्या कथांनी आणि त्यावर आधारित शिल्पांनी, पानाफुलांच्या सजावटींनी बहरलेल्या दिसतात. याशिवाय विविध पशुपक्षी यांचाही इथे समावेश होतो. या लेखमालेचा विषय हा प्राचीन भारतीय कलेत दिसणाऱया पशुपक्ष्यांशीच निगडित आहे. जरी हा विषय भारतीय कलेत दिसणाऱया पशुपक्ष्यांसंबंधी असला तरी इथे पशुपक्ष्यांचे निव्वळ वर्णन नसून, निरनिराळ्या पशुपक्ष्यांचे एकत्रीकरण करून तयार झालेले विलक्षण, मोहक असे काल्पनिक प्राणिविश्व आणि त्यांच्यामुळे बहरलेली भारतीय कला दाखवण्याचा प्रयत्न या लेखमालेत केला आहे.

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मिथक शिल्पांचे देखणेपण

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आशुतोष बापट / वारसा वैभव

प्राणी वा पक्ष्यांचे एकत्रीकरण किंवा त्यांचे संमिश्र रूप म्हणजे एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया प्राण्याचे शरीर अशी संयुक्त रचना करून तयार केलेली शिल्पे आपल्याला प्राचीन काळापासून हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात. या व्यालप्रतिमा म्हणजेच मिथकशिल्पांचे देखणेपण उठून दिसते.

शंकराच्या मंदिरात गेल्यावर गाभाऱयाच्या उंबरठय़ावर एक राक्षसाचे तोंड कोरलेले दिसते. कार्ल्याच्या लेणीत गेल्यावर तिथल्या खांबांवर कुणी चमत्कारिक प्राणी दिसतात. राशीपा बघताना धनु राशीचे चिन्ह दाखवताना अर्धा घोडा आणि अर्धा माणूस दाखवतात. काही काही देवळांवर चांगले तीन फूट उंचीचे प्राणी दिसतात. त्यांचे तोंड हत्तीचे असते आणि उरलेला देह सिंहाचा असतो. हंपीला गेल्यावर तिथल्या विठ्ठल मंदिराच्या खांबावर एक निराळाच प्राणी दिसतो. वेगवेगळ्या प्राण्यांचे अवयव एकत्र करून घडवलेला हा प्राणी असतो. त्याचं नाव काही सांगता येत नाही. त्याचं नक्की रूप काय आहे हेदेखील समजत नाही. काय असतं हे सगळं? कशासाठी अशी रचना केलेली असते? या प्राण्यांची काही कथा आहे का? असे असंख्य प्रश्न आपल्याला पडतात आणि त्याची समाधानकारक उत्तरे काही मिळत नाहीत.

या सगळ्या प्राण्यांना मिथक प्राणी, पौराणिक प्राणी किंवा काल्पनिक प्राणी असे म्हणतात. या सगळ्याचा एक सोपा शब्द नंतर समोर येतो तो म्हणजे ‘व्यालशिल्पे’. यांना व्याल असे संबोधले जाते. प्राणी वा पक्ष्यांचे एकत्रीकरण किंवा त्यांचे संमिश्र रूप म्हणजे एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया प्राण्याचे शरीर अशी संयुक्त रचना करून तयार केलेली शिल्पे आपल्याला प्राचीन काळापासून हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात. या प्रकाराला ‘व्याल’ असा शब्द जरी सध्या रूढ झालेला असला तरी हा शब्द साधारण इ.स.च्या 6 व्या शतकानंतर वापरला जाऊ लागला. संयुक्त प्राणी ज्याला इंग्रजीत ‘मिथीकल अॅनिमल‘ असं म्हटलं गेलं आहे, त्याला आपण पौराणिक किंवा खरं तर काल्पनिक प्राणी म्हणू शकतो. हे असे प्राणी कलेत दाखवणे ही कलाकाराच्या कल्पनाशक्तीची भरारी म्हणावी लागेल. कलाकारांच्या या कल्पनाशक्तीला जोड मिळाली आहे ती या प्राण्यांच्या साहित्यातून येणाऱया वर्णनांची आणि त्याचबरोबर परकीय कलेच्या प्रभावाची. हिंदुस्थानी कलेमध्ये अशा संयुक्त प्राण्यांच्या वापराचे संदर्भ आपल्याला प्राचीन साहित्यांतूनही मिळतात. साहित्यात अशा प्राण्यांना ‘इहामृग’ असे म्हटले गेले आहे.

प्राचीन हिंदुस्थानी साहित्यात विविध ग्रंथांसोबतच मत्स्य, लिंग, हरिवंश, वायू, ब्रह्म, वामन या पुराण ग्रंथांमधूनही विविध ठिकाणी इहामृगाचा उल्लेख आलेला आहे. किंबहुना पौराणिक लेखकांनी या इहामृगांची एक यादीच दिलेली आहे. गजानन, ह्यानन, सिंहानन, व्याघ्रानन, मृगेंद्रवदन, खरमुख, मकरानन, इहामृगमुख, काकमुख, गृद्धमुख अशी अनेक नावे या यादीत दिसून येतात. कालिदासाचे प्रसिद्ध नाटक ‘रघुवंश’ यातही अर्धा हत्ती-अर्धा मत्स्य अशा एका दैत्याचा उल्लेख येतो.

इ.स.पूर्व दुसऱया शतकापासून लयनस्थापत्य महाराष्ट्रात मोठय़ा प्रमाणावर दिसून येते. चैत्यगृह आणि विहार असे लेण्यांचे स्वरूप असते. लेणीचा दर्शनी भाग (फसाड) आकर्षकरीत्या कोरलेला दिसतो. लेण्यांमध्ये असलेल्या स्तंभांवर आपल्याला प्राणी कोरलेले दिसून येतात. बेडसे आणि कार्ले तसेच लेण्याद्री इथे या प्राण्यांच्या पाठीवर कुणी एकटा स्वार तर कधी दंपती बसलेली दाखवतात. मात्र या लेण्यांमधून खूप सुंदर असे संमिश्र प्राणी कोरलेले दिसून येतात. पितळखोरा, भाजे, जुन्नर, लेण्याद्री, नाशिकची पांडवलेणी या लेण्यांतून स्फिंक्स, सेंटॉर, किन्नर कोरलेले आहेत. म्हणजे नुसते सांची, अमरावती, मथुरा इथल्या कलेतच नाहीत तर या लेण्यांतूनही या पौराणिक प्राण्यांचे दर्शन कलाकारांनी आपल्याला करून दिले आहे. यात पंख असलेला सिंह, चोच असलेला सिंह, माणसाचा चेहरा असलेला सिंह, पंख असलेले घोडे, हत्ती अशी विविधता दिसते. नाग व गरुडाचे मानवीकरण केलेली शिल्पे कोरलेली आहेत.

संमिश्र प्राणी किंवा संमिश्र पक्षी यांचे कलेतील सादरीकरण आपण सांची, भारहूत, अमरावती, नागार्जुनकोंडा इथे तसेच अजिंठा इथल्या लेणींमधील चित्रकलेत बघितले. ‘इहामृग’ अर्थात संमिश्र प्राण्यांची संकल्पना पुढे ‘व्याल’ या संकल्पनेत परावर्तित झालेली दिसून येते आणि इ.स.च्या 6 व्या शतकानंतर बांधलेल्या अनेक मंदिरांवर हे व्याल किंवा असे संमिश्र प्राणी मोठय़ा प्रमाणावर कोरलेले दिसून येतात. हे व्याल कोरताना भिन्न प्राण्यांची शरीरे एकत्र करून हे काल्पनिक प्राणी कोरले गेले आहेत. एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया एका किंवा एकापेक्षा जास्त प्राण्यांच्या शरीराचे भाग एकत्र करून असे व्याल कोरले गेले. ज्या प्राण्याचे तोंड कोरलेले असेल त्याच्या नावाने तो व्याल ओळखला जातो. उदाहरणार्थ, हत्तीचे तोंड आणि शरीर सिंहाचे असे शिल्प असेल तर त्याला ‘गजव्याल’ असे म्हटले जाते. मग मकरव्याल, अश्वव्याल, अजव्याल, गणेशव्याल अशा असंख्य व्याल प्रतिमा मंदिरांवर कोरलेल्या दिसून येतात. खजुराहो इथल्या मंदिरांवर असे व्याल दिसून येतात. महाराष्ट्राचा विचार करायचा झाला तर गडचिरोली जिह्यातल्या मार्कंडा मंदिरावर खूप मोठय़ा संख्येने व्याल कोरलेले आहेत. तारकाकृती आकारामुळे मंदिराच्या बाह्य भिंतीना अनेक कोन निर्माण होतात. उठाव असलेल्या भिंतींवर विविध देवदेवतांच्या मूर्ती कोरलेल्या दिसून येतात, तर त्या दोन मूर्तींच्या आतमध्ये असलेल्या कोनांवर व्याल प्रतिमा कोरलेल्या असतात. या व्याल प्रतिमांचे देखणेपण आणि त्यांचा ठसठशीतपणा प्रकर्षाने उठून दिसतो.

छत्तीसगडच्या पाली इथल्या मंदिरावर नरव्यालाची मूर्ती आहे. चेहरा माणसाचा आणि उर्वरित शरीर प्राण्याचे असा हा नरव्याल इथले मुख्य आकर्षण म्हणायला हवा. इथले व्यालसुद्धा हत्तीच्या पाठीवर दाखवलेले आहेत. याचा अर्थ हत्ती आणि या व्याल प्रतिमा यांचा काहीतरी संबंध असण्याची दाट शक्यता दिसते. या मंदिरावरचे व्याल फारच देखणे आहेत आणि देवतांना जसे विविध दागदागिने दाखवतात तसे विविध दागिने या व्यालांच्या अंगावर कोरलेले दिसतात. इतकी सुंदर शिल्पकला अर्थातच चकित करून टाकते. तत्कालीन कलाकारांची कलासक्त नजर आणि कुठलीही गोष्ट सादर करताना ती अतिशय मोहक रूपात सादर केली पाहिजे ही ओढ प्रकर्षाने जाणवते.

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किर्तीमुख.....

भटका जीव

🦑🦑🦑 किर्तीमुख🦑🦑🦑


आपले मंदिरे नुसती बांधायची म्हणून अजिबात बांधलेली नाहीत, मंदिर कुठलंही बघा त्यामागे मंदिराची रचना, स्थान, भौगोलिक स्थिती या सर्वांचा जबरदस्त मेळ घालुनच ते बनविलेले असते, त्यावर असलेल्या प्रत्येक शिल्पाकृतीचाही काहींना काही अर्थही  नक्कीच असतो... पण माहिती अभावी आज मात्र कशाचा कशालाच ताळमेळ नसतो... आणि म्हणून अनावधानाने त्या-त्या शिल्पाचे, मूर्तीचे नुकसान ही होत असते,आता हेच बघा ना

तुम्ही मंदीरात गेल्यावर मंदिरांच्या प्रवेशव्दारापाशी एक राक्षसाच्या तोंडासारख एक शिल्प कोरलेले असंत. 

या शिल्पाला “किर्तीमुख” अस म्हणतात. हे किर्तीमुख मंदिराच्या प्रवेशव्दारापाशी ठेवण्या मागच्या दोन प्रचलित पौराणिक कथा आहे.त्यातील पहिली.....

जालंधर नावाचा एक राक्षस होता. तो महादेवाचा मोठा भक्त होता त्याला प्रचंड भुक लागायची. कितीही खाल्ले तरी त्याची भुक कधी संपायची नाही. अश्याही स्थितीत त्याने घोर तपश्चर्या केली. 

 महादेव प्रसन्न झाले....

 बोलले....काय पाहिजे...???

  जालंधर न मागून-मागून मागितल तरी काय, त भूक लागली खायला द्या😂😂

  महादेवाने त्याला स्वत:च शरीर  खायला सांगितले,त्याने पायापासून खायला सुरवात केली उरलं फक्त तोंड आणि डोकं...तरीही त्याची भूक संपली नाही....! देवा अजून भूक लागली...म्हटल्यावर भोळ्याशंकराने मस्तपैकी स्माईल देऊन त्याला जालीम उपाय सांगितला...की जिथं जिथं मी असेल... तिथं तिथं माझ्या दारात येऊन बस आणि येणार्‍या  सर्वांची पाप खाऊन टाक...!!!

न संपणारा भंडारा आहे तो...

 कितीही खाय...तुला ती कधी कमी पडणार नाही.🤣🤣

आणि म्हणून या किर्तीमुखाच शिल्प मंदिरा च्या दारात कोरण्याची प्रथा रुढ झाली !!

कथा दुसरी.....


        एकदा पार्वतीच्या सौंदर्याची महती ऐकून महा शक्तिशाली जलंधर राक्षसाने पार्वतीस लग्नाची मागणी घालण्यास राहू ला आपला दूत म्हणून पाठवले. राहू कैलासावर गेला, आणि त्याने जलंधरासाठी पार्वती ला मागणी घातली. हे  ऐकून संतापलेल्या महादेवाच्या तिसऱ्या डोळ्यातून एक भीषण आक्राळविक्राळ प्राणी तयार झाला, आणि तो राहूवर धावून गेला. त्या प्राण्यांचे महाभयंकर रूप पाहून राहूची चिक्कार फाटली...! मग करेल तरी काय... त्याने महादेवाच्या पायावर डोकं ठेवल...! त्यामुळे महादेवाने राहूला माफ केले. राहू तिथून निघून गेल्यावर महादेव परत ध्यानस्थ झाले.

पण बाहेर आलेल्या प्राण्यांची भूक वाढत होती. त्याने महादेवाला विचारले, मी खाऊ तरी काय? महादेवांनी सांगितले, की खा स्वतःलाच.... देवाधिदेव महादेवाची चा हुकूम सर आखोंपर मानून ह्या प्राण्यांने स्वतः ला पायापासून खायला सुरवात केली आणि खात खात त्याचे फक्त डोकेच उरले. तरीही त्याची भूक भागली नाही. महादेवाचे ध्यान संपल्यानंतर त्यांना दिसले ते फक्त त्याचे डोके!!🦑 पहिला प्रश्न देवा भूक लागली😂😂


 या खाऊगिरी वर महादेव जाम खुश झाले. त्यांनी त्या डोक्याला नाव दिले कीर्तिमुख  आणि काम ही दिलं.... तेच पाप खायचं✨

ह्या जगात कधीही न संपणारी गोष्ट म्हणजे मनुष्याचे पाप,अमर्याद अशी भूक लागलेल्या किर्तीमुखाला देवाने काम दिले भक्तांची पापं खाण्याचे.!!!

ऐकंदरीत दोन्ही कथा मिळत्या-जुळत्या...!!!

व आशय ही सारखाच....


फक्त महादेवच नाही... तर  मंदिर  कुठलही असो आता हा दिसतो म्हणजे दिसतोच!!!

जागा मात्र कधी-कधी बदलत असतो...कधी मंदिराच्या शिखरावर...कधी मूर्ती मागच्या प्रभावळीवर....कधी प्रवेशद्वारच्या वर....


 जागा कुठंही असो पण काम आपलं तेच पापखायच...

असा हा कीर्तिमुख🦑✨

हल्लीच्या काळात यांच्यावरही बेरोजगारी च संकट आलं आहे....

कारण आपले येडे अंधभक्त🤦🏽‍♂️.....!!!याच्यावर पाय ठेवून मंदिरात जाण्याऐवजी यालाच ऑइल पेंट मारत आहे...कुणी पेढा खाऊ घालत आहेत...कुणी हळदी-कुंकू खाऊ घालत आहेत... तर कुणी याच्यावर बेलफुल टाकून बुजवून टाकत आहेत ह्याला....!!!🙈🙉🙊

 हे टाळायला पाहिजे🙏🏽🙏🏽

कदाचित याचमुळे  तो सध्या जरा नाराज दिसतो...🙃🙏🏽

वरच सर्व दोन-तीन वेळा वाचलं की तुम्ही कुठल्याही प्राचीन मंदिरात जा... तुम्हांला  किर्तीमुख दिसलाच म्हणून समजा...😊

(📸फोटू:-हिंडून फिरून मीच काढलेले आहेत)

✍🏾निखील

 

शिवालयों में कीर्तिमुख अलंकरण

शिवालयों में द्वारपट, स्तंभों, भित्तियों में एक भयावह मुखाकृति बनी दिखाई देती है। इस आकृति को शिल्पकार अपनी कल्पना शक्ति के अनुसार भयावह निर्मित करते थे। देखने से प्रतीत होता है कि किसी राक्षस की प्रतिमा है। भक्तजन इस मुखाकृति को प्रणाम कर आगे बढ जाते हैं। परन्तु उनके मन में हमेशा इस मुखाकृति के प्रति कौतुहल बना रहता है। कुछ मित्र मुझसे इस आकृति के विषय में हमेशा चर्चा कर अपनी जिज्ञासा शांत करते हैं। उनका प्रश्न रहता है कि इस आकृति को शिवालयों में क्यों निर्मित किया जाता है? यह आकृति शिवालयों के साथ जैन मंदिरों के शिल्प में भी पाई जाती है। खजुराहो के पार्श्वनाथ मंदिर में भी इस मुखाकृति को मंदिर शिल्प में स्थान दिया गया है।
कीर्तिमुख (भीमा-कीचक) मल्हार छत्तीसगढ़
इस मुखाकृति को कीर्तिमुख कहा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसका जीवंत निर्माण लंका के प्रवेशद्वार पर शुक्राचार्य द्वारा किया गया था। वर्णन है कि शुक्राचार्य ने "रुद्र कीर्तिमुख" नाम का दारुपंच अस्त्र लंका के प्रवेशद्वार पर स्थापित किया, बाहर होने वाली प्रत्येक गतिविधि इस पर चित्रित होकर दिखाई देती थी। इसके मुख से अग्नि का गोला निकल कर शत्रु का संहार करता था। लंका में कीर्तिमुख का अस्त्र के रुप में प्रयोग किया गया। वर्तमान में हम घरो, दुकानों एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर सी सी टी वी कैमरों का इस्तेमाल करते हैं, इसी तरह कीर्तिमुख अस्त्र का निर्माण कर प्रयोग किया गया था।

कीर्तिमुख के विषय में एक कथा मत्स्य पुराण अ 251 में आती है -  अंधकासुर के वध के समय भगवान शंकर के ललाट से पृथ्वी पर जो स्वेद बिंदू गिरे उनसे एक भयानक आकृति का पुरुष प्रकट हुआ। जिसने अंधकगणों का रक्त पान किया, परन्तु अतृप्त ही रहा। अतृप्त होने के कारण वह भगवान शंकर का ही भक्षण करने चल दिया। इस कारण महादेवादि देवों ने इसे पृथ्वी पर सुलाकर वास्तु देवता के रुप में प्रतिष्ठित किया और उसके शरीर में सभी देवताओं ने वास किया।  इसलिए यह वास्तु पुरुष या वास्तु देवता कहलाने लगा। देवताओं ने वास्तु को  गृह निर्माण, वापी, कूप, तड़ाग, गरी, मंदिर, बाग बगीचा, जीर्णोद्धार, यग्य मंडप निर्माणादि में पूजित होने का वरदान दिया। तब से यह वास्तु देवता के रुप में पूजित एवं प्रतिष्ठित है।
कीर्तिमुख (ताला) छत्तीसगढ़
एक अन्य कथा में  बताया गया है कि प्राचीन काल में  जलंधर नामक एक महाशक्तिशाली दैत्य उत्पन्न हुआ जिसने अपनी तपस्या के बल पर  ब्रह्मा को खुश करके कई वरदान प्राप्त कर लिये। इसने जंगल के मध्य अपने लिए एक भव्य भवन का निर्माण कराया और एक राक्षसी सेना भी तैयार कर ली। इससे इसकी ताकत बहुत बढ़ गई और मन में अहंकार भी समा गया। अब वह प्रतिदिन संध्या समय एक सुंदर रथ पर सवार होकर भ्रमण के लिए निकलता था और  ऐसे-ऐसे कार्यों को अंजाम दे डालता था जिससे प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठती थी।

इसी क्रम में एक दिन जलंधर रथ पर सवार होकर घूम रहा था कि एक मादक सुगंध उसके नाक में समा गई जिससे वह चकित हो उठा और चतुर्दिक दृश्यों को निहारने पर एक अद्वितीय सुंदर नारी जंगल में घूमती हुई दिखाई दी। तब वह चौंका – कौन है यह नारी? इस सुन्दरी के अंदर तो सृष्टि की सारी सुघड़ता सिमटी जैसी दिखाई दे रही है। ‘यह कैलासपति शिव की पत्नी पार्वती है’, एक सेवक ने उत्तर दिया तो वह हंस पड़ा, ‘भला उस बूढ़े शिव के साथ इस अनुपम सुन्दरी का क्या काम? मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊंगा।’ दैत्य ने मन में ठान लिया और बेचैन होकर महल में वापस लौट आया फिर अपने एक सेवक को दूत बनाकर शिव के पास भेजा।
कीर्तिमुख पंचायतन शिवालय सुरंग टीला सिरपुर छत्तीसगढ़
इस सेवक का नाम रोनू था। वह कैलास पर्वत पर पहुंचा तो भोलेनाथ योगसाधना में मगन थे। इससे रोनू तनिक सहमा किंतु शीघ्र अपनी राक्षसी प्रवृत्ति के अनुकूल जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ‘आप पार्वती को तुरंत हमारे हवाले करें क्योंकि दैत्यपति जलधर को वह पसंद आ गयी है।’ शिव कुछ सुन नहीं पाये क्योंकि उनकी आंखें मुंदी थीं और पूरा शरीर एकदम स्थिर था। मगर रोनू का हठ तो पराकाष्ठा पर पहुंच गया और अपनी बात चिल्ला-चिल्ला कर बताने लगा। उसकी चिल्लाहट से शिव की तंद्रा टूट गयी और और उन्होंने रोनू की तरफ लाल-लाल आंखों से देखा फिर क्रोध से अपने त्रिनेत्र खोल लिये। इस त्रिनेत्र के खुलते ही आक्रोश की एक रक्तिम धारा बहने लगी जिससे एक विचित्र जीव पैदा हो गया। 

इस जीव के चेहरे का आकार बाघ पशु के समान चौड़ा एवं मजबूत था जबकि हाथ-पैर रस्सी की भांति पतला तथा छिन्न। यह जीव जन्म लेते ही भूख-भूख चिल्लाने लगा और रोनू की ओर लपका। वह शिव के चरणों में गिर पड़ा और प्राण रक्षा के लिए गुहार लगाने लगा। रोनू के गिड़गिड़ाने से शिव को दया आ गयी और उन्होंने माफ कर दिया, पर उस जीव की भूख को मिटाना आवश्यक था। इससे शिव सोच में पड़ गये किंतु शीघ्र ही इस जीव का नामकरण कीर्तिमुख किया फिर प्रेमपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए समझाया – पुत्र कीर्तिमुख, जब तक भोजन का प्रबंध नहीं होता तब तक अपने ही हाथ-पैर खाकर भूख मिटा लो।
कीर्तिमुख कंसुवा शिवालय कोटा (फ़ोटो - रिंकेश अग्रवाल कोटा)
बस फिर क्या कहना था, कीर्तिमुख अपने ही हाथ-पैर पर टूट पड़ा और पेट-पीठ भी खा गया। इसके बाद गर्दन की ओर बढ़ा तो शिव ने रोकते हुए कहा  पुत्र कीर्तिमुख, तुम्हारा जीवित रहना आवश्यक है ताकि मेरी कुटिया की सुरक्षा होती रहे अत: तुम द्वार पर नियुक्त हो जाओ। शिव से आदेश पाकर कीर्तिमुख इनके द्वार  का प्रहरी बन गया और अपने जीवन को धन्य कर लिया। इस जीव के अंदर शिव-मस्तिष्क का कल्याण समाहित है, इसलिए शिवालयों में इसकी दैत्यनुमा आकृति बनाने की परम्परा है और यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति कीर्तिमुख की पूजा करके शिवालय में प्रवेश करता है उसकी प्रार्थना शिव तुरंत सुनते हैं। इसी मान्यता स्वरुप शिवालयों में कीर्तिमुख का निर्माण किया जाता है।
 

शरभ - गडकिल्ल्यांच्या द्वार शिल्पांमधील एक पौराणीक प्राणी


॥ श्री गणेशाय नमः ॥

भारतीय संस्कृती साठी वैदिक आणि पौराणिक हे महत्त्वाचे कालखंड आहेत . या कालखंडामधले काही देव, दैवत, यक्ष, गंधर्व, अप्सरा,दहा दिशांचे दिक्पाल हे जरी कालबाह्य झाले असले तरी मुर्त्यांचा स्वरूपातून ते आजही नजरेस पडतात . यातल्या बऱ्याचशा मुर्त्या त्यांच्या शैलीवरून ओळखता येतात पण बऱ्याचश्या किल्ल्याच्या मुख्य दारावर आढळणारी शरभ ह्या प्राण्याची शिल्पं आजही सर्वसामान्यांना गोंधळात टाकतात .


 चित्र क्रमांक १ . जलदुर्ग अर्नाळा येथील प्रवेशद्वारा वरील शरभ शिल्प .

चित्र क्रमांक एक मध्ये दिसणारा हत्तीच्या वरचा वाघ की सिंह असा बुचकळ्यात टाकणारा प्राणी म्हणजेच शरभ होय ! शरीर यष्टी वाघ सिंहाशी जरी मिळतीजुळती असली तरी तोंड मात्र अगदी वेगळं आहे . सर्वात महत्वाचा पडणारा प्रश्न म्हणजे ह्या शरभांचं शिल्प गडांच्या दरवाजावर का असतं ? त्यासाठी थोडा पुराणांचा संदर्भ घेऊया .

विष्णूनें नृसिंहरूप धारण करून हिरण्यकशिपूस मारले; पण खून चढल्यामुळे त्याची उग्रता कमी होईना; तेव्हां सर्व सृष्टि शंकरास शरण गेली; शंकराने दोन तोंडे, आठ पाय, दोन पंख व लांब शेपूट असलेल्या शरभाचे रूप धारण करून नृसिंहास फाडले आणि त्याचे कातडे पांघरले व डोके मुकुटावर धारण केले अशी एक कथा आहे. ( संदर्भ : मूर्तिविज्ञान, डॉ. गणेश हरि खरे ) .

हल्लीच्या काळामध्ये जसे सामर्थ्याचे प्रतीक पंचमुखी हनुमानाची प्रतिमा किंवा चित्र दरवाजावर लावण्याची पद्धत आहे तीच पद्धत जुन्या काळामध्ये किल्ल्यांच्या दरवाजावरती शरभाचे शिल्प कोरण्यात दिसून येते . तसंच लढाईच्या वेळेस स्फुरण चढण्यासाठी हर हर महादेव म्हणणार्या मराठ्यांच्या किल्ल्यांवर शंकराचे रूप असणाऱ्या शरभाचं शिल्प हा निव्वळ योगायोग असावा का? तसंच महापराक्रमी राजांच्या सन्मानार्थ आणि स्मरणार्थ कोरल्या जाणाऱ्या काही वीरगळांच्या कलशाभोवती देखील शरभ आढळतात . वीरगळ म्हणजे ?

 शरभ या प्राण्याचे अनेक प्रकार असून त्यात पंखधारी , पंख विरहित , गज जेता म्हणजे ज्याने पायात हत्तींना दाबून धरले आहे ( ह्यावरून शरभाच्या सामर्थ्य आणि विराटरूपाची कल्पना करता येते . ) , व्याघ्रजेता म्हणजे ज्याने वाघाला स्वतःच्या पायात धरले आहे असे अनेक प्रकार आहेत .


 चित्र क्रमांक २ . भुईकोट सोलापूर येथील बुरुजावरील शरभशिल्प .

सोलापूरच्या भुईकोटात जीर्णोद्धाराच्या वेळेस ही  शरभ शिल्प कोरण्यात आली . महाराष्ट्रातले बरेचसे किल्ले मराठ्यांनी जिंकल्यावर त्यांचा  जीर्णोद्धार करण्यात आला .


 चित्र क्रमांक ३ . जलदुर्ग किल्ले जंजिरा ( मुरुड ) येथील प्रवेशद्वारा वरील शरभ शिल्प .

किल्ले जंजिरा हा सिद्दी नावाच्या मुसलमान राज्यकर्त्याने बांधलेला किल्ला होता . हा अभेद्य किल्ला आजवर कोणत्याही हिंदू राज्यकर्त्यांनी जिंकला नाही हे जग जाहीर आहे .तरीही या किल्ल्यामध्ये मुख्य प्रवेशद्वाराच्या डाव्या बुरुजावर ती शरभाचे शिल्प दिसून येतं .


 चित्र क्रमांक ४ . किल्ले शिवनेरी ( शिव जन्मभूमी जुन्नर ) येथील आतल्या प्रवेशद्वारा वरील केवल शरभ शिल्प .


 चित्र क्रमांक ५ . किल्ले शिवनेरी ( शिव जन्मभूमी जुन्नर ) येथील आतल्या प्रवेशद्वारा वरील शरभ शिल्प .

चित्र क्रमांक . ५ मधील शरभ हा व्याघ्रजेता शरभ आहे . म्हणजे त्याने वाघाला पायात धरले आहे किंवा त्यावर विजय मिळवला आहे . शरभाचे बारकाईने निरीक्षण केल्यास त्याचे पंख दिसून येतात . उघडलेले तोंड आणि बाहेर आलेली जीभ त्याच्या आक्रमकतेचे प्रदर्शन करतात .


 चित्र क्रमांक ६ . किल्ले शिवनेरी ( शिव जन्मभूमी जुन्नर ) येथील मुख्य प्रवेशद्वारा वरील शरभ शिल्प .

चित्र क्रमांक सहा मध्ये शरभाचं सर्वात आक्रमक रूप दिसतं . द्विगज विजयी शरभात् पराभूतौ पक्षीदेहधारी गंडभेरुंड,  म्हणजे  एका पायात गंडभेरूड ( दोन तोंडे असणारा पक्षी ) तर बाकी दोन पायात हत्तींना चिरडणारा असा शरभ शिवनेरीच्या प्रवेश द्वारावर आढळतो . ह्या शरभाचं पण अत्यंत बारकाईने निरीक्षण केल्यास त्याचे पंख दिसून येतात म्हणून त्याचं पक्षीदेह धारी असं यथार्थ वर्णन केले आहे .

 गंडभेरुंड हासुद्धा एक पौराणिक पक्षी असून तोही  अत्यंत सामर्थ्यवान आहे . त्याची छायाचित्रे आणि माहीती मी वेगळ्या लेखात सविस्तर पणे देईन .

लोभ असावा !
- राहुल अभ्यंकर , विरार .

अतिरिक्त माहिती आणि छायाचित्रांसाठी इंस्टाग्राम वर फॉलो करा.
 
 

विरगळ - Hero stone नौकादलाचा वीरगळ ( महाराष्ट्रातील एकमेव ) एकसार ( बोरिवली , मुंबई )

                      ॥ श्री गणेशाय नमः ॥


हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसि महिम् ।
तस्मादुतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय ॥ 

भगवदगीतेच्या दुसऱ्या अध्यायाच्या ३६ व्या श्लोकात भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनाला युद्धासाठी प्रवृत्त करताना म्हणतात की " हे अर्जुना ! युद्धासाठी तयार हो कारण युद्धात मरण पावला तर तुला स्वर्गप्राप्ती होईल आणि जर का तुझा विजय झाला तर पृथ्वीचे राज्य उपभोगायला मिळेल त्यामुळे युद्धाचा निश्चय कर आणि तयार हो. "

आपल्या शास्त्रानुसार फार पूर्वीपासून युद्धांमध्ये वीरमरणाची प्राप्ती व्हावी याला अपार महत्व दिले गेलंय. आणि अशा या वीरांचे स्मरण येणाऱ्या पिढीला कायमस्वरूपी होत राहावं म्हणून जो शिल्प विशेष उदयाला आला तो म्हणजे विरगळ (Herostone )! वीरगळ समजून घेण्यासाठी त्याच्या मुळ संरचनेला समजून घ्यावं लागतं. काळ आणि स्थानपरत्वे त्याच्या रचनेत थोडं भिन्नत्व आहे परंतु वीर मरण आलेल्याचं स्वर्गरोहण आणि स्वर्गप्राप्ती या मूलभूत गोष्टी प्रत्येक शिल्पात आढळून येतात . 

वीरगळ बनवण्याची संकल्पना ही साधारणतः सातवाहन काळ म्हणजे सुमारे २२०० वर्षांपूर्वीपासून चालत आली आहे .सातवाहनांच्या व्यतिरिक्त वाकाटक, शिलाहार, राष्ट्रकुट, यादव ते अगदी मराठा साम्राज्य पर्यंत नियमित युद्ध आपण ऐकत आलो आहोत . साम्राज्यविस्तार आणि साम्राज्य संरक्षण ह्या दोन्हीसाठी युद्ध अटळ होतं. आज आपण जो वीरगळ बघणार आहोत तो महाराष्ट्रातला अत्यंत अनोखा असा नौकायुद्धाचा प्रसंग कोरलेला आणि महाराष्ट्रातला एकमेव ( नौकायुद्धाचा प्रसंग कोरलेला ) शिल्पपट आहे.

 चित्र क्रमांक १ . बोरीवली मधील एकसार गावातील शिलाहार कालीन नौकादल निदर्शक वीरगळ .

वर निर्देशित केल्याप्रमाणे चित्र क्रमांक एक मध्ये वीरगळाच्या दुसऱ्या टप्प्यात शिवपिंडी दिसून येते आणि संपूर्ण चित्रात वेगळी आणि उठावदार दिसणारी वस्तू म्हणजे त्या शिवपिंडीवर वाहिलेलं गुलाबी रंगाचे फूल ! वस्तुतः याच्या बाजुलाच एक अत्यंत सुंदर आणि लहानसं शिवमंदिर आहे .पण जुनं ते सोनं या हिशोबाने लोक आजही या वीरगळावरच्या शिवपिंडीला आस्थेने पुजतात .त्यामुळे आजही अज्ञान आणि आस्थेचा सुंदर मिलाफ बऱ्याचशा वीरगळांवरती दिसून येतो . म्हणूनच या लेखामध्ये मी वीरगळाचा प्रत्येक टप्पा आणि कप्पा उलगडून दाखवण्याचा प्रयत्न करणार आहे .

चित्र क्रमांक २ . एकसार गावातील वीरगळाचा सर्वात खालचा कप्पा (लढाई निर्देशक ).

सर्वसाधारणतः वीरगळाचा सर्वात खालचा टप्पा हा वीराच्या मृत्यूचं कारण दर्शवण्यासाठी असतो . यामध्ये विविध प्रकार असून त्याप्रमाणे वीरगळांचं वर्गीकरण केलं जातं. चित्र क्रमांक दोन मध्ये दाखवल्याप्रमाणे सदर वीरगळ हा नौका दलाच्या युद्धामध्ये आलेल्या वीराच्या वीरमरणाला दर्शवण्यासाठी उभारला गेला आहे . या सर्वात खालच्या कप्प्यामध्ये ३ नौका दिसून येतात. बारकाईने निरीक्षण केल्यास त्या शिडाच्या नौका होत्या हे दिसून येतं .सातवाहन काळामध्येच मोसमी वाऱ्यांचा शोध लागला होता आणि त्याचा वापर मुख्यत्वे व्यापारासाठी केला जात होता .सातवाहनांच्या नाण्यांवरती मिळालेलं जहाजाचं चित्र हे अधोरेखित करतं की अगदी तेव्हापासून आरमाराचं अस्तित्व भारतात होतं. शिडांव्यतिरिक्तही वल्ह्यांचा वापर नौकानयनासाठी केला जात असल्याचं दिसतं. मधल्या बोटीत बारकाईने लक्ष दिलं तर लढणारी माणस धनुष्यबाणाचा वापर करताना दिसतात तर काहीजण वल्ही मारताना दिसतात त्याचबरोबर नौकेच्या शेवटी एक माणूस सुकाणू धरून नौकेला दिशा दाखवताना स्पष्ट दिसून येतो आणि त्याला लागूनच असलेला दुसरा माणूस शिडाची दोरी सांभाळताना दिसतो. शिल्पकाराच्या कमी जागेत खच्चून जास्त शिल्प भरण्यामागचा उद्देश हा त्या घनघोर लढाईचं स्पष्ट शिल्पांकन व्हावं असा दिसतो. थोडक्यात ज्या वीराला मरण आलं ते ह्या नौका दलाच्या युद्धामध्ये आलं आणि ती लढाई बरीच घनघोर झाली असावी असं यातून आकलन होतं .


चित्र क्रमांक ३ . एकसार गावातील वीरगळाचा खालून दुसरा कप्पा ( स्वर्ग प्राप्ती निर्देशक )

सर्वात खालच्या कप्प्यात लढाईचा प्रसंग घडल्यावर त्याच्या वरच्या कप्प्यात सहसा त्या वीराला स्वर्ग प्राप्ती झाली असं अभिप्रेत करणारे शिल्प कोरलं जातं. वीराचं शौर्य आणि पराक्रम या कप्प्यातून सहज दाखवलं जातं. चित्र क्रमांक तीन मध्ये मध्यभागी असलेली शिवपिंडी वीर शिवाचा उपासक असल्याचा दर्शवते. त्याच बरोबर वीरमरण आल्यामुळे त्याच्या स्वर्ग प्राप्तीचा प्रसंग दर्शवते.  चित्र क्रमांक तीन मध्ये शिवपिंडीवर  (उजवीकडे) वाहिलेल्या गुलाबी रंगाच्या फुला च्या बाजूला एक पुरोहित उभा दिसतो. उजव्या हातातल्या भस्माच्या पुरचुंडीतून तो शंकरावरती भस्मलेपन करत असल्याचं दिसतं. पुरोहिताच्या मागे असलेल्या अप्सरा या सितार / वीणा सदृश्य तंतुवाद्य घेऊन गायन वादन करताना दिसतात. त्याच सोबत अप्सरांच्या वरती पुरोहिताचे काही शिष्यगण हे मंत्रोच्चारण करताना दिसतात . शिवपिंडीच्या दुसऱ्या बाजूला (डावीकडे) वीरगती प्राप्त झालेला वीर ( शिल्प भग्नावस्थेत ) चौरंगावर बसलेला दिसून येतो.  पुरोहित त्या वीराला वेदमंत्र सांगतात .

चित्र क्रमांक ४ . एकसार गावातील वीरगळाचा खालून तिसरा कप्पा  (स्वर्गरोहण )

वेदमंत्रांनी संपन्न झालेल्या शिव पूजनानंतर स्वर्गप्राप्ती झालेल्या वीराला अप्सरा स्वर्गात घेऊन जातात. चित्र क्रमांक चार मध्ये मधोमध वीर चौरंगावर बसलेला आढळतो ( वीराची मूर्ती पूर्ण भग्नावस्थेत ). त्याच्या आजूबाजूला चवऱ्या ढाळत उभ्या असलेल्या अप्सरा त्याच्या स्वर्गरोहणाची स्थिती दर्शवतात. वीराचा वेगळा कप्पा हा त्याने गाजवलेल्या अतुलनीय पराक्रमाचं द्योतक असतं. बऱ्याचदा अप्सरा वीराला खांद्यावर उचलून नेताना दाखवतात किंवा या शिल्पाप्रमाणे त्याच्यासाठी विशेष यानाची व्यवस्था केली जाते. 

चित्र क्रमांक ५ . एकसार गावातील वीरगळावरील कलश (मोक्षप्राप्ती ).

वीरगळावरचा कलश मांगल्यासोबतच मोक्षप्राप्तीचंही प्रतिक आहे. चित्र क्रमांक पाच मध्ये कलश अत्यंत सुबकपणे कोरलेला आहे .त्यावरती श्रीफळ ( नारळ ) शोभून दिसतं . श्रीफळाभोवती यक्षिणी फेर धरून नाचताना दिसतात . कलशाचं भव्य आकारमान आणि सौंदर्य , सुबकता हे एका राजाचं वीरगळ असल्यांचं दर्शवतात. कारण इतकं भव्य, सुबक आणि सुरेख शिल्प कोरणाऱ्या शिल्पकाराला उत्तम मानधन द्यावं लागे आणि त्यासाठी राजा किंवा त्याचं राजघराणंच समर्थ असे.

सर्वसाधारणतः कोणत्याही वीरगळावर ब्राम्ही किंवा तत्सम लिपीतला शिलालेख उपलब्ध नसतो. त्यामुळे त्यामागचा अचूक इतिहास हा छातीठोकपणे सांगता येत नाही. परंतू इतिहासकारांच्या मते एकसार येथील वीरगळाबाबत दोन मतप्रवाह आहेत. प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता हेन्री कझिंग यांच्या मते शेवटचा शिलाहार राजा सोमेश्वर आणि देवगिरीचा राजा महादेव यादव यांच्यात तेराव्या शतकात झालेल्या घनघोर युद्धात वीरमरण पावलेल्या सोमेश्वराचे हे शिल्पचित्रण आहे. तर डॉ. शिल त्रिपाठी यांच्या मते हे स्मारक गुजरातच्या परमार भोज राजा याच्या कोकण विजयाचे प्रतीक आहे. व इ.स. १०२० साली साष्टी येथील नौकादल निदर्शक वीरगळ जमीन एका ब्राम्हणाला दान दिली, असा निष्कर्ष काढला आहे. 

संदर्भग्रंथ : - इतिहासाचे मूक साक्षीदार वीरगळ आणि सतीशिळा, श्री. अनिल दुधाणे.
 
 

सोलापूरजवळील सकाट गावातील वीर स्त्रीचा वीरगळ .

 ॥ हर हर महादेव ॥


चूल आणि मूल इतकीच चाकोरीबद्ध भूमिका स्रियांनी निभावली हे आपल्याला इतिहासकारांनी मनावर अगदी सहजपणे ठसवलं. पण भारतीय इतिहास केवळ पुस्तकांमधून नाही तर शिलालेख, बारव, मंदिरं आणि वीरगळ अशा अनेकोत्तम साधनांमधून वाचता येतो. आपल्याकडे लागते ती केवळ दृष्टी ! 

मागे सोलापूरच्या सहलीमध्ये सकाट गावात एक वीरगळ माझ्या दृष्टीस पडला. मारुतीच्या मंदिरात मारुतीच्या मूर्तीशेजारीच असे दोन वीरगळ पहायला मिळतात. ही गोष्ट मला सर्वत्र आढळली की वीरगळांचा संदर्भ काहीकदा लागत नसल्याने ते गावाच्या वेशीवर, देवळांमध्ये किंवा किल्ल्यांवर कुठेतरी कडेला लावून ठेवलेले दिसतात.


चित्र क्र १ . वीरगळाचे छायाचित्र .


चित्र क्र २. वीरगळाचे संपादित केलेलं छायाचित्र .

वीरगळ म्हणजे एक शिल्पपटच असतो. आणि म्हणून त्याला टप्प्या टप्प्यानेच समजून घ्यावं लागतं.

टप्पा क्र १. खालून पहिला कप्पा.

नेहमीप्रमाणे वीरगळाचा खालचा कप्पा हा वीराच्या मृत्यूचं कारण दर्शवतो. इथे पुरुषांऐवजी दोन स्त्रिया ( पिवळा रंग ) हातात ढाल आणि तलवार घेऊन लढताना दिसतात. गुडघ्यापर्यंत आलेली वस्त्रं, केसांचा बांधलेला अंबाडा, कानात झुलणारी भली मोठी कर्णकुंडलं लक्ष वेधतात. ( चित्र क्र १ . पाहावे ) . 

टप्पा क्र २ . खालून दुसरा कप्पा.

खालून दुसरा कप्पा हा मृत्यूपश्चात घडणाऱ्या गोष्टींचं वर्णन करतो. युद्धभूमीत मृत्यू आलेल्याला स्वर्ग मिळतो अशी शास्त्रात नोंद आहे. त्याप्रमाणे दोन अप्सरा ( हिरवा रंग )ह्या मृत्यू पावलेल्या स्रीला स्वर्गात घेऊन जाण्यासाठी आलेल्या दिसतात. स्वतःच्या खांद्यावर बसवून त्या वीर स्त्रीच्या आत्म्याला स्वर्गात नेताना दिसतात. वीर स्त्री स्वत:चे दोन्ही हात अप्सरांच्या खांद्यावर ठेवून उभी दिसते. सोबतच अप्सरा हातातल्या चवऱ्या ( लाल रंग ) ढाळताना दिसतात. चवऱ्या म्हणजे पूर्वी राजे महाराजांच्या बाजूला दासी उभी राहून वारा घालत ते साधन. 

टप्पा क्र ३ . खालून तिसरा कप्पा.

या कप्प्यात वीर स्त्री मांडी घालून बसलेली दिसते. समोरच असलेल्या शिवपिंडी समोर नतमस्तक होऊन शिवआराधना करताना दिसते. स्वर्ग प्राप्ती झाल्यानंतर स्वतःच्या आराध्य देवाचं पूजन करण्याचा प्रसंग सर्वच वीरगळांवर आढळतो. असं असलं तरी बहुतांश वीरगळांवर शिवपिंडच आढळते हे विशेष.

टप्पा क्र ४ . सर्वात वरचा कप्पा.
 
सर्वात वरचा कप्पा हा सदर वीरेला मोक्ष प्राप्ती झाली हे कलशाच्या माध्यामतून दर्शवतो. कलश हा वीरगळाचा आणि वीर मनुष्याचं अंतिम ध्येय दर्शवतो. सहसा कलशाच्या रक्षणासाठी वाघ हत्ती शरभ इ. प्राणी किंवा काही मंगलचिन्ह कोरलेली असतात. ती इथे कुठेही मला आढळली नाहीत.

नेहमीप्रमाणे वीरगळावर कोणताही शिलालेख नसल्याने त्याचा काळ, लढाईचं विशिष्ट कारण इ. गोष्टींचा सहज बोध होत नाही. पण अहिल्याबाई होळकर, राणी लक्ष्मीबाई यांसारख्या प्रसिद्धी पावलेल्या रणरागिणींसोबतच अश्या काही प्रसिद्धी न पावलेल्या स्त्रियाही संसारासोबतच संरक्षणातही कर्तव्य चोखपणे बजावत होत्या हे कौतुकास्पदच ! 

लोभ असावा !
राहुल अभ्यंकर, विरार.
 
 

वीरगळ - गोधन संरक्षक ( भंडारदरा रतनवाडी )

गोधन संरक्षणाचा वीरगळ - अमृतेश्वर मंदिराजवळ , रतनवाडी, भंडारदरा

॥ हर हर महादेव ॥

यांत्रिकीकरण आणि औद्योगिकरणाच्या आधीच्या युगात पशुधन हे पण माणसाची मालमत्ता समजली जाई . ब्रिटीश काळात आणि थोडं त्यापूर्वीच्या काळात ओसरीवर झोपाळा , स्वतःची विहीर आणि गुराढोरांचा पसारा असणारा माणूसही श्रीमंत समजला जाई . शेतीसाठी पशूपालनाची गरज आणि त्या निमित्ताने का होईना पशू पक्ष्यांशी माणसांचा जिव्हाळा होता . वैदिक काळात तर गायींचा वापर चलन म्हणून केला जाई . मग कालांतराने विकत घेतलेल्या वस्तूच्या मोबदल्यात अर्धी गाय किंवा पाव गाय देणे शक्य नसल्याने इतर वस्तूंची देवाणघेवाण सुरु झालं . याची अखेर चलन व्यवस्थेत झाली तरी पशुधन, गोधन हे शब्द आजही व्यवहारात आहेत . ( संदर्भ : - प्राचीन भारतीय नाणकशास्त्र , एम. के . ढवळीकर ) . 

 ह्या पशुधनावर अनेकदा हल्ले होत असत . कधी श्वापदं ( वाघ , सिंह , कोल्हा इत्यादी ) , तर कधी टोळीयुद्ध, तर कधी चोर दरोडेखोर, इतर राज्यातले सैनिक इत्यादी पशुधनावर हल्ला करत असत . अशा वेळेला स्वतःचं पशुधन वाचवायला लोक प्राणांची बाजी लावायला ही कमी करत नसत . आणि जर या प्रसंगात ते मृत्यूमुखी पडले तर त्यांच्या बलिदाना प्रित्यर्थ त्यांच स्मारक दगडात घडवलं जाई जे येणाऱ्या पिढ्यांना साक्ष देई . असाच एक पशुधनाशी संबंधित एक वीरगळ आपण पाहणार आहोत .


चित्र क्र . १. बेवारस पडलेले वीरगळ, रतनवाडी , भंडारदरा .


चित्र क्रमांक १ मध्ये वीरगळ असेच झाडाच्या कडेला टेकवून ठेवलेले दिसत आहेत . न जाणो किती ऊन पावसाळे पाहीले असतील त्यांनी ! 


चित्र क्र . २ वर्षानुवर्षांच्या ऊन पावसाच्या आघाताने झिजलेला वीरगळ

चित्र क्रमांक दोन मध्ये झिजलेला वीरगळ दिसतो . वीरगळावर बहुतेक वेळा कोणत्याही प्रकारचं लेखन केलं जात नाही . त्यामूळे त्याच्या इतिहासाचा स्पष्ट मागोवा घेता येत नाही . तरीही त्याच्या वेगवेगळ्या टप्प्यांमधून प्रसंग पुन्हा एकदा उभा केला जाऊ शकतो. सदर वीरगळ झिजला असल्याने मी त्याला थोडं संपादित करून समजता येईल असा प्रयत्न केला आहे .


चित्र क्र . ३ . वीरगळाचे संपादित केलेले छायाचित्र .

चित्र क्रमांक ३ मध्ये दाखावलेल्या वीरगळाचे एकूण ४ कप्पे करून त्याला समजता येईल आणि प्रसंग पुन्हा उभा करता येईल . ( चित्र क्रमांक २ आणि ३ ची तुलना करून पाहाणे ) .

कप्पा क्र १ - सर्वात खालचा कप्पा .

सर्वसाधारणतः वीरगळाचा सर्वात खालचा कप्पा हा त्याच्या मृत्युचं कारण दर्शवतो . सर्वात खालच्या कप्प्यात ( पिवळ्या रंगात ) वीर मरून पडलेला दिसतो . त्याच्या सभोवती ( पांढऱ्या रंगात ) पशुधन उभे दिसते. प्रथमदर्शनी पाहताना असे वाटू शकते की तो वीर त्यांच्या पायदळी आला असावा . मात्र ते तसं नसून त्यांना वाचवताना तो धारातिर्थी पडला असं अभिप्रेत आहे.

कप्पा क्र . २ खालून दुसरा कप्पा

हा कप्पा घनघोर युद्ध दर्शवतो . धारातिर्थी पडलेला वीर ( पिवळ्या रंगात डावीकडे ) हातात ढाल आणि तलवार ( हिरवा रंग ) घेऊन लढताना दिसतो . तर त्याच्या समोर घोड्यांवर ( पांढरा रंग ) बसून हातात तलवारी ( हिरवा रंग ) घेऊन  दोन स्वार ( पिवळा रंग ) येताना दिसतात . लढाई तुल्यबळ नसली तरी अशा सेने समोर धावून जाऊन त्वेषाने लढण्याचा पराक्रम वीराने केलेला दिसतो .

कप्पा क्र . ३ खालून तिसरा कप्पा

हा कप्पा वीराला वीरगती प्राप्त झाली असं दर्शवतो . डावीकडे एक पुरोहीत ( पिवळा रंग ) ( जटाभारा वरून ओळखावं ) शिवपिंडीवर भस्मलेपन करताना आणि मंत्रोच्चारण करताना दिसतो . उजवीकडे दोन वीर ( पिवळा रंग ) शिवलिंगाची पूजा करताना दिसतात . वीर मरणामुळे झालेली स्वर्गप्राप्ती ह्या कप्प्यात दर्शवतात .

कप्पा क्र . ४ सर्वात वरचा कप्पा .

हा कप्पा कलश ( आकाशी रंग ) दर्शवतो . सदर कलश हा त्या वीराला मोक्ष प्राप्त झाला याचं प्रतिक आहे . सर्वसाधारणतः कलशाभोवती वाघ, सिंह किंवा शरभ ( शरभ म्हणजे ? ) हे कलशाचे संरक्षक म्हणून कोरले जातात . किंवा सुर्य चंद्र ( यावत् चंद्र दिवाकरो ) कोरले जातात . सदर  वीरगळावर कलशाभोवती जे काही कोरलं आहे ते अत्यंत अस्पष्ट आहे त्यामुळे त्यावर भाष्य करणं उचित ठरणार नाही .

थोडक्यात सदर वीरगळ न बोलताही त्या काळची शिल्पकला , समाजव्यवस्था, लोकांच्या मनोअवस्था आणि तत्कालीन समजुतीं बदद्ल बरंच काही सांगून जातो . म्हणूनच यांचं संवर्धन करणं ही आपली सर्वांची जबाबदारी आहे . वस्तूचं मूल्यं माहीत नसेल तर कसं काय कोणी तिला सांभाळेल ? ती कळावी म्हणून हा लेखप्रपंच .

लोभ असावा ....!
राहुल अभ्यंकर , विरार

अजून माहीती, छायाचित्र आणि अभिप्रायासाठी इन्स्टाग्राम वर संपर्क करा .
 
 

त्रिंगलवाडी गावातील घोडेस्वार सतीशिळा

॥ हर हर महादेव ॥

वीरगळांचे अनेक प्रकार आढळतात. त्यातला सर्वात वैशिष्ट्यपूर्ण प्रकार म्हणजे सतीशिळा. वीरगळ हा वीराच्या मृत्युचे कारण दर्शवतो तर सतीशिळा ही त्या वीराची पत्नी त्याच्या मृत्युनंतर  सती गेली हे दर्शवते. सतीशिळा ओळखावी कशी हे समजण्यासाठी वीरगळाचे नीर निरीक्षण करावे. त्याच वीरगळावर जर कुठेही कोपरापासून दुमडलेला हात दिसला ( चित्र क्र १ ) तर त्या वीरगळाला सतीशिळा म्हणतात. त्रिंगलवाडी किल्ल्याच्या ( ईगतपूरी, नाशिक ) पायथ्याशी प्राचीन जैन लेणी आहेत. त्यांच्या जवळ आढळलेल्या सतीशिळेबद्दल.



चित्र क्र १. सतीशिळेचं छायाचित्र.


चित्र क्र. २. सतीशिळेचं संपादीत छायाचित्र.


 चित्र क्र ३. सतीशिळेचा खालचा टप्पा

 चित्र क्र. ४. सतीशिळेचा मधला कप्पा


नेहमी प्रमाणे वीरगळ आणि सतीशिळा टप्प्या टप्याने समजून घेऊ.

कप्पा क्र १ . सर्वात खालचा कप्पा . चित्र क्र ( ३ )

सर्वात खालच्या कप्प्यात सती जाणारी स्त्री घोड्यावर बसलेली दिसते . सोबत तिच्या सहचरणी आहेत . त्यांच्या डोक्यावर सतीचे वाण आहे. 

कप्पा क्र. २ वीरगळाच्या  उजव्या बाजूला कोपरातून दुमडलेला हात ( चित्र क्र २ नारिंगी रंग )

स्वातंत्र्य पूर्व काळापर्यंत सती जाण्याची प्रथा होती.  सती जाणे म्हणजे पतीच्या निधनानंतर पत्नीने त्याच्या चितेवर आत्मदहन करून घेणे. ( सदर प्रथा काळाच्या ओघात बंद झाली असल्याने त्यावर कोणतीही टिपण्णी म्हणजेच कमेंट करू नये ही वाचकांना नम्र विनंती ). जसं युद्धात वीरमरण आलं की स्वर्ग मिळे ही भावना समाजात रूढ होती तीच भावना सती जाणे ह्या चाली बद्दल होती. त्यामुळे वीराच्या चितेवर सती जाणं हे भाग्याचं समजलं जाई. सदर वीराची पत्नी सती गेली हे दर्शवण्यासाठी कोपरापासून दुमडलेला हात दाखवला आहे. हातावर ठळकपणे दिसणाऱ्या बांगड्या पत्नी सौभाग्यासह स्वर्गवासी झाली हे ठळकपणे दर्शवण्यासाठी आहेत.

कप्पा क्र. ३ वीरगळाचा खालून दुसरा कप्पा ( चित्र क्र. ४ )

हा टप्पा वीराच्या मृत्युनंतरचा प्रसंग दर्शवतो. सदर वीर हा मृत्युपश्चात शिवपिंडीची पूजा आणि आराधना करताना दिसतो. पाय दुमडून बसलेला नंदी, त्याच्या पाठीवरचं कुबड अगदी स्पष्ट दिसतं. वीराच्या पाठी त्याची पत्नी सुद्धा हात जोडून बसलेली दिसते. शिव आराधना करून त्यांना स्वर्गप्राप्ती झाली असं दर्शवले आहे.

कप्पा क्र. ४ सूर्य, चंद्र आणि कलश 

चित्र क्र २ मध्ये कलशाच्या खाली चंद्रकोर आणि संपूर्ण सूर्य कोरलेले दिसतात. यावत्चंद्रदिवाकरो  म्हणजेच जोवर आकाशात चंद्र सूर्य असतील तोवर यांची किर्ती टिकेल असा त्याचा अर्थ आहे. पण त्यावर शिलालेख नसल्याने लढाईचं कारण, वीराचं नाव आणि इतर बारकावे लक्षात येत नाहीत. सर्वात वर कलश काढलेला आहे. कलशाचा अर्थ सदर वीर दांपत्याला मोक्षपद मिळाला असा असतो. 


लोभ असावा !

राहुल अभ्यंकर, विरार.

 

 

 

वीरगळ – हुतात्मा वीरांचे स्मारक Memorial Stone in Maharashtra
           
वीरगळ –

          महाराष्ट्रभूमी म्हणजे समरभूमी ! देव देश धर्म रक्षणार्थ पेटलेले अग्निकुंड !!! स्वातंत्र्यदेवतेच्या या यज्ञात अनेकांनी प्राणाहुती दिल्या. या हुतात्मा वीरांची स्मृती चिरकाल जिंवंत रहावी म्हणून त्यांचे स्मारक ‘वीरगळ’ रुपात उभारण्यात येई. शूरवीरांच्या पराक्रमगाथा सांगत असलेले हे स्मारक आज मात्र काहीसे दुर्लक्षित आहे. चला त्यांच्या कथा व्यथा जाणून घेऊयात ...

वीरगळ म्हणजे काय ?

       वीरगळ हा शब्द ‘वीरकल्लू-वीरकळ-वीरगळ’ याप्रकारे महाराष्ट्रात रूढ झाला. ‘कल्लू’ या कानडी शब्दाचा अर्थ ‘दगड’ असा होतो. दक्षिणेत वीरगळास ‘वीरकळ’ तर उत्तरेत ‘वीरब्रम्ह’ म्हणतात . इंग्रजीत वीरगळास ‘Herostone’ असे संबोधतात.

       थोडक्यात वीरगळ म्हणजे वीराचा दगड, अर्थात वीराच्या स्मृतीप्रित्यर्थ उभारलेला दगड.

       वीरगळ हा शब्द पुल्लिंगी आहे.

वीरगळचा इतिहास :

         अभ्यासकांच्या मते , महाराष्ट्रात आढळणारे वीरगळ साधारण आठव्या ते तेराव्या शतकातील आहेत. नंतरच्या काळात अगदी १८ व्या शतकापर्यंत वीरांच्या स्मरणार्थ उभारलेल्या शिळांवर वीरशिल्प आढळते. कर्नाटकातील वीरगळांवर शिलालेख असल्याने त्या वीराबद्दल आणि वीरगळबद्दल माहिती समजते.

        महाराष्ट्रातील वीरगळांवर मात्र शिलालेख आढळत नाही. त्यामुळे वीराचे नाव, त्याच्या मृत्यूची तिथी, युद्धप्रसंग याबाबत इतिहास मूक आहे.

     वीरगळ अभ्यासताना त्यावर शिलालेख नसल्याची उणीव नेहमी भासते. बऱ्याच वीरांचा इतिहास अंधारात राहिला.

वीरगळ रचना :

       छायाचित्रावरून वीरगळ रचना सहज लक्षात येईल.

    वीरगळ वाचन नेहमी तळातील चौकटीपासून वरपर्यंत करावे. त्यामुळे घटनाक्रम व्यवस्थित समजतो.

     तळातील चौकटीत तो युद्धप्रसंग कोरतात, ज्या युद्धात वीर धारातीर्थी पडला.

     त्यावरच्या चौकटीत अप्सरा हुतात्मा वीराला स्वर्गात नेत आहेत असे दिसते. {वीराचे स्वर्गारोहण}

     सर्वात वरच्या चौकटीत वीर स्वर्गवासी झालेला दाखवतात. तो शिवलिंग पूजताना दिसतो. सोबत शिवगण कोरलेले असतात.

   त्यावर शिखर असते. तिथे कलश व इतर शिल्पे आढळतात.

चौकट प्रसंगात व शिखरात आढळणारी विविधता :

     बहुतांश वीरगळांमध्ये चौकटप्रसंगातील क्रम सारखा असतो . खालपासून वरपर्यंत ‘युद्धप्रसंग- वीराचे स्वर्गारोहण – स्वर्गवासी वीर – शिखर याच क्रमाने शिल्पे कोरतात. यामध्ये आढळणारी विविधता....

१} युद्धप्रसंग :-

      वीरगळ मध्ये तळातील चौकटीत तो युद्धप्रसंग कोरतात, त्यात वीरास वीरमरण येते. काहींमध्ये तळातील दोन चौकटीत दोन युद्धप्रसंग दिसतात. हे दोन्ही युद्धप्रसंग एकाच वीराचे असून एकाच किंवा लागोपाठच्या युद्धातील असतात. काही ठिकाणी तळातील चौकटीत धारातीर्थी पडलेला वीर दिसतो.

     युद्धप्रसंगात वीर व त्याच्याविरूद्ध लढणारे शत्रू यांची शिल्पे दिसतात. वीरांची वेशभूषा, शत्रूसंख्या, सर्वांच्या हातातील शस्त्रे यांचे निरीक्षण करावे.

     येथे- पायदळ, घोडदळ, गजदळ, नौकायुद्ध, द्वंद्वयुद्ध यांसारखे विविध युद्धप्रकार आढळतात.

छायाचित्रे –

(१.१) यामध्ये एक वीर ढाल तलवार घेऊन दोन शत्रूंपासून लढताना दिसतो. हे पायदळातील युद्ध आहे.

१.२) या छायाचित्रात वीर एका शत्रूसोबत तलवारीने लढताना दिसेल. हे द्वंदयुद्ध आहे.

(१.३) येथे दोन युद्धप्रसंग आढळतात. प्रथम वीर चार पायदळ सैनिकांविरुद्ध लढत आहे. त्यावरच्या चौकटीत तो अश्वावर स्वार होऊन लढताना दिसेल.

हे दोन्ही युद्धप्रसंग एकाच किंवा लागोपाठच्या युद्धातील आहेत.

(१.४) यामध्येही दोन युद्धप्रसंग दाखवले आहेत. पहिल्या प्रसंगात वीर हत्तीवर स्वार होऊन लढत आहे. त्यावरच्या चौकटीत तो पायीच एका घोडेस्वार शत्रूविरुद्ध लढतोय.

(१.५) यामध्ये शेवटच्या चौकटीत धारातीर्थी पडलेला वीर दिसतो. त्यावरच्या चौकटीत तो दोन शत्रूंसोबत लढत आहे. असा प्रसंग कोरला आहे. त्याच्या हातात ‘फिरंगी’ तलवार आहे.

 २} स्वर्गारोहण :-

      युद्धप्रसंगाच्या वरच्या चौकटीत वीराचे स्वर्गारोहण दाखवतात. धारातीर्थी पडलेल्या विराला अप्सरा कैलासात नेत आहेत , या आशयाचे शिल्प असते. वीर नेहमी मध्यभागी असतो.

      वीरासोबत जितक्या जास्त अप्सरा, तितका तो वीर मोठ्या पदावरचा समजावा. काही ठिकाणी विराला पालखीचा मान मिळतो.

 

छायाचित्रे :

(२.१)या वीरगळामध्ये वीरासोबत दोन अप्सरा दिसतात.

(२.२) यामध्ये वीरासोबत चार अप्सरा कोरलेल्या आहेत.

(२.३) वीर पालखीत बसून स्वर्गास गेलेला दिसतो.

(२.४)येथे वीर प्रथम पालखीतून व नंतर पायी चालत स्वर्गाकडे मार्गस्थ झालेला आहे.

३) स्वर्गवासी वीर:

      सर्वात वरच्या चौकटीत वीर स्वर्गास गेलेला दाखवतात. वीर शिवलिंग पुजताना दिसतो. वीरासोबत शिवगणही आढळतील. वीर डाव्या बाजूस तर शिवगण उजव्या बाजूस असतात.

     काही वीरगळांमध्ये वीर – फक्त शिवलिंग , काहींमध्ये नंदीवरील शिवलिंग पूजताना दाखवतात. काहींमध्ये तर वीराला प्रत्यक्ष भगवान शिव पूजनाचा मान मिळतो. वीराच्या अधिकारपदानुसार ही विविधता आढळते.काही दुर्मिळ वीरगळांमध्ये स्वर्गवासी झालेला वीर त्याची आराध्य देवता अथवा त्याच्या पंथाची देवता पूजताना दिसतो. मग ती विष्णू, सरस्वती, गणपती अशी कोणतीही असू शकते...

छायाचित्रे :

(३.१) यामध्ये वीर शिवलिंग पूजताना दाखवला आहे. सोबत एक शिवगणही दिसतो.

(३.२) यामध्ये वीर नंदीवरील शिवलिंग पुजत आहे. सोबत सहा-सात शिवगण सनई व इतर वाद्ये वाजवताना दिसतात.

(३.३)

यामध्ये वीराला प्रत्यक्ष भगवान शंकर पूजन्याचा मान मिळाला आहे.

४} शिखर :

     वीरगळांचा सर्वात वरचा भाग म्हणजे शिखर. काही वीरगळांमध्ये शिखर आढळत नाही.

      शिखारामध्ये विविध शिल्पे – शुभलक्षणी चिन्हे कोरलेली असतात. येथे कलशासोबत पक्षी कोरले असतील तर त्यास कलशवाहक व प्राणी असतील तर त्यांना कलशसंरक्षक म्हणतात. याशिवाय येथे चंद्र-सूर्य, किर्तीमुख, कमळपुष्प यांसारखी शिल्पे आढळतात.

छायाचित्रे :

(४.१) या वीरगळामधील शिखरावर कलश कोरला आहे. कलश स्वर्गारोहनाचे प्रतिक आहे.

(४.२) यामध्ये कलशासोबत चंद्र सूर्यही कोरलेले आहेत. वीरांची कीर्ती आकाशात चंद्र सूर्य असेपर्यंत राहो, हा त्यामागचा उद्देश !

(४.३) या छायाचित्रात शिखरावर मयुरशिल्पे दिसतात. ते सुंदरतेचे प्रतिक आहेत.

(४.४) येथे शिखरावर रत्नशाखा व कमळपुष्प आढळते. ती समृद्धीची  प्रतिके म्हणून कमळपुष्प कोरतात.

(४.५) या ठिकाणी काळाशासोबत सिंह दिसतो. येथे सिंह कलशसंरक्षक आहे.

(४.६) येथे कलश व त्याच्या बाजूला हत्ती, कीर्तिमुख आढळतात. ते कलशसंरक्षक म्हणून कोरले असावेत.

(४.७) या छायाचित्रात कलशासोबत मारुती दिसतो. हुतात्मा वीराचे इष्ट दैवत म्हणून मारुती कोरला असावा.

(४.८) या छायाचित्रात एक पादुका, ढाल व सतीचा हात कोरला आहे. या वीराची पत्नी सती गेली , त्यामुळे येथे सतीचा हात दिसतो.

(४.९) येथे शिखरावर कीर्तिमुख कोरलेले आढळते. कीर्तिमुख मनुष्याचे पाय खाते, अशी दंतकथा आहे.

गोधनगळ :

           वीर जर त्याच्या गोधनाचे रक्षण करताना हुतात्मा झाला असेल तर त्याच्या स्मरणार्थ गोधनगळ उभारतात.

          यामध्ये शेवटच्या चौकटीत धारातीर्थी वीर त्याच्या गोधनासोबत दाखवतात. त्यावर युद्धप्रसंग , स्वर्गारोहण प्रसंग, स्वर्गवासी वीर, शिखर असे अनुक्रमे कोरतात.

व्याघ्रशिल्प असलेला वीरगळ:

     वाघाला मारताना वीर मुत्युमुखी पडला असेल तर त्याच्या स्मरणार्थ व्याघ्रगळ उभारला जाई.

     यात तळातल्या चौकटीत वीर वाघासोबत लढताना दाखवला जात असत. त्यावर स्वर्गारोहण , स्वर्गवासी वीर, शिखर कोरलेले असत.


स्तंभ वीरगळ :

      काही ठिकाणी एकाच दगडाच्या चारही बाजूला चार वीरगळ कोरलेले आढळतात. ते चार वेगवेगळ्या वीरांच्या स्मारके असतात.

      या चारही वीरगळमधील चार वीर एकाच कुटुंबातील/गावातील असतात. ते सर्व एकाच युद्धात मारले गेले असतील, तर त्यांचे स्मारक अशा स्वरूपाचे आढळते.

वीरांगनागळ :

     इतिहासातील काही वेळा पुरुषांच्या बरोबरीने स्त्रियांनाही रणांगणात उतरावे लागले. या युद्धात योद्धा स्त्रियांना वीरमरण आले. म्हणूनच त्यांच्या स्मरणार्थ वीरगळप्रमाणे वीरांगनागळ उभारली गेली.

आत्मबलिदानवीरगळ :

            ही दुर्मिळ प्रकारची वीरगळ . युद्धदेवतेस बळी लागतोच अशी आपल्याकडे समजूत आहे. त्यामुळे युद्ध सुरु होण्याआधी एखादा धैर्यवान वीर आपली मान कापून शीर समरभूमीस अर्पण करी. त्याच्या स्मरणार्थ आत्मबलिदानवीरगळ उभारीत. फलटण शहरातील स्मशानभूमीजवळ आत्मबलिदानगळ पहायला मिळते.   

वीराच्या अधिकारपदानुसार वीरगळात आढळणारे बदल

      युद्धात गावकरी ,सामान्य शेतकरी यांच्यापासून ते सेनापती, राज्यापर्यंत कोणीही मृत्युमुखी पडे.

    या वीरांच्या अधिकारपदानुसार वीरगळात काही फरक असतात.  

१} मोठ्या वीरांच्या वीरगळ आकाराने मोठ्या असतात.

२} स्वर्गारोहण प्रसंगात वीरासोबत जितक्या जास्त अप्सरा तितका तो वीर मोठा समजावा. मोठ्या पदावरचे वीर पालखीतून स्वर्गारोहन करताना दाखवतात.

३} सामान्य वीराला शिवलिंग पूजनाचा मान मिळतो. मात्र वीर मोठ्या पदावरचा असेल तर त्यास नंदीवरील शिवलिंग किंवा भगवान शिवपूजनाचाही मान मिळतो. तसेच स्वर्गात त्याच्यासोबत जास्त शिवगण दाखवतात. शिवगण वाद्ये वाजवताना दिसतील.

४} मोठ्या पदावरील वीरांच्या वीरगळात शिखर कोरतात. तिथे शुभलक्षणी चिन्हेही दाखवतात. 

सतीशीळा :

    पूर्वी पती मरण पावला की त्याच्या पत्नी सती जात. त्यांच्या स्मृतीप्रीत्यर्थ सतीशिळा उभारत. सतीशिळेत सतीचा हात चुडेमंडीत कोरत असत तसेच ती स्वर्गात तिच्या पतीसोबत शिवलिंग उजळताना दाखवत. काही वेळा सती स्त्रीची गावातून घोड्यावरून मिरवणूक काढली जाई. त्यामुळे क्वचित सतीशिळांवर सती घोड्यावर बसलेली दाखवतात. बऱ्याचदा वीरांच्या एकापेक्षा अनेक सती जात. तेव्हा जितक्या पत्नी सती गेल्या तितके हात सतीशिळेवर कोरले जात.

गद्देगळ:

     एखाद्या मंदिरात दान दिले, वर्षासन दिले की त्याचा भंग होऊ नये म्हणून गद्देगळ उभारत. यात गाढव व स्त्रीचे संकर करतानाचे  शिल्प असते. त्यावर चंद्र सूर्य असतात.

    मंदिरात दिलेले वर्षासन / दान आकाशात चंद्र सूर्य असेपर्यंत चालू राहो असा त्याचा अर्थ. या शिल्पांच्या वर-खाली मोकळ्या जागेत शिलालेख असतो.

यात मंदिरास दिलेल्या इनामाबाबत व शापवाणीबद्दल {शिवीचा} उल्लेख आढळतो.

    गद्देगळ एक प्रकारची शापवाणीच आहे. मंदिरास दिलेले वर्षासन जो मोडेल किंवा मंदिराचे इनाम चोरेल/ त्याचा गैरवापर करेल त्याला हा शाप लागतो, हा गद्देगळ कोरण्यामागचा उद्देश.

वीरगळांच्या व्यथा :

       युद्धात धारातीर्थी पडलेल्या किंवा परकीय आक्रमणापासून गावचे रक्षण करताना हुतात्मा झालेल्यांचे स्मारक म्हणजे वीरगळ. पण आज त्यांची ओळख हरवली आहे. ते कुठेतरी महादेवाचे मंदिर , ग्रामदैवत किंवा गावकुसाबाहेरील दुर्लक्षित व भग्न अवस्थेत दिसतात. काही ठिकाणी तर देवाचे दगड म्हणून पूजले जातात. बहुतांश वीरगळांना शेंदूर फासल्याने त्याची झीज होते. सतीशिळा आणि गद्देगळ यांचीही तीच अवस्था. अज्ञात वीरांच्या स्मारकांची ही अवस्था म्हणजे त्यांच्या बलिदानाचा अपमान !

          वीरगळांची अशी उपेक्षा थांबली पाहिजे. त्यांना त्यांची हरवलेली ओळख मिळवून देणे, त्याबाबत जनजागृती करणे ही आपली जबाबदारी आहे. इतिहासप्रेमी म्हणून वीरगळ संवर्धनासाठी नेहमी प्रयत्नशील असावे.

वीरगळ संवर्धन

      वीरगळांची अवस्था खूप वाईट आहे. आपण त्यांचे संवर्धन केले पाहिजे. वीरगळांना शेंदूर किंवा रंग थापू नये, यासाठी गावकऱ्यांमध्ये जनजागृती करावी. अस्ताव्यस्त पडलेल्या वीरगळ त्यांना ऊन वारा पाऊस लागणार नाही , अशा ठिकाणी ठेवाव्यात . त्यामुळे त्यांची झीज थांबेल. जमल्यास वीरगळबाबत माहिती देणारा बोर्ड तिथे लावावा. पुरातत्व खात्याकडे वीरगळ नोंदणीचे फॉर्म मिळतात. त्यामार्फत वीरगळ नोंदणी करावी.

      आपली संस्कृती राखणाऱ्या वीरांना मानवंदना म्हणून एवढेतरी आपण करूच शकतो !!!

बा रायगड परिवाराने दुर्ग श्रीसुधागड वर केलेले वीरगळ संवर्धन.

 

कोल्हापूर जिल्ह्यात कसबा बीड येथे शिवशक्ती प्रतिष्ठान ने वीरगळींचे खूप सुंदर स्मारक बनवले आहे .

लेख लिहिताना ....

      वरील लेख लिहिताना श्री. सदाशिव टेटवीकर यांच्या ‘महाराष्ट्रातील वीरगळ’ या पुस्तकाची खूप मदत झाली.

      तसेच सतीश शिंदे {सह्याद्रीवेडा} , सागर सुर्वे, संतोष तुपे, अमित निंबाळकर यांचे मोलाचे मार्गदर्शन लाभले. स्वप्नील खलाटे, संतोष तुपे, श्रीराम कुलकर्णी, बा रायगड परिवार यांनी छायाचित्रे पुरवली. हा लेख निखील आघाडे यांच्यामुळे pdf स्वरुपात आला.

लेख बनवण्यास मदत करणाऱ्या ज्ञात अज्ञात सर्वांचे मनपूर्वक आभार....

     संकलन/लेखन – सुजय खलाटे   

(ब्लॉग मध्ये काही त्रुटी असल्यास कमेंटबॉक्स मध्ये नक्की कमेंट करा .)  


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वीरगळ (Hero Stone)

वीरगळ (Herostone) : युद्धभूमीवर अथवा कोणत्याही संग्रामात वीरगती पावलेल्या माणसाच्या स्मरणार्थ उभारलेला वैशिष्ट्यपूर्ण दगड म्हणजे वीरगळहोय. वीरगळ हा शब्द वीर(संस्कृत) आणि कल्लू (कन्नड) अशा दोन शब्दांचा मिळून झाला आहे. कल्लू म्हणजे दगड अथवा शिळा. वीरपुरुषाची शिळा म्हणजेच वीरगळ. हे वीरगळ महाराष्ट्रात आणि कर्नाटकात बहुसंख्येने दिसतात. वीरगळाला वीराचा दगडकिंवा केवळ वीरम्हणूनही संबोधतात. वीरगळांचा उगम कर्नाटकात झाला, असे दिसते. तेथून त्यांचा महाराष्ट्रात प्रसार झाला. कन्नड प्रदेशातील कल्याणी चालुक्य, राष्ट्रकूट ह्या राजघराण्यांची सत्ता ज्या प्रदेशांवर पसरली होती, तेवढ्याच भागात वीर-कल आढळतात. महाराष्ट्रात आढळणारे वीरगळ मुख्यत्वे मराठवाडा, दक्षिण महाराष्ट्र आणि कोकणचा बोरिवलीपर्यंतचा भाग इतक्या प्रदेशात पसरलेले आहेत. यांना ऐतिहासिक व शिल्पशास्त्रीय महत्त्व आहे. बोरिवलीरेल्वे स्थानकाजवळ एकसर गावात उत्तम दर्जाच्या सात वीरगळ आहेत. त्यांवरील कोरीव कामात युध्दाचा प्रसंग दाखविलेला असून हत्तींचे चित्रण आहे. याशिवाय नौका आणि वल्ही यांचेही चित्रण आहे.  अनंत स. अळतेकर यांच्या मते हे युध्द शिलाहार राजा सोमेश्वर व यादव राजा महादेव यांच्यातील असावे यावरील शिल्पपट्टांच्या धाटणीवरून ते इसवी सनाच्या तेराव्या शतकातील असावेत. 





महाराष्ट्रात वीरगळांचे दोन प्रकार दिसतात : एका प्रकारात वीराच्या दगडावर तीन-चारबहुधा तीनचौकटी कोरून यांत काही प्रसंग कोरतात. तीन चौकटी असलेल्या वीरगळावर सगळ्यात खालच्या चौकटीत जेथे तो वीर धारातीर्थी पडला, तेथील युध्दप्रसंग कोरलेला असतो. युध्दप्रसंगांत बरेच वैविध्य असते. उदा., ढाल-तलवारींनी समोरासमोर लढणारे सैनिक, घोडेस्वारांची लढाई, गाईच्या चोरीवरून लढाई झाली असल्यास गाईंचा कळप एका बाजूला असतो. त्याला गोवर्धन शिल्प म्हणतात. नाविक युध्द असल्यास अनेक वल्ह्यांच्या नावा दिसतात. खालून दुसऱ्या चौकटीत, वीरगती पावलेल्या माणसाला अप्सरा कैलासाला नेत आहेत, असे चित्र कोरलेले असते. हा प्रवास कधी पालखीतून, तर कधी रथातून होताना दिसतो आणि सगळ्यांत वरच्या चौकटीत कैलासामध्ये शिवाच्या पिंडीची पूजा करताना तो वीर दाखविलेला असतो. वीरगळाच्या सर्वांत वरच्या बाजूला देवळाच्या कळसासारखा भाग दिसतो व त्याच्या दोन्ही बाजूंस चंद्र-सूर्य कोरलेले असतात. जोपर्यंत चंद्र-सूर्य उगवत आहेत, तोवर ह्या वीराची कीर्ती कायम राहील, हे ह्यातून सांगावयाचे असते. वीरगळावर कधीकधी चार वा पाच चौकटीही असतात. क्वचित दगडाच्या चारही बाजूंवर कोरीव काम केलेले आढळते. ह्या प्रकारातील वीरगळांचा काळ अकरावे ते तेरावे शतक असा सांगता येईल. दुसऱ्या  प्रकारात अर्धउठावातील मानवी आकृती दिसते. ह्या प्रकारातले वीरसतराव्या-अठराव्या शतकांतील आहेत, असे त्यांच्या शैलीवरून म्हणता येते. महाराष्ट्रातील बहुतांश वीरगळ हे शिलाहारकाळ आणि यादवकाळात मोठ्या प्रमाणावर उभारले गेले.

कर्नाटकातल्या वीरगळांशी महाराष्ट्रातल्या वीरगळांचे विशेष साम्य आहे. कर्नाटक-महाराष्ट्रातील वीरगळांवर वीर हा कैलासावर शिवाची पूजा करताना दिसतो; कैलासवासी होतो. मात्र कर्नाटकातील गदगसारख्या काही ठिकाणी तो शिवाऐवजी विष्णूची वा नरसिंहाची पूजा करताना दिसतो; वैकुंठवासी होतो. शैव-वैष्णव वादाची छाया वीरगळांवर ही पडलेली दिसते.

कर्नाटकातील वीर-कलांचे थोडे सूक्ष्म निरीक्षण केल्यास त्यांचे मूळ स्मृतिमंदिरांत असल्याचे स्पष्ट होते. अनेक वीर-कलांवर, चित्रचौकटींवर मंदिरांच्या प्रतिकृती कोरलेल्या आहेत. द्राविड मंदिरशिल्पाच्या प्रतिकृती स्पष्ट दिसतात. राजघराण्यांतील व्यक्तींच्या स्मरणार्थ देवांची मंदिरे बांधली जात. सामान्य माणसे मंदिरे बांधण्याऐवजी त्यांच्या छोटेखानी प्रतिकृती निर्माण करून वीरांची स्मृती जतन करीत. वीरगती पावलेल्या माणसांच्या स्मरणार्थ राजस्थानात पालियाउभारतात. मात्र येथे बऱ्याच वेळी दगडाऐवजी लाकडाचा वापर करून स्तंभ उभारले जातात. कधी फलकांचाही ह्यासाठी वापर केला जातो. 

१. रतनवाडीतील अमृतेश्वर मंदिराच्या बाजूला असणारा वीरगळ

२. राजमाचीच्या भैरवनाथ मंदिराच्या बाजूस असणारा वीरगळ

३. माहुली किल्ल्यावरील भग्नावस्थेतील वीरगळ

४. 
यादवकालीन वीरगळ : बळसाणे, जि. धुळे (महाराष्ट्र), १३ वे शतक.

५.
















गढेगाळ (शापवाणी शिल्प)

ही शिळाशिल्पे बहुतेक वेळा शापवाणी (कर्स मेकर्स) करण्यासाठी निर्मिली गेली. वीरगळांप्रमाणेच यांचा उगम शिलाहारकालीन. यादवकाळातही हे गधेगाळ कोरले गेले.
वीरगळांसारखीच यांची रचना. उभट आयताकृती दगड आणि वर घुमटी. मात्र या गधेगाळांवर शिलालेख आढळतात. मुख्य म्हणजे हे शिलालेख देवनागरीत आहेत ते ही मराठी भाषेत.
घुमटीवर चंद्र सूर्य कोरलेले, त्याखालच्या चौकटीवर शिलालेख कोरलेला. वर काही मंगलवचने तर खालच्या बाजूस अभद्र वचने कोरलेली. व त्या खाली अजून एक शिल्प कोरलेले. त्या शिल्पात स्त्रीचा गाढवाबरोबर किंवा हत्तीबरोबर संकर दाखवलेला. हे गाढव शिल्प म्हणजे गधेगाळ व जिथे हत्ती असेल ते हत्तीगाळ.
काही वेळा ह्या असभ्य शिल्पांबरोबरच वरच्या बाजूस शिवलिंगाची पूजेचे शिल्प पण कोरले गेले आहे.
नागाव, अलिबाग येथील अक्षी गावातील गधेगाळ शिल्प सर्वात प्राचीनतम मानले जाते. डॉ. शं. गो. तुळपुळे यांनी याचे संपूर्ण वाचन केले.
गीं सुष संतु। स्वस्ति ओं। पसीमस- मुद्राधीपती।
स्त्री कोंकणा चक्री- वर्ती। स्त्री केसीदेवराय।
महाप्रधा- न भइर्जु सेणुई तसीमीनी काले प्रव्रतमने।
सकु संवतु: ९३४ प्रधा- वी सवसरे: अधीकू दीवे सुक्रे बौ- लु।
भइर्जुवे तथा बोडणा तथा नऊ कुवली अधोर्यु प्रधानु।
महालषु- मीची वआण। लुनया कचली ज-
शके ९३४ अर्थात इ.स. १०१२ मधला हा संकृत मिश्रीत मराठी शिलालेख मराठीतील सर्वात आद्य लेख आहे. श्रवणबेळगोळच्या गोमटेश्वराच्या सर्वमान्य आद्यलेखापेक्षाही जुना.
ह्याचा अर्थ असा-
कल्याण होवो. पश्चिम समुद्राधिपती श्री. कोकण चक्रवर्ती श्री. केसीदेवराय याचा महाप्रधान भइर्जू सेणुई याने शक संवत ९३४ प्रभव संवत्सर अधिक कृष्ण पक्ष शुक्रवार या दिवशी देवीच्या बोडणासाठी नऊ कुवली धान्य नेमून दिले. जगी सुख नांदो.
ह्या खालच्या तीन ओळींत मात्र अभद्र वचन कोरलेले आहे.
हे शासन कुणी भंग करील तेहाची माय गाढवे झबिजे
व त्या खालच्या शिल्पामध्ये गाढव व स्त्रीचा संकर दाखवलेला आहे.
ह्या शिलालेखाच्या वरील भागात चंद्र सूर्य कोरलेले असून मधल्या ओळी मात्र आता बर्‍याचशा पुसट झालेल्या आहेत.
रतनगडाच्या पायथ्याशी रतनवाडीतल्या अमृतेश्वर मंदिराच्या प्रांगणात एक हत्तीगाळ जमिनीत अर्धवट रोवलेला आढळतो. घुमटीवर चंद्र-सूर्य कोरलेले असून मधल्या चौकटीत शिवपिंडीचे पूजन दाखवले आहे. तर खालच्या बाजूस हत्तीबरोबर संकर दाखवला आहे. शिलालेखाच्या ओळी पूर्णपणे बुजलेल्या आहेत.
जो कोणी ह्या शिवलिंगाच्या पूजेचा अव्हेर करेल त्याची अशी अवस्था होईल असा ह्या शिल्पाचा अर्थ काढता येतो.
हे शिल्प शिलाहार झंझ राजाच्या कारकिर्दीत घडवले गेले असावे (साधारण १० वे शतक) कारण अमृतेश्वराच्या मंदिराचा कर्ताही तोच आहे. मंदिराशेजारीच काही वीरगळ पण आहेत.
अंबेजोगाई-वेळापूर इथल्या गधेगाळामध्ये संस्कृतमध्ये शापवाणी कोरलेली आहे.
स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुंधरा |
षष्टिं वर्ष सहस्त्रानि विष्ठायां जायते कृमि: ||
स्वकीय किंवा परकीय जो या वसुंधरेचे हरण करेल, असं करणारा सहा हजार वर्ष विष्ठेमधला कृमी बनेल
तर काटी येथील गधेगाळात 'हे जो मोडी राजा अथवा प्रजा तेयाची मायेसि गाढोअ' अशा प्रकारची मराठी वाक्यरचना आहे.
महाराष्ट्रातील काही गधेगाळ पुढीलप्रमाणे
१. कदंब भरूडदेव याचा सावरगाव लेख (इ.स. ११६४)
२. शिलाहार अपरादित्य याचा लोनाड लेख (मराठी)
३. शिलाहार अपरादित्य(द्वि.) याचा परळ लेख.
४. शिलाहार सोमेश्वरदेव याचा चांजे लेख( या लेखात शब्दरूपात गधेगाळ नसून शिल्परूपात आहे)
५. यादव रामचंद्र देव याचा पूर शिलालेख (इ.स. १२८५ फक्त शिल्परूपात)
६. यादव रामचंद्र देव याचा वेळापूर शिलालेख (इ.स. १२८५)
७. वेळूस शिलालेख (इ.स. १४०२)
९. शिलाहार राजा अनंतदेवाचा दिवेआगर शिलालेख(इ .स. १२५४)
अशी हीन दर्जाची शापवाणी कोरीव लेखांमध्ये कशी काय वापरली गेली याचा काहीच अंदाज येत नाही. यादव-शिलाहारांच्या लेखांतच आणि मुख्यत्वे मराठी भाषेतच ती आढळली आहेत आणि त्यातही गधेगाळीबरोबर बरेच वेळा शिवलिंगही असल्याने शैवपंथियांमध्येच अशा प्रकारची शिल्पे जास्त प्रचलित असावीत.
रतनवाडीतील हत्तीगाळ
 अक्षी येथील गधेगाळ(फोटो आंतरजालावरून)
 पिंपळवंडी गधेगाळ(फोटो शैलेन भंडारे यांजकडून)
दिवेआगर येथील श्री बाळ जोशी यांच्या खाजगी जागेत असलेला गधेगाळ शिलालेख यावर सन १२१४ मधील शिलाहार राजा अनंत देव यांच्या काळातील राम मंडलिक या अधिकार्याने गणपती नायक याला दिलेल्या एका दानपत्राचा उल्लेख आहे. 
संदर्भः
१. प्राचीन मराठी कोरीव लेख’ व ‘मराठी वाङ्मयाचा इतिहास’ संपादक : डॉ. शं. गो. तुळपुळे
२. महाराष्ट्राच्या इतिहासाचे साक्षीदार -प्रा. कल्पना रायरीकर, डॉ. मंजिरी भालेराव.


 

प्राचीन मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का अंकन

सांप और नेवले की कहानी महाभारत से लेकर हितोपदेश तक उपलब्ध होती है। बचपन में सांप एवं नेवले की लड़ाई खूब देखी परन्तु वर्तमान में वन्य प्राणी कानून होने के बाद सांप एवं नेवले की लड़ाई दिखाने वाले दिखाई नहीं देते। 
नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन
नारायणपुर (कसडोल-छत्तीसगढ़) के मंदिर की भित्ति में सांप एवं नेवले की लड़ाई का खूबसूरत अंकन किया गया है। नेवला सांप का परम्परागत शत्रु है, कितना भी बड़ा एवं विषैला सर्प हो, अगर नेवला उसके पीछे पड़ गया तो प्राण लिए बिना छोड़ता नहीं है। 

विदेशी वैसे भी भारत को सांपों एवं साधुओं का देश कहते हैं। इनके द्वारा खींचे गए स्नेक चार्मर्स के चित्र बहुधा मिलते हैं। सांपों के प्रति आकर्षण एवं भय दोनो रहता है। विदेशी मंत्र मुग्ध होकर सांपों का खेल देखते हैं।
शिल्पकार ने अपनी छेनी से मंदिर की भित्ति में इसी रोमांच का अंकन किया है। 

संसार में दिखाई देने वाली छोटे छोटे को दृश्यों का शिल्पांकन कर शिल्पकार ने अपनी विवेकशीलता का परिचय दिया है। हितोपदेश में नेवले की कई कहानियाँ हैं, जिसमें एक कहानी नेवले के स्वामीभक्ति एवं परोपकार की भी है जो इस प्रकार है………

उज्जयिनी नगरी में माधव नामक ब्रा्ह्मण रहता था। उसकी ब्राह्मणी के एक बालक हुआ। वह उस बालक की रक्षा के लिये ब्राह्मण को बैठा कर नहाने के लिये गई। तब ब्राह्मण के लिए राजा का पावन श्राद्ध करने के लिए बुलावा आया। यह सुन कर ब्राह्मण ने जन्म के दरिद्री होने से सोचा कि "जो मैं शीघ्र न गया तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्ध का आमंत्रण ग्रहण कर लेगा।

आदानस्त प्रदानस्त कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।।
शीघ्र न किये गये लेन- देन और करने के काम का रस समय पी लेता है।

परंतु बालक का यहाँ रक्षक नहीं है, इसलिये क्या करुँ ? जो भी हो बहुत दिनों से पुत्र से भी अधिक पाले हुए इस नेवले को पुत्र की रक्षा के लिए रख कर जाता हूँ। ब्राह्मण वैसा करके चला गया। वह नेवला बालक के पास आते हुए काले साँप को देखकर, उसे मार कोप से टुकड़े- टुकड़े करके खा गया। वह नेवला ब्राह्मण को आता देख लहु से भरे हुए मुख और पैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया।

फिर उस ब्राह्मण ने उसे वैसा देख कर सोचा कि इसने मेरे बालक को खा लिया है। ऐसा समझ कर नेवले को मार डाला। बाद में ब्राह्मण ने जब बालक के पास आ कर देखा तो बालक आनंद में है और सांप मरा हुआ पड़ा है तो उस उपकारी नेवले को देख कर मन में घबरा कर बड़ा दुखी हुआ।

कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमर्जिंस्मस्त्यक्ते सुखी नृपः।।
काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार तथा मद इन छः बातों को छोड़ देना चाहिये, और इसके त्याग से ही राजा सुखी होता है।


 

मखर, अर्थात मकरतोरण


मखर, याचा उगम मकर अथवा मगरापासून होतो. मगरीच्या (मकराच्या) मुखातून निघालेले तोरण म्हणजे मकरतोरण. याचाच पुढे अपभ्रंश होत जाऊन आजचे मखर तयार झाले. काळानुरूप बदल होत जाऊन हल्ली तोरणाचा उगम मूळ मकरमुख जरी फारसे दिसत नसले तरी नक्षी मात्र अगदी तशीच आहे.

१. वेरूळच्या कैलास लेण्यातील गंगा. बघा ही मकरावर आरूढ असून तिच्या दोन्ही बाजूंच्या स्तंभांवर मकरतोरण आहे.

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२. खिद्रापूरच्या कोपेश्वर मंदिरातील महावीराची प्रतिमा. मस्तकी असलेल्या कळसावर मकरतोरण आहे.
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३. खिद्रापूरच्याच मंदिराच्या बाह्यभिंतीवरील अजून एक मकरतोरण

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४. खिद्रापूरच्याच मंदिराच्या बाह्यभिंतीवरील अजून एक मकरतोरणांकित प्रतिमा
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५. सिन्नरच्या गोंदेश्वर मंदिरातील स्तंभावरील माहेश्वरी (प्रतिहारी)
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६. गोंदेश्वराच्याच स्तंभावरील अजून एक मकरतोरण
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७. अंजनेरीच्य विष्णूमंदिरातील वैष्णव प्रतिहार
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८. अंजनेरीच्या विष्णूमंदिराच्या बाह्य भागावरील मकरतोरणात असलेला विदारण नरसिंह
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९. नारायणपूरच्या नारायणेश्वराच्या राऊळातील शैव प्रतिहार
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१०. भुलेश्वर मंदिरातीलल मकरतोरण सभोवती असलेला भैरव प्रतिहारी
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११. भुलेश्वरातील मकरतोरणांकित मूषकारूढ विनायकी, नंदीवर आरूढ असलेली माहेश्वरी आणि मयुरारूढ कौमारी
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१२. भुलेश्वरातील मकरतोरणांकित प्रेतवाहिनी चामुंडा, गजारूढ ऐन्द्री
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१३. सिन्नरच्या ऐश्वर्येश्वर मंदिरातील अत्यंत देखणे मकरतोरण. मध्यभागी शिवतांडवनृत्य
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१४. हे मकरतोरण मात्र सर्वात अर्वाचीन. पुण्यातील त्रिशुंड गणपती मंदिराच्या दर्शनी भिंतीवर. १८ व्या शतकातील.
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मखराची कूळकथा आवडली. तोरणात मकराला स्थान द्यायचं काय विशेष कारण असावं? मकर हे गंगेचं वाहन मानलं गेलं. गजेंन्द्र मोक्षाची कथा मकराशी संबंधित. तसाच "सुंदर ते ध्यान" अभंगात "मकर कुंडले तळपती श्रवणी" असा उल्लेख विठोबाच्या बाबत आहे. यात कुंडलांनाही मकराचा आकार आहे का?


तोरणात मकराला स्थान द्यायचे नक्की कारण माहीत नाही बहुतेक शिल्पात येणारी लयबद्धता हेही कारण असावे किंवा मकर पवित्र मानले जात असावे. बाकी मकर हे गंगेबरोबरच वरूणाचेही वाहन आहे. बाकी विष्णूच्या कानात मकर कुंडले असतात त्यामुळे विठोबाच्याही ती असल्यास त्यात काही नवल नाही.

हा वेरूळ लेणीतील मकरारूढ वरूण

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आणि ही दिवेआगरमधली विष्णूच्या कानातील मकरकुंडले (१२ वे शतक)
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भुलेश्वरातील तोरणावरील डिझाईन अप्रतिम, सिन्नरच्या ऐश्वर्येश्वर मंदिरातील तोरण पाहून हे दगडात कोरलेले मानवनिर्मित काम वाटतच नाही.
सध्या दिसणार्‍या मंदिरातील सोनेचांदीच्या प्रभावळीतपण मकर आहेच. पण या तोरणाच्या शीर्षस्थानी असणार्‍या मुखासंबंधी सांग ना. काही म्हणतात तो वीरभद्र तर काही महिष.

तोरणाच्या शीर्षस्थानी किर्तीमुख असते. थोडक्यात सिंहमुख.

मंदिरात येऊ पाहणार्या दुष्ट शक्तींना किर्तीमुखे रोखत असतात अशी मूळ धारणा.


अगदी पूर्वी वास्तु लाकडाच्या असत, त्यातील अवश्यक बाबी (उदा. लाकडी खांबांवर तुळया टाकताना दिलेले रुंद टेकू, तसेच तुळयांची भिंतींच्या बाहेर निघणारी टोके इ.) पुढे लेणी खोदताना आवश्यक नसूनही त्या खोदल्या जात. याची उदाहरणे आहेत का काही तुमच्या फोटोंमधे?
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तशी बरीच उदाहरणे आहेत.

हे पहा वेरूळचे सुतार लेणे. हे चैत्यगृह आहे. पण याची रचना हुबेहूब लाकडी कामासारखी केलीय.
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हा पहा अजिंठ्याचा चैत्य. इथे छतावरील लाकडी फासळ्यांची जागा अखंड कोरीव दगडी फासळ्यांनीच घेतलीय.
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आणि तुम्ही वर दिलेत तशा शैलीत असणारा देवगिरी किल्ल्यातील हा दगडी सज्जा.
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मकर आणि नाग (आणि काही ठिकाणी सिंहसुद्धा) अतिपूर्वेला जाता जाता त्यांचा काल्पनिक संकर होऊन ड्रॅगन बनला असावा काय? ड्रॅगनही असाच प्रवेशद्वारावर अथवा घरावर पहारा देत दुष्ट शक्तींना पिटाळून लावतो असे तिकडे समजतात.

मकर आणि नाग (आणि काही ठिकाणी सिंहसुद्धा) अतिपूर्वेला जाता जाता त्यांचा काल्पनिक संकर होऊन ड्रॅगन बनला असावा काय?

त्याबद्दल नक्की काही सांगता येत नाही. पण जगातील बहुतेक प्राचीन संस्कृतींमध्ये काही ना काही गोष्टी समान आहेत. ड्रॅगनचे मूळ कितपत जुने ते काही माहित नाही.

पण हा अजिंठा लेणीतील १७ च्या क्रमांकाच्या विहारातील हे चित्र रोचक ठरावे.
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प्रचलित हिंदू धर्मातील देवतांचे सगुण रूप

दोन महिन्यांपूर्वी हिंदू धर्मग्रंथाच्या कालाबद्दल एक लेखमाला मी उपक्रमवर लिहिली होती. त्या वेळी काही संदर्भ वाचन करत असताना एक प्रश्न माझ्या डोक्यात घोळत असे. सध्या आपण ज्या देवतांचे पूजन करतो त्या देवतांना सध्या प्रचलित असलेली त्यांची सगुण रुपे कोणी व कधी दिली असावीत? म्हणजे गणपतीला गजमुख दाखवायचा किवा शंकराला जटा व गळ्याभोवती नाग या स्वरूपातच दाखवायचा. लक्ष्मीला कमलपुष्पातच उभे करायचे.

यापैकी ही रुपे कधी दिली गेली असावीत या संबंधी अंदाज बांधणे त्या मानाने सोपे आहे. मोहोंजोदारो व हडाप्पा संस्कृतीमधे देवताना सगुण रूप होते परंतु त्या वेळी प्रजननक्षमता (Fertility) हीच देवता पूजत असत. या देवतेच्या सगुण रूपाला अदिती असे नाव होते असे काही तज्ञांचे म्हणणे. म्हणजे सध्याच्या प्रचलित देवता इ.स.पूर्व 1300 च्या आधी तरी नव्हत्या एवढे ढोबळपणे म्हणता यावे. आर्य टोळीवाले मूर्ती पूजकच नव्हते. त्यांचे देव म्हणजे इंद्र, वरुण, सूर्य, रुद्र व विष्णू. या देवतांचे पूजन ते अग्नीच्या माध्यमातून करत. आर्य संस्कृती भारतात रुजली तेंव्हाही सध्याच्या देवतांची सगुण रूपे नसणार. म्हणजेच आपण इ.स.पूर्व 1000 पर्यंत आलो. हा काल व इ.स,पूर्व 500 हा बौद्ध धर्माच्या उदयाचा काल या मधेच देवतांना सध्याची सगुण रूपे दिली गेली असावीत असे मला वाटते.

परंतु या सर्व देवतांना ही सगुण रूपे कोणी दिली असावीत याचा काहीही अंदाज मला तरी बांधता येत नाही. बघुया दुसर्‍या कोणी उपक्रमीला काही सांगता येते का?

त्यांचे देव म्हणजे इंद्र, वरुण, सूर्य, रुद्र व विष्णू. या देवतांचे पूजन ते अग्नीच्या माध्यमातून करत.
इंद्र, वरुण, सुर्य, रुद्र, विष्णू यांच्या पैकी बरेच जण खरेच (म्हणजे सगुणच)आर्य टोळ्यांचे नेते होते. अग्नीच्या माध्यमातुन पूजनाचा संबंध सरळसरळ यज्ञ व आहूतीशी संबंधित आहे.

आर्य संस्कृती भारतात रुजली तेंव्हाही सध्याच्या देवतांची सगुण रूपे नसणार.
सहमत.

मधेच देवतांना सध्याची सगुण रूपे दिली गेली असावीत असे मला वाटते.

सहमत. ही अशी रुपे देण्यामागे तत्कालिन समाजामनावर भीती, लालसा या बाबींचा वापर करुन अधिपत्य गाजवणारी व्यवस्था निर्माण करणे हा हेतू होता. हा हेतू आजतागायतही सफल झालेला आहे. ही सगळी सगुण रुपे होऊन गेलेल्या नायकांवर काल्पनिक देवत्व आरोपित करुन, त्यांच्या पराक्रमांच्या अतिरंजित कहाण्या निर्माण करुन त्यांच्या आधारे निर्माण करण्यात आली. या रुपांचा तत्कालिन नायकांच्या खऱ्या रुपाशी फारसा संबंध नसुन ती रचणाऱ्याच्या मानसिकतेत त्या रुपाच्या उपयोजनाची काय संकल्पना असेल त्यावर आधारीत आहेत. ही रुपे नायकांची असल्याकारणाने ती रचनाकर्त्यांच्या समुहाचेच प्रातिनिधित्व करणारी आहेत.

अवांतर
ही सगुण रुपरचना करतांना अर्थात खलनायकांचीही सगुण रुपे तयार करावी लागली. देवांचे नायक जसे चित्रित झाले तसे राक्षसांचेही खलनायक चित्रित करावे लागले. वास्तविक राक्षस हे ही अस्तित्वात असलेल्या भारतातील पूर्वप्रस्थापित टोळ्यांचे नायकच होते. परंतु ते शत्रु असल्या कारणाने त्यांची रुपे लांब नखे , सुळे दात, शिंगे, अस्ताव्यस्त वाढलेले केस, काळाकुट्ट रंग, गडगडाटी हास्य करणाऱ्या भेसूर मुद्रा अशा तऱ्हेची रेखाटली गेली. पण अशी काही मानवजात अस्तित्वात असावी असे वाटत नाही. आणि हे मानव नसुन हिंस्र पशू असते तर देवनायकांना त्यांच्याशी इतकी दमछाक होईपर्यंत लढायचे कारणही नव्हते. असो. जेणेकरुन या खलनायकांचे सगुणरुप चित्रण ही लबाडी आहे हे दिसून येते. तशीच देवदेवतांची सगुण रुपे तयार करणे हा ही एक लबाडीचाच भाग आहे.

आपल्या देवी देवतांना सगुण रुपे देण्यात राजा रविवर्मा आणि इतर चित्रकारांचा मोठा हात आहे. हल्लीच लोकप्रभामध्ये यावर लेख होता. येथे वाचा.

रविवर्मा यांनी लक्ष्मी आणि सरस्वती यांना नऊवारी साड्या आणि शिवलेले ब्लाऊज नेसवले. वीणा घेऊन मोरावर बसलेली सरस्वती आणि कमळात उभी राहिलेली लक्ष्मी यांना रेखाटताना त्यांनी एका पारशी महिलेला (लेखात पारशी माणसाची बायको असे म्हटले आहे परंतु काळ लक्षात घेता पारशी माणसाची पारशी बायकोच असावी असे वाटते.) मॉडेल म्हणून वापरले होते. ही चित्रे आज घराघरातून पूजली जातात. :-)

असो.

दुसर्‍या शतकातील शंकराची मूर्ती पहा. तिच्या गळ्यात नाग नाही. हातात त्रिशूळ आहे आणि शंकर मिशीधारी दिसतो. शंकराच्या हातातील त्रिशूळही पाश्चात्य ट्रायडेंटशी (पसायडन किंवा नेपच्यूनच्या हातातील) मेळ खातो. नंतरच्या चित्रांत मात्र त्रिशूळाचा आकार आणि स्वरुप बदलेले दिसते. (असेही असू शकेल की ही मूर्ती गांधारातील असल्याने वेगळी घडवली असेल.)



पूजेसाठीचे ढोबळ पिंड "सगुण" म्हणून चालेल का?

पूजनासाठी ढोबळ पिंडे (शेंदूर फासलेले, कधीकधी मोठे डोळे चितारलेले लंबगोल पाषाण) ही बहुधा फार प्राचीन काळापासून वापरात असावी. या वेगवेगळ्या "आया" आणि "बा" आहेत.

काही भक्तश्रीमंत ग्रामदैवतांची ओळख प्रमुख पौराणिक देवांशी जुळवल्याच्या घटना अगदी अलिकडे सुद्धा दिसतात.

खंडोबाचा शंकराशी संबंध, महाराष्ट्रातील बहुतेक आयांचा पार्वतीशी संबंध, काही आयांचा विष्णुपत्नीशी संबंध, लिंगरूप दैवताचा वैदिक रुद्राशी संबंध...

असे करता पौराणिक/वैदिक देवाला दृश्य-स्पर्शरूप मिळते. ते दृश्य-स्पर्शरूप लोकांमध्ये आधीच पूजनीय असल्यामुळे, त्या पिंडाची पूजनीयता नव्याने पटवून द्यावी लागत नाही.

दा. ध. कोसंबी यांच्या "मिथ अँड रिऍलिटी" मध्ये महाराष्ट्रातील अनेक आई-देवतांबद्दल समूळ संशोधनासहित चर्चानिबंध आहे. त्यात काही वैदिक/पौराणिक<->लौकिक/स्थानिक दैवतांच्या जोड्यांची चर्चा सापडेल - जोड्यांमधली दैवते मुळात वेगळी असली तरी क्षेत्रमाहात्म्यात अभेद झालेली आहेत.

मनुष्याकार नसलेल्या पूजनीय पाषाणांवरती मनुष्याकृती मुखवटे चढवतात, ही प्रथा तर सर्वांच्या ओळखीचीच असेल. गोव्यातील शंकरांच्या पिंडींवर मुखवटे असतात. हल्लीच वैष्णोदेवीच्या देवळात गेलो, तिथे दैवते अखंड नैसर्गिक अभिषेक होत असलेले "स्टॅलॅक्टाइट" आहेत. पण त्यांच्यापुढे देवीचा घडीव मुखवटा आहे.

कोकणातल्या एका घरगुती पूजाविधीमध्ये देवीचा मुखवटा तांदळाच्या उकडीने बनवतात. या रूढीत सुद्धा काहिशा-निर्गुण पिंडाला दिखाऊ सुंदर सगुण रूप देण्याची लोकपरंपरा दिसते, असा माझा कयास आहे.

पुरीच्या जगन्नाथाच्या कथेतून सगुण-निर्गुण पिंडांबद्दल लोकांच्या श्रद्धेमध्ये जो तणाव आहे, त्याचे अंशदर्शन घडते. (राजाला जगन्नाथाची मूर्ती सुबक बनवायची होती, पण विश्वकर्म्याने ढोबळ पिंडे बनवली...)

मूर्तीपूजा अस्तित्वात आल्यावर प्रत्येक कालखंडातील शिल्पकार, चित्रकार यांनी आपापल्या कुवती आणि समजानुसार देवांना रेखाटले असावे. 

 पुरीच्या जगन्नाथाच्या कथेतून सगुण-निर्गुण पिंडांबद्दल लोकांच्या श्रद्धेमध्ये जो तणाव आहे, त्याचे अंशदर्शन घडते. (राजाला जगन्नाथाची मूर्ती सुबक बनवायची होती, पण विश्वकर्म्याने ढोबळ पिंडे बनवली...)

सहमत आहे. गणपतीच्या बहुतांश देवळांतील मूर्ती (त्यांना मूर्ती तरी म्हणावे का नाही असा संभ्रम होतो) ढोबळ असतात. गणेशोत्सवातल्या गणपतीसारख्या मूर्ती सहसा देवळात नसतात. शंकराच्या देवळात सहसा पिंडच असते.

वैष्णव देवळांतल्या (राम, कृष्ण, दत) मूर्ती मात्र सुबक असतात का? हे अर्वाचीन देव (दत्त अर्वाचीन आहे यात शंका नाही) असावेत का?

बाबासाहेब जगताप यांनी म्हटल्याप्रमाणे सरंजामशाहीत एखाद्यावरील अतिरेकी निष्ठा हा गुण आवश्यक होता. त्या गुणाचा विकास करण्याचे काम भक्तीमार्गाच्या प्रसारातून साधले गेले.

 

गणपतीला गजमुख दाखवणे हे किमान ९ व्या शतकाआधीपासून असावे असे विकीपीडियाच्या संदर्भावरून वाटते. ११ व्या शतकापूर्वी गणपतीचे सध्याचे रूप व्यवस्थित प्रचलित झाले होते असे वाटते. विकीवरच श्रीलंकेत २र्‍या शतकातली गणपतीची या प्रकारची मूर्ती आहे असे म्हटले आहे. पण मूर्तीच्या चित्राचा दुवा मिळाला नाही.

कमळ हे भारतीय साहित्यात खूपच महत्त्वाचे फूल आहे. ऋग्वेदातही सरस्वती नदीच्या पात्रातील कमळांचा उल्लेख आहेच. नंतरच्या काळात शिल्पकलेतही याचा उपयोग आहेच. गजलक्ष्मीचे बर्‍यापैकी प्राचीन बौद्ध शिल्प (शुंग काळ, ख्रिस्तपूर्व १ -२ शतके) - यात हत्ती, अर्थातच पण पायाशी कमळही आहे.

काही अधिक चित्रे इथे -

 
 
 
 
 
 

जगातील पहिले व्यंगचित्र ( शिल्प ) - महेन्द्र शेगावकर


जगातील पहिले व्यंग चित्र (शिल्प) 

भरहूतच्या स्तुप स्तंभावरचेच..... 

कारण हे शिल्प इ.स.पु. दुसऱ्या शतकात साकारल्या गेले !
 दंतवैद्याकडे पाळलेले माकड असते . वैद्यबुआ एका व्यापाऱ्याचा दुखरा दांत उपटून त्याला वेदनामुक्त करतात , त्याचा मोबदला म्हणून व्यापारी सुकामेवा , फळे , खजूर व द्रव्यही देतो .
माकडाने हे बघितले ,. त्याने ठरविले ,की आपणही वैद्य झालोच पाहिजे .
त्याने त्याचा व्यवसाय सूरु केला ......
एक व्यापारी आपला दांत उपटून घेत आहे . भल्लीमोठी सांडसी लावलेली आहे . तीला दोर बांधून हत्ती ओढत आहे . हत्तीला उत्साह यावा म्हणून काही माकडे ढोल, पिपाणी, ताशे वाजवत आहेत ....
एक माकड तर चक्क हत्तीच्या शेपटीचा कडाडून चावाच घेत आहे ...
दुखरा दांत व माकडचाळे पाहून  त्राग्याचे भाव व्यापाऱ्याचे चेहऱ्यावर स्पष्ट दिसत आहेत ...
आज हे शिल्प कलकत्ता वस्तुसंग्राहलयात आहे .
बौध्द जातककथामध्ये काही विनोदी जातककथाही आहेत .त्यातील ही एक विनोदी जातककथा आहे ,.
 " आधा अधूरा हकीम , मरिज के लिए  जान का खतरा ! "
 
 
 

मूती मालिका -५


भक्ताची भव्य मूर्ती (औंढा नागनाथ, जि.हिंगोली)

देवदेवतांच्या कलात्मक आणि भव्य मूर्ती आपण पाहतो पण सामान्य भक्ताची मूर्ती आणि तिही इतकी भव्य? हे आश्चर्य औंढा नागनाथ येथील मंदिरावर आढळून येतं. मूर्तीची भव्यता लक्षात यावी म्हणून मी हा पाठभिंतीचा पूर्णच फोटो मुद्दाम दिला आहे. दोन्ही हात जोडलेले, पद्मासनात बसलेली, चेहर्यावर शांत भाव असलेली, कुठलेच अलंकरण नसलेली ही मानवी मूर्ती लक्ष वेधून घेते. औंढ्याचं मंदिर पश्चिमाभिमुख आहे. त्याबद्दल सांगताना संत नामदेवांना मंदिरात प्रवेश करू दिला नाही, मग त्यांनी आपल्या भक्तीच्या शक्तीने देवालाच बदलण्यास भाग पाडले, आणि मंदिर फिरून पश्चिमेला आले. यातला खरेखोटेपणा माहित नाही कारण ही दंतकथा आहे. पण पूर्वेला एका भक्ताची भव्य मूर्ती मंदिरावर कोरून भक्तीची महती किती याचा पुरावाच इथे आढळतो.
गर्भगृहाच्या पाठभिंतीवर ही मूर्ती पूर्वेला तोंड करून विराजमान आहे. अशाच अजून दोन मूर्ती दक्षिण आणि उत्तरेला गाभार्याच्या बाह्यांगावर आहेत. दीड मिटर बाय दीड मिटर इतक्या भव्य कोनाड्यात या मूर्ती आहेत. मुर्तीच्या बाजूला छत्रचामर धारिणी आहेत. मुर्तीच्या माथ्यावर साधी टोपी आहे. त्यावर चंद्रासारखी आकृती कोरलेली आहे.
मंदिराला प्रदक्षिणा घालून आपण मागे या मूर्तीच्या समोर दगडी पायर्यांवर बसूलो तर एक वेगळाच अनुभव येतो. भक्तीतून येणारी शांत समाधानाची भावना मनात जागी येते. आपण मूर्तीसमोर हात जोडतो पण इथे मूर्तीच आपल्या समोर हात जोडते आहे, आपल्यातले पावित्र्य देवत्व जागवते आहे असे काही विलक्षण जाणवते. देवदर्शन करून घाईघाईत निघून जाणार्या अंधभक्तांचे काही सांगता येत नाही पण खरा भक्त, रसिक, शिल्पप्रेमी या मूर्तीच्या प्रेमात पडून समोरच्या दगडी पायर्यांवर बसून राहतो हे निश्चित.
तज्ज्ञांनी यावर अजूनही सविस्तर कुठे काही लिहीलं नाही (three huge sculptures probably of devotee इतकाच उल्लेख गो.ब. देगलुरकरांच्या पुस्तकात आहे). या प्राचीन भव्य मंदिरावर सर्वात मोठ्या आकारात या मानवी मूर्ती कशासाठी कोरल्या गेल्या आहेत? का हा कुणा देवतेचाच प्रकार आहे? कुणाला याची माहिती असल्यास खुलासा करावा.
 



चक्रव्युह छेदणारा अभिमन्यु (होयसळेश्वर. हळेबीडू)
कर्नाटकातील होयसळेश्वर मंदिर शिल्पकलेचा अत्युच्च नमुना आहे. या मंदिरावर बाह्य भागात एक फुट उंच आणि दोन अडीच फुट रूंद असा हा सुंदर शिल्पपट आहे. महाभारतात ज्याचे वर्णन आलेले आहे तो चक्रव्युह या ठिकाणी कोरलेला आहे. रथावर अर्जूनपुत्र अभिमन्यु स्वार आहे. सहस्त्रावधी बाणांनी तो लढतो आहे. त्याला कर्णाने पूर्णत: घेरले आहे. त्याचे बाण आपल्या बाणांनी रोकले आहेत. डाव्या बाजूला भीम आणि हिडिंबेचा पुत्र घटोत्कच दाखवला आहे. त्याच्या हातात गदा आहे. इतक्या छोट्या शिल्पात राक्षस कुळातील घटोत्कच वेगळा दाखवत शिल्पकाराने कमाल केली आहे.
खरी कमाल तर चक्रव्युहात बारीक बारीक कोरलेल्या सैन्याला दाखवून केली आहे. हा फोटो मी साध्या मोबाईलच्या कॅमेर्यातून काढलाय. मोठ्या कॅमेर्यातून फोटो काढून enlarge करून बघितल्यास बारकावे अजून नीट समजतील.
होयसळ शैलीत शिल्पकलेने कळस गाठला होता असं म्हणतात ते उगीच नाही. हळेबीडू आणि बेलूरच्या मंदिरात त्याचा प्रत्यय दर्शकांना जरूर येतो. ही मंदिरे आपल्या एखाद्या मोठ्या सहलीचा भाग म्हणून गडबडीत पाहू नका. किमान एक संपूर्ण दिवस इथे घालवला पाहिजे. तर इथलं शिल्प सौंदर्य समजू शकेल. बारकावे पहायचे तर आठवडा लागतो.
 
 
 

मूर्ती मालिका -९


नर्तकाची देखणी मूर्ती

अजिंठ्याच्या जवळ अन्वा (ता. भोकरदन, जि. जालना) येथे उत्तर चालूक्य कालीन मंदिर आहे. या मंदिवरील विष्णु शक्तीच्या मूर्तींमुळे अभ्यासकांचे लक्ष इकडे वेधले गेले. याच मंदिरावर प्रदक्षिणा पथावर उजव्या बाजूला ही नर्तकाची मूर्ती मला आढळून आली. या पूर्वी तीन चार वेळा मंदिर बघितले पण ही मूर्ती लक्षात आली नव्हती. नर्तकी, अप्सरा, सुरसुंदरी या नावाने ओळखल्या जाणार्या स्त्री शिल्पांची माहिती होती. अशी भरपुरं शिल्प मंदिराच्या बाह्य भागावर आढळून येतात. पण या तूलनेत मोठ्या आकारातील (शिल्पाची उंची दीड फुट) नृत्य पुरूष (नर्तक) शिल्पांची संख्या फारच कमी आहे.
या नर्तकाचे कानातले, गळ्यातले, दंडावरचे ठळक ढोबळ वाटणारे दागिने वेगळेपण सांगतात. स्त्रीयांचे दागिने नाजूक कोरलेले असतात. कमरेला असलेली मेखला जाड माळेसारखी दाखवलेली आहे. स्त्रीयांच्या मेखलेचा नाजूकपणा इथे नाही. नर्तकी-नर्तकांचे डोळे काजळाने अधोरेखीत केले असल्याने ठसठशीत दिसून येतात. या नर्तकाचे डोळे तसेच आहेत. ओडीसी नृत्यात यासारखी मुद्रा असलेले गुरू केलूचरण महापात्रा यांचे छायाचित्र प्रसिद्ध आहे. कथ्थक मध्येही याला साधर्म्य साधणारी मुद्रा आढळते. लेणी आणि मंदिरांवर आढळून येणार्या नृत्यमुद्रांवरूनच नंतरच्या काळातील नृत्य प्रकार समृद्ध होत गेले असं अभ्यासक सांगतात.
या मंदिर सभामंडपात भव्य अशी वर्तुळाकार रंगशीळा आहे. भोवती आसन कक्ष आहेत. म्हणजे देवतेच्या समोर नृत्य सादर केले जायचे व ते पाहण्यासाठी लोक आसनांवर बसून असायचे. मंदिरांचा मुख्य मंडप हा कलाविष्काराचे केंद्र होता.
Mahagami Gurukul
तूमच्याकडे अशा शिल्पांवर अभ्यास झालेला असेल तर जरूर माहिती सांगा.
 
  ना..


देखणा द्वारपाल
प्राचीन मंदिरांवर विविध शिल्पे आढळून येतात ती केवळ सहज म्हणून कोरलेली नसतात. त्यांची एक परिभाषा असते. ते शिल्प तिथेच का कोरले याचे विशिष्ट कारण असते. छायाचित्रातले हे जे शिल्प आहे ते द्वारपालाचे आहे. मंदिराच्या गर्भगृहात प्रवेश करतानाच्या दरवाज्याची जी चौकट असते त्यावर अतिशय कलात्म नक्षीकाम असते. त्याला द्वारशाखा म्हणतात. या द्वारशाखा एक दोन तीन अगदी माणकेश्वर मंदिर (ता. भुम जि. उस्मानाबाद) इथे तर तब्बल सात द्वारशाखा आहेत. या द्वारशाखेच्या तळाशी द्वारपालाचे शिल्प कोरलेले असते. हे शिल्प होट्टल (ता. देगलुर जि. नांदेड) येथील मंदिराच्या द्वारशाखेवरील द्वारपालाचे आहे.
या द्वारपालाच्या हातात डमरू आणि त्रिशुळ आहे. यावरून हा शैव द्वारपाल असल्याचे अनुमान काढता येते. म्हणजे हे मंदिर शैव देवतेचे आहे हे ठरवता येते.
आक्रमकांच्या भितीने बहूतांश मंदिराच्या गर्भगृहातील मूर्ती भक्तांनी मुळ जागेवरून दूसरीकडे नेवून ठेवल्या. मग बराच काळ लोटल्यावर सगळं काही स्थिरस्थावर झाल्यावर रिकामा गाभारा पाहून स्थानिक भाविकांनी घडवायला सोपी म्हणून महादेवाची पिंड आणून बसवली. मग मंदिर मुळ कुठल्या देवतेचे? हे ओळखणं अवघड होवून बसले. अभ्यासकांनी हे दाखवून दिले की जी मुख्य देवता मूर्ती आहे त्या अनुषंगाने द्वारपाल, ललाटबिंबावरील देवता, बाह्य भागातील देककोष्टकांतील देवता यावरून काही अनुमान काढता येते.
गर्भगृहातील अभिषेकाचे पाणी बाहेर जाण्यासाठी जी प्रणाल असते तिलाही अर्थ आहे. तिथे गोमुख कोरले आहे किंवा मकर प्रणाल आहे याचेही अर्थ आहेत.
अतिशय देखणी अशी ही शैवद्वारपालाची मूर्ती आहे. आजूबाजूला इतर भक्तगणांची शिल्पे आहेत. सर्वच नृत्याच्या ललित मूद्रेत आहेत. भोवती सुरेख नक्षी आणि किर्तीमुखही कोरलेले आहे.
मंदिराचा मुख्यमंडप आणि गाभारा यांना जोडणार्या जागेला अंतराळ असा शब्द आहे. या ठिकाणी अंधारच असल्याने इथली शिल्पकला दूर्लक्षीत राहते. प्राचीन मंदिरात गेलात तर गर्भगृहाच्या द्वारशाखा आवर्जून बारकाईने न्याहाळा. खुप सुंदर कलाकृती इथे दिसतील.
 
र सौजन्य


पशु पक्षी शिल्पं घोटण
मंदिरांवर कोरलेल्या शिल्पांमागे काही एक अर्थ दडलेला असतो. पण काही शिल्प काही वास्तुरचना या सौंदर्याचा भाग बनुन निखळ कलात्मक आविष्कार बनुन येतात. पशु पक्षांच्या या सहा जोड्या घोटण (ता. शेवगाव जि. नगर) थेथील मल्लिकार्जूनेश्वर मंदिरावरील आहेत. मंदिराच्या पायाशी गजथर, अश्वथर असतो. पण हे प्राणी युद्धात वापरले जाणारे आहेत. मोर हंस गरुड हे देवतांचे वाहन आहैत. पण घोटण मंदिरावरील ही शिल्पे मुख्य मंडपावरील खांबांवर स्वतंत्र शिल्प म्हणून कोरलेली आहेत हे विशेष. बदक, हत्ती, हंस, वराह, हरिण आणि वानर अशा या सहा जोड्या आहेत. यातही परत नर मादी असं काही दाखवलं असतं तर त्यालाही काही वेगळा अर्थ देता आला असता. इथे तसंही नाही. केवळ जोड्या आहेत. मुख्य मंडपाच्या स्तंभांवर पौराणीक संदर्भ कोरलेले असतात किंवा नक्षी असते. पण इथे प्रामुख्याने पशु पक्ष्यांच्या जोड्या आहेत.
तेराव्या शतकातील या मंदिराचा जिर्णोद्धार पेशवेकाळात १८ व्या शतकात करण्यात आला. पुरातत्व खात्याकडून हे मंदिर चांगल्या पद्धतीनं जतन केलं गेलं आहे. पैठणपासून दक्षिणेला २० किमी अंतरावर हे मंदिर आहे. इथपर्यंत जाण्यासाठी रस्ता चांगला आहे.
 
 
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अशोक वनात हनुमान
घोटणच्या मल्लिकार्जूनेश्वर मंदिरात (ता. शेवगांव जि. नगर) पशुपक्ष्यांची शिल्पे लक्षणीय आहेत हे मी आधी सांगितले होतेच. या शिल्पात सीतेच्या शोधातील हनुमान दाखवला आहे. शिल्पाची झीज झाली शिवाय मोडतोड झाल्याने आधी लक्ष्यात नाही आले. तेथील पुजार्याने सांगितल्यावर नीट लक्ष्य देवून बघितले. मग हनुमानाने पुढे केलेले बोट म्हणजे तो सीतेला अंगठी दाखवतोय हे लक्ष्यात आले. बाजूला दोन बलदंड स्त्रीया म्हणजेच राक्षसी आहेत. अंगठी दिसताच सीतेने मान वरती केली, अंगठीसाठी हाताची ओंजळ पुढे केली. एरव्ही सीता खाली मान घातलेली दाखवली जाते. पण रामाची अंगठी दिसताच ती आनंदली. या शिल्पकाराने नेमका हा क्षण टिपला आहे. मागची अशोकाचे खोड सरळ न दाखवता कलात्मक असे त्रिभंग मुद्रेत उभ्या असलेल्या सुरसुंदरी सारखे दाखवले आहे. हनुमान हा आकाराने लहान होवून सीते समोर उभा राहिला असे वर्णन रामायणात आहे. इथे शिल्पकाराने त्याचाही विचार केलाय हे विशेष. बसलेल्या सीतेइतकीच हनुमानाची उंची आहे.
जेंव्हा हे शिल्प संपूर्ण चांगल्या स्थितीत असेल तेंव्हा त्याचे सौंदर्य काय आणि किती असेल. आज केवळ अवशेषांवरून अंदाज लावला तर त्याचे सौंदर्य जाणवते. मंदिरावरची छोटी शिल्पे आकारामुळे दूर्लक्षीत राहतात पण त्यांच्यातही मोठा अर्थ दडलेला असतो.
 
 
 हे.



गुढ शिल्पे (गोकुळेश्वर, चारठाणा)
काही मंदिरांवर तंत्रमार्गी, अघोरपंथी, शाक्तपंथी अशी शिल्पे कोरलेली आढळून येतात. त्यांचा अर्थ त्या संप्रदायातील एखाद्या कृतीशी निगडीत असतो. पण सामान्य दर्शकाला मात्र कळत नाही.
हे शिल्प चारठाणा (ता. जिंतूर जि. परभणी) येथील गोकूळेश्वर मंदिराच्या मुखमंडपाच्या स्तंभावरील आहे. यात एकुण पाच मानवी आकृती दिसून येतात. पण पाय मात्र ८ आहेत. दोन्ही टोकाच्या दोन स्त्रीया आहेत. अगदी मधला पुरूष आहे. पण त्या बाजूचे दोन कोण हे चटकन कळत नाहीत. कारण त्यांचे केस स्त्रीयांसारखे मागे बांधलेले आहेत. पण छाती सपाट दाखवली असल्याने त्यांना स्त्री संबोधता येत नाही.
मधल्यांनी बाजूच्यांच्या डोक्यावर हात ठेवले आहेत. शिवाय सर्वात मधल्याचे वाटणारे दोन्ही हात बाजूच्या स्त्रीयांच्या हातात आहेत. हेच हात मधल्या पुरूषांचेही भासतात. पायासोबतच हाताचीही संख्या आठच आहे.
यातील टोकाच्या स्त्रीया स्वतंत्र आहेत. मधले तीनही एकमेकात अडकलेले आहेत. एक तर्क असा मांडता येतो. पुरूषाच्या उजव्या बाजूस त्याची शक्ती असते आणि डाव्या बाजूस पत्नी (वामांगी). बहूतेक देवतांच्या बाबत हे शिल्पांकित केलेले आढळून येते. येथे सामान्य पुरूषाच्या बाबतीतही हे सुचित केले असावे. आणि आज कार्टून काढताना जशी चलचित्र (animation) काढली जातात तसे उजवीकडचे चित्र पहिले, दूसरे चित्र दोन्ही स्त्रीयांचे हात हाती घेतलेले. आणि तिसरे मग पूर्णत: डावीकडच्या स्त्रीच्या डोक्यावर हात ठेवला असे. मधला पुरूष एकच असावा. फक्त तीन अवस्थांत दाखवला आहे. याला एक गती आहे. ही नृत्यातीलही एक गतीमान अशी मुद्रा असू शकते. कारण डाव्या बाजूच्या स्त्रीच्या हातात टिपरी सारखे काही दिसत आहे.
याचा तंत्रमार्गातही काही वेगळा अर्थ असू शकेल. केसांची आणि पायांची रचना यातून पुरूषांत स्त्रीचा अंश आहे असेही सुचवायचे असावे.
Laxmikant Sonwatkar
तूमच्या सारख्या अभ्यासकांनी यावर प्रकाश टाकावा. Dr-Arvind Sontakke हे तूम्हा अभ्यासकांना आव्हान ठरणारे विषय आहेत.
 
 चित्र सौजन्य
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तोरण शिल्पाचा 3D नमुना
होट्टल (ता. देगलुर जि. नांदेड) येथील मंदिरांचा विविध पैलूंनी बारीक विचार झाला पाहिजे. आता हे जे शिल्प आहे ते गर्भगृहाच्या द्वारशाखेवरील तोरणाचे आहे. समोरून पाहताना हातात माळा घेतलेले यश किन्नर दिसतात. त्यांच्या हातातील माळांची सुरेख अशी नक्षी बनलेली आढळून येते. या भागात सहसा अंधार असतो त्यामुळे संपूर्ण शिल्पाकडे लक्ष जात नाही. पण या तोरणावर प्रकाश टाकला आणि खालची बाजू बघितली तर आपण चकित होतो. हे शिल्प 3D आहे. आपल्याला दिसते ती छाती पासून वरची बाजू दर्शनी प्रतलात आहे. पण कमरेपासून खालची बाजू दूसर्या प्रतलात आहे. ९० अंशाचा कोन करून या मानवी आकृत्या वळवलेल्या आहेत. शिल्पकलेतील हे मोठं आव्हानात्मक काम आहे. अशाच पद्धतीने द्वारशाखेवर नृत्य करणारे स्त्री पुरूष दाखवलेले आहेत. म्हणजे शिल्पकलेत एकाच प्रतलाचा वापर न करता दोन दिशा दोन प्रतलात शिल्प कोरलेली आढळून येतात. हे केवळ सौंदर्यपूर्णच आहे असे नाही तर गणिताचा अभ्यास करून निर्माण झालं आहे.
प्राचीन मंदिरांबाबत अशा काही बाबी खरंच आचंबीत करतात. वास्तुशास्त्र, शिल्प सौंदर्य, विज्ञान, गणित असा अद्भुत संगम इथे पहायला मिळतो. दगडाची प्रतवारी शोधून मगच शिल्प कोरले जाते. दगडी चिर्यांची रचना नुसती सौंदर्यपूर्ण नसते तर त्यात शास्त्रही सांभाळलेले असते.
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अशा अवघड जागी वर चढून फोटो काढल्या बद्दल धन्यवाद मित्रा.



युद्ध शिल्पे
घोटण (ता. शेवगांव, जि. नगर) येथील मल्लिकार्जूनेश्वर मंदिरावर पशु पक्षांची वैशिष्ट्यपूर्ण शिल्पं असल्याचे याच मालिकेत पूर्वी लिहिलं होतं. याच मदिराच्या स्तंभांवर युद्ध आणि युद्ध सराव अशी काही शिल्पे आढळून आली. ही शिल्पे पण वैशिष्ट्यपूर्ण आहेत. पहिल्या शिल्पात तलवार घेवून लढणारे दोन योद्धे दिसत आहेत. त्यांनी शिरस्त्राण घातलेले आहेत. प्रत्यक्ष युद्धापेक्षा हा युद्ध सराव असावा. दूसरे शिल्प कुस्तीचे आहे. खेळा सोबतच युद्धाची तयारी म्हणून प्रशिक्षणाचा भाग असावा.
तिसर्या शिल्पात हत्ती आणि घोडा आहे. हत्तीने सोंडेत एक माणूस पकडला आहे. समोरचा घोडा उधळलेला आहे. हत्तीवर माहूत नाही. प्रत्यक्ष युद्धातीलच एक क्षण शिल्पात फोटोसारखा पकडला आहे. चौथे आणि शेवटचे शिल्पही असेच गतीमान आहेत. यात दोन अश्वस्वार दिसत आहेत. दोघांच्याही हातात भाले दिसत आहेत. दोघांच्या मध्ये जमिनीवर एक योद्धा आहे. घोडे मागील दोन पायांवर आहेत. युद्धाचा जोर इथे दिसून येतो. वीररसात ही शिल्पे न्हावून निघाली आहेत.
छायाचित्र सौजन्य
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-श्रीकांत उमरीकर, औरंगाबाद, 9422878575

मूर्ती मालिका -२१



लाकुड नव्हे हा दगड आहे
वेरूळ लेण्यातील ३२ क्रमांकाच्या लेणीत स्तंभावरील हे नक्षीकाम नजरेस पडले आणि पाय अक्षरश: थिजलेच. पर्णयुक्त घटाचे शिल्प खुप ठिकाणी पहायला मिळते. त्यावर उत्तम नक्षीकामही केलेले असते. पूर्ण कलशास स्त्री गर्भाचे प्रतिक मानले जाते. हे मंगल प्रतिक आहे. पूर्ण कलश म्हणजेच पाण्याने भरलेला, त्यावर पर्ण आणि या कलशास हार, रत्नांच्या माळांनी शृंगारलेले असते.

वेरूळच्या या स्तंभावर प्राचीन मांगल्य संकल्पना प्रमाणे शिल्पांकन आहेच. पण मुख्य म्हणजे शिल्पकाराने कलाविष्कारासाठी स्वातंत्र्य घेत ज्या अप्रतिम पद्धतीने बारकावे कोरले आहेत ते थक्क करणारे आहेत. कलशाच्या मुखातून खाली लोंबलेली पाने आणि त्यांना समतोल करण्यासाठी सोन्याचा मोत्याचा गोफ अशा माळा बघत रहाव्यात अशा आहेत.

कलशावर पण नक्षी कोरलेली आहे. हे सगळं एका अखंड स्तंभाचा भाग आहे. सगळं दालनच एका दगडात कोरलेलं. चुकीला जागाच नाही. मंदिराच्या उभारणीत तरी एखादा दगड शिल्पकामात डावा वाटला तर बाजूला काढता येतो. लेणीत म्हणजेच लयन स्थापत्यात चुकीला जागाच नाही. हे लक्षात घेतलं म्हणजे या कामाचे मोल कळते. कलशाच्या चारही बाजूला खाली यक्ष किन्नरही कोरलेले आहेत. वेरूळचे वैशिष्ट्य म्हणजे भव्यता. पण कुठेही बोजडपणा नाही. कवेत येणार नाहीत असे रूंद आणि उंच खांबही विलक्षण सुंदर आहेत. कलात्मक दृष्ट्या नाजूक कलाकुसरीने मढलेले आहेत.
या लेण्यांच्या शिल्पकलेने वेडे होवून परत परत भेट देणार्यांची संख्या प्रचंड आहे. वेरूळ अजिंठ्याचा नाद लागला की माणूस "आषाढी कार्तिकी" वार्या करत राहतो.
Vincent Pasmo
हा आमचा वेडावलेला फ्रेंच मित्र वर्षातून किमान एकदा तरी वेरूळची वारी करतोच. काही परदेशी पर्यटक तर तिथेच मुक्काम ठोकुन असतात. भारतीय भावा बहिणींना हात जोडून विनंती तूम्ही कैलास लेण्याशिवाय बाकीच्या सुंदर लेण्यांना किमान एकदा भेट द्या. शांतपणे लेण्या बघा. कुठून कुठे जाताना रस्त्यात वेरूळ लागलं म्हणून वचावचा पाहून पळून जावू नका.
 
 
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भव्य द्वारपाल
कैलास लेणं (वेरूळ, ता. खुलताबाद, जि. औरंगाबाद) विविध कारणांनी वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. त्यातील एक वैशिष्ट्य आहे भव्यता. ही भव्यता कलात्मक आहे. केवळ प्रचंड मोठी एखादी ओबडधोबड वास्तु आहे असे नव्हे.
कैलास लेण्यातील दर्शनी भागातील हे दोन द्वारपाल. सामान्य मानवी आकारापेक्षा जरा मोठेच आहेत. हातातील गदा जमिनीवर रोवून द्वारपाल अतिशय रिलॅक्स असे उभे आहेत. त्यावर त्यांची ढोपरं विसावली आहेत. त्यांच्या गळ्यातले दागिने, पायातले तोडे, कमरेची मेखला संपन्नता दर्शवतात. या भव्य मंदिरात प्रवेशणार्या भक्तांकडे ते कौतूकाने पहात आहेत.
राष्ट्रकुटांची सत्ता या काळात शिखरावर होती. त्यामुळे संपन्नता भव्यता शांतपणा असा भाव आपल्याला इथे पहायला मिळतो. ज्या ८ व्या शतकात लेणं कोरल्या गेलं त्या काळाचाही विचार केला पाहिजे.
कैलास लेण्याचा विचार असा विविध पैलूंनी करता येतो. प्रत्येकवेळी भेट दिली की काहीतरी वेगळंच लक्षात येतं. सौंदर्याची प्रचिती प्रत्येकवेळी नव्याने येते.
 
म.



द्वारशाखेवरील 3D शिल्प

होट्टल मंदिरातील गर्भगृहाच्या तोरणावरील 3D शिल्पाचा उल्लेख यापूर्वी या मालिकेत आला आहे. हे आताचे शिल्प आहे अन्वा (ता. भोकरदन जि. जालना) येथील महादेव मंदिराच्या द्वारशाखेचे. अतिशय आकर्षक अशी ही द्वारशाखा. एकुण पाच द्वारशाखा या मंदिराला आहेत. शार्दूल शाखा, पुष्प शाखा, स्तंभ शाखा, पुष्प शाखा अशा क्रमाने चार शाखा आहेत आणि पाचवी छायाचित्रात दिसणारी विद्याहार शाखा. गायन वादन नृत्य करणारे स्त्री पुरूष यावर कोरलेले आहेत. यात मध्यभागी पुरूष आहेत आणि आजू बाजूला छोट्या आकारात स्त्रीया आहेत.
कोपर्याचा वापर करून त्यावर अशी नक्षी कोरायची हे आवाहन शिल्पकाराने लिलया पेलले आहे. आश्चर्य म्हणजे यातील प्रत्येक शिल्प वेगळे आहे. एकच आकृती परत परत डिझाईनचा भाग म्हणून काढलेली नाही. प्रत्येक शिल्पाचा वेगळा विचार केला आहे हे विशेष. या द्वारशाखांवर एका बाजूला विष्णु आणि एका बाजूला लक्ष्मी कोरलेली आहे. आपण ज्याला एकसारखे बारीक डिझाईन समजतो ते एकसारखे नसते. जवळून बारकाईने निरिक्षण केल्यास त्यातील फरक लक्षात येतात आणि थक्क व्हायला होतंं. एका पुष्पशाखेत कळी पासून अर्ध उमलले, पुर्ण उमललेले, कोमेजलेले अशा सर्व अवस्था दाखवलेल्या आहेत. एक एक मंदिर पहायचे तर किमान एक दिवस तरी पूर्ण घालवला पाहिजे. ज्या अनाम शिल्पकारांनी आयुष्य खर्च करून हे निर्माण केलं त्यांच्यासाठी किमान दिवस तर खर्च करून कलेला दाद द्यावी.



द्वारपाल - वालूर
वालूर (ता. सेलु, जि. परभणी) हे अतिशय प्राचीन वारश्याने संपन्न असे गाव.
Malharikant Deshmukh
या मित्राने याच गावावर लिहिलं आहे. या गावातील सिद्धेश्वर मंदिरावरील हे द्वारपाल. वेरूळच्या कैलास लेण्यांतील द्वारपालांवर नुकतंच लिहिलं होतं. त्याच्या साधारण ५०० वर्षानंतरचा या मंदिराचा कालखंड असावा. द्वारपालांचे मुकुट, पाठीमागची प्रभावळ, अलंकरण यादवांच्या काळातील समृद्धी दर्शवते. उत्तर यादवांच्या काळातील मंदिरं आणि बारवा या परिसरांत प्रामुख्याने आढळतात. सातवाहन, वाकाटक, राष्ट्रकुट, चालूक्य आणि यादव या राजघराण्यांची समृद्धी या भागातील प्राचीन वारशावरून स्पष्ट होते.
या दोन्ही द्वारपालांचे दरवाजाच्या दिशेचे पायाचे पंजे आत वळलेले आहेत आणि विरूद्ध दिशेचे सरळ समोर आहेत. म्हणजे आतून काही आज्ञा आली की आत वळायचेच आहे. या शिल्पांत उभं राहण्याची ललित मूद्रा मोहक आहे. मंदिराचा जो भाग शिल्लक आहे त्यावर फारसे शिल्पांकन नाही. इथेच एक मैथून शिल्पाची शिळा निखळून पडली आहे. त्यावरून आणि या द्वारपालांवरून कोसळलेल्या भागात काही शिल्पे असावीत याचा अंदाज येतो.
या मंदिराच्या प्रदक्षिणा पथावर वाळवणं घातली आहेत. भिंतींना खिळे ठोकून दोर्यांवर कपडे वाळत घातले आहेत. मंदिराच्या बाजूने गटार वहाते आहे. मंदिराच्या भिंतीला लागुन चुली मांडल्या आहेत पाणी तापविण्यासाठी. त्याची काजळी भिंतींवर चढत आहे. मंदिराच्या छतावर गवत वाढले आहे. काय अनास्था आहे कळत नाही. अशा उकिरड्यात हे शिल्पसौंदर्य पडलेलं आहे.
 
 
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घोड्याच्या पायदळी शिक्षा
गोकुळेश्वर मंदिर चारठाणा (ता. जिंतुर जि. परभणी) येथील मंदिराच्या खांबावर हे शिल्प आहे. या पूर्वीही खांबावरील गुढ शिल्पावर लिहिले होते. या शिल्पात चार व्यक्ती दिसत आहेत. घोड्याच्या पुढे आणि मागे शस्त्रधारी सैनिक दिसत आहेत. त्यांच्या हातात तलवार, खड्ग किंवा दंडा असे काहीतरी दिसत आहे. एक सैनिक घोड्यावर बसलेला आहे. जो आरोपी आहे तो वाकलेला असून त्याची मान खाली झुकलेली आहे.
हत्तीच्या पायी तुडवणे अशी एक मृत्युदंडाची शिक्षा असते. तसेच गाढवावरून धिंड अशीही एक शिक्षा आहे. इथे घोडा आहे. घोड्याच्या पायी तुडवणे अशीही शिक्षा असावी.
काही शिल्पे ही केवळ शिल्पे नसतात. त्यामागे धार्मिकते पलिकडचा त्या काळातील समाज जीवनाशी संबंधीत काही संकल्पनांचा गुढ अर्थ असतो. याचा वेगळा विचार झाला पाहिजे.
शिल्पांचा बारकाईने अभ्यास करण्यासाठी मंदिराचे निरिक्षण करण्यात वेळ खर्च करावा लागतो. परत परत त्या मंदिराला भेट द्यावी लागते.
 
 

पुणे परिसरातील योग-साधना व संबंधित शिल्पे

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आधुनिक जीवनशैलीमुळे आरोग्यसंबंधीच्या निर्माण झालेल्या अनेक समस्या तसेच दिवसेंदिवस वाढत चाललेला ताण-तणाव, यांवरती उपाय म्हणून योगसाधनेकडे जग मोठया आशेने पाहत आहे. दैनंदिन जीवनात आरोग्य विषयीचे महत्त्व आपल्या पूर्वजांनी फार पूर्वीपासूनच ओळखले होते. यासाठी त्यांनी योगसाधनेला आपलेसे केले. अनेक ऋषी-मुनींनी योगविद्येच्या बळावर आपले व इतरांचे जीवन आरोग्यदायी बनविण्याचा प्रयत्न केला. जागो-जागी असणारे सांप्रदायिक मठ तसेच गुहा-कंदरांमध्ये ही साधना चालत असे. वरचेवर यात नवनवीन प्रयोग झाल्याने ही विद्या भरभराटीस आली. कित्येक प्राचीन मंदिरांवरती शिल्पकलेच्या रुपात आपल्याला याचे पुरावे मिळतात.


अर्ध-मत्स्येंद्रासन, ब्रह्मनाथ मंदिर, पारुंडे
आपला हा प्राचीन वारसा अनेक ग्रंथ व मौखिक परंपरेने तर जपला गेला आहेच, परंतु हा एवढया पुरताच मर्यादित न राहता शिल्पकलेच्या माध्यमातूनही जोपासण्याचा प्रयत्न झाला. योगविषयीची अनेक आसने, मुद्रा, प्राणायामांचे प्रकार शिल्पबद्ध केले गेले. पुणे परिसरात व जिल्ह्यात इतरत्र अशा प्रकारची शिल्पे व अवशेष आपल्याला पहावयास मिळतात.
आज पुणे शहरातील ‘अय्यंगार योग संस्था’ तसेच लोणावळ्यातील ‘कैवल्यधाम’ व ‘लोणावळा योग संस्था’ योगविद्येच्या प्रचार व प्रसारासाठी कार्यरत असल्या तरी, ही परंपरा पुण्यासाठी नवीन नाही. इसवीसन १७५४ ते १७७० या काळात सोमवार पेठेत बांधल्या गेलेल्या त्रिशुंड गणपती मंदिर व मठात योगविद्येची साधना केली जात असे. साधकांना योग्य प्रकारे साधना करता यावी म्हणून विशिष्ट खोल्यांची रचनाही येथे केली गेली होती. येथे ‘धुम्रपान’ नावाची एक विशिष्ट साधना होत असे. त्यामध्ये हठयोगाचे साधक स्वतःला छताला उलटे टांगून घेत व खाली निखाऱ्यामध्ये काही औषधी वनस्पती टाकल्या जात व त्यापासून निघालेला धूर ते नाकाद्वारे घेत असत. यामध्ये संभवतः दशनामी गोसावी पंथातील साधक हठयोगाची साधना करीत. येथे काही योगसाधकांच्या समाध्याही आहेत. अशा या योग-स्मारकाचे संवर्धन करून त्याचा विकास करणे अगत्याचे आहे.
पुण्यापासून साधारणतः ५४ किमी अंतरावर पिंपरी-दुमाला नावाचे गाव आहे. येथील सोमेश्वर मंदिरावर कुंडलिनी योग विषयीचे महत्त्व सांगणारे दुर्मिळ शिल्प आहे. सुमारे सातशे वर्षांपूर्वी हे मंदिर बांधले गेले. या मंदिराच्या प्रदक्षिणामार्गावर संभवतः आदिनाथांची एक अतिशय दुर्मिळ प्रतिमा आहे. आदिनाथ अर्थात शिव. यामध्ये ते समाधिस्थ योगीच्या रुपात साकारले गेले असून ते पद्मासनात बसले आहेत. त्यांचा उजवा हात ‘सूची’ मुद्रेत आहे. सर्वात वैशिष्ट्यपूर्ण गोष्ट म्हणजे शिल्पकाराने त्यांच्या डोक्यावर अर्धवट उमललेले कमळ दाखविले आहे. हे कमळ योग साधनेत खूप महत्त्वाचे प्रतिक मानले जाते. मानवी शरीरात कुंडलिनीरूपाने ‘शक्ती’ सुप्त अवस्थेत असते तसेच मस्तकातील सहस्रारांत शिवाचा निवास असतो. कुंडलिनीचा प्रवास मेरुदंडाजवळील मूलाधार चक्रापासून सुरु होऊन त्यानंतर स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र आणि आज्ञा चक्र अशा सहा चक्रांना ओलांडून सहस्रारांत संपतो. योगी ह्या कुंडलिनीरुपी शक्तीला जागृत करून सुषुम्ना नाडीच्या माध्यमातून शक्ती व शिवाचे मिलन सहस्रारांत घडवून आणतो आणि हे सहस्रार रुपी कमळ उमलले जाते अर्थात योग्यास परमानंदमय समाधी प्राप्त होते. असे हे अनन्यसाधारण शिल्प येथील मंदिरावर कोरण्यात आले आहे. पुणे परिसरात योगसाधनेचा प्रचार-प्रसार किती मोठ्या प्रमाणात झाला होता याचे हे उत्तम उदाहरणच होय. सोमेश्वर मंदिरांवरील या शिल्पांमध्ये नाथ संप्रदायातील इतर हठयोगीही दाखविले आहेत. यामध्ये मत्स्येंद्रनाथ व गोरक्षनाथांची शिल्पे या भागात दुर्मिळच म्हणावी लागतील. योगसाधनेच्या उज्ज्वल परंपरेमध्ये पिंपरी-दुमाला येथील मंदिरावरील हठयोगाच्या महान गुरूंची शिल्पे राष्ट्रीय संपदा ठरावीत अशी आहेत.

कुंडलिनी योग संबंधीचे शिल्प, पिंपरी-दुमाला
कुंडलिनी योगाचे ज्ञानेश्वरांनी आपल्या ग्रंथात भरपूर विवेचन केले आहे. आळंदी येथे इंद्रायणी काठी तर ८४ सिद्धांचा मेळा भरत असे. या सिद्धांपैकी काही सिद्ध हे हठयोगी होते. ज्ञानेश्वरांच्या परंपरेतील नाथ-योग्यांच्या समाध्या आजही ज्ञानेश्वर मंदिर परिसरात पहावयास मिळतात.
पुण्यापासून साधारणतः ५४ किमी अंतरावर प्रसिद्ध असणाऱ्या प्राचिन भुलेश्वर मंदिरातही सिद्धांची बरीच शिल्पे आहेत. त्यांना पद्मासन, सिद्धासन यांसारखी विभिन्न आसने व मुद्रांमध्ये दर्शविले आहे. किंबहुना येथील एक सुंदर शिल्प विशिष्ट अशा द्विपादशिरासनात असून साधकाने यात आपल्या पाठीमागे दोन्ही पाय एकमेकांत अडकविले आहेत. 
द्विपादशिरासन/पाशिनी मुद्रा, भुलेश्वर मंदिर
जुन्नरपासून साधारणतः १० किमी अंतरावरील पारुंडे गावातील ब्रह्मनाथ मंदिराच्या खांबांवरती विविध ध्यान-धारणा व आसनातील अनेक शिल्पे कोरण्यात आली आहेत. उर्ध्व-धनुरासन, गरुडासन, नौकासन, प्रसारित-पादोत्तानासन, गोमुखासन, पाद-पश्चिमोत्तानासन, अनंतासन, अर्ध-मत्स्येन्द्रासन, क्रौंचासन अशा किती तरी आसनांचे प्रकार येथे कोरले गेले आहेत.
पाद-पश्चिमोत्तानासन, ब्रह्मनाथ मंदिर, पारुंडे
येथूनच पुढे हरिश्चंद्रगडावर प्रसिद्ध योगी चांगदेव यांनी ‘तत्त्वसार’ नावाचा ग्रंथ लिहिला होता. त्यामुळे हा परिसर एकेकाळी योग साधकांच्या गर्दीने फुलून गेलेला असावा असे दिसते. अशा या दर्जेदार वारशामुळे सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्षेत्रांबरोबरच योगसाधनेच्या परंपरेतही पुणे परिसर व जिल्ह्याचे महत्त्व ठळकपणे दिसून येते.
योग विद्येचे जागतिक महत्त्व ओळखून या स्थळांचे व्यवस्थितरित्या संगोपन व संवर्धन होणे गरजेचे आहे. योगसाधनेच्या परंपरेत आपणासही असा प्राचीन वारसा लाभला आहे, याचा अभिमान सर्वांनी बाळगायला हवा. या अवशेषांचे अस्तित्त्व टिकून राहणे म्हणजे आपले व आपल्या पूर्वजांचे अस्तित्त्व टिकून राहण्यासारखे आहे. हा अनमोल ठेवा नाहिसा होण्याअगोदर त्याची माहिती सर्वदूर पोहोचवून त्याचे महत्त्व जगासमोर मांडणे गरजेचे आहे. संपूर्ण विश्व योगसाधनेला जवळ करीत असताना आपणही या निमित्ताने आपल्या पूर्वजांप्रमाणे योगविद्येला अंगीकारून आपल्या जीवनाचा अविभाज्य घटक बनवायला हवे. आपल्या भारतीय योगपरंपरेचे हे प्राचीन दुर्मिळ पुरावे निश्चितच संपूर्ण जगासाठी मार्गदर्शक व प्रेरक ठरतील व आपल्या पूर्वजांचे महान कार्य शिल्परूपाने बोलू लागतील.
 
 https://vijaysardehindi.blogspot.com/2020/06/travels-and-tourism-history-and-culture.html
 
 

मिथक शिल्पे – आकाशगामी

सामना ऑनलाईन

>> आशुतोष बापट 

मागील लेखात आपण आकाशगामी म्हणजेच व्योमचरिन् या वर्गातले प्राणी बघायला सुरुवात केली होती. या प्रकारात एकापेक्षा एक आकर्षक आणि विस्मयकारक प्राणी भरलेले आहेत. त्यातल्या ग्रिफिनपर्यंत आपण येऊन पोचलो होतो. भारतीय कलेच्या बाबतीत बोलायचं झालं तर ग्रिफिन हे नंतरच्या काळात दिसणाऱया श्येन, गरुड आणि शुक-व्याल या संकल्पनेचे प्राथमिक रूप म्हणता येईल. भारतीय कलेत दिसणाऱया ग्रिफिनच्या शिल्पासारखेच ग्रिफिनचे एक शिल्प मिलेटस इथल्या ग्रीक देवता अपोलोच्या मंदिरातील एका स्तंभावर कोरलेले दिसते. त्याशिवाय इ.स.पूर्व 4-5 व्या शतकातील तिओस आणि थ्रेसच्या नाण्यांवरसुद्धा ग्रिफिनचे शिल्प आढळून येते.

ग्रिफिनबद्दल काही सुरस कथा प्रसिद्ध आहेत. ग्रिफिन हे जगाच्या उत्तर टोकावर हायपरबोरीयनचे शेजारी म्हणून वास्तव्याला असतात. ते सोन्याच्या खजिन्याचे राखणदार असतात. या खजिन्यावर एकच डोळा असलेल्या अरिमास्पियन्सचे लक्ष असते. ते हा खजिना चोरण्याच्या प्रयत्नात असतात. ग्रिफिन, हायपरबोरीयन आणि अपोलो यांचेसुद्धा सुरेख संबंध या कथांमधून येतात. अपोलो या ग्रीकांच्या देवतेने हायपरबोरीयनसमवेत काही काळ घालवला होता. त्यामुळे हायपरबोरीयन्स हे पवित्र समजले गेले. कालांतराने अपोलो आणि हेलीयस या सूर्यदेवतांचे एकत्रीकरण झाले किंवा अपोलोलाच पुढे हेलीयस असे संबोधले जाऊ लागले तेव्हा हे ग्रिफिन हेलीयसचे सारथी झाले होते. हेलीयसचा रथ हे ग्रिफिन आकाशमार्गे ओढून नेतात असे वर्णन अनेक कथांमधून येते.

 एखाद्या प्रांतातल्या लोकप्रिय झालेल्या लोककथा, त्यातले संदर्भ तसेच ठेवून किंवा त्यात काही जुजबी बदल करून जगाच्या विविध भागात प्रसारित होत असतात. ग्रिफिनच्या बाबतीत प्रसिद्ध असलेल्या अशाच काही कथांमधून ग्रिफिन्सचे वास्तव्य उत्तर भारतात असल्याचेही उल्लेख आलेले आहेत. उत्तर भारतात ग्रिफिन्सचे वास्तव्य होते. तिथे त्यांनी वाळवंटातून सोनेरी वाळू खणून काढली. त्यामुळे साहजिकच त्यांच्या शेजाऱयांचे त्या सोन्याच्या वाळूवर लक्ष गेले. ती वाळू त्यांना चोरायची तर होती, पण त्याच्या रक्षणासाठी बसलेले हे ग्रिफिन्स फारच उग्र आणि भयंकर होते. पण त्या शेजाऱयांना तर ती सोनेरी वाळू हवी होती. मग या ग्रिफिन्सच्या शेजाऱयांनी सोनेरी वाळू चोरण्यासाठी एक शक्कल लढवली. त्यांनी ग्रिफिन्सना आवर्जून खायला आणून दिले आणि जेव्हा ग्रिफिन्स खाण्यात व्यग्र होते, तेव्हा त्यांनी ती सोनेरी वाळू चोरून नेली.

पंखधारी हरीण किंवा काळवीट

पंखधारी हरीण किंवा काळविटाची दोन शिल्पे आपल्याला सांचीला दिसतात. सांची स्तुपाच्या उत्तर तोरणावर पाठीला पाठ लावून बसलेल्या या दोन पंखधारी हरणांचे शिल्प आहे. टोकदार शिंगे असलेल्या या हरणांनी आपले पंख उंचावलेले आहेत. अतिशय मोहक आणि आकर्षक असे हे शिल्प आहे. यांनाच पुढे हरीण-व्याल म्हणून संबोधले जाऊ लागले. याच तोरणाच्या मागच्या बाजूवर पंखधारी काळविटाचे एकमेव शिल्प आहे. यालासुद्धा हरीण-व्याल असेच म्हणतात. सांचीसारखेच अमरावती आणि मथुरा इथे आपल्याला पंखधारी हरीण (हरीण-व्याल) शिल्पांकित केलेले दिसून येतात.

पंखधारी घोडा 

उडणारे घोडे किंवा पंख असलेल्या घोडय़ाचे उल्लेख भारतीय आणि परकीय साहित्यातून जरी विपुल प्रमाणात दिसत असले, तरी त्या मानाने त्यांचे कलेमध्ये शिल्पांकन फारच थोडे दिसते. अशी शिल्पे दुर्मीळच म्हणायला हवीत. मात्र एक सुंदर शिल्प आपल्याला सांची स्तुपाच्या कठडय़ावर दिसते आणि दुसरे शिल्प अमरावती कलेमधे दिसून येते. हिंदू पौराणिक कथांमधून दिसणारा ‘उच्चैश्रवा’ नावाचा घोडा, हा या पंखधारी घोडय़ाचे मूळ रूप असण्याची शक्यता आहे.

बौद्ध साहित्यात बर्याच जातक कथा आहेत. या कथांमधून गौतम बुद्धाचे पूर्वीचे जन्म आणि त्यात त्याने समाजासाठी केलेले योगदान सांगितलेले असते. त्या जातक कथांच्या विषयानुसार त्यांना विविध नावे दिलेली आहेत. अशाच एका ‘वलहंस जातका’त या पंखधारी घोडय़ाचा उल्लेख येतो. या घोडय़ाचा संदर्भ बौद्ध संकल्पनेतील एका रत्नाशी आहे. तो असा की, बौद्ध संकल्पनेनुसार चक्रवर्तीपदाची काही लक्षणे आहेत. ज्यानुसार चक्रवर्ती हा सप्त रत्नांनी सुशोभित केलेला असतो. म्हणजेच त्याच्या बाजूने सात रत्ने दाखवलेली असतात. त्यातील एक रत्न म्हणजे वलह श्रेणीतला एक घोडा असतो. आणि म्हणून हा घोडा या जातककथेत दिसून येतो. या जातककथेनुसार हा घोडा, ‘विदुरपंडित’ जातकातल्या पुणक यक्षासारखा आकाशात उडू शकतो. बहुदा या कथांमधून आलेल्या उडणाऱया घोडय़ांच्या कल्पनेवरून, शिल्पकारांना प्रेरणा मिळाली असावी आणि म्हणून त्यांनी पुढे अशा उडणाऱया घोडय़ांची शिल्पे निर्माण केली असावीत.

ग्रीक पुराणकथांमधूनही उडणाऱया घोडय़ाचे उल्लेख येतात. तिथे पेगॅसस नावाच्या पंख असलेल्या घोडय़ाची कथा आहे. पॉसिडॉनचा मुलगा असलेला हा पेगॅसस. या पेगॅससचा एका पाण्याच्या झऱयाशी संबंध आलेला आहे. त्याच्या जन्माची कथा मोठी रंजक आहे. त्याच्या आईचे डोके पर्सियसने कापले. त्यानंतर तिच्या रक्तबंबाळ शरीरातून हा पेगॅसस जोरदार उसळी मारून बाहेर पडला. तो फारच उत्तेजित झालेला होता. जन्माला आल्यावर त्याने आकाशात उंच झेप घेतली. तो पहिल्यांदा जिथे विश्रांतीसाठी थांबला ते ठिकाण म्हणजे कॉरीन्थचे एक्रोपोलीस होते. नंतर तो जेव्हा पेरेनाच्या कारंज्यापाशी पाणी पिण्यासाठी थांबला तेव्हा अथेन आणि पॉसिडॉनच्या मर्जीने बेलेरोफोन याने पेगॅससला शांत केले आणि तो त्याच्यावर स्वार झाला. याच पेगॅससवर आरूढ होऊन बेलेरोफोनने युद्धात मोठमोठे विजय मिळवले. चिमेरावर मिळवलेला विजय हा त्यातल्याच एक होय. पुढे पेगॅससने त्याच्या बेलेरोफोन या स्वाराला धुडकावून लावले आणि तो उंच उंच उडत पार स्वर्गात गेला. तिथे त्याने झ्यूसबरोबर वास्तव्य केले. वीज आणि ढगांचा गडगडाट आणण्याच्या कामात त्याने झ्यूसला मोलाची मदत केली. काही लेखकांनी पेगॅससला इरॉस किंवा म्युझेसचा अश्व म्हणून संबोधले आहे. पेगॅससने ज्या ठिकाणी हेलीकॉनला आपल्या खुराने मारले, त्या ठिकाणी पाण्याचा झरा उत्पन्न झाला. ज्याला ‘अश्वाचा झरा’ असे नाव पडले. ट्रोजनजवळ असलेला हिप्पोक्रीन नावाचा झरा आणि अक्रोकोरीन्थस जवळचा पिरेन झरा यांच्या उत्पत्तीची कथासुद्धा अशीच सांगितली जाते.

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मिथकशिल्पांचे प्रकार

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आपण बघितले की, के. कृष्णमूर्तींनी त्यांच्या पुस्तकात हे इहामृग, व्याल किंवा जे काल्पनिक प्राणी वर्णन करून सांगितले आहेत, ते साधारणत तीन प्रकारांत विभागले आहेत. आकाशगामी प्राणी (व्योमचरिन्), जमिनीवरचे प्राणी (भूचरिन्) आणि पाण्यातले प्राणी (जलचरिन्). काल्पनिक प्राणी चित्रित किंवा शिल्पांकित करताना त्या प्राण्यांना दाखवलेल्या विशिष्ट अवयवांवरून त्यांचे वर्गीकरण तीन प्रकारांत केलेले आहे. मूलत तो प्राणी कोण आणि त्याला कुठले अवयव जोडले आहेत याचा विचार करून हे प्रकार ढोबळमानाने ठरवले गेले आहेत. प्राणी कुठल्या गटात बसतो वगैरे तांत्रिक बाबी सोडल्या जरी असल्या तरी यातली नाटय़मयता, प्राण्यांचे नवीन रूप, काही प्राण्यांचे परकीय कलेशी असलेले साधर्म्य यांचा ऊहापोह के. कृष्णमूर्तींनी केलेला आहे. या तीन वर्गीकरणांतला पहिला प्रकार आहे तो आकाशात उडणारे प्राणी. त्यांना ‘व्योमचरिन्’ असे म्हटले आहे.

आकाशगामी (व्योमचरिन्) – आकाशगामी म्हटले की, साहजिकच उडणे ही क्रिया अपेक्षित आहे आणि उडणे या क्रियेशी जोडला गेलेला अवयव म्हणजे पंख. त्यामुळे प्राणी जरी संमिश्र असला तरी त्याला पंख दाखवले की, तो उडणारा आहे हे लगेच समजून येते. ‘आकाशगामी’ या नावातच स्पष्ट होतं की, असे संयुक्त, काल्पनिक प्राणी (व्याल) ज्यांना पंख दाखवलेले असतील, त्यामुळे या प्रकारात जे प्राणी समाविष्ट केले आहेत त्यांचे प्रकार पुढीलप्रमाणे बघता येतील. यामध्ये पंखधारी सिंह, पंखधारी आणि शिंग असलेले सिंह, ग्रिफिन म्हणजे पंखधारी गरुडरूपी सिंह, पंखधारी हरीण, काळवीट, पंखधारी घोडे, पंखधारी हत्ती, किन्नर आणि किन्नरी, पंखधारी आणि हत्तीमुखी बैल म्हणजे पंखधारी गरुडरूपी सिंह, पंखधारी पाणमांजर, पंखधारी बकरी, सिंहमुखी कोंबडा, पंखधारी आणि सिंहाचे शरीर असलेले पुरुष आणि स्त्राr, पाच फणे असलेला नाग आणि गरुड, पक्ष्याचे शरीर असलेली स्त्राr. एवढय़ा विविधतेचे प्राणी आपल्याला ‘आकाशगामी’ म्हणजे ‘व्योमचरिन्’ या श्रेणीमध्ये सापडतात. या प्राण्यांचे शिल्पांकन किंवा चित्रांकन कुठे केलेले आहे तेसुद्धा बघू या.

 पंखधारी सिंह – पंखधारी सिंह दाखवताना सिंहाच्या पुढच्या पायाच्या बाजूने बाहेर आलेले पंख दाखवलेले असतात. त्यामुळे हे जणू आकाशातून विहार करणारे कुणी राक्षसच असावेत असा बघणाऱयाला भास होतो. हे पंखधारी सिंह शक्यतो कुठल्या तरी खांबांच्या शीर्षस्थानी कोरलेले असतात. शीर्षस्थानी कोरल्यामुळे उंचावर असलेले त्यांचे अस्तित्व ते प्राणी आकाशगामी असल्याचे दर्शवतात. अशा उंचावर कोरल्यामुळे या प्रजातीचे वास्तव्य अंतरिक्षात असते असे शिल्पकाराला ठळकपणे दाखवून द्यायचे असते. शिल्पकलेमधे पंखधारी सिंह हा बऱयाच ठिकाणी आढळतो. त्यातही विशेषकरून बघायचे झाल्यास सांची इथले शिल्प, भारहूत, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, मथुरा इथली शिल्पे आपल्याला प्रामुख्याने विचारात घ्यावी लागतील. यातही एक आश्चर्यकारक गोष्ट दिसून येते ती म्हणजे वाकाटक-गुप्त काळात हा प्रकार कलाकारांमध्ये फारसा लोकप्रिय नव्हता असे दिसते. कारण या काळातील अजिंठा लेण्यांमधील चित्रकलेत असे पंखधारी सिंह कुठेही दिसत नाहीत. तस गांधार कलेच्या कलाकारांनीसुद्धा यांचे शिल्पांकन आपल्या शिल्पकलेत केलेले दिसत नाही.

हिंदुस्थानी साहित्यात याचा उल्लेख ‘वाल्मीकी रामायणा’त ‘सिंहा: पक्षगम:’ असा केलेला आहे (रामायण, किष्किंधा 42, 16) त्या उल्लेखानुसार या पंखधारी सिंहांचे वास्तव्य जिथे सिंधू नदी समुद्राला मिळते त्या ठिकाणी असलेल्या सोमगिरी पर्वतावर होते. या स्थानाला पश्चिम दिशेचे टोक म्हणजे शेवटचे स्थान असे म्हटलेले आहे. यावरून असाही एक अंदाज बांधता येतो की, लेखकाने इराण, मेसोपोटेमिया इथल्या पारंपरिक कलाकृतींच्या पार्श्वभूमीवर हे लेखन केले असावे. कारण त्या प्रदेशात अशा अजस्र आकाराची शिल्पनिर्मिती केली जात असे. या शिल्पकृतींच्या कथा त्या देशांतून समुद्रमार्गे येणारे व्यापारी आणि प्रवासी यांच्याकडून लेखकाने ऐकलेल्या असणार आणि त्यानुसार त्याने आपल्या लिखाणात त्यांचा उल्लेख केलेला असणार. याचेच काही नमुने एका उत्खननात सापडले आहेत. इ.स.पूर्व 5 व्या शतकातल्या अॅकिमेनिड काळातला तो नमुना आहे. इकबाटन इथे झालेल्या उत्खननात काही सोन्याची भांडी मिळाली, ज्यावर पंखधारी सिंहाचे शिल्प कोरलेले सापडले. हमादान इथल्या उत्खननात कपडय़ावर लावायच्या सोन्याच्या बटणाच्या रूपात पंखधारी सिंह सापडले. तसेच पर्सिपोलीस इथल्या उत्खननात तलवारीच्या म्यानावर पंखधारी सिंहाची आकृती कोरलेली मिळाली.

पंखधारी शिंग असलेला सिंह – प्राचीन हिंदुस्थानी मूर्तींमध्ये अशा प्रकारच्या सिंहाचे शिल्प अगदी क्वचितच आढळते, पण जी शिल्पे उपलब्ध आहेत, त्यातले सर्वात सुंदर असे शिल्प सांची इथे आहे. पंखधारी, शिंग असलेला हा सिंह असून त्याच्या पाठीवर एक स्वार बसला आहे. त्या स्वाराने हातात लगाम धरलेला दाखवलेला आहे. काहीसा उग्र दिसणारा हा प्राणी आपल्याला सांची इथे बघायला मिळतो. याच्या तुलनेत अमरावती आणि नागार्जुनकोंडा इथे असलेले पंखधारी शिंग असलेले सिंहाचे शिल्प अगदीच साधे आहे.

ग्रिफिन (पंखधारी गरुडरूपी सिंह)
सिंहाचे शरीर, गरुडाची किंवा पोपटाची चोच आणि गरुडाचे पंख असलेला हा संमिश्र प्राणी. या प्राण्यांचे शिल्पांकन आपल्याला सांची इथे बऱयाच प्रमाणावर आढळते. चारही पाय दुमडून बसलेला हा प्राणी आपले पंख फुलवून मागे वळून बघतो आहे असे हे शिल्प. इथे सिंहाची आयाळ ठसठशीतपणे दाखवलेली आहे. सांची स्तूपाच्या पश्चिम तोरणावर समोरच्या बाजूला एकतर मागच्या बाजूला दोघे पाठीला पाठ लावून बसलेले ग्रिफिन आपल्याला दिसतात. इथेच 2 ाढमांकाच्या स्तूपाच्या कठडय़ावर अशा ग्रिफिनचे शिल्पांकन केलेले आहे. अशाच प्रकारचा एक ग्रिफिन मथुरा कलेमध्येसुद्धा बघायला मिळतो.

हिंदुस्थानी कलेच्या बाबतीत बोलायचं झालं तर ग्रिफिन हे नंतरच्या काळात दिसणाऱया श्येन, गरुड आणि शुक-व्याल या संकल्पनेचे प्राथमिक रूप म्हणता येईल. या ग्रिफिनच्या काही सुरस कथा आहेत. त्या पुढच्या भागात बघू या.

 

मिथक शिल्पे – शिल्प आणि चित्रांचा संदर्भ

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साहित्यातील संदर्भ पाहिल्यानंतर आपण या काल्पनिक विश्वातील प्राण्यांचे अजून कुठे कुठे संदर्भ येतात हे शोधायला गेलो की, अर्थातच कलेमध्ये त्याचे पडलेले प्रतिबिंब स्पष्ट दिसून येते. मुळात साहित्यात जे संदर्भ आले आहेत त्याचे रूपांतर कलेत होणे हे अगदी क्रमप्राप्तच आहे म्हणा. ‘मिथीकल अॅनिमल्स इन इंडियन आर्ट’ या आपल्या पुस्तकात श्री. के. कृष्णमूर्ती यांनी या संकल्पनेचा सगळा ऐतिहासिक आढावा घेतलेला आहे. त्या पुस्तकावर आधारित असलेले आणि अजून बरेच निरनिराळे संदर्भ जोडून प्रसाद प्रकाशनाने ‘मिथक शिल्पे’ हे पुस्तक प्रकाशित केले. या पुस्तकात के. कृष्णमूर्ती यांनी विचारात घेतलेली ‘इहामृग’ ही संकल्पना, त्याचे कलेत पडलेले प्रतिबिंब हे मांडले आहेच, पण त्याशिवाय श्री. ढाकी यांनी पुढे मांडलेली ‘व्याल’ ही संकल्पना आणि त्याचे हिंदुस्थानी कलेत दिसणारे रूप याचासुद्धा विचार केला आहे. तसेच के. कृष्णमूर्ती यांनी सांची, अमरावती, नागार्जुनकोंडा इथली शिल्पे आणि अजिंठा लेणीतील भित्तिचित्रे यांचाच समावेश त्यांच्या पुस्तकात केला आहे. मात्र मराठी पुस्तकात विविध लेण्यांमध्ये दिसणारे हे काल्पनिक प्राणी आणि पुढे मंदिरांवर विपुल प्रमाणावर दिसणाऱया व्याल प्रतिमा यांचासुद्धा समावेश केलेला आहे.

के. कृष्णमूर्ती यांनी त्यांच्या पुस्तकात म्हटले आहे की, त्यांनी फक्त इ.स.च्या 6व्या शतकापर्यंतचा कालावधी लक्षात घेऊन त्या कालावधीत आढळणारी मिथक शिल्पे विचारात घेतली आहेत. कारण पुढे श्री. ढाकी यांनी ‘व्याल’ ही संकल्पना त्यांच्या पुस्तकातून विस्तृतपणे उलगडून दाखवली. त्यांनी ‘द व्याल फिगर्स ऑन द मेडिएव्हल टेंपल्स ऑफ इंडिया’ या त्यांच्या पुस्तकात ‘व्याल’ या संकल्पनेबद्दल खूप सखोल अभ्यास मांडला आहे. त्यांच्या म्हणण्यानुसार अंदाजे इ.स.च्या 4थ्या शतकापासून ‘व्याल’ ही संकल्पना विकसित झाल्याचे दिसून येते.

 वर म्हटल्याप्रमाणे श्री. के. कृष्णमूर्ती यांनी इहामृगाचे कलेतील संदर्भ शोधण्यासाठी भारहूत, सांची, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, मथुरा आणि गांधार इथली शिल्पे आणि अजिंठा लेण्यांतली चित्रे यांचा विचार इथे केला आहे. हिंदुस्थानी कलेवर परदेशी कलेचा किती प्रभाव पडतो हेसुद्धा इथे दिसून येते. शिल्पातून दिसणारे हे इहामृग म्हणजे कलाकारांच्या अफलातून कल्पनाशक्तीतून निर्माण झालेला एक सुंदर कलाविष्कार आहे. प्राचीन कलेत अशा काल्पनिक किंवा पौराणिक प्राण्यांची विविधता फार मोठी आहे. ते प्राणी किती आहेत आणि कोणकोणते आहेत याची एक झलक बघायची म्हटली तर आपल्या समोर कलेचे एक मोठे दालनच उघडले जाते. ज्यात पंख असलेला सिंह, चोच असलेला सिंह, शिंग असलेला सिंह, किन्नर-किन्नरी, चेहरा माणसाचा आणि शरीर सिंहाचे किंवा हत्तीचे असा प्राणी, अर्धा माणूस आणि अर्धा घोडा, हत्तीचे तोंड असलेला माणूस, बकरीचे तोंड असलेला माणूस, सिंह-मगर-माशाची शेपूट असा संयुक्त प्राणी, पंख असलेले हरीण, पंख असलेला बैल, हत्तीचे तोंड आणि पंख असलेला बैल, पंख असलेली बकरी, गरुडाचे शरीर आणि पंख असलेला पुरुष किंवा स्त्री, नरसिंह आणि त्याला पंख, सिंह-मगर, हत्ती-मासा, हरणाला माशाची शेपूट, बकरीला माशाची शेपूट, हत्तीला विंचवाची शेपूट, सिंहाचे पंजे असलेला बैल आणि त्याला माशाची शेपूट, माशाची शेपूट असणारी जलपरी, घोडय़ाचे तोंड असलेला समुद्री मासा ज्याला हॉर्सफिश असे म्हणतात, पंख असलेली बकरी आणि तिला माशाची शेपूट असे अक्षरश अगणित व्याल प्रकार आपल्या प्राचीन हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात.

या काल्पनिक संमिश्र प्राण्यांबद्दल कलाकारांच्या मनात काय कमालीचे आकर्षण होते आणि त्याचबरोबर त्यांच्या कल्पनाशक्तीची झेप किती अफाट होती हे यावरून दिसून येते. कुठल्याही दोन भिन्न प्राण्यांच्या शरीराचे विशिष्ट भाग एकत्र करून एक नवीनच प्राणी सादर करायचा असा जणू छंदच त्यांना जडला होता. या संकल्पनेचे कलेमध्ये सादरीकरण करताना या कलाकारांची कल्पनाशक्ती किती अचाट होती याची जाणीव, हे सगळे व्याल बघताना आपल्याला प्रकर्षाने होते. हे सगळे इतक्या मोठय़ा संख्येने असलेले आणि विविध प्रकारचे प्राणी आपल्यासमोर सांगताना त्यांची वैशिष्टय़ानुसार निरनिराळ्या गटात विभागणी केली आहे. हे एवढे सगळे विविध प्रकार एकत्र करताना त्यांची काही वैशिष्टय़े लक्षात घेऊन ती इथे सादर केली आहेत. त्यांचे अवयव किंवा कुठल्या प्राण्याचे अवयव त्यांना जोडले आहेत हे विचारात घेऊन त्यांचे साधारण वर्गीकरण केले आहे. के. कृष्णमूर्तींनी त्यांच्या पुस्तकात हे इहामृग किंवा व्याल मांडताना ते साधारणत तीन प्रकारांत विभागले आहेत. आकाशगामी प्राणी (व्योमचरिन्), जमिनीवरचे प्राणी (भूचरिन्), आणि पाण्यातले प्राणी (जलचरिन्) असे हे तीन प्रकार होत. या प्राण्यांना दाखवलेल्या विशिष्ट अवयवांमुळे त्यांचे वर्गीकरण अशा तीन प्रकारांत केलेले आहे. यातले काही प्राणी दोन गटांतसुद्धा मोडतात. मूलत तो प्राणी कोण आहे आणि मग त्याला कुठले अवयव जोडले आहेत याचा विचार इथे केला आहे. मूलत तो प्राणी जर जमिनीवरचा असेल आणि त्याला पंख जोडले असतील तर त्याचा समावेश आकाशगामी प्राण्यात केला आहे. त्याचे बदललेले रूप कोणते आहे यावर तो कुठल्या गटात बसतो हे ठरवले आहे. या काही तांत्रिक बाबी जरी असल्या तरी यातली नाटय़मयता, त्या प्राण्यांचे नवीन तयार झालेले रूप, त्यातल्या काही प्राण्यांचे परकीय कलेशी असलेले साधर्म्य किंवा पूर्णपणे परदेशी कलेतच त्यांचा असलेला आढळ यांचा ऊहापोह त्या त्या वेळी केलेला आहे. के. कृष्णमूर्तींनी तर अनेक प्राण्यांच्या कथा, लोककथा यांचे खूप रंजक वर्णन केले आहे. यातल्या प्रत्येक प्रकारातील गमतीशीर प्राणी आपण इथे बघणार आहोत.

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मिथकशिल्पे – भारतीय कलेतील पौराणिक प्राणी

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प्राचीन भारतीय मंदिरे, लेणी हे आपले स्थापत्य वैभव. आपल्या पूर्वसुरींनी निर्माण केलेले हे स्थापत्य आज आपल्याला त्यांच्या कर्तृत्वाची, सामर्थ्याची आणि वैभवाची गाथा सांगतात. मंदिरे, मूर्ती, मंदिरांची रचना, त्यांचे स्थापत्य अशा अनेक विषयांवर विविध अभ्यासकांनी विपुल लेखन केले आहे. मंदिर स्थापत्य आणि मूर्तिशास्त्र हा विषयच मुळी असा आहे की, त्यावर विविधांगांनी अभ्यास करता येतो. त्यावर लेखन करता येते आणि मग त्यातले निरनिराळे पैलू उलगडून दाखवता येतात. मंदिर हे केवळ त्या देवाचे निवासस्थान न राहता ती एक सामाजिक संस्था होऊन जाते. समाजात घडणाऱया विविध गोष्टींचे प्रतिबिंब मंदिरांवर निरनिराळ्या शिल्पांच्या रूपाने आपल्याला बघायला मिळते. मग कधी ही शिल्पे युद्धाची असतात, कधी माणसाच्या दैनंदिन जीवनात घडणाऱया प्रसंगांची असतात, कधी देवदेवतांची असतात, तर कधी कामशिल्पेसुद्धा मंदिरावर कोरलेली आढळतात. या प्रत्येक शिल्पाच्या तिथे असण्याला काहीतरी अर्थ असतो, त्याचे काहीना काही प्रयोजन असते. उगाचच जागा आहे म्हणून कुठलेसे शिल्प मंदिरावर कोरले आहे असे अजिबात होत नाही. मग त्या शिल्पामागे कुठलीशी पौराणिक कथा असेल, त्या-त्या विशिष्ट देवतेचे महत्त्व समजावून सांगण्यासाठी त्या देवतेचे सामर्थ्य दाखवणारी ती शिल्पे असतील किंवा कुठल्या तत्त्वज्ञानाची ओळख त्या विशिष्ट शिल्पाच्या माध्यमातून करून दिलेली असेल. प्रत्येक शिल्प हे काहीतरी प्रयोजन घेऊनच मंदिरावर विराजमान झालेले असते. त्यामुळे या शिल्पांमध्ये खूप मोठय़ा प्रमाणावर विविधता दिसून येते. त्यांचे विषय वेगळे, त्यांची शैली वेगळी, त्यांची तऱ्हाच निराळी.

मंदिरांवर, लेणींमध्ये किंवा विविध स्थापत्यावर दिसणाऱया विविध शिल्पांमध्ये प्राणी आणि पक्ष्यांचे शिल्पांकन बघायला मिळते आणि यातसुद्धा संमिश्र प्राणी आणि पक्षी कोरलेले जेव्हा दिसून येतात तेव्हा ते बघून नक्कीच आश्चर्य वाटते. काय प्रयोजन असेल असे संमिश्र प्राणी-पक्षी इथे कोरण्याचे हे समजून येत नाही. वाघ, सिंह, मोर, गरुड, नंदी असे प्राणी आपण समजू शकतो. विविध देवतांची ती वाहने म्हणूनसुद्धा त्यांचे शिल्पांकन मंदिरावर केलेले आढळते. मात्र कधी कधी माणसाचे तोंड आणि सिंहाचे शरीर किंवा शिंग असलेला सिंह आणि पंख असलेला बैल असे जेव्हा शिल्पांकन केलेले दिसते तेव्हा मात्र यामागचे कारण काय असेल ते समजत नाही. ही शिल्पे उगाचच कोरली असतील का? की ही शिल्पे म्हणजे कलाकारांचा निव्वळ कल्पनाविलास असेल? फक्त भारतातच अशी शिल्पकला दिसून येते की जगभर हा प्रकार दिसतो? अशा संमिश्र शिल्पांना काय म्हणतात? यांचे संदर्भ कुठे साहित्यात म्हणा किंवा शास्त्रग्रंथात दिसून येतात का? असे असंख्य प्रश्न आपल्या समोर येऊन उभे राहतात आणि मग त्या प्रश्नांची उत्तरे शोधायला गेलो की, एकेक सुंदर आणि आश्चर्यकारक गोष्टी समोर येऊ लागतात. शिल्पकलेतील एक निराळेच दालन आपल्या समोर उघडले जाते. थक्क करणाऱया विविध कथा समोर येतात आणि मग आपण शिल्पकलेतील या रंजकतेचा मागोवा घेऊ लागतो. संमिश्र प्राणी, काल्पनिक प्राणी किंवा पौराणिक प्राणी अशी विविध नावे घेऊन ही शिल्पे आपल्या समोर येतात आणि त्यांचे अंतरंग उलगडू लागतात.

 या लेखमालेत आपण मंदिरांवर, लेणींमध्ये आणि विविध स्थापत्यांवर कोरलेले पौराणिक प्राणी किंवा काल्पनिक संमिश्र प्राणी यांची माहिती घेणार आहोत. इंग्रजीत या प्राण्यांना ‘मिथिकल अॅनिमल’ असे संबोधले जाते. याचा शब्दश अर्थ ‘पौराणिक प्राणी’ असा होतो. मात्र याचा पौराणिक प्राण्यांबरोबरच काल्पनिक प्राणी असाही उल्लेख असायला हवा. कारण महाकाव्ये, पुराणे यातून उल्लेख आलेले हे प्राणी मुळात काल्पनिक आहेत. माणसाच्या कल्पनाविलासातून त्यांची निर्मिती झाली आहे. साहित्यात त्यांची निर्मिती होताना मुख्यत्वे दोन विविध प्राण्यांचे एकत्रीकरण करून एखाद्या प्राण्याचे चित्रण केले गेले आहे. एका प्राण्याचे डोके आणि दुसऱया प्राण्याचे धड यांच्या एकत्रीकरणातून असे प्राणी कल्पिले गेले.

प्राचीन भारतीय कलेचा अभ्यास करताना, विशेषत शिल्पकला आणि चित्रकला या कला विविध विषयांनी, देवदेवतांच्या कथांनी आणि त्यावर आधारित शिल्पांनी, पानाफुलांच्या सजावटींनी बहरलेल्या दिसतात. याशिवाय विविध पशुपक्षी यांचाही इथे समावेश होतो. या लेखमालेचा विषय हा प्राचीन भारतीय कलेत दिसणाऱया पशुपक्ष्यांशीच निगडित आहे. जरी हा विषय भारतीय कलेत दिसणाऱया पशुपक्ष्यांसंबंधी असला तरी इथे पशुपक्ष्यांचे निव्वळ वर्णन नसून, निरनिराळ्या पशुपक्ष्यांचे एकत्रीकरण करून तयार झालेले विलक्षण, मोहक असे काल्पनिक प्राणिविश्व आणि त्यांच्यामुळे बहरलेली भारतीय कला दाखवण्याचा प्रयत्न या लेखमालेत केला आहे.

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मिथक शिल्पांचे देखणेपण

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आशुतोष बापट / वारसा वैभव

प्राणी वा पक्ष्यांचे एकत्रीकरण किंवा त्यांचे संमिश्र रूप म्हणजे एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया प्राण्याचे शरीर अशी संयुक्त रचना करून तयार केलेली शिल्पे आपल्याला प्राचीन काळापासून हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात. या व्यालप्रतिमा म्हणजेच मिथकशिल्पांचे देखणेपण उठून दिसते.

शंकराच्या मंदिरात गेल्यावर गाभाऱयाच्या उंबरठय़ावर एक राक्षसाचे तोंड कोरलेले दिसते. कार्ल्याच्या लेणीत गेल्यावर तिथल्या खांबांवर कुणी चमत्कारिक प्राणी दिसतात. राशीपा बघताना धनु राशीचे चिन्ह दाखवताना अर्धा घोडा आणि अर्धा माणूस दाखवतात. काही काही देवळांवर चांगले तीन फूट उंचीचे प्राणी दिसतात. त्यांचे तोंड हत्तीचे असते आणि उरलेला देह सिंहाचा असतो. हंपीला गेल्यावर तिथल्या विठ्ठल मंदिराच्या खांबावर एक निराळाच प्राणी दिसतो. वेगवेगळ्या प्राण्यांचे अवयव एकत्र करून घडवलेला हा प्राणी असतो. त्याचं नाव काही सांगता येत नाही. त्याचं नक्की रूप काय आहे हेदेखील समजत नाही. काय असतं हे सगळं? कशासाठी अशी रचना केलेली असते? या प्राण्यांची काही कथा आहे का? असे असंख्य प्रश्न आपल्याला पडतात आणि त्याची समाधानकारक उत्तरे काही मिळत नाहीत.

या सगळ्या प्राण्यांना मिथक प्राणी, पौराणिक प्राणी किंवा काल्पनिक प्राणी असे म्हणतात. या सगळ्याचा एक सोपा शब्द नंतर समोर येतो तो म्हणजे ‘व्यालशिल्पे’. यांना व्याल असे संबोधले जाते. प्राणी वा पक्ष्यांचे एकत्रीकरण किंवा त्यांचे संमिश्र रूप म्हणजे एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया प्राण्याचे शरीर अशी संयुक्त रचना करून तयार केलेली शिल्पे आपल्याला प्राचीन काळापासून हिंदुस्थानी कलेत दिसून येतात. या प्रकाराला ‘व्याल’ असा शब्द जरी सध्या रूढ झालेला असला तरी हा शब्द साधारण इ.स.च्या 6 व्या शतकानंतर वापरला जाऊ लागला. संयुक्त प्राणी ज्याला इंग्रजीत ‘मिथीकल अॅनिमल‘ असं म्हटलं गेलं आहे, त्याला आपण पौराणिक किंवा खरं तर काल्पनिक प्राणी म्हणू शकतो. हे असे प्राणी कलेत दाखवणे ही कलाकाराच्या कल्पनाशक्तीची भरारी म्हणावी लागेल. कलाकारांच्या या कल्पनाशक्तीला जोड मिळाली आहे ती या प्राण्यांच्या साहित्यातून येणाऱया वर्णनांची आणि त्याचबरोबर परकीय कलेच्या प्रभावाची. हिंदुस्थानी कलेमध्ये अशा संयुक्त प्राण्यांच्या वापराचे संदर्भ आपल्याला प्राचीन साहित्यांतूनही मिळतात. साहित्यात अशा प्राण्यांना ‘इहामृग’ असे म्हटले गेले आहे.

प्राचीन हिंदुस्थानी साहित्यात विविध ग्रंथांसोबतच मत्स्य, लिंग, हरिवंश, वायू, ब्रह्म, वामन या पुराण ग्रंथांमधूनही विविध ठिकाणी इहामृगाचा उल्लेख आलेला आहे. किंबहुना पौराणिक लेखकांनी या इहामृगांची एक यादीच दिलेली आहे. गजानन, ह्यानन, सिंहानन, व्याघ्रानन, मृगेंद्रवदन, खरमुख, मकरानन, इहामृगमुख, काकमुख, गृद्धमुख अशी अनेक नावे या यादीत दिसून येतात. कालिदासाचे प्रसिद्ध नाटक ‘रघुवंश’ यातही अर्धा हत्ती-अर्धा मत्स्य अशा एका दैत्याचा उल्लेख येतो.

इ.स.पूर्व दुसऱया शतकापासून लयनस्थापत्य महाराष्ट्रात मोठय़ा प्रमाणावर दिसून येते. चैत्यगृह आणि विहार असे लेण्यांचे स्वरूप असते. लेणीचा दर्शनी भाग (फसाड) आकर्षकरीत्या कोरलेला दिसतो. लेण्यांमध्ये असलेल्या स्तंभांवर आपल्याला प्राणी कोरलेले दिसून येतात. बेडसे आणि कार्ले तसेच लेण्याद्री इथे या प्राण्यांच्या पाठीवर कुणी एकटा स्वार तर कधी दंपती बसलेली दाखवतात. मात्र या लेण्यांमधून खूप सुंदर असे संमिश्र प्राणी कोरलेले दिसून येतात. पितळखोरा, भाजे, जुन्नर, लेण्याद्री, नाशिकची पांडवलेणी या लेण्यांतून स्फिंक्स, सेंटॉर, किन्नर कोरलेले आहेत. म्हणजे नुसते सांची, अमरावती, मथुरा इथल्या कलेतच नाहीत तर या लेण्यांतूनही या पौराणिक प्राण्यांचे दर्शन कलाकारांनी आपल्याला करून दिले आहे. यात पंख असलेला सिंह, चोच असलेला सिंह, माणसाचा चेहरा असलेला सिंह, पंख असलेले घोडे, हत्ती अशी विविधता दिसते. नाग व गरुडाचे मानवीकरण केलेली शिल्पे कोरलेली आहेत.

संमिश्र प्राणी किंवा संमिश्र पक्षी यांचे कलेतील सादरीकरण आपण सांची, भारहूत, अमरावती, नागार्जुनकोंडा इथे तसेच अजिंठा इथल्या लेणींमधील चित्रकलेत बघितले. ‘इहामृग’ अर्थात संमिश्र प्राण्यांची संकल्पना पुढे ‘व्याल’ या संकल्पनेत परावर्तित झालेली दिसून येते आणि इ.स.च्या 6 व्या शतकानंतर बांधलेल्या अनेक मंदिरांवर हे व्याल किंवा असे संमिश्र प्राणी मोठय़ा प्रमाणावर कोरलेले दिसून येतात. हे व्याल कोरताना भिन्न प्राण्यांची शरीरे एकत्र करून हे काल्पनिक प्राणी कोरले गेले आहेत. एका प्राण्याचे तोंड आणि दुसऱया एका किंवा एकापेक्षा जास्त प्राण्यांच्या शरीराचे भाग एकत्र करून असे व्याल कोरले गेले. ज्या प्राण्याचे तोंड कोरलेले असेल त्याच्या नावाने तो व्याल ओळखला जातो. उदाहरणार्थ, हत्तीचे तोंड आणि शरीर सिंहाचे असे शिल्प असेल तर त्याला ‘गजव्याल’ असे म्हटले जाते. मग मकरव्याल, अश्वव्याल, अजव्याल, गणेशव्याल अशा असंख्य व्याल प्रतिमा मंदिरांवर कोरलेल्या दिसून येतात. खजुराहो इथल्या मंदिरांवर असे व्याल दिसून येतात. महाराष्ट्राचा विचार करायचा झाला तर गडचिरोली जिह्यातल्या मार्कंडा मंदिरावर खूप मोठय़ा संख्येने व्याल कोरलेले आहेत. तारकाकृती आकारामुळे मंदिराच्या बाह्य भिंतीना अनेक कोन निर्माण होतात. उठाव असलेल्या भिंतींवर विविध देवदेवतांच्या मूर्ती कोरलेल्या दिसून येतात, तर त्या दोन मूर्तींच्या आतमध्ये असलेल्या कोनांवर व्याल प्रतिमा कोरलेल्या असतात. या व्याल प्रतिमांचे देखणेपण आणि त्यांचा ठसठशीतपणा प्रकर्षाने उठून दिसतो.

छत्तीसगडच्या पाली इथल्या मंदिरावर नरव्यालाची मूर्ती आहे. चेहरा माणसाचा आणि उर्वरित शरीर प्राण्याचे असा हा नरव्याल इथले मुख्य आकर्षण म्हणायला हवा. इथले व्यालसुद्धा हत्तीच्या पाठीवर दाखवलेले आहेत. याचा अर्थ हत्ती आणि या व्याल प्रतिमा यांचा काहीतरी संबंध असण्याची दाट शक्यता दिसते. या मंदिरावरचे व्याल फारच देखणे आहेत आणि देवतांना जसे विविध दागदागिने दाखवतात तसे विविध दागिने या व्यालांच्या अंगावर कोरलेले दिसतात. इतकी सुंदर शिल्पकला अर्थातच चकित करून टाकते. तत्कालीन कलाकारांची कलासक्त नजर आणि कुठलीही गोष्ट सादर करताना ती अतिशय मोहक रूपात सादर केली पाहिजे ही ओढ प्रकर्षाने जाणवते.

 

शिराळशेट

१३८५ च्या सुमारास महाराष्ट्रात मोठा दुष्काळ पडला होता. त्यावेळी बहामनी राजवट होती व महमूदशहा बहायनीचे महाराष्ट्रावर राज्य होते. हा राजा प्रजादक्ष होता. या राजाने गुलबर्गा, बिदर, कंधार, दौलताबाद, एलिचपूर, चौल व दाभोड या ठिकाणी अनाथालये उघडली होती. त्याच्या राज्यात शिराळशेट  (किंवा श्रीयाळ श्रेष्ठी) नावाचा एक सत्प्रवृत्तीचा लिंगायत वाणी होता. या दुष्काळात शिराळशेठने अनेकांचे प्राण वाचवले. आपली सर्व संपत्ती विकून लमाणांच्या करवी बैलांच्या पाठीवरून गुजरातेतून धान्य आणून दुष्काळपीडित लोकांना मोफत दिले. या राजाचे कौतुक एवढय़ासाठी की, शिराळशेठने केलेले प्रयत्न पाहून समाधान व्यक्त केले व त्याला राजदरबारी पाचारण करून धन्यवाद देऊन इच्छा असेल ते मागून घेण्यास सांगितले. शिराळशेठ मोठा चतुर असला पाहिजे. त्याने साडेतीन घटकांचे राज्यपद मागून घेतले व महमूदशहा बादशहाने त्याला ते आनंदाने दिले. कराराप्रमाणे राजाने आपली राज्यमोहोर त्याच्या स्वाधीन केली. या लक्ष्मीसंपन्न माणसाने स्वत:करता एक ढबू पैसाही घेतला नाही व आलेल्या अमोल संधीचा उपयोग इतरांसाठी केला. देवाधर्मासाठी केला व म्हणून तो अजरामर झाला. जप्त केलेली हिंदू मंदिरे व खालसा केलेले त्यांचे उत्पन्न शिराळशेठने राज्यमोहोर लावून सरकारी आज्ञेने परत केली. जप्त झालेली अनेक इनामे व जमिनी परत केल्या व दानधर्म केला. त्याच्या या कृतीने बादशहा अधिकच खूश झाला व शिराळशेठच्या इच्छेप्रमाणे अंमलबजावणी करण्यास त्याने फर्मावले. या ठिकाणी पुन्हा बादशहाचे औदार्य दिसून येते. इतकेच नव्हे तर त्याने शिराळशेठच्या मुलाला बोलावून त्याला सरदारकी बहाल केली.

श्रावण शुद्ध षष्ठीला शिराळशेठच्या प्रतिमांचे पूजन होते. आदल्या दिवशी तेथील कुंभाराकडे पाट दिला जाई व त्या पाटावर कुंभार शिराळशेठची बैलावर बसलेली प्रतिमा, शिराळशेठपुढे त्याचा श्वान व घरातील मंडळी असा देखावा केलेला असतो. या सर्वाची करडीच्या बिया, पताका आदी गोष्टींनी आरास केलेली असते. असा सजवलेला पाट आणून शिराळशेठची पूजा होते व संध्याकाळी त्याचे विसर्जन केले जाते.
पूर्वी पुण्यात श्रावणात महिनाभर अनेक ठिकाणी शिराळशेठचा मातीचा पुतळा बसवला जात असे. हा पुतळा आतून पोकळ व पोटाच्या जागी मागून मोकळा असे. त्यात भुसा, धलप्या इ. घालून त्याचा धूर शिराळशेठच्या तोंडातल्या चिलमीतून धूर निघत असे.

शिराळशेठने साडेतीन घटकांचे राज्यपद मागून आपली अनेक मंदिरे बहामनी राजांच्या जप्तीतून मुक्त केली म्हणून अनेक मंदिरात त्याचा दगडी पुतळाही दिसतो तो फोटो सोबत देत आहे.
सामान्य लोकांच्या मनातला हा साडेतीन घटकांचा राजा व त्याच्याबद्दलची कृतज्ञता हे त्या पुतळ्याचे प्रतीक होते. त्याला मिळालेल्या साडेतीन घटकांत त्याने रयतेच्या कल्याणाचे निर्णय घेतले आणि आत्ता पाच-पाच वर्षे सत्ता मिळूनही जनतेचे प्रश्न सोडवता न येणारे राज्यकर्ते असे चित्र आपण पाहात आहोत. म्हणून आपण शिराळशेठ आपल्यातून जाऊ देता कामा नये अशी इच्छा! 

राज्यनिर्मिती होऊन पन्नास-साठ वर्षे झाली तरीही प्रजेच्या पाणी, अन्न, वीज, निवारा ह्या महत्त्वाच्या गरजाही राज्यकर्त्यांना पूर्ण करता आलेल्या नाहीत, हे आज आपण अनुभवीत आहोत.
पण इच्छा असली तर काय करता येऊ शकते ते ह्या शिराळशेटने त्याला मिळालेल्या अवघ्या साडेतीन घटिकांमधून दाखवून दिले. त्या तेवढया वेळेत त्याने तातडीने जास्तीत जास्त देवस्थानांना वर्षासनें नेमून दिली. अनेक धार्मिक स्थळांना शक्य तेवढया सोयी-सुविधांसाठी मुबलक निधी उपलब्ध करुन दिला, देणग्या दिल्या. दानधर्म केला. जे एखाद्या राजाला दहा-बारा वर्षांमध्ये जमणार नाही एवढी धर्मकृत्यें त्याने केली.

त्याच्या ह्या औदार्याचे आणि धर्मशीलतेचे स्मरण म्हणून सातारा येथील शिराळे या गावी श्रावण शुध्द पंचमीला त्याच्या नावाने उत्सव साजरा केला जातो. त्याच्या प्रतिमेची पूजा केली जाते.
'जोडोनियां धन उत्तम वेव्हारें। उत्तमचि गती तो एक पावेल। उत्तम भोगील जीव खाणी॥' असे आपल्याला तुकोबांनी सांगितले आहेच.

 तुकोबा म्हणतात, जनहो, तुम्ही अतिशय उत्तम मार्गाने कोणाला न फसविता व्यापाद उदीम करा, व्यवसाय करा. त्याद्वारे भरपूर संपत्ती कमवा, आणि नंतर ती 'इदं न मम' ह्या विचाराने योग्य कामासाठी, विधायक कार्यासाठी खर्च करा. जो अशातऱ्हेने वागेल त्याला उत्तम गति तर मिळेलच शिवाय मनःशांतीदेखील लाभेल. शेवटी आत्मिक समाधान महत्त्वाचे!

तुकोबांच्या प्रत्येक शब्दाचा नीट विचार करावयास लागलो की, मन न सांगता आपसूकच अंतर्मूख होते. धन मिळवा पण कसे, तर सनदशीर मार्गाने मिळवा. चांगला उद्योग करुन मिळवा. लोकांना व्यसनी बनविणाऱ्या वस्तुंची निर्मिती करुन त्यांना, त्यांच्या नातलगांना आणि परिणामी साऱ्या समाजाला दुःखाच्या खाईत लोटून बख्खळ पैसा कमविला तरी त्याचा काय उपयोग?


दुधात पाणी घालून पाण्यासारखा पैसा मिळवायचा आणि तो तसाच उधळायचा ह्याला काय अर्थ आहे? एखाद्याला अडचणीत टाकून मग त्याच्याकडे लाच मागाल आणि समाजात उजळ माथ्याने फिरता यावे म्हणून गाजावाजा करुन दान कराल तरी ते 'पुण्य' म्हणून गणले जाणार नाही. नेकीने, श्रमाने पैसे कमवा, ते थोडे-थोडे करुन जमा करा आणि नंतर योग्य ठिकाणी 'सत्कारणी' लागतील अशातऱ्हेने त्याचा विनियोग करा. 'क्षणशः कणशश्चैव विद्या अर्थंच साधयेत्' असे पूर्वी लहानपणी मुलांना शिकविले जाई. क्षण-क्षण करुन प्रत्येक क्षण सत्कारणी लावून विद्या मिळवा आणि कण-कण करुन अर्थ म्हणजे धन जोडा. 'थेंबे थेंबे तळे साचे'- हा दाखलादेखील हेच सांगण्यासाठी दिला जाई.
आता पैसा खूपच मोठा झाला आहे. पण तो तसा मोठा होतांना खोटादेखील झाला आहे. काहीही न करता, दुसऱ्याला 'टोपी घालून किंवा 'शेंडी' लावून आपले खिसे कसे भरुन घ्यायचे ह्याच विचारात अनेकजण असतात. पैसा, आणखी पैसा, अधिक पैसा, सायकल, स्कूटर, गाडी अशा आपल्या इच्छा-आकांक्षा सतत अधिकाधिक हाव धरतांना दिसतात.

'मी-माझे'ह्यापलिकडील जगाची पर्वा करण्याची आजच्या पिढीला गरजच वाटेनाशी झाली आहे. ज्याच्याकडून 'लाभ' आहे त्याच्यावर 'लोभ' करावा एवढेच त्यांचे ब्रीद आहे की काय असे वाटते. त्याचा परिणाम म्हणजे मऊ गाद्यागिरद्या, एअरकंडिशनर असूनही मनःशांती मात्र तसूभरही लाभत नाही. जीव तळमळ तळमळ करीत राहातो.उद्याची-परवाची काळजी वाटत राहाते. झोपेची गोळी घेऊनही झोप लागत नाही.


तुम्ही परोपकाराची चव एकदा तरी चाखून बघा. दुसऱ्याला देण्यातील आनंद काय असतो ते एकदा तरी अनुभवा. मग ही जीवाची तगमग कधी अदृश्य झाली ते तुम्हाला कळणारदेखील नाही. त्यासाठी एक दिवस तरी प्रत्येकानें शिराळशेट बनावें!
संदर्भ :  कै. वा. गो. आपटे यांचा शब्दकोश, महाराष्ट्र शब्दकोश व प्रल्हाद कृष्ण प्रभुदेसाई यांचा ‘आदिशक्तीचे विश्वरूप अर्थात देविकोश खंड-१  (वाईच्या प्राज्ञ पाठशाळेच्या ग्रंथालयात उपलब्ध). 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
 

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