गुप्त
वंश, पूर्वोत्तर भारत में मगध (अब बिहार) राज्य के शासक। उन्होंने चौथी
शताब्दी की शुरुआत से छठी शताब्दी के अंत तक उत्तरी और मध्य और पश्चिमी
भारत के कुछ हिस्सों पर एक साम्राज्य बनाए रखा।
गुप्त साम्राज्य की स्थापना श्री गुप्त ने की थी और इसके उत्तराधिकारी
उनके पुत्र घटोत्कच थे। यह राजवंश चंद्रगुप्त- I, समुद्रगुप्त, आदि जैसे
शासकों के साथ प्रसिद्ध हुआ। 5वीं सदी के संस्कृत कवि कालिदास ने
गुप्तों को श्रेय दिया कि उन्होंने भारत के भीतर और बाहर लगभग इक्कीस
राज्यों पर विजय प्राप्त की, जिसमें पारसिक, हूण, कम्बोज, पश्चिम और पूर्व
में स्थित ओक्सस घाटियों, किन्नरों के राज्य शामिल थे। , किरातस, और अन्य। गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र नगर थी। आज यह शहर पटना के नाम से जाना जाता है।
विष्णुपुराण गुप्त के अनुसार “वैश्य” से संबंधित है।
गुप्ता प्रशासन राज्य (राज्य) को कई प्रांतों में विभाजित किया गया
था और उन्हें उत्तर में ‘भुक्ति’ और दक्षिण में ‘मंडल’ या ‘मंडलम’ के नाम
से जाना जाता था। ‘भुक्ति’ का राज्यपाल राजा द्वारा नियुक्त किया जाता था
और ‘उपरिका’ के नाम से जाना जाता था।
• प्रांतों को उत्तर (भारत) में ‘विषय’ या ‘भोगा’ और दक्षिण (भारत) में ‘कोट्टम’ या ‘वलनाडु’ के रूप में उप-विभाजित किया गया था।
• प्रशासन की कुछ अन्य इकाइयाँ जिले थे, जिन्हें उत्तर (भारत) में ‘आधी’, ‘थाना’ या ‘पटना’ और दक्षिण (भारत) में ‘नाडु’ कहा जाता था।
गांवों के समूह (यानी आधुनिक तहसील) को उत्तर (भारत) में ‘विथिस’ और
दक्षिण (भारत) में ‘पट्टला’ और ‘कुर्रम’ के नाम से जाना जाता था। ग्राम
प्रशासन ग्रामीण निकायों के नियंत्रण में था जिसमें एक मुखिया और गाँव के
बुजुर्ग शामिल थे।
प्रत्येक नगर प्रशासन के पास एक परिषद निकाय था।
गुप्त राजवंश स्रोत नितिसार-कामंदक
कौमुदी महोत्सव – वज्जिका
देवीचंद्रगुप्तम (ध्रुव देवी और चंद्रगुप्त द्वितीय के बारे में) और मुद्राराक्षस – विशाखादत्त
स्वप्नवासवदत्तम (वासवदत्त का स्वप्न) – भासा
मृच्छकटिक (चारुदत्त नाम के एक ब्राह्मण के बारे में एक नाटक जो वसंतसेना नाम की एक वेश्या से प्रेम करता था) – शूद्रक
कथासरित्सागर (जो दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार की बात करता है) – सोमदेव
कला और वास्तुकला गुप्त काल में, गुप्तों ने भारत में पहली बार हिंदू संरचनात्मक मंदिरों की स्थापना की। गुप्त काल के मंदिर हैं:
मध्य प्रदेश में वराह और विष्णु मंदिर (विष्णु वराह के रूप में, उदयगिरि गुफाएं)
जबलपुर में कंकाली देवी का मंदिर नचना कुथारा में महादेव और पार्वती का मंदिर देवगढ़ में दशावतार का मंदिर (विष्णु अनंतशयन पैनल) उत्तर प्रदेश में भीतरगाँव मंदिर
कुमारगुप्त ने नालंदा विश्वविद्यालय की नींव रखी जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थान के रूप में उभरा। 427
CE में स्थापित, नालंदा को दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता
है, एक प्रकार का मध्यकालीन आइवी लीग संस्थान, जिसमें नौ मिलियन पुस्तकें
हैं, जिसने पूर्वी और मध्य एशिया के 10,000 छात्रों को आकर्षित किया।
आर्यभट, भारतीय गणित के जनक माने जाते हैं, आर्यभट सबसे पहले शून्य को एक अंक के रूप में निर्दिष्ट करने वाले थे। आर्यभट्ट ने साइन फंक्शन (त्रिकोणमिति) की भी खोज की। उन्होंने बीजगणित और साइन कोण के उपयोग से पाई के मान की भी गणना की
आर्यभट्ट का सिद्धांत कि पृथ्वी आकार में गोल है चपटी नहीं है। आर्यभट्ट ने यह भी सिद्ध किया कि पृथ्वी प्रतिदिन अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने सूर्य और चंद्र ग्रहण के कारण की खोज की।
कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम, रघुवंश और कुमारसंभव जैसे महाकाव्यों की रचना की।
गुप्त काल में संस्कृत भाषा प्रमुख हो गई।
गुप्त काल के दौरान पंचतंत्र की कहानियों और हितोद्देश की रचना विष्णु शर्मा ने की थी।
चंद्रगुप्त द्वितीय “विक्रमादित्य” ने उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। वह कला और संस्कृति के व्यक्ति भी थे, उज्जैन में उनका दरबार ‘नवरत्न’ से सुशोभित था- कालिदास – कवि अमरसिंह – कोशकार धन्वंतरि- डॉक्टर वेताल बत् – जादूगर वैहरमिहिर-खगोलविद वरची – व्याकरणिक शंका-वास्तुकार हरीसेना – दरबारी कवि क्षपंक- ज्योतिषी
शासकों की सूची
श्री-गुप्त प्रथम महाराजा – तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में
पुराण – विष्णु पुराण, वायु पुराण एवं ब्राह्मण पुराण
समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति
देवी चन्द्रगुप्तम (विशाखदत्त कृत)
कमारगुप्त का विलसड अभिलेख
कालीदास की रचनाएं
स्कन्दन गुप्त का भितरी अभिलेख
विदेशी यात्री: फाह्यान, ह्नेनसाग आदि
प्रभावती गुप्त का पूना ताम्रपत्र
गुप्त कौन थे ? वैश्य या ब्राह्मण ?
वैश्य होने के पक्ष में तर्क – रोमिला थापर, रामशरण शर्मा आदि इतिहासकारों ने गुप्तों को वैश्य माना है।
कारण: स्मृतियों के अनुसार नाम के पीछे गुप्त उत्तरांश लगाना वैश्यों की
एक विशेषता है। गुप्त वैश्यों का एक गोत्र भी है। इसका एक कारण यह भी माना
जाता है कि गुप्त वंश के संस्थापक का नाम केवल गुप्त प्राप्त होता है।
श्री आदर भाव से जोड़ा गया उपसर्ग है। इस प्रकार गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त माना जाता है।
ब्राह्मण होने के पक्ष में तर्क – राय चौधरी ने गुप्तों को ब्राह्मण वंशी माना है।
कारण: पुष्यमित्र शुंग षट्टमहिषी धारणी में गुप्त गोत्र को ब्राह्मण वंशी
बताया गया है। इसका एक कारण गुप्त शासकों द्वारा अपनी पुत्रियों का विवाह
ब्राह्मणों के साथ किया जैसे – चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती
गुप्त का विवाह वाकाटक शासक द्वितीय से एवं भानु गुप्त ने अपनी बहनों का
विवाह भी ब्राह्मणों से किया। चूंकि गुप्त काल में एवं मौर्योत्तर काल में
जाति प्रथा प्रबल थी तथा अन्तर्जातीय विवाह अमान्य था।इस प्रकार गुप्तों की
पुत्रियों के ब्राह्मणों से विवाह उन्हें ब्राह्मण वंशी मानने को प्रेरित
करते हैं। परन्तु इस समय अनुलोम विवाह (उच्चवंश का वर, निम्न वंश की कन्या)
प्रचलित था। ये पुनः इस तथ्य का उलझा देती है।
अतः ये कौन थे इसका कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है।
गुप्तवंशीय शासक
श्रीगुप्त (240 – 280 ई)
प्रभावती गुप्त का पूना स्थित ताम्रपत्र अभिलेख के अनुसार श्री गुप्त को
गुप्त वंश का आदिराज/आदिपुरूष माना गया है। अतः गुप्त वंश की स्थापना का
श्रेय श्री गुप्त को प्राप्त है। श्री गुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की
थी।
घटोत्कच्च गुप्त (280-319)
यह श्री गुप्त का उत्तराधिकारी था।
घटोत्कच्छ ने भी महाराज की उपाधि धारण की थी।
नोट – श्री गुप्त एवं घटोत्कच गुप्त को संपूर्ण स्वतंत्र शासक नहीं
माना गया है क्योंकि इन दोनो ने महाराज की उपाधि धारण की थी और उस समय
महाराज की उपाधि सामन्तों को प्राप्त होती थी तथा पूर्ण स्वतंत्र शासक
महाराजाधिराज की उपाधि धारण करते थे। चूंकि चंन्द्रगुप्त-1 ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी इसी कारण चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक माना गया है।
चन्द्रगुप्त प्रथम (319ई. – 334ई.)
यह गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक था।
इसने गुप्त वंश में महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
गुप्त वंश में सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाने वाला शासक यही था
चन्द्र गुप्त प्रथम ने ही गुप्त संवत् की स्थापना की थी।
चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया।
समुद्रगुप्त (335ई. – 380ई.)
समुद्रगुप्त को विसेट स्मिथ ने अपनी पुस्तक अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया में भारत का नेपोलियन कहा है।
उपाधियां – पराक्रमांक, अप्रतिरथ एवं व्याघ्रपराक्रम।
समुद्रगुप्त का विजय अभियान (5 चरण)
प्रथम चरण – अहिच्छत्र, चम्पावती एवं विदिशा सहित उत्तर भारत के 9 राज्य। यह आर्यावर्त राज्य प्रसभोद्वरण कहलाया।
द्वितीय चरण – पंजाब, सीमावर्ती राज्य एवं नेपाल।
तृतीय चरण – विंध्यक्षेत्र पर विजय।
चतुर्थ चरण – पल्लव, कोसल, कोट्टूर, महाकान्तर, कांची, वेंगी आदि सहित
कुल 12 राज्यों पर विजय प्राप्त की। दक्षिण भारत पर यह विजय धर्म विजय
कहलायी
पांचवां चरण – उत्तर पश्चिम भारत के कुछ विदेशी राज्यों पर विजय।
विजय अभियान को पूरा करने के बाद अश्वमेधयज्ञ करवाया एवं अश्वमेध
पराक्रम की उपाधि ली। समुद्रगुप्त को उसके सिक्कों पर वीणा बजाते हुए
दिखाया गया है। समुद्र गुप्त को कविराज की उपाधि प्रदान की गयी है
चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में गुप्त साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से पूर्व में बंगाल तक एवं उत्तर में हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक क्षत्रप रूद्रसिंह-3 को पराजित किया इस
उपलक्ष में व्याघ्र शैली के चांदी के सिक्के चलाए एवं शकारि की उपाधि धारण
की।
गुप्तकाल में चांदी के सिक्के चलाने वाला प्रथम शासक यही था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ही विक्रम संवत् की स्थापना की।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान आया था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजदरबार में 9 रत्न थे।
नो रत्न –
धन्वन्तरी – चिकित्सा क्षेत्र
घाटखर्पर – कवि
कालिदास – लेखक
वाराहमिहिर – खगोल शास्त्री
अमरसिंह
कक्षपनक – ज्योतिष
वररूचि – संस्कृत व्याकरण
वेतालभट्ट – मन्त्रशास्त्र
शंकु – शिल्प शास्त्र
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन काल कला एवं साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है।
कुमारगुप्त
कुमारगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
उपाधि – महेन्द्रादित्य, श्री महेन्द्र, गुप्तकुल व्योमशशि, अश्वेमेध महेन्द्र।
कुमार गुप्त की मुद्राओं पर गरूड के स्थान पर मयूर आकृति अंकित है।
कुमारगुप्त प्रथम के शासन में नालंदा विश्वविधालय की स्थापना करवायी।
कुमारगुप्त के सिक्कों पर कार्तिकेयन का अंकन मिलता है।
स्कन्दगुप्त (455 – 467)
उपाधि – क्रमादित्य
अन्यनाम – देवराय
स्कन्दगुप्त के शासन काल में प्रथम हूण आक्रमण हुआ जिसे स्कंदगुप्त ने विफल कर दिया।
स्कन्दगुप्त ने अपनी राजधानी अयोध्या में स्थानांतरित की थी।
स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारी
पुरूपुप्त – कुमारगुप्त द्वितीय – बुद्धगुप्त – नरसिंहगुप्त – भानुगुप्त।
भानुगुप्त (510 ई. )
इसकी जानकारी एरण अभिलेख से प्राप्त होती है।
भानुगुप्त का मित्र गोपराज, भानुगुप्त की ओर से हूणों से लड़ता हुआ
वीरगति को प्राप्त हुआ तथा गोपराज की पत्नि आग में जलकर सती हो गयी।
एरण अभिलेख में सतीप्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है।
विष्णुगुप्त -3 (540 – 550)
यह गुप्तवंश का अंतिम शासक था एवं इसके बाद गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था।
रामगुप्त प्रकरण
गुप्त शासकों के रूप में रामगुप्त का नाम देवीचन्द्रगुप्तम, हर्षचरित,
काव्यमीमांशा आदि ग्रंथों से प्राप्त होता है। यह समुद्रगुप्त के पश्चात्
गद्दी पर बैठा परन्तु यह कायर शासक था। इसके समय में शक आक्रमण बढ़ गए थे
जिसे इसने अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शाकाधिपति के लिए सौंपकर राज्य में
शांति बहाल करने की कोशिश की। परन्तु रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त
द्वितीय को इस बात की भनक लग गयी तथा स्त्री के वेश में ध्रुवदेवी के स्थान
पर शक शिविर में गया तथा मौका पाकर शकाधिपति की हत्या कर दी। इसके बाद
इसने अपने कायर भाई की भी हत्या कर दी तथा स्वंय गद्दी पर बैठा एवं
ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।
गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण
अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी
शासनक व्यवस्था का संघात्मक/विकेन्द्रित स्वरूप
उच्च पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर आनुवांशिक।
प्रांतीय शासकों को विशेषाधिकार प्रदान करना।
बाह्म आक्रमण।
गुप्तकालीन प्रशासन
राजत्व का दैवीय उत्पत्ति सिद्धांत लोकप्रिय था।
राजपद वंशानुगत था परन्तु ज्येष्ठाधिकार की अटल प्रथा का अभाव था।
गुप्तकाल प्रशासन विकेन्द्रीकरण व्यवस्था पर आधारित अथवा संघात्मक था। प्रमाण: सामन्तों/प्रांत अधिकारियों को प्राप्त विशेषाधिकार।
राजा न्याय व्यवस्था का प्रधान होता था परन्तु विधि निर्माण का अधिकार सीमित था।
राजा का मुख्य कार्य जनता की एवं राज्य की सुरक्षा, वर्ण व्यवस्था कायम रखना तथा धर्म की रक्षा करना था।
केन्द्रीय प्रशासन एवं प्रांतीय प्रशासन
राजा
प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी
कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं सैन्य प्रधान।
विधि निर्माण का अधिकार नहीं।
देश/राष्ट्र
प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई
इसका शासक गोप्ता होता था
भुक्ति/प्रांत
देश भुक्तियों में बंटा हुआ होता था।
यहां कुमारमात्यों को नियुक्त किया जाता था।
यहां उपरिक नामक अधिकारी होता था।
विषय/जिला
प्रांतों का विभाजन विषय/जिलों में होता था।
इसका सर्वोच्च अधिकारी विषयपति था
विषयपति की सहायता श्रेष्ठि, सार्थवाह, कुलिक, कायस्थ करते थे
विधि/तहसील
विषय विधियों में बंटा होता था
पेठ
पेठ विधि से छोटी इकाई थी। गांवों का संघ।
ग्राम/गांव
गुप्त कालीन प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी।
इसका प्रधान महत्तर/मुखिया या ग्राम वृद्ध होता था।
गुप्त साम्राज्य के प्रशासनिक अधिकारी
महाबलाधिकृत – सेनापति
महादण्डनायक – न्यायाधीश
दण्डपाशिक – पुलिश विभाग का सर्वोच्च अधिकारी
सन्धि विग्रहिक – युद्ध तथा संधि से संबंधित विदेश मंत्र
विनयस्थिति – शिक्षा एवं धार्मिक मामलों का प्रधान
महाअक्षपटलिक – लेखा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी
चौरोदरनिक – गुप्तचर विभाग का प्रधान।
अग्रहारिक – दान विभाग का प्रधान
भाण्डागाराधिकृत – राजकोष अधिकारी
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था
कृषि
गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था।
भमि के प्रकार-
वास्तु भूमि – वास करने योग्य
अप्रहत – बिना जोती गयी भूमि
सदबल भूमि – घास मैदान वाली
औदिक – दलदल भूमि
राजस्व – भू राजस्व ही राज्य की आय का मुख्य साधन था। भू राजस्व कुल आय का 1/6 हिस्सा होता था।
विभिन्न प्रकार के कर
धान्य – अनाज में राजा का हिस्सा
भट्टकर – पुलिस कर
चाट – लुटेरों से बचाने के लिए दिया जाने वाला कर
प्रणय – अनिवार्य कर
विष्टि – बेगार कर
शुल्क – सीमा कर या बिक्री कर
बलि – यह एक धार्मिक कर था।
उपरि कर – यह उन रैयतों पर लगाया जताा था जो भूमि के स्वामी नहीं थे
भू राजस्व नकद तथा अनाज दोनों के रूप में वसूला जाता था।
हिरण्य सामुदायिक – नकद भू राजस्व वसूलने वाले।
औदरांगिक – अनाज के रूप में भू राजस्व वसूलने वाले।
गुप्तकालीन व्यापार
रोमन व्यापार का पतन
द. पू. एशिया एवं चीन के साथ व्यापार में वृद्धि।
आंतरिक व्यापार में कमी।
गुप्तकालीन समाज
गुप्तकालीन समाज की विशेषताएं
गुप्तकालीन समाज ब्राह्मणवादी था।
विभिन्न पेशेवर समूहों का जाति में ढलना
पुनरूत्थान के कारण उच्चवर्णो के विशेषाधिकारों का बल
वैश्यों की सामाजिक दशा में तुलनात्मक रूप में गिरावट
शूद्रों की सामाजिक दशा में सुधार
दास प्रथा
गुप्त काल में दास प्रथा प्रचलित थी तथा इस काल में दासों को मुख्यतः
घरेलू कार्यो में लगाया जाता था। कारण – जनजातियों के आत्मसातीकरण के कारण
श्रमिकों की पूर्ति, शूद्रों को कृषि कार्यो में लगाया जाना एवं भूमि दानों
द्वारा दास प्रथा को कमजोर कर देना।
स्त्रियों की दशा
स्त्रियों की सामाजिक दशा में तुलनात्मक रूप से गिरावट आयी।
पर्दा प्रथा का प्रचलन हो चुका था।
बाल विवाह प्रथा एवं बहु विवाह प्रथा व्याप्त हो चुकी थी।
सती प्रथा का साक्ष्य एरण अभिलेख से प्राप्त हुआ है।
देवदासी प्रथा द्वारा मंदिर के पुजारियों द्वारा यौन शोषण बढ़ गया था।
गणिकाओं एवं वैश्यावृति में वृद्धि हुई।
कुछ सकारात्मक परिवर्तन
स्त्रियों को सम्पत्ति संबंधि अधिकार दिए गए।
पत्नि एवं पुत्रियों को सम्पति का उत्तराधिकारी बनाया गया।
स्त्रियां प्राकृत भाषा का प्रयोग कर सकती थी।
गुप्तकाल में धार्मिक स्थिति
गुप्तकालीन धार्मिक व्यवस्था का मुख्य लक्षण – जटिलता एवं विविधता है।
एक ओर ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के कारण यहां यज्ञ की पद्धति पुनर्जीवित हो
रही थी वहीं जनजातीय तत्वों के प्रभावस्वरूप भक्ति की अवधारणा को
प्रोत्साहन मिल रहा था। मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण हुआ। अवतार वाद
की अवधारणा का उदय हुआ तथा ब्राह्मण धर्म के अन्तर्गत वैष्णव एवं शैव भक्ति
का विकास हुआ। नव हिन्दु धर्म की शुरूआत भी इसी काल में हुई। इसके चलते
वैष्णव धर्म सबसे प्रधान बन गया। शैव सम्प्रदाय को भी संरक्षण मिल गया।
भगवान हरिहर की मूर्ति
यह शैव एवं वैष्णव धर्म के समन्वय को दर्शाती है।
देवताओं के साथ देवियों को इसी काल में जोड़ा गया।
त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की संकल्पना इसी काल में विकसित हुई।
ब्राह्मणवाद के उत्थान के कारण धार्मिक कर्मकाण्डों में पुनः वृद्धि हुई।
मूर्ति पूजा का प्रभाव एवं भक्ति का प्रभाव बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म पर भी पड़ा तथा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी मूर्ति बनना शुरू हुआ।
मन्दिरों का निर्माण, भक्ति, कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा इस काल की प्रमुख विशेषता थी।
गुप्तकालीन स्थापत्य
गुप्तकाल को भारतीय कला एवं संस्कृति का स्वर्णयुग माना जाता है।
गुप्तकाल के प्रमुख मंदिर-
देवगढ़ का दशावतार मंदिर – ललितपुर (उत्तर प्रदेश)
तिगवा का विष्णु मंदिर – जबलपुर (मध्य प्रदेश)
एरण का विष्णु मंदिर – सागर (मध्य प्रदेश)
भूमरा का शिव मंदिर – सतना (मध्यप्रदेश)
नचना कुठार का पार्वती मंदिर – पन्ना (मध्य प्रदेश)
भीतर गांव का कृष्ण मंदिर – कानपुर (उत्तर प्रदेश)
नागोद का शिव मंदिर – सतना (मध्यप्रदेश)
गुप्तकालीन शिक्षा एवं साहित्य
गुप्तकालीन साहित्य की विशेषताएं
अधिकांश रचनाएं प्रेमप्रधान एवं सुखान्त होती थी।
रचनाओं में उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत बोलते थे। शूद्र एवं महिलाएं प्राकृत भाषा बोलती थी।
नोट – सेक्सपियर एवं कालिदास की रचनाओं में मुख्य अंतर प्रेमगाथा के
अंत का होता है। कालिदास की रचनाएं सुखान्त वाली हैं। जबकि सेक्सपियन की
रचनाओं का अंत सुखद नहीं होता।
महाभारत एवं रामायण का अंतिम रूप से संकलन इसी काल में हुआ।
गुप्तकालीन रचनाएं
मालविकाग्निमित्रम – कालिदास – अग्निमित्र एवं मालविका की प्रणयकथा
अभिज्ञान शाकुन्तलम – कालिदास – दुष्यन्त एवं शकुन्तला की प्रेमकथा।
विक्रमोवर्षीयम – कालिदास – सम्राट पुरूरवा एवं उप्सरा उर्वसी की प्रेमकथा।
मुद्राराक्षसम् – विशाखदत्त – चन्द्रगुप्त मौर्य कालीन विश्लेषण व कथा।
देवीचन्द्रगुप्तम् – विशाखदत्त – चन्द्रगुप्त-2 द्वारा शक राजा का वध एवं ध्रुवदेवी (रामगुप्त की पत्नी) से विवाह।
मृच्छकटिकम् – शूद्रक – चारूदत्त एवं वसन्त सेना की प्रेमगाथा।
स्वप्नवासदत्तम् – भास – महाराजा उदयन एवं वासवदत्ता की प्रेम कथा।
अन्य रचनाएं
कालिदास – ऋतुसंहार, मेघदूतम, कुमार सम्भवम, मालविकाग्निमित्रम, रघवंशम, अभिज्ञानशाकुन्तलम, विक्रमोर्वशीयम।
भारत के राजनीतिक इतिहास में गुप्त वंश के अंत के बाद विकेन्द्रीकरण
एवं क्षेत्रीयता का आविर्भाव हुआ। गुप्त वंश के पश्चात् अनेक छोटे-छोटे
राज्य बने जैसे – थानेश्वर का पुष्य भूति वंश, कन्नौज का मौखिरी वंश आदि
मुख्य राज्य थे।
पुष्यभूति/वर्धन वंश
इस वंश की स्थापना थानेश्वर में पुष्यभूति द्वारा की गई। (थानेश्वर, हरियाणा)
ये संभवतः गुप्तों के सामन्त थे जिन्होंने मौका पाकर स्वतंत्र राज्य को स्थापित कर लिया ।
इस वंश की प्रारंभ में राजधानी थानेश्वर थी।
पुष्यभूति वंश के प्रभावशाली शासक था।
प्रभाकरवर्धन
वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन ही था।
प्रभाकर वर्धन ने परमभट्टारक एवं महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
यह इस बात का सबूत है कि यह एक स्वतंत्र एवं ताकतवर शासक था।
बाणभट्ट
ने हर्षचरित्र में प्रभाकर वर्धन के लिए अनेक अलंकरणों का प्रयोग किया है।
हूणहरिकेसरी, सिंधुराजज्वर, गुर्जरप्रजागर, सुगंधिराज आदि अलंकरण बाणभट्ट
द्वारा दिए गए है।
अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखिरी शासक ग्रहवर्मन के साथ तय किया।
प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम दिनों में
हूणों का आक्रमण हुआ परन्तु प्रभाकरवर्धन युद्ध में जाने के लिए सक्षम नहीं
था अतः उसका पुत्र राज्यवर्धन युद्ध के लिए गया किन्तु युद्ध के मध्य में
ही प्रभाकरवर्धन का स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ गया। राज्यवर्धन युद्ध से वापस
लौटा तो उनके पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।
इसी समय
मालवा शासक देवगुप्त एवं बंगाल शासक-शशांक ने मिलकर कन्नौज के मौखिरी शासक
गृहवर्मन (राज्यवर्धन के बहनोई) की हत्या कर दी एवं राज्यश्री को बंदी बना
लिया।
हर्षवर्धन
के गद्दी संभालते ही उसक सामने अपनी बहिन राज्यश्री को बचाने की सबसे बड़ी
चुनौती थी इसी क्रम में अपनी बहिन को देवगुप्त की कैद से छुड़ाने एवं अपने
भाई तथा बहनोई की हत्या का बदला लेने हर्षवर्धन कन्नौज की तरफ बढ़ा परन्तु
सूचना मिली की राज्यश्री देवगुप्त की कैद से भागकर विंध्य की पहाड़ीयों में
चली गयी है। तो अब वह विंध्य की तरफ बढ़ने लगा।
बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र की सहायता से हर्ष ने राज्यश्री को खोज निकाला एवं सती होने से बचा लिया।
गृहवर्मन का कोई उत्तराधिकारी नहीं था अतः राज्यश्री की सहमति से हर्ष को कन्नौज का शासक बना दिया गया।
हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित कर ली।
इस वंश का संस्थापक संभवतः गुप्तों का सामन्त था। क्योंकी इस वंश के
प्रारंभिक 3 शासकों (हरि वर्मा, आदित्य वर्मा एवं ईश्वर वर्मा) को महाराज
की उपाधि प्राप्त थी।
बाद के तीन शासकों (ईशान वर्मन, सर्ववर्मन एवं अवंतिवर्मन) को महाराजाधिराज की उपाधि प्राप्त हुई। अतः ईशान वर्मन इस वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं शक्तिशाली राजा प्रतीत होता है।
गुप्तवंश के पतन के बाद कन्नौज उत्तर भारत का शक्ति स्थल बना इसी कारण
भारत का एकछत्र सम्राट बनने की होड में गुर्जर-प्रतिहार, पाल एवं
राष्ट्रकूटों के मध्य एक लंबा त्रिदलीय संघर्ष चला।
मौखरी वंश के शासक – ईशानवर्मन, सर्ववर्मन, अवंतिवर्मन, ग्रहवर्मन, हर्ष (राज्यश्री के साथ), सुचंद्रवर्मन (अंतिम)।
कन्नोज के लिए त्रिदलीय संघर्ष
कारण – एकछत्र सम्राट बनने की इच्छा
गंगाघाटी एवं इसमें उपलब्ध कृषि एवं व्यापारिक संबंधित संमृद्ध संसाधनों पर नियंत्रण।
अन्य सामरिक महत्व के उद्देश्य।
संघर्ष में शामिल प्रमुख शासक
प्रतिहार वंश – वत्सराज, नागभट्ट-2, राम भद्र, मिहिर भोज, महेन्द्रपाल।
कन्नौज पर स्वामित्व के लिए संघर्ष को शुरू पाल शासक धर्मपाल ने किया। इसके बाद प्रतिहार शासक इस संघर्ष में शामिल हुए। बाद में राष्ट्रकूट इस संघर्ष में कूदे।
प्रभाकरवर्धन (583 – 604 ई.)
उपाधि – महाराजाधिराज
पिता – आदित्यवर्धन
राजवंश – पुष्पभूति (वर्धन)
मृत्यु – 604 ई.
वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन ही था।
प्रभाकर वर्धन ने परमभट्टारक एवं महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
यह इस बात का सबूत है कि यह एक स्वतंत्र एवं ताकतवर शासक था।
बाणभट्ट ने हर्षचरित्र में प्रभाकर वर्धन के लिए अनेक अलंकरणों का
प्रयोग किया है। हूणहरिकेसरी, सिंधुराजज्वर, गुर्जरप्रजागर, सुगंधिराज आदि
अलंकरण बाणभट्ट द्वारा दिए गए है।
अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखिरी शासक ग्रहवर्मन के साथ तय किया।
प्रभाकरवर्धन थानेश्वर का शासक था, जो पुष्यभूति वंश का था और छठी
शताब्दी के अंत में राज्य करता था। प्रभाकरवर्धन की माता गुप्त वंश की
राजकुमारी महासेनगुप्त नामक स्त्री थी।
अपने पड़ोसी राज्यों, मालव, उत्तर-पश्चिमी पंजाब के हूणों तथा गुर्जरों
के साथ युद्ध करके प्रभाकरवर्धन ने काफ़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। अपनी
पुत्री राज्यश्री का विवाह प्रभाकरवर्धन ने कन्नौज के मौखरि राजा गृहवर्मन
से किया था।
प्रभाकरवर्धन की मृत्यु 604 ई. में हुई जिसके बाद उसका सबसे बड़ा पुत्र राज्यवर्धन उत्तराधिकारी बना।
पुष्यभूति वंश का प्रथम शासक था जिसने थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था। यह “प्रतापशील” के नाम से विख्यात था। इस वंश के शासकों में सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि प्रभाकरवर्धन ने ही धारण की।
इसकी मृत्यु के बाद इसकी पत्नी यशोमती सती हो गयी। यशोमती की तीन संतान
थी – राज्यवर्धन, हर्षवर्धन, राज्यश्री। राजयश्री का विवाह मौखरि नरेश
ग्रहवर्मा से हुआ था। देवगुप्त ने ग्रहवर्मा की हत्या कर दी और राज्यश्री
को बंदी बना लिया। राज्यश्री को हर्षवर्धन विंध्याचल के जंगलों से बचाकर
लाया।
राज्यवर्धन
प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम दिनों में हूणों का आक्रमण हुआ परन्तु
प्रभाकरवर्धन युद्ध में जाने के लिए सक्षम नहीं था अतः उसका पुत्र
राज्यवर्धन युद्ध के लिए गया किन्तु युद्ध के मध्य में ही प्रभाकरवर्धन का
स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ गया। राज्यवर्धन युद्ध से वापस लौटा तो उनके पिता
प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।
इसी समय मालवा शासक देवगुप्त एवं बंगाल शासक – शशांक ने मिलकर कन्नौज के
मौखिरी शासक गृहवर्मन (राज्यवर्धन के बहनोई) की हत्या कर दी राज्यश्री बना
लिया।
राज्यश्री (बहिन) को बंदी बनाए जाने तथा गृहवर्मन की हत्या की सूचना
मिलते ही राज्यवर्धन देवगुप्त एवं शशांक से बदला लेने के लिए निकल पड़ा इसी
क्रम में राज्यवर्धन ने देवगुप्त को हराया । शशांक ने राज्यवर्धन से
मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए अपने शिविर में बुलाया और धोखे से राज्यवर्धन की
हत्या कर दी। राज्यवर्धन की मौत की सूचना पाकर हर्षवर्धन ने थानेश्वर राज्य
की बागडोर संभाली।
राज्यवर्धन थानेश्वर के शासक प्रभाकरवर्धन का ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने भाई हर्षवर्धन और बहन राज्यश्री से बड़ा था।
तीनों बहन-भाइयों में अत्यंत प्रेम था। एक भीषण युद्ध के फलस्वरूप बंगाल के राजा शशांक द्वारा राज्यवर्धन का वध हुआ।
राज्यवर्धन की बहन राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि वंश के शासक
गृहवर्मन से हुआ था। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के पश्चात ही देवगुप्त का
आक्रमण कन्नौज पर हुआ और एक भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया।
युद्ध में गृहवर्मन मालवा के राजा देवगुप्त के हाथों मारा गया और उसकी
पत्नी राज्यश्री को बन्दी बनाकर कन्नौज के काराग़ार में डाल दिया गया।
सूचना मिलते ही राज्यश्री के ज्येष्ठ अग्रज राज्यवर्धन ने अपनी बहन को काराग़ार से मुक्त कराने के लिए कन्नौज की ओर प्रस्थान किया
राज्यवर्धन ने मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित करके मार डाला, किंतु
वह स्वयं देवगुप्त के सहायक और बंगाल के शासक शशांक द्वारा मारा गया।
इस समय राज्य में व्याप्त भारी उथल-पुथल से राज्यश्री काराग़ार से भाग निकली और उसने विन्ध्यांचल के जंगलों में शरण ली।
बाद में राज्यवर्धन के उत्तराधिकारी सम्राट हर्षवर्धन ने राज्यश्री को
विन्ध्यांचल के जंगलों में उस समय ढूँढ निकाला, जब वह निराश होकर चिता में
प्रवेश करने ही वाली थी। हर्षवर्धन उसे कन्नौज वापस लौटा लाया और आजीवन
उसको सम्मान दिया।
हर्षवर्धन (606-647 ई.)
जन्म – 590 ई.
राजवंश – वर्द्धन (पुष्यभूति)
शासनकाल – 606 ई.-647 ई.
मृत्यु – 647 ई.
हर्षवर्धन गुप्तोत्तर काल का शासक था। 606 ई. में हर्षवर्धन थानेश्वर के
सिंहासन पर बैठा। हर्षवर्धन के बारे में जानकारी के स्रोत है- बाणभट्ट का
हर्षचरित, ह्वेनसांग का यात्रा विवरण और स्वयं हर्ष की रचनाएं।
हर्षवर्धन का अन्य नाम शिलादित्य था। हर्ष ने महायान बौद्ध धर्म को
संरक्षण प्रदान किया। हर्ष ने 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे तथा 643 ई. और
646 ई. में दो चीनी दूत उसके दरबार में आये। हर्ष ने 646 ई. में कन्नौज तथा
प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया।
हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दंत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किये।
हर्षवर्धन भगवान् शिव का भी भक्त था। वह सैनिक अभियान पर निकलने से पूर्व
रूद्र शिव की आराधना किया करता था।
हर्षवर्धन शासक के साथ साथ साहित्यकार भी था। उसने प्रियदर्शिका,
रत्नावली तथा नागानंद तीन ग्रंथों (नाटक) की रचना की। बाणभट्ट हर्ष का
दरबारी कवि था। उसने हर्षचरित, कादम्बरी तथा शुकनासोपदेश आदि कृतियों की
रचना की।
मालवा के शासक देवगुप्त एवं गौड़ शासक शशांक ने, ग्रहवर्मन की हत्या
करके कन्नौज पर कब्ज़ा कर लिया। हर्षवर्धन ने शशांक को पराजित करके कन्नौज
पर अधिकार करके उसे अपनी राजधानी बना लिया ।
हर्षवर्धन को बांसखेड़ा तथा मधुबन अभिलेखों में परम महेश्वर कहा गया है। ह्वेनसांग के अनुसार, हर्ष ने पड़ोसी राज्यों पर अपना कब्जा करके अपने नियंत्रण में कर लिया था।
दक्षिण भारत के अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है की हर्ष सम्पूर्ण उत्तरी
भारत का मालिक था। हर्ष के साम्राज्य का विस्तार उत्तर में थानेश्वर
(पूर्वी पंजाब) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तथा पूर्व में गंजाम
से लेकर पश्चिम में वल्लभी तक फैला हुआ था।
भारतीय इतिहास में हर्ष का सर्वाधिक महत्त्व इसलिए भी है की वह उत्तरी
भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट था, जिसने आर्यावर्त पर शासन किया।
हर्ष का शासन प्रबंध
राजा के दैवीय सिद्धांत का प्रचलन था, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि
राजा निरंकुश होता था। वस्तुतः राजा के अनेक कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व होते
थे, जिन्हें पूरा करना पड़ता था। हर्ष को एक प्रशासक एवं प्रजापालक राज्य
के रूप में स्मरण किया जाता है।
नागानंद में उल्लेख आया है की हर्ष का आदर्श प्रजा को सुखी एवं प्रसन्न
देखना था। केन्द्रीय शासन का जो नियंत्रण मौर्य युग में दिखाई देता है वह
हर्ष युग में नहीं दिखाई देता। ह्वेनसांग के विवरण में हर्ष की छवि एक
प्रजापालक राजा की उभरती है।
वहीँ राजहित कादम्बरी और हर्षचरित में उसे प्रजा का रक्षक कहा गया है।
राजा को राजकीय कार्यों में सहायता देने के लिए एक मंत्रिपरिषद की व्यवस्था
की गयी थी। मंत्रियों की सलाह काफी महत्व रखती थी।
राजा प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी होता था। वह अंतिम न्यायाधीश और मुख्य
सेनापति था। हर्ष के प्रशासन में अवंति, युद्ध और शांति का अधिकारी था।
हर्ष की प्रशासनिक व्यवस्था गुप्तकालीन व्यवस्था पर आधारित थी।
बहुत से प्रशासनिक पद गुप्तकालीन थे, जैसे ‘संधिविग्रहिक‘ अपटलाधिकृत
‘सेनापति’ आदि। राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति,
राष्ट्र में विभाजित था। भुक्ति का तात्पर्य प्रांत से था, विषय जिले के
समान था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।
महासामंत, महाराज, दौस्साधनिक, प्रभावर, कुमारामात्य, उपरिक आदि
प्रांतीय अधिकारी थे। पुलिस विभाग का भी गठन किया गया था। चौरोद्धरजिक,
दण्डपाशिक आदि पुलिस विभाग के कर्मचारी थे। हर्ष काल के अधिकारीयों को वेतन
के रूप में जागीरें (भूमि) दी जाती थीं।
राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने पर आजीवन कैद की सजा दी जाती थी। इसके
आलावा अंग-भंग, देश निकाला, आर्थिक दण्ड भी लगाया जाता था। हर्ष ने अपने
साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक संगठित सेना का गठन किया था। सेना में
पैदल, अश्वारोही, रक्षारोही और हरिन्तआरोही होते थे।
हर्षवर्धन की जानकारी के स्रोत
हर्ष चरित्र– लेखक बाणभट्ट ( 8 अध्याय )- इसे ऐतिहासिक विषय पर गद्यकाव्य लिखने का प्रथम प्रयास कहा जा सकता हैं।
कादम्बरी–लेखक बाणभट्ट- हर्षकालीन सामाजिक धार्मिक जीवन का वर्णन मिलता है।
हर्ष के ग्रन्थ (नाटक)– नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिका।
ह्वेनसांग पुस्तक– ‘सी-यू-की’
काओसेंग
चुवान– चीनी यात्री इत्सिंग की भारत यात्रा का विवरण। इसने बौद्ध धर्म के
गहन अध्ययन के लिए 672-688 ई. तक भर्मण किया था। उसने बताया कि भारत को
आर्यदेश कहा जाता है।
बाँसखेड़ा ताम्रलेख (628 ई.), मधुबन ताम्रपत्र लेख (631 ई.) व पुलकेशिन-द्वितीय का ऐहोल का अभिलेख (634 ई.)
मुहरें- नालन्दा से मिट्टी की व सोनीपत से तांबे की मुहरें मिली जिसमे हर्ष का पूरा नाम मिलता हैं।
हिंदुकुश पर्वताला ग्रीक लोक 'हिंदी काकेशस' असे म्हणत. हा पर्वत आपल्या राज्याची उत्तर मर्यादा असावी म्हणून सोळाव्या आणि सतराव्या शतकात मोंगल बादशहांनी आणि त्यापुढे इंग्रजांनी खूप धडपड केली. पण ह्यांपैकी कोणालाही जे साधले नाही ते बावीसशे वर्षांपूर्वी एका हिंदू राजाने साधले. तो म्हणजे मौर्यकुलभूषण चंद्रगुप्त .महाभारत युद्धानंतरचे चौथे साम्राज्य म्हणजे मौर्य अर्थात मगध साम्राज्य होते. चंद्रगुप्त मौर्य हा या साम्राज्याचा संस्थापक होता. भारताच्या इतिहासातले सर्वात मोठे साम्राज्य असा मौर्य साम्राज्याचा लौकिक आहे. इ.स. पूर्व ३२१ ते इ.स. पूर्व १८५ पर्यंत यांचे शासन होते. इ. स. पूर्व ३२४ पासून मौर्य राजवंश सुरू झाला. एक मतप्रवाह असा, की या वंशात एकूण नऊ राजे होऊन गेले. त्यांची नावे अशी अमित्रघात अथवा बिंदुसार, सम्राट अशोक, दशरथ, संप्रति, शालिशुक, देववर्मन, शतधन्वा आणि बृहद्रथ. यांची कारकीर्द इ. स. पूर्व १८४ पर्यंत होती. सुमारे १४० वर्षे मौर्य वंशाची सत्ता होती. याविरुद्ध ‘कलियुगराज वृत्तांत’ या प्राचीन ग्रंथामध्ये आणि पुराणात नमूद केल्याप्रमाणे मगध राजसिंहासनावर मौर्य वंशाचे एकूण १२ सम्राट होऊन गेले. त्यांनी एकूण ३१६ वर्षे राज्य केले. चंद्रगुप्त मौर्य हा आपणा सर्वांना भारतसम्राट म्हणून परिचित आहेच. पण तो भारतसम्राट कसा झाला? त्यासाठी त्याला कोणकोणते कष्ट सोसावे लागले?
आमचे राज्य कल्याणकारी असो. आमचे साम्राज्य सर्व उपभोग्य वस्तुंनी परिपूर्ण असो. येथे लोकराज्य असो. आमचे राज्य आसक्तिरहित, लोभरहित असो. अशा परमश्रेष्ठ महाराज्यावर आमची अधिसत्ता असो. आमचे राज्य क्षितिजाच्या सीमेपर्यंत सुरक्षित असो. समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर आमचे एकसंघ दीर्घायु राज्य असो. आमचे राज्य सृष्टीच्या अंतापर्यंत म्हणजे परार्ध वर्ष पर्यंत सुरक्षित राहो.
मंत्रपुष्पांजली मधील या दोन श्लोकांवरून वैदिक समाजात ‘राज्य’ या संकल्पनेबद्दलची स्पष्टता दिसून येते. प्राचीन काळातील विविध वाङ्मयात राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, साम्राज्य, एकराज्य, अशा विविध राज्यप्रकारांचे उल्लेख मिळतात. वैदिक कालखंडात अशा विविध प्रकारची राज्ये अस्तित्वात होती याचे हे प्रमाण आहे.
कालानुरूप या राज्यव्यवसस्थेमध्ये काही बदल होत गेले पण भारतीय शासन व्यवस्था कायमच प्रजासत्ताक स्वरूपाची राहिली आहे. इ.स.पूर्व ६ वे शतक हे इतिहासाच्या प्रवासातला मैलाचा दगड आहे. कारण याच कालखंडात बौद्ध आणि जैन धर्मांचा उदय झाला आणि याच शतकाच्या सुरुवातीला उत्तर भारतात लहान लहान राज्येही उदयास आली. पण ही राज्ये स्वतंत्र होती. या राज्यांना कोणीही सार्वभौम राजा नव्हता. अशा राज्यांना गणराज्ये म्हणत. या गणराज्यांमध्ये राजसत्ता एका व्यक्तीच्या हाती नसून गण किंवा अनेक व्यक्तींच्या हाती असे. पण त्याचबरोबरीने राज्य किंवा सार्वभौम अधिकार राजाच्या हातात असणारी जनपदेही होती.
जनपदे म्हणजे छोट्या आकाराची राज्ये तर महाजनपदे म्हणजे राजाच्या अधिकाराखाली येणारा बराच मोठा प्रदेश. प्राचीन ग्रंथांमधून उल्लेख असणारी महाजनपदे त्याकाळी खूप महत्वाची होती. कारण या महाजनपदांमध्ये गणराज्य स्वरूपाची व्यवस्था होती.
इ.स.पूर्व ६व्या शतकात अशी लहान मोठी पुष्कळ राज्ये गणराज्य किंवा प्रजासत्ताक पद्धतीने कारभार करत होती. या सर्व महाजनपदांमध्ये मगध महाजनपद हे बलाढ्य राज्य होते. या राज्याचा संस्थापक बिंबिसार राजा असला तरी हे राज्य वाढवण्याचे श्रेय नंद घराण्याकडे जाते.
सर्वप्रथम या नंद घराण्याची माहिती घेउया.
मगध : प्राचीन भारतीय पहिले प्रबळ व बलाढ्य साम्राज्य :-
आधुनिक बिहारमधील पाटणा व गया परिसरात हे गणराज्य उदयास आले. वैदिक आर्याच्या काळात मगध प्रदेश वैदिक संस्कृतीच्या बाहेर होता. सोळा महाजनपदांत श्रेष्ठत्वाचा जो लढा झाला त्यात मगध विजयी झाले. मगधचे श्रेष्ठत्व व सार्वभौमत्व सर्व छोट्या-मोठ्या संतांनी मान्य केले होते. भारताच्या राजकीय इतिहासातील पहिले प्रबळ साम्राज्य म्हणून मगध पुढे आले.
पुराणग्रंथ, जैन व बौद्ध ग्रंथातून मगध महाजनपदांचा इतिहास व मगधवर राज्य केलेल्या राजवंशांच्या वंशावळी दिल्या आहेत. जैन ग्रंथात मगधला पवित्र जनपद मानले आहे. मगधामध्ये जैन ज्ञान व जैनाचार यांचे रक्षण चांगल्या प्रकारे होऊ शकेल, असे महावीर वर्धमानने म्हटले होते.
1. The approximate extent of the Magadha Empire in the 5th century BCE.
मगधवर नंद वंशाचे राज्य येण्यापर्वी ८ राजवंश सत्तेवर आले होते असे पुराणात म्हटले आहे. त्यापैकी इतिहासाला ज्ञात वंश खालीलप्रमाणे आहेत.
१) ब्रहद्रथ वंश
२) हर्षक वंश
३) शिशुनाग वंश (इ. स. पू. ५४३ ते ४२३
४) नंद वंश ( इ. स. पू. ४२३ ते ३२३)
५) मौर्य वंश (इ. स. पू. ३२३ ते इ. स. पू. १८७) श.
बलाढ्य राजकीय शक्ती म्हणून मगधचा उदय :
महाजनपदातील सत्तासंघर्षात यशस्वी होऊन मगधचे राज्य एक बलाढ्य राजकीय शक्ती म्हणून पुढे आले. त्याची कारणमीमांसा,
१) मगधची भूमी सुपीक असल्याने अन्नधान्याचा तुटवडा भासला नाही.
२) आर्थिक वैभवामुळे लोकसंख्या वाढली. त्यामुळे महाजनपदाच्या सत्तासंघर्षात आवश्यक असलेले सैनिक मगधला मिळू शकले.
(3) मगध राज्यात लोखंडाचे साठे प्रचंड असल्याचे शस्त्रास्त्रांची अडचण भासली नाही. शेतीची अवजारे तयार करण्यासाठी तेथे लोखंड उपलब्ध होते.
४) मगधचे व्यापारावर वर्चस्व प्रस्थापित झाले होते.
५) मगधला ब्रहद्रथ हर्षक, शिशुनाग, नंद व मौर्य या वंशांतील कर्तबगार राजांचे नेतृत्व लाभले म्हणूनच मगध एक बलाढ्य राजकीय सत्ता म्हणून पुढे आले.
१) ब्रहद्रथ वंश :
कुरू वंशाचा राजा वसूने मगध राज्य जिंकून आपल्या साम्राज्यात समाविष्ट केले होते. त्याच्या मृत्यूनंतर त्याचे राज्य ५ पुत्रांत विभागले गेले. पाच पुत्रांपैकी एक पुत्र ब्रहद्रथ याने मगधला स्वतंत्र राज्य स्थापन केले. तोच मगधचा संस्थापक मानला जातो. त्याच्याच नावावरून त्याच्या वंशाला 'ब्रहद्रथ वंश' असे नाव पडले. याच वंशात पुढे महाभारत काळात जरासंध हा शक्तिशाली सम्राट होऊन गेला. जरासंध हा एका युद्धात मारला गेला. त्यानंतर पुलिक वंश मगधवर सत्तेवर आला.
२) हर्षक वंश:
पुलिक वंशाचा राजा बालक हा दुबळा असल्याने त्याची हत्या भहिय या त्याच्या महत्त्वाकांक्षी सेनापतीने केली व आपला पुत्र बिंबिसार याला मगधच्या गादीवर बसवले.
राजा बिंबिसार (इ. स. पू. ५४३ ते ४९१) : -
राजा बिंबिसारच्या वडिलांचे नाव विविध ग्रंथांत वेगवेगळे दिले आहे. पुराणात त्याच्या वडिलांचे नाव हेमजित क्षेत्रोज होते असे पुराणात म्हटले आहे तर तिबेटी ग्रंथात 'महापद्म' असे नाव दिले आहे. बिंबिसार हा हर्षक वंशातील पहिला शक्तिशाली सम्राट होता.
तो हर्षक वंशातील होता की शिशुनाग वंशातील होता हा इतिहासकारांतील वाद आहे. परंतु तो शिशुनाग वंशापूर्वीच होऊन गेल्यामुळे तो हर्षक वंशातील होता असे समजले जाते.
बिंबीसारचे वैवाहिक संबंध :
बिंबीसारने कोसल, वैशाली, भद्र वगैरे देशांच्या राजकन्यांशी विवाह करून त्या सत्तांशी मैत्रीपूर्ण संबंध प्रस्थापित केले. 'महावंश' या बौद्ध ग्रंथात त्याने ५०० विवाह केले अशी नोंद आहे. अर्थात, त्यात अतिशयोक्ती आहे. तरीही अनेक राजकुमारीशी विवाह करून साम्राज्यविस्तार करणे हे त्याच्या परराष्ट्र धोरणाचे सूत्र असावे. कोसलची कोसलदेवी, लिच्छवीची चेलना, मद्रदेशाची क्षेमा या राजकन्यांशी त्याचे झालेले विवाह विशेष महत्त्वाचे होते. कोसलचा राजा प्रसेनजित याने आपली बहीण कोसलदेवी हिला खर्चासाठी म्हणून काशी नगराचे उत्पन्न बिंबिसारला दिले होते. विदेहच्या राजकन्येशीही त्याचा विवाह झाला होता.
अंग राज्यावर ताबा:
बिंबिसारने 'अंग' या राज्याचा राजा ब्रह्मदत्तचा पराभव करून अंग साम्राज्याचा काही भाग व अंगची राजधानी, हे शहर जिंकले व मगध साम्राज्यात समाविष्ट केले. चंपा हे त्या काळातील अत्यंत प्रसिद्ध व्यापारी केंद्र होते. अंग राज्याची प्राप्ती व काशीची प्राप्ती यामुळे मगधच्या संपूर्ण भारतावरील वर्चस्वाचा पाया घातला गेला असे मत डॉ. आर. के. मुखर्जी यांनी व्यक्त केले आहे.
बिंबिसार - जैन व बौद्ध धर्म:
जैन व बौद्ध धर्माच्या साहित्यानुसार तो दोन्ही धर्माचा पुरस्कर्ता होता असे दिसते. उत्तराध्ययनसूत्रात बिंबिसार व महावीर वर्धमान या दोघांच्या भेटीचा उल्लेख केलेला आहे. बिंबीसारची एक पत्नी चेलना ही जैन धर्मअनुयायी होती व तिच्याच प्रभावामुळे तो जैन धर्माकडे आकर्षिला गेला. त्याने आपली पत्नी चेलनाबरोबर महावीराची पूजा केली व जैन धर्म स्वीकारला, अशी नोंद तत्कालीन जैन ग्रंथात आहे.
बौद्ध साहित्यात बिंबीसार हा बौद्ध होता असे म्हटले आहे. सिद्धार्थ गौतम बुद्धाशी त्याचे स्नेहाचे संबंध होते. भगवान बुद्धाच्या मधुर वाणीचा व संन्याशी जीवनाचा प्रभाव बिंबिसारवर पडला होता. बुद्धाच्या निर्वाणप्राप्तीच्या अगोदर ८ वर्षे व निर्वाणप्राप्तीनंतर पुन्हा दोघांची भेट झाल्याची नोंद तत्कालीन बौद्ध साहित्यात आहे. बिंबिसारने बौद्ध धर्म स्वीकारला होता. त्याने आपला वैद्यक जीवक यास गौतम बुद्धाच्या वैद्यकीय चिकित्सेसाठी पाठवले होते. बिंबिसारने सर्व बौद्ध भिक्षूंना मगधच्या राज्यात गंगा पार करण्यासाठीचा कर (नौकाचालकाचे पैसे) माफ केला होता. बौद्ध धर्माचे उत्सव त्याने साजरे केले. रोगग्रस्त लोकांना भिक्षू होण्यास त्याने मज्जाव केला होता. बुद्धाच्या पायाच्या नखाच्या तुकड्यावर त्याने एक स्तूप बनवला होता. त्या स्तुपाची पूजा राजघराण्यांतील स्त्रिया करीत असत. बुद्ध जिवंत असतानाच बिंबिसारने बौद्ध धर्मप्रसारास चांगलीच मदत केली होती.
बिंबिसारची प्रशासनव्यवस्था :
मगध राज्याला बिंबिसारने शक्तिशाली केले. बिंबिसारच्या काळात मगध साम्राज्यात ८०,००० गावे होती. बिंबिसारने आपल्या राज्याचे प्रांतात विभाजन करून प्रत्येक विभागाचा कारभार हा राजपुत्रांकडे सोपवला होता. राज्यकारभाराच्या सोयीसाठी विविध खाती होती. प्रत्येक खात्यावर स्वतंत्र अधिकाऱ्यांच्या नेमणुका केल्या जात. गावाचा कारभार हा ग्रामसमितीमार्फत चाले. न्यायादानासाठी स्वतंत्र न्यायादानाची व्यवस्था केली होती. गुन्हेगारास कठोर शासन केले जाई. अवयव विच्छेदन, जाहीर फटके मारणे, दंड, तुरुंगवास वगैरे स्वरूपाच्या शिक्षा दिल्या जात. बिंबीसारचा सर्व अधिकाऱ्यांवर वचक होता. सभाजक, व्यावहारिक आणि सेनानायक हे तीन प्रमुख अधिकारी होते. बिंबिसारने 'गिरीव्रज' हे नैसर्गिकृष्ट्या सुरक्षित स्थळ निवडून त्यास राजधानीचा दर्जा दिला. पण हे स्थळ गैरसोयीचे वाटल्यामुळे त्याने राजगृह येथे राजधानी हलविली. गौतम बुद्धाने नंतर राजगृहाला भेट दिली होती.
इ.स.पुर्व २९७-२७२ या काळातील मौर्यकालीन बिंदुसारकालीन पाटलीपुत्र येथील १ कार्षपण चांदीचे नाणे. या नाण्याचा आकार १४ ११ मी.मी. वजन- ३.४ ग्रॅम. यावर सुर्याचे चिन्ह आहे
बिंबिसारचा अस्त :
बिंबिसारचा अस्त किंवा मृत्यू याबद्दल निश्चित पुरावा उपलब्ध नाही. इ. स. पू. ४९३ मध्ये बिंबीसारचा पुत्र अजातशत्रू याने त्यास ठार केले असे बौद्ध मत आहे तर पुत्रांनी कैदत टाकल्याने जीवन असह्य झाल्याने त्याने आत्महत्या केली असे जैन मत आहे. बिंबिसारने ५० वर्षे राज्य केले होते. त्याच्या वृद्धापकाळात त्याच्या पुत्रात गादीसाठी वारसायुद्धे सुरू झाली. प्रत्येकाला त्यांच्या आजोळचा (कोसल, वैशाली, मद्र) पाठिंबा होता. त्या सर्व राजपुत्रांत अजातशत्रू हा पराक्रमी असल्याने तो वारसायुद्धात विजयी झाला.
सम्राट अजातशत्रू : मगधच्या विशाल साम्राज्याचा सर्वश्रेष्ठ संस्थापक सम्राट (इ. स. पू. ४९३ ते ४६२) :-
अजातशत्रू (इ. स. पू. ४९३ ते ४६२) मगधच्या विशाल साम्राज्याचा संस्थापक म्हणूनही अजातशत्रूचा उल्लेख केला जातो. बिंबिसारनंतर अजातशत्रू मगधच्या गादीवर आला. त्याने मगधच्या साम्राज्यात भर घातली. मगध राज्यातला तो सर्वश्रेष्ठ सम्राट होय.
अजातशत्रूचा साम्राज्यविस्तार : कोसलशी संघर्ष :
कोसल राजा प्रसेनजित याने त्याची बहीण कोशलदेवीचा विवाह बिंबिसारशी करून काशी या शहराचे उत्पन्न आंदण म्हणून कोसलदेवीला दिले होते. परंतु अजातशत्रूने त्याचा पिता बिंबिसारचा खून केल्याने व कोशलदेवी ही मृत्यू पावल्याने काशीचे उत्पन्न देणे बंद केले. प्रसेनजितने अजातशत्रूशी संघर्ष उभा कला. या संघर्षात कधी प्रसेनजित तर कधी अजातशत्रु विजयी होई. निश्चित विजय कोणाचाही होत नव्हता. परंतु प्रसेनजितचे अजातशत्रुबाबतचे गैरसमज दूर झाल्यानंतर त्याने आपली कन्या वजिराचा विवाह अजातशत्रूशी लावला व पुन्हा काशीचे उत्पन्न अजातशत्रूला दण्याचे मान्य केले. याचा परिणाम म्हणून अजातशत्रू व पर्यायाने मगधचे राजकीय वर्चस्व वाढण्यास मदत झाली.
वैशालीशी संघर्ष :
अनेक लहान लहान गणराज्यांचा एक संघ बनवून लिच्छवी हे त्या राज्यसंघाचे पुढारी बनले होते. लिच्छवीची राजकन्या चेल्लनाचा विवाह बिंबिसारशी झाला होता. म्हणजे चेल्लना ही अजातशत्रूची सावत्र आई होती. बिंबीसारच्या मृत्यूनंतर चेल्लना दोन मुले व काही संपत्ती घेऊन वैशालीला आपल्या पित्याकडे गेली. अजातशत्रूने वैशालीचा नरेश चेटक यास आपले दोन भाऊ व संपत्ती परत करावी असे सुचविले. पण ती सूचना फेटाळून लावल्याने अजातशत्रू व वैशालीचे राज्य यांच्यात संघर्षाला प्रारंभ झाला. लिच्छवीचे गणराज्य हे प्रबळ असल्याने त्याचा पराभव करणे अशक्य होते. म्हणून अजातशत्रूने पूर्वतयारी म्हणून गंगेच्या काठावर लष्करी ठाणे व किल्ला असलेले 'कुसुमपूर' (हेंच ठिकाण पाटलीपुत्र या नावाने पुढे ओळखले गेले व मौर्याची ती राजधानी होती.) हे शहर वसवले. चेटकासारखा शक्तिशाली शत्रूचा पाडाव करता यावा म्हणून ३६ राज्यांचा एक संघ त्याने उभा केला. तसेच लिच्छवीच्या गणराज्याचा पाडाव करता यावा म्हणून त्या. गणराज्यात दुहीचे राजकारण करण्यासाठी हेर पाठवले. आम्रपाली नावाच्या गणिकेकडून वैशालीच्या गुप्त स्थानांची माहिती करून घेतली. एवढी भक्कम तयारी केल्यामुळेच अजातशत्रू वैशालीच्या लिच्छवी गणराज्यास पराभूत करू शकला. परिणामी अजातशत्रूचे वर्चस्व लिच्छवी गणराज्यावर प्रस्थापित झाले त्यामुळे मगध साम्राज्यात फार मोठी भर पडली.
अवंतीशी संघर्ष :
अजातशत्रू वैशालीशी संघर्ष करण्यात गुंतला असता अवंतीच्या चंडप्रद्योत राजाने अजातशत्रूची राजगृहावर आक्रमण करण्याची तयारी चालविली. तेव्हा अजातशत्रूने राजगृह या राजधानीची मजबूत तटबंदी करून घेतली. मगधाची सुरक्षाव्यवस्था त्याने मजबूत केली त्यामुळेच अवंतीशी झालेल्या सत्तासंघर्षात अजातशत्रू विजयी झाला. काही इतिहासकारांच्या मते, अवंती मगध असा संघर्ष अजातशत्रूच्या काळात झालाच नाही. तो अजातशत्रूच्या मृत्यूनंतर झाला.
अजातशत्रूचे धार्मिक धोरण :
अजातशत्रू हा धर्मसहिष्णू सम्राट असावा. जैन परंपरेनुसार त्याने जैन धर्माचा स्वीकार केला होता तर बौद्ध परंपरेनुसार त्याने बौद्ध धर्म स्वीकारला होता. 'औपत्तिक सूत्र' या जैन ग्रंथात त्याने महावीर वर्धमानपुढे आपल्या धार्मिक निष्ठा व्यक्त केल्या होत्या असा उल्लेख आहे. विनयपिटिका व दीर्घनिकायातून अजातशत्रूचे बौद्ध धर्मीयांशी असलेले संबंध स्पष्ट होतात. प्रारंभी अजातशत्रूच्या मनात गौतम बुद्धाबद्दल द्वेष, अनादर होता. गौतम बुद्धाचा चुलत भाऊ देवदत्त याच्या मनात गौतम बुद्धाबद्दल असूया असल्याने व त्याची अजातशत्रूशी मंत्री असल्याने त्याने अजातशत्रूच्या मनात गौतम बुद्धाबद्दल गैरसमज करून दिले होते. 'जीवक' या अजातशत्रूच्या पदरी असलेल्या वैद्याच्या सूचनेवरून अजातशत्रू गौतमाच्या भेटीसाठी आम्रवनात गेला. तेव्हा १२०० बौद्ध भिक्षू अत्यंत शिस्तीत ध्यानस्थ बसलेले त्याला दिसले. हा प्रसंग भारहूतच्या शिल्पकारांनी कोरून ठेवला आहे. या घटनेचा परिणाम होऊन तो बौद्ध धर्माकडे आकर्षित झाला. बुद्धाच्या भेटीत त्याला परमआत्मशांती लाभल्याने त्याने बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला.गौतम बुद्धाच्या मृत्यूची वार्ता ऐकून अजातशत्रू कुशीनगर येथे पोहोचला व बुद्धाचे अस्थि अवशेष प्राप्त व्हावेत व त्या अवशेषांवर मी एक स्तूप बांधेल असे त्याने म्हटले. त्यानुसार त्याच्याकडे अस्थि अवशेष सुपूर्द करण्यात आले. त्यानुसार त्याने राजगृह येथे बौद्ध स्तूप बांधला. एवढेच नव्हे तर राजगृह येथे वर्णमहाविहार तयार केले.
अजातशत्रूने गौतम बुद्धाच्या मृत्यूनंतर इ. स. पू. ४८७ मध्ये राजगृह येथे पहिली बौद्ध धर्म परिषद भरवली. या धर्म परिषदेला ५०० भिक्षू हजर होते. महाकश्यप, आनंद, उपाली या बुद्धाच्या ख्यातनाम शिष्यांनी त्यात भाग घेतला. बुद्धाची शिकवण, संदेश यावर परिषदेत चर्चा होऊन त्याचे व्यवस्थित संकलन करण्यात आले. ही परिषद भरवून अजातशत्रू बौद्ध धर्माच्या इतिहासात अमर ठरला आहे. याच परिषदेत 'सुत्तपिटक' व 'विनयपिटक' या बुद्ध वचनांचे संकलन करण्याचे महत्त्वपूर्ण कार्य पार पडले.
अजातशत्रूचा मृत्यू व त्याचे उत्तराधिकारी :
अजातशत्रूने नेमके किती व राज्य केले हे निश्चित सांगता येत नाही. पुराणानुसार त्याने २४ वर्षे राज्य केले तर बौद्ध साहित्यानुसार ३२ वर्षे राज्ये केले. अजातशत्रू इ. स. पू. ४५९ मध्ये मृत्यु पावला. त्याच्या मृत्यूनंतर ‘दर्शक' हा मगधचा राजा झाला असे पुराणात म्हटले आहे तर जैन व बौद्ध साहित्यानुसार अजातशत्रूनंतर उदायीन हा राजा झाला असे म्हटल आहे. अजातशत्रूचा मुलगा दर्शक याने २४ वर्षे राज्य केले असे आहे. अजातशत्रूनंतर उदयभद्र, अनिरुद्ध, मुंड व नागदशक ही चार राजे होऊन गेली. पुराणात त्यांचा कार्यकाळ निश्चित सांगता येत नाही; परंतु या चौघांनीही आपल्या पित्याचा खून करून गादी मिळवली होती. त्यांच्या काळात मगध सत्तेचा विकास झाला नाही. उलट अंतर्गत कलहामुळे मगधचे राज्य दुबळे झाले. नागदशकच्या अस्तावरोबरच हर्षक वंशाची सत्ता संपली.
शिशुनाग वंश:
मगधचे अमात्य व मंत्री हर्षक वंशाचा शेवटचा राजा नागदशक याला सत्तेवरून हटवले व त्याच्या जागी अमात्य शिशुनाग यास मगधच्या गादीवर बसवले असे 'दीपवंश' व 'महावंश' या ग्रंथात म्हटले आहे. शिशुनाग हा वैशालीचा लिच्छवी राजाचा पुत्र होता. शिशुनाग हाच शिशुनाग वंशाचा संस्थापक होता. बौद्ध वाङ्मयात शिशुनाग वंशासंबंधी गौरवपर मजकूर आहे. शिशुनागाने विस्तारवादी धोरणाचा पुरस्कार करून अजातशत्रूच्या मृत्यूनंतर जी अस्थिरता निर्माण झाली होती ती दूर केली. अवंती, मत्स, कोसल या राज्यांवर पुन्हा त्याने मगधचे वर्चस्व प्रस्थापित केले. जवळजवळ संपूर्ण उत्तर भारतावर त्याने मगधचे वर्चस्व व सार्वभौमत्व निर्माण केले. शिशुनागाच्या मृत्यूनंतर त्याचा पुत्र कलाशोक हा गादीवर आला. त्याने मगधची राजधानी राजगृह येथून पाटलीपुत्र येथे हलवली. त्याने बौद्ध धर्माच्या प्रसाराचे मोठे काम केले. त्याच्या काळातच दुसरी बौद्ध धर्म परिषद बोलावली गेली. कलाशोक हा 'काकवर्णी' या नावानेही ओळखला जातो. कलाशोकाचा मृत्यू व शिशुनाग वंशाचा अस्त यासंबंधी काही आख्यायिका, लोककथा असून तत्कालीन साहित्यात त्या नोंदवल्या आहेत. राजघराण्यातील एका नाभिकाने कलाशोकच्या पत्नीशी संबंध ठेवून कलाशोकाचाही विश्वास संपादन केला. शेवटी कलाशोकचा वध त्याच्या पत्नीनेच केला. अशा प्रकारे शिशुनाग वंशाची सत्ता अस्त पावली अशी माहिती 'क्युरोटियस' या ग्रीक इतिहासकाराने नोंदविली आहे. पुराणग्रंथात तसेच बाणभट्टाच्या 'हर्षचरित" मध्येही अशाच प्रकारची माहिती आहे. शिशुनाग वंशानंतर मगधवर नंद राजांची सत्ता प्रस्थापित झाली.
नंद वंश : प्राचीन भारतीय पहिले प्रबळ व बलाढ्य साम्राज्य मगध
महापद्मानंद आणि धनानंद ( इ. स. पू. ४२३ ते ३२३)
नंद वंशाचा संस्थापक कोण याबद्दल इतिहासकारांत मतभेद आहेत. काही इतिहासकारांनी 'उग्रसेन' हा नंद वंशाचा संस्थापक होय असे म्हटले आहे तर काहीनी 'महापद्मानंद' हा नंद वंशाचा संस्थापक आहे असे म्हटले आहे. इतिहासकारांच्या मते उग्रसेन व महापद्यानंद ही दोन्ही नावे एकाच शासकाची असून उग्रसेन मगधच्या गादीवर आल्यानंतर महापद्यानंद या नावाने ओळखला जाऊ लागला.नंद राजांचे वर्णव्यवस्थेतील स्थान कोणते याबद्दल इतिहासकारांत मतभेद आहेत. जैन व बौद्ध साहित्यात नंद राजे कुलहीन होते असे म्हटले आहे. पुराणातही नंद वंशाचा संस्थापक कुलहीन होता असे म्हटले आहे. परंतु मुद्राराक्षस व कौटिल्याच्या अर्थशास्त्रात नंद राजे क्षत्रिय आहेत असे म्हटले आहे.
नंदांच्या इतिहासाची साधने :
१) पुराणग्रंथात नंदांची वंशावळ दिली आहे.
२) 'परिशिष्ट पर्व' या जैन ग्रंथात नंदाविषयी माहिती आढळते.
3) आवश्यक सूत्र, महावंशटिका, महाबोधी वंश, बौद्ध ग्रंथातून नंदांच्या इतिहासाचे धागेदोरे सापडतात. या ग्रंथात नंदांच्या ९ राजांची नावे आली आहेत.
४) 'कथासरित्सागर' या ग्रंथातही नंदांच्या इतिहासाची माहिती आली आहे.
५) कलिंगच्या खारवेलने कोरलेल्या हत्तीगुंफा शिलालेखातून व मैंसूर येथील काही शिलालेखातून नंदांच्या इतिहासाची अप्रत्यक्ष माहिती मिळते.
६) क्युरोटियस या ग्रीक इतिहासकाराच्या लिखाणातून नंद राजांचे संदर्भ आले आहेत.
महापद्यानंद:
राजा कलाशोक याच्या पत्नीचे दरबारातील एका नाभिकाशी संबंध होते. या नाभिकापासून झालेला पुत्र म्हणजे महापद्मनंद होय. आपल्या पुत्रास गादी मिळावी म्हणून राजा कलाशोकचा खून त्याच्या पत्नीनेच केला. अशा प्रकारे महापद्मनंद हा गादीवर आला. पुराणग्रंथात महापद्मनंदाचा उल्लेख 'सर्वक्षत्रियांतक', "एक राट' अशा शब्दांत आला आहे. महापद्मनंद हा कुलहीन असला तरी तो पराक्रमी व विस्तारवादी राजा होता. त्याने अनेक क्षत्रिय राजांचा पराभव केला. त्यामध्ये कुरु, पांचाल, कलिंग, अश्मक, मिथिला, शूरसेन आदी क्षत्रिय सम्राटांचा समावेश होतो. क्षत्रियांचा पराभव करून क्षत्रियांची पारंपरिक राजकीय वर्चस्वाची परंपराच त्याने तोडली असे मत डॉ. आर. के. मुखर्जी यांनी मांडले आहे. त्याने चतुरंग सेनेची उभारणी केली होती. त्याच्या लष्करात दोन लक्ष पायदळ, २०,००० अश्वदल, ३००३ गजदल व २००० रथदल होते असे ग्रीक इतिहासकारांनी म्हटले आहे. अर्थात, ही संख्या विश्वासार्ह वाटत नाही. तरीही प्रचंड लष्करी शक्ती त्याने उभी केली असावी म्हणूनच त्यास अनेक क्षत्रिय राजांचा पराभव करणे शक्य झाले. महापद्मनंद हा एकूण २५ वर्षे सत्तेवर होता. पुराणग्रंथांमधून त्याच्या प्रचंड सामर्थ्याचे वर्णन आले आहे.
महापद्मनंदाचे राज्य दक्षिण भारतातही होते. दक्षिण भारतात गोदावरी नदीच्या काठावर त्याने आपली एक उपराजधानी वसवलेली होती. डॉ. आर. के. मुखर्जीच्या मते, नवनंदडेरा या गावाची नंदाची एक उपराजधानी गोदावरी नदीच्या काठावर वसलेल्या नांदेड परिसरातच होती. 'नवनंदडेरा' या नावावरूनच 'नांदेड' हे नाव आले असावे 'स्वनंदडेरा' नावातच 'नंद' हा शब्द असल्याने या शहराची स्थापना करून त्यास उपराजधानीचा दर्जा 'नंद' राजांनी दिला असावा, असा इतिहासकारांचा अंदाज आहे. शिलालेख व ताम्रपटांतून मात्र नांदेडचा अशा स्वरूपाचा उल्लेख अद्याप आढळून आला नाही. 'अश्वकसूत्रात' तसेच 'महाबोधी वंश' या बौद्ध ग्रंथात नंदांच्या ९ राजांचा उल्लेख आला आहे.
यापैकी उग्रसेन (महापद्मनंद) व धनानंद या दोघांचा अपवाद वगळता इतर नंद राजांची माहिती मिळत नाही.
हे नऊ राजे एकमेकांचे भाऊ होते का? एकाच वेळी नंदांच्या साम्राज्यात विविध भागांत ते राज्य करीत होते का? हे नऊ राजे एकमेकांचे वंशज होते का? त्यांच्यातील नाते पिता-पुत्राचे होते का? आदी प्रश्नांची उत्तरे देता येत नाहीत. कारण त्याबाबतची निर्विवाद उत्तरे अद्याप उपलब्ध नाहीत.
धनानंद:
धनानंद हा नंद वंशातील शेवटचा राजा होय. नंद राजा धनानंद हा महत्त्वाकांक्षी, परंतु जुलमी राजा होता. तो पैशाचा अत्यंत लोभी होता म्हणूनच 'धनानंद' हे नाव त्याला पडले. त्याने प्रजेवर प्रचंड कर बसविला होता. अमाप संपती जमा करून गंगा नदीच्या खडकात गुहा खोदून सोन्याच्या नऊ राशी त्याने दडवून ठेवल्या अशी त्यांच्याबद्दल आख्यायिका होती. फक्त धनानंदच नव्हे तर सर्वच नंद राजे संपत्तीचे लोभी असल्याने जनता नंद राजवटीवर असंतुष्ट होती. ह्यु-एन-संगच्या प्रवासवर्णनातही धनानंदने दक्षिण भारतातील आपल्या उपराजधानीच्या जवळून वाहणाऱ्या गोदावरीच्या पात्रात धन साठवून ठेवल्याच्या आख्यायिकेची नोंद आहे. पाटलीपुत्रातील ५ प्रमुख स्तुपांतूनही त्याने धनसंचय केला असावा अशीही आख्यायिका ह्यु-एन-स्संग नोंदवितो. धनानंदाचा वध त्याचा एक दासीपुत्र चंद्रगुप्त मौर्य याने करून मगधची गादी बळकावली.नंद वंशाचा अस्त झाला, पण नंदांचे महत्व नाकारता येत नाही. बिंबीसारच्या कार्यकर्तृत्वातून उदयास आलेले मगधचे साम्राज्य हे पुन्हा एकदा उत्तर भारतात प्रसिद्धीस आले. मगधच्या साम्राज्याला पूर्णत्व प्राप्त करून देण्याचे कार्य नंदांनीच केले, नंदांनी मगध साम्राज्याच्या रूपाने फार मोठा वारसा आपल्या मागे ठेवला होता. सत्तेचा केंद्रबिंद नंदांच्या काळात मगध परिसरात स्थिरावला व तेथेच तो ६००-७०० कायम राहिला. प्राचीन भारतातील सर्व वैभवशाली साम्राज्ये मगधच्याच परिसरात उदयास आली.
मगधंचा परिसर हा अनेक अर्थानी महत्त्वाचा ठरतो, वैदिक धर्म व परंपरा नाकारणारे जैन व बौद्ध धर्म हे याच परिसरातले. नंद-मौर्य यांच्या रूपाने शूद्रांने राज्य निर्माण करणारे, गणराज्याची भरभराट पाहणारे राजे याच परिसरातले होते, प्राचीन भारतातील पहिले प्रबळ साम्राज्य नंदांनीच निर्माण केले. दक्षिणेत नांदेडपर्यंत त्यांनी सत्ता होती. पाटलीपुत्र व राजगृह या दोन शहरांना नंदांनी वैभव प्राप्त करून दिले. नंदांनी जे साम्राज्य निर्माण केले होते त्यांच्याच आधारावर मौर्याना आपल्या साम्राज्याची इमारत उभी करणे शक्य झाले.
खरं तर जग जिंकायला निघालेलं ग्रीक सैन्य, भारताच्या पूर्वेपर्यंत धडक मारून नंद वंशाचं मगध राज्य जिंकण्याची अभिलाषा बाळगून होतं. भारतात प्रवेश करताना वायव्येकडच्या छोट्या छोट्या गणराज्यांशी आणि पुरू राजाशी लढून थकल्यानंतर, जिंकलेल्या प्रदेशावर राज्यपाल नेमून ॲलेक्झांडर परत फिरला. याच काळात मगध साम्राज्यावर नंद वंशाचे शासन होते. बलाढ्य असे हे साम्राज्य त्याच्या शेजारील राज्यांच्या डोळ्यात मात्र सलत होते. धनानंद हा नंद राजा अतिशय जुलमी व संपत्तीचा लोभी होता. त्याने प्रजेवर प्रचंड कर लादले होते. जनतेचा तो छळ करी. जनतेला त्याची सत्ता नको होती.
जगज्जेता सिकंदर जेव्हा पंजाबवर चढाई करत होता एवढ्या अवधीत तक्षशीलेचे जगद्विख्यात आचार्य चाणक्य मगधाची राजधानी 'पाटलिपुत्र' मधे आले. धनानंदाचा मुद्राराक्षस म्हणून एक फार हुशार महा-अमात्य होता. तो अतिशय एकनिष्ठ होता. फक्त तो राष्ट्रनिष्ठ असण्याऐवजी राजनिष्ठ होता. त्याच्यामुळेच मगध साम्राज्याचा गाडा योग्य रितीने हाकला जात होता. त्याच्यावर राज्यकारभार सोपवून धनानंद विलासात दंग झाला. आचार्य चाणक्य दरबारात धनानंदाला अलेक्झांडरच्या आक्रमणाची जाणीव करुन द्यायला आले होते. पण धनानंदाकडे अखंड भारताच्या हिताची दृष्टी नसल्याने त्याने आर्य चाणक्यांची निंदा करुन दरबारातून बाहेर काढले. या अपमानाने क्रोधित होऊन आर्य चाणक्यांनी भर दरबारात आपल्या शेंडीची गाठ सोडली व प्रतिज्ञा केली की, "जोपर्यंत मगधाच्या गादीवर असलेल्या नंद कुळाचा नाश करीत नाही तोपर्यंत मी शेंडीला गाठ बांधणार नाही.... " झालं... आर्य चाणक्यांची ही भीषण प्रतिज्ञा ऐकून धनानंदाने चाणक्याची टर उडवायला सुरुवात केली. मग काय आगीत तेल ओतल्यासारखंच झालं. आधीच भडकलेला आचार्यांचा क्रोधाग्नि आणखीनच भडकला. आचार्य तेथे क्षणभरही न थांबता निघाले. दरबारातून बाहेर पडल्यावर आचार्यांनी थेट तक्षशीलेकडे प्रयाण केले.चाणक्यने मगधसम्राटाला धडा शिकविण्याचा तसेच मगध साम्राज्याला योग्य शासक मिळवून देण्याचा पण केला आणि तिथून सुरू झाला मगध सम्राटाचा शोध.
चंद्रगुप्त मौर्य :
पूर्वचरित्र: कुलाविषयी भिन्न मते :
चंद्रगुप्तमौर्य हा मौर्यसाम्राज्याचा संस्थापक होय. चंद्रगुप्ताच्या जन्मासंबंधी अनेक आख्यायिका आहेत आणि खात्रीलायक माहितीही उपलब्ध नाहीये. अनेक तर्क चंद्रगुप्ताच्या जन्माबाबत लढविले गेले आहेत. दंतकथांना आपले संशोधक पुरावा म्हणून मानत नाहीत. सम्राट चंद्रगुप्ताचा जन्म नंद कुळातच झाला त्याच कुळाचा नाश त्याने स्वतःच्या हातांनी कसा केला? तीच तर खरी गंमत (खरे तर शोकांतिका) आहे.चंद्रगुप्त मौर्य हा कोण होता, मौर्य कुळ क्षत्रिय होते की शूद्र होते, मौर्य व नंदांचा संबंध काय इ. प्रश्नांची उत्तरे तत्कालीन ग्रंथांत भिन्न भिन्न आहेत. जैन व बौद्ध साहित्यानुसार तो क्षत्रिय होता तर ब्राह्मण ग्रंथानुसार तो शूद्र होता. चंद्रगुप्त हा शूद्र कुळातील होता हे खालील ग्रंथांत दाखवले आहे. यापैकी कोणत्याच दाव्याला ठोस पुरावा नाही. त्या काळातले, आज उपलब्ध असलेले ग्रंथ म्हणजे ‘कौटिलिय अर्थशास्त्र’ आणि ‘मुद्राराक्षस’ हे नाटक. यापैकी अर्थशास्त्र हा एकूणच राजधर्म विशद करणारा ग्रंथ आहे. याचा कर्ता कौटिल्य अथवा चाणक्य तथा विष्णुगुप्त हा आहे. या अद्वितीय ग्रंथाची भूर्जप्रत १९०४ मध्ये म्हैसूरच्या ग्रंथसंग्रहालयात सापडली. मात्र या ग्रंथात चंद्रगुप्तचा स्वतंत्र उल्लेख नाही.
‘मुद्राराक्षस’ हे नाटक लिहिणारा विशाखादत्त तर खूपच नंतरच्या काळातील आहे. त्यामुळे चंद्रगुप्त मौर्य नक्की कोण, हे गूढ आजही कायम आहे. ग्रीक सम्राट अलेक्झांडर इ. स. पूर्व ३२७ मध्ये भारतात आला होता. तो परत गेला (भारत जिंकून वगैरे अजिबात नव्हे.) त्यानंतर चंद्रगुप्त सत्तेवर आला.
१) हिंदू – विष्णू पुराणात व तत्कालीन समजुतीप्रमाणे चंद्रगुप्त मौर्य हा नंदवंशातील शेवटच्या सम्राटाच्या (धनानंद) मुरा नांमक दासीचा पुत्र होय. म्हणून मुरा या शब्दावरून मौर्य हा शब्द बनला. पण मुरावरून मौर्य ही उत्पत्ती पाणिनीच्या व्याकरणाप्रमाणे अयोग्य आहे.
विशाखादत्त याने लिहिलेल्या 'मुद्राराक्षस' या नाटकात चंद्रगुप्त हा एक दासीपुत्र होता. मगध नरेश धनानंद राजाला चैनी-विलासी जीवनाची आवड होती. धनानंदाच्या सेवेत 'मुरा' नावाची एक दासी होती. मुरा दिसायला सुंदर होती. विलासी धनानंदाच्या दृष्टीस मुरेचे लावण्य पडताच त्याने तिला स्वतःची खास दासी म्हणून नियुक्त केले. मुरा एक सामान्य दासी असून धनानंदाने तिला आपल्या अंतःपुरातील दासी बनवले. दासीच्या भावनेला त्या काळात किंमत शून्य होती. निदान धनानंदासारखा विषयासक्त मगधसम्राट असल्यावर तो म्हणेल तीच पूर्वदिशा होती.
काही काळानंतर मुरेला धनानंदापासून दिवस गेले. धनानंदाने तिची योग्य ती काळजीदेखील घेतली होती. ती प्रसूत झाल्यावर तिला जो मुलगा झाला तो चक्रवर्ति होईल असे राज-ज्योतिष्यानी राजाला भविष्य सांगितले. ते ऐकून राजाला भय पडले. दासीपुत्र चक्रवर्ति होऊ नये म्हणून त्याने मुरेसकट त्या निष्पाप बालकाला स्वर्गाची वाट दाखवायचा निर्णय घेतला. कसा कोणास ठाऊक पण मुरेला धनानंदाचा बेत कळला. अजिबात वेळ न घालवता मुरेने बाल चंद्रगुप्तासह पलायन केले. मगधाबाहेर गेल्यावर मुरेला एका गुराख्याने आसरा दिला.
कर्मधर्मसंयोगानं म्हणा किंवा धनानंदाचा व नंदवंशाचा काळ जवळ आला होता म्हणा, चाणक्याची व शूर चंद्रगुप्ताची गाठ पडली. चंद्रगुप्त तेव्हा साधारण आठ-दहा वर्षांचा असेल. चाणक्य तक्षशीलेकडे निघाला असताना एके ठिकाणी गुराख्याची काही मुले त्याला दिसली. एक मुलगा ऐटीत एका उंच दगडावर बसला होता. त्यच्या मधुर वाणीने ती गुराखी मुलेच काय पण आचार्यदेखील मोहित झाले. दोन मुलांच्या आपापसातील भांडणाचा न्याय-निवाडा तो गुराखी मुलगा एका जातीवंत राजाप्रमाणे करत होता. चाणक्यांनी लगेच बालचंद्रगुप्ताच्या - होय तो मुलगा चंद्रगुप्तच होता - आईची भेट घेतली. एवढा तीक्ष्ण बुद्धीचा आणि योग्य न्यायबुद्धी असणारा चंद्रगुप्त आचार्यांना हवा होता. देशाचे भवितव्य घडविण्यासाठी आचार्य चाणक्यांनी चंद्रगुप्ताला मुरेकडे मागितले.. आचार्यांनी आपली योजना मुरेला सांगितली. मुलाचे भविष्य सुरक्षित किंबहुना त्याहुन अधिक सक्षम हातांनी घडविले जाणार होते म्हणून आणि मुरेलाही धनानंदाचा सूड घ्यायचा होता म्हणून तिने काळजावर दगड ठेवून बालचंद्रगुप्ताला चाणक्यांच्या हवाली केले. चाणक्याने मुरेचा निरोप घेतला. मुरेनेही धनानंदाने केलेला अत्याचार बालचंद्रगुप्ताला सांगून त्याच्या हृदयात प्रतिशोध (सूड म्हणू हवं तर) घ्यायची भावना भडकवली . सूडाच्या भावनेने पेटलेला चंद्रगुप्त आपले ध्येय गाठण्याच्या हेगेला.आर्य चाणक्यांबरोबर तक्षशिलेला गेला. 'मुरा' या आईच्या नावावरूनच चंद्रगुप्ताच्या घराण्याला मौर्य हे नाव पडले व चंद्रगुप्तानेच चाणक्य या धनानंदाकडून अपमानित झालेल्या राजनीतिज्ञाच्या मदतीने मौर्य वंशाची स्थापना केली असे कथानक आहे. तत्कालीन ग्रंथ म्हणून हा पुरावा महत्त्वाचा ठरतो.
२) जैन - जैन परंपरेप्रमाणे चंद्रगुप्त हा एक ग्रामप्रमुखाच्या मुलीचा मुलगा होय. या गावात मोर पाळणारे लोक राहात होते. त्यामुळे 'मयूरपोषक' या शब्दावरून मौर्य हा शब्द बनला असावा. एका स्मारकावरून असे स्पष्ट दिसते की, मौर्यवंशाची संबंध मयुरांशी अवश्य असावा. सांची येथील मूर्तिमध्ये व नंदरगड येथील अशोकाच्या स्तंभात मोरांची चित्रे आढळली आहेत. तसेच पाटलीपुत्र येथील बागेत पाळीव मोर ठेवण्यात आले होते.
३) बौद्ध - महावंशानुसार चंद्रगुप्त खट्टीय गोत्राचा वंशज असून मौर्य नावाने प्रसिद्ध होता. दिव्यावदानानुसारही चंद्रगुप्ताचा पुत्र बिंदुसार क्षत्रिय होता. असे आहे. महापरिनिभाणसुत्त या ग्रंथांत चंद्रगुप्त क्षत्रिय होता हे सिद्ध केले आहे. त्यात म्हटले आहे की. चंद्रगुप्ताचे वंशज क्षत्रिय असून इ.स.पू. सहाव्या शतकात ते नेपाळ तराईमध्ये पिप्पलीवन नामक प्रदेशाचे सत्ताधीश होते. नंतर हा प्रदेश मगध साम्राज्यात विलीन करण्यात आल्यामुळे मौर्यवंशाची वाताहात झाली असावी. 'दिव्यावदान' व 'महावंश' या बौद्ध ग्रंथांत चंद्रगुप्त हा क्षत्रिय होता असे म्हटले आहे.
४) ग्रीक: ग्रीक ग्रंथात चंद्रगुप्त हा क्षत्रिय होता असे म्हटले आहे.
५) सोमदेवकृत 'कथासरित्सागर' मध्ये चुद्रगुप्त नंदाचा पुत्र होता. तो दासीपुत्र किंवा शूद्र मातेपासून उत्पन्न झाला नव्हता. मगधच्या राजसत्तेचा तो वंशपरंपरेने अधिकारीच होता असे म्हटले आहे.
वरील नोंदी व इतिहासकारांनी काढलेले निष्कर्ष यांच्या आधारे चंद्रगुप्त हा क्षत्रिय कुळातील होता हे मान्य झाले आहे. चंद्रगुप्ताच्या प्रारंभिक जीवनाबद्दलची माहिती उपलब्ध नाही. ‘मोरीय’ टोळीत चंद्रगुप्ताचा जन्म झाला असे बौद्ध परंपरा मानते. या टोळीप्रमुखाचा तो पुत्र होता. टोळीयुद्धात त्याचे वडील वारल्याने त्याच्या आईने छोट्या चंद्रगुप्तसह पाटलीपुत्र येथे आश्रय घेतला. चंद्रगुप्त हा अत्यंत हुशार व राजलक्षणी होता. तो स्वत:च्या अंगच्या गुणांमुळे नंदांच्या लष्करात एका साध्या शिपायापासून ते सेनापतीपदापर्यंत पोहोचला.
चंद्रगुप्त मौर्याचे साम्राज्य
भारत त्यावेळी विविध गणांमध्ये विभागला गेला होता. त्यात शाक्य, मौर्य या जातीच्या शासकांचा प्रभाव असे. काही मान्यतेनुसार चंद्रगुप्त हा त्यातल्याच एका गणप्रमुखाचा मुलगा होता. एखाद्या योद्ध्याला शोभतील असे सारे गुण त्याच्यात होते. तो साहसी, पराक्रमी तर होताच पण चांगले नेतृत्वही तो करत असे. त्याचे हे गुण चाणक्याने हेरले आणि त्याला आपले शिष्य बनवले. चाणक्य अर्थशास्त्र, राजकारण, कूटनीती यात निपुण होतेच पण चंद्रगुप्ताला युद्धनीती शिकवून त्यांनी स्वतंत्र सैन्य तयार केले
धनानंदाचा सुड घेण्यासाठी निघालेला चाणक्य उर्फ विष्णुगुप्त उर्फ कौटील्य आणि त्याने बरोबर घेतलेला छोटा चंद्रगुप्त तक्षशिलेला पोहोचताच आर्य चाणक्यांनी मुळीच वेळ वाया न घालवला नाही. चंद्रगुप्ताच्या शिक्षणासाठी चाणक्यांनी पुन्हा तक्षशिला विद्यापीठाचे आचार्यपद स्वीकारले. आचार्यांनी चंद्रगुप्ताला विशेष करुन राजनीती, शस्त्रविद्या, युद्धाचे डावपेच, यांमध्ये निष्णात केले. बाकीच्या विषयांमधेसुद्धा चंद्रगुप्त आपल्या बुद्धीची प्रगल्भता दाखवत होता. जसजसा चंद्रगुप्त आर्य चाणक्यांच्या हाताखाली शिकत होता तसतसा तो आपली बुद्धीमत्ता प्रकट करत होता. मनोमन चाणक्य सुखावले होते. कारण चंद्रगुप्त त्यांच्या अपेक्षेहून अधिक हुशार, चाणाक्ष आणि समंजस होता.
तक्षशिलेत चंद्रगुप्ताने किती काळ शिक्षण घेतले हे अज्ञात आहे. पण साधारण वयाच्या विसाव्या वर्षी त्याचे शिक्षण पूर्ण झाले असावे. शस्त्रविद्येत तर चंद्रगुप्त भलताच तरबेज झाला होता. आता त्याला ध्यास होता तो धनानंदाने त्याच्या आईवर केलेल्या अत्याचारांचा सूड घ्यायचा. त्याच्या तलवारीला धनानंदाच्या रक्ताची तहान लागली होती. आचार्य चाणक्यांनी चंद्रगुप्ताची ही अवस्था आधीच ओळखली होती. आणि त्यानुसार सर्व सिद्धताही केली होती. पण मगधस्वारीत एकच गोष्ट आड येत होती. ती म्हणजे सिकंदराची स्वारी.
अलेक्झांडर सिकंदर हा अतिशय महत्त्वाकांक्षी तरुण योद्धा होता. त्याच्या शिस्तबद्ध सैन्याची माहिती करुन घेण्यासाठी आचार्यांनी चंद्रगुप्ताला त्याच्या काही मित्रांसमवेत सिकंदराच्या गोटात पाठवले. सिकंदरापुढे तक्षशिलेच्या राजाने युद्ध न करताच शरणागती पत्करली होती. अनेक मांडलिक राजांनी सिकंदराला आपले सैन्य दिले होते त्यामुळे सिकंदराच्या सैन्यात आता भारतीय सैनिकही होते. त्यामुळे चंद्रगुप्ताला सिकंदराच्या सैन्यात प्रवेश मिळवळे सोपे गेले. चंद्रगुप्ताची व सिकंदराची भेट झाली होती असे म्हटले जाते. पण या गोष्टीला पुरावा नाही. तरी या दोघांची भेट ही अशक्यदेखील नव्हती. चंद्रगुप्ताने सिकंदराच्या सैन्याची शिस्त, त्यांची युद्धपद्धति, आधुनिक शस्त्रास्त्रे यांचा बारकाईने अभ्यास करुन ते ज्ञान आत्मसात केले. या गोष्टीचा चंद्रगुप्ताला मगधाधिपती होण्यासाठी व नंतरही पुढे फार उपयोग झाला.
सिकंदराच्या सैन्याने पुढे जाणे आता नाकारले होते. सतत सात वर्षे मायदेशापासून दूर राहून सैनिक कंटाळले होते. त्यांना घराची ओढ लागली होती. त्यात भर म्हणून यौधेय गणाच्या सामर्थ्याची माहिती सिकंदराच्या सैनिकांना मिळाली होती. अगोदरच थकलेल्या सैन्याची ही बातमी ऐकून अतिशय वाईट अवस्था झाली. सैन्याने पुढे जाणे तर नाकारलेच पण जर सिकंदराने पुढे जायचे ठरवले तर बंड करुन सिकंदराला ठार मारण्याचा कटदेखील काही लोकांनी केला होता. यौधेय हे अतिशय बलशाली, वीरांचे गणराज्य म्हणून प्रसिद्ध होते. प्रसंगी स्त्रियादेखील युद्धभूमिवर शस्त्रे घेऊन युद्ध करीत. या यौधेय गणराज्याला घाबरुन सिकंदराच्या सैन्याने युद्धाला नकार दिला. परिणामी सिकंदराला आपली जगज्जेता होण्याची महत्त्वाकांक्षा सोडावी लागली व तो मायदेशी परत जाण्यास निघाला.
सिकंदराने माघार घेताच चंद्रगुप्त व चाणक्य यांनी सैन्याची जमवाजमव करण्यास सुरुवात केली. सैन्य जमताच आचार्यांनी चंद्रगुप्ताच्या साहाय्याने सैन्याला आधुनिक युद्धकलेचे शिक्षण दिले. आपल्या सैन्याच्या सामर्थ्याबद्दल खात्री होताच गुरु-शिष्यांनी पाटलिपुत्राकडे प्रयाण केले. शक्य तेवढ्या लवकर पाटलिपुत्र गाठायचा चाणक्याचा विचार होता. चंद्रगुप्तदेखील आपलं ध्येय साध्य करण्यासाठी आतुर झाला होता. चंद्रगुप्ताच्या सैन्याने लवकरच मगध साम्राज्यात प्रवेश केला. पाटलिपुत्र नगरीपर्यंत चंद्रगुप्ताचे सैन्य सहजपणे पोहोचले. त्यांना प्रतिकार झालाच नाही. होणार तरी कसा? चाणक्याने आपल्या भेदनीतीचा वापर करुन गुप्तहेरांच्या सहाय्याने मगधसेनापतीस केव्हाच आपल्याकडे वळवून घेतले होते. चाणक्याच्या या हुशारीमुळे चंद्रगुप्ताच्या सैन्यावर युद्धाचा प्रसंग आलाच नाही. फक्त पाटलिपुत्र नगरीत धनानंदाच्या राजनिष्ठ सैन्याशी युद्ध करावे लागले. थेट पाटलिपुत्रावर आक्रमण केलेल्या चंद्रगुप्ताच्या सैन्यापुढे मनोबल खच्ची झालेल्या आणि स्तिमित झालेल्या धनानंदाचे सैन्य कसे टिकणार? शेवटी चंद्रगुप्ताने पाटलिपुत्रात प्रवेश मिळविला. ही देखील आचार्यांच्या भेदनीतीचीच कृपा होती. अन्यथा चाणाक्ष अमात्य राक्षस असताना पाटलिपुत्रात प्रवेश मिळणे महाकठीण होते...
पाटलिपुत्रात प्रवेश करताच चंद्रगुप्त व चाणक्य या गुरु-शिष्यांनी थेट धनानंदाच्या महालाकडे धाव घेतली. धनानंदाचा चतुर, मुत्सद्दी अमात्य मुद्राराक्षस हा गुप्तमार्गाने निसटून जाण्यात यशस्वी झाला होता. पण विलासात दंग असलेला धनानंद मात्र चंद्रगुप्ताच्या हातात सापडला होता. चंद्रगुप्ताच्या सैनिकांनी धनानंदाला धरुन ठेवले होते. धनानंद खाली मान घालून उभा होता. आचार्यांनी धनानंदाला आपल्या भर दरबारात केलेल्या प्रतिज्ञेची आठवण करुन दिली. घाबरल्यामुळे व अपमानामुळे त्याची नजर वर उठत नव्हती. मग आचार्यांच्या भेदक नजरेला नजर देणं तर दूरच. आचार्यांनी चंद्रगुप्तास खूण केली. आपल्या तलवारीची तहान भागवण्यासाठी चंद्रगुप्त तयारच होता. आपली तलवार घेऊन चंद्रगुप्ताने धनानंदाच्या दिशेने पावलं टाकण्यास सुरुवात केली. धनानंदाला स्वत:चा अंत समोर दिसताच तो प्राणदान द्यावे म्हणून आचार्यांकडे गयावया करु लागला. पण आचार्यांनी त्याच्याकडे लक्ष दिले नाही. इतक्यात चंद्रगुप्त धनानंदाजवळ पोहोचला आणि....... एकाच घावात चंद्रगुप्तानं धनानंदाचं मस्तक धडावेगळं केलं ...
अशा रितीने चाणक्यानं आपली प्रतिज्ञा चंद्रगुप्ताला हाताशी धरुन तडीस नेली. चंद्रगुप्त आता मगधसम्राट झाला होता. युक्त्या-प्रयुक्त्या योजून चाणक्याने एकदाचे अमात्य राक्षसाला चंद्रगुप्ताचा महा-अमात्य होण्यास भाग पाडले. चाणक्य आता निश्चिंत झाला होता. चंद्रगुप्ताचा राज्यकारभार सुरळीत चालावा म्हणून चाणक्याने चंद्रगुप्तासाठी व त्याच्या पुढील पिढ्यांसाठी 'कौटीलिय अर्थशास्त्र' हा जगप्रसिद्ध ग्रंथ लिहिला. चाणक्य हा आयुष्यभर चंद्रगुप्तासोबत होता की मगध साम्राज्याची योग्य घडी बसवून अन्यत्र निघून गेला हे कळण्यास मार्ग नाही. पण अमात्य राक्षसाला चंद्रगुप्ताच्या बाजूने वळविण्यास जे अथक प्रयास चाणक्याने केले, ते पाहता चाणक्याने प्रतिज्ञापूर्तीनंतर पुन्हा तक्षशीलेकडे प्रयाण केले असावे असे वाटते.
आजपासून २३४४ वर्षांपूर्वी (इसवीसनपूर्व ३२३ मध्ये) अलेक्झांडरचा मृत्यू इराकमधील बॅबिलॉन इथं झाला. इ.स.पूर्व ३२३ च्या जून महिन्यात अलेक्झांडतचा मृत्यु झाला तरी ऑगस्टमधे ही बातमी हिंदुस्थानात पोहोचली व नोव्हेंबरच्या सुमारास चंद्रगुप्ताने पहाडी लोकांचे सैन्य उभारुन ग्रीकांनी बळकावलेले प्रदेश मुक्त केले. इ.स.पूर्व ३२२ च्या आरंभीच सर्व भारतीय भूभाग चंद्रगुप्ताने ग्रीकांच्या सत्तेपासून मुक्त केले. चंद्रगुप्त तेव्हा जेमतेम २५-२६ वर्षांचा असेल. अलेक्झांडरच्या मृत्यूसमयी त्याचं साम्राज्य ग्रीसपासून पाकिस्तानपर्यंतच्या प्रदेशात होतं. हयात असताना अलेक्झांडरनं प्रांताधिकारी म्हणून नेमलेले त्याचे ग्रीक सरदार अलेक्झांडरच्या मृत्यूनंतर स्वतंत्र होऊन राज्य करू लागले. मात्र, राज्यविस्तारासाठी त्यांच्यात लवकरच संघर्ष सुरू झाला. तो इसवीसनपूर्व ३२२ ते २८१ पर्यंत सुरू राहिला. याचे परिणाम भारताच्या राजकीय इतिहासावर झाले. सध्याच्या दक्षिण पाकिस्तानातील सिंध प्रांतात पेथन नावाचा ग्रीक प्रांताधिकारी अलेक्झांडरनं नेमला होता. उत्तर पाकिस्तानातील पंजाबातील सिंधू, झेलम, चिनाब या नद्यांच्या खोर्यांत अंभी आणि पुरू हे दोन राजे स्वतंत्रपणे राज्य करत होते; पण पंजाबातील या राज्यांवर लक्ष ठेवण्यासाठी अलेक्झांडरनं युडेमस नावाचा ग्रीक लष्करी अधिकारी नेमला होता. आजपासून २३४४ वर्षांपूर्वी, म्हणजे इसपू ३२३ मध्ये, अलेक्झांडरच्या अचानक झालेल्या मृत्यूनंतर कदाचित दोनेक वर्षांत या युडेमसनं अंभीचं गांधार प्रदेशाचं राज्य ताब्यात घेतलं आणि त्यानंच नंतर पुरूची हत्या घडवून आणली. अलेक्झांडरच्या मृत्यूनंतर चारच वर्षांनी पश्चिम आशियातील त्याच्या सरदारांमध्ये राज्यविस्तारासाठी मोठं युद्ध सुरू झालं होतं. या युद्धात सहभागी होण्यासाठी इसवीसनपूर्व ३१७-१६ मध्ये युडेमस आणि पेथन हे प्रांताधिकारी पंजाब आणि सिंध प्रांतांतून भारतीय सैन्य, हत्ती घेऊन तुर्कस्तानात गेले. यामुळे पंजाब आणि सिंध या प्रांतांत निर्माण झालेल्या राजकीय पोकळीचा फायदा चंद्रगुप्त मौर्य यानं घेतला. ग्रीक इतिहासकारांनुसार, पंजाब आणि सिंध या प्रांतांतील परकीय शक्तींच्या विरोधात, म्हणजेच ग्रीकांच्या विरोधात, चंद्रगुप्तानं स्थानिकांची एकजूट करून उठाव घडवून आणला. पंजाब आणि सिंध या प्रांतांतील दुय्यम ग्रीक अधिकाऱ्यांना मारून चंद्रगुप्तानं तिथं आपलं वर्चस्व प्रस्थापित केलं. यानंतर चारेक वर्षांत सेल्युकस निकेटर नावाचा अलेक्झांडरचा प्रांताधिकारी इराक, इराण या देशांच्या प्रदेशात आपली सत्ता वाढवण्याच्या प्रयत्नात होता. हा प्रदेश जिंकल्यावर त्यानं आपलं लक्ष पंजाब आणि सिंध या प्रांतांकडे वळवलं. हे दोन्ही प्रांत एकेकाळी अलेक्झांडरच्या साम्राज्याचा भाग असल्यानं सेल्युकस हे दोन्ही प्रांत जिंकण्यासाठी अफगाणिस्तानच्या प्रदेशात आला. आजपासून २३२५ वर्षांपूर्वी म्हणजे, अंदाजे इसवीसन पूर्व ३०५ ते ३०३ या दोन वर्षांच्या काळात, झालेल्या युद्धानंतर सेल्युकसनं इसवीसनपूर्व ३०३ मध्ये चंद्रगुप्ताशी तह केला. या तहानुसार, सिंधू नदीच्या पश्चिमेकडील पूर्व अफगाणिस्तानातील जलालाबाद-काबूल-कंदाहारचा प्रदेश आणि जवळजवळ सध्याच्या पाकिस्तानचा सर्व भूभाग मौर्य साम्राज्याचा भाग म्हणून चंद्रगुप्ताकडे राहिला. त्याबदल्यात चंद्रगुप्तानं सेल्युकसला ५०० हत्ती भेट दिले. तुर्कस्तान, इराकमधील इतर ग्रीक प्रांताधिकाऱ्यांच्या विरुद्धच्या युद्धात विजय मिळवण्यासाठी सेल्युकसला हे हत्ती उपयोगी ठरले. सेल्युकस आणि चंद्रगुप्त यांच्यातील या तहात भारतीय आणि ग्रीक यांच्यात विवाह होऊ देण्याचं कलम होतं, असं रोमन इतिहासकार सांगतात. काही अभ्यासकांच्या मतानुसार, या वाक्याचा अर्थ, या दोन राजघराण्यांत वैवाहिक संबंध निर्माण झाले होते असा असू शकतो. झालेल्या तहामुळे सेल्युकसने आपली मुलगी हेलन हिचा चंद्रगुप्ताशी विवाह करुन दिला व त्याच्याशी सख्यत्व केले. त्यामागे सशक्त साम्राज्य निर्माण करणे आणि त्याच्या साम्राज्याशी मैत्रीपूर्ण संबंध ठेवणे हा हेतू होता. त्यामुळे भारतीयांना पश्चिमी देशांबरोबर व्यापार करणे सोपे झाले.
कदाचित याच तहाच्या वाटाघाटी करण्यासाठी किंवा या तहानंतर मेगास्थेनिस नावाचा ग्रीक राजदूत भारतात आला. तो सेल्युकसचा वकील असावा असं संशोधकांचं मत आहे. मेगास्थेनिस हा सध्याच्या अफगाणिस्तानातील कंदाहार या नगरातून मगध साम्राज्याची राजधानी असलेल्या पाटलीपुत्रमध्ये (बिहारमधील पाटणा) आला. मेगास्थेनिसनं पाटलीपुत्रचं वर्णन त्याच्या ‘इंडिका’ नावाच्या ग्रंथात केलं आहे. दुर्दैवानं तो ग्रंथ नष्ट झाला; परंतु त्यातील काही माहिती, परिच्छेद काही ग्रीक लेखकांनी वापरले होते, त्यावरून मेगास्थेनिसनं लिहिलेली भारताची थोडी माहिती कळते. मेगास्थेनिसनं केवळ पाटलीपुत्रचाच नव्हे तर, उत्तर प्रदेशातील मथुरा आणि दक्षिणेतील मदुराई या दोन्ही ठिकाणांचा उल्लेख केला आहे. सध्याच्या तामिळनाडू राज्याच्या प्रदेशात पांड्य राज्य होतं. या राज्याची राजधानी मदुराई होती असंही तो सांगतो. चंद्रगुप्ताचा मुलगा बिंदुसार याच्या काळात दियमाकस नावाचा ग्रीक राजदूत आला होता आणि त्यानंदेखील त्याच्या भारतातील वास्तव्यावर आधारित ‘इंडिका’ नावाचा ग्रंथ लिहिला होता, एवढीच माहिती नंतरच्या काळातील ग्रीक लेखक देतात.
अशा रितीने चंद्रगुप्ताने मगध साम्राज्याचा विस्तार केला व राष्ट्र एकसंध करण्याची आर्य चाणक्यांची कल्पना वास्तवात आणली. सेल्युकसशी सख्यत्व केल्यावर सेल्युकसने मॅगॅस्थिनिस हा आपला वकील चंद्रगुप्ताच्या दरबारी ठेवला. सुमारे पाच वर्ष तो चंद्रगुप्ताच्या दरबारी होता. फावल्या वेळात त्याने तत्कालीन माहिती लिहिली. त्याच्या वर्णनांमुळेच आपल्याला त्या काळाची योग्य माहीती मिळण्यास मदत होते.
चंद्रगुप्त मौर्याने आपल्या पराक्रमाने मगध साम्राज्याचा अशा रितीने विस्तार केला. त्याच्यानंतर त्याचा पुत्र बिंदुसार मगधाच्या गादीवर आला. चंद्रगुप्ताचे थोडेफार राहिलेले साम्राज्यविस्ताराचे काम त्याच्या पराक्रमी पुत्राने व सम्राट अशोकाने पूर्ण केले
भारताला एकसंध केल्यानंतर चंद्रगुप्त आणि चाणक्य यांनी सामाजिक आणि आर्थिक बदल घडवले. त्यामुळे संपन्नता तर आलीच पण पाश्चिमात्त्य व्यापारामुळे देशाचा आंतरिक आणि बाह्य विकास साध्य झाला. मौर्य साम्राज्य ४ प्रांतात विभागलेले होते. अशोकाच्या शिलालेखानुसार या चार प्रांतांची नावे तोसली (पूर्व), उज्जैन (पश्चिम), सुवर्णनगरी (दक्षिण), तक्षशिला (उत्तर) अशी होती. या प्रांतीय प्रशासनाचा प्रमुख राजपुत्र असे. तो राजाचा प्रतिनिधी म्हणून प्रांताचा कारभार पाहत असे. त्याला सहाय्यक म्हणून महाअमात्य व मंत्र्यांची समिती असे. अशीच शासनव्यवस्था साम्राज्याच्या स्तरावर असे. केवळ प्रशासनाचा प्रमुख हा सम्राट तर त्याला साहाय्य करण्यासाठी मंत्रिपरिषद असे. मौर्य साम्राज्याचे सैन्य त्याकाळचे सर्वाधिक सैन्य होते. ६ लाख पायदळ, ३० हजार घोडदळ व ९ हजार लढाऊ हत्ती या सैन्यात होते. त्याचप्रमाणे अंतर्गत व बाह्य माहिती गोळा करणारे हेरगिरी खातेही तैनात होते. सम्राट अशोकाने त्याच्या कालखंडात युद्ध व साम्राज्यविस्तारास आळा घातला असला तरी अंतर्गत व बाह्य शांततेसाठी आपले सैन्य कायमठेवले होते. चंद्रगुप्ताने भव्य इराणी शहरांशी स्पर्धा करेल, अशी ६४ दरवाजे व ५०० मनोरे असलेली मोठी लाकडी भिंत आपली राजधानी पाटलीपुत्रभोवती बांधली होती. मौर्य साम्राज्याच्या एकछत्री अंमलामुळे अंतर्गत लढायांना आळा बसला व प्रथमच संपूर्ण भारताची एकत्र आर्थिक व्यवस्था निर्माण झाली. वेगवेगळे कर भरण्याऐवजी ‘अर्थशास्त्र’ या चाणक्यच्या ग्रंथातील तत्त्वांवर आधारित शिस्तबद्ध व उचित अशी कर आकारणी शासनाद्वारे सुरू झाली. मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था ही त्यानंतर अनेक शतकांनी उदयास आलेल्या रोमन साम्राज्यासारखी होती. दोन्ही साम्राज्यांचे मोठ्या प्रमाणावर व्यापारी संबंध होते. सहकारी संस्थेसारख्या संस्था होत्या. चंद्रगुप्ताने संपूर्ण भारतात एकच चलन प्रस्थापित केले. शेतकर्यांना, व्यापार्यांना न्याय तसेच सुरक्षा मिळावी याकरिता प्रांतस्तरावर प्रशासक नेमले. गुन्हेगारी टोळ्या, खाजगी, प्रांतिक सैन्य यांना डोके वर काढू दिले नाही. त्यांच्यावर ताबा मिळवला. परिणामी अंतर्गत व्यापार, राजकीय एकात्मता, अंतर्गत सुरक्षा वाढीस लागली. आंतरराष्ट्रीय व्यापारही मौर्य शासनकाळात चमसीमेवर होते. सध्या पाकिस्तान व अफगाणिस्तानच्या सीमेवरील खैबरखिंड ही या व्यापारात अतिशय महत्त्वाची होती. पश्चिम आशियातील ग्रीक राज्ये, मलय द्वीपकल्प भारताबरोबर मोठ्या प्रमाणात व्यापार करीत. भारतातून रेशीम, रेशमी कापड, कपडे, मसाले व विविध खाद्यपदार्थ निर्यात होई. युरोपबरोबर विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाची देवाणघेवाण झाल्याने साम्राज्य समृद्ध झाले. मौर्यसम्राट अशोकाच्या कारकिर्दीत हजारो रस्ते, कालवे, जलमार्ग, दवाखाने, धर्मशाळा निर्माण झाले. धान्य व कर गोळा करण्यासंबंधीच्या अनेक कठोर कायद्यांच्या शिथिलीकरणाने साम्राज्याची उत्पादनक्षमता वाढली. मौर्यकाळात आरंभी हिंदू धर्म प्रमुख धर्म होता. चंद्रगुप्त मौर्य यानेही आपल्या अखेरच्या काळात जैन धर्म स्वीकारला होता.श्रवणबेळगोळ येथे सापडलेल्या शिलालेखानुसार चंद्रगुप्त आपल्या अंतिमटप्प्यात जैन मुनी बनले होते. ते शेवटचे मुकुटधारी जैन मुनी होते. त्यांच्यानंतर कोणीही मुकुटधारी म्हणजे प्रशासक असलेले जैन मुनी झाले नाही. जैन धर्मात चंद्रगुप्ताला विशेष महत्त्व आहे. चंद्रगुप्त स्वामी भद्रबाहू यांच्यासमवेत श्रवणबेळगोळ येथे गेला होता. तेथेच अन्नपाणी वर्ज्य करून, समाधीअवस्थेत त्याने आपले प्राण सोडले. श्रवणबेळगोळ येथे ज्या पर्वतावर त्याचे वास्तव्य होते त्या पर्वताला ‘चंद्रगिरि’ असे नाव पडले आणि तेथेच त्याने बनविलेले ‘चंद्रगुप्तबस्ति’ नावाचे मंदिरही आहे. सम्राट अशोकाचे ४० अभिलेख आतापर्यंत अवगत झाले आहेत. जे प्रामुख्याने ब्राह्मी लिपीत, खरोष्टी आणि ग्रीक भाषेत लिहिले गेले आहेत.
बिंदूसार मौर्य :-
चंद्रगुप्तानंतर त्याचा मुलगा बिंदूसार सम्राट बनला. बिंदूसार या नावाचा उल्लेख कुठल्याही ग्रीक साधनात मिळत नाही, तिकडे नाव अमित्राघात असे येते. परंतु भारतीय साधनांमध्ये बिंदूसार हे नाव आढळते. अमित्राघात याचा अर्थ शत्रूंचा घात करणारा असा आहे त्यामुळे ही बिंदुसाराला मिळालेली पदवी असू शकते. चंद्रगुप्तप्रमाणेच बिंदूसारही अतिशय पराक्रमी सम्राट होता. चंद्रगुप्तांने त्याच्या काळात बनविलेल्या शत्रूंशी बिंदुसाराने यशस्वीरीत्या सामना केला.
इ.स. पुर्व २७३ मधील विंदुसराचे साम्राज्य
बिंदूसाराच्या कारकिर्दीचा जास्त इतिहास उपलब्ध नाही. परंतु आपण तर्क लावू शकतो. चंद्रगुप्ताच्या काळात सगळाच दक्षिण भारत मगध साम्राज्यात नव्हता आणि पुढे अशोकानेही फक्त कलिंग जिंकून घेतले त्यामुळे दक्षिण भारत बिंदूसार याने जिंकला असावा असे दिसते. बिंदूसारने २५(काही साधनात २८) वर्ष राज्य केले आणि त्याचा इ.स. पूर्व २७३ मध्ये मृत्यू झाला आणि पुढे इ.स. पूर्व २६९ मध्ये अशोक सम्राट बनला
चक्रवर्ती सम्राट अशोक :-
प्राचीन भारतीय इतिहासातील सर्वात शक्तिशाली आणि लोककल्याणकारी राजा म्हणून सम्राट अशोकाच्या एकूणच कार्यपद्धतीवरुन दिसून येते. आचार्य चाणक्य यांचे अखंड भारताचे स्वप्न पूर्ण करणारा हिंदुस्तानाचा पहिला सम्राट म्हणजे अशोक. अशोकाचे चक्रवर्ती हे उपपद त्याच्या ठायी सार्थ झाले होते हे त्याच्या राज्यविस्तारावरून दिसून येते.
भारतीयांनीच नाही तर अनेक पाश्चात्त्य इतिहासकारांनी सुद्धा अशोकाचे चक्रवर्तीत्व स्वीकारलं आहे.
१. व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतात, "His dominions were far more extensive than British India of to day excluding Burma"
म्हणजे, आज ब्रिटिश इंडिया हे नाव जेवढ्या प्रदेशाला येते (ब्रह्मदेश वगळून) त्याच्यापेक्षाही जास्त विस्तृत प्रदेश अशोकाच्या सत्तेखाली होता.
२. रे. मॅकफेल याने इंग्लंडचा सुप्रसिद्ध राजा आल्फ्रेड दि ग्रेट याच्याशी अशोकाची तुलना केली आहे. न्यायदानतत्परता, विद्योत्साह, आणि भविकता या बाबतीत दोघांमध्ये बरेच साम्य दाखवले आहे. परंतु त्याबरोबरच मॅकफेल हे ही कबुल करतो की आल्फ्रेड दि ग्रेट चे राज्य अशोकाच्या मगधाच्या कितीतरी पटीने लहान होते.
३. प्रो. ह्रिस डेव्हीड्सने त्याच्या Buddhist India या ग्रंथात ओलिव्हर क्रोमवेलशी अशोकाची तुलना केली आहे.
वरील प्रकारे सम्राट अशोकाची तुलना नेपोलियन, पीटर दि ग्रेट, अलेक्झांडर इत्यादी पाश्चात्य व्यक्तींशी होऊ शकते.
परंतु सम्राट अशोक या सगळ्यांपेक्षाही श्रेष्ठ होता हे आपण म्हणू शकतो. ते कसं?
१.अशोक नेपोलियन सारखा धाडसी शूर महत्वाकांक्षी होता परंतु त्याने महत्वाकांक्षेच्या पायी आपला नाश करून घेतला नाही.
२.पीटर दि ग्रेट प्रमाणे प्रजेच्या ऐहिक सुखकडेच फक्त अशोकाची दृष्टी नव्हती. ऐहिक सुखाबरोबरच अध्यात्मिक आणि नैतिक उन्नती कशी साधावी हे त्याने उपदेशांकरवी दाखविले.
३.अलेक्झांडरने दिग्विजय केला. अशोकानेही कलिंगविजय केला. पण सगळा भारत खंड आपल्या स्वामित्वाखाली आल्यानंतर आता जिंकण्यास काही उरले नाही म्हणून तो अलेक्झांडर प्रमाणे शोक करत बसला नाही. उलट दिग्विजयाहूनही श्रेष्ठ असा आत्मविजय त्याने करून दाखविला.
याच प्रमाणे सेंट पॉल, अरबस्तानचा पहिला म्हालिफा उमर, मुघल बादशाह अकबर या सगळ्यांच्या तुलनेत सम्राट अशोकच श्रेष्ठ ठरतो.
अशोकाची कीर्ती शोधायची झाली तरी ती त्याच्या अफाट राज्यविस्तारात, अतुल ऐश्वर्यात, अपरंपार संपत्तीत, कलिंग विजयात दिसून येतेच, परंतु याचबरोबर त्याच्या अंतःकरणाच्या औदार्यात, हृदयाच्या ऐश्वर्यात, त्याच्या अतुल त्याग बुद्धितही दिसून येते.
सम्राट अशोकाचा कुलवृत्तांत
मगध! सोळा महाजनपदातील एक महत्वाचे राज्य. सध्याचा भारतातील बिहारचा परिसर म्हणजे पूर्वीचे मगध साम्राज्य.
आतापर्यंत ऐतिहासिक साधनातून मगधाच्या वेगवेगळ्या काळातील एकूण ४ राजधान्या कळतात.
१. महाभारतातील जरासंधाच्या वेळची राजधानी गिरीव्रज(आत्ताचे गिर्यांक),
२. सातव्या शतकातील शिशुनाग वंशावेळची राजधानी राजगृह (आत्ताची राजगिर),
३. राजगृह (दुसरी)
४. सम्राट अजातशत्रूने पाटलीग्राम या गावी गंगा व शोणभद्र यांच्या संगमावर बसवलेली पाटलीपुत्र(आत्ताचे पटना) ही राजधानी.
सम्राट अशोकाने कोरलेले ऐतिहासिक शिलालेख, शिलाखंड, राजाज्ञा यासारखे किंवा दुसरे अनेक ऐतिहासिक पुरावे उपलब्ध असताना सुध्दा इतिहास तज्ञ या सम्राटाला एकप्रकारे अडगळीत टाकण्याचा प्रयत्न करत आहेत किंवा पूर्वग्रहदूषित दृष्टिकोन समोर ठेवून त्या महान सम्राटाचा इतिहास समोर घेऊन येत नाहीत ही मोठी शोकांतिका म्हणावी लागेल.
अशोकाने भारतीय प्राचीन इतिहासाला सर्वात महत्वाचा वारसा दिला तो म्हणजे साम्राज्यात सर्वत्र कोरलेले शिलालेख. या शिलालेखांमधून आपले विचार प्रकट केलेले आहेत. काळाच्या ओघात बरेचसे शिलालेख नष्ट झालेले आहेत. अजूनही उत्खननात बरेचसे पुरावे उघडकीस येऊ शकतील परंतु त्यासाठी इच्छाशक्ती दाखवावी लागेल.
चक्रवर्ती सम्राट अशोक यांचा जन्म इ. स. पूर्व ३०४ तेव्हाच पाटलीपुत्र (बिहार) हे या सम्राटाचे जन्माचे ठिकाण. चंद्रगुप्त मौर्य यांनी पाया घातलेल्या मौर्य साम्राज्याचा दुसरा मौर्य सम्राट बिंदुसार याचा अशोक हा मुलगा. अशोकाच्या आईबद्दलची माहिती फक्त दंतकथांतून मिळते व आज बहुतेक सर्व संशोधकांकडून तिला अविश्वसनीय अशी मान्यता मिळाली आहे. अशोकावदान, दिव्यावदान आणि वंसथ्थपकासिनी या ग्रंथांमधून अशोकाच्या आईसंबधी खात्रीलायक माहिती देणारे पुरावे दिलेले आहेत. त्यापैकी पहिल्या ग्रंथात अशोकाची आई सुभ्रदांगी असे संबोधले आहे. चंपा येथील ब्राम्हणाची मुलगी असा तीचा उल्लेख आहे. ती दिसायला अतिशय सुंदर होती त्यामुळे त्या ब्राह्मणाने तिला पुढे बिंदूसाराच्या राजवाड्यात पाठविले. तिकडे तिला तिच्या सौंदर्यामुळे महाराणींकडून हीन वागणूक मिळाली आणि न्हाविणीचे काम तिला देण्यात आले. राजवाड्यातील कारस्थानामुळे तीला राजापासून दूर रहावे लागले परंतु ती शेवटी राजाकडे जाऊ शकली. काही दिवसांनी शेवटी बिंदूसाराची दृष्टी तिच्यावर गेली आणि त्याने तिच्याशी लग्न करून तिला आपली १६ वी पट्टराणी केले. पुढे सुभद्रांगीला अशोक आणि विगतअशोक अशी २ मुले झाली.तिला मुलगा झाला त्यावेळी ‘मी दुःखमुक्त म्हणजे अशोक आहे ‘ असे ती स्वतःबद्दल उद्देशून म्हणाली. अशोकाचे शिक्षण याबद्दलही फक्त दंतकथाच आल्या आहेत. त्या अशा की, अशोक जन्माला आल्यापासून एकदम कुरूप व दुष्ट निघाला त्यामुळे पहिल्यापासूनच तो बिंदूसाराचा नावडता झाला. यामुळे त्याला इतर राजकुमारांबरोबर बोलू, खेळू देण्यात येत नसे आणि त्याचे शिक्षणही नीट झाले नाही. परंतु या गोष्टी तर्काने खऱ्या वाटत नाहीत.
सम्राट अशोकाच संपूर्ण आयुष्य हे अनेक अख्यायिकांनी भरलेले आहे. त्यामुळे त्या अख्यायिकांवरती किंवा कथांवरती जास्त भर न देता साम्राज्यात त्यांनी निर्माण केलेल्या लोककल्याणकारी उपाययोजना, एक राजा ते देवानाम प्रियदर्शी चक्रवर्ती सम्राट हा अलौकिक प्रवास सर्वांसमोर येण गरजेचे आहे. प्रा. रोमिला थापर म्हणतात भारतीय इतिहासातील ख्रिस्तपूर्व पाच शतकांमध्ये झालेल्या घडामोडी यांच्या उलटसुलट प्रवाहामधून ज्या विशेष कतृत्ववान व्यक्ती उदयाला आल्या त्यांच्यामध्ये सम्राट अशोकाची गणना होते. कलिंग युद्धामध्ये झालेल्या संहारामुळे व त्यातून झालेल्या आपल्या विजयामुळे दारूण दुःखाची झालेली निर्मिती पाहून त्या विजयाविषयी खंत व्यक्त करणारा विजेता, एक संत, साधू आणि सम्राट यांचा संगम, राजकीय विचारवंत, मानवी जीवनाविषयी क्वचितच आढळणारा समंजसपणा दाखवणारा राजा अशा अनेक रुपांमध्ये तो अनेकांना दिसतो.
तरूण अशोकाने आपल्या गुणांनी आपल्या पित्यावर सम्राट बिंदुसारवर छाप पाडली. त्यामुळे या तरूण राजपुत्राची उज्जयनीच्या राज्यपाल पदासारख्या महत्वाच्या पदांवर नेमणूक केली. त्यानंतर काही खास हेतूने त्याला तक्षशिलेला पाठवले होते व तेथील कामगिरी व्यवस्थितरित्या पार पाडली. उच्चपदावरील अधिकार्यांच्या जुलमी कारभाराला कंटाळून बिंदुसार राजाच्या कारकिर्दीत तक्षशिलेला एक बंड पुकारले होते. अशोकाला त्याच्या पित्याने ते बंड शांत करण्यासाठी तक्षशिलेला पाठवले अशोकाची हि सर्वात पहिली ज्ञात कामगिरी! मौर्य घराण्याविरुद्धचे बंड हे अगदी चंद्रगुप्तांपासून चालून येत असतं. पुढे बिंदूसाराच्या काळातही अनेक बंड झाले. त्यातलाच एक तक्षशिला येथील बंड. तक्षशिला हे सिंधू नदीपासून ३ दिवसांच्या मजलेवर सुप्रसिद्ध स्थान होते. बौद्ध ग्रंथात तक्षशिलाचा उल्लेख 'तक्षशिर' असाही येतो. बिंदूसाराच्या काळात इकडे बंड झाला त्यामुळे राजाने राजकुमार अशोकाला बंड मोडण्यासाठी पाठवले. अशोकाने युद्ध व रक्तपात न करताच बंड मोडून काढले. अशोकाने प्रजेचा संताप वाढू न देता ते बंड यशस्वीपणे शांत केले. यानंतर ३ वर्षे अशोक तक्षशिला मधेच राहिला.अशोकासारख्या गुण आणि अभिरुची असणार्या तरूण राजपुत्राला तक्षशिला हे एक आकर्षक शहर वाटत होते. संरक्षणाच्या दृष्टीने महत्त्वाचे आणि राजकीय राजधानीचे शहर एवढेच या शहराचे महत्त्व नव्हते तर राजमार्गावरील शहर, बहुरंगी संस्कृती असलेले व्यापारी केंद्र आणि महत्वाचं म्हणजे विद्येच्या अनेक मोठ्या केंद्रांपैकी एक. पुढे त्याची नेमणूक उज्जैनी येथे झाली. काही कथांमधून अशी माहिती मिळते की अशोकाच्या सावत्र आईच्या सांगण्यावरून अशोकाची नेमणूक पाटलीपुत्रापासून लांब उज्जैनी मध्ये करण्यात आली. अशोक उजैनी मध्ये असतानाच पुढे इ.स. पूर्व २७३ रोजी बिंदूसाराचा मृत्यू झाला.
काही ग्रंथांमधून असे सांगितले आहे की, बिंदुसारला विविध राण्यांपासून झालेल्या नव्यान्नव मुलांना अशोकाने ठार केले. परंतु ही माहिती काल्पनिक असल्याने मानण्याजोगी नाही. बिंदुसारच्या मृत्युच्या वेळी सिंहासनावर अधिराज्य गाजवण्यासाठी संघर्ष झाला. मोठा मुलगा सुसीमचा राज्याभिषेक करावा असा बिंदुसारचा प्रयत्न होता परंतु तक्षशिलेला झालेला उठाव मोडून काढण्यासाठी सुसीमला आलेले अपयश पुढे तक्षशिलेला अशोकाने केलेली यशस्वी मोहीम यामुळे बिंदुसारचा मुख्यमंत्री राधागुप्त याचा अशोकाला पाठिंबा होता त्यामुळेच अशोकाला स्वतःच्या राज्याभिषेकाला विरोध करणाऱ्या भावांना बाजूला सारून राज्यकारभार करणे भाग पडले होते. आपले स्थान पक्के झाले अशी खात्री झाल्यानंतर इ. स. पुर्व २६९ अशोकाने आपला अधिकृत राज्याभिषेक केला.
सिंहसनासाठी संघर्ष व राज्याभिषेक
बिंदूसाराचा मृत्यू इ.स. पूर्व २७३ मध्ये झाला आणि अशोकाचा राज्याभिषेक इ.स. पूर्व २६९ म्हणजे ४ वर्षांनी झाला. यावरून आपण असा तर्क लावू शकतो की ही ४ वर्ष सिंहसनासाठी संघर्ष चालू होता. तो संघर्ष कसा आणि किती जणांत झाला हे आपण आज ठामपणे सांगू शकत नाही. तरी ही काही मुद्दे असे आहेत.
अ. बौद्ध ग्रंथामध्ये म्हटले आहे की अशोकाने आपल्या १०० भावांपैकी ९९ भावांना ठार मारले आणि स्वतःला सम्राट घोषित केले.
आ. सिंहली दंतकथांमध्ये सुद्धा साधारण असाच उल्लेख आहे की बिंदूसारला १०१ पुत्र होते. पण त्यात १०१ पैकी फक्त ३ पुत्रांची नावं मिळतात. तिष्य,अशोकवर्धन,सुमल.
इ. तारानाथ म्हणतो की अशोकाने ६ भाऊ मारले.
ई. महबोधिवंश या ग्रंथात म्हटले आहे की अशोकाने सर्व भावांना मारले.
परंतु या वरील गोष्टींना ठोस काहीच पुरावा मिळत नाही आणि वरून सम्राट बनल्यावर अशोकाने खोदविलेल्या एका आदेशात सरळसरळ म्हटलं आहे की 'आपले भाऊ पाटलीपुत्र नगरात व अन्यत्रही आहेत.' याचमुळे दंतकथांमधील गोष्टी खऱ्या नसाव्यात असे मला वाटते.
व्हिन्सेंट स्मिथ सुद्धा याबाबतीत हेच म्हणतो की,
"These fictions were sufficiently refuted by the testimony of the inscriptions which proves that the brothers and sisters of the king were still living in the middle of the reign."(पान १९)
या सगळ्यावरून आपण असं म्हणू शकतो की अशोकाने फक्त अशाच भावांना मारले ज्यांचे अशोकाबरोबर वैर होते. आणि याच संघर्षामुळे यामुळे बिंदूसाराच्या मृत्यूनंतर अशोकाला गादीवर बसायला ४ वर्ष लागली.
डावीकडील नकाशात इ.स.पुर्व २५० या काळातील सम्राट अशोकाचे साम्राज्य तर उजवीकडच्या नकाशात इ.स.पुर्व २५० या काळानंतर विस्तारलेले साम्राज्य
सम्राट अशोक हा आधुनिक काळातील मॅनेजमेंट मधील मॅनेजमेंटचा निर्माता आहे असे म्हटले तर वावगे ठरू नये प्रथम मॅनेजमेंट म्हणजे काय हे पाहणे आवश्यक आहे तर आधुनिक काळात त्याची व्याख्या आहे लोकां कडून काम करवून घेण्याची कला म्हणजे मॅनेजमेंट होय management is art of getting things done through people . आता याला कला का म्हटले आहे तर जन्मताच कोणाला काही येत नसते त्याला ते अवगत करावी लागते अशोकाचा व्यवस्थापन जगतातले काम आजवर कधी जगापुढे आले नाही ते आले असते तर अशोक आज मॅनेजमेंट जगतातील एक उत्तुंग व्यक्तिमत्व असा सम्राट ठरला असता पण त्याला तसे कोणी प्रेझेंट करण्याचा प्रयत्न केला नाही
आता याला कला का म्हणतात ते पाहू या त्याची कारणे असतात एक यात नावीन्य असावे लागते ते व्यवस्थापनात केले जाते म्हणजे नवनवीन युक्त्या नवे प्रश्न सोडवण्यासाठी वापरले नवीन संकटे असतात ते सोडवण्यासाठी नवा मार्ग शोधला जातो
एकदंरीत नवनव्या गोष्टींचे निर्माण करावे लागते त्यात एक नाविन्यता असेल तरच ते यशस्वी होते आता व्यवस्थापनात कॉपी करण्यास जागा नसतो कारण सतत बदलत असणारी परिस्थिती तसे बदल करण्यास प्रवृत्त करते त्यामुळे एखादा व्यक्ती जशीच्या तशी कृती करू शकत नाही आणि तशीच परिस्थिती असताना तसाच निर्णय घेऊ शकत नाही त्यात बदल करू शकतो म्हणजे काय यात बुद्धिमत्ता महत्वाची असते अशोकाने तक्षशीलेचे शमवलेले बंड असेल किंवा अशोकाने आपल्या साम्राज्यात विविध लोकांनी केलेलं बंड असतील किंवा धम्म प्रसारासाठी वापरलेली यंत्रणा आहे जे सारे त्याचंच एक भाग आहे पण हा लोकांसमोर कधी आला नाही
दुसरी गोष्ट व्यक्तिगत दृष्टिकोन हि महत्वाचा भाग आहे प्रत्येक माणसाची काम करण्याची पद्धत वेगळी असते एकी व्यक्ती करतोय तशीच दुसऱ्याची कृती असू शकत नाही कारण दुसऱ्याच्या पद्धतीचा वापर आपणास तंतोतंत करता येत नाही तेव्हा कधी हि स्वतःची कृती महत्वाची असते
तिसरी गोष्ट असते मन आणि मेंदू दोन्हीचा उपयोग करणे म्हंजे काय हे दोन्ही घटक एकाच वेळी कामामध्ये युझ करणे आता आता व्यवस्थापक होण्यासाठी नुसते कौशल्य व ज्ञान असून फायदा नाही तर त्याच्याकडे शिस्त समर्पण बांधिलकी हे गुण असावे लागतात
सम्राट अशोकाने अनेक संकटाना झेलत एवढे मोठे साम्राज्य उभारले आहे ते बिना मॅनेजमेंटचे शक्य होईल का कोणत्या हि राजाला ते शक्य नाही व्यवस्थापन हा महत्वाचा भाग असतो
अशोकाने आपल्या आयुष्यात एक एक माणसे जोडली आहेत लोकांमध्ये प्रिय राजा म्हणून त्याची ओळख आहे सामाजिक बांधिलकी जपण्यामध्ये सम्राट अशोक सर्वात यशस्वी सम्राट झालेला आहे अशोकाची शिस्त हि आजच्याघडीला महत्वाची आहे आजवर कोणी यावर लक्ष दिलेले नाही सम्राट अशोकाने सैन्याला शिस्त घालून दिली च पण सोबत त्याने आपल्या जनतेला हि शिस्त घालून दिलेली आहे अशोकाच्या काळात अन्याय अत्याचार च्या घटना लांबची गोष्ट आहे या तीन तत्वांचा जिथे योग्य मेल असतो तिथे च कल्याणकारी राज्य निर्माण होते
सम्राट अशोकाची कारकीर्द किती वर्षाची आहे सम्राट अशोक इसवी सन पूर्व २६९ ला सत्तेवर बसला व इसवी सन पूर्व २३२ मध्ये त्याचे निधन झाले आहे ३७ वर्षाचा कालावधी मध्ये अशोकाने निर्माण केलेलं साम्राज्य ते हि एकछत्री साम्राज्य जगात एकछत्री साम्राज्य असावे असे लोकांना अशोकाचे साम्राज्य पाहूनच पुढे लोकांनी पावले उचलली आहेत यालाच व्यवस्थापक यांचे यश आहे जेव्हा मन आणि मेंदू एकत्र काम करतात तेव्हाच काम बिनचूक होते
सम्राट अशोकाचे शिलालेख उपलब्ध असणारी ठिकाणे
सम्राट अशोकाच्या काळात बौध्द धर्मप्रसारासाठी झालेला प्रवासाचा मार्ग
सम्राट अशोकाच्या तेराव्या शिलालेखातील उल्लेखानुसार जगात बौध्द धर्माचा विस्तार झालेला प्रदेश
चौथी गोष्ट आहे निकालावर आधारित म्हणजे काम रिझल्ट ओरियंटेड असावे लागते कोणते हि काम करताना कामाचा रिझल्ट लागणे गरजेचे असते नुसते आम्ही हे केले ते केले सांगून होत नाही तर त्याचा रिझल्ट लागणे आवश्यक आहे सम्राट अशोकाने धम्म विजय करून जगाला ते दाखवून दिले आहे कि कामाचा रिझल्ट कसा असायला पाहिजे ते शिवाय त्याचे साम्राज्य हेच त्याच्या कामाचा सर्वात मोठा रिझल्ट आहे शिवाय त्याने केलेलं प्रत्येक काम हे हे रिझल्ट ओरियंटेड आहे त्याने जे जे मनात आणले ते ते त्याने पूर्ण केले
सम्राट अशोकाने आपल्या राज्याचे विस्तार करतेवेळी साम्राज्यवादी भूमिका ठेवून ते केले असे म्हणता येत नाही लोकांनी चुकीचा अशोक मांडला आहे अशोकाला साम्राज्य विस्ताराची भूक नसून सामान्य लोकांच्या भल्याची भूक होती आणि त्यातून अशोकाचे व्यवसाय व्यवस्थापन पुढे येते
आधुनिक काळातील भले भले मॅनेजमेंट मध्ये पारंगत असणाऱ्या लोकांना जे जमले नाही ते अशोकाने दोन हजार वर्षांपूर्वी यशस्वी करून दाखवले
अशोकाच्या सैन्यामध्ये शिस्तप्रिय काम असायची प्रत्येक सैन्याला त्याचे एक अस्तित्व होते अशोकाने साम्राज्य विस्तार करताना अनेक राजांपुढे मैत्रीचा हात देतेसमयी महत्वाची गोष्ट केली आहे ती म्हणजे लोक जोडणे सामन्यातील सामान्य माणसाला जोडले गेले म्हणून अखंड भारत वर्ष साकारले गेले हे व्यवस्थापनाचे महत्वाचे भाग आहेत पाचवी बाब आहे ती म्हणजे पुढाकार घेणे म्हणजे आपण मागे आणि तुम्ही पुढे चला असे नाही प्रत्येकवेळी आपल्या सैन्याला नवीन गोष्टीसाठी स्वतः पुढाकार घेऊन दाखवत असे आणि योग्य ठिकाणी योग्य काम करणे हे महत्वाचे असते यासाठी योग्य त्याच माणसाला ते काम देणे अशोकाने धम्म प्रसारासाठी ज्या ज्या लोकांना निवडले ते ते लोक धम्माचा प्रसार करण्यात यशस्वी झाले आहेत याला मॅनेजमेंट म्हणतात अशोकाचा एक हि पराभव झालेला नाही हे अजून एक महत्वाचे आहे मग लढाई रणांगणावर ची असेल व बुद्धीच्या मैदानात अशोकाने हार पाहिलेली नाही कारण योग्य त्या ठिकाणी योग्य माणसाला नेमून काम पूर्ण करणे आणि अशोकाच्या राज्यात सामान्य जनतेला पुढाकार घेता येत होता म्हणून भारतभर स्तूपांची निर्मिती झाली आहे . ८४ हजार स्तूपांची निमिर्ती ती हि अवघ्या काही कालावधी मध्ये याला आजवर लोकांनी वेगळ्या मुद्द्यातून पाहिले पण हे एका अभियंत्याची दृष्टी आणि कृती चे मॅनेजमेंट म्हणतात टाइम मॅनेजमेंट म्हटले जाते
सहावी गोष्ट बुद्धिमत्ता हि तर लागतेच नसेल तर तो माणूस यशस्वी होत नसतो अशोकाच्या साम्राज्याचा विस्तार पूर्ण कल्पना देते अशोकाची बुद्धी कौशल्य किती अफाट असेल याचे
आता यात चार प्रकारची बुद्धिमत्ता असते एक मानसिक बुद्धिमत्ता सामाजिक बुद्धिमत्ता अंतर व्यक्ती बुद्धिमत्ता भावनिक बुद्धिमत्ता
आता मानसिक मध्ये कोणत्या हि संकटाच्या वेळी अचूक पणे ज्याची कामे पूर्णत्वास जातात त्यालाच मानसिक बुद्धिमत्ता चांगली असली पाहिजे असे म्हणतात अशोकाने आपल्या भावाच्या चुकीच्या वागणुकीमुळे सामान्य माणूस पिळवटाला जातोय ये पाहून लोकांसाठी अतिशय नाजूक असणारा विषय त्याने हाताळून घेतला ते कौशल्य सहज कोणाला हि जमत नाही यामध्ये भावनेच्याभरात वाहून चुकीची पावले पडून विनाशाकडे वाटचाल होते व्यवस्थापकाला यामध्ये महत्वाचा भाग पार पाडावा लागतो
सामाजिक बुद्धिमत्ता मध्ये त्या व्यवस्थापकाला सामाजिक परिस्थितीचे भान असायला लागते आणि सर्व समाजाचा पाठींबा असणे महत्वाचे आहे अशोकाने लोकांच्या मनात राष्ट्राप्रती एक भावना निर्माण करून दिली आहे ज्यामुळे लोक अशोकाच्या त्या प्रवाहात आली आहेत आणि अखंड भारत पूर्णत्वास नेला आहे
अंतर व्यक्ती बुद्धिमत्ता म्हणजे स्वतः बुद्धिमान असून चालणार नाही तर बुद्धिमान लोकांना शोधून आपल्या सोबत घेण्याची बुद्धिमत्ता असावी लागते
भावनिक बुद्धिमत्ता मानसिक व भावनिक म्हणजे वैचारिक व भावनिक शब्द एकत्र येतात म्हणजे काय वैचारिक बुद्धिमत्ता जिथे संपते तिथे भावनिक बुद्धिमत्ता चालू होते आणि यात भावनिक न होणे हिलाच भावनिक बुद्धिमत्ता म्हटली जाते अशोकाने भावनिक राजकारण केले नाही काही ठिकाणी कठोर निर्णयाची गरज होती तिथे कठोर निर्णयांची अंमलबजावणी केली आहे नुसते आदेश देऊन सोडले नाही त त्यावर अंमल झाला पाहिजे
सम्राट अशोकाने भावनिक राजकारण न करता लोकांच्या भल्याचे राजकारण केले आहे राज्य करताना आदर्श राज्यकारभार कसा असावा याचे महत्वाचे पुरावे हे अशोकाकडेच पाहून घ्यावे लागतात
अशोकाच्या बाबतीत सर्वात मोठा गैरसमज असा आहे कि अशोक क्रूर होता कलिंगाच्या युद्धांनंतर तो बदलला तर हे अत्यंत चुकीचे आहे अशोकाच्या घराचे वातावरण हे बुद्धाच्या शिकवणीचा प्रभाव असणारे आहे काही इतिहासकारांनी अशोक चुकीचा रंगवला आणि त्याचे हि कारण आहे कारण बुद्धाला लोकांनी प्रेझेंट करण्यासाठी अशोक चुकीचा रंगवला म्हणजे बुद्ध तत्व सांगायला अशोक असा प्रकारे सांगितला गेला
एक गोष्ट लक्षात घ्या अशोकाची एकमेव लढाई आहे जो अशोक मैदानात लढाई करण्यासाठी गेला आहे आणि जिथे माणसे मारली गेली अशी त्याची एकमेव लढाई आहे ती म्हणजे कलिंग आणि कलिंगाच्या स्वाभिमानपणा हा त्यास कारणीभूत ठरला सामान्य लोक लढाई स उतरले शेवटी विजय झाला तेव्हा अशोक अस्वस्थ झाला होता कारण माणसे मारणे चुकीचे आहे हे त्याला माहित असताना हि लढाईत मारावेच लागतात कारण ती लढाई आहे लोकांनी मात्र अशोक याने मोठ्या प्रमाणात कलिंग बेचिराख केले असे चुकीचे सांगतात मुळात सामान्य माणसे लढाईत उतरली तेव्हाच अशोकाने लढाईच मार्ग बदलला आहे माणसे मारून काही होत नसते हे सांगणारा अशोक क्रूर असेल असे वाटत नाही आणि लगेच काही तो बुद्ध तत्वज्ञान ऐकून बुद्धाकडे आलेला नाही त्याचा लहानपणापासून तो बुद्धाच्या शिकवणी च्या प्रभावाखाली आहे म्हणून अशोक बुद्धकडे सहज गेला कारण त्यावेळी बुद्धशिवाय कोणता पर्यायच समोर नव्हता. अशोकाने बुद्धाच्या प्रति प्रेरणेची भावना होती श्रद्धा वैगरे अजिबात ठेवणारा अशोक नव्हता कारण यशस्वी व्यवस्थापकाला श्रद्धा ठेवून जमत नसते तर त्याला प्रेरणेची गरज असते आणि अशोकाने आपल्या लोकांमध्ये प्रेरणा जागवली आहे
हे अशोकाचे स्किल आहे अशोक केवळ राजा किंवा चक्रवर्ती सम्राट नसून एक यशस्वी मॅनेजमेंट किंग आहे ज्याने दोन हजार वर्षांपूर्वी या जगाला मॅनेजमेंट कशी करावी हे शिकवून गेला
आता अशोकाच्या मॅनेजमेंट मधील सूत्रांचा अभ्यास करू जी आता मॅनेजमेंट सांगतात ते अशोकाने पूर्वी कशाप्रकारे अमलात आणले होते ते कामाचे वाटप हे मॅनेजमेंट मधील पहिले सूत्र मानले जाते सम्राट अशोकाच्या संपूर्ण राज्याचे कामकाजाचे विभाग आहेत अशोकाचे नऊ मंत्री आहेत शिवाय अशोकाची सैन्य व्यवस्था त्यावेळच्या काळातीळ सर्वात मोठी सैन्य व्यवस्था आहे आणि हे सैन्य कायमस्वरूपी कामदार आहेत ६ लाख पायदळ ३० हजार घोडदळ व ९ हजार हत्तीदल आहे शिवाय अशोकाचे स्वतःचा खजिना म्हणजे कोषागार आहे म्हणजे आजची नॅशनल बँक अशोक हा बँक सिट्सम चा जनक होता असे म्हणायला हरकत नाही कारण त्याने तसे काम केले आहे अशोकाची स्वतंत्र अर्थव्यवस्था होती अशोकाचा स्वतःची अदयावत धान्याची बँक आहे लोकांना जेव्हा गरज लागेल तेव्हा धान्य पुरवणारी जगातील पहिली सरकारी बँक अशोकाने केली आहे शेतकऱ्यांना लागणाऱ्या बी बियाणाची इथूनच पुरवणी केली जायची अशोकाच्या व्यायामशाळा आहेत जिथे कसलेले पैलवान तयार केले जायचे खास करून अशोकाचे सैन्य त्या तोडीचे होते शिवाय अशोक हा कलागुणांना वाव देणारा सम्राट होता त्यामुळे त्याने स्वतंत्र विद्यालये ती हि विश्वविद्यालये निर्माण केली आहेत अशोकाच्या दवाखाने ,यंत्रशाळा हत्तीशाळा आरोग्यशाला पक्षी शाळा टाकसाळ असे बरेच विभाग आहेत अशोकाच्या राज्यात एकूण काय तर अशोकाने प्रत्येक काम विभागाहून देऊन कामाचे स्वरूप सहज आणि सोपे केले आहे अन्यथा एवढ्या अवाढव्य राज्याचा कारभार एकट्या व्यक्तीला करणे शक्य नसते
मॅनेजमेंट मध्ये महत्वाची गोष्ट आहे कामाची विभागणी इन प्रकारे केली जाते ते म्हणजे सोपे काम थोडे अवघड काम आणि अवघड काम अशी असते त्यात सोपी कामे करण्यासाठी लोक ठेवली जातात थोडे अवघड काम करण्यासाठी कौशल्य पूर्ण माणसे ठेवली जातात व अवघड काम करण्यासाठी स्वतः कौशल्य दाखवावे लागते म्हणजे काय एखादे सोपे काम आहे तर तेसैन्याच्या लायक आहे ते सैन्यानं च द्यायचे जे मंत्र्यांच्या लायक आहे ते मंत्र्यांना च करायला द्यायचे व मंत्री सेनापति यांच्यानी झाले नाही तर राजाला करावे लागायचे अशोकाने नेमके तेच केले आहे जे जे महत्वाचे काम आहे ते ते त्याने स्वतः केलेलं आहे अशोकाने धम्माच्या बाबतीत स्वतः लक्ष देऊन काम केले आहे माणसे निवडण्याचे काम अशोकाने स्वतः केले आहे म्हणजे कोणता माणूस कोणत्या ठिकाणी पाठवला पाहिजे हे अचूक माहित असणे हे मॅनेजमेंट आहे कौशल्य आहे ते कोणाला हि पाठवून जमणार नव्हते सीरियाच्या राजाकडे जाण्यासाठी अंतियोक नावाच्या भिक्षूला पाठवले मिश्र देशात तूरमय याला पाठवले म्हणजे भारताबाहेर ज्यांना पाठवले ते लोक तिकडे बुद्धाचा धम्म प्रभावी मांडतील असेच लोक पाठवले आहेत
अशोकाने एवढ्या मोठ्या साम्राज्याचे यशस्वी पणे राज्यकारभार कसा चालवला तर त्याने केलेली कामाची विभागणी आज आपण आपल्या भारताची जी यंत्रणा पाहतो तशीच यंत्रणा अशोकाची आहे सम्राट अशोकाच्या हाताखाली नऊ मंत्र्यांचे मंत्रिमंडळ त्यांच्या हाताखाली प्रांतवार माणसांची नेमणूक केलेली आहे आणि महत्वाचे म्हणजे अशोकाच्या राज्यात वतनदार पाहायला मिळत नाहीत कारण सामान्य माणसाला टॅक्समुक्त करणारा जगातला पहिला सम्राट हा सम्राट अशोक आहे आजच्या युगात सोडा असा एकही राजा भेटणार नाही ज्याने रयतेकडून टॅक्स घेतला नाईल पण अशोकाचे सर्वत्र एकछत्री राज्य असल्यामुळे कुठे हि बंडाळी नव्हती कारण कामाचे यशस्वी नियोजन महत्वच भाग आहे अशोकाच्या राज्यात रयतेवर जुलूम जबरदस्ती करण्याची मुभाच नव्हती कारण थेट यंत्रणा अशोकाच्या निगराणी खाली होती त्यामुळे सैन्याला त्याप्रकारे आदेश होते अशोकाचा काळ सुवर्ण काळ गणला जातो कारण शेती हा प्रमुख व्यवसाय असणारा भाग असल्याने अशोकाने जगातील सर्वातमोठ्या प्रमाणावर शेतमालाचा व्यापार करणारी यंत्रणा उभारली
आणि हे सारे शक्य झाले कारण अशोकाने कामाची विभागवार काम लोकांना देऊ केली ज्याची जशी गुणवत्ता तशी त्याला कामाची पोस्ट दिली जायची
आधुनिक यंत्रणेत हि तशी सिस्टम नाही गुणांनुसार कामांची विभागणी आज हि प्रभावी पणे चालताना दिसत नाही पण अशोकाने ती त्याकाळची यशस्वी करून दाखवली आहे आणि त्याच्याकडून च बहुतांश लोकांनी ती यंत्रणा वापरली आहे
सम्राट अशोकाने ज्या पद्धतीने व्यवस्थापन क्षेत्रात केलेली क्रांती आजवरच्या इतिहासात लोकांनी कधी सांगितली च नाही पण सम्राट अशोकाला इतिहासकारांनी न्याय दिला नाही एवढेच म्हणावे लागेल कारण अशोकाची यंत्रणा हि प्रभावी यंत्रणा म्हणून जगापुढे नेली गेली पाहिजे
सम्राट अशोक हा व्यवस्थापनाचाजनक आहे
२: अधिकार व जबाबदारी : भारतीय संविधानाने आपल्याला अधिकार जसे दिलेलं आहेत तसे आपणास जबाबदारी हि दिलेली आहे हे समजण्यासाठी मॅनेजमेंट माहित असावी लागेल हा एक मॅनेजमेंट चा भाग आहे बाबासाहेब ते उत्तम जाणत होते म्हणून संविधानात अधिकार सोबत जबाबदारी दिलेली आहे. त्याच हेतूने मॅनेजमेंट मध्ये देखील हा महत्वाचा भाग असतो
म्हणजे काय जेव्हा आपण एखाद्याला काम करण्याची संधी देतो तेव्हा त्याच्याकडे पूर्ण जबाबदारी हि देणे आवश्यक आहे कारण लोक नुसते काम देतात जबाबदारी नसते म्हणून जबाबदारी हे मॅनेजमेंट मधील महत्वाचा भाग आहे यामध्ये जितके अधिकार जास्त दिले जातात तितकीच जबाबदारी जास्त असायला हवी अन्यथा तो व्यक्ती त्या अधिकारांचा गैरवापर करू शकतो उलट जितकी जबाबदारी जास्त असते तितका तो अधिकारांचा गैरवापर कमी करतो कारण त्याच्यावर जबाबदारीचे ओझे असते व त्या दबावाखाली तो व्यक्ती पूर्णपणे काम करण्यात व्यस्त असतो आणि हे व्यवस्थापनातील सूत्र सम्राट अशोकाने दोनहजार वर्षांपूर्वी अमलात आणून जगाला दाखवून दिले आहे
सम्राट अशोकाच्या दरबार असणाऱ्या प्रत्येक सैनिकाला जसे अधिकार दिलेत तसे त्यांना तेवढी जबाबदारी हि दिलेली आहे कारण एवढ्या मोठ्या साम्राज्याचा राजा म्हणजे त्याचे मंत्रिमंडळ केवढे असणार आजच्या पंतप्रधान म्हणजे अशोकाचा प्रधान असे त्याला आपण वजीर हि म्हणतो आणि वजिराच्या हाताखाली आज जसे खासदार असतात तसे अशोकाच्या राज्यात देखील त्येवळचे खासदार आहेत प्रत्येक प्रांताचा एक अधिकारी नेमलेला आहे जो आजचा खासदार आहे आता याना जशी अधिकार दिलेत तशी त्यांना जबाबदारी दिलेली आहे त्यावेळच्या काळात अशोकाचे सैन्य व्यवस्थापन मध्ये ६ लाख नुसते पायदळाचे सैन्य आहेत ते आणि त्याचे नेतृत्व करणाऱ्या सेनापती ला जसे सैन्य व्यवस्थापनाचे अधिकार दिलेत तसे त्याला सैन्याची बांधणी करण्याची जबाबदारी दिलेली आहे घर तिथे सैनिक ह्याचे निर्माण करणारा कोणी असेल तर तो सम्राट अशोक आहे म्हणजे सेनापती ला नुसते एकाच प्रांतातील सैन्य व्यवस्थापन नाही अशोकाच्या संपूर्ण राज्यात सैन्य व्यवस्थापनाची जबाबदारी दिलेली आहे त्याच्याकडून चूक झाली तर कठोर शासन हे अशोकाच्या राज्यात दिले आहे म्हणजे नुसते अधिकार गाजवून प्रजेला कष्ट द्यायचे नाहीत तर दिलेली जबाबदारी पूर्ण करून द्यायची आहे आणि सम्राट अशोक पहिला सम्राट आहे ज्याने आपल्या राज्यात असणाऱ्याकाम करणाऱ्या लोकांना टार्गेट बेस काम देऊ केले आहे म्हणजे एका दिवसाचा वा एका आठवड्याचा किंवा एका महिन्यात जे काम दिलेले असायचे ते पूर्ण झालेच पाहिजे मग त्यात कसर केली जायची नाही
आता महत्वाचे यात चुका करणाऱ्या मंत्र्याला हि चूक झाली म्हणून ती चूक का झाली याची कारणे संगवई लागत असत मंत्र्याला हि कधी मोकळे सोडलेले नाही
अशोक धम्माच्या मार्गावर आला म्हणजे त्याने तलवार टाकून दिली हा सर्वांचा मोठा गैरसमज कोणता हि सम्राट आपली हातातील तालावर सोडून देत नसतो त्याला त्याची वेळोवेळी गरज असतेच राजेशाही मध्ये ती महत्वाची मानली जाते स्वतः सम्राट असून अशोकाने जेवढे आपले अधिकार आहेत त्याहून अधिक जबाबदारी स्वीकारलेली आहे त्यामुळे सम्राट अशोकाची पावले कुठे हि चुकीच्या दिशेला गेली नाहीत भारतीय इतिहासात राजपूत राजे असो हिंदू राजे यांचे मात्र उलटे झाले त्यांनी अधिकार खूप घेतले पण जबाबदारी काहीच घेतली नाही त्यामुळे हिंदू राजे बाई आणि बाटली यामध्ये व्यस्त राहिले व शत्रूला आयते साम्राज्य कष्ट न करता मिळवता आले खूप सारी संपत्ती लुटून घेऊन गेले हा त्यांचा विलासीपणा मुले कारण त्यांच्याकडे जबाबदारी नव्हते आणि इथे सम्राट अशोकाने आपल्याला देखील या सूत्रापासून वेगेळे ठेवले नाही याला खरे मॅनेजमेंट म्हणतात
दुसरी बाब सम्राट अशोकाने बुद्धाच्या धम्माल राजधर्म म्हणून मान्यता दिल्यावर धम्म प्रसार करण्यासाठी भिक्षूंची नेमणूक केली आहे तेव्हा त्याने धर्मगुरू म्हणून नाही तर धम्माचे प्रचारक म्हणून त्यांची नेमणूक करून त्यांना काही अधिकार देऊ केलेत म्हणजे जिथे जिथे हा प्रचारक जाईल तिथे तिथे त्याचा मान हा एखाद्या राजाच्या तोडीचा होता त्याचे अधिकार देऊ केले होते पण त्याच बरोबर घरघरात धम्म पोहचला पाहिजे हि सर्वात मोठी जबाबदारी दिलेली आहे तुम्ही ज्या भागात आहेत तिथे कोणत्याही प्रकारची कमी तुम्हाला पडणार नाही पण धम्म प्रसारात कसूर झाल्यास त्यांना कारणे दाखवा नोटीस द्यावी लागायची जे लोक योग्य काम करत नसायचे अश्यांची भिक्षु संघातून हकालपट्टी करणारा सम्राट अशोक होता हे मॅनेजमेंट चे स्किल आहे अधिकार व जबाबदारी देऊन त्यांचा समतोल बांधणे याला खरे मॅनेजमेंट म्हटले जाते
थोडक्यात अशोकाचे विविध विभाग आहेत प्रत्येक विभागाला मुख्य अधिकारी आहे आणि त्या अधिकाऱ्याला सर्व अधिकार देऊन त्याला त्या विभागाची सर्व जबाबदारी देऊ केलेली आहे की तो त्याच्या जबाबदारी शिवाय दुसरा विचारच करू शकत नाही म्हणून अशोकाचे साम्राज्य दिवसेंदिवस वाढतच गेले लोक जोडत गेले एक हि माणूस शत्रूला जाऊन मिळाला नाही शत्रू मात्र सम्राटाच्या राज्याचा भाग बनून राहिला याला एका यशस्वी व्यवस्थापकाचे कौशल्य म्हणतात आणि सम्राट अशोक हा मॅनेजमेंट मधील किंग होता हे उभ्या जगाने समजून घेणे आवश्यक आहे
३} शिस्त : शिस्त हि महत्वाचा भाग आहे मॅनेजमेंट मध्ये कारण प्रत्येक संस्थेला संघटना किंवा राज्याला शिस्त असावी लागते शिस्त नसेल तर त्या संस्था वा राज्य उभे राहू शकत नाही शिस्त हि सर्वाना पाळावीच लागते आता इथे जशी शिस्तीची अपेक्षा मालक नोकरांकडून करतो तशीच शिस्त मालकाला हि असणे आवश्यक आहे म्हणजे एखाद्या राजाने सैन्यानं शिस्त व स्वतः मात्र बेशिस्त असेल तर राज्य बुडते शिस्तीला जगाच्या इतिहासात खूप महत्व आहे. राजाने शिस्त पाळली तरच तो सैन्याला जनतेला शिस्त पाळण्यास सांगू शकतो
सम्राट अशोक शिस्तीच्या बाबतीत सर्वात कठोर मानला जातो त्याच्या सैन्याला हि त्याच प्रकारची शिस्त दिलेली आहे अगदी खुद्द स्वतः सम्राट असून देखील शिस्त मोडलेली नाही अगदी अशोकाच्या साम्राज्यात रयतेला देखील शिस्त घालून दिलेली होती शिक्षणाची द्वारे उघडली होती अशोकाचा आदेश आहे शिक्षणासाठी घरातील प्रत्येक मुलाला शिक्षित झाले पाहिजे यासाठी अशोकाचे स्वतंत्र विभाग आहे शिक्षणाचा ज्यामध्ये मुलाला सर्व प्रकारचे शिक्षण दिले जायचे शिक्षणासाठी स्वतंत्र्य विभाग तयार करणारा सम्राट म्हणून जगात तो एकमेव च गणला जातो जो दोन हजार वर्षांपूर्वी शिक्षणाला महत्व दिले आहे तक्षशिला विद्यापीठाला विश्वविद्यापीठाचा दर्जा दिला तिथे सर्व विद्यांचे शिक्षण दिले जायचे त्याचा स्वतःचा मुलगा कुणाल हा त्या काळातला पहिला इंजिनियर आहे ज्याने लेण्याची व स्तूपांचे इंजिनियरिंग करून बांधकाम केले आहे अशोकाने घालून दिलेली शिस्त पहा
त्याची मुले धम्माच्या प्रचारासाठी देऊ केली कारण स्वतः राजा शिस्तप्रिय असेल तरच रयत शिस्तप्रिय असते आणि म्हणूनच अशोकाचा भारत हा सुवर्णमय होता जगातील पहिली आर्थिक महासत्ता असणारा देश म्हणून दोन हजार वर्षांपूर्वी भारत महासत्ता होता पण आज आम्हाला तेच माहित नाही अशोक इतिहासात सांगताना अशोकाची महत्वाची कौशल्य लोक विसरले. अशोक शिस्तप्रियसम्राट आहे हेच लोक विसरून गेले इतिहासकरांनी चुकीचा अशोक रंगवून सांगितलं कारण कुठे तरी धम्म मोठा व चांगला वाटावा म्हणून कलिंगचे युद्धात माणसे मारावी हा हेतूच नव्हता पण ऐनवेळी कलिंगातील रयत युद्धात उतरली त्याच क्षणी अशोकाने आदेश दिलेला आहे युद्ध विरामाचा पण खुल्या मैदानात घडलेले तो प्रसंग अशोकाला वेदना देऊन गेला त्यावेळी अशोकाने मैत्रीने जग जिंकण्याचे निश्चित केले.ते अशोकाच्या शिस्तप्रिय वागण्यामुळेच अशोकाने आपल्या सैन्याला एक शिस्तच घालून दिली होतो कि प्रथम आपला देश व नंतर आपण म्हणून अशोकाचे राज्य टिकून होते अशोकांनंतर अनेक राजे झाले तरी देखील त्याचा प्रभाव त्यांच्यावर कायम राहिला आहे सातवाहन असोत कि गुप्त राजे असोत अशोकाचा प्रभाव त्यांच्या वर स्पष्ट दिसतो हि एक शिस्तप्रिय राजाची वैशिष्टये असतात
अशोकाने रयतेला शिस्त अशी दिली आहे की अशोकाच्या साम्राज्यात चोरी घडल्याचे प्रसंग नाही अशोकाच्या राज्यात बलात्कार सोडा स्त्रीकडे वाकड्या नजरेने पाहण्याची हिंमत नव्हती कारण अशोकाच्या सैन्यात स्त्री वर्गाची स्वतंत्र फौज होती स्त्रीला देखील सैन्यामध्ये स्थान देऊन ती अबला नाही हे दाखावून देणारा पहिला चक्रवर्ती सम्राट अशोक आहे
अशोकाच्या राज्यात कधी संपत्तीसाठी भांडणे झाली नाहीत कारण अशोकाचे कार्यव्यवस्थापन कारणीभूत आहे कारण अशोकाच्या राज्यात शिस्तीने काम केले जायचे प्रत्येक घरात अशोकाचा सैनिक होता इतकेच काय अशोक स्वतः रयतेमध्ये वेषांतर करून प्रजेला कोणाकडून उपद्रव तर होत नाही ना याची काळजी घेत होता लोकांनी अशोक चुकीचा रंगवला आहे कारण अशोक लगेच बदलून इतका प्रेमळ झाला असे म्हणता येत नाही अशोक प्रेमळ च होता न्यायी राजा होता त्याच्या अंगी मैत्री भावना आधीच होती म्हणूनच तो एवढे मोठे साम्राज्य उभे करू शकला तलवारीच्या पातीवर साम्राज्य उभे केले जाते पण मैत्रीच्या माध्यमातून साम्राज्य उभे करून प्रजेच्या हक्काचे राज्य निर्माण करणारा अशोक जगातला पहिला सम्राट आहे
अशोकाची अजून एक महत्वाची गोष्ट
अशोकाने आपल्या साम्राज्यात घालून दिलेलं नियम अतिशय कठोर आहेत न्यायप्रिय राजा म्हणून अशोकाची ओळख आहे व्यवस्थापनात महत्वाची गोष्ट हीच असते शिक्षण कला गुणानं वाव देणारा राजा सम्राट अशोक होता त्याच्या शिस्तप्रियतेमुळे अशोकाला जगप्रसिद्धी मिळाली आहे धम्म प्रसारासाठी माणसे निवडताना हि त्याने योग्य तीच निवडली आहेत भिक्षु संघ बुद्धाच्या नियमांचे उल्लंघन करतोय असे जाणवले त्यामुळेच धम्म संगीती घेऊन बेशिस्त भिक्षुना त्याने संघातून हाकलून दिले आहे अशोक नेहमीच नवनव्या रूपात तुम्हाला पाहायला मिळेल पण इतिहासाने अन्याय केला असल्याने त्याचे चित्रण चुकीचे होते आहे
मॅनेजमेंट मध्ये महत्वाची गोष्ट शिस्त आहे जिच्यामुळेच मॅनेजमेंट यशस्वी होते अशोकाच्या साम्राज्यत त्याने केलेलं मॅनेजमेंट थक्क करणारे आहे
बहुधा लोकांनी सम्राट अशोक समजून च घेतलेला नसतो तर अशोकाचे मॅनेजमेंट तर लांबची गोष्ट आहे आपण जाणून घेऊ या एक एक सूत्रे जी आजच्या काळात मांडली गेली तीच सूत्रे सम्राट अशोकाने दोन हजार वर्षांपूर्वी आपले साम्राज्य निर्माण करण्यासाठी वापरली आहेत
व्यवस्थापनातील चौथे सूत्र आहे आदेशाची एकवाक्यता
चक्रवर्ती सम्राट अशोकाचे राज्य अखंड जम्बूद्वीप मध्ये होते .आणि महत्वाची गोष्ट म्हणजे सम्राट अशोकाची शासन प्रणाली एवढ्या मोठ्या अवाढव्य साम्राज्यात कोणत्या हि प्रकारचे प्रशासन हे चुकीचे सापडत नाही कोणते व्यवस्थापन अतिशय कौतुकास्पद आहे
यामध्ये महत्वाचा आहे राजाचा आदेशाची अंमलबजावणी कशी होते ते . आणि सम्राट अशोकाच्या आदेशाची अंमलबजावणी कशी होते याचे दाखले च त्याने कोरून ठेवलेले शिलालेखातून आपणास पाहायला मिळते .
यासाठी आपण महत्वाचा शिलालेख पाहू या
देवा……….
एल………..
पाट…………..ये केनपि संघे भेतवे ए चु खो
भिखु वा भिखुनी वा संघ भाखति से ओदितानि दुसानि संनंधापयिया अनावाससि
देवांचा प्रिय राजा प्रियदर्शी याचा आदेश आहे कि , पाटीलपुत्र मध्ये भिक्खू व भिक्खुनी संघात जो कुणी फुट पाडत असेल व संघ दुषित करण्याचा प्रयत्न करत असेल तर त्याला संघापासून वेगळे करावे योग्य ती समज देवून शुद्ध करावे त्याला पांढरे वस्त्र देवून भिक्खू वा भिक्खुनी संघापासून वेगळे राहण्याची व्यवस्था करावी व उरलेला भिक्खू वा भिक्खुनी संघ विनयानुसार म्हणजेच विनय पिटकात दिलेल्या विनयानुसार संपूर्ण संघ पुन्हा विनशील करून घ्यावा. असे देवानपियेन प्रियदर्शी राजाने सांगितले आहे. या लेखाची प्रत स्वताजवळ ठेवावी कारण हे सर्वाना प्रसारित व्हावे यासाठी तसेच एक प्रत प्रत्येक उपासाकांकडे दिली जावी आणि उपासकांनी त्यानुसार अनुसरण करावे या अनुशासनावर विश्वास ठेवून ते कायम आचरणात आणावे . आणि प्रत्येक महामात्रा ने हे जपून ठेवावे म्हणून आपणास हा अनुशासन दिले आहे त्यावर विश्वास ठेवावा आणि आचरण करावे जेव्हा आपण दूरवर विहार म्हणजे प्रवास करण्यास जाल तेव्हा देखील हि एक प्रत आपल्याकडे असावी कारण हे सर्व दूर असणाऱ्या प्रत्येक भागातील लोकांसाठी अनुशासन आहे. म्हणून हि आपल्या जवळ बाळगावी
वरील वाचल्यानंतर आपल्याला एक गोष्ट लक्षात येईल पाटीलपुत्र हि अशोकाची राजधानी आहे इथून आदेश काढला आहे आणि सर्वदूर असणाऱ्या प्रदेशातील प्रत्येक महामात्रा तसेच प्रत्येक जनतेला खास करून इथे त्याने आपल्या जनतेला उपासक म्हणून म्हटलेले आहे यावरून च भारतातील जनता हि बौद्ध धम्माचे आचरण करणारी बौद्ध उपासक होते याचे ऐतिहासिक दाखले आहेत हे. उपासक यांच्याकडे हि हा आदेश दिलेला आहे कि एखादा व्यक्ती कोणी हि भिक्खू वा भिक्खू नि संघात फुट पाडण्याचे काम करत असेल तर अश्या भिक्खुंचे चीवर काढण्याचा आदेश आहे याची लिखित नोंद आपणास मिळते जरी बौद्ध धम्माला राजाश्रय दिला असला तरी धर्माच्या ओझ्याखाली राज्यशासन दबलेले नाही याचा लिखित पुरावा आपणास पाहायला मिळतो
आदेशाची एकवाक्यता कशी असते ते पहा संपूर्ण जम्बुद्विपात आपला आदेश देणारा आणि त्याची अमलबजावणी व्हावी शिवाय हा आदेश चिरकाळ टिकून राहावा यासाठी ते आदेश शिलास्तंभ आणि शिलेवर कोरून ठेवले म्हणजे हजारो वर्षांनी हि ते लोकांनी वाचावे आणि त्यानुसार काम करावे अशी दूरदृष्टी ठेवून दिलेले आदेश आहेत पुढील आदेश अगदी आज हि आपल्या प्रशासनात आलेले दिसतात
प्राण्यांची हिंसा करू नये म्हणून काढलेल्या आदेशाची अमलबजावणी संपूर्ण राज्यात केली जाते शिवाय धम्माचे आचरण करावे यासाठी धम्ममहापात्रा ची नियुक्ती करून लोकांचे आचरण सुधारावे यासाठी काढलेला आदेश आणि त्याची अमलबजावणी हि साऱ्या राज्यात होते हि एक प्रशंसनीय गोष्ट आहे . सम्राट अशोकांनी या व्यवस्थापन कौशल्यात पारंगत होते म्हणून च त्यांना हा अवाढव्य असणारा राज्यकारभार सहज सांभाळता आला
इतिहासात हि बाब खूप महत्वाची आहे सम्राट अशोकाने दिलेली आदेश व त्याचे पालन झाले नाही अशी घटना आपणास पाहायला मिळत नाही शिवाय सम्राटाच्या आदेशाशिवाय इतर कोणी आदेश दिल्याची नोंद सापडत नाही जोवर सम्राटाचा आदेश येत नाही तोवर खालील कोणते हि अधिकारी स्वतःचा आदेश देत नव्हते . आपल्या महापात्रा याना त्यांनी काही अधिकार दिलेले होते पण जनतेवर अधिकार गाजवाण्यासाठी कोणी त्याचा गैरवापर होणार नाही यासाठी त्याची पूर्णपणे सम्राट अशोक यांच्याकडे अधिकार होते .
संपूर्ण जम्बूद्वीप मध्ये आपले राज्य प्रशासन काम करत असताना कोणत्या हि प्रकारचे चुकीचे नियोजन आपणास पाहायला मिळत नाही.
शिवाय प्रशासनातील जे अधिकारी वर्ग आहेत त्यांच्याकडून हि कोणत्या हि चुकीच्या प्रकारची काम होताना पाहायला मिळत नाही. सम्राट अशोकाने घालून दिलेले नियम हे प्रत्यक अधिकारी जबाबदारीने पालन करत होता शिवाय लोक धम्म आचरण करणरे असल्यामुळे कपटनीती अथवा कोणत्या हि प्रकारचे चुकीची काम कोणी केलेली नाहीत हाच सर्वात महत्वाचा मुद्दा या निमित्ताने अधोरेखित होतो
सम्राट अशोकाच्या राज्यव्यवस्थेचा विचार केला तर या गोष्टीची नक्कीच जाणीव होइल की एका राजाला सम्राट, प्रियदर्शी किंवा चक्रवर्ती अशी संबोधने का लावली असतील. सम्राट अशोकाच्या साम्राज्यातील जे प्रदेश राजकीय दृष्ट्या महत्वाचे आहेत, जसे उज्जैन, तोसली आणि सुवर्णगिरी या प्रातांचा राज्यकारभार आपल्या राजपुत्राकडे सोपवला होता. सम्राट अशोकाने गादीवर बसण्यासाठी आपल्या सर्व भावांना ठार केले. इतिहासकारांनी आणि पुराणांनी असा अनेक ग्रंथांमधून चुकीचा प्रचार केलेला आहे. स्तंभलेख पाचवर उल्लेख केला आहे की, पाटलीपुत्र व इतर शहरांमध्ये त्यांचे भाऊ बहीण आणि इतर नातेवाईकांना स्वतंत्र घर किंवा खोल्यांची व्यवस्था निर्माण केली होती याचा अर्थ त्यांचे कुटुंबातील सर्व सदस्य व नातेवाईक जिवंत आणि सुरक्षित होते.
सम्राट अशोकाने आपला राज्यकारभार सुरळीत चालावा यासाठी गव्हर्नराची नेमणूक केली होती त्याच्यामर्फत प्रांतातील सोई सुविधा आणि देखरेख करण्यासाठी काही उच्चपदावरील अधिकारी नेमले होते. त्यांनाच प्रादेशिक असे म्हणत. प्रत्येक प्रांतातील जिल्ह्यात असे महामात्र नेमले जात. महामात्र परिषद किंवा मंत्रीमंडळाची स्थापना केली होती. अशा प्रकारची कार्यपद्धती सम्राट अशोकाला महाबलाढ्य किंवा महान नैतिक राजा म्हणून ओळख निर्माण करून देते. कोसंबी येथील लेखात तसेच पाटलीपुत्र आणि राणीच्या लेखात कोसंबीच्या महामात्रास, सारनाथ येथील लेखात त्या प्रांतातील महामात्रांना आदेश देण्यात आले आहेत. धौली व समापा येथील महामात्रांना न्यायदानाचे अधिकार देण्यात आले आहेत. याशिवाय सीमेवर असणार्या राष्ट्रांवर नजर ठेवण्याची जबाबदारी सोपवण्यात आली होती. आपल्या राज्यभिषेकाच्या तेराव्या वर्षी धर्ममहामात्र नेमले होते. त्या धर्महामात्रांची जबाबदारी लोकांमध्ये नीतिमत्ता वाढीस लागावी यासाठी काम करावे लागत होते.
समाजातील महत्वाचा घटक म्हणजे स्त्रिया! त्यांच्या कल्याणासाठी किंवा स्त्रियांना सक्षम बनवण्यासाठी ज्या योजना राबविण्यात येत असत त्यावर लक्ष ठेवण्यासाठी स्त्री अध्यक्ष महामात्र यांची नियुक्ती करण्यात आली होती.
दुसरा अधिकारी वर्ग म्हणजे राजुक किंवा लाजुक होता. त्याचे कार्यक्षेत्र म्हणजे काही लाख लोकसंख्येवरती त्यांची नियुक्ती होती. चांगल्या सज्जन लोकांना शासकीय बक्षिसे आणि दुर्जनांना शिक्षा किंवा दंड देण्याचा त्यांना अधिकार होते. रज्जूवाहक म्हणजे दोर धरणारा म्हणजे याचे काम जमिन मोजणे, तळ्यातील किंवा सरोवरातील पाणी वाटप करणे, तसेच गावातील प्रत्येक क्षेत्रातील कारागिरांकडून कर वसूल करणे इत्यादी कामे होती. आधुनिक पटवार्यास त्यावेळी रज्जूक म्हणत याशिवाय सेक्रेटरी म्हणून काम करणारा युतस किंवा युक्तस म्हणून ओळखले जात. तो महामात्रांना कार्यालयात मदत करत होता. युत हे प्रांताचे अधिकारी होते. या अधिकाऱ्यांना राजकार्याशिवाय धर्मप्रसार करण्यासाठी आपल्या जनपद क्षेत्रात दौरे करावे लागत.
आजच्या विदेश मंत्रालयाच्या कार्यालयासारखे त्यावेळी कार्यालय होते. राजाचा दूत वकील म्हणून सम्राट अशोकाने शेजारच्या पांड्य, चोल, सिलोन आणि इतर पाच ग्रीक देशात आपले वकील नेमले होते. सम्राट अशोकाच्या दरबारात डियोनिसीयस हा आॅलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस हा इजिप्तचा वकील होता. विदेशनीती सह अस्तित्व आणि शांती यावर आधारित होती. चंद्रगुप्तापासून सम्राट अशोक पर्यंत साम्राज्याची विदेश निती मैत्रीपूर्ण होती. सिरियाच्या राजाशी सम्राट अशोकाच्या वडिलांचा बिंदुसार राजाचा पत्रव्यवहार होता. सम्राट अशोकाने धर्मविजय आणि धर्मप्रचाराकरिता अन्तियोक, इजिप्तचा राजा तुरमाय राजाशी मैत्रीचे संबंध होते. विश्वशांतीसाठी म्हणजेच सर्व मानवजात व पशुपक्षी सुखी रहावेत यासाठी सदैव प्रयत्नशील असावे. याच उद्देशाने प्रेरीत होऊन सिमेलरील शेजारच्या राष्ट्रांना आपली निती प्रतिपादित केली. ” आपण घाबरु नका, भितीचे कारण नाही. अगदी निश्चिंतपणे रहा. माझ्याकडून सुख शांती प्राप्त करा. दुःखी होऊ नका. ” धौली लेखात स्पष्ट आदेश दिले आहेत. असे लिखित अभिवचन दिले आहे.
इ.स. पुर्व तिसर्या शतकातील सारनाथ येथे सापडलेली परदेशी व्यक्तीचे शिल्प. हे शिल्प बहुधा अशियायी पहलव किंवा शक व्यक्ती जी गंगेच्या खोर्यात आली असावी.
सम्राट अशोक यांच्या काळात ग्रीक राजदूत भारतात आल्याचा उल्लेख मिळत नाही; परंतु सम्राट अशोक यांचे सीरिया, इराक, इजिप्त इथल्या ग्रीक राजांशी वकिलातीद्वारे संबंध होते असं त्यांच्या शिलालेखांतून समजतं. सम्राट अशोक यांच्या गिरनार इथल्या तेराव्या शिलालेखात ‘अन्तियक’, ‘तुरमय’, ‘अंतेकिन’, ‘मग’ आणि ‘अलिकसुंदर’ या पाच ग्रीक राजांशी त्यांचा संपर्क असल्याचा उल्लेख येतो. संशोधकांच्या मते अन्तियक म्हणजे सिरियातील राजा ‘अँटिओकस थेओस’, तुरमय म्हणजे इजिप्तचा राजा ‘टोलेमी फिलाडेल्फस’, अंतेकिन म्हणजे मॅसेडोनियाचा राजा ‘अँटिगोनस’, मग म्हणजे सिरेन येथील राजा ‘मगस’ आणि अलिकसुंदर म्हणजे ग्रीसमधील कोरिन्थ किंवा इपिरस या ठिकाणी राज्य करणारा ‘अलेक्झांडर’. या वेगवेगळ्या पुराव्यांवरून २३०० वर्षांपूर्वी ग्रीस, पश्चिम आशिया, इजिप्त इथले ग्रीक राजे आणि भारतातील किमान पहिले तीन मौर्य सम्राट यांच्यात दूतावासाद्वारे संपर्क होता हे समजतं.
मौर्य साम्राज्याची उत्तर पश्चिम दिशेच्या परिसरातील राज्ये दाखवणारा नकाशा
सम्राट अशोक यांचे प्रसिद्ध शिलालेख पाकिस्तानातील शाहबाजगढी, मानसेहरा इथं आणि अफगाणिस्तानातील लाघमान, कंदाहार इथं सापडले आहेत. यातील अफगाणिस्तानातील लेख हे स्थानिक अरमाइक, ग्रीक भाषेत आणि अनुक्रमे त्याच लिप्यांमध्ये लिहिलेले आहेत. पाकिस्तानातील लेख प्राकृत भाषेत आणि खरोष्टी लिपीत लिहिलेले आहेत. पूर्व अफगाणिस्तान आणि पाकिस्तानचा भूभाग हा चंद्रगुप्त मौर्याच्या काळापासून मौर्य साम्राज्याचा भाग असल्यानं हे शिलालेख तिथं सापडतात यात नवल नाही.
युद्ध, व्यापार आणि विवाहसंबंध यांमुळे जेव्हा दोन संस्कृती एकमेकींच्या थेट संपर्कात येतात तेव्हा त्यांच्यात काही प्रमाणात देवाण-घेवाण होण्यास सुरुवात होते. अलेक्झांडरनंतर २५० वर्षं अफगाणिस्तानच्या, पाकिस्तानच्या प्रदेशात एकमेकींच्या संपर्कात आलेल्या ग्रीक आणि भारतीय या संस्कृतींचंदेखील असंच झालं. ग्रीक कलास्थापत्यातील काही घटक ग्रीक कारागिरांमुळे तत्कालीन भारतीय कलेत सामावले गेले. इराणी कलास्थापत्यातीलही काही घटक अफगाणिस्तान आणि पाकिस्तान यांच्या भागातील ग्रीकांच्या माध्यमातून याच काळात उत्तर भारतात आले.
त्याचबरोबर अफगाणिस्तानच्या, पाकिस्तानच्या प्रदेशातील ग्रीकांनी हळूहळू भारतीय संस्कृती, धर्म, भाषा, लिपी अंगीकारण्यास सुरुवात केली. २२०० वर्षांपूर्वीच्या अफगाणिस्तानात आणि पाकिस्तानात सापडणाऱ्या ग्रीक राजाच्या नाण्यांवर ग्रीक लिपी आणि भाषेखेरीज स्थानिक खरोष्टी किंवा ब्राह्मी या प्राचीन भारतातील दोन लिप्यांमध्ये आणि प्राकृत भाषेत लेख लिहिलेले आढळतात. ग्रीकांची भारतीय संस्कृतीत आणि समाजात एकरूप होण्याची ही सुरुवात होती.
सम्राट अशोक मनुष्य कल्याणासाठी झटत होते. त्यांच्या सर्व अधिकारी आणि कर्मचारी यांनी देखील सदैव मनुष्य आणि प्राणिमात्रांच्या कल्याणासाठी झटावे असे आदेश दिले होते. पशुपक्षांच्या कल्याणासाठी त्यांनी व्रजभूमीक नावाचे अधिकारी नियुक्त केले होते. त्यांनी साम्राज्यातील पशुपक्षांच्या सुखशांती साठी औषधालय स्थापन करून औषधी गुणयुक्त झाडांची लागवड करावी. विहीरी आणि पिण्याच्या पाण्यासाठी प्याऊ, प्राण्यांच्या पिण्याच्या पाण्यासाठी हौद, विश्रांमगृह सावलीसाठी रस्त्याशेजारी झाडांची लागवड करावी व त्यांची देखरेख करावी असे आदेश दिले होते. ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ यामुळेच विश्वकल्याण व शांती स्थापित होऊ शकेल यावर सम्राट अशोकाची श्रध्दा होती.
विश्वशांतीसाठी प्रयत्न करत असताना साम्राज्याला धोका निर्माण होऊ नये म्हणून त्यांनी शस्त्रांचा वापर अजिबात टाळला नाही. आपली सैनिकी शक्ती पुर्वी होती तीच पुढेही कायम ठेवली. त्यांच्या संरक्षण व्यवस्थेविषयी आपणांस कळून येईल की, ती सहा विभागात विभागली गेली होती. त्यावर राजाला मदत करण्यासाठी तीस सदस्यांची महासमिती होती. त्यानंतर सहा सैनिकी विभागांकरता सहा उपसमित्या होत्या. १) नौसेना २) साहित्य ३) पायदळ ४) अश्वसेना ५) रथसेना ६) हत्ती सेना. यावरुन सैनिकी क्षमता दिसून येते. सहा लाख पायदळ, तीन हजार घोडदळ, नऊ हजार हत्ती आणि तेवढेच रथ इतके बलाढ्य सैन्य असताना त्याची सुसंघटीत आणि शिस्तबद्ध रचना केली होती. त्यामुळे शत्रूची वाकडी नजर टाकण्याची हिम्मत होत नव्हती. या सैन्यबळावर व बुध्दिकौशल्यामुळे हे साम्राज्य संपूर्ण जंबुदिपात पसरले होते.
मौर्यकाळात विदेशी व्यापारात प्रगती :-
संपूर्ण भारताला एका सूत्रात गोवण्याचा प्रयत्न पहिल्यांदा मौर्य काळात झाला. राजकीय व्यवस्था एकाच सत्तेखाली येण्याचा हा काळ होता. या काळातील सक्षम राजकीय पार्श्वभूमीने व्यापार व उद्योगाच्या विकासात मोलाचे योगदान दिले.यावेळी सिरिया,इजिप्त तसेच इतर पाश्चात्य देशांशी भारताचे संबंध स्थापित झाले. ग्रीक-रोमन लेखकांनी भारताच्या सागरी व्यापाराविषयी लिहून ठेवले आहे.
बहुतेक मौर्य काळात असलेल्या नाण्याचा साठा
इ.स.पुर्व तिसर्या शतकातील मौर्य काळातील हत्ती आणि चक्राचा ठसा असणारी चांदीची नाणी
कमानीचा ठसा असणारी मौर्यकालीन नाणी
सुमारे इ.स.पुर्व दुसर्या ते चौथ्या शतकातील मौर्यकालीन नाणी
सुमारे इ.स.पुर्व २०७ ते १९४ या काळातील मौर्य सम्राट सालीसुक याच्या काळातील नाणे
एरियनच्या म्हणण्यानुसार भारतीय व्यापारी आपला माल विकण्याकरिता ग्रीसच्या बाजारात जात असत. व्यापारी जहाजांची निर्मिती करणे हा त्याकाळातील प्रमुख उद्योग होता. विदेशातील व्यापाऱ्यांच्या संरक्षणाचे कार्य नवाध्यक्ष आणि पणाध्यक्ष नावाचे अधिकारी करीत असत असे अर्थशास्त्र या कौटिल्याच्या ग्रंथात लिहिलेले आहे. विदेशी सार्थवाह भारताच्या उत्तर-पश्चिमी व्यापारी मार्गावरून व्यापार करीत आल्याचे उल्लेख आढळतात. मौर्य काळात भारत व इजिप्तमधील व्यापार उन्नत अवस्थेत पोचला होता. टोलेमी या इजिप्तचा राजाने या व्यापाराला प्रोत्साहन देण्याकरिता लाल समुद्राच्या किनाऱ्यावर ’ बरनीस ‘ नावाचे एक बंदर निर्माण केले होते. तेथून इजिप्तच्या सिकंदरिया या विख्यात बंदरापर्यंत जाण्याकरिता तीन जमिनीवरील मार्ग उपलब्ध होते.
प्राचीन काळात समुद्र मार्गे व्यापार चालत असे त्या अर्थी जहाजांच्या संरक्षणाची व्यवस्था असणारच, पण त्याचे भक्कम पुरावे मिळत नाहीत. त्यामुळे भारतीयांचे पहिले आरमार बाळगाण्याचा मौर्य साम्राज्याकडे जातो. चंद्रगुप्त मौर्याच्या संरक्षण खात्याचे एकूण सहा विभाग होते व त्यातील पहिलाच विभाग हा आरमारी विभाग होता. या विभागाचे ५ अधिकारी होते आणि ते आरमार प्रमुखाशी संलग्न रहात असत. या आरमाराचे मुख्य काम समुद्री सीमा, नद्यांची मुखे, नद्या आणि तळी यांच्यावर लक्ष ठेवणे हे असे. हे आरमार समुद्री चाच्यांचा बंदोबस्त करीत असे. हे आरमार श्रीलंकेपर्यंत तर जात असेच, पण अगदी इजिप्त, सिरीया येथपर्यंतही पोहचत असे. मौर्यांच्या आरमाराची बंदरे भारताच्या पूर्व आणि पश्चिम या दोन्ही किनारपट्टीवर होती.
मौर्यांच्या नौदलाचे उल्लेख अशोकाच्या शिलालेखामध्येही आढळतात. मौर्यांच्या नंतर सातवाहन राजांचे मोठे आरमार असल्याचे उल्लेख मिळतात. सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी याचा मुलगा पुळूमावी याचे शक्तीशाली आरमार होते. पुळूमावीच्या काळातील चलनी नाण्यांवर दोन शिडांच्या जहाजाचे चित्र असलेले दिसते. सातवाहनकाळात भारताचा व्यापार खाडीतले देश आणि अगदी इजिप्तशीही चालायचा.
सातवाहनांच्या नंतर दक्षिण भारतात होवून गेलेल्या पल्लव राजांचेही शक्तीशाली आरमार होते. पल्लव घराण्यातील नरसिंहवर्मन या राजाने श्रीलंकेवर आक्रमण करून तो देश ताब्यात घेतला होता.
भारतीय आरमाराची ही परंपरा पुढेही चालूच राहिली. चालुक्य, राष्ट्रकुट, चोल, शिलाहार या सगळ्यांच्या राजवटीत त्यांची-त्यांची आरमारे होती. चालुक्य सम्राट पुलकेशी दुसरा याच्या आरमारात किमान १०० जहाजे होती. त्याने ओरिसातील पुरी शहरावर समुद्रमार्गे आक्रमण केल्याचे उल्लेख मिळतात. पुलकेशी दुसरा याचा नातू विनयादित्य याने लंकेवर आक्रमण करून तेथील राजाला पराभूत केले होते. विनयादित्या प्रमाणेच राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तिसरा यानेही लंकेवर हल्ला करून लंकेच्या उत्तर भागावर आपले राज्य स्थापन केले होते.
मौर्य काळात दक्षिण भारतातील राज्ये
सम्राट अशोकाच्या शहाबाझगढी, काल्सी, मनेसर आणि गिरनार येथील दुसर्या शिलालेखामध्ये असलेल्या उल्लेखानुसार मौर्य साम्राज्याचा विस्तार दाखवणारा नकाशा
अशोकाचा कलिंग विजय आणि युद्धानंतरची परिस्थिती :-
इ.स. पूर्व २६९ साली बिंदूसाराच्या मृत्यूनंतर ४ वर्षांनी अशोकाचा विधिवत राज्याभिषेक झाला.अशोकाच्या शासनकाळातील सुरवातीच्या वर्षात काय झाले याबाबत कोणताही ठोस पुरावा मिळत नाही.
१. देवानां प्रियस्य अशोकस्य.
कलिंग युद्धापूर्वी ९ वर्षाच्या शासनकाळात विशेष अशी काही घटना घडलेली दिसत नाही.(९ वर्ष ही २६९ साली राज्याभिषेक झाल्यापासून. बिंदूसाराच्या मृत्यूपासून बघायची झाली तर १३ वर्ष.) फक्त या काळात कधीतरी अशोकाने स्वतःस 'देवानां पिय पियदस्सी राजा' ही पदवी लावून घेतली. याचा अर्थ देवांना प्रिय असलेल्या प्रियदर्शी राजा असा होतो. अशोकाला समकालीन असणाऱ्या पतंजलीने या पदाचा अर्थ चिरंजीव, आयुष्यमान, श्रीमान असा सांगितला आहे.
२. कलिंग देश
अशोक सम्राट बनल्यापासून त्याने केलेल्या साम्राज्यविस्ताराचा जो पहिला आणि शेवटचा उल्लेख मिळतो तो म्हणजे कलिंग युद्ध. (त्याने इतर काही भाग जोडलेले उल्लेख आहेत पण त्या दंतकथा आहेत.)
कलिंग राज्य हिंदुस्तानाच्या पूर्व भागात ओरिसाच्या जवळ होते. पूर्वेला बंगालचा उपसागर, पश्चिमेस पूर्वघाट, दक्षिणेस गोदावरी नदी आणि उत्तरेस महानदी अशा त्याच्या सीमा होत्या. कलिंगच दुसरं नाव 'स्त्रि-कलिंग' असेही होते. राज्याची राजधानी 'राजपूर'(बौद्ध ग्रंथानुसार सिंहपूर) होती. लोकांची धर्मनिष्ठा, शौर्य, शिल्प, वाणिज्य यांसाठी हा देश प्रसिद्ध होता.
३. कलिंग युद्ध व भयंकर प्राणहानी.
चंद्रगुप्ताला, बिंदूसाराला जे जमले नाही असा कलिंग वर विजय अशोकाने मिळवून दाखवला. ही गोष्ट अशोकाच्या राज्यरोहणापासून १३ वर्षांनी म्हणजे इ. स. पूर्व २६१ रोजी घडली. अशोकाने लिहून घेतलेल्या एका गिरिलेखात युद्धाचा असा उल्लेख आहे की,
"देवांचा प्रिय राजा याने राज्याभिषेकाला ८ वर्षे होऊन गेल्यावर कलिंग देश जिंकला. तेव्हा दीड लाख लोक कैद करण्यात आले, एक लक्ष लोकांना मारण्यात आले आणि या संख्येच्या अनेक पट लोक प्राणास मुकले."
यात 'लोकांना मारण्यात आले' म्हणजे युद्धादरम्यान मारण्यात आलेले सैनिक,लोकं. 'अनेक पट लोक प्राणास मुकले' म्हणजे कदाचित युद्धा नंतरच्या परिणामांना बळी पडलेले लोक. परिणाम म्हणजे दुष्काळ, महामारी, साथीचे रोग. कलिंग देशावर स्वारी करून ते आपल्या साम्राज्याला जोडताना झालेल्या युद्धात साधारणतः एक लाख लोक मारले गेले. दीड लाखापेक्षा जास्त युद्धकैदी झाले.
व्हिन्सेंट स्मिथ याबद्दल म्हणतो की,
"His(ashoka's) arms were successful and the kingdom(kalinga) was annexed to the empire."
म्हणजे, अशोक विजयी झाला आणि कलिंग देश मगध साम्राज्याला जोडला गेला.
४. युद्धाचे परिणाम.
कलिंग येथील प्राणहानीमुळे अशोकाच्या मनावर विलक्षण परिमाण घडला व त्यामुळे त्याच्या चरित्राबरोबरच हिंदुस्तानाच्या इतिहासात परिवर्तन घडून आले.
या बाबतीत व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतो,
"The horrors which must accompany war, even successful war, made a deep impression on the heart of the victorious monarch."
थोडक्यात, युध्दासोबतच झालेल्या प्रचंड हानिमुळे युद्ध जिंकूनही विजयी सम्राट अशोकाचे मन द्रवले.
कलिंग युद्धाचे ३ परिणाम झाले.
-- पहिला परिणाम - पुढील आयुष्यात अशोकाने युद्धाचे नाव काढले नाही.
-- दुसरा परिणाम - प्रजेला भोगावे लागणारे अत्याचार, जुलूम बंद व्हावेत यासाठी अशोकाने सक्तीचे हुकूम सोडले.
दुसऱ्या परिणामाविषयी थोडी अजून माहिती.
आज कलिंग प्रदेशात जौगाड व धौली या ठिकाणी अशोकाचे २ शिलालेख सापडले आहेत. कलिंग राज्य खालसा केल्यावर आपल्या हातून धोर अन्याय घडला अशी टोचणी अशोकाच्या मनात लागून राहिल्यामुळे यापुढेतरी आपल्या अंमलाखाली कलिंग प्रजेला सुख लागावे व अधिकारी वर्गाकडून त्यांच्यावर अत्याचार होऊ नयेत म्हणून त्याने कलिंग प्रांतासाठी जास्त सवलतीची अशी शासन पद्धती योजून तिच्या संबंधाचे हुकूमवजा दोन गिरिलेख जौगाड व धौली या ठिकाणी जाहीर केले आहेत. या आदेशाच्या अंमलबजावणीसाठी त्याच प्रदेशातील पुरी तालुक्यातील तोसली या ठिकाणी त्याने राजप्रतिनिधी नेमला होता.
१.जौगाड येथील शिलालेख.
२.धौली येथील शिलालेख
-- तिसरा परिणाम - अशोकाचा बौद्ध धर्म स्वीकार.
१. अशोकाचा बौद्धधर्माचा स्वीकार.
मौर्य वंशाचा चक्रवर्ती सम्राट अशोक याच्या कारकिर्दीत मौर्य वंशाचा प्रचंड विस्तार झाला. मात्र युद्ध आणि त्यातील रक्तपात यातील फोलपणा समजल्यानंतर अशोकाने बुद्धाचा शांतीचा मार्ग अनुसरला. केवळ बौद्धधर्माची दीक्षा घेऊन तो थांबला नाही तर त्याने आपला मुलगा महेंद्र आणि मुलगी संघमित्रा हिला श्रीलंकेला बौद्ध धर्माच्या प्रसारासाठी पाठवले. तेथील राजा तिसा यानेही बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला. पश्चिम आशिया, ग्रीस, नैऋत्य आशिया येथेही सम्राट अशोकाने आपले अनेक धर्मप्रसारक पाठवले. मौर्य वंशाच्या महत्त्वपूर्ण शासकांमध्ये चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार आणि सम्राट अशोक यांचा समावेश होतो. चंद्रगुप्त मौर्याने तामिळनाडू आणि वर्तमानकाळातील ओडिशा हे भाग वगळता भारतातील सर्व महाद्वीपांवर शासन केले. चंद्रगुप्ताने सिकंदरचा शक्तीशाली शासक सेल्युकस निकेटरला पराभूत करून त्यानंतरच्या तहानुसार त्याची मुलगी हेलनाशी विवाह केला. त्यामागे सशक्त साम्राज्य निर्माण करणे आणि त्याच्या साम्राज्याशी मैत्रीपूर्ण संबंध ठेवणे हा हेतू होता. त्यामुळे भारतीयांना पश्चिमी देशांबरोबर व्यापार करणे सोपे झाले.
सम्राट अशोकाचे ४० अभिलेख आतापर्यंत अवगत झाले आहेत. जे प्रामुख्याने ब्राह्मी लिपीत, खरोष्टी आणि ग्रीक भाषेत लिहिले गेले आहेत. सम्राट अशोकाचा बराचसा इतिहास या अभिलेखांतून प्रतीत होतो. इराणचा शासक डेरियस याच्याकडून प्रेरणा घेऊन अशोकाने हे अभिलेख तयार केल्याचे मानले जाते.
सम्राट अशोकाने भगवान बुद्धाच्या मानवतावादी संदेशाने प्रभावत होऊन बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला व त्याचा जगभर प्रसार केला. त्याच्या काळात बौद्ध धर्म हा अखंड भारताचा राजधर्म होता. अशोकाने आपला मुलगा महेंद्र व मुलगी संघमित्रा यांना श्रीलंकेत पाठवून तेथे बौद्ध धर्माचा प्रसार केला. तिसा या तेथील राजानेही बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला. पश्चिम आशिया, ग्रीस, आग्नेय आशिया येथेही अशोकाने आपले अनेक धर्मप्रसारक पाठवले. त्याने बुद्धाच्या स्मरणार्थ अनेक स्तंभ बांधले, जे आजही त्यांच्या जन्मस्थळी नेपाळमधील लुम्बिनीत मायादेवी मंदिराजवळ, सारनाथ, बोधगया, कुशीनगर तसेच श्रीलंका, थायलंड, चीन या देशांत ‘अशोकस्तंभ’ या स्वरूपात पाहायला मिळतात. सम्राट अशोक आपल्या संपूर्ण कारकिर्दीत एकही युद्ध हरला नाही. इतका यशस्वी सम्राट असूनही युद्धाने, त्यामधील रक्तपाताने होणारी मनुष्यहानी बघून त्याचे मन हेलावले आणि शांतीचा, करुणेचा संदेश देणारा बौद्ध धर्म त्याला जवळचा वाटला. माणसाला युद्धाने नव्हे तर प्रेमाने जिंकता येते, हे त्याला समजले आणि त्याने बौद्ध धर्म केवळ स्वीकारलाच नाही तर जगभर त्याचे अनुयायी घडवले.
अशोकाच्या वेळी बौद्ध धर्म त्याच्या शुद्ध स्वरूपात होता आणि निरनिराळ्या धर्मप्रचारकांकडून तो उपदेशिला जात होता. मगधराज्यात असा कोणताही प्रदेश नव्हता जेथे बौद्ध भिक्षूंचा व धर्मप्रचारकांचा प्रवेश झाला नव्हता. त्यामुळे कलिंगयुध्दाच्या आधी अशोकाची बौद्ध धर्माशी ओळखच झाली नव्हती असं आपण म्हणू शकत नाही. पुढे कलिंगयुद्धावेळी विजयानंतर झालेल्या प्राणहानीमुळे अनुतप्त झालेल्या अंतःकरणाला शांती देण्यासाठी भूतदयाप्रधान बौद्ध धर्मासारखा धर्मच अत्यंत योग्य असल्यामुळे अशोकाच्या मनावर या धर्माची छाप पडली आणि त्याने बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला.
बौद्ध धर्माचा स्वीकार करणं म्हणजे आता कधीच शस्त्र धरायचं नाही असं नक्कीच नव्हतं. शेवटी अशोक एक राजा होता. आपल्या राज्याच्या सीमा सुरक्षित ठेवणं हे बौद्ध धर्म स्वीकारण्याऐवढंच महत्वाचं होतं हे त्याला नक्कीच माहीत असेल.
व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतो की,
"All that we know about his life indicates that once he had begun to devote himself to the love, protection and teaching of the law of Piety, or dharma, he never again allowed himself to be tempted by ambition into an unprovoked war."(Page 26)
म्हणजेच, त्याच्या आयुष्याबद्दल आपल्याला जे काही माहित आहे ते हे दर्शविते की जेव्हा त्याने प्रेम, संरक्षण, धर्म आणि धर्मातील शिकवणीस स्वत: ला समर्पित केले, तेव्हा त्याने स्वतःस कधीही बिनआगळिकीच्या युद्धाची महत्वाकांक्षा बाळगण्याची परवानगी दिली नाही. पुरावे नसले तरी आपण असे म्हणू शकतो की कलिंगयुद्ध हे त्याच्या आयुष्यातील पाहिलं युद्ध नाही तर शेवटचं युद्ध होतं.
वर म्हटल्याप्रमाणे कलिंगयुद्धापूर्वी सुद्धा अशोकाने बौद्ध धर्माची दीक्षा घेतली होती. ते साल इ.स. पूर्व २६५ होतं म्हणजे युद्धापूर्वी साधारण अडीच वर्ष आधी. परंतु त्या वेळची बौद्ध धर्मविषयीची अशोकाची आस्था विशेष नसावी. कलिंग युद्धाने त्याचे मन वळविले. कलिंग देशावर मिळवलेल्या विजयानंतर त्या युद्धात झालेली प्रचंड हानी पाहुन उद्विग्न झालेल्या सम्राट अशोकाने बुद्धांचा संदेश जनमानसांपर्यँत पोहचवण्याचा शेवटपर्यँत प्रयत्न केला. अशोकाची पत्नी विदिशा हि बुद्ध धम्माचे पालन अगोदर पासुनच करत होती. जगातील एकमेव सम्राट असा असेल की ज्याने तलवार म्यान केल्यावर सुद्धा त्याचे राज्य हे वाढतच गेले. सम्राट अशोक हा असा एकमेव राजा होता की त्याने सर्वप्रथम मनुष्यां सोबतच प्राण्यांचे देखील दवाखाने उभे केले. सम्राटाने त्याच्या प्रजेसाठी काही नियम केले ते सर्व नियम आजही आपल्याला त्याच्या शिलालेखांतून वाचायला मिळतात. आपल्या शिलालेखांत वडीलधारे मंडळी,श्रमण,ब्राम्हण यांच्या सोबत आदराने वागायला सांगितले.कोणीही भ्रष्टाचार करू नये म्हणुन प्रत्येक विभागात एका अमात्याची नेमणुक केली.रस्त्याच्या दुतर्फा झाडे लावली,पाणपोई निर्माण केल्या. बुद्धांच्या दोनशे वर्षां नंतर सम्राट अशोकाचा काळ येतो तोवर या भुमीतून बुद्ध धम्म नष्ट होत चाललेला. बुद्धांचे जन्मस्थळ लुंबिनी येथे एक शिलालेख लिहुन ठेवला कि याठिकाणी सिद्धार्थ गौतमाचा जन्म झाला असल्याने लुंबीनी ग्राम मधील सर्व नागरिकांना कर माफी केली.तसेच बुद्धांचे अस्थी धातु स्तुपांतून काढुन त्या सर्व अवशेषांवर ८४००० स्तुपांची निर्मिती केली. आज या स्तुपांपैकी सांची येथील स्तुप आपल्याला ज्ञात आहेत.व्यवस्थित संशोधन केल्यास अनेक स्तुपांची माहिती आजही मिळु शकते. अशोकाने २५६ दिवस धम्मयात्रा केली. श्रमण आजीवकांसाठी बिहार येथील बाराबर या ठिकाणी भारतातील पहिली लेणी कोरली. बुद्ध धम्माने सर्व मानवांचे कल्याण व्हावे यासाठी स्वतःची मुलगी संघमित्रा व मुलगा महामहेंद्र यांना सिरीलंकेत बुद्ध गयेतील बोधी वृक्षाची फांदी घेऊन पाठवले आजही श्रीलंकेतील अनुराधापुर येथे तो बोधिवृक्ष आहे.
बौद्ध ग्रंथ आणि दंतकथा बघितल्या तर 'उपगुप्त' नावाचा आचार्य आणि 'श्रमण निग्रोध' नावाच्या अधिकाऱ्याच्या मदतीने अशोकाने बौद्ध धर्माची दीक्षा घेतली.
अशोकाने बौद्ध धर्म स्वीकारल्यानंतर त्यासंबंधी ३ मोठे निर्णय घेतले. १) हिंदू धर्मातील वर्ण व्यवस्था काढून टाकली. २ ) प्राणी जीवनाच्या पावित्र्याचा आदर केला. ३ ) पालक, वडीलधाऱ्या माणसांचा आदर करण्याच्या श्रद्धेला फार मोठे स्थान दिले.
२. धर्मयात्रा
स्तंभ आणि शिलालेखांतून दिसून येतं की अशोकाने त्याची धर्म यात्रा इ.स. पूर्व २४९ रोजी म्हणजे राज्याभिषेकानंतर २१व्या वर्षी आणि कलिंग युद्धानंतर साधारण १२ वर्षांनी सुरू केली.
१ ) सर्वप्रथम त्याने नेपाळ मधील तराई प्रांतातील बौद्ध जन्मस्थानाचे दर्शन घेतले. २ ) नेपाळ तराई येथीलच कपिलवस्तू(तिलौरा कोट) यालाही भेट दिली. बुद्धाचे बालपण ज्या स्थानी गेले ते स्थान. ३ ) बोधी वृक्ष असलेले गया. ४ ) ऋषीपट्टण/सारनाथ. ५ ) श्रावस्ती (बौद्ध ज्या ठिकाणी दीर्घ काळ राहिला ते स्थान.) हे सध्या औंध प्रांतातील राप्ती नदीच्या काठी असलेले सहात-महात असावे असं व्हिन्सेंत स्मिथ म्हणतो. (पान - ४१ ) ६ ) बुद्धाचे मदुत्युस्थान कुशीनगर.
३. धर्मप्रसार
अशोकाने बौद्ध धर्माचा प्रसाराचे काम फार नेटाने केले. त्याने अगदी जंगली लोकांपासून मगध राज्यातील दूरदूरच्या प्रांतात आणि त्याच बरोबर आशिया, युरोप व उत्तर आफ्रिका वगैरे खंडात धर्म प्रसार केला.
अ ) भारताबाहेरील धर्मप्रसार १ ) सीरियाच्या बादशहकडे आणि पश्चिम आशियात. २ ) टॉलेमी फिलाडेफस, इजिप्तच्या शाहच्या प्रदेशात. ३ ) उत्तर आफ्रिकेतील राजा मॅगस याच्या प्रदेशात. ४ ) मेसिडोनियात. ब ) भारतातील धर्मप्रसार देश (भाग) - धर्मप्रचारकाचे नाव १) काश्मीर - मज्झन्तिक २) गांधार - मज्झन्तिक ३) महिश्मंडल(म्हैसूर) - महादेव ४) वनवासी(उत्तर कन्नड) - रक्षित ५) अपरांतक(उत्तर कोंकण) - योन धर्मरक्षित ६) महाराष्ट्र - महा धर्मरक्षित ७) योन(सरहद्द प्रांत) - महारक्षित ८) हिमवंत(हिमालय) - कश्यप, सहदेव ९) सुवर्णभूमी(पेगु आणि मूलमेन)- सोन आणि उत्तर १०) सिंहलद्वीप (लंका) - महेंद्र (मुलगा)
अशोकाचा हा बौद्ध धर्मप्रसार अतिशय यशस्वी झाला होता हे व्हिन्सेंट स्मिथ, जनरल कनींगहॅम सारखे पाश्चात्य इतिहास संशोधकही मान्य करतात.
ते म्हणतात की सम्राट अशोकामुळेच बौद्ध धर्माचा विस्तार प्रत्यक्षित आणि अप्रत्यक्षितरीत्या भारत, सिलोन प्रमाणेच बर्मा, कंबोडिया, चायना, कोरिया, जपान, मंगोलिया, तिबेट सारख्या देशांत झाला.
अशोकाचा परिवार आणि मृत्यू
अशोकाचा परिवार
अशोकाच्या परिवारसंबंधात त्याच्या शिलालेख, स्तंभलेख तसेच बौद्धग्रंथांतून फार थोडी माहिती मिळते.
अ ) अशोकाच्या राण्या.
साधनांतून असे कळू शकते की अशोकाला ५ राण्या होत्या.
१.देवी - बौद्ध ग्रंथात असा उल्लेख येतो की उजैनी मध्ये राजप्रतिनिधी असताना अशोकाचा श्रेष्ठी जातीच्या 'देवी उर्फ विदिशा महादेवी शक्यकुमारी' नावाच्या एका स्त्रीशी प्रेमसंबंध होता आणि त्यांना एक संतती सुद्धा होती.
२. असंधीमित्रा - ही अशोकाची पट्टराणी होती.
३. कारुवाकी - अशोकाच्या एका लेखात त्याची 'दुसरी राणी' कारुवाकीचा उल्लेख येतो.
४. पद्मावती.
५. तिष्यारक्षिता.
आ ) अशोकाचे पुत्र आणि कन्या.
पुत्र
१. महेंद्र(महिंद) - देवी चा मुलगा. अशोकाने याला बौद्ध धर्मप्रसारासाठी लंकेत पाठविले. (व्हिन्सेंट स्मिथ महिंद्राला अशोकाचा भाऊ मानतो.)
महेंद्र अशोकाचा मुलगा होता की भाऊ हे आपण स्पष्ट सांगू शकत नाही. परंतु या संबंधी आपण तर्क लावू शकतो. ते असे,
अ) महेंद्र जर पहिला मुलगा म्हणजेच भावी सम्राट असता तर अशोकाने त्याला राज्यात ठेवण्याऐवजी लांब लंकेत धर्माच्या कामाला का पाठवले असते? त्यासाठी दुसऱ्या कोणा राजकुमाराला का पाठविले नाही? अशोकाने जरी बौद्ध धर्म स्वीकारून कधीही युद्ध न करण्याचा निर्णय घेतला असला तरी एका राजाने आपल्या राज्याचं रक्षण केलं पाहिजे आणि त्यासाठी शस्त्र उचलावं लागलं तरी उचलायचं हे तो जाणून होता. त्यामुळे अशोक राज्याच्या युवराजाला राज्याबाहेर पाठवेल असं वाटत नाही. व्हिन्सेंट स्मिथ यांचेही असेच विचार आहेत की महेंद्र हा मुलगा नसून भाऊ असावा.
ब) काही इतिहासकार मानतात की महेंद्र हा मुलगाच असावा. कारण अशोकाच्या साम्राज्याचे ४ मोठे भाग होते. तक्षशिला, उजैनी, सुवर्णगिरी, तोसली. चंद्रगुप्ताच्या काळापासून अशा मोठ्या विभागावर राजप्रतिनिधी म्हणून युवराजांना पाठविण्यात येत असे. महेंद्र धरून अशोकाचे ४ पुत्र होतात व अशोकाच्या काळात राज्याचेही ४ मोठे भाग होते त्यामुळे महेंद्र हा अशोकाचा मुलगाच असावा असं काही इतिहासकारांचे मत आहे.
२. तीवर.
हा कारुवाकी या अशोकाच्या दुसऱ्या राणीचा मुलगा होता. 'द्वितीया देवी तीवरमाता कारुवाकी' असा एक लेखात उल्लेख येतो यावरून तीवर नावाचा मुलगा होता हे समजते.
३. कुणाल
पद्मावती राणीचा मुलगा. याच्या २ मुलांनी दशरथ आणि सांप्रतिने अशोकानंतर राज्यकारभार पाहिला.
४. जलौक
कन्या
१. संघमित्रा - महेंद्र बरोबर ही सुद्धा लंकेत बौद्ध धर्म प्रसाराला गेली.
२. चारुमती - ही देवपाल नावाच्या नवऱ्याबरोबर नेपाळ मध्ये देवपाटन ला गेली आणि तिथेच वारली.तिच्या स्मरणार्थ अशोकाने तिकडे ४ स्तूप बांधले असं म्हणतात.
(इकडे आपण एक लक्षात घेतले पाहिजे की अशोकाची राणी कारुवाकी आणि तिचा मुलगा तीवर या दोघांचाच फक्त अशोकस्तंभांत, लेखांत वगैरे उल्लेख येतो. बाकी सगळ्यांचा उल्लेख बौद्ध ग्रंथांतून आणि दंतकथांतून येतो.)
अशोकाचा मृत्यू.
अशोकाचे अखेरचे दिवस व मृत्यू यांविषयी अशोकाच्या कोणत्याही लेखात उल्लेख येत नाही. जो उल्लेख येतो तो बौद्ध ग्रंथांतून येतो.
बौद्ध ग्रंथांनुसार अशोकाचा मृत्यू वार्धक्याने झाला.
बौद्ध ग्रंथांमध्ये अशी कथा येते की, एकदा अशोक आपले गुरू आचार्य उपगुप्त यांच्याबरोबर चर्चा करत असताना त्याला कळले की जगात सर्वात जास्त दान करणारा माणूस आपण नाही. त्यामुळे त्याने १०० कोटी सुवर्णमुद्रा दान करण्याचा निर्णय घेतला. हे दान सरकारी खजिन्यातून जाऊ लागले. राजा एवढे खर्च करतोय आणि ते पण सरकारी खजिन्यातून! हे पाहून अनेक मंत्री बिथरले आणि अशोकाचा नातू सांप्रतीकडे(कुणालचा मुलगा) गेले. आणि नंतर सांप्रतिच्या आज्ञेवरून हे दान थांबवण्यात आले. गेलेल्या पैशांची परतफेड होण्यासाठी मंत्र्यांनी अशोकाला अप्रत्यक्षरीत्या छळण्यास सुरवात केली. उदाहरणार्थ, अशोक नेहमी सोन्याच्या ताटातून जेवायचा. हळू हळू त्याला चांदीच्या ताटातून आणि मग मृत्तिकापात्रांतून जेवण जाऊ लागले. तरी बौद्ध धर्म स्वीकारलेला अशोक काहीच बोलला नाही. आणि मग पुढे त्याचा मृत्यू झाला.
अशोकानंतर मगध राज्य त्याच्या २ नातवंडांत, दशरथ आणि सांप्रती यांच्यात वाटले गेले आणि पुढे ५० वर्षांतच मौर्य साम्राज्याचा शेवट झाला.
मौर्य-कला
भारतीय कलेच्या इतिहासातील एक महत्त्वाचा कालखंड. इ. स. पू. चौथ्या शतकाच्या अखेरीस भारतातील प्राचीन मगध देशात मौर्य वंश उदयास आला. या वंशातील राजांनी इ. स. पू. ३२१ ते १८५ दरम्यान भारत खंडाच्या बहुतेक भागावर राज्य केले आणि प्रथमच एकछत्री अंमल प्रस्थापित केला. या काळाला मौर्य काल ही सर्वसाधारण संज्ञा देतात. या काळाशी संबंधित जे कलेचे प्रकार निर्मिले गेले, त्या कलाविष्कारांना प्रातिनिधिक स्वरूपात ‘मौर्य कलाʼ असे संबोधले जाते. या संबोधनाला राजकीय संदर्भासोबतच भौगोलिक पार्श्वभूमीसुद्धा आहे. या काळात कलेचे जे विविध प्रकार विकसित झाले, ते मोठ्या प्रमाणात गंगा-यमुनेच्या दोआबात पाहायला मिळतात. त्यासोबतच या कलेचा या प्रदेशाला लगत असलेल्या प्रदेशावरील आनुषंगिक प्रभाव समकालीन काळात आणि त्यानंतरच्या काळात अवशिष्ट स्वरूपात दृग्गोचर होतो. भारतीय कलेतिहासात हा कालखंड महत्त्वाचा टप्पा मानला जातो. या काळातील कलाविष्कारांचा व कलात्मक उंचीचा संबंध द्वितीय नागरीकरणाशी (Second Urbanization) जोडला जातो. किंबहुना या दोन्ही गोष्टी परस्परसंबंधातूनच विकसित होत होत्या, असे विश्लेषण काही विद्वान करतात. या कलेची वैशिष्ट्ये सूक्ष्म निरीक्षणांती कलातज्ज्ञांनी निर्धारित केली आहेत. ही निर्धारित केलेली वैशिष्ट्ये ज्या कलावस्तूमध्ये याअगोदर आढळली किंवा आढळतात, त्या कलावस्तूंना मौर्यकालीन वा मौर्य काळाचा प्रभाव असलेल्या कलावस्तू असे वर्गित केले जाते.
इ.स.पुर्व तिसर्या शतकातील पाकिस्तानात सापडलेला मौर्यकालीन वर्तुळाकार दगड ज्यावर उभ्या असलेल्या देवता कोरलेल्या आहेत
मौर्य कला ढोबळमानाने मौर्यपूर्व काळ, विकसित मौर्य काळ आणि उत्तर मौर्य काळ अशा तीन कालखंडांत विभागली आहे. हा कालक्रम कलेच्या स्वरूपासोबतच तत्कालीन इतर पुराव्यांवर बेतलेला आहे. विशेषत: अभिलेख आणि साहित्यिक उल्लेख. तसेच या काळातील दुसरे महत्त्वाचे लक्षण म्हणजे या काळातील काही कलाप्रकार प्रत्यक्ष राजकीय पाठबळाने विकसित झाले. भारतीय कला-इतिहासात प्रत्यक्ष राजकीय सहभागाचा पुरावा मौर्य काळापासूनच पाहायला मिळतो. त्यामुळे राजकीय पाठबळाच्या माध्यमातून निर्मित झालेल्या कलावस्तू आणि इतर कलाप्रकार असे मौर्यकालीन कलेचे ढोबळ वर्गीकरण करता येते. धौली येथील हस्तिशिल्प (ओडिशा). या काळातील कलेचे मुख्यत: स्थापत्य, मृण्मय आणि शिल्पकला असे प्रकार आढळतात. मौर्यकालीन कलावस्तू सापडलेल्या महत्त्वाच्या स्थळांमध्ये बुलंदी बाग, कुम्रहार, पाटना, राजगृह, वैशाली, कौशांबी, श्रावस्ती, सारनाथ, सांची, बोधगया, धौली, जौगढ, शिशुपालगढ, विदिशा इ. स्थानांचा उल्लेख करता येईल. यांव्यतिरिक्त बाराबर व नागार्जुनी ही दोन स्थळे. लेणीस्थापत्य, लौरीया अरराज, लौरीया नंदनगढ, सारनाथ, सांची, गोटीहवा, प्रयागराज (अलाहाबाद), वैशाली, रामपूर्वा, संकीसा, लुंबिनी, दिल्ली इ. ठिकाणी मौर्यकालीन स्तंभ (अशोकस्तंभ) आजही पाहायला मिळतात. यांतील काही स्तंभांवर मौर्य सम्राट अशोकाचे लेख आहेत, ज्यांना ‘स्तंभ लेखʼ म्हणून ओळखले जाते. सोबतच या स्तंभांच्या शीर्षस्थानी विविध प्राण्यांचे शिल्पांकन आढळते. अशाच प्रकारच्या शिल्पांकनातील सारनाथ येथे उत्खननात मिळालेले चार सिंहांचे शिल्प आणि त्यावरील चक्र भारतीय राज्यघटनेने भारताच्या सार्वभौमत्वाचे प्रतीक म्हणून स्वीकारले आहे.
मौर्य काळात बांधला गेलेला सांची येथील स्तुप
इ.स. पुर्व तिसर्या शतकातील मौर्य काळातील बाराबर येथील लोमश ऋषी गुंफा
इ.स. पुर्व तिसर्या शतकातील सहा मीटर व्यासाच्या स्तुपाशेजारी पडलेले छत्र,
मौर्य काळात भगवान बुध्दांचे अवशेष मध्यभागी ठेवून सांचीचा स्तुप उभारला गेला, त्याचा नक्षीदार स्तंभ श्रूंग काळात बांधला गेला तर सजावट असलेली प्रवेशद्वारे सातवाहन काळात उभारली गेली
यक्षशीला येथील मौर्यकालीन विद्यापीठ
सम्राट अशोकाने बांधलेला असावा अशी शक्यता असणारा सध्या पाकिस्तानात असणारा तक्षशीला येथील स्तुप
सम्राट चंद्रगुप्त याचे जिथे निधन झाले असे मानले जाते ती श्रवणबेळगोळ येथील भद्रबाहु गुंफा
मौर्य काळामध्ये स्तंभ आणि त्यावरील शीर्ष प्राणिशिल्पांसाठी चूनार (उत्तरप्रदेश) येथील खाणींमधून विशिष्ट रंगछटेचा वालुकाश्म दगड मोठ्या प्रमाणात वापरला जात होता. स्तंभ आणि त्यांवरील प्राणिशिल्पांकन एकाच ठिकाणी तयार करून हे शिल्पखंड गंगानदीच्या प्रवाहाच्या साहाय्याने एका ठिकाणांहून दुसऱ्या ठिकाणी वाहून नेले जात असे. वैशाली येथील अशोकस्तंभ (बिहार). या काळातील शिल्पांवर एक विशिष्ट प्रकारची चकाकी आढळते. ही चकाकी प्रथमदृष्टीत धातुसदृश भासते. अशा प्रकारची चकाकी प्रामुख्याने मौर्य काळातील कलावस्तूंवर मोठ्या प्रमाणात आढळते. त्यामुळे दगडाला चकाकी देण्याचे तंत्र त्या काळी मोठ्या प्रमाणात विकसित झाले होते आणि त्यावर त्या काळातील कलाकारांचे प्रभुत्व होते, असे नमूद करता येते. या शिल्पकलेच्या सामान्य दृष्टीने दिसणाऱ्या वैशिष्ट्यांत शिल्पांची प्रमाणबद्धता, विशेषत: प्राण्यांच्या शिल्पांकनात, नजरेस भरते. ही प्रमाणबद्धता त्या त्या प्राण्यांचे वास्तव चित्र उभे करण्यास कारणीभूत आहे. त्यांतून दृष्टीस पडणारे भाव त्या त्या प्राण्यांच्या स्वभाववैशिष्ट्याला धरून असलेले दिसतात. उदा., सिंह, हत्ती, घोडा, बैल या प्राण्यांचे शिल्पांकन करताना शिल्पकाराने त्या प्राण्याच्या मूलभूत स्वभावाला गृहीत धरून आपल्या कलाविष्काराचा प्रारंभबिंदू ठरविला आहे. या प्राण्यांच्या शिल्पांकनात मौर्यकालीन कलेच्या उन्नयनाची स्वतंत्र प्रक्रिया अभ्यासकांनी निदर्शनात आणून दिली आहे. उदा., वैशाली येथील स्तंभशीर्षावरील सिंहप्रतिमा आणि सारनाथ येथील सिंहप्रतिमा यांची तुलना केली असता हा फरक आपल्याला अगदी स्पष्टपणे जाणवतो. हा तुलनात्मक फरक मौर्यकालीन शिल्पकलेच्या स्वतंत्र विकासाची प्रक्रिया नजरेसमोर उभी करतो. प्राण्यांच्या शिल्पांसोबतच तत्कालीन मानवी शिल्पांकनातसुद्धा हे तत्त्व उतरलेले दिसते. उदा., दीदारगंज येथील चवरी ढाळत असलेली स्त्रीप्रतिमा (दीदारगंज येथील यक्षी), लोहानीपूर येथील खंडित शिल्प (तीर्थंकर), तसेच अन्य ठिकाणी मिळालेले खंडित शिल्पावशेष हे सर्व शिल्पांकन कलात्मक मूल्यांशी प्रामाणिक असलेले दिसते. मौर्यकाळात बौद्ध स्थापत्यकलेने महत्त्वाचा आयाम घेतलेला आढळतो. विशेषतः ज्या ठिकाणी सम्राट अशोकाने आपले स्तंभ उभारले, त्या ठिकाणी बौद्ध स्तूप आढळतात. यावरून या काळात ‘स्तूपʼ स्थापत्यप्रकाराची प्रमुख लक्षणे आणि त्याची वैशिष्ट्ये विकसित झाली होती, असे उपलब्ध स्तूपांच्या आधारे सांगता येते. यांमध्ये सारनाथ (उत्तरप्रदेश), वैशाली (बिहार), बैराट (राजस्थान), कुशिनारा (बिहार), सांची (मध्य प्रदेश) इत्यादी स्तूपांचा उल्लेख करता येईल. यांतील काही स्तूप उत्खननात मिळाले, तर काही स्तूपांमध्ये मौर्य काळानंतर केलेली दुरुस्ती आणि त्यावर अधिकची भर घातलेली आढळते. याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे सांची येथील महास्तूप, जो सम्राट अशोकाने निर्माण केला आणि अशोकानंतर शुंग आणि सातवाहन राजवंशांच्या काळात त्याची दुरुस्ती आणि विस्तार केला. मौर्य कलेच्या उद्भव आणि विकासाच्या संदर्भात दोन सिद्धांत अभ्यासकांमध्ये प्रचलित आहेत. त्यांतील पहिला गट असे स्पष्ट करतो की, मौर्य कला पर्शियन व ग्रीक कलेच्या प्रभावातून विकास पावली आहे; तर दुसरा गट असे म्हणतो की, मौर्यकला आणि त्या काळातील विविध कलाविष्कार भारतीय परंपरेतूनच विकास पावले आहेत. या परस्परविरोधी दोन्ही मतांचे सिद्धांत या काळातील कलेचे विश्लेषण आणि त्यांचा अर्थ समजून घेण्यासाठी महत्त्वाचे आहेत. अलीकडे मात्र परस्परप्रभाव, सांस्कृतिक आदानप्रदान आणि त्यातून विकसित झालेली त्या त्या प्रदेशाची वैशिष्ट्ये कलानिर्मितीच्या मुळाशी असावीत, असे सिद्धांतन केले जाते. भारतीय शिल्पकलेत भारतीयत्वाचे निदर्शक म्हणू असे जे विशेष आपल्याला आढळते, त्याचे मूळ मौर्य कलेत दिसते.
स्थापत्य आणि शिल्पकलेसोबतच या काळातील मृण्मय कलाही उल्लेखनीय होती. मौर्यपूर्व काळात अगदीच प्रारंभिक अवस्थेत असलेली ही कला मौर्य काळाच्या भरभराटीत एका वेगळ्याच उंचीवर पोहोचलेली दिसते. हा मृण्मय कलेचा विकास दोन अंगांनी पाहावयास मिळतो : एक, तंत्राच्या अंगाने आणि दुसरा, शिल्पांकनाच्या दृष्टीने. या काळातील मृण्मय शिल्पे प्रामुख्याने हाताने तयार केली जात असत. परंतु बुलंदी बाग येथील काही मृण्मय शिल्पांच्या अभ्यासावरून या मृण्मय शिल्पांच्या मुखाचा भाग हा साच्याद्वारा बनविल्याचे निदर्शनास येते. यावरून या कालखंडात साच्याचे आंशिक रूपात प्रयोजन प्रारंभित झाले असावे, असे विधान करता येईल. ही मृण्मय शिल्पे उत्कृष्ट मातीपासून तयार केली असून चांगल्या प्रकारे भाजलेली आढळतात आणि या शिल्पांवर कमीत कमी अलंकरण आढळते. या शिल्पांमध्ये मानव, प्राणी, पक्षी आणि मनोरंजन किंवा गृहसजावटीसाठीच्या कलात्मक वस्तू आढळतात. या मृण्मय कलेत, विशेषतः मानवी अंकनात कमालीची परिपूर्णता आढळते. लहान मुली किंवा लहान मुले यांच्या चेहऱ्यावरील बालसुलभ हास्य, खेळत असताना असलेले भाव, स्वत:च जर स्वत:ला गिरकी घेत असेल तर त्या वेळी असलेली शरीराची ठेवण, लकब, वस्त्रांची ठेवण इ. सर्व बाबींचे अचूक अंकन या कलेत आढळते.
इ. स. पू. ३२१ ते
इ. स. पू. १८५ या कालखंडात मौर्य घराण्याचे राज्य भारतीय उपखंडाच्या
बहुतांश भागावर पसरलेले होते. हा कालखंड भारतीय उपखंडाच्या कलेतिहासाच्या
दृष्टीने फार महत्त्वाचा मानला जातो. या काळातील उपलब्ध कलेच्या
प्रकारांमध्ये मृण्मय कलेचे अन्यन्यसाधारण महत्त्व आहे. भारतीय उपखंडात
अनेक ठिकाणी झालेल्या पुरातात्त्विक उत्खननात या काळातील पक्व मृण्मय
प्रतिमा प्राप्त झाल्याच्या नोंदी आहेत.
रिबिनी वापरून तयार केलेला पट्टा डोक्यावर घातलेली मूर्ती.
इंग्रजी भाषेत प्रचलित असलेला ‘टेराकोटा’ हा शब्द ‘Terracotta’ या लॅटिन शब्दावरून घेतला असून त्याचा अर्थ ‘भाजलेली माती’ (पक्व मृदा) असा होतो. माती हे सहज उपलब्ध होणारे साधन असल्यामुळे मातीच्या प्रतिमा मोठ्या प्रमाणात अगदी आद्य ऐतिहासिक (Protohistoric) काळापासून विपुल प्रमाणात मिळालेल्या आहेत. विशेषतः गंगा-यमुनेच्या खोऱ्यात विपुल प्रमाणात उपलब्ध असलेली उत्कृष्ट गाळाची माती ही या कलेसाठी वरदान ठरलेली दिसते. मौर्य कालखंडातील ‘मृण्मय कला’ कलेतिहासाच्या अभ्यासकांनी ढोबळपणे तीन कालखंडात विभागली आहे : मौर्य पूर्व काळ, मौर्य काळ व मौर्योत्तर काळ. या काळविभाजनामागे काही महत्त्वाच्या गृहीतकांचा विचार केला गेलेला दिसतो. यातील अत्यंत महत्त्वाचे गृहीतक म्हणजे या मृण्मय प्रतिमांच्या प्राप्तीच्या उत्खननातील पुरातात्त्विक सांस्कृतिक स्तर, सोबतच मृण्मय प्रतिमांचे आकारप्रकार, भाजणी, विषय, तंत्र, ठेवण इत्यादी.
मथुरा येथील वराहाच्या चेहऱ्याप्रमाणे असलेली मातृदेवतेची मूर्ती.
उत्कृष्ट रीत्या भाजलेल्या मातीपासून तयार केलेल्या या प्रतिमा या
काळाच्या पूर्वी सापडलेल्या प्रतिमांपेक्षा विषयवस्तू आणि प्रतिमांकनाच्या
दृष्टीने वैशिष्ट्यपूर्ण आहेत. सोबतच या प्रतिमांतील मानवी अंकनाचे काही
ठळक लक्षणे नमूद करता येतात. शारीरिक ठेवण, चेहऱ्यावरील भाव, वस्त्रालंकार
इत्यादी. मौर्य काळातील सुस्थितीतील मृण्मय प्रतिमा प्राचीन पाटलीपुत्रचा
भाग असलेल्या स्थळांवर मिळालेल्या आहेत. त्यांत बुलंदीबाग, कुम्रहार व
बक्सर या ठिकाणांचा समावेश होतो. या बरोबरच उत्तर प्रदेशमधील सारनाथ,
राजघाट, अहिच्छत्र, श्रावस्ती, मथुरा आणि कौशांबी इत्यादी महत्त्वाच्या
पुरातात्त्विक स्थळांवरून सुद्धा मौर्य कालीन मृण्मय प्रतिमा मिळाल्याची
नोंद प्रकाशित अहवालांत आढळते. इतर ठिकाणांमध्ये वर्तमान उत्तर प्रदेशामधील
हस्तिनापूर, आलमगीरपूर, अंतरंजीखेडा, भिटा, प्रल्हादपूर, सराई मोहन,
सोहगूर या स्थळांचा सुद्धा समावेश करता येतो.
टेराकोटा मूर्तीच्या चेहऱ्याचा भाग.
बुलंदीबाग आणि बक्सर या ठिकाणी मिळालेल्या मृण्मय प्रतिमांच्या निधीवरून (Hoard) असा कयास लावला जातो की, मौर्य कालखंडात ‘पाटलीपुत्र’ (सध्याचे पाटणा, बिहार) हे शहर मातीपासून तयार केल्या जाणाऱ्या वस्तू व प्रतिमांचे केंद्र होते. या काळातील मातीपासून बनवलेल्या प्रतिमा ह्या आकाराने मोठ्या आहेत. मृण्मय प्रतिमा तयार करण्याच्या बदलत्या तंत्राच्या संदर्भात हा काळ महत्त्वाचा आहे. उदा., या काळातील मानवी प्रतिमांच्या शरीराचा काही भाग हा साच्यात बनवून नंतर इतर अवयव हाताने तयार करून जोडला जात असे. तदनंतर तयार केलेली प्रतिमा भट्टीत भाजली जात असावी, असे तज्ज्ञांचे निरीक्षण आहे. अभ्यासकांनी या मृण्मय प्रतिमांची शैलीच्या आधारे दोन गटात विभागणी केलेली आहे. यांतील पहिल्या गटातील मृण्मय प्रतिमांवर मुख्यत: सामान्य जनजीवन आणि दरबारातील राजेशाही थाट यांचा प्रभाव दिसून येतो. या सोबतच या प्रतिमा पूर्णतः हाताने घडवलेल्या आढळतात. प्रतिमांचे हात, पाय व इतर अवयव हे हाताने बनवलेले असून त्यांना हातांच्या बोटाने आकार दिलेला आढळतो. या प्रतिमांचे कान, नाक, ओठ, केस, बेंबी इत्यादी शरीरलक्षणे वेगळी बनवून नंतर प्रतिमेला जोडलेले दिसून येतात. या गटातील प्रतिमा ढोबळ आणि साध्या धाटणीच्या आहेत. त्यामुळे या मृण्मय प्रतिमा सामान्य माणसांच्या किंवा दरबारात असलेल्या सेवकांच्या असाव्यात. विकसित तंत्र, कल्पना, शैली आणि नव्या घडणीच्या मृण्मय प्रतिमा दुसऱ्या गटात मोडतात. या गटातील मृण्मय प्रतिमांचे चेहरे साच्यात बनवून उर्वरित प्रतिमेचे अवयव हे हाताने बनवले जात असे. अशा प्रकारच्या प्रतिमा ह्या उत्तर प्रदेशमधील मथुरा, अहिच्छत्र, राजघाट, कौशांबी येथे मोठ्या प्रमाणात मिळालेल्या आहेत. परकीय प्रभाव असलेल्या प्रतिमा सुद्धा या गटात अंतर्भूत होतात. हा प्रभाव प्रतिमांची शारीरिक ठेवण, चेहऱ्यावरचे भाव, केशरचना, दागिने इत्यादी बाबींच्या आधारे नजरेस पडतो. मथुरा येथे सापडलेली पर्शियन प्रभाव दर्शवणारी मृण्मय प्रतिमा परदेशातून आयात केलेली असावी, असा अंदाज बांधला जातो. या गटातील प्रतिमांवर राजेशाही थाटाचा प्रभाव अधिक प्रमाणात दिसून येतो.
हातात वाद्य घेतलेली स्त्री प्रतिमा.
मौर्यकालीन प्रतिमांमध्ये कारागिरांनी प्रतिमेच्या सजावटीवर अधिक भर दिलेला दिसून येतो. तसेच मूर्तींची घडण ही अधिक उत्तम रीत्या व कलात्मक पद्धतीने विकसित झालेली दिसून येते. स्त्री प्रतिमांची केशरचना आणि दागिने दाखवण्यासाठी मूर्तिकाराने फुलांचा तसेच मोठ्या प्रमाणात इतर नैसर्गिक वस्तूंचा उपयोग केलेला दिसतो. अशा प्रतिमा मथुरा, अहिच्छत्र आणि कौशांबी येथील उत्खननात आढळून आलेल्या आहेत. विशिष्ट धर्म कल्पनांचा विकास व प्रसाराच्या आकलनासाठी मृण्मय प्रतिमांच्या अभ्यासाचे महत्त्व अभ्यासकांनी अधोरेखित केलेले आहे. मौर्यपूर्व काळ व मौर्यकालीन प्रचलीत धार्मिक मान्यता, विश्वास, देवता इत्यादींच्या अभ्यासाठी मृण्मय प्रतिमा मुख्य साधन आहे. या काळात अनेक ठिकाणी विपुल प्रमाणात स्त्री प्रतिमा मिळालेल्या आहेत. या स्त्री प्रतिमांची काही समान लक्षणे आढळतात. उदा., अनावृत्त अप्रमाणबद्ध प्रतिमा, काहीशी रुंद कंबर, उठावदार स्तन, अनावृत्त जननेंद्रिय, पोटाजवळचा काहीसा पुढे आलेला मांसलभाग इत्यादी. अशी लक्षणे असलेल्या स्त्री प्रतिमा या काळात सर्वदूर आढळून आलेल्या आहेत. यांतील काही प्रतिमा मौर्यपूर्वकालीन सांस्कृतिक स्तरातून, तर काही प्रतिमा मौर्यकालीन स्तरात आढळलेल्या आहेत. अशा प्रकारच्या स्त्री प्रतिमा मातृदेवतेच्या असाव्यात. या प्रतिमांचा तत्कालीन सुफलनविधींशी संबंध असावा, असा तर्क काही अभ्यासकांनी केलेला आहे. या प्रतिमा तत्कालीन लोकधर्म आणि संबंधित मान्यतांना अधोरेखित करतात. यात काही स्त्री प्रतिमा लहान मुलासोबतही असलेल्या दिसतात. उत्तर प्रदेश येथील काही ठिकाणी व इतर काही स्थळी उपलब्ध मृण्मय प्रतिमांत मृदेपासून वराह, सर्प, प्राणी व पक्षांचा चेहरा असलेल्या स्त्री प्रतिमांची नोंद आढळते. या प्रतिमा तत्कालीन मातृदेवतांच्या लक्षणाकडे अंगुलीनिर्देश करतात. तसेच लहान मुलांसोबत आणि रिबिनी वापरून केलेल्या डोक्यावर पट्टा घातलेल्या (Rosettes) प्रतिमा सापडलेल्या आहेत. वराहाच्या चेहरा असणाऱ्या मातृदेवतांच्या काही प्रतिमा मथुरा येथील उत्खननात आढळून आल्या. ह्या प्रतिमेचे शरीर म्हणजे प्रजापती व डोके म्हणजे पृथ्वी होय, असे अभ्यासक सांगतात. शतपथ ब्राह्मण आणि पुराणांमध्येही प्रजापतीने पृथ्वी उचलून घेतल्याची कथा प्रचलित आहे. त्याचेच प्रतीक म्हणून ह्या मूर्तीची घडण केलेली असावी, असा अंदाज लावलेला दिसतो.
शिरोभूषण परिधान केलेली स्त्री प्रतिमा.
मथुरा आणि अहिच्छत्र या ठिकाणी झालेल्या उत्खननात पक्ष्याच्या चेहरा असलेल्या मातृदेवतेच्या मातीच्या प्रतिमा आढळून आल्या. मथुरा येथे सापडलेली प्रतिमा ही बऱ्यापैकी सुस्थितीत असून प्रतिमेचा उजवा हात अर्धा तुटलेल्या अवस्थेत आहे. मुखाचा भाग गरुडाच्या चोचीप्रमाणे भासतो. चेहरा हा गरुडाप्रमाणे असल्यामुळे ही मूर्ती ‘विनता’ म्हणजेच गरुडाच्या आईची असावी. मात्र अहिच्छत्र येथे प्रतिमेचा केवळ चेहऱ्याकडचा भागच सापडला आहे. राजघाट, पाटणा, बुलंदीबाग आणि प्रल्हादपूर येथील उत्खननात सापाची वैशिष्ट्ये असलेल्या काही मानवी प्रतिमा आढळून आल्या. वरील चारही ठिकाणी सापडलेल्या प्रतिमा ह्या एकमेकांपेक्षा वेगळ्या आहेत. बुलंदीबाग येथून उपलब्ध प्रतिमेला मानवी डोके असून शरीराला वेलीसारखे दिसणारे वेटोळे आहेत. पाटणा येथील प्रतिमेचे शरीर हे सापाचे असून या प्रतिमेला मानवी डोके नाही. प्रल्हादपूर येथील प्रतिमा ही साधी असून त्याच्या डोक्याकडील भाग हा वरच्या बाजूस निमुळता आहे. या अर्धसर्प/अर्धमानवी प्रतिमा तयार करण्याचा हेतू हा तत्कालीन प्राणिपूजनाची मान्यता व विश्वास दर्शवितात. विशेषतः या प्राणिपूजनात ‘सर्पपूजन’ फार प्राचीन असावे, असे या प्रतिमांवरून लक्षात येते. मौर्यकाळातील धार्मिक महत्त्व असलेल्या काही प्रतीकात्मक वस्तू मथुरा येथे सापडल्या. या वस्तू अतिशय ढोबळ बनवलेल्या असून त्या अगदीच थोड्या प्रमाणात उपलब्ध आहेत. मानवी चेहरा आणि पशूचे शरीर अशी एक मौर्यकालीन मृण्मय प्रतिमा हस्तिनापूर येथे मिळाली आहे. या प्रतिमेचे शरीर हे सिंहाचे असावे. डाव्या हातात फूल आणि उजव्या हातात वाडगा पकडलेली आणि दागिने घातलेली एक स्त्री प्रतिमा हस्तिनापूर येथून मौर्य कालीन स्तरामधून मिळाल्याची नोंद आढळते. ही प्रतिमा अंशतः साच्यात बनवलेली असून ती एका स्त्री भक्ताची असावी, असा अंदाज अभ्यासक करतात. मौर्य कालखंडातील धार्मिकदृष्ट्या महत्त्व नसणाऱ्या काही मृण्मय प्रतिमा व वस्तू या उत्तर प्रदेश आणि बिहार येथील काही स्थळांवर मिळाल्याच्या नोंदी आढळतात. मथुरा या ठिकाणाहून पर्शियन प्रभाव असलेल्या फक्त मुखाचा तेवढा भाग उपलब्ध आहे. या प्रतिमेच्या चेहरेपट्टीवर पर्शियन प्रभाव दृग्गोचर होतो. तसेच याच ठिकाणाहून पर्शियन प्रभाव असलेली अजून एक पुरुषाची उभी प्रतिमा आढळून आलेली आहे. या प्रतिमेची देहबोली आणि वेषभूषेवरून ती कोण्या मुख्य किंवा महत्त्वाच्या व्यक्तीची प्रतिमा असावी, असे दिसून येते. इ. स. पू. चौथ्या आणि तिसऱ्या शतकात भारताचा इराणी लोकांशी संबंध असल्यामुळे, येथील कलाकुसरींवर पर्शियन प्रभाव आढळून येतो. त्याबरोबरच याच काळात गांधार प्रदेशात अलेक्झांडरच्या आक्रमणानंतर ग्रीक लोकांचा संपर्क मोठ्या प्रमाणात वाढला. या संचार व संपर्काचा परिणाम तत्कालीन कलाकुसरीच्या वस्तू व इतर कला प्रकारांवर पडलेला दिसून येतो. राजा अशोकाच्या काळात गांधार प्रदेश मौर्य साम्राज्याचा महत्त्वाचा भाग होता. मौर्यकालीन मृण्मय प्रतिमांत जो तंत्र व घडणावळीच्या संदर्भात आमुलाग्र बदल घडून आलेला दिसतो त्या मागे ‘ग्रीककलेचा’ प्रभाव असावा, असे काही विद्वान युक्तिवाद करतात. विशेषतः बुलंदीबाग येथे मिळालेल्या मृण्मय प्रतिमांच्या निधीत उपलब्ध झालेल्या प्रतिमांवर ग्रीक कलेचा मोठा प्रभाव दिसतो. हा प्रभाव चेहरा, वस्त्र, शरीराची ठेवण, प्रतिमांत दर्शविलेल्या विविध कृती यांवरून अधोरेखित करता येते. या निधीमध्ये मिळालेल्या प्रतिमा आजपर्यंत भारतात उपलब्ध झालेल्या मृण्मय प्रतिमांत सर्वोत्कृष्ट कलेचा नमुना म्हणून गणल्या जातात. मौर्यकाळातील मृण्मयप्रतिमा व वस्तू हे तत्कालीन इतिहासाच्या आकलनाचा एक स्रोत म्हणून बघितल्यास या अभ्यासातून पुढील मुख्य मुद्दे निदर्शनास येतात : या काळात मृण्मय वस्तू व प्रतिमा बनवण्याच्या तंत्रात बराच बदल झाला, त्या सोबतच मानवी प्रतिमांची रचना, आकार, नवीन विषयांची भर, उपयोगिता आणि स्वरूप यांत आमूलाग्र बदल घडून आले. या काळातील कलेवर मौर्य साम्राज्याचा विस्तीर्ण भूप्रदेश आणि तेथे वस्तीस असलेल्या विविध जनसमुदाय, त्यांच्या परंपरा व परस्परसंबंध यांचा प्रभाव आढळतो. मौर्य काळ आणि मौर्योत्तर काळात मृण्मय कलेने जी कलात्मक उंची गाठलेली दिसते, याचे मूळ या काळातील आर्थिक, सामाजिक व विस्तारित जनसंपर्क या बाबींशी जोडता येतो.
अशोककालीन मौर्यकालीन कला :-
कलिंगयुद्ध हे अशोकाच्या कारकीर्दीतील शेवटचं ठरलं. त्यानंतर सम्राट अशोक यांनी अहिंसाप्रधान बौद्ध धर्माचा स्वीकार करत उर्वरित आयुष्य धर्मप्रसारात व्यतीत केलं. या काळात शत्रुरहित असं एकसंध बलशाली मौर्य साम्राज्य अस्तित्वात आल्यामुळे शांतता आणि संपन्नता आली. परकीय संस्कृतीशी सलोख्याचे संबंध आल्यामुळे कलेला नवचैतन्य लाभून तिचा उत्कर्ष झाला. शांतता, एकांतवास, ध्यानधारणा, आध्यात्मिक चिंतन यासाठी ऋषी-मुनी, भिक्षू हे अनेकदा डोंगरांत नैसर्गिकपणे निर्माण झालेल्या गुहांमध्ये राहत असत. सम्राट अशोक यांच्या काळात डोंगराळ खडक मुद्दाम फोडून गुहा निर्माण करण्याची प्रथा सुरू झाली आणि एक खास भारतीय वास्तुकला जन्माला आली.
बिहारमध्ये असलेली लोमश/लोमस ऋषींची गुहा ही तत्कालीन लाकडी बांधणीच्या सुंदर वास्तूची हुबेहूब नक्कल असल्याचं जाणवतं.
सध्याच्या जहानाबाद जिल्ह्यात डोंगराळ भागात ही गुहा आहे. तिच्या दर्शनी भागावर अश्वनालाकृत कमान कोरलेली आहे. तिच्या आतील अर्धवर्तुळाकार पट्टीत उथळ उठावात दोन्ही बाजूंनी मध्याकडं येणाऱ्या हत्तींच्या रांगा कोरलेल्या आहेत. आतील भागात आलंकरण नसलं तरी दगडी भिंतीला दगड घासून हा भाग मौर्य पद्धतीनं आरशासारखा गुळगुळीत करण्यात आला आहे.
इ.स.पुर्व दुसर्या शतकातील मौर्यकालीन शिल्प
मौर्य कालीन पुतळे
कुमारहर येथील प्राचीन मौर्यकालीन पाटलीपुत्र या राजधानीच्या परिसरात स्तंभ असलेली जागा
कुशीनगर येथील स्तुपाचे अवशेष
इ.स.पुर्व तिसर्या ते चौथ्या शतकातील राजधानी पाटलीपुत्र येथील बुलंद बागी
सांची येथील जुना स्तूप स्वत: सम्राट अशोकाने बांधला होता व अशोकाची
पत्नी तेथे वास्तव्य करत होती. अशोकाचा पुत्र महेंद्र त्याची पत्नी देवी व
त्याची मुलगी हे अशोकाच्या पत्नीला भेटण्यासाठी सांची येथे आले होते.
सध्याचा स्तूप शुंग काळातील इ.स.पूर्व 2 रे शतक या वेळी अशोकाने बांधलेल्या
स्तूपाच्या बाहेर बांधलेला आहे. ब्रिटिश संशोधकांनी या स्तूपात काही
अवशेष सापडतात का म्हणून खोदाई केली होती परंतु त्यांना काही सापडले
नव्हते.
सांचीच्या स्तुपावरील या तोरणांवरील शिल्पकला सुमारे 2200 वर्षांपूर्वीची असून जगप्रसिद्ध आहे.
पहिले शिल्प सम्राट अशोकाने बुद्ध गयेतील बोधी वृक्षाला दिलेल्या
भेटीच्या वेळचे आहे. सम्राट अशोक कोणत्याही शिल्पात कधी चित्रण केलेला
आढळत नाही. सांची स्तूपावरील या दोन शिल्पात फक्त अशोकाचे चित्रण आहे.
त्यामुळे या शिल्पाला अनन्य साधारण महत्व आहे.
दुसरे शिल्प सम्राट अशोकाने केलेल्या रामग्राम येथील बुद्धाच्या अस्थी
हलवण्याच्या प्रयत्नासंबंधीचे आहे. या ठिकाणी नागा राजाच्या विरोधाने
अशोकाला यश मिळाले नाही असा प्रसंग चित्रित केला आहे.
तिसरे शिल्प म्हणजे बुद्धाच्या महानिर्वाणानंतर त्यांच्या अस्थी मालस देशाच्या राजाने कुशीनगर येथे आणल्याचा प्रसंगाचे चित्रण आहे.
चौथ्या शिल्पात बुद्धांच्या अस्थी आपल्या ताब्यात द्याव्यात म्हणून अनेक
राजांनी सेना आणून कुशीनगरला वेढा घातला असल्याचा प्रसंग आहे. पुढे या
राजांना अस्थी देण्यात आल्या व लढाई झालीच नाही.
सम्राट अशोक यांनी सर्वसामान्य माणसाला सदाचार शिकवण्यासाठी स्तंभलेख, गुहालेख आणि गिरिलेख हे पाली भाषेत कोरून बौद्ध धर्माज्ञा पोहोचवण्याचं मोठं कार्य केलं. असेच सुमारे ३४ शिलालेख देशाच्या चारही भागांत सापडले आहेत. मौर्यकाळातल्या कलाकृती अभ्यासताना काही मोजकी शिल्पं आणि त्यातही काही अत्यंत महत्त्वपूर्ण असे स्तंभशीर्ष उपलब्ध आहेत. सम्राट अशोक यांनी साधारणतः चाळीस फूट उंचीचे सुमारे ३० स्तंभ राजमार्गांवर, राज्याच्या सीमेवर आणि महत्त्वाच्या धार्मिक ठिकाणी उभारले. हे स्तंभ चुनारच्या खाणीतल्या पिवळ्या वालुकाश्मात आहेत. या स्तंभांपैकी तेरा स्तंभ आजही उपलब्ध आहेत. त्यावरील एक किंवा अनेक प्राण्यांच्या शिल्पांनी बनवलेले स्तंभशीर्ष हे शिल्पकलेचा उत्कृष्ट नमुना म्हणून ओळखले जातात. सर्व स्तंभांवर अशोक यांच्या १४ आज्ञा कोरलेल्या आहेत. या स्तंभांसारखी झिलई मौर्यकाळापूर्वी आणि नंतर कोणत्याही शिल्पात आढळत नाही. यांपैकी लौरिया-नंदनगडचा सिंहस्तंभ बिहारच्या चंपारण जिल्ह्यात आज दोन हजार वर्षांनंतरही सुस्थितीत पाहायला मिळतो. बिहारमधील रामपूर इथं सापडलेलं वृषभ स्तंभशीर्ष हे वालुकाश्म दगडात एकसंध घडवलेलं आहे. आखूड शिंगं, उभारलेले कान, मोठ्या आकाराचं वशिंड...असा हा धष्टपुष्ट वृषभ आहे. मात्र, या शिल्पात बैलाच्या उन्मादाचा लवलेशही आहे. उलट, हे वृषभशिल्प पाहताना सौम्यताच अनुभवाला येते. सर जॉन मार्शल यांनी तर ‘भारतात निर्माण झालेल्या प्राचीन शिल्पांमधलं सर्वोत्कृष्ट शिल्प’ अशी या शिल्पाची प्रशंसा केली आहे.
सम्राट अशोकाचे ४० अभिलेख आतापर्यंत अवगत झाले आहेत. जे प्रामुख्याने ब्राह्मी लिपीत, खरोष्टी आणि ग्रीक भाषेत लिहिले गेले आहेत. सम्राट अशोकाचा बराचसा इतिहास या अभिलेखांतून प्रतीत होतो. इराणचा शासक डेरियस याच्याकडून प्रेरणा घेऊन अशोकाने हे अभिलेख तयार केल्याचे मानले जाते. त्याने बुद्धाच्या स्मरणार्थ अनेक स्तंभ बांधले, जे आजही त्यांच्या जन्मस्थळी नेपाळमधील लुम्बिनीत मायादेवी मंदिराजवळ, सारनाथ, बोधगया, कुशीनगर तसेच श्रीलंका, थायलंड, चीन या देशांत ‘अशोकस्तंभ’ या स्वरूपात पाहायला मिळतात. एकसंध वालुकाश्म दगडात कोरलेल्या मोठ्या आकाराच्या प्राण्यांच्या शिल्पांबरोबरच तत्कालीन मानवी शिल्पांकनसुद्धा मौर्यकलेत दिसून येतं. याचंच उदाहरण म्हणजे यक्ष-यक्षिणीच्या मूर्तींची घडण होय. यामध्ये उत्स्फूर्तता, कमालीची भव्यता, जोम आणि जिवंतपणा जाणवतो. मौर्यकाळातल्या सर्वात प्राचीन यक्षाची तांबड्या वालुकाश्मात घडवली गेलेली मूर्ती मथुरेजवळच्या परखम इथं सापडली. या यक्षाचं नाव बहुधा मणिभद्र हे असावं. गळ्यात रत्नमाला, कमरेच्या वरचा भाग अनावृत असून कमरेभोवती गुंडाळलेल्या वस्त्राची दोन टोकं खाली धोतरावर लोंबत आहेत. शिल्पाचे दोन्ही हात तुटलेले आहेत - तरीही, शिल्पकारानं मूर्ती उत्स्फूर्तपणे सरळ घडवलेली असल्यामुळं - त्या शिल्पात अतिमानवी, शक्तिशाली रूप साकार झालं आहे. मोठ्या आकारात शिल्प घडवण्याचा कदाचित हा भारतीय शिल्पकारांचा सुरुवातीचा प्रयत्न असावा असं वाटतं.
पाटलीपुत्र येथे सापडलेल्या दोन यक्षाच्या मुर्ती, यावर ब्राह्मी लिपीतील शिलालेख आहेत ज्यावर ब्राह्मी लिपीत
... (Yakhe... for "Yaksha...")
पाटणा इथं सापडलेली यक्षमूर्ती इसवीसनपूर्व दुसऱ्या शतकातली आहे. शिर आणि दोन्ही हात तुटलेले, स्थूल शरीर अशा प्रकारच्या या भव्य यक्षमूर्तीचा वरच्या भागावर आणि पावलांवर चकचकीत झिलई पाहायला मिळते. अशी झिलई हे सर्व मौर्य शिल्पांचं वैशिष्ट्य होय. चवरी ढाळणाऱ्या या सेवकाच्या गळ्यात जाडजूड माळ, कमरेभोवती धोतरासारखं वस्त्र असून, नेसलेल्या वस्त्रावर कंबरपट्टा आहे. डाव्या खांद्यावर पट्टा आहे. तो सेवक असल्याचं या वैशिष्ट्यांवरून स्पष्ट होतं. वस्त्रावरच्या कोरीव कामातल्या खोदलेल्या समांतर रेषा इराणी शैलीच्या आहेत. मात्र, शरीराची घडण भारदस्त आणि पूर्णपणे भारतीय आहे.
दीदारगंज यक्षिण
बिहारच्या दीदारगंज इथं सापडलेली यक्षी ही पिवळ्या वालुकाश्म दगडात मौर्यकालीन झिलईसह घडवली गेली आहे. कमरेच्या वरच्या शरीराचा भाग हा दागदागिन्यांच्या कौशल्यपूर्ण कोरीव कामासह असून पूर्णपणे अनावृत आहे. चेहरा वर्तृळाकृती घाटाचा असून त्याचे अवयव आणि केशकलाप अत्यंत कुशलतेनं कोरलेले आहेत. डाव्या हातात चामर असून उजवा हात खांद्यापासून तुटलेला आहे. वक्षस्थळांवरून रुळणारा रत्नहार, कमरेचं वस्त्र, कंबरपट्टा, पायातले तोडे आणि हातावरून जमिनीपर्यंत दर्शवलेलं उत्तरीय या सगळ्याचं कोरीव काम खूप तपशिलानं केलेलं आहे. बांधेसूद, प्रमाणबद्ध कंबर ही निरोगी शरीराचं निदर्शक आहे. या सर्व तपशिलावरून तत्कालीन स्त्रीसौंदर्यविषयक कल्पना आणि मौर्यशिल्पांची अत्यंत प्रगत अवस्था या मूर्तीत पाहायला मिळते. या सर्व कलाकृतींमध्ये शिखर गाठणारा, आपल्या सर्वांच्या आत्मीयतेचा विषय ठरतो तो ‘सारनाथचा सिंहस्तंभशीर्ष’. ज्ञानप्राप्तीनंतर गौतम बुद्धांनी सारनाथ इथल्या मृगोद्यानात पहिलं प्रवचन दिलं होतं. त्याचं स्मरण म्हणून सम्राट अशोकांनी हा स्तंभ चुनार खाणीतल्या एकसंध पिवळ्या वालुकाश्म दगडात उभारला आहे. या सिंहस्तंभशीर्षाचे तीन प्रमुख भाग आहेत. सर्वात खाली घंटेच्या आकाराचं उलटं कमळ, त्यावर खालच्या कड्यापेक्षा थोडं मोठं असणारं वरचं दुसरं कडं. त्याच्या वर अनियमित अष्टकोनी शीर्षस्तंभफलक आहे. या फलकाच्या चारही दिशांना चार धर्मचक्रे उठावात कोरलेली आहेत. प्रत्येक दोन चक्रांच्या मध्ये एका धावत्या प्राण्याची - उदाहरणार्थ : बैल, घोडा, सिंह आणि हत्ती या चार प्राण्यांची - सुरेख शिल्पे उठावात कोरलेली आहेत. हे प्राणी धावत्या अवस्थेत दाखवल्यामुळे त्यांची गती सूचित होते.
सारनाथ येथील अशोक स्तंभ
स्तंभशीर्षफलकावर पाठीला पाठ लावलेले चार सिंह चार दिशांना तोंड करून दिमाखात उभे आहेत. सर्व प्राचीन संस्कृतींमध्ये सिंह हे सूर्याचं प्रतीक मानलं गेलं आहे. ‘अधर्माचा काळोख धर्मरूपी सिंह नष्ट करतो,’ या कल्पनेला अनुसरून सिंहाची योजना केलेली आहे असं तज्ज्ञांचं मत आहे. सिंहाचा रुबाबदार; परंतु काहीसा ताठर आविर्भाव, मुखवट्याप्रमाणे भासणारे त्यांचे चेहरे, नाकपुड्यांखालचा ओठाचा भाग समांतर व वक्ररेषांनी दाखवण्याची पद्धत, डोळ्यांचा त्रिकोणी आकार आणि या कोरलेल्या शिल्पाची आरशासारखी चकचकीत झिलई हे तत्कालीन सर्व इराणी शिल्पांमध्ये पाहायला मिळतं. या चार सिंहांच्या डोक्यावर धर्मचक्र होतं. या स्तंभाच्या उभारणीमागं धर्मप्रसाराचा उद्देश स्पष्ट आहे. जनतेसमोर राजाज्ञा ठेवण्याची इराणी प्रथा सम्राट अशोक यांनी स्वीकारली; मात्र, तिचा उपयोग स्वतःचं राजकीय व्यक्तिमाहात्म्य वाढवण्यासाठी न करता केवळ धर्मप्रसारासाठी केला हे त्यांचं श्रेष्ठत्व ठरतं. ‘बराबर डोंगरा’तल्या गुहा सम्राट अशोक यांनी, बौद्ध मत न मानणाऱ्या आजीवक पंथाच्या भिक्षूंना राहण्यासाठी कोरल्या होत्या हे आवर्जून लक्षात घेण्यासारखं आहे. हे सिंहस्तंभशीर्ष उदारमतवादी भारतीय संस्कृतीचं योग्य प्रतीक आहे हे लक्षात घेऊन स्वातंत्र्यप्राप्तीनंतर हे महान शिल्प भारत सरकारनं राजमुद्रा म्हणून स्वीकारलं. आक्रमक म्हणून आलेल्या ग्रीकांसोबत तत्त्ववेत्तेही होते. कलाकारही होते. त्यांत पर्शियन कलाकारांचाही समावेश होता. शत्रू म्हणून आलेल्यांकडूनही उचित ते वेचण्याचं सामर्थ्य आपल्या समाजात प्राचीन काळापासून असल्याचं दिसून येतं. त्यामुळं तत्कालीन मौर्यकलेला ग्रीक आणि पर्शियन कलागुणांची जोड मिळाली आणि आपली भारतीय कला अधिक समृद्ध होत गेली.
अशोकाचे लेख
अशोकाचे लेख म्हणजे काय? तर अशोकाने आपल्या आयुष्यात अख्या हिंदुस्थानाभर जे काही कोरून ठेवले ते म्हणजे अशोकाचे लेख.
अशोकाच्या लेखांचे साधारण खालील वर्ग पडतात. १. स्तंभलेख, लघुस्तंभलेख २. गिरिलेख, लघु गिरिलेख ३. कलिंगलेख (याखेरीज भाब्रूलेख, गुहालेख, स्मारकलेख असे प्रकार आढळतात.) यातील बहुतांश लेखांची भाषा मागधी असून अलंकार विरहित सोपी आहे. बहुतेक सर्व लेख ब्राह्मी लिपीत लिहिले गेले आहेत.
लौरीया, नंदनगड , बिहार येथील सम्राट अशोकाच्या काळातील स्तंभ
१. स्तंभलेख, लघुस्तंभलेख
अशोकाचे स्तंभलेख दिल्ली, तोपरा, मीरत, अलाहाबाद, लौरीया अराराज, लौरीया नंदनगड, राम पुरा, तरई नेपाळ(२ लेख), निग्लीव, सारनाथ, कौशांबी, सांची इत्यादी ठिकाणी आहेत. एकूण मिळालेल्या स्तंभलेखांची संख्या ७ आणि ४ (लघु स्तंभलेख) मिळून ११ आहेत. हुएन त्सांग नावाच्या ६व्या शतकातील चिनी प्रवाशाने अशोकाचे १६ स्तंभलेख असल्याचा उल्लेख केला आहे. या सोळापैकी वर उल्लेख केल्याप्रमाणे ११ लेखांचा शोध लागला आहे. त्यातील २ स्तंभच चांगल्या स्थितीत आहेत. अशोकाच्या परिवारापैकी आजपर्यंत त्याच्या फक्त एका राणी(कारुवाकी) आणि एका मुलाचा(तीवर) उल्लेख आढळतो अलाहाबाद येथील स्तंभावर आढळतो. त्यात उल्लेख आहे की, "दुसरी राणी व तीवरची माता कारुवकी हिच्या प्रित्यर्थ करण्यात आले आहे.." अशोकाचे हे स्तंभलेख एकंदर प्रजेला उद्देशून आहेत. त्यात राज्यशासनाची तत्वे, धर्माचरण, आत्मपरीक्षण, हिंसेसंबंधांचे नियम, धर्मानुराग, धर्मप्रचारार्थ योजना इत्यादी भिन्न भिन्न विषय आले आहेत.
सांची येथील स्तुपाच्या दक्षीण प्रवेशद्वाराच्या उजव्या बाजुला असणारा चकाकी असलेल्या दगडाचा अशोककालीन स्तंभाचा अवशिष्ट भाग
सांची येथील स्तुपाच्या दक्षीण प्रवेशद्वाराच्या उजव्या बाजुला शेडमध्ये असलेल्या दगडाचा अशोककालीन स्तंभाचा अवशिष्ट भाग
शिलालेख कोरलेला स्तंभ
चक्रवर्ती सम्राट अशोक
वैशाली येथील अशोक स्तंभ
ब्रिटीश म्युझीयम मध्ये असलेला इ.स.पुर्व २३८ अशोककालीन स्तंभावर तुकड्यावर असलेला ब्राह्मी लिपीतील शिलालेख
स्तंभांचे वैशिष्ट्य - १ ) प्रत्येक स्तंभावरील लेखांची सुरवात "देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा" अशीच होते. इथे कुठेही अशोकाचे नाव येत नाही. त्यामुळे एका लेखावर अशोकाचे नाव सापडेपर्यंत संशोधकांना वाटत होते की हे लेख 'पियदस्सी'(प्रियदर्शी) नावाच्या कोणा राजाचे आहेत. २ ) अशोकाने किती स्तंभ बांधले हे आज समजत नाही परंतु जेवढे मिळालेले स्तंभ आहेत ते एकमेकांपासून बऱ्याच अंतरावर आहेत. ३ ) स्तंभांची उंची १० ते १२ मीटर आहे. प्रत्येक स्तंभाचे वजन साधारण ३० टन पासून ५० टन पर्यंत आढळते. स्तंभांचा आकार गोलाकार आहे. हा आकार खालून वर निमुळता होत गेलेला आहे. ४ ) सगळ्या स्तंभांसाठी वापरलेला दगड एकाच प्रकारचा आहे. हा दगड उत्तरप्रदेशातील मिर्झापुर जिल्ह्यातील चुनार येथील डोंगरातून आढळतो. या भागात अनेक स्तंभ सापडले आहेत यावरून स्तंभ बनविण्याचा कारखाना इकडेच असू शकतो असा आपण तर्क लावू शकतो. ५ ) स्तंभांची निर्मिती पूर्णपणे भारतीय कलाकारांनी केलेली आहे.
२. गिरीलेख, लघु गिरिलेख
गिरिलेख म्हणजे आदेश. पर्वतांवर कोरून ठेवलेले लहानमोठे शिलालेख. आजपर्यंत अशोकाच्या गिरिलेखांपैकी १४ लेखांचा शोध लागला आहे. या १४ पैकी बहुतेक लेख अशोकाच्या कारकिर्दीच्या १३ व्या आणि १४ व्या वर्षातील आहेत. हे सापडलेले सर्व गिरिलेख मगध पासून खूप दूर आहेत. या गिरिलेखांतून अशोकाचा धर्म व त्याची राज्यपद्धती यांच्या संबंधीची बरीच माहिती मिळते.
कंदाहार येथील वस्तु संग्रहालयात असलेला ग्रीक आणि आर्मेनीक असा द्विभाषीक शिलालेख
प्रथम गिरिलेखाचा शोध शाहबाजगडी येथे लागला. हे ठिकाण आजच्या पाकिस्तानच्या पेशावर प्रांताच्या पुढे युसफझाई येथे आहे. इतर गिरिलेख गिरनार, कालसी, मानसेरा इत्यादी ठिकाणी मिळाले आहेत.
लघु गिरिलेख :-
अशोकाचे लघु गिरिलेख रुपनाथ, मस्की, ब्रह्मगिरी(२) इत्यादी ठिकाणी आहेत. इकडे मस्की येथील लघु गिरिलेखाचा उल्लेख करावासा वाटतो कारण वर म्हटल्याप्रमाणे संशोधकांना अशोक हे नाव ज्या पहिल्या आणि एकुलत्या एक लेखात सापडले आहे तो लेख म्हणजे हा मस्कीचा लघु गिरीलेख. याची सुरवात "देवानां पियस असोकस..." अशी होते. यावरून सम्राटाचे नाव पियदस्सी नसून असोक(अशोक) आहे हे संशोधकांना कळले.
३. कलिंगलेख :-
कलिंग म्हणजे सध्याचे ओडिसा प्रांत. आधी म्हटल्या प्रमाणे अशोकाने कलिंगयुद्धानंतर तेथे दोन लेख उभारले. पहिला कलिंगलेख कलिंग मधील तोसली जवळील जौगड या ठिकाणी सापडला. या लेखाला 'प्रांतीय अधिकाऱ्यांसाठी लेख' असे आपण म्हणू शकतो कारण यात नागरिकांना न्यायाने वागवावे, त्यांच्यावर जोरजुलूम करू नये याबाबत बजावले आहे. दुसरा लेख हा तोसली जवळील धौली येथे सापडला. हा लेख सुद्धा अधिकाऱ्यांनाच उद्देशून आहे पण या लेखास 'सीमांत लेख' असे आपण म्हणू शकतो कारण या लेखात सरहद्दीवरील लोकांशी अधिकाऱ्यांनी कशाप्रकारे वर्तन ठेवावे हे सांगितले आहे.
सम्राट अशोकाने धम्मलिपीत कोरलेल्या १४ शिलालेखांचे मराठीत वर्णन. १. पूर्वी प्रियदराशी राजाच्या भटारखान्यात हजारों प्राणी मारले जात. आता धम्म समजल्यामुळे, येथून पुढे पशु हत्या निषेध आहे. २.
संपूर्ण राज्यभर तसेच इतर राज्यांच्या सीमेवर देखील मनुष्य आणि
जनावरांसाठी हॉस्पिटल आणि फार्मसी ची सोय. तसेच या फार्मसी जवळ औषधी
वनस्पतींची लागवड. मनुष्य आणि पशूंसाठी रस्त्याच्या दुतर्फा मोठी झाडे व
पाणपोई. ३. दर पाच वर्षांनी, राज्यातील सर्व कमिश्नर आणि कलेक्टर यांनी
आपल्या हद्दीतील सर्व गावांना भेटी देऊन लोकांच्या समस्या जाणून घेतल्या
पाहिजे. तसेच सर्व लोकांनी आपल्या आई वडील, मित्र परिवार, ब्राह्मण, श्रमण
यांचा आदर केला पाहिजे. सर्वांशी प्रेमाने बोलायला हवे. ४. माझे सर्व पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र मी दाखविलेल्या नीतीमार्गावर चालणार आहेत व हीच अपेक्षा मी माझ्या प्रजे कडून करत आहे. ५.
माझे अनेक दूत राज्यभर विखुरले आहेत. सर्व लोके सर्व व्यवहारात नीतिमत्ता
पाळतात का याकडे त्यांचे लक्ष असेल. तसेच कोणता अधिकारी लोकांना उगीचच
छळतोय अथवा त्यांच्याशी अन्यायकारक वागतो का हे ते पाहतील. ६. मी
शयनकक्षेत असो अथवा बागेत अथवा अंतःपुरात, माझ्या राज्याची मला प्रत्येक
बातमी समजली पाहिजे म्हणजे लोककल्याणाच्या निर्णय मला ताबडतोब घेता येईल.
दिवसातील माझा प्रत्येक प्रहर हा लोकांसाठीच असेल, माझं उर्वरित संपूर्ण
आयुष्य त्यांच्यासाठीच असेल. ७. प्रत्येक मनुष्याला उत्कर्ष करायचा
असतो, मात्र त्याच्यात तेवढी नैतिकता, सजगता आणि तळमळ असेल तरच तो तेथे
पोहचू शकेल. माझ्या राज्यात प्रत्येक माणसाला ही संधी असेल मग तो कुठलाही
पंथ मानणारा असो. ८. पूर्वी प्रियदर्शी राजा शिकारी साठी लांब यात्रा
करायचा मात्र येथून पुढे त्याच्या यात्रा लोकांच्या समस्या जाणून घेऊन त्या
निवारण्यासाठीच असेल. ९. लोकं उत्सवात किंवा लग्नात प्रचंड खर्च करतात
मात्र या दिखाव्यामुळे कुठलेही नीतिमान कार्य होत नाही. त्यापेक्षा त्यांनी
त्यांच्या घरातील नोकर चाकर, शेजारी, मित्रपरिवार व सगळ्यांशी प्रेमाने
वागावे. त्यामुळे त्यांचे जीवन नीतिमान होईल व त्यांना पुण्य लाभेल. १०.
खरी प्रतिष्ठा ही सत्ता आणि पदावर अवलंबून नाही तर लोककल्याणासाठी तुमची
किती तळमळ आहे यावर प्रतिष्ठा ठरते. लोककल्याणाच्या विचार करणे हा धम्म
आहे. लोकांनी खऱ्या प्रतिष्ठेचा अवलंब करावा. ११. लोकधर्म पाळणे या
सारखे धर्मदान नाही. आपला मित्र परिवार, नोकर, नातेवाईक, समाजातील प्रत्येक
घटक यांच्या बद्दल आपल्याला मैत्री असायला हवे. त्यांच्या सुख दुःखात आपण
त्यांना सदोदित मदत केली पाहिजे. हीच धम्माची शिकवण आहे. तेच सर्वश्रेष्ठ
धर्मदान होय. १२. प्रत्येक धर्मात चांगले विचार असतात. ते समजून न घेता
दुसऱ्या धर्माला नावे ठेवणे चुकीचे आहे. असे केल्याने तुम्ही तुमच्या
धर्माची कमकुवत शिकवण दाखवता. त्यापेक्षा चर्चा करा, दुसऱ्या धर्माची शिकवण
समजून घ्या. यातच सर्वांचे कल्याण आहे. १३. कलिंगातील युद्धात मारलेले
लाखों सैनिक पाहून प्रियदर्शी राजाचे मन दुखी झाले आहे. येथून पुढे जग
जिंकायचे ते केवळ धम्माच्या मार्गाने. हाच मार्ग योग्य आहे. १४. हा धम्म
प्रियदर्शी राजाने अनेक ठिकाणे कधी लघु, कधी मध्यम तर कधी दीर्घ स्वरूपात
लिहिले आहेत. त्याचे कारण म्हणजे तेथे उपलब्ध असलेला दगड. तसेच काही ठिकाणी
माझे लेख अर्धवट किंवा चुकीचे शब्द असतील तर ती सर्वस्वी चुकी तेथील
लिपिकाराची आहे. वरील शिलालेखातून आपल्याला हे समजते कि अशोकाला
त्याच्या प्रजेविषयी तसेच त्याच्या राज्यातील प्रत्येक प्राणिमात्राविषयी
प्रचंड आपुलकी होती. जर दूरदर्शनवर सम्राट अशोक,बुद्ध या संबधी मालिका
निर्माण केल्या गेल्या असत्या तर आज देशाची परिस्थिती नक्कीच वेगळी असती.
सम्राट अशोकांचा ९ वा शिलालेख
हा शिलालेख इ.स. पुर्व ( ख्रिस्त पुर्व ) ३ ऱ्या शतकातील आहे. मुंबई जवळ असणाऱ्या अत्यंत प्राचिन सोपारा ( आजच्या विरार जवळील नालासोपारा ) या ठिकाणचा हा शिलालेख आहे ! सोपारा ( आजचे नालासोपारा ) याचे अनेक ऐतिहासिक संदर्भ आजही उपलब्ध आहेत. सदर शिलालेख हा इ. स. पुर्व ३ ऱ्या शतकात सम्राट अशोकाने धर्मप्रचारासाठी मौर्य ब्राम्ही लिपीत लिहिलेला आहे.
यात असं लिहिल आहे की, सम्राट अशोक असे म्हणत आहे की....
"रोगराई, विवाह, जन्म, यात्रा याप्रसंगी सामान्य ( हिंदू ) माणसे अनेक धार्मिक विधी करतात. ( धार्मिक विधी फक्त हिंदू धर्मात होतात ) अशावेळी माता आणि पत्नी अनेक धार्मिक विधी करतात. ( हिंदू स्त्रिया आजही हे करतात )
शिलालेखात सम्राट अशोक पुढे लिहितात ...
" …धार्मिक विधी निश्चित कराव्यात ( अस अशोक सम्राट म्हणतात ) पण याच्या सोबतच ( धार्मिक विधी सोबतच ) सदाचाराचे फळ चांगले मिळते. ( सदाचार म्हणजे चागले आचार / विचार )
पुढे लिहिल आहे की ...
बंदी, दास - दासी यांना माणुसकीने वागविणे. ज्येष्टांचा आदर करावा पशुपक्षांवर दया दाखवणे. ब्राह्मण आणि श्रमणांप्रति औदार्य असणे ही सदाचाराची कामे आहेत ....
सम्राट अशोक सांगतात...
...ब्राह्मण आणि श्रमणांप्रति औदार्य बाळगा अस म्हणतात
सम्राट अशोकांनी बौद्ध धर्म वाढवला असे म्हटले जाते. त्याच अशोकांचे दुसरे मत असे की, ब्राह्मणांप्रति औदार्य ( आदर ) दाखवा हे सदाचाराचे काम आहे. सरसकट ब्राम्हणांवर टिका करणाऱ्या त्या मुर्ख लोकांना सम्राट अशोकांचे हे सदाचाराचे काम पटतयं काय ? की स्वतःचेच खरं करण्याच्या किंवा कोणीतरी बोंबलतयं म्हणून आपणही बोंबलायचं या नादात सत्य नाकारतोय ? आता असं म्हणू नका की हा शिलालेख खोटा आहे म्हणून ... हा शिलालेख आजही तुम्हाला मुंबईतील छत्रपती श्रीशिवाजी महाराज संग्रहालयात पहायला मिळेल फक्त डोळे उघडे ठेवण्याची आणि तो शिलालेख वाचण्याचा मनाचा मोठेपणा तुमच्या जवळ असायला हवा !
कर्नाटकातील रायचूर जिल्ह्यातील एक पुरातत्त्वीय स्थळ. १८७० मध्ये
रॉबर्ट ब्रूस फूट या भूवैज्ञानिकाने या भागाचे सर्वेक्षण केले. येथे
चालुक्य राजा जयसिंह जगदेकमल्ल (इ .स. १०२७), यादव राजा सिंघण (इ. स.
१०१५–१०४२), विजयनगरचे राजे अच्युतराय (इ. स. १५२९–४२) आणि सदाशिवराय (इ.
स. १५४२–७०) यांचे कोरीव लेख सापडले आहेत. त्यात मस्कीचे वर्णन ‘राजधानी
पिरीया मोसंगी’ असे केले आहे. इ. स. १९१५ मध्ये सी. बीडोन यांनी येथे
सम्राट अशोकाच्या (कार. इ. स. पू. २७३–२३२) एका लघुलेखाचा शोध लावला.
मेसर्स टेलर अँड सन्स तर्फे ते सोन्याचा शोध घेत होते. हुट्टी येथील एल.
बिशप यांच्या साहाय्याने त्यांनी या लेखाची दृष्टप्रत तयार केली. १९१५
मध्ये एच. कृष्णशास्त्री यांनी या लेखाचे भाषांतर प्रसिद्ध केले. तथापि इ.
स. १८७७ मध्ये कनिंगहॅम यांनी सर्वप्रथम प्रसिद्ध केलेल्या इन्स्क्रिप्शन्स ऑफ अशोक या ग्रंथात मस्की लेखाचा उल्लेख नाही. मस्की येथील लघुलेख संक्षिप्त स्वरूपाचा आहे.
इ. स. १८३७ मध्ये जेम्स प्रिंसेप याने ब्राह्मी आणि खरोष्ठी लिपींचे
वाचन केल्यावर भारतीय पुराभिलेखविद्येची सुरुवात झाली. सम्राट अशोकाच्या
लेखांचे वाचन होऊन देखील त्याची निश्चित ओळख पटत नव्हती. कारण तोवर वाचन
झालेल्या महत्त्वाच्या दीर्घ आणि स्तंभ लेखांत अशोकाचा उल्लेख ‘देवानामपिय
पियदस्सी राजा’ व ‘पियदसि लाजा (राजा) मागधे’ (बैराट-कलकत्ता लेख) असा
होता. सारनाथ येथील स्तंभलेखात ‘पाट’ (पाटलीपुत्र) असा उल्लेख असावा, पण
त्याबाबत निश्चित अनुमान करता येत नव्हते. त्यामुळे जेम्स प्रिंसेप याने हा
राजा श्रीलंकेतील अनुराधापूरचा राजा ‘देवानामपिय तिस्स’ असावा असे गृहीत
धरले. तिस्स हा अशोक याचा समकालीन होता आणि त्याच्याच राज्यकालात श्रीलंकेत
महिंद्र आणि संघमित्रा या अशोकाच्या मुलांनी बौद्ध धर्माचा प्रसार केला.
इ. स. १८३७ मध्ये जॉर्ज टर्नर या इंग्रज अधिकार्याने महावंश, तसेच इ. स. १८७९ मध्ये हर्मन ओल्डेनबर्ग याने दीपवंश
या श्रीलंकेच्या प्राचीन इतिहासाचे वर्णन असलेल्या ग्रंथांचे भाषांतर
केले. यामध्ये सम्राट अशोक याला ‘पियदस्सी’ ही उपाधी लावली होती; तसेच
मौर्य राजघराण्याचीही सविस्तर माहिती होती. यामुळे अशोकबाबतची संदिग्धता
काहीशी कमी झाली. प्रस्तुत लेखाच्या सुरुवातीस ‘देवानं पियस असोकस’ असा
स्पष्ट उल्लेख असल्याने उर्वरित लेखांत उल्लेख असलेला प्रियदर्शी राजा हा
मगधचा मौर्य सम्राट अशोक हाच होता हे निश्चित झाले.
मस्की येथील लघुलेख. अशोकाच्या लेखांमध्ये काळाचा उल्लेख त्याच्या राज्यारोहणाच्या वर्षाने ‘वसाभिसीत्तेन’ (अभिषिक्त वर्ष) केला जातो. बौद्ध परंपरेनुसार अशोक हा युवराज नव्हता. बौद्ध साहित्यानुसार थोरला भाऊ सुसीम याच्याशी झालेल्या सत्तासंघर्षामुळे अशोकाचा औपचारिक राज्याभिषेक हा सत्ता हाती आल्यावर चार वर्षांनी झाला ( इ. स. पू. २६९). राज्याभिषेकानंतर आठ वर्षांनी, म्हणजेच शासन काळाच्या नवव्या वर्षी (इ. स. पू. २६१-६०) कलिंग युद्ध झाले. त्यात झालेल्या अपरिमित हानीमुळे अशोक बौद्धमताकडे वळला. प्रस्तुत लेखात अशोक दोन महत्त्वाचे उल्लेख करतो. दहाव्या शासन वर्षात तो उपासक झाला. मात्र या वर्षी त्याने विशेष प्रगती न केल्याची नोंद केली आहे. त्यानंतरच्या दीड वर्षात त्याने अधिक उत्साहाने संघाच्या जवळ गेल्याचे आवर्जून नोंद केले आहे. सहस्राम लघुलेखातील याबाबतचा उल्लेख महत्त्वाचा आहे. अशोकाने २५६ दिवस धम्माच्या प्रसाराकरिता धम्मयात्रांचे आयोजन केले. त्याच्या अखेरच्या दिवशी या लेखाचे आयोजन केले गेले. मस्की येथील लघुलेख संक्षिप्त स्वरूपाचा असल्याने त्यात हा विशिष्ट उल्लेख नाही. हा काळ सर्वसाधारणपणे इ. स. पू. २५७ असावा. अशोकाच्या सर्व प्रकारच्या कोरीव लेखांत ‘लघुलेख’ हे सर्वांत प्राचीन समजले जातात. या लघुलेखांचे दोन प्रकार आहेत : क्रमांक १ आणि क्रमांक २. पैकी मस्की येथील लघुलेख हा क्र. १ चे संक्षिप्त रूप आहे. लेखाची भाषा मागधी प्राकृत असून तो अशोककालीन ब्राह्मी लिपीमध्ये कोरलेला आहे. मागधी प्राकृताच्या नियमाप्रमाणे या लेखात ‘र’ ऐवजी ‘ल’ आणि ‘श’, ‘ष’ ऐवजी ‘स’ चा वापर केलेला दिसतो. लघुलेख क्र. २ देखील दक्षिणेतच काही विशिष्ट ठिकाणी सापडतो. कर्नाटकात मस्की बरोबरच नित्तुर, उदेगोलम, गाविमठ, पालकीगुंडू, जतिग – रामेश्वर, ब्रह्मगिरी आणि सिद्दापूर येथे अशोकाचे लघुलेख सापडले आहेत. कर्नाटक हा अशोकाच्या साम्राज्याचा दक्षिणेकडचा भाग असावा. याशिवाय शेजारील आंध्र प्रदेशात राजुल-मंडगिरी, एरगुडी येथेही अशोकाचे लेख सापडले आहेत. एवढ्या मोठ्या संख्येने एका विशिष्ट भूभागात लेख सापडणे, हे त्या भागाचे राजकीय आणि भौगोलिक महत्त्व सिद्ध करते. जतिग – रामेश्वर, ब्रह्मगिरी आणि सिद्दापूर येथील लघुलेख क्र. १ मध्ये ही आज्ञा अशोकाच्या इच्छेनुसार सुवर्णगिरी येथे कार्यरत असलेल्या आर्यपुत्राने (युवराज) इसीला येथील महामात्रांना उद्देशून दिली असल्याचे नमूद आहे. या प्रदेशावर प्रत्यक्ष युवराजची नेमणूक झाली असल्याने या भागाचे राजकीय महत्त्व सिद्ध होते. बौद्ध साहित्यात स्वतः अशोकाची सुद्धा उज्जयिनी आणि तक्षशिला अशा महत्त्वाच्या ठिकाणी राज्यपाल म्हणून नेमणूक झाली होती अशी नोंद आहे. इ. स. १९५३ मध्ये मस्की लेखाचा शोध लागल्यावर मध्य प्रदेशील दतिया जिल्ह्यात गुजर्रा येथे अशोकचा लघुलेख क्र. १ सापडला. यात पहिल्या ओळीत ‘देवा(नम) पिय(स) पियदसिनो असोकराजस’ असा उल्लेख आढळला. मस्की नंतर अशोकाच्या नावाचा स्पष्ट उल्लेख असलेला हा दुसरा लेख होता. इ. स. १९७७ मध्ये बेल्लारी जिल्ह्यातील शिरूगुप्पा तालुक्यातील नित्तूर येथे अशोकाचे लघुलेख क्र. १ आणि २ सापडले. यांतील लघुलेख क्र. १ चे वैशिष्ट्य म्हणजे या लेखाच्या शेवटी ‘यथा राजा असोको तथाति’ (राजा अशोकाच्या आज्ञेप्रमाणे) असा उल्लेख आहे. तसेच लेख क्र. २ च्या सुरुवातीस ‘राजा असोको हेवम अहा’ (राजा अशोक म्हणतो की) असे उल्लेख आहेत. अशोकाच्या नावाचा शेवटचा उल्लेख नित्तूरच्या शेजारील उदेगोलम येथे १९७८ मध्ये सापडला. उदेगोलम येथे लघुलेख क्र. १ आणि २ सापडले आहेत. पैकी पहिला लेख भग्न असल्याने त्यात अशोकाच्या नावाचा उल्लेख होता किंवा कसे हे सांगता येत नाही. मात्र लघुलेख क्र. २ च्या सुरुवातीस ‘राजा असोको देवानंपियो’ असा उल्लेख आहे. मस्की येथील लेखाचा अनुवाद पुढीलप्रमाणे आहे : “…देवनाम प्रिय अशोक … अडीच वर्षांहून अधिक काळ मी एक सामान्य बौद्ध उपासक (बुद्ध शाक्य) झालो आहे. पण पहिल्या वर्षी मी फारशी प्रगती केली नाही. आता एक वर्षापेक्षाही अधिक काळ मी भिक्षूंच्या संघाकडे आकृष्ट झालो आहे आणि अधिक उत्साही झालो आहे. या काळापर्यंत जंबुद्वीपातील (अशोकचे साम्राज्य) देव माणसांची संगत धरीत नसत. आता ते त्यांच्यात मिसळतात. हे लक्ष्य गरीब, धनवान सर्वांनाच साध्य करता येईल. अशा प्रकारे लहान थोर सर्वांनीच ही प्रगती करावी. अशा तऱ्हेने प्रगती केल्यास ही गुंतवणूक वाढेल, पुन्हा वाढेल आणि पुन्हा वाढली त्याच्या दीड पट वाढेल.” बौद्ध संघ संघटित, मजबूत व चिरस्थायी कसा होईल ह्याविषयीच्या उपाययोजना या लेखात सांगितलेल्या आहेत. सारनाथ येथील अशोकस्तंभ
नेपाळ तरई येथील अशोकस्तंभ
कंगनहल्ली येथील अशोकाचे त्याच्या २ पत्नींबरोबरचे शिल्प. अशोकाचे हिंदुस्थानातील शिलालेख आणि स्तंभ असलेली ठिकाणे
आज भारताचे राजचिन्ह असलेला चार सिंहांकित ‘अशोक स्तंभ’ ही त्याचीच देणगी आहे. सारनाथ या ठिकाणी उत्खननात सापडलेला हा मूळ स्तंभ आजमितीस सारनाथ वस्तू संग्रहालयात ठेवलेला आहे. तो सुमारे सात फूट उंचीचा आहे. बौद्ध धर्माचा प्रसार भारताबाहेर करण्यात मोठे योगदान अशोकाचे होते. ‘देवानाम् प्रिय .. प्रियदर्शी’ अशी त्याची पदवी होती. अशोकाबाबतही काही इतिहास अभ्यासकांचा दावा असा आहे, की प्राचीन भारतात मौर्यवंशीय अशोक आणि गुप्तवंशीय अशोक असे दोघे वेगवेगळ्या कालखंडात होऊन गेले.
येवढे बलाढ्य साम्राज्य आणि त्याचा सम्राट अशोक एका शिलालेखात म्हणतो (सर्व मुनिसे पजायमा) सर्व मानव माझे संतान आहे. दुसर्या एका लेखात म्हणतात जनहिताला मी आपले सर्वश्रेष्ठ कार्य समजतो. यावरच एकच दिसून येत आहे की, सधम्म आणि राजकारण यांचे एकत्रीकरण करून एवढे मोठे साम्राज्य चालवणे जगातील कोणत्याही राजाला सम्राट अशोकाशिवाय जमलेले नाही.
अश्या या महान सम्राटाला नक्कीच मानाचा मुजरा !!
सम्राट अशोक हा प्राचीन भारतात कल्याणकारी राज्यशासन मोजायचा मानदंडच होय. इतकेच नव्हे, तर प्रचंड क्षेत्र एका छत्राखाली आणणारा तो पहिला सम्राट होता. त्याचे साम्राज्य किती दूरदूरवर पसरले होते, त्याची साक्ष देणारे शिलालेख पूर्व-पश्चिमेकडे सुदूर सापडतात. शिलालेखांवरती सम्राटाची प्रशंसा अर्थातच अपेक्षित आहे. सम्राट कृतीमध्ये आदर्श असणार-नसणार, हे तर आलेच. परंतु अशा शिलालेखांमध्ये सम्राटाचे आदर्श काय होते, ते कळू शकते. अथवा वर्धिष्णू राज्यामधील प्रतिष्ठित लोकांच्या सम्राटाकडून काय अपेक्षा होत्या? त्याबद्दल आपल्याला कल्पना येऊ शकते. ("आपण अमुक केले" असा डंका कधी फायद्याचा असणार आहे? लोकांना त्या अमुक बाबतीत स्वारस्य असेल तरच.)
अशोकाच्या शिलालेखांचे महत्त्व एका वेगळ्याच अभ्यासशाखेतही जाणवते. शिलालेखांचा प्राथमिक हेतू म्हणजे सुशिक्षित-साक्षरांना काही संदेश पोचवणे. अलंकारिक शैली असण्याचा हेतू दुय्यम. म्हणूनच प्राकृत भाषेच्या स्थानिक प्रकारांमध्ये लेखन झालेले दिसते. संशोधनासाठी ही साधनसामग्री अधिक "थेट" आहे. संस्कृत नाटकांमध्येही वेगवेगळ्या प्रकारची प्राकृत भाषा आपल्याला सापडते. परंतु त्यात लोकांच्या खर्याखुर्या वापरापेक्षा रूढ-अलंकारिक वापराचे संकेत होते. राजा-ब्राह्मण संस्कृतात बोलणार, उच्चवर्गीय स्त्रिया आणि राजा-ब्राह्मण सोडून अन्य पुरुष शौरसेनी प्राकृतात बोलणार, गाणी गाणार महाराष्ट्री प्राकृतात, शूद्र किंवा खलनायक बोलणार ते मागधी प्राकृतात. मग नायिका मगधातली असो, आणि शूद्र मध्यभारतातला असो - ती बोलणार शौरसेनी, तो बोलणार मागधी!
येथे संदर्भासाठी अशोकाच्या शिलालेख क्रमांक ४च्या दोन आवृत्ती देत आहे - गिरनार (गुजरात) आणि धौली (उडिसा). यांच्यात प्राकृत भाषा भिन्न दिसते. मला तरी सध्या प्राकृतापेक्षा संस्कृत कळायला सोपे जाते. (खरे तर असा खूप लोकांचा अनुभव आहे. संस्कृतात अधिक विपुल साहित्य उपलब्ध आहे, आणि पठन-पाठन परंपरा अव्याहत आहे. प्राकृत ही जरी मराठीला अधिक "जवळची" - खापरपणजी नव्हे तर आजी लागते - तरी प्राकृत समजायला जड जाते.) म्हणून प्राकृताबरोबर संस्कृत"छाया" दिलेली आहे. शिवाय मराठी भाषांतरही दिलेले आहे.
पाठ्य मला वुलनरच्या प्राकृत पाठ्यपुस्तकात मिळाले. (संदर्भ खाली दिलेला आहे.) मात्र छपाईत अनेक चुका असाव्या असे वाटते. शिवाय माझ्या संस्कृतछायेतही काही प्रामादिक प्रयोग आहेत. क्षमस्व.
गेल्या काळात शेकडो वर्षे प्राणहत्या, भूतमात्रांची हिंसा, ज्ञातींचा तसेच साधु(श्रमण)-ब्राह्मणांचा अ-सन्मान वाढतच चालला होता.
त अज देवानं प्रियस प्रियदसिनो राञो धंमचरणेन भेरीघोसो अहो धंमघोसो विमानदसणा च हस्तिदसणा अगिखंधानि च अञानि च दिव्यानि रूपानि च दसयित्पा जनं ।
से अज देवानं पियस पियदसिने लाजिने धंमचलनेन भेलिघोसं अहो धंमघोसं विमानदसनं हथीनि अगिकंधानि अंनानि च दिवियानि लूपानि दसयितु मुनिसानं ।
तद् अद्य देवानां प्रियस्य प्रियदर्शिनो राज्ञो धर्माचरणेन भेरीघोषो अभवत् धर्मघोषः, विमानदर्शनात् च हस्तिदर्शनात्, अग्निस्कंधानि च अन्यानि दिव्यानि रूपाणि च दर्शयित्वा जनम् ।
तेव्हा आज देवांच्या आवडत्या प्रियदर्शी राजाच्या धर्माचरणाने धर्माचा घोष नगार्याच्या घोषासारखा झाला. विमानदर्शन [विमान म्हणजे देवळाचे उत्तुंग शिखर असावे], हत्तीदर्शन, अग्नि-स्कंध आणि अन्य दिव्य रूपे लोकांना दाखवून (घोष झाला).
जसे अनेक शेकडो वर्षांसाठी नव्हते, असे आज देवांना प्रिय प्रियदर्शी राजाच्या धर्मानुशासनामुळे वाढलेले आहे - प्राणांची हत्या नाही, भूतमात्राबाबत अहिंसा, ज्ञातींचा आदर, श्रमण-ब्राह्मणांचा आदर, मातापित्यांची शुश्रूषा, वृद्धांची शुश्रूषा.
एस अञे च बहुविधे धंमचरणे वढिते वढयिसति चेव देवानं प्रियो प्रियदसी राजा धंमचरणं इदं ।
एतस्मै अर्थाय इदं लिखितम् [लेखयितम् - ?संस्कृत रूप चुकले असावे?] अस्य अर्थस्य वृध्यै युजन्तु हीना च मा द्रष्टव्या । द्वादशवर्षाभिषिक्तेन देवानां प्रियेण प्रियदर्सिना राज्ञा इदं लिखितम् ।
या कारणासाठी हे लिहविले आहे. या अर्थाच्या वृद्धीस जुटावे, हीन मानू नये. अभिषिक्त होऊन बारा वर्षे झालेल्या देवांना प्रिय प्रियदर्शी राजाने हे लिहविले आहे.
*लेखनात अशुद्ध/चुकलेली रूपे असल्यास सांगावे. खालील पहिल्या प्रतिसादात शुद्धिपत्र आहे, तिथे नोंद केली जाईल. ** प्राकृत मूलपाठ्याचा स्रोत : Alfred C. Woolner. Introduction to Prakrit. मूळ प्रकाशनाची दुसरी आवृत्ती १९२८, पुनर्मुद्रण : मोतिलाल बनारसीदास प्रकाशन, दिल्ली १९९९
इतिहासकारांनी अशोकाचे कोरीव लेख (इनस्क्रिप्शन) तीन वर्गांत विभागिले आहेत:
१. प्रमुख शिलालेख (मेजर रॉक ईडिक्ट) प्रमुख शिलालेख सर्वसामान्य जनतेला उद्देशून होते. अशोकाची धोरणे, विशेषतः त्याच्या धम्माची शिकवण, जनतेपर्यंत पोचवणे हा त्यांचा हेतू होता. उदा. पहिल्या प्रमुख शिलालेखात प्राणीहत्या करू नये असा आदेश दिला आहे. आणि प्रियदर्शी अशोकाच्या स्वयंपाकघरात ह्यापूर्वी दररोज शेकडो पशूंची मांसासाठी कत्तल होत असे. पण प्रस्तुत शिलालेख लिहिताना फक्त तीनच प्राण्यांची (२ मोर आणि एक हरीण) हत्या झालेली आहे. भविष्यात मात्र हे ३ प्राणीही मारले जाणार नाहीत, अशी ग्वाहीदेखील हा शिलालेख देतो.
२. दुय्यम शिलालेख (मायनर रॉक ईडिक्ट) दुय्यम शिलालेख हे बौद्ध धर्माच्या अनुयायांसाठी होते.
३. स्तंभलेख (पिलर ईडिक्ट)
स्रोत: रोमिला थापर ह्यांचे 'अशोक अँड दी डिक्लाइन ऑफ़ मोर्याज़'. इथे थापरबाईंनी केलेला प्रमुख शिलालेखांचा अनुवाद त्यांना श्रेय न देता दिलेला आहे. ह्या अनुवादात त्यांना प्राध्यापक ए. एल बाशम ह्यांनी मदत केली होती. दुव्यावरील इतर शिलालेखांचे अनुवाद तपासलेले नाहीत. तेदेखील थापरबाईँच्या पुस्तकातूनच उचललेले असावेत.
खालील माहिती 'भारतीय पुरालेखोंका अध्ययन' या डॉ. शिवस्वरूप सहाय यांनी लिहिलेल्या पुस्तकावरून -
शिलालेख : बेसनगर गरुडध्वज अभिलेख
स्थान : बेसनगर (प्राचीन आकर) जिल्हा - भिलसा (विदिशा) , मध्यप्रदेश
भाषा : प्राकृत
लिपी : ब्राह्मी
काळ : राजा भागभद्राच्या शासनकाळाचे १४ वे वर्ष (~ इ.स.पू. २००)
विषय : यवन दूत हेलिओडोरसने तक्षशिलेहून विदिशेला यऊन केलेली गरूडध्वजाची स्थापना
संदर्भ : Archaeological Survey of India, Annual Report (1908-1909) पृष्ठ १२६,
भांडारकर जे.व्ही.आर. ए.एस. ,२३ , पृष्ठ १०४
मूळ पाठ
भाग १
१. [दे]वदेवस वा[सुदेव]स गरुडध्वजो अयं
२. कारितो इ[अ] हेलिओदोरेण भाग -
३. वतेन दियस पुत्रेण तख्खसिलाकेन
४. योन-दू़तेन [आ] गतेन महाराजस
५. अंतलिकितस उपन्ता सकासं रञो
६. कासी -पु[त्र]स [भा]गद्रस त्रातारस
७. वसेन च[तु]दसेन राजेन वधमानस (||)
भाग२
१. त्रिनि अमुत-पदानि [इअ] [सु] - अनुठितानि
२. नेयति [स्वगं] दम-चाग अप्रमाद (||)
संस्कृत भाषांतर -
भाग १.
देवदेवस्य वासुदेवस्य गरुड-ध्वज अयं कारितः इह हेलियोदोरेण भागवतेन दियस्य
पुत्रेण तक्षशिलाकेन यवन दूतेन आगतेन महाराज अंतलिकितस्य उपान्तात् सकाशं
राज्ञः काशीपुत्रस्य भागभद्रस्य त्रातु: वर्षेण चतुर्दशेन राज्येन
वर्धमानस्य |
भाग २.
त्रीणि अमृत पदानि इह सुअनुष्ठितानि नयन्ति स्वर्गं - दामः त्यागः अप्रमादः |
मराठी भाषांतर -
भाग १.
१. देवांची देवता वासुदेव याचा हा गरुडध्वज
२. स्थापित केला गेला हेलिओडॉरस द्वारा
३. दियस चा पुत्र (,) भागवत धर्मानुयायी (,)तक्षशिलेचा
४. यवन दूत याने येऊन(-) महाराज
५. अंतलिकितस (Antialkaidas) याच्या जवळचा राजा
५. काशीपुत्राच्या भागभद्राच्या तारक
६. वर्धमान याच्या राज्याच्या चौदाव्या वर्षी
भाग २.
१. ही तीन अमृतपदे सुअनुष्ठानाने
२. स्वर्गात घेऊन जातात - दम , त्याग आणि अप्रमाद.
साधे मराठी -
१. महाराज अंतलिकितस (अँटिअल्काईडस) याच्या दियसपुत्र हेलिओडोरस नावाच्या
भवगद्भक्त यवनदूताने, अंतलिकितसचा त्राता कासीपुत्र भगभद्र याच्या
राज्याच्या चौदाव्या वर्षी तक्षशिलेहून येऊन इथे हा देवांचा देव वासुदेव
याचा गरुडध्वज उभारला.
२. संयम, त्याग आणि निर्दोष वर्तन यांमुळे स्वर्ग प्राप्त होतो.
गरुडध्वजाचे ऐतिहासिक महत्त्व -
धर्मेतिहासाच्या दृष्टीने हा स्तंभ काही महत्त्वाच्या गोष्टींवर प्रकाश टाकतो.
या स्तंभावर गरुड अंकित आहे. गरुड हे विष्णूचे वाहन मानलेले असल्याने
त्याकाळी (इ.स.पू.२०० ते १५०) वैष्णव धर्माला ऊर्जितवस्था प्राप्त झालेली
होती हे स्पष्ट होते. गरुड हा विष्णूचे प्रतिक म्हणून घेतलेला आहे.
या स्तंभावरील लेखाच्या पहिल्याच पंक्तीत 'गरुडध्वज अयं कारिते' असे
म्हटलेले असल्याने हा स्तंभ वैष्णव धर्माच्या विशेष प्रयोजनानेच स्थापित
केलेला आहे हे स्पष्ट होते.
या लेखात वैष्णवांचे आराध्य दैवत वासुदेव याचा नावाने उल्लेख आहे.
पाणिनी, पातंजली यांनी वासुदेव या नावाचा देव असल्याचे उल्लेख केले
आहेत.मेगास्थिनस (इ.स.पू. ३५०-२९०) यानेही मथुरेला शौरसेनी लोकांच्या
'वासुदेवकृष्ण' (हेरिक्लीज) उपासनेचा उल्लेख केलेला आहे.
वासुदेवाला 'देवदेवस' म्हणजे देवांचा देव / प्रमुख देव असे संबोधले आहे. म्हणजे येथे वैष्णव देवतेला अधिक महत्त्व दिले गेले आहे.
कृष्णाला 'वासुदेव' या नावाने संबोधून त्याच्या बाळलीलांपेक्षा मोठेपणातील प्रगल्भ राज्यकर्त्या भूमिकेवर जास्त भर दिलेला आहे.
विदिशा हे महत्त्वाचे वैष्णव केंद्र होते असे स्तंभावरील 'इयं' (इथे) या शब्दाने दिसते.
हेलिओडॉरसला 'भागवत' म्हणजे (कृष्ण) भगवानाचा भक्त असे संबोधले आहे.
एका यवन राजाचा यवन दूत वैष्णव भागवत धर्माचा अनुयायी होता असे दिसते.याचा
अर्थ परदेशीय लोकांमध्येही वैष्णव धर्माचा प्रसार झाला होता.
राजा अंतलिकित (जो ऍन्टीअल्काईडस असावा असे मानले जाते) हा तक्षशिलेत
राज्य करत होता. त्याच्या राज्यातील त्याचा यवन दूत ज्याअर्थी हा वैष्णव
धर्मस्तंभ विदिशेला येऊन स्थापन करतो त्याअर्थी
अंतलिकिताचाही वैष्णव धर्माला पाठिंबा नपेक्षा संमती असावी. मथुरा आणि
आसपासचा प्रदेश यांबरोबरच उत्तर पश्चिमेच्या यवन राज्यांतही वैष्णव
धर्माचा प्रसार झालेला असावा. परंतु उल्लेखनीय गोष्ट अशी की या यवनी
राज्याच्या भागात वैष्णव धर्माची महती दर्शवणारा एकही पुरावा सापडत नाही.
या लेखाच्या दुसर्या भागात स्वर्गात जाण्यासाठी ज्या तीन मार्गांचा
उल्लेख आहे ते महाभारत (दमस्त्यागोऽ प्रमादश्च एतेष्वमृतमहितम् - ५/४३/२२)
आणि भग्वदगीतेतून (१६/१-३) घेतलेले आहेत. याचा अर्थ तोवर या ग्रंथांचे
प्रमाणत्व प्रस्थापित होऊन यवनांपर्यंतही पोचलेले होते.
वैदिक देवता विष्णू , वासुदेवकृष्णाचे उन्नयन आणि वैष्णव धर्माचा विकास
या स्तंभावरील लेखाच्या अनुषंगाने आपण वैष्णव धर्म, त्यातील भगवान
श्रीकृष्णाचे स्थान आणि या धर्माचा सार्वत्रिक विकास यांबद्दल विचार करू
शकतो.
दैवतशास्त्राचे एक महत्त्वाचे भाष्यकार श्री. रा.चिं.ढेरे यांनी अनेक
स्थानिक वीरपुरुषांचे उन्नयन कसे झाले आहे आणि त्यांना वेदातील उल्लेखांचे
वेष्टन चढवून त्यांचे हिंदू धर्मात महत्त्वाची देवता म्हणून प्रस्थापन कसे
झाले आहे हे सप्रमाण दाखवलेच आहे.
या विषयावर अनेक संशोधकांनी आपापली मते मांडली आहेत. त्यांच्यात तात्त्विक
मतभेद दिसले तरी स्थानिक महत्त्वाच्या व्यक्ती आणि प्रथा यांचे हिंदू
धर्मात सामिलीकरण झालेले आहे आणि ढेरे यांच्या भाषेत त्या देवतेचा संस्कृत
'पावित्र्यव्यूह' नंतर रचला गेला आहे.
मल्लारी/खंडोबा, बिरोबा, विट्ठल, तिरुमलै श्रीनिवास, अय्यप्पा स्वामी
स्कंद, ज्येष्ठा लक्ष्मी या अर्वाचिन देवतांबरोबरच गणपती सारख्या प्राचिन
देवतेचेही लोकदेवता स्वरूपापासून वैदिक देवता/अवतार असे उन्नयन झालेले आहे
हे आपण जाणतोच.
श्रीकृष्णही याला अपवाद नाही.
प्रचलित विद्वत्विचारानुसार वैष्णव धर्माची उत्पत्ती नारायण नामक
'अऋग्वेदिक' देवतेपासून झाली असावी. या देवतेला यजुर्वेदात वैदिक
देवतांमध्ये महत्त्वाचे स्थान मिळाले. यालाच आदिपुरुष ही उपाधी लाभली. या
नारायणाच्या संप्रदायाला भागवत धर्म असे नाव मिळाले.
या भागवत देवतेप्रित्यर्थ पंचरात्र सत्र केले जात असे ज्यातून पंचरात्र संप्रदाय निर्माण झाला.
ऋग्वेदात उल्लेख असणारा विष्णू हा इंद्र या सर्वात महत्त्वाच्या देवतेचा
सहायक देव होता. त्याचे स्थान इंद्रापेक्षा कितीतरी खाली होते, तो या
भागवत धर्मात समाविष्ट होऊन नारायणाशी तादात्म्य पावला. नारायण भगवान
विष्णूच्या संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आणि वसुदेव या चार प्रकट
रूपांपैकी वसुदेव या रूपाचा विकास महत्त्वाचा आहे. इंद्राच्या प्रमुख
सहायकांना 'वसु' असे म्हटले जाते. 'वसु' हे नाव वस्तीचे द्योतक आहे. वस्ती
करून राहाणार्यांचा देव तो वसुदेव असे म्हणता येते.
वसुदेव हा यदु, अंधक आणि वृष्णी
या गोपालक कुळांचा पूर्वापार देव होता. ही गोपालक कुले राजसत्ताधारक होती.
याच गोपालक कुलांच्या राज्यातील महत्वाची राजघराण्यात जन्मलेली (राजा
शूरसेनाचा पुत्र) आणि नंतर मथुरेचा राजा झालेली व्यक्ती म्हणजे 'वसुदेव' -
ज्याचे नाव या देवतेच्याच नावावरून दिले गेले.
त्यातूनच वसुदेवाचा पुत्र वासुदेवकृष्ण याचे उत्थान होऊन तोही या गोपालक
कुलांमध्ये पूजनीय बनला. तसेच पाणिनीच्या अष्टाध्यायीतील एका सूत्रात
'ऋष्यन्धक वृष्णि कुरुम्यश्र' (४/४/९८) असा उल्लेख आहे. पातंजलीने त्याचे
विवरण देताना अंधक आणि वृष्णी वासुदेवाची पूजा करत असत असे म्हटले आहे.
याचाच अर्थ असा की इ.स.पू. ४५० मध्ये 'कृष्णवासुदेव' याची प्रस्थापना यमुना
आणि (लुप्त?) सरस्वती यांच्या आसपासच्या राज्यांमध्ये प्रमुख दैवत म्हणून
झालेली होती. परंतु याचाच एक वेगळा अर्थ असाही निघतो की हा भूभाग सोडला तर
वासुदेव कृष्ण (पाणिनी रहात असलेल्या) गांधारसारख्या नैऋत्य राज्यांमध्ये
झालेला नसावा. अन्यथा पाणिनीने वासुदेवाचा 'वेगळ्या राज्यातील' लोकांचा देव
असा उल्लेख केला बनसता. इ.स.पू. तिसर्या शतकात या दैवताची स्थिती काय
होती ते कळत नाही. कारण त्याबद्दल पुरावे उपलब्ध नाहीत. परंतु यमुनेच्या
काठावरील मथुरा आणि कृष्णपुर (?) येथे वसणार्या शौरसेनी लोकांच्या
देवतेचे मेगास्थेनिसने (इ.स.पू. ३५० ते २९०) केलेले वर्णन 'हेराक्लीज' असे
आहे. याचे मूर्तीस्वरूप हातात
'गो-यष्टी धारण केलेला बाळकृष्ण' असे भासते. यावरून असा निष्कर्ष काढता
येतो की या नंतरच्या शतकातही कृष्णाची पूजा अतित्वात राहिली असावी.
बेसनगर गरुडध्वज लेख हा त्यानंतरचा (इ.स. पू. २००) पुरावा आहे. हा
पुरावा असे दर्शवतो की भागवत-वैष्णव धर्म भारताच्या आणखी मोठ्या भागात
पसरला होता. आता तो मध्यभारतातील विदिशेपासून वायव्येच्या तक्षशिलेपर्यंत
पसरला होता. परदेशांतून आलेल्या यवनांवरही या धर्माचा प्रभाव पडलेला
होता.तोवर महाभारत, भग्वद्गीता या ग्रंथांचा जनांमध्ये प्रसार होऊन त्यांना
जनमान्यता मिळालेली होती. महाभारतातील वचने स्तंभांवर कोरली जाण्याइतपत
महत्त्वाची ठरलेली होती. यापूर्वी दोनशे वर्षे पाणिनीच्या काळी
कृष्णाबरोबरच अर्जुन हाही दैवतीकरणाच्या मार्गावर होता. या दोहोंचीही पूजा
या (कृष्ण-अर्जुन) संप्रदायात होत असे. परंतु नंतरच्या काळात अर्जुन देव
बनून राहिला नाही.
या गरुडध्वजाने हेही सिद्ध होते की या काळापर्यंत नारायण - विष्णू - कृष्ण
यांची ऐक्यप्रक्रिया पूर्ण झालेली होती आणि वासुदेव हाच विष्णू ही
वैष्णवांची भूमिका सिद्ध झालेली होती. त्यामुळे अपरिहार्यपणे अर्जुनाचे
देवत्व गळून पदले.
असे असले तरी इ.स. पू. १५० पर्यंत भारताच्या इतर नैऋत्य, पूर्व आणि
दक्षिण भागात वैष्णव धर्म अस्तित्वात होता असे मानायला जागा नाही. याचे एक
कारण असे असावे की हा गरुडध्वज असलेली विदिशा ही शुंग हिंदू घराण्यातील
भागभद्राकडे होती. पूर्व भागात बौद्ध आणि जैन धर्मानुयायी राजांच्या राजवटी
अजूनही अस्तित्वात होत्या. तर नैऋत्य-दक्षिणेला परकीय क्षत्रप राज्ये
होती. नहपान या क्षत्रपाचे हिंदूकरण सुरू झालेले असले तरी पूर्ण झालेले
नव्हते. अंदाजे ५० वर्षांनंतर दक्षिणेला सातवाहन (सातकर्णी ) यांची सत्ता
स्थिरावली तेव्हापर्यंत ते हिंदू असूनही नारायणाची संकर्षण-वासुदेव ही रूपे
कृष्णाशी एकरूप समजत नव्हते असे दिसते.
वैष्णव धर्मियांनी हिंदू धर्माच्या राजरक्षणाचे दक्षिण-पूर्वेकडील
पुनरुत्थान झाल्यावर हळूहळू स्थानिक लोकांचे महत्त्वाचे दैवत
=विष्णू(=कृष्ण /विष्णूचे अन्य अवतार) या सूत्रानुसार पुराणांत त्यांची
वैदिकता प्रस्थापित करून विष्णू हे दैवत अधिकाधिक लोखाभिमुख केले आणि
वैष्णव धर्माची पताका भारतातच नव्हे तर कंबोडियापर्यंत फडकवली.
मौर्य घराण्याने अशोकाच्या काळात बौद्ध धर्म स्वीकारल्यावर कालांतराने
मौर्य घराण्याची राजसत्ता खिळखिळीत होऊ लागली. अशातच बृहद्रथ या शेवटच्या
मौर्यराजाची सत्ता उलथवून पुश्यमित्र शुंगाने आपली सत्ता प्रस्थापित केली.
शुंग सत्ताकाळात भारतातून हळूहळू बौद्ध धर्माचे उच्चाटन होत गेले आणि हिंदू
(वैष्णव) धर्माची पुनर्स्थापना झाली. बौद्ध धर्म गांधार, बॅक्ट्रिया वगैरे
प्रांतांपुरता सिमित झाला.
शुंग घराण्यातील एक राजा भागभद्र (यालाच इतरत्र भद्रक असेही म्हटले
जाते) याच्या काळात शुंगांची मूळ राजधानी पाटलीपुत्र असली तरी विदिशेतून
कारभाराची सूत्रे हलवणे सुरु झाले. भागभद्राचा काळ इ.स.पूर्व ११० मानला
जातो. याच्या राज्यकाळात हेलिऑडॉरसचा खांब रोवला गेला. त्याची माहिती पुढे
येईलच.
भागभद्राच्या काळातच तक्षशिलेवर अंतलिकित या इंडो-ग्रीक राजाचे राज्य
होते. गांधारातील हे राज्य बौद्धधर्मीय होते. या राजाविषयी फारशी माहिती
नसली तरी याच्या राजदूताने शुंग राजासाठी तयार केलेला स्तंभ पाहता दोन्ही
देशांत सौहार्दाचे संबंध होते असे मानण्यास जागा आहे. हेलिऑडॉरस याने
स्थापना केलेल्या या स्तंभावर पुढील मजकूर आढळतो.
महाराज अंतलिकित यांचा राजदूत दियसपुत्र हेलिओडोरस नावाच्या
भवगद्भक्ताने, काशी-राजकन्येचा पुत्र, त्राता भगभद्र याच्या राज्याच्या
चौदाव्या वर्षी इथे हा देवांचा देव वासुदेव याचा गरुडध्वज उभारला.
(संदर्भः हेलिऑडॉरस पिलर)
या लेखावरून पुढील गोष्टी लक्षात येतातः
१. गरुडध्वजः या स्तंभावर गरुड अंकित आहे. गरुडाचा
उल्लेख महाभारतात येतो. विनतेच्या पोटी जन्म घेणारा गरुड हे विष्णूचे वाहन
कसा झाला त्याची कथा आदिपर्वात आहे. त्यानंतर यादवांच्या/ कृष्णाच्या
ध्वजावर गरुडचिन्ह असल्याचा उल्लेखही येतो. कृष्ण आणि गरुडाचा संबंध असा
लागतो. भगभद्राच्या काळात (इ.स.पू.२०० ते १५०) वैष्णव धर्माला ऊर्जितवस्था
प्राप्त झालेली होती हे या ध्वजावरून स्पष्ट होते. या स्तंभावरील लेखाच्या
पहिल्याच पंक्तीत 'गरुडध्वज अयं कारिते' असे म्हटलेले असल्याने हा स्तंभ
वैष्णव धर्माच्या विशेष प्रयोजनानेच स्थापित केलेला आहे हे स्पष्ट होते.
२. वासुदेवः या लेखात वैष्णवांचे आराध्य दैवत वासुदेव
याच्या नावाचा उल्लेख आहे. वासुदेव हे कृष्णाचे नाव (वसुदेवपुत्र) हे
सर्वश्रुत आहेच. अष्टवसुंची कथा महाभारतात शंतनु आणि गंगेचे पुत्र म्हणून
येते. नववा वसु भीष्म. वसुंना इंद्राचे सहाय्यक मानले जाते. (विसुनानांनी
म्हटले आहे की वसुदेव हा यदु, अंधक आणि वृष्णी या गोपालक कुळांचा
पूर्वापार देव होता. त्याबद्दल मला विशेष माहिती नसल्याने येथे उहापोह करत
नाही.) हा यदु, अंधक आणि वृष्णी या गोपालक कुळांचा पूर्वापार देव होता. पुढे वसुदेवपुत्र वासुदेव (कृष्ण) हा या कुलांचा देव झाला असावा. (गोवर्धनाच्या गोष्टीतूनही इंद्राचे प्रस्थ कमी होऊन वैष्णव धर्म वाढीला लागल्याचे सूतोवाच असावे.)या
स्तंभावर वासुदेवाला देवांचा देव मानून सर्वोच्चपद बहाल केलेले आहे.
विदिशा ही हिंदू राजांची राजधानी असल्याने ते वैष्णव केंद्र होते असे
स्तंहावरील 'इथे' या शब्दाच्या उल्लेखाने दिसून येते. हेलिओडॉरसला 'भागवत'
म्हणजे (कृष्ण) भगवानाचा भक्त असे संबोधले आहे. एका यवन राजाचा यवन दूत
वैष्णव भागवत धर्माचा अनुयायी होता असे दिसते.याचा अर्थ गांधारात वैष्णव
धर्माचा प्रसार झाला होता असे म्हणण्यास जागा आहे. गांधारातील बौद्ध राजा
अंतलिकितानेही वैष्णव धर्माला मान्यता दिली असावी असे वाटते. भागवत
धर्माच्या दोन शाखा होत्या असे कळते. यापैकी एक शाखा बाळकृष्णाच्या लीलांना
मानणारी तर दुसरी शाखा गोपाळ याला मानणारी. स्तंभावर कृष्णाला 'वासुदेव'
या नावाने संबोधून त्याच्या बाळलीलांपेक्षा मोठेपणातील प्रगल्भ
राज्यकर्त्या भूमिकेवर जास्त भर दिलेला आहे.
परंतु उल्लेखनीय गोष्ट अशी की या यवनी राज्याच्या भागात वैष्णव धर्माची महती दर्शवणारा एकही पुरावा सापडत नाही.
चंद्रगुप्ताच्या दरबारातील मेगॅस्थेनिसने इंडिका या आपल्या ग्रंथात
भारतीय लोक, जमाती आणि राज्यांबद्दल विवेचन केलेले आहे. त्यात त्याने
शौरसेनी या हरे-कृष्णाला पुजणार्या जमातीचा उल्लेख केला आहे. मेगॅस्थेनिस
जरी याला हेरॅकेलिज म्हणत असला तरी हर्क्युलिसशी कृष्णाची सांगड घालून
अलेक्झांडरला कृष्णाचा वंशज सांगण्याचे प्रयत्न पूर्वीही झालेले आहेत.
३. लेखाचा उर्वरित भाग : या लेखाच्या दुसर्या भागात स्वर्गात जाण्यासाठी ज्या तीन मार्गांचा उल्लेख आहे ते महाभारत (दमस्त्यागोऽ
प्रमादश्च एतेष्वमृतमहितम् - ५/४३/२२) आणि भग्वदगीतेतून (१६/१-३) घेतलेले
आहेत. याचा अर्थ तोवर या ग्रंथांचे प्रमाणत्व प्रस्थापित होऊन
यवनांपर्यंतही पोचलेले होते.
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काही महत्त्वाची वाक्ये मला या लेखात मला जाणवली - एकंदरीत लेख खूप आवडला. नवी माहिती मिळाली.
१. यवनी राज्याच्या भागात वैष्णव धर्माची महती दर्शवणारा एकही पुरावा सापडत नाही.
२. महाभारताचा प्रसार निश्चितच या काळाच्या पूर्वी झाला परंतु मेगॅस्थेनिसच्या काळातही वैष्णव धर्म अस्तित्वात होता.
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लेखात काही गोष्टी अतिशय त्रोटक स्वरूपात येतात. पाणिनी आणि पतंजली
यांनी वासुदेव या नावाचा देव असल्याचे उल्लेख केले आहेत ते नेमके कोठे/ कसे
आणि कोणत्या संदर्भात ते कळत नाही. मेगॅस्थेनिसने हे उल्लेख इंडिकात
केलेले आहेत. विकीनुसार पाणिनी इ.स.पूर्व ४०० म्हणजे सदर राज्यांच्या आधी
सुमारे २००-२५० वर्षे तर पतंजली अदमासे या राजांच्या राज्यकाळात आढळतो.
पाणिनीने भागवत् धर्माचा किंवा कृष्णाला मानणार्या धर्माचा (का कल्टचा?)
उल्लेख केला असल्यास आणि मेगॅस्थेनिसनेही तसाच उल्लेख केला असल्यास आणि या
लेखात कौटिल्याच्या अर्थशास्त्रातही
उल्लेख असल्यास वैष्णव धर्म इ.स.पूर्व ४०० वगैरे आधीच रूजला असल्याचे
ध्यानात येते. महाभारताच्या रचनेचा काळ शोधण्यासाठी हे संदर्भ महत्त्वाचे
वाटले.
अंदाजे ५० वर्षांनंतर दक्षिणेला सातवाहन (सातकर्णी ) यांची
सत्ता स्थिरावली तेव्हापर्यंत ते हिंदू असूनही नारायणाची संकर्षण-वासुदेव
ही रूपे कृष्णाशी एकरूप समजत नव्हते असे दिसते.
The Heliodorus pillar was erected and dedicated by Heliodorus, an Indo-Greek ambassador to the Shunga Empire
The Heliodorus pillar is a stone column that was erected around 113 BCE in central India[1] in Besnagar (Vidisha), Madhya Pradesh. The pillar is commonly named after Heliodorus (identified by him as a Garuda-standard), who was an ambassador of the Indo-Greek king Antialcidas from Taxila, and was sent to the Indian ruler Bhagabhadra.[2] A dedication written in Brahmi script was inscribed on the pillar, venerating Vāsudeva (Krishna), the Deva deva the "God of Gods" and the Supreme Deity.[3][4][5][6] The pillar also glorifies the Indian ruler as "Bhagabhadra the savior". The pillar is a stambha
which symbolizes joining earth, space and heaven, and is thought to
connote the "cosmic axis" and express the cosmic totality of the Deity.[3]
The Heliodorus pillar site is located near the confluence of two rivers, about 60 kilometres (37 mi) northeast from Bhopal, 11 kilometres (6.8 mi) from the Buddhist stupa of Sanchi, and 4 kilometres (2.5 mi) from the Hindu Udayagiri site.[7]
The pillar was discovered by Alexander Cunningham
in 1877. Two major archaeological excavations in the 20th-century have
revealed the pillar to be a part of an ancient Vāsudeva temple site.[4][8][9] Aside from religious scriptures such as the Bhagavad Gita, the epigraphical inscriptions on the Heliodorus pillar and the Hathibada Ghosundi Inscriptions contain some of the earliest known writings of Vāsudeva-Krishna devotion and early Vaishnavism and are considered the first archeological evidence of its existence.[10][11][12][13][14][6] The pillar has been called one of the earliest surviving records of a foreign convert into Vaishnavism.[15][6]
An alternative interpretation is that making dedications to foreign
gods was only a logical practice for the Greeks, intended to appropriate
their local power and cannot be regarded as a "conversion" to Hinduism.[16]
Initial reconstitution of the Heliodorus pillar by Cunningham in 1874–1875
The pillar was first discovered by Alexander Cunningham in 1877 near the ancient city of Besnagar in neighbourhood of Vidisha in central India. Besnagar was founded near the confluence of Betwa River and Halali River (formerly, Bais River and the basis for "Bes"-nagar).[17]
The fertile region was historically important because it was on the
trade route between the northern Gangetic valley, the Deccan and the
South Indian kingdoms of the subcontinent.[17] The Besnagar site is at the northeastern periphery of the confluence, and close to Sanchi and Udayagiri, both ancient and of significance to Buddhism and Hinduism.[7][18]
The fan-palm pinnacle Cunningham assumed belonged to the Heliodorus pillar.
When Cunningham first saw it, the pillar was thickly encrusted with
ritually applied red paste (vermillion). This encrusted pillar was the
object of worship and ritual animal sacrifice.[17]
Next to the red-colored pillar was a high soil mound, and on top of the
mound a priest had built his home and surrounded it with a compound
wall.[17] The locals at the time called the pillar the Khamba Baba or Kham Baba.[17][19]
Cunningham, an avid British archaeologist credited with many
discoveries of ancient sites on the subcontinent, saw no inscription due
to the thick crust surrounding the pillar. He nevertheless sensed its
historical significance from the shape and the visible features such as
the crowning emblem, carved fan, rosettes, the faceted symmetry merging
into a round section.[17]
He also guessed there may be an inscription below the crust, and
reported the pillar as, "the most curious and novel" of all his
discoveries.[17]
Near the standing Besnagar pillar, Cunningham found the remains of a
fan-palm pinnacle, which he thought originally belonged to the pillar.[20] Assuming that this broken part was part of the standing pillar, he sketched a composite version.[20] The fan-palm design is otherwise known to be associated to the worship of Samkarsana-Balarama, another one of the Vrishni heroes.[21]
A short distance away, Cunningham found a second pillar capital on the ground with an emblem in the form of a makara (mythical elephant-crocodile-fish composite).[20]
He assumed, based on the shape of the bell, which he considered "of
true Ashokan proportions", that this broken part was part of a lost
pillar of the Ashokan period.[20][17] Further, about a kilometer away, Cunningham found a third pillar capital of similar style, with an emblem in the form of a kalpadruma (wishing tree). Cunningham assumed this discovery too was related to the Besnagar pillar in some way.[22] The kalpa tree design is otherwise known to be associated to the goddess Sri Lakshmi.[23]
Later research showed that the fan palm pinnacle could not fit,
and the discovery of the inscription on the pillar suggested that a
Garuda emblem was crowning the structure.[24]
Between 1909 and early 1910, nearly 30 years after the pillar's
discovery, a small Indian and British archaeological team led by H H
Lake revisited the site.[25] After the thick red crust was cleaned out, they found Brahmi script inscriptions. John Marshall
reported the discovered inscriptions, and to everyone's surprise, the
longer inscription related to a Greek ambassador named Heliodorus of
2nd-century BCE and the deity Vāsudeva. An additional smaller
inscription on the pillar listed human virtues, later identified to be
from a verse of the Mahabharata.[22][26][27]
Heliodorus pillar, 1913–15 excavation.
The pillar and the unusual inscriptions attracted two larger
archaeological excavations. The first was completed between 1913 and
1915, under Bhandarkar, but left incomplete because the priest blocked
efforts citing rights to his home and compound walls his ancestors had
built over the mound.[22][28][29]
The second excavation was completed between 1963 and 1965, under Khare,
who had convinced the locals to move their religious practice to a
location near a tree close by and relocating the priest's family. The
archaeologists for the second excavation had full access to the Besnagar
pillar site.[22][28][9]
A cross-section of the Heliodorus pillar sketched during the 1913 CE archaeological excavation.
The 1913–15 excavations, though partial, revealed that the modern era
Besnagar site had experienced numerous floods that had deposited silt
over the last 2,000 years.[29]
The partial dig uncovered an extensive rectangular, square and other
substructure and many brick foundations aligned to the cardinal axes.
More ruined parts, plates and capitals were also found. The relative
alignments suggested that the Besnagar pillar was likely a part of a
more extensive ancient site.[29][30][4]
The 1963–65 excavations revealed that the mound under the demolished
later era priest home, contained the brick foundation for a sanctum (garbhagriha) and pillared halls (mandalas)
of an elliptical temple. Further excavations below the foundation
revealed a different foundation of likely a more ancient temple. These
ancient temple foundation, layout and structures were similar to those
discovered at Chittorgarh (Rajasthan).[28][31]
A more comprehensive excavation underneath the pillar and around the
pillar led to the discovery that the pillar itself was much deeper, had a
metal-stone interface, features Cunningham's early report had missed,
and that secondary foundations were added over time to match the new
ground level after major floods. Further, many more structures and items
were discovered at the site.[28][9]
The archaeologists discovered that the Heliodorus pillar itself was one
of eight pillars, all aligned along the north-south axis. These
discoveries confirmed that the Besnagar Heliodorus pillar was a part of a
more extensive ancient temple site.[28][9][31]
The 1913 excavation revealed that a significant part of the
Heliodorus pillar is below the platform. It sits on top of the remains
of a more ancient pillar probably damaged by floods.[32]
Over time, silt from various floods have deposited and a raised
platform was added at some point. The pillar shaft has a base support of
two placement stones held with a layer of stone-metal.[32][29]
Above this was an untrimmed stone portion of the pillar. Above the
untrimmed section is a trimmed octagonal cross-section. The original
ground level was about 4.5 centimeter above the junction of the
untrimmed and trimmed section.[33]
Above the length with octagonal facet is the section of the pillar with
sixteen facets. Above the sixteenths section is the thirty-two faceted
section, beyond which is the short round pillar section all the way to
the top where sat the crowning emblem (now missing).[34][28]
The pillar is about 17.7 feet above a square platform (12 feet side),
and the platform itself is about 3 feet high above the ground.[25]
The currently visible portion of the pillar's octagonal section is
about 4 feet 10 inches high. The sixteenths section is fully visible and
is 6 feet 2 inches high.[25]
The thirty-twos is also fully visible and is about 11.5 inches high,
while the round section is 2 feet and 2 inches high. The bell capital is
about 1 feet 6 inches deep and 1 feet 8 inches wide. The abacus is a 1
feet 7 inch sided ornate square.[25]
Structure and decorative elements of the Heliodorus pillar. The pillar originally supported a statue of Garuda, now lost, or possibly located in the Gujari Mahal Museum in Gwalior.[35]
The ornamental bands on the pillar are at the junctions of the octagon-sixteenths and sixteenths-thirty-seconds sections.[34][28] The lower ornamental band consists of half-rosettes, while the upper ornamental band is a festoon
with birds (swag with flowers, leaves and hanging vines). Early
scholars mistook it as geese (or swan), but a closer examination
revealed that they are regular pigeon-like birds, not geese (nor swan).[36][28] The upper festoon is about 6.5 inches long.[25] According to Donald Stadtner,
the capitals found at the Heliodorus pillar site are similar, yet
different in ways from the Sunga capitals found at Sanchi. The Sanchi
discoveries lack the clockwise birds, the makara and the band found in Besnagar. They have elephants and lions, which are absent in Besnagar.[37]
According to Julia Shaw, the elephants and lions motif is typically
found with Buddhist art of this period. The two styles have differences
yet informed the other, states Shaw.[38]
The Heliodorus pillar is neither tapered nor polished like the ancient Ashokan pillars found in India.[29][39] It is also about half the diameter of Ashoka pillars.[40] The Brahmi inscriptions are found on the octagonal surface just below the lower ornamental band of half-rosettes.[41]
The 1963–65 excavations suggest that the site had an elliptical
shrine – possibly 4th to 3rd-century BCE – with a brick foundation and
likely a wooden superstructure.[42][28][43]
This was destroyed by a flood around 200 BCE. New soil was then added
and the ground level raised to build a new second temple to Vāsudeva,
with a wooden pillar (Garuda dhvaja) in front of the east-facing
elliptical shrine.[42][28] This too was destroyed by floods sometime in the 2nd-century BCE.[42]
In late 2nd-century BCE, after some ground preparation, yet another
Vāsudeva temple was rebuilt, this time with eight stone pillars aligned
in the north-south cardinal axis. Only one of these eight pillars have
survived: the Heliodorus pillar.[42][28]
Main inscription of the Heliodorus pillar, c. 110 BCE.
There are two inscriptions on the pillar. The inscriptions have been analysed by several authors, such as E. J. Rapson,[44] Sukthankar,[27]Richard Salomon,[5] and Shane Wallace.[4]
The text of the inscriptions is in the Brahmi script of the Sunga period, the language is Central-western epigraphic Prakrit, with a few Sanskritized spellings.[5] The first inscription describes the private religious dedication of Heliodorus (Translations: Richard Salomon):[5]
Line 1. This Garuda-standard of Vāsudeva, the god of gods
Line 2. was constructed here by Heliodora (Heliodoros), the Bhagavata,
Line 3. son of Dion, a man of Takhkhasila (Taxila),
Line 4. the Greek ambassador who came from the Great King
Line 5. Amtalikita (Antialkidas) to King
Line 6. Kasiputra Bhagabhadra, the Savior,
Line 7. prospering in (his) fourteenth regnal year.[45]
The second inscription on the pillar, in the same script, recites a verse from the Hindu epic Mahabharata:[22][26]
Line 1. (These?) three steps to immortality, when correctly followed,
Line 2. lead to heaven: control, generosity, and attention.[45]
The identity of the King Bhagabhadra in the longer inscription is contested. Early scholars proposed that he may have been the 5th ruler of the Sunga dynasty, as described in some Puranic lists.[5]
However, later excavations by German archaeologists near Mathura
(Sonkh) have shown that the Sunga dynasty may have ended before the
Heliodorus pillar was installed.[22] Therefore, it is probable that the Bhagabhadra may have been a local ruler.[22]
The virtues in the shorter inscription has been variously translated by
different scholars. John Irwin, for example, translates it as
"Restraint, Renunciation and Rectitude".[22]
This Garuda-standard of Vāsudeva, the God of Gods
was erected here by the devotee Heliodoros,
the son of Dion, a man of Taxila,
sent by the Great Yona King Antialkidas, as ambassador
to King Kasiputra Bhagabhadra,
the Savior son of the princess from Varanasi,
in the fourteenth year of his reign.
Relief depicting a portable Garuda pillar, one of the oldest images of Garuda, Bharhut, 100 BCE. This may have been similar to the Garuda capital of the Heliodorus pillar.[47][48][49]
The Garuda capital of the Heliodorus pillar has not been found in the
surveys, but it has been suggested that it had already been excavated
by Cunningham, who was unaware of the Garuda attribution of the pillar,
and that the remains of this Garuda capital were transferred to the Gwalior Museum together with the other artefacts initially discovered at the site.[50]
In particular, a statue fragment in the Gwalior Museum, composed of
bird's feet holding a Naga, with the tail end resting on a portion of a
vedika, may correspond to the lost Garuda capital of the Heliodorus
pillar.[51][50][52]
According to Susan L. Huntington, the Garuda capital on the Heliodorus pillar was probably similar to a portable Garuda standard illustrated on one of the nearly contemporary reliefs at Bharhut.[47] In Bharhut, a man riding a horse is seen holding a portable pillar-standard, crowned by a bird-man creature similar to a Kinnara.[47] The same concept of Garuda pillar may have been adopted for the Heliodorus pillar.[47] Further, the Bharhut relief was dedicated by an individual from Vidisha,
the town where the Heliodorus pillar is located, as explained in the
attached dedicatory inscription, which suggests that the Garuda capital
in the Bharhut relief may just be an imitation of the one on the
Heliodorus pillar.[47] The inscription in Brahmi script next to the relief of the Garuda pillar at Bharhut reads:[47][53]
Images
of the deities were probably present in shrines adjoining the pillars,
in a style rather similar with their depiction on the coinage of Agathocles of Bactria (190–180 BCE). Here Saṃkarṣaṇa and Vāsudeva are shown with their attributes.[54]
Other sculptures and pillar capitals were found near the Heliodorus
pillar, and it is thought they were dedicated to Vāsudeva's kinsmen,
otherwise known as the Vrishni heroes and objects of the Bhagavata worship.[55] These are a tala (fan-palm capital), a makara
(crocodile) capital, a banyan-tree capital, and a possible statue of
the goddess Lakshmi, also associated with the Bhagavat worship.[56] Just as Garuda is associated with Vāsudesa, the fan-palm capital is generally associated with Saṃkarṣaṇa, and the makara is associated with Pradyumna.[57][58] The banyan-tree capital with ashtanidhis is associated with Lakshmi.[56]
The presence of these pillar capitals, found near the Heliodorus
pillar, suggests that the Bhagavata worship, although centered around
the figures of Vāsudeva and Saṃkarṣaṇa, may also have involved the
worship of other Vrishni deities, such as Pradyumna, son of Vāsudeva.[58] For example, there may have been a Pradyumna temple at Besnagar, or at least the Pradyumna pillar with its Makara emblem may have been incorporated into the Vāsudeva shrine.[58] In effect, the findings surrounding the Heliodorus pillar suggest the worship of a trio of the Vrishni heroes in this time and area, composed of the three deities Vāsudesa, Saṃkarṣaṇa and Pradyumna.[59]
Excavations suggests that these various pillars with their
symbolic capitals were standing in line at the site, and that the
Heliodorus pillar was just one of them, standing at the northern end of
the line.[60][61] Although the pillars are aniconic, it is probable that now lost sculptures representing the deities, broadly similar to the depictions on Vāsudeva and Samkarshana on the coins of Agathocles of Bactria (190–180 BCE), were located in adjoining shrines.[54] An inscription on an octagonal pillar found in nearby Besnagar does mention a "Garudadvaja" installed in a Temple of Vasudeva (Vasudeva prasadauttama)
by a Gautamiputra Bhagavata, suggesting that there may have been two
Garuda pillars, just as there were two fan-palm pillars, in front the
Vāsudeva Temple.[60]
The fan-palm capital, found next to the Heliodorus pillar, is associated with Saṃkarṣaṇa.[57][58]
The sun bird Garuda is the traditional vehicle of Vāsudeva.[65] In the Mahabharata (probably compiled between the 3rd century BCE and the 3rd century CE),[66] Garuda appears as the vehicle of Vishnu.[67]
However, the understanding of Vāsudeva as an emanation of Vishnu
probably appeared much later, as there is nothing to suggest it in the
early evidence: the worship of Vāsudeva between the 4th century BCE and
the 2nd century BCE was a warrior-hero worship, after which the
progressive amalgamation with Vishnu and Narayana would follow,
developing during the Kushan period and culminating during the Gupta period.[68]
Slightly later, the Nagari inscription also shows the association of the Hindu deity Narayana with Bhagavatism.[56] Vishnu would much later become prominent in this construct, so that by the middle of the 5th century CE, during the Gupta period, the term Vaishnava would replace the term Bhagavata to describe the followers of this worship, and Vishnu would now be more popular than Vāsudeva.[56]
In 1910, an archaeological team led by H H Lake revisited the
Heliodorus pillar site and nearby mounds. They found the Brahmi
inscriptions on the pillar, and noticed several mistakes in the early
Cunningham report.[25]
They also found many other broken wall pieces, pillar sections and
broken statues in different mounds along the river, within a kilometer
from the pillar. Lake speculated these to be variously related to
Buddhism, Hinduism and Jainism.[69]
Near the Heliodorus pillar site, his team discovered Sapta-Matrikas
(seven mothers of the Shaktism tradition of Hinduism), dating to the
5th–6th century CE.[70][71][72] These discoveries suggest that Besnagar was probably an important ancient temples and pilgrimage site.[73][74]
Initial excavations
Elliptic plan of the Temple
Excavation of the huge Temple of Vāsudeva next to the Heliodorus pillar.[75] The Temple measured 30x30 meters, and the walls were 2.4 meters thick. Pottery remains assigns the site to the 2nd century BCE.[76]
Further excavations also revealed the outline of a smaller elliptic
temple structure, which was probably destroyed by the end of the 3rd
century BCE.[77] The platform and the base of the Heliodorus pillar are visible in the immediate background.
The 1963–65 excavations revealed that the Heliodorus pillar was a
part of an ancient temple site. The archaeologists found an ancient
elliptical foundation, extensive floor and plinth produced from burnt
bricks. Further, the foundations for all the major components of a Hindu
temple – garbhagriha (sanctum), pradakshinapatha (circumambulation passage), antarala (antechamber next to sanctum) and mandapa (gathering hall) – were found.[78] These sections had a thick support base for their walls. These core temple remains cover an area of 30 x 30 m with 2.40 m.[79]
The sections had post-holes, which likely contained the wooden pillars
for the temple superstructure above. In the soil were iron nails that
likely held together the wooden pillars.[78] According to Khare, the superstructure of the temple was likely made of wood, mud and other perishable materials.[78]
The sub-surface structure discovered was nearly identical to the ancient temple complex discovered in Nagari
(Chittorgarh, Rajasthan) – about 500 kilometers to the west of Vidisha,
and the Nagari temple too has been dated to the second half of the
1st-millennium BCE. The archaeological discoveries about Vāsudeva
Krishna at the Mathura site – about 500 kilometers to the north, states
Khare, confirm that Garuda, Makara found at this site, palm-leaf motifs were related to early Vaishnavism. The Heliodorus pillar was a part of an ancient Vaishnava temple.[80]
According to Susan Mishra and Himanshu Ray, the Heliodorus pillar
Besnagar site (2nd century BCE) and the Nagari site (1st century BCE)
are perhaps the "earliest Hindu temples" that archaeologists have
discovered.[81]
The Heliodorus pillar, being dated rather precisely to the period of
the reign of Antialkidas (approximately 115–80 BCE), is an essential
marker of the evolution of Indian art during the Sunga period. It is,
following the Pillars of Ashoka, the next pillar to be associated clearly with a datable inscription.[40] The motifs on the pillar are key in dating some of the architectural elements of the nearby Buddhist complex of Sanchi. For example, the reliefs of Stupa No.2
in Sanchi are dated to the last quarter of the 2nd century BCE due to
their similarity with architectural motifs on the Heliodorus pillar as
well as similarities of the paleography of the inscriptions.[40] A remaining fragment of the Garuda capital is located at the Gujari Mahal Museum in Gwalior.[35]
Vāsudeva refers to "Krishna, son of Vasudeva", "Vāsudeva" in the lengthened form being a vṛddhi-derivative of the short form Vasudeva, a type of formation very common in Sanskrit signifying "of, belonging to, descended from".[84] The worship of Vāsudeva may have evolved from the worship of a historical figure belonging to the Vrishni clan in the region of Mathura.[85] He is also known as a member of the five "Vrishni heroes".[85] According to Upinder Singh "Vāsudeva-Krishna was the Indian God bearing the closest resemblance to the Greek God Herakles".[85] He was also depicted on the coinage of Agathocles of Bactria c. 190-180 BCE,
which shows that he was already widely considered as a deity by that
time, and probably as early as the 4th century according to literary
evidence.[85] In the Heliodorus pillar, Vāsudeva-Krishna was worshipped as the "God of Gods", the Supreme Deity.[86] At one point Vāsudeva-Krishna came to be associated to the God Narayana-Vishnu.[87] Epigraphically, this association is confirmed by the Hathibada Ghosundi Inscriptions of the 1st century BCE.[88] It is thought that "by the beginning of the Christian era, the worship of Vasudeva, Vishnu and Narayana amalgamated".[citation needed] As a third step, Vāsudeva-Krishna was incorporated into the Chatur-vyūha concept of successive emanations of the God Vishnu.[87] By the 2nd century CE, the "avatara concept was in its infancy", and the depiction of Vishnu with his four emanations (the Chatur-vyūha) starts to become visible in art at the end of the Kushan period.[89]
Based on Helliodorus pillar evidence it has been suggested that
Heliodorus is one of the earliest Westerners on record to convert to Vaishnavism whose evidence has survived.[90] But some scholars, most notably A. L. Basham[91] and Thomas Hopkins, are of the opinion that Heliodorus was not the earliest Greek to convert to BhagavataKrishnaism.
Hopkins, chairman of the department of religious studies at Franklin
and Marshall College, has said, "Heliodorus was presumably not the
earliest Greek who was converted to Vaishnava
devotional practices although he might have been the one to erect a
column that is still extant. Certainly there were numerous others
including the king who sent him as an ambassador."[92]
Professor Kunja Govinda Goswami of Calcutta University concludes that
Heliodorus "was well acquainted with the texts dealing with the Bhagavata religion."[14]
According to Indologist Edwin F. Bryant, Heliodorus converted to the
Krishna religion during this period. This is evident from the column
dedicated to Garuda, Vishnu's eagle carrier, which features an
inscription where Heliodorus identifies himself as a devotee of Vasudeva
Krishna. The fact that a prominent foreign envoy embraced the Krishna
tradition in the first century BCE suggests that the tradition had
established firm roots by then. Moreover, there are several other
inscriptions prior to the Common Era, created by Indian sponsors of the
Vasudeva Krishna tradition.[6]
Alternatively, the dedication made by Heliodorus to Vāsudeva as supreme deity may simply have been a diplomatic gesture.[93][94] This may also have been an instance of a typically Greek religious practice: according to Harry Falk,
it was a logical and normal practice for Greeks to make dedications to
foreign gods, as they were just interested in appropriating their power,
and this natural Greek behaviour cannot be construed as a "conversion
to Hinduism".[95]
According to Allan Dahlquist, an alternative interpretation of the inscription is possible. Shakyamuni Buddha too was called a Bhagavan, and Heliodorus originated from Taxila where Buddhism was strong.[96]
At the time of Dahlquist's 1962 publication, he stated there was no
proof that a sect of Vishnu-Krishna devotees existed at that time in
Taxila.[96] Lastly, according to Dahlquist, there is no definite evidence that Vāsudeva should necessarily refer to Vishnu-Krishna.[96] As god-of-the-god, Vāsudeva can well be associated with Indra, who had a key role in Buddhism, stated Dahlquist.[96]
Later scholars have questioned Dahlquist's analysis and assumptions.[97] Kuiper criticizes him for interpreting the dubious source of Megasthenes, ignoring all the "indications to the contrary", and dispute Dahlquist's treatment of the evidence.[98]
The Greek texts that describe ancient India, have numerous references
that suggest the existence of Vishnu-Krishna before the time of
Heliodorus. For example, there is little doubt that Methora in ancient Greek texts is same as Mathura, Sourasenoi as Shurasenas, Herakles of India is Hari-Krishna, Kleisobora is Krishna-pura.[99][100] Similarly, early Buddhist sources provide evidence of Krishna worship, such as the Niddesa which somewhat derogatorily mentions both Vāsudeva and Baladeva[note 1] The Jataka tales too include a story about Krishna.[99]
Heliodorus converted to the Krishna religion when he was serving as an
envoy. The Heliodorus pillar's inscription is generally dated to the
late 2nd century BCE or about 100 BCE, is attributed to Heliodorus, as
recording his devotion to the Vaishnava Vāsudeva sect.[99][102]
During the Besnagar site excavations by archaeologists Lake and
Bhandarkar, a number of additional inscriptions were found such as one
in Vidisha. These also mention Vaishnava-related terms. In one of those
inscriptions, is the mention of another Bhagavata installing a pillar of
Garuda (vahana of Vishnu) at the "best temple of Bhagavat" after the king had ruled for twelve years.[29]
A pillar from nearby Buddhist Sanchi, Pillar 25, is thought to be contemporary with the Heliodorus pillar, and is also dated to the 2nd century BCE.[103]
सम्राट अशोकाच्या उज्वल कारकीर्दीनंतर मात्र मौर्य साम्राज्याला उतरती कळा लागली. मगधाचा शेवटचा मौर्य सम्राट ब्रुहद्रथ हा बौद्ध होता. त्याचवेळी शेजारी कलिंगाच्या गादीवर असलेला खारवेल मात्र जैनधर्मीय होता. राजे जरी अहिंसेचा पुरस्कार करणारे असले तरी मगध आणि कलिंग या देशांनी सैन्य मात्र सुसज्ज राखले होते आणि ही सैन्ये वैदिक क्षात्रधर्माचे पालन करणारी होती. त्यावेळी या प्रदेशात एवढे राजकारण एकवटले होते, की मुत्सद्दीपणाची कमाल लागली होती. मगध राज्यावर कितीजणांचा डोळा होता ते पाहा.
सगळ्यात पहिले ग्रीक (त्या काळात परदेशातून आलेल्यांनाच यवन संबोधत असत. बौद्धांना यवन म्हटले जात नसे. पुढील काळात मुसलमानांसाठीही यवन ही संज्ञा वापरली गेली, पण अधिक अचूकपणे मुस्लिम आक्रमणकर्त्यांना म्लेंच्छ म्हणत असत.) ग्रीकांचा प्रमुख मिन्यांडर (मिलिंद) हा बौद्ध धर्माचा अभ्यासक या बुरख्याखाली मगधाचा घास घ्यायला टपून बसला होता. ब्रुहद्रथ हा हलक्या कानाचा आणि विलासात मग्न सम्राट होता. त्याला मिन्यांडरने एका रुपवान ग्रीक नर्तकीच्या नादाला लावले होते. ब्रुहद्रथ जरी सम्राट असला तरी मगधाचे प्रशासकीय निर्णय राजप्रतिनिधीं आणि मगधाच्या मांडलिक राजांचा समावेश असलेली संघटना म्हणजेच 'चंद्रगुप्तसभा' घेत असे आणि तो निर्णय मानणे सम्राटावर बंधनकारक असे. तर चंद्रगुप्ताच्या साम्राज्याचा आयता घास घेण्याची संधी मिन्यांडरला सोडायची नव्हती.
दुसरा शत्रु म्हणजे कलिंगराज खारवेल. मगध आणि कलिंगात कायम हिंसक संघर्ष होत असे. अशोकाच्या काळात तर कलिंगाची अख्खी सेनाच गारद झाली होती. ते जुने वैभव पुन्हा मिळवून देण्याची संधी खारवेल बघत होता. त्याला ऐतिहासिक सूड उगवायचा होता. पुष्यमित्राला हे माहित होते. खारवेलाने मगध राजकारणात हस्तक्षेप करावा आणि त्यायोगे ग्रीकांच्या हालचालींवर नजर ठेवणारी एक प्रबळ शक्ती असावी, म्हणून पुष्यमित्राने धूर्तपणे एक डाव खेळला. त्याने ठरवून एका हेराला अपमान करुन मगधाबाहेर हाकलून दिले. या हेराने खारवेलला जाऊन सांगितले, की कलिंगाच्या मालकीची असलेली भगवान तथागतांची रत्नजडीत प्रतिमा एका युद्धात मगधाने लुटून नेली आहे आणि ती अप्रतिम आहे. त्यामुळे खारवेलाने ती प्रतिमा आपल्या ताब्यात मिळावी म्हणून ब्रुहद्रथाशी बोलणी सुरु केली. यानिमित्ताने खारवेलचाही चंचुप्रवेश मगध राजकारणात झाला.
तिसरा शत्रु म्हणजे आंध्रराज सातकर्णी. हा जरी मगधापासून लांब असला तरी त्याला स्वतःच्या राज्याची सीमा उत्तरेत वाढवायची होती. त्यामुळे तो सावधपणे या राजकारणावर नजर ठेऊन बसला होता.
या स्थितीत मगधाच्या हिताचे रक्षण करण्यासाठी सावध असलेल्या काही व्यक्ती होत्या. त्या म्हणजे राजगुरु पतंजली, सेनापती पुष्यमित्र, त्याचा मुलगा अग्निमित्र आणि नातू वसुमित्र. पुष्यमित्र हा वृद्ध होता. त्याने सम्राट ब्रुहद्रथाला अंगाखांद्यावर खेळवले होते. त्यामुळे मगधाचा सम्राट व्यसनांच्या आणि भोगांच्या मागे लागून अंतिमतः ग्रीकांच्या कुटील डावाला बळी पडणार आणि मगध साम्राज्याचा नाश होणार या काळजीने पुष्यमित्र व्यथित होता. त्याने अनेकवेळेला ब्रुहद्रथाला धोक्याचे इशारे दिले आणि ग्रीकांच्या कच्छपि न लागण्यास सांगितले, पण ब्रुहद्रथ इतका वेड्यासारखा वागत होता, की मगधाचे स्वातंत्र्य संपणार हे दिसून येत होते. पुष्यमित्राने ठरवून आणि स्वतःच्या स्वार्थासाठी ब्रुहद्रथाला मारले नाही. वार्षिक सैन्य संचलनात (चतुरंग दळाचे व मगध सामर्थ्याचे प्रदर्शन) सम्राट ब्रुहद्रथ अगदीच वेड्यासारखा वागला. त्याने सर्व सैनिकांना हत्यारे गंगेत विसर्जित करुन आणि मुंडण करुन भिक्षू बनण्याचे आवाहन केले. सैन्य काही बौद्ध नव्हते. त्यांना क्षत्रियधर्माची निंदा सहन झाली नाही आणि ते बिथरले. त्यानंतर ग्रीक यवनीच्या नादाने ब्रुहद्रथाने राज्यकारभार चालवणे सुरु केले. हा चंद्रगुप्त सभेचा अपमान होता. सम्राटाच्या देशद्रोही वर्तनावर निर्णय घेण्यासाठी चंद्रगुप्त सभेची बैठक झाली. ही चंद्रगुप्तसभा अगदी चंद्रगुप्ताच्या काळापासून रुढ झाली होती. सम्राटाने सर्वांच्या सहमतीने निर्णय घ्यावा म्हणून चाणक्यानेच या राजप्रतिनिधी सभेची घडी बसवून दिली होती. ही प्राचीन परंपरा असलेली प्रतिनिधी सभा विसर्जित करण्याचे ब्रुहद्रथाने जाहीर केले. त्याने सभेबाबत तुच्छतेचे उद्गार काढले त्यातही ब्रुहद्रथाने चक्क ही सभा कायमसाठी विसर्जित करण्याचा निर्णय जाहीर केला. त्यामुळे या सभेचे जवळपास ३००-४०० सदस्य संतप्त झाले आणि त्यांनी एकमुखाने 'या जुलमी राजाचा वध करा' असा आदेश सेनापती पुष्यमित्राला दिला. पुष्यमित्राने या अंतिम क्षणीही ब्रुहद्रथाची समजूत काढण्याचा प्रयत्न केला, परंतु ब्रुहद्रथ माफी मागायला तयार नव्हता. पुष्यमित्राला ती आज्ञा अमलात आणावी लागली.
दरम्यानच्या काळात पुष्यमित्राचा मोठा नातू सुमित्र हाही ग्रीक यवनीच्या आणि ब्रुहद्रथाच्या नादी लागून वाया गेला आणि एका हल्ल्यात मारला गेला. या खुनाखुनीच्या राजकारणाने रागावून आणि मुलगा गेल्याच्या दु:खाने निराश होऊन पुष्यमित्राचा मुलगा अग्निमित्र हा आपल्या मालव राज्यात निघून गेला. त्यांना वसुमित्रालाही बरोबर न्यायचे होते, परंतु पुष्यमित्र व महामुनी पतंजली यांनी धारिणीची समजूत काढली. ब्रुहद्रथ निपुत्रिक असल्याने मगधाला वारस नव्हता आणि पुष्यमित्र वृद्ध असल्याने त्याला सम्राट होण्यात रस नव्हता. त्यामुळे पुष्यमित्राचा तरुण नातू वसुमित्र हा मगधाचा सम्राट झाला. अशारीतीने मौर्य घराणे जाऊन त्याजागी शुंग घराण्याची सत्ता आली. हे सत्तांतर मगधाला अनुकूल ठरले कारण वसुमित्राने लगेचच अश्वमेध् यज्ञ केला आणि खारवेल तसेच शातकर्णीला युद्धात हरवून मगधाचा दरारा पुन्हा स्थापित केला.
पुष्यमित्र वैदिक धर्माचा पुरस्कर्ता होता खरा आणि बौद्ध धर्माची अवनती मगधाच्या स्वातंत्र्याचा घास घेणार, हे त्याला दिसत होते. त्यामुळे त्याने क्रांती घडवली ती खरे तर मगधाच्या हितासाठी. वैदिक धर्माची पुनर्स्थापना वगैरे हेतू त्याला अभिप्रेत नव्हता. पुढे ते आपोआपच घडले. वसुमित्र सम्राट झाल्यावर मगध सैन्यासह दिग्विजय करायला गेला. त्याने युद्धात विजयश्री मिळवल्यावर आणि मगधच्या शत्रूंचा बंदोबस्त झाल्यावर मगच पुष्यमित्राने वानप्रस्थाश्रम स्वीकारला आणि तो मरेपर्यंत मातृभूमी मगधातच राहिला.
पाटलीपुत्रावर पुनः हिंदू धर्माची सत्ता आली. काशीपुत्र भगभद्र हा शुंग घराण्यातील राजा मध्यभारतातील विदिशा येथून राज्य करत असावा. (किंवा विदिशाच्या भूभागावर त्याचे राज्य होते.) या भगभद्र राजाचा उल्लेख स्तंभावरील लेखात तक्षशीलेचा यवन (बौद्ध?) राजा अंतलिकित याचा 'त्राता' (त्रातारः) आणि जवळचा मित्र (उपान्तात् सकाशं ) असा झालेला आहे. कदाचित कोणत्यातरी युद्धात अंतलिकिताला साह्य/उपकार करून त्याने ही मैत्री संपादलेली असावी.
अशाप्रकारे चाणक्याची चाणाक्ष बुद्धी आणि चातुर्य, चंद्रगुप्ताचे अतुलनीय साहस यांच्या अभूतपूर्व संयोगाने निर्माण झालेले, सम्राट अशोकाने बौद्ध धर्माच्या प्रसाराने नावलौकीक मिळवून दिलेले मौर्य साम्राज्य दुर्बल प्रशासकांमुळे अस्तंगत झाले. अशा परिस्थितीत अंतलिकिताला शुंग भगभद्राचा धर्म - जो हिंदू वैष्णव होता - त्याला मान्यता/संमती द्यावी लागली असावी.
कोंकणचे मौर्य
चंद्रगुप्त मौर्याने इ. स. पूर्व ३२४च्या सुमारास भारताच्या इतिहासातील पहिलेवहिले देशव्यापी साम्राज्य निर्माण केले. इ. स. पू. तिसऱ्या शतकात अशोकाने या मौर्य साम्राज्यास वैभवाच्या शिखरावर पोचविले. इ. स. पू. १८७ मध्ये सेनापती पुष्यमित्र शुंगाने शेवटचा मौर्य सम्राट ब्रहद्रथ याचा वध केला आणि त्याबरोबर हा राजवंश इतिहासजमा झाला.' त्यानंतरच्या काळातील या राजवंशाचा ठावठिकाणा लागत नाही. परन्तु अलीकडील काळात प्रकाशात आलेल्या काही कोरीव लेखांवरून इतिहासकार या निष्कर्षाप्रत येऊन पोचले आहेत की, मौर्याच्या वंशजांनी पुढील काळात दक्षिणेत स्थलांतर केले आणि मर्यादित स्वरूपात का असेना, आपल्या सत्तेचे पुनरुज्जीवन केले. मौर्य सुकेतुवर्मन याने इ. सं. च्या चौथ्या शतकाच्या अखेरीस उत्तर कोंकणात आपले स्वतंत्र राज्य स्थापन केले. त्यामुळे यानंतरच्या काळातील मौर्य शासक 'कोंकणचे मौर्य' किंवा 'उत्तरकालीन मौर्य' (Later Mauryas) या नावाने इतिहासात ओळखले जातात. इ. स.च्या. चौथ्या शतकापासून सतराव्या शतकापर्यंत भारताच्या विविध भागांतील राजकारणात मौर्य घराण्यातील व्यक्तींचे अस्तित्व जाणवते. य व्यक्तींचा परस्पर संबंध कसा होता है अद्याप अस्पष्टं आहे. तसेच त्यांचा सुसंगत इतिहास आणि समकालीन संस्कृतीतील त्यांचे योगदान याविषयीही माहिती उपलब्ध नाही. प्रस्तुत लेखात या माहितीवर प्रकाश टाकण्याचा प्रयत्न करण्यात आला आहे.
उत्तरेतील मौर्याचे हे वंशज दक्षिणेत केव्हा आणि कोणत्या स्थितीत आले याविषयी निश्चित सांगता येत नाही. परंतु दक्षिणेतील हे मौर्य चंद्रगुप्त अशोकाचे वंशज होते या-विषयी बहुतेक इतिहासकारांत मतैक्य आहे. या बाबतीत पुढील शक्यता संभवतात.
(१) आपल्या आयुष्याच्या शेवटी सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य याने राजसत्तेचा त्याग केला आणि जैन मुनी भद्रबाहुसह दक्षिणेत येऊन कर्नाटकातील श्रवणबेळगोळ इथे वास्तव्य केले. जैन धर्माचा निष्ठावन्त अनुयायी म्हणून त्याने सल्लेखना व्रताद्वारे आपल्या आयुष्याचा शेवट केला. चद्रगुप्ताबरोबर त्याच्या परिवारातील काही व्यक्तीही दक्षिणेत आल्या व त्यांचे वंशज तिथे स्थाइक झाले असण्याचीही शक्यता आहे. कारण चंद्रगुप्त मौर्याच्या नावाशी जोडला जाणारा आगुप्ताइक नामक काल संवत महाराष्ट्र कर्नाटकाच्या संलग्न प्रदेशात प्रचलित असल्याची-मांहिती इ. स. च्या सहाव्या शतकाच्या मध्यास होऊन गेलेल्या मानापूरच्या देज्ज महाराज या राष्ट्रकूट राजाच्या गोकाक (जि. बेळगाव, कर्नाटक राज्य) ताम्रपटावरून प्रकाशात आली. यावरून या प्रदेशात मौर्य वंशातील शासकांचे काही काल तरी शासन असले पाहिजे असा निष्कर्ष निघतो. कोंकणातील मौर्य त्यांपैकी असण्याची शक्यता नाकारता येत नाही.
(२) युवराजांना प्रांतिक प्रशासक म्हणून नेमण्याची प्रथा मौर्यकालात रूढ होती.
आपल्या राज्यारोहणापूर्वी अशोक हा अगोदर उज्जयिनीचा आणि नंतर तक्ष-शिलेचा राज्यपाल होता. बौद्ध ग्रंथ मिलिंदपन्ह आणि अपदान यांतील वर्णना-नुसार अशोकाचा समकालीन असलेला पिंगल किंवा पिंगलक नामक मौर्य राजपुत्र सौराष्ट्राचा शासक होता. तो अशोकाचा प्रतिस्पर्धी असून त्याने अशोकाविरुद्ध पाटलिपुत्रावर स्वारी केल्याची माहितीही या ग्रंथात आढळते." परन्तु अशोकाने पिंगलाचा पराभव केला. ही घटना कितपत ऐतिहासिक होती है समजणे कठीण आहे. परन्तु बिंदुसाराच्या पश्चात अशोक आणि त्याच्या भावांत झालेला वारसा हक्काचा तंटा आणि त्यातून त्याने केलेला आपल्या भावांचा बध इत्यादीविषयी जी माहिती बौद्ध वाङ्मयात आढळते त्या पाश्वभूमीवर पिंगलाची कथा ही केवळ कपोलकल्पित होती असे म्हणता येणार नाही. विशेष म्हणजे या सौराष्ट्राची नंतरच्या काळातील राजधानी असलेल्या बलभी येथील मौर्य राज-वंशाशी आपला संबंध दाखविणाऱ्या गोविंद नामक मौर्य मांडलिकाचा अकराव्या शतकातील एक शिलालेख जळगाव जिल्ह्याच्या चाळीसगाव तालुक्यात उपलब्ध झाला आहे. हा गोविंद मौर्य यादवांचा सामंत असून त्याने प्रस्तुत शिलालेखात बलभीच्या आपल्या अठरा पूर्वजांची नावे असलेली वंशावळ दिली आहे. यावरून मौर्योत्तर काळात सौराष्ट्रात मौर्य राजवंशाचे शासक होते है सिद्ध होते. अशोकाने आपल्या परिवारातील युवराजांना प्रांतिक प्रशासक म्हणून नेमले होते. त्याचा नातू संप्रती हा उज्जयिनीचा प्रशासक होता. यावरून हे स्पष्ट होते की, पश्चिम भारतात मौर्य राजपुत्रांना प्रांतिक प्रशासक म्हणून नेमले जात असे. त्यांपैकी काहींचे वंशज पुढे त्याच भागात स्थायिक झाल्याचा पुरावाही वाघळी शिलालेखातील वंशावळीतून मिळतो. महाराष्ट्राचा कोंकण प्रांत गुजरातला लागूनच आहे. त्यामुळे कोंकणातील मौर्याची शाखा गुजरात किंवा मध्यप्रदेशा-तील असणेही शक्य आहे.
(३) पुष्यमित्र शुंगाने मौर्य घराण्याचा शेवट करून सत्ता हस्तगत केल्यानंतर या वंशातील उर्वरित व्यक्तींनी परकीय राज्यात आश्रय घेतला असण्याची शक्यताही नाकारता येत नाही. याला आधार म्हणजे आंध्र प्रदेशातील सालिहुंडम इथे इ. स. पूर्व पहिल्या शतकातील अशोक राजाचा एक शिलालेख सापडला. हा अशोक कोण होता याविषयी बाद आहे. नावावरून तो मौर्य सम्राट अशोकाचा वंशज असल्याचे जाणवते. अशा प्रकारे वेगवेगळ्या परिस्थितीत मौर्य घराण्यातील व्यक्ती भारताच्या विविध भागांत स्थायिक झालेल्या आढळतात. कोंकणातील मौर्याचे पूर्वज हे यांपैकी एक असावेत. त्यातल्या त्यात कर्नाटक किंवा गुजरातमधून ही शाखा कोंकणात स्थलांतरित झाली असण्याची अधिक शक्यता आहे.
मौर्य धर्ममहाराज सुकेतुवर्मन :-
कोंकणातील मौर्य राजवंशाचा संस्थापक सुकेतुवर्मन हा होता. त्याचा शके ३२२. (इ. स. ४००) मधील एक शिलालेख ठाणे जिल्ह्यातील वाडा इथे सापडला आहे विशेष म्हणजे शक संवताची निर्णायक नोंद असलेला हा निदान दक्षिणेतील तरी सर्वोत प्राचीन शिलालेख होय. इ. स. च्या चौथ्या शतकाच्या अखेरपर्यंत कोंकणात त्रैकूटकांचे राज्य होते. त्याच प्रदेशात सुकेतुवर्मन मौर्याने स्वतंत्र राज्य स्थापन केले. यावरून असे दिसते की, सुकेतुवर्मन हा पूर्वी त्रैकूटकांच्या राज्यात अधिकारपदावर असावा आणि. या घराण्याचा शेवट करून त्याने कांकणात आपले स्वतंत्र राज्य स्थापन केले असावे. काही इतिहासकारांच्या मते सुकेतुबर्मन हा पूर्वी त्रैकूटकांचा मांडलिक असून त्याचे उत्तरा-धिकारी महिष्मतीच्या कलचुरींचे सामंत असावेत. परंतु तशी शक्यता नाही. कारण वाडा शिलालेखात सुकेतुवर्मन याचे वर्णन 'धर्ममहाराज' (सार्वभौम राजा) या विरुदासहित करण्यात आले आहे. त्याचे उत्तराधिकारीही 'मांडलिकांचे महाराजे असल्याची नोंद त्यांच्या ताम्रपटातून आढळते. यावरून कोंकणातील मौर्य दुसऱ्यांचे सामंत नसून स्वतंत्र आणि सार्वभौम शासक होते हे सिद्ध होते.
वाडा शिलालेखात सुकेतुवर्मनचे वर्णन 'भोजानां मौर्य धर्ममहाराज' (म्हणजे भोज आणि मौर्य वंशातील) असे जे करण्यात आले आहे त्यामुळे त्याच्या वंशाविषयी संशोधकांनी विविध मते व्यक्त केली आहेत. पी. आर. श्रीनिवासन यांनी संबंधित मजकुराचे 'भोजानां आर्य धर्ममहाराज असे वाचन करून सुकेतुवर्मन हा मौर्य नसून भोज राजवंशातील होता, असे मत मांडले आहे. याउलट के. व्ही. रमेश यांनी 'भोजानां मौर्य धर्ममहाराज' असे वाचन केले असून सुकेतुवर्मन हा मौर्य वंशातील असून भोज हे त्याचे मातुल कुल असल्याचे प्रतिपादन केले आहे." शिलालेखातील मजकुराच्या वाचनाच्या बाबतीत के. व्ही. रमेश यांचे मत बरोबर दिसते. कारण शंभर वर्षांपूर्वी या शिलालेखातील अक्षरे आजच्यापेक्षा अधिक स्पष्ट असताना स्व. भगवान- लाल इंद्रजी यांनीही 'आर्य' ऐवजी 'मौर्य' असेच वाचन केले होते. 'मौर्य १६ या वंशनामाबरोबर 'भोज' या वंशनामाच्या उल्लेखाविषयी के. व्ही. रमेश यांनी जे स्पष्टी-करण दिले आहे तेही तत्कालीन प्रथेस धरून असल्याचे जाणवते. उदा. कर्नाटकातील हळदीपूर येथील ताम्रपटात पल्लव वंशीय गोपालदेव याचे वर्णन 'कैकेयवंशोद्भव' असे करण्यात आले आहे, कारण त्याची आई कैकय वंशातील होती. इ. स. च्या चौथ्या शतकांत गोवा आणि कर्नाटकाच्या तटीय प्रांतात भोज वंशाचे राज्य होते. मौर्य है त्यांचे उत्तरेकडील शेजारी असल्यामुळे तत्कालीन प्रथेनुसार या दोन राजवंशांत शरीर-संबंध झाले असणे स्वाभाविक होय. विशेषतः भोज राजवंश दक्षिणेतील प्रतिष्ठित राजवंश होता. त्या घराण्याशी वैवाहिक संबंध आल्यामुळे सुकेतुवर्मनला कोंकणातील आपल्या राज्याच्या स्थापनेत भोजांचे सक्रिय साहाय्य लाभले असणेही संभवनीय आहे. त्यामुळे आपल्या कोरीव लेखात सुकेतुवर्मन याने मौर्य या आपल्या वंशनामाचरोबर भोज या नावाचा आवर्जून उल्लेख केला असे दिसते.
गुप्त सम्राट पहिला चंद्रगुप्त याला मगधचे राज्य त्याची राणी लिच्छवी राजकन्या कुमारदेवी हिच्यामुळे प्राप्त झाले, कारण गुप्तांच्या उदयापूर्वी मगधवर लिच्छवींचे शासन होते. याचे संस्मरण म्हणून चंद्रगुप्ताने आपल्या व राणी कुमारदेवीच्या प्रतिमे-सह खास नाणे पाडले व त्यावर 'लिच्छव्यः' असे चिरुद कोरविले. चंद्रगुप्ताच्या राज्यप्राप्तीत त्याच्या लिच्छवी घराण्याशी आलेल्या वैवाहिक संबंधाचा जसा महत्त्वाचा वाटा होता तशीच स्थिती मौर्य सुकेतुवर्मन याची भोजांच्यामुळे झाली असावी आणि याचा गौरव म्हणून त्याने आपल्या मौर्य या वंशनाबाबरोबर भोजांचे नावही आपल्या लेखात कोरविले असे दिसते. त्यामुळे सुकेतुवर्मन हा मौर्यवंशीय होता याविषयी तर संशय राहात नाहीच; शिवाय या दोन्ही घराण्यांत वैवाहिक संबंध होते ही माहितीही वाडा शिलालेखावरून मिळते.
वाडा शिलालेखाव्यतिरिक्त सुकेतुवर्मनच्या बाबतीत दुसरा कुठलाही ऐतिहासिक पुरावा उपलब्ध नाही. त्यामुळे त्याच्या कारकीर्दीविषयी निश्चित माहिती देता येत नाही. परंतु इ. स.च्या चौथ्या शतकाच्या अखेरीस त्याने स्थापन केलेले कोंकणातील मौर्याचे राज्य इ. स. च्या सातव्या शतकाच्या प्रारंभापर्यंत म्हणजे दोन शतकांहून अधिक काळपर्यंत अस्तित्वात असल्याची माहिती बदामीचा चालुक्य सम्राट दुसरा पुलकेशी याच्या इ. स. ६३४-३५ मधील ऐहोळे शिलालेखावरून मिळते. अगोदरचे सातवाहन आणि नंतरचे शिलाहार यांच्याव्यतिरिक्त एवढ्या प्रदीर्घ काळापर्यंत कोंकणवर मौर्यो-शिवाय दुसऱ्या कुठल्याही राजवंशाची सत्ता टिकली नाही. अशा राज्याचा संस्थापक म्हणून सुकेतुबर्मनचे कोंकणच्या मौर्याच्या इतिहासातील स्थान निश्चितच महत्त्वाचे आहे.
इ. स. च्या तिसऱ्या शतकाच्या प्रारंभी सातवाहन सत्तेचा शेवट होऊन दक्षिणेत आभीर राजवंश सत्तेवर आला. परंतु याच शतकाच्या अखेरीस आभीरांचे सामंत विविध प्रांतांत स्वतंत्र झाले व आभीरांची सत्ता खानदेशापुरती मर्यादित झाली. पश्चिम किनारपट्टीतील महाराष्ट्र आणि गुजरातच्या सलग प्रदेशावर त्रैकूटक राजवंशाचे आधिपत्य प्रस्थापित झाले. या राजवंशातील पाच राजांनी पुढील एक शतक कोंकण आणि दक्षिण गुजरातवर राज्य केले. चौथ्या शतकाच्या उत्तरार्धात कर्नाटकातील कदंब राज्यसंस्थापक मयूरशर्मन याने पश्चिम महाराष्ट्रावर आक्रमण करून आभीर त्रैकूटक राज्यांना जबरदस्त तडाखा दिला. परिणामतः पुढील काळात त्रैकूटकांची सत्ता खिळखिळी होऊन त्यांच्या सामंतांनी बंडाचे निशाण उभारले. चौथ्या शतकाच्या अखेरीस दक्षिण गुजरातवरील त्रैकूटकांची सत्ता संपुष्टात आल्याची माहिती त्या भागा-तील सुनावकाला येथील ताम्रपटावरून मिळते. तिथे संगमहिंग नामक सामंत स्वतंत्र झाला. त्याच्याप्रमाणे सुकेतुबर्मन हा उत्तर कोंकणात स्वतंत्र झाला असे दिसते.
सुकेतुवर्मनचे राज्य महाराष्ट्राच्या किनारपट्टीपुरते मर्यादित होते असे दिसते. वाडा शिलालेखातील 'भोजानां' या उल्लेखावरून तो भोजांच्या राज्याचा अधिपती असावा अशी शक्यता के. व्ही. रमेश यांनी व्यक्त केली आहे, परंतु ते शक्य दिसत नाही, कारण सुकेतुवर्मनच्या नंतरच्या काळात होऊन गेलेल्या भोजवंशीय कापालिवर्मन या राजाचे त्याच्या ताम्रपटात 'धर्ममहाराज' या सार्वभौमदर्शक बिरुदासह वर्णन करण्यात आले आहे. तसेच सुकेतुवर्मनच्या राज्यापेक्षा भोजांचे राज्य विस्तृत असून त्यांचे सामंत शासन चालवीत असल्याची नोंदही त्यांच्या कोरीव लेखात आढळते. त्यावरून मौर्य आणि भोज हे निदान सुकेतुबर्मनच्या काळात तरी आपापल्या राज्यात सार्वभौम होते असा निष्कर्ष निघतो. उलट सुकेतुबर्मनला राज्यस्थापनेत मदत केल्यामुळे त्याने भोजांचे ज्येष्ठत्व मान्य केल्याचा संकेत बाडा शिलालेखातील 'भोजानां' या उल्लेखावरून मिळतो.
सुकेतुवर्मनचे उत्तराधिकारी :-
दोन शतकांहून अधिक काळ कोंकणवर राज्य करणाऱ्या या मौर्यवंशातील सुकेतु-वर्मनशिवाय केवळ दोनच राजांची नावे त्यांच्या कोरीव लेखाद्वारे प्रकाशात आली आहेत. ती म्हणजे गोवा ताम्रपटातील चंद्रवर्मन आणि बांदोडा ताम्रपटातील अनिर्जितवर्मन ही होत." लेखांच्या अक्षरवाटिकेवरून हे दोन्ही राजे इ. स. च्या सहाव्या शतकात होऊन गेल्याचे संशोधकांचे मत आहे. सुकेतुवर्मन हा इ. स. ४०० च्या सुमारास राज्यावर आल्याची माहिती त्याच्या वाडा शिलालेखावरून मिळते. त्याने २५-३० वर्षे राज्य केले असे मानले तरी त्याच्या आणि गोवा ताम्रपटातील चंद्रवर्मन याच्या काळात जवळ जवळ एक शतकाची तफावत राहते. या कालावधीत किमान तीन शासकांनी राज्य केले असावे, परंतु दुर्दैवाने त्यांच्याविषयी काहीही माहिती उपलब्ध नाही.
या संदर्भात दण्डीच्या दशकुमारचरितातील कुमारगुप्त नामक कोंकणच्या राजाचा उल्लेख विचारात घेणे आवश्यक आहे. के म. म. वा. वि. मिराशी यांच्या मते कुमार गुप्त ही ऐतिहासिक व्यक्ती असून कोंकणचा राजा म्हणून आलेल्या त्याच्या उल्लेखा-वरून तो त्रैकूटक राजवंशातील असावा. १६ कोंकणात त्रैकूटकांची सत्ता होती है ऐतिहासिक सत्य असले तरी त्या वंशाशी कुमारगुप्ताचा संबंध असण्याची शक्यता नाही. कारण सुमारे एक शतक सलगपणे राज्य केलेल्या पाच त्रैकूटक राजांची माहिती त्यांच्या राज्यकालासह कोरीव लेखाद्वारे प्रकाशात आली आहे. त्यात कुठेही तफावत जाणवत नाही. त्यामुळे कुमारगुप्त हा त्रैकूटक राजवंशातील असणे शक्य नाही.
मिराशींनी प्रतिपादिल्याप्रमाणे कुमारगुप्त या कोंकणच्या राज्याची ऐतिहासिकता मात्र सत्याधिष्ठित वाटते. कारण दण्डीच्या दशकुमारचरितात भानुवर्मन नामक बन वासीच्या राजाचे जे वर्णन आले आहे तो वनवासीच्या कदंब राजवंशात होऊन गेल्याचा पुरावा त्यांच्या कोरीव लेखात आढळतो. त्या आधारे कुमारगुप्त या कोंकणच्या राजाची ऐतिहासिकता मानायची झाल्यास त्याला कोंकणच्या मौर्य राजवंशातील सुकेतु-बर्मनचा नजीकचा उत्तराधिकारी मानावा लागेल. या अंदाजास पुष्टी देणारा पुरावा मौर्य अनिर्जितवर्मन याच्या बांदोडा ताम्रपटात मिळतो. हा ताम्रपट जारी केला तेव्हा. राजाचा मुक्काम ज्या ठिकाणी होता त्याचे नाव 'कुमारद्वीप' असे होते. स्थलनामांना प्रमुख राजांची नावे जोडण्याची प्रथा प्राचीन भारतात रूढ होती. उदा. प्रवरपूर ही वाकाटक प्रवरसेनाची राजधानी आणि सध्याचे वर्धा जिल्ह्यातील पवनार कुमारद्वीप आणि कुमारगुप्त यांच्यातील अन्योन्य संबंध तसे असण्याची शक्यता आहे. तसे असल्यास कुमारगुप्त हा मौर्य सुकेतुवर्मन या नजीकचा उत्तराधिकारी होता असेच मानावे लागेल. तसेच भौगोलिक घटकाशी त्याचे नाव जोडले गेले हे सत्य असल्यास या वंशातील तो एक महत्त्वाचा राजा होता असे म्हणावे लागेल.
वाकाटक हरिषेण याच्या अजिंठा शिलालेखानुसार त्याने इ. स. च्या पाचव्या शतकाच्या अखेरीस त्रिकूट, लाट इत्यादी पश्चिम किनारपट्टीतील राज्यांवर आक्रमण केले होते. २१ यातील त्रिकूट म्हणजे महाराष्ट्राच्या किनारपट्टीतील मौर्याचे राज्य होय. १२ या काळातील कोंकणातील मौर्य शासक बहुधा दुर्बल असावा. परंतु हे आक्रमण म्हणजे केवळ एक मोहीम होती, असे दिसते. कारण हरिषेणानंतर वाकाटकांचे राज्य संपुष्टात आले. याउलट कोंकणात मोर्याची सत्ता आणखी एक शतकाहून अधिक काळ टिकली हे पुढील काळातील कोरीव लेखावरून स्पष्ट होते.
चंद्रवर्मन मौर्य :
सुकेतुवर्मनच्या उत्तराधिकाऱ्यांतील चंद्रवर्मन हा एक महत्त्वाचा शासक होता. गोव्यात उपलब्ध झालेल्या शिवपुर किंवा गोवा ताम्रपटावरून त्याची माहिती प्रकाशात आली. १२ या ताम्रपटाचे प्रथम संपादक कै. मो. गं. दीक्षित यांच्या वाचनात 'मौर्य' हे वंशनाम आले नव्हते. त्यामुळे त्यांनी चंद्रवर्मन हा पूर्वी गोव्यात होऊन गेलेल्या कदंब राजवंशातील असावा असे मत व्यक्त केले होते. परंतु नंतरच्या संशोधकांनी त्यातील 'मौर्य' हे वंशनाम वाचल्यामुळे चंद्रवर्मन हा कोकणच्या मौर्य राजवंशातील होता है स्पष्ट झाले आहे. ३४ गोवा ताम्रपटात चंद्रवर्मन याच्या दुसऱ्या राज्यवर्षाची नोंद आहे; परंतु निश्चित काळाची नोंद नाही. अक्षरवाटिकेच्या आधारे तो ५ व्या ६ व्या शतका-तील असावा असे मत व्यक्त करण्यात आले आहे. त्यावरून तो इ. स. च्या सहाव्या शतकाच्या प्रथमार्धात होऊन गेला असे म्हणता येईल. या काळातील दक्षिणेतील राज-कीय स्थिती मौर्यांना अनुकूल होतो. विदर्भ-मराठवाड्यातील वाकाटकांची सत्ता संपुष्टात आली होती. महिष्मतीच्या कलचुरींचा आणि बदामीच्या चालुक्यांचा उद्यही झालेला नव्हता. मौयीचे त्या वेळचे समकालीन म्हणजे दक्षिण महाराष्ट्रातील मानपूरचे राष्ट्रकूट, कर्नाटक गोवा किनारपट्टीतील भोज, आणि पश्चिम कर्नाटकातील वनवासीचे कदंब.
वरील समकालीनांपैकी वनवासीचे कदंब सर्वांत बलाढ्य होते. परंतु त्यांच्या आणि मौर्याच्या राज्यात भोज आणि मानपूरचे राष्ट्रकूट असल्यामुळे कदंबांच्या विस्तारवादाची झळ गौर्यांना लागणे शक्य नव्हते. कदंबांनी भोजांचा हलशी (जि. बेळगाव) सभोव तालचा प्रदेश जिंकून त्यांना गोवा-कारवार भागात ढकलल्याची माहिती त्यांच्या कोरीब लेखावरून मिळते. भोज-कदंबांच्या या संघर्षात मौर्यानी भोजांना मदतीचा हात दिल्या-मुळे गोवा-कारवार प्रांत त्यांना आपल्या ताब्यात ठेवता आला व कदंबांच्या भीतीने मोजांनी मौर्याचे आधिपत्य स्वीकारले असे या दोन्ही राजवंशांच्या कोरीव लेखावरून दिसते.
चंद्रवर्मन मौर्याच्या गोवा ताम्रपटात शिवपुर येथील बौद्धविहारास राजाद्वारे भूमिदान केल्याची नोंद आहे. या शिवपुराचा गोव्यात शोध लागला नाही आणि ते गोव्यात असण्याची शक्यताही नाही, कारण प्राचीन काळात गोव्यात बौद्धविहार असल्याची माहिती नाही. या उलट भोज कापालिवर्मन यांच्या अर्गा ताम्रपटातील दान दिलेले गाब आणि विषय मुख्यालय शिवपुर असे होते, तसेच भोज आशंकिताच्या हिरेगुट्टी ताम्र-पटात कारवारजवळील एका महाविहाराला दिलेल्या दानाची नोंद आहे. यावरून शिवपुर येथील बौद्धविहार कारवार परिसरात होता हे स्पष्ट होते. चंद्रवर्मन याचे भोजांच्या प्रदेशातीऊ भूमिदान त्याचे भोजावरील सार्वभौमत्वाचे निदर्शक मानावे लागेल. त्याशिवाय चंद्रवर्मनचा उत्तराधिकारी अनिर्जितवर्मन याच्या बांदोडा ताम्रपटातील भूमिदान 'द्वादश ग्राम देशातील' असल्याची त्यात नोंद आहे. प्रस्तुत ताम्रपटाच्या संपादकांनी याचा अर्थ 'बारा देशातील बारा गावात' असा घेतला तो बरोबर नाही. द्वादशग्राम हे भौगोलिक नाव असून त्याची निश्चिती उत्तर गोव्यातील बारदेश भागाशी केली जाऊ शकते. हे दानही भोजांच्या प्रदेशातीलच होते. भोज है मौर्याचे मांडलिक होते याचा हा आणखी एक पुरावा. चंद्रवर्मन आणि अनिर्जितवर्मन यांचा भोज वंशातील समकालीन राजा पृथ्वीमलवर्मन हा होता. गोव्यात आणि कोल्हापूर इथे त्यांचे एकूण तीन ताम्रपट प्राप्त झाले आहेत. परंतु त्यात त्याच्या नावाबरोबर कुठलेही राजबिरुद नाही. यावरून वरील विधानास आणखी पुष्टी मिळते.
अशा प्रकारे चंद्रवर्मन याच्या काळात उत्तरेत महाराष्ट्र-गुजरात सरहद्दीवरील संजान (जि. वलसाड, गुजरात राज्य) पासून दक्षिणेस कारवार (कर्नाटक राज्य) पर्यंतचा संपूर्ण पश्चिम किनारपट्टीचा प्रदेश मौर्याच्या राज्यात समाविष्ट होता. त्यापैकी महाराष्ट्रा-तील कोंकणपट्टी मौर्याच्या प्रत्यक्ष नियंत्रणात असून गोवा-कारवार किनारपट्टीत भोजांचे शासन असून त्यावरही मौर्याचे अप्रत्यक्ष नियंत्रण होते. दक्षिण महाराष्ट्रातील मानपूरच्या राष्ट्रकूटाकडून मौर्याना भीती नव्हती, कारण कदंबांच्या विस्तारवादातून आपल्या प्रदेशाचे रक्षण करण्यावर त्यांना लक्ष केंद्रित करावे लागत होते. या परिस्थितीमुळे चंद्रवर्मनचा राज्यकाल मौर्य राज्याच्या दृष्टीने सर्वांत उत्कृष्ट होता असे दिसते.
मौर्याची राजधानी पुरी म्हणजे आजचे मुंबई जवळील घारापुरी किंवा एलिफंटा बेट. बदामीच्या चालुक्यांच्या आणि शिलाहारांच्या कोरीव लेखात तिचे चंद्रपुरी किंवा चंद्रपूर असे वर्णन आढळते. पुरीला विविध राजवटींतील प्रमुख व्यक्तींच्या नावावरून विविध पूर्वपदे लावण्यात आली होती. 'चंद्र' हे पूर्वपद चंद्रवर्मन मौर्याच्या नावावरून लावले गेले असावे. कोरीव लेखाशिवाय आठव्या नवव्या शतकातील अरब खलाशांच्या वृत्तान्तातही चंद्रपूर म्हणजे कोंकणातील एक अतिशय समृद्ध बंदर आणि व्यापारी पेठ म्हणून नमूद करण्यात आले आहे. दुसच्या पुलकेशीच्या ऐहोळे शिलालेखात तर 'अपर जलघेर्लक्ष्मी' (पश्चिम सागरातील लक्ष्मी) असे पुरीचे वर्णन करण्यात आले आहे..
मौर्य अनिर्जितवर्मन :-
गोव्यातील बांदोडा इथे उपलब्ध झालेल्या ताम्रपटामुळे अनिर्जितवर्मनची इतिहास-कारांना ओळख झाली. या ताम्रशासनातही कालोल्लेख नाही. परंतु अक्षरवाटिकेवरून तो चंद्रवर्मनच्या गोवा ताम्रपटानंतरचा होय हे स्पष्ट होते. तो चंद्रवर्मनचा उत्तराधिकारी असून सहाव्या शतकाच्या उत्तरार्धात होऊन गेला असावा.
बांदोडा ताम्रपटात अनिर्जितवर्मनच्या २९ व्या राज्यवर्षांची नोंद आहे. यावरून त्याने किमान तीन दशके राज्य केले हे सिद्ध होते. अनिर्जितवर्मनची बहुतेक कारकीर्द बदामीच्या चालुक्यांशी लढण्यात गेली असे दिसते. बदामीच्या चालुक्यांच्या कोरीव लेखातील वर्णनावरून पहिला कीर्तिवर्मन (इ. स. ५६७ ते ५९७), मंगलेश (इ. स. ५९८ ते ६१०) आणि दुसरा पुलकेशी (इ. स. ६११ ते ६४२) अशा सलग तीन पिढ्यांतील राजांनी मौर्याचे राज्य जिंकण्याचा प्रयत्न केला होता. शेवटी दुसऱ्या पुलकेशीला मौर्य सत्ता नामशेष करण्यात यश आले ही माहिती त्याच्या इ. स. ६३४-३५ मधील ऐहोळे शिलालेखावरून मिळते. ४४ चालुक्य-मौर्यातील हा संघर्ष इ. स. च्या सहाव्या शतकाच्या आठव्या दशकात सुरू होऊन सातव्या शतकाच्या दुसऱ्या दशकात संपला. म्हणजे जवळ जवळ अर्धशतक हा लढा चालू होता. या संघर्षात कीर्तिवर्मन आणि मंगलेश यांच्याशी लढा देणारा मौर्य राजा अनिर्जितवर्मन हाच असला पाहिजे. त्यात त्याला भोज पृथ्वीमल्लवर्मन याचे साहाय्य लाभले असे दिसते. याला पुरावा म्हणजे अनिर्जितवर्मनचा बांदोडा ताम्रपट आणि भोज पृथ्वीमल्लवर्मन याचे तिन्ही ताम्रपट विजयी शिबिरातून जारी करण्यात आले आहेत.
दुसरी गोष्ट म्हणजे चालुक्यांच्या ताम्रपटात त्यांनी पराभूत केलेल्या शत्रूची नावे असलेला जो श्लोक आहे त्यात मौर्याचा पाडाव केल्याच्या संदर्भात 'निर्जित मौर्य' असा प्रयोग केलेला आहे. अनिर्जितवर्मन याच्या नावावरील ती कोटि आहे हे सहज स्पष्ट होते. तसेच त्याच श्लोकात 'पृथु' असे दुसऱ्या शत्रूचे नाव आले आहे.४५ तो कोण होता है अद्याप स्पष्ट झालेले नाही. तो पृथ्वीमल्ल वर्मन हा भोज राजाच असावा. अनिर्जित वर्मन आणि पृथ्वीमल वर्मन या दोघांनीही तीन दशकांहून अधिक काळ राज्य केले. त्यावरून कीर्तिवर्मन आणि मंगलेश यांच्याविरुद्ध लढणारा मौर्य राजा अनिर्जितवर्मन हाच असला पाहिजे.
ऐहोळे शिलालेखात चालुक्यं कीर्तिवर्मन पहिला याचे वर्णन 'मौर्याना कालरात्री-समान' असे करण्यात आले आहे. यावरून त्याने मौर्याच्या राज्यावर आक्रमण करून त्यांचा प्रदेश जिंकण्याचा प्रयत्न केला होता है स्पष्ट होते. परन्तु कीर्तिवर्मनच्या काळात तरी चालुक्यांना मौयौनी आपला प्रदेश मिळू दिला नाही, अनिर्जितवर्मनच्या प्रखर प्रतिकारामुळेच हे घडले.
कीर्तिवर्मनचा उत्तराधिकारी चालुक्य मंगलेश याने मौर्याच्या विरुद्धची मोहीम आणखी प्रखर केली. कोंकण हा सागरी प्रदेश असल्यामुळे त्याने आरमारी छावण्यांवर अधिक भर दिला. रेवतीद्वीप (चौल आणि मुखड जंजिरा) जिंकण्यासाठी मंगलेशाने सैन्य पाठविण्यासाठी नौकासेतु बांधल्याचे वर्णन चालुक्यांच्या कोरीव लेखात आढळते. ४६ या मोहिमेत मंगलेशास यश लाभले. रेवतीद्वीपासहित चार प्रांतांवर त्याने आपला अंमल बसविला आणि नवीन जिंकलेल्या या प्रदेशाच्या प्रशासनासाठी ध्रुवराज इंद्रवर्मन बप्पूर या आपल्या नातेवाईकांची नियुक्ती केल्याची माहिती इंद्रवर्मनच्या गोवा ताम्रपटावरून मिळते. यावरून मंगलेशाने कारवार-गोव्यापासून चौलमुखड जंजिऱ्यापर्यंतचा कोकणचा प्रदेश आपल्या अंकित केला हे स्पष्ट होते. त्यामुळे मौर्याच्या ताब्यात रायगड जिल्ह्याचा उर्वरित भाग आणि ठाणे-मुंबई एवढाच प्रदेश उरला. अनिर्जितवर्मन बहुधा या लढाईत धारातीर्थी पडला असावा असे दिसते, कारण त्यानंतर चालुक्य पुलकेशीने पुरीवर जो हल्ला केला त्या वेळी अनिर्जितवर्मनऐवजी कुणी दुसरा मौर्य राजा होता. तो अर्थातच अनिर्जितवर्मनचा उत्तराधिकारी असला पाहिजे.
अशा प्रकारे अनिर्जितवर्मन याने बदामीच्या चालुक्याशी प्रखर आणि प्रदीर्घ संघर्ष करून आपले राज्य टिकविण्याचा प्रयत्न केला. या कामी त्याने आपल्या शेजारच्या प्रमुखांची मदत घेतली व त्या बदल्यात त्यांना संरक्षण दिले. यापैकी भोज पृथ्वीमल वर्मन याचा उल्लेख बरं आला आहेच. त्याशिवाय मानपूरच्या राष्ट्रकूटांनाही अनिर्जित-वर्मन याने मदतीचा हात दिल्याची माहिती त्याच्या बांदोडा ताम्रपटावरून मिळते. बांदोडा ताम्रपटाद्वारे अनिर्जितवर्मन याने जी भूमी आणि घरे दान दिली होती ती पूर्वी कुणा राष्ट्रकूट प्रमुखाच्या मालकीन्ची होती अशी त्यात नोंद आहे. यावरून शक्यता अशी दिसते की, इ. स. च्या सहाव्या शतकाच्या मध्यास बदामीच्या चालुक्यांनी अगोदर मालपूरच्या राष्ट्रकूटांचे राज्य जिंकले. परिणामतः काही पराभूत राष्ट्रकूट-प्रमुखांनी कोंकणातील मौर्याच्या प्रदेशात आश्रय घेतला. गा किनारपट्टीतील राष्ट्रकूटांचे अस्तित्व इ. स. च्या आठव्या शतकाच्या मध्यापर्यंत असल्याची माहिती बदामीचा चालुक्यराजा दुसरा विक्रमादित्य याच्या नखण ताम्रपटावरून मिळते. त्यात राष्ट्रकूट शिवराजपुत्र गोविंदराज हा दक्षिण कोंकणात चालुक्यांचा प्रांताधिकारी असल्याची नोंद आढळते.
अनिर्जितवर्मन हा कोंकणच्या मौर्य राजवंशातील शेवटचा बलाढ्य शासक होता असे म्हणावे लागेल. बदामीच्या चालुक्यासारख्या आपल्याहून अधिक शक्तिशाली शत्रूशी त्याने जी चिवट आणि प्रदीर्घ झुंज दिली ती नक्कीच विशेष मानावी लागेल. त्याशिवाय चौल-जंजिऱ्याजवळ मंगलेशाच्या सैन्यास रोखून त्याने पुरीचे रक्षण केले आणि मौर्य सत्तेस आणखी काही काळ जीवदान दिले.
अनिर्जितवर्मनचे उत्तराधिकारी :-
इ. स. ६३४-३५ मधील ऐहोळे शिलालेखातील वर्णनानुसार दुसऱ्या पुलकेशीने कोंकण विजयाचे उर्वरित काम पूर्ण केले. पुरी आणि भोवतालचा प्रदेश जिंकण्यासाठी त्याने शेकडो युद्धनौकांचा वापर केला आणि शेवटी मौर्याच्या या राजधानीवर आपला ध्वज फडकावला अशी माहिती ऐहोळे शिलालेखात आढळते. ""
पुलकेशीचा समकालीन मौर्य राजा कोण होता याची निश्चित माहिती आढळत नाही. परंतु तो अनिर्जितवर्मनचा उत्तराधिकारी असावा असे पुलकेशीचा भाऊ चालुक्य बुद्धवर्ष याच्या संजान ताम्रपटातील वर्णनावरून दिसते. संजान ताम्रपटातील माहितीवरून बुद्धवर्ष हा उत्तर कोंकणचा प्रांताधिकारी असून पिनुक (पेण, जि. रायगड) इथे त्याचे मुख्यालय होते. प्रस्तुत ताम्रपटाद्वारे दान दिलेली गावेही त्याच परिसरातील होती." बुद्धवर्षाचा हा संजान ताम्रपट चालुक्य पुलकेशीचा उत्तर। धिकारी पहिल्या विक्रमादित्याच्या काळातला असला तरी बुद्धवर्षाची कोंकणवरील नियुक्ती पुलकेशीच्या काळातील असली पाहिजे, कारण बुद्धवर्ष हा पुलकेशीचा भाऊ होता. ऐहोळे शिलालेखाते वर्णिलेल्या पुरी विजयानंतर ही नेमणूक झाली असणार हे उघड आहे. 'त्यावरून पुलकेशीच्या मौर्याविरुद्धच्या मोहिमेत बुद्धवर्षाचा सहभाग होता हेही ओघाने आलेच.
संजान ताम्रपटात बुद्धवर्षाची जी प्रशस्ती देण्यात आली आहे त्या संदर्भात त्याने 'अचत्यनगण' नामक शत्रूच्या चार सुळे असलेल्या हत्तींना ठार केल्याचे वर्णन आले आहे. ताम्रपटाचे संपादक स्टेनकॉनो यांनी 'अचत्यनगण' म्हणजे 'अचत्यायन नामक शत्रूची आघाडी' असा लावला आहे. त्यावरून काहीच अर्थबोध होत नाही. हे बहुधा बुद्धवर्षाने पराभूत केलेल्या शत्रूचे नाव असले पाहिजे; कारण 'गण' हे उपपद त्या काळी राजवंशातील व्यक्तिनामात आढळते. उदा. दहृगण त्रैकूटक, शंकरगण कलचुरी इत्यादी. त्या आधारे ते नाव 'अच्युतगण' असून त्वष्ट्टयाच्या चुकीने ताम्रपटात 'अचत्यनगण' असे कोरले गेले असल्याची शक्यता नाकारता येत नाही. मौर्याकडून उत्तर कोंकण जिंकल्यानंतर पुलकेशीने त्या प्रदेशात बुद्धवर्षाची नेमणूक केली होती; या पाश्वभूमीवर अच्युतगण हा अनिर्जितवर्मनचा उत्तराधिकारी असून पुलकेशी आणि बुद्धवर्षाने परा-भूत केलेला शेवटचा मौर्य राजा होता असा निष्कर्ष निघतो.
उत्तर भारतातील मौर्य :-
सातव्या शतकापासून अकराव्या शतकापर्यंत म्हणजे जवळजवळ पाचशे वर्षे मौर्य घराण्यातील व्यक्तींच्या दक्षिणेतील हालचाली दाखविणारा पुरावा आजवर उपलब्ध झालेला नाही. याउलट नेमक्या सातव्या शतकापासून पुढील काळात उत्तर भारतात मौर्य शासकांचे कोरीव लेख आढळतात उत्तर प्रदेशातील मथुरा इथे दिंडिराज ऊर्फ कर्कनामक मौर्य राजाचा इ. स. च्या सातव्या किंवा आठव्या शतकातील एक शिलालेख कै. डॉ. दिनेशचंद्र सरकार यांनी प्रसिद्ध केला आहे. प्रस्तुत आलेखात या राजघराण्याची वंशावळ पुढीलप्रमाणे देण्यात आली आहे.
कृष्णराज
चंद्रगुप्त
आर्यराज
दिंडिराज ऊर्फ कर्कराज
वरीलपैकी शेवटच्या तीन शासकांच्या कारकीर्दी सलग होत्या. कृष्णराज आणि चंद्रगुप्त यांचे नाते काय होते ते स्पष्ट नाही. तसेच या वंशाचे मूळ कोणते हेही स्पष्ट नाही. तथापि ते मगधच्या आणि पर्यायाने कोंकणच्या मौर्याचे वंशज असण्याची शक्यता सरकार यांनी व्यक्त केली आहे.
तशी शक्यता गृहीत धरण्यास बराच वाव आहे, कारण दोन्हींचे वंशनाम तर एक आहेच; शिवाय कोंकणचे मौर्य आणि मथुरेचे मौर्य यांच्या राजमुद्रेवरील लांछन एकच (वराह) आहे. विशेष म्हणजे मौर्य साम्राज्याचा संस्थापक चंद्रगुप्ताचे नावही या दोन्ही वंशावळींत आहे. दुसरी महत्त्वाची बाब म्हणजे पुष्यमित्र शुंगानंतर एक हजार वर्षे मौर्य राजवंशाचे अस्तित्व दाखविणारा पुरावा उत्तरेत आढळत नाही, आणि जेव्हा तो आढळतो त्यापूर्वी काही काळ चालुक्य पुलकेशीने कोंकणच्या मौर्याचे राज्य पूर्णपणे जिंकलेले असते. या सर्व घटनांमागे ऐतिहासिक कार्यकारणभाव असावा.
इ. स. च्या सातव्या शतकात दक्षिण आणि उत्तर भारतात एकाच वेळी दोन महत्त्वाकांक्षी समबल राजपुरुष होऊन गेले. ते म्हणजे दक्षिणेतील बदामीचा चालुक्य दुसरा पुलकेशी आणि उत्तरेतील हर्षवर्धन, हर्षाला नर्मदेच्या पलीकडे रोखण्यात पुलकेशी 'यशस्वी झाला होता. मौर्याचे कोंकणातील राज्यही पुलकेशीने संपुष्टात आणले होते. अशा परिस्थितीत शत्रूचा शत्रू म्हणजे आपला मित्र समजून कोंकणच्या मौर्याच्या वंशजांनी हर्षाच्या राज्यात स्थलांतर केले व हर्षाने त्यांचा मथुरा किंवा उत्तरेत इतरत्र पुनर्वास केला असणे असंभवनीय नाही. विशेष म्हणजे हर्ष-पुलकेशीच्या काळात भारतभर भ्रमण केलेला चिनी प्रवाशी हयूएन त्संग याने आपल्या वृत्तान्तात वरील विधानास पोषक अशी नोंद करून ठेवली आहे. तीनुसार सम्राट अशोकाचा शेवटचा वंशज असलेल्या पूर्णवर्मन नामक मगधच्या राजाने गौडनरेश शशांक याने उद्ध्वस्त केलेल्या बोधिवृक्षाचे पुनरारोपण केले.
मौर्य साम्राज्याच्या पतनानंतर त्यांच्या नंतरच्या शुंग व कण्व राजवंशांना पाटलि-पुत्राहून माळव्यातील विदिशा आणि गंगा-यमुना खोऱ्यातील कौशांबी इथे स्थलांतर करावे लागले होते. अशा परिस्थितीत मौर्याच्या वंशजांचे मगधात पुढील काळातील अस्तित्व शक्यच नाही. त्यावरून पूर्णवर्मन हा हर्षाच्या आश्रयास आलेला कोंकणच्या मौर्याचा वंशज असण्याचीच अधिक शक्यता आहे. तो अशोकाचा वंशज असल्यामुळे आणि हर्ष हा बौद्ध धर्माचा आश्रयदाता असल्यामुळे त्याने पूर्णवर्मन यास त्याचे मगधचे पैतृक राज्य दिले असावे. हर्षानंतर कनोजच्या राज्यात पुन्हा बंडाळी सुरू झाली. त्यामुळे पूर्णवर्मनच्या वंशजांनी मथुरेकडे स्थलांतर केले असावे. हर्षानंतर कनोजच्या स्वामित्वासाठी जो संघर्ष सुरू झाला त्यात मथुरा शिलालेखात उल्लेखिलेल्या मौर्य दिंडि राजाने भाग घेतला होता. त्याने कनोजवर आक्रमण करून ते नगर भस्मसात केले व त्यामुळे त्याला कर्क (अग्नि) अशी उपाधी प्राप्त झाल्याची माहिती मथुरा शिलालेखात आढळते.
राजस्थानातील झालरापाटण येथील इ. स. ६९० मधील एका शिलालेखात मौर्य वंशीय दुर्गगण नामक राजाची माहिती आढळते. तो मथुरेच्या मौयीच्यापैकी असला पाहिजे. याच प्रांतात आठव्या शतकाच्या मध्यास धवल मौर्य याचे शासन असल्याची नोंद तिथे उपलब्ध झालेल्या कोरीव लेखात आलेली आहे. तो दिंडिराजाचा उत्तरा-धिकारी असावा असा डॉ. सरकार यांचा अंदाज आहे.
वरील धवल मौर्याचे वंशज राजस्थान-सौराष्ट्र प्रदेशात शासन करीत असतान। पश्चिम भारतावर अरबांचे आक्रमण झाले. त्याची झळ बसलेल्या शासकास मौर्य असल्याची माहिती गुजरातमधील चालुक्यांच्या कोरीव लेखात आढळते. कदाचित त्याचा परिणाम म्हणून सौराष्ट्रातील मौर्याना देशत्याग करावा लागला व त्यांनी महाराष्ट्रातील खानदेशात स्थलांतर केले असावे. जळगाव जिल्ह्यातील वाघळी येथील शिलालेखात ज्याची माहिती आली आहे तो गोविंद मौर्य या स्थलांतरित शाखेचा वंशज होता असे दिसते. अकराव्या शतकातील यादवांच्या या मांडलिकाने सौराष्ट्रातील वलभीच्या मौर्य वंशातील आपल्या १८ पूर्वजांची नावे असलेली दीर्घ वंशावळ या शिलालेखात दिली आहे.
गोविंद मौर्याच्या वंशजांनी मुस्लिम राजवटीत महाराष्ट्रात जहागिरी मिळविल्या असे दिसते. सतराव्या शतकात सातारा जिल्ह्यातील जावळी येथील आदिलशाही सरंजामदार चंद्रराव मोरे हे त्यापैकी असावेत. शिवकालापूर्वी सात पिढ्या या घराण्याची सत्ता जावळीवर होती. विशेष म्हणजे 'चंद्रराव मोरे' हे एका व्यक्तीचे नाव नसून त्या घराण्याचे नाव बनले होते. सतराव्या शतकाच्या मध्यास शिवाजी महाराजांनी जावळीच्या हनुमंतराव चंद्रराव मोऱ्यांचा शेवट केला. चंद्रगुप्त मौर्य या संस्थापकाच्या नावाचा प्रभाव या राजवंशावर अशा प्रकारे शेवटपर्यंत कायम होता.
सातवाहनांच्या नजीकच्या उत्तर।धिकाऱ्यांत दक्षिणेच्या पश्चिम किनारपट्टीवर सर्वोत जास्त काळ राज्य करणारे म्हणून कोंकणच्या मौर्याचा उल्लेख करावा लागेल. जवळ जवळ दोन शतके राज्य करणाऱ्या या राजवंशाचा कोंकणच्या प्राचीन संस्कृतीवर प्रभाव पडला नसता तरच नवल !
इ. स. ४०० मधील सुकेतुवर्मन मौर्याच्या वाडा शिलालेखात बाटक (बाडा, जि. ठाणे) इथे राजाचा तलवार सिंहदत्त याने कोटेश्वर, वसिष्ठेश्वर आणि सिद्धेश्वर इ. देवालये बांधल्याची नोंद आहे. प्रस्तुत शिलालेखात ब्रह्मा, विष्णु आणि हर (शिव) या देव-त्रयीचाही उल्लेख आहे. देवालयाच्या परिसरात तटाक किंवा तलावही बांधले होते. तसेच या देवालयांच्या नित्य-नैमित्तिक पूजा-अर्चेसाठी वाडा परिसरातील भूमी दान देण्यात आली होती. विशेष म्हणजे हिंदू देवालये बांधल्याचा दक्षिणेतील हा सर्वांत प्राचीन पुराभिलेखीय उल्लेख असल्यामुळे प्राचीन भारतीय स्थापत्याच्या इतिहासाच्या दृष्टीने त्याचे अनन्यसाधारण महत्त्व आहे. वरीलपैकी तलावाचे अवशेष आजही वाडा इथे आहेत. देवालयांपैकी बहुतेक काळाच्या उदरात गडप झाली आहेत. खंडेश्वर नामक एक नंतरच्या काळातील मंदिर आजही वाडा इथे आहे. कदाचित वरीलपैकी एखाद्या मंदिराचे ते नूतनीकरण केलेले मंदिर असू शकेल." अनिर्जितवर्मन याच्या बांदोडा ताम्रपटातील भूमिदान हस्त्यार्थ नामक सामवेदी ब्राह्मणास दिलेले होते. भूमीचे वर्णन 'खज्जन' (मराठी खाजण) असे करण्यात आले आहे. खांदून तयार केलेल्या भाताच्या खाचराचा हा बहुधा सर्वात प्राचीन पुराभिलेखीय उल्लेख असावा.
चंद्रवंर्मनच्या गोवा ताम्रपटातील भूमिदान शिवपुर येथील महाविहारास दिलेले होते. हा महाविहार बौद्ध किंवा जैनही असू शकेल. यावरून प्राचीन भारतातील तिन्ही प्रमुख धर्मपंथांना राजाश्रय देण्याची परंपरा इतर राजवंशांप्रमाणे मौर्यानीही कोंकण पुरती चालू ठेवली होती. कोंकणातील कोल, कुत्रा, महाडपाले आणि कान्हेरी येथील काही बिहार आणि चैत्य मौर्याच्या काळात कोरविले गेले असले पाहिजेत.
कोंकणच्या मौर्याची राजधानी पुरी म्हणजे आजचे मुंबईजवळील घारापुरी किंवा एलिफंटा बेट. या बेटावरही लेणी आहेत. त्यातील लेणी क्र. ५ आणि ६ या मुख्य लेण्याहून (क्र. १) प्राचीन आहेत, कारण त्यांच्याजवळ बौद्ध स्तूपाचे अवशेष सापडले आहेत. बेटाच्या पूर्वेकडील बाजूस प्रस्तरात कोरलेला हत्ती होता. या हत्तीवरूनच पोर्तुगीजांनी या बेटाचे एलिफंटा असे नामकरण केले. हा हत्ती सध्या मुंबई येथील जिजामाता (पूर्वीचा राणीचा बाग) उद्यानातील भाऊ दाजी लाड संग्रहालयात आहे. विशेष म्हणजे दक्षिण कोंकणातील रेडी (चालुक्यकालीन शिलालेखातील इरिडिगे) येथील किल्ल्यातही असाच कोरलेला हत्ती आहे. हे कोरीव हत्ती बघून अशोककालीन ओरिसातील धौली येथील हत्तीची आठवण येते. हे सर्व अवशेष कोंकणच्या मौर्याच्या स्थापत्याचे होत.
कोंकणच्या मौर्याची दुसरी महत्त्वाची कामगिरी म्हणजे बंदर आणि आरमाराचा विकास. बदामीच्या चालुक्यांना कोंकण जिंकण्यासाठी तीन पिढ्या आणि पन्नास वर्षांचा अवधी लागला यावरून मौर्याचे है कोंकण किनारपट्टीतील छोटेसे राज्य असूनही त्यांचे आरमार कसे सक्षम होते याची प्रचीती येते. संजान, सोपारा, कल्याण, चौल, आणि रेडी ही राज्यातील प्रमुख बंदरे असून त्यामार्फत विदेशी व्यापार चालत असे. बंदरांचे संरक्षण करण्यासाठी कशा प्रकारे सुसज्ज आरमार ठेवले जात असे याचा पुरावा चालुक्य मंगलेशाच्या रेवतीद्वीन (चौल-जंजिरा) विजय वर्णनावरून मिळतो. पुरी है राजधानीचे शहर व व्यापारी बंदर असून मुख्य भूभागापासून तुटक असल्यामुळे त्याच्यासाठी विशेष व्यवस्था करण्यात आली होती. त्या काळी पुरीचा संपर्क उरण न्हावा-शेवा परिसरातील समुद्रतीराद्वारे होता. आजच्या न्हावा शेवा बंदराच्या जागी समगिरी-पण नामक बंदर बांधण्यात आल्याची माहिती चालुक्यांच्या कोरीव लेखावरून मिळते. याच जागी आजचे जवाहरलाल नेहरू बंदर हे मुंबईला पर्यायी म्हणून नवीन बंदर अस्तित्वात आले आहे. तेथून पुरी वेटाशी संपर्क असे पुरी बेटावर पूर्वेकडील बाजूस बंदर होते. मौयानी ते बांधले असल्याची खूण आजही त्याच्या मोराबंदर या नावावरून पटते.
आता महाराष्ट्रातील मौर्यकालीन अवशेषाचा आढावा घेउया.
भोन स्तुप :-
मौर्यकालीन साम्राज्याचा इतिहास जगासमोर मांडला तो भारतीय पुरातत्व विभागाचे जनक सर अलेक्झेंडर कनिंग्हॅम यांनी. चीनी प्रवासी ह्युयेनस्तांग यांच्या डायरीमुळे त्यांना तत्कालीन भारताचा भुगोल समजला. ह्युयेनस्तांग भारताच्या भ्रमंतीवर ६ व्या शतकात आले होते आणि त्यांनी भारताचे वर्गीकरण पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण आणि मध्य भारत असे केले आहे. आजही त्याच वर्गीकरणानुसार भारताचे वर्णन केले जाते. त्यांच्या डायरीच्या आधारावर कनिग्हॅम यांनी बुद्धांच्या एतिहासिक पुराव्यांचा शोध घेण्यास सुरुवात केली आणि टप्प्याटप्प्याने मातीच्या ढिगाऱ्याखाली गाडली गेलेली शहरे, स्तुप आणि दुर्गम डोंगरात दडलेल्या वास्तुकलेचा अद्भुत नमुना असलेल्या लेण्या त्यांनी प्रकाशात आणल्या. पुरातत्व विभागाची स्थापना झाल्यानंतर मुघलकालीन ऐतिहासिक स्थळे संरक्षित तर झालीच, त्याचप्रमाणे २५०० वर्षांपूर्वीचा इतिहासही समोर आला.
भारतात एकेकाळी बौद्ध धर्म सर्वत्र विस्तारलेला होता. त्यामुळे त्याच्या खुणा या आजही सापडत आहेत. असेच काही पुरावे २००२ मध्ये विदर्भात सापडले. भोन स्तुपाचा शोध २००२ मध्ये डॉ. बी. सी. देवतारे यांनी लावला आणि येथे उत्खननाने जोर धरला. बुलढाणा जिल्ह्यातील संग्रामपूर तालुक्यातील भोन गावात मौर्यकालीन बौद्ध स्तुप आढळले. येथे २००३ पासून उत्खनन सुरु झाले आणि २००७ मध्ये उत्खननाचे काम थांबवले. भोन गावाजवळील पूर्णा नदीकिनारी बौद्ध स्तुप सापडले. त्यामुळे याचे नामकरण भोन स्तुप झाले. पुर्णा नदीकिनारी अनेक छोट्या-मोठ्या टेकट्या आहेत. या टेकड्या १० ते १२ हेक्टर परिसरात पसरल्या आहेत. टेकटी क्रमांक ६ येथे उत्खननादरम्यान हे स्तुप आढळले. हे स्तुप साधारण इसवी सन पूर्व ३०० शतकातील असल्याचे सिद्ध झाले. येथे सापडलेल्या तांब्याच्या नाण्यांवर बोधिवृक्षाची (पिंपळाचे झाड ) प्रतिमा आढळली. तसेच एका पत्र्यावरही बोधिवृक्ष आढळून आला. टेराकोटा अर्थात विशेष प्रकारच्या मूर्तीवर ‘त्रिरत्न’ आढळले. एवढेच नाही तर येथे पाणी व्यवस्थापनासाठी विशिष्ट्य रचना असल्याचे आढळून आले. त्यामुळे येथे उत्खनन वेगाने होण्याची गरज भासू लागली. मात्र इतके भक्कम पुरावे आढळल्यानंतरही पुरातत्व विभागाने २००७ नंतर येथील उत्खनन बंद केले. त्यामुळे पुरातत्व विभागाच्या भूमिकेवर प्रश्नचिन्ह उपस्थित होत आहे.
असो, उत्खनन थांबले इथपर्यंत ठिक आहे, पण हा ऐतिहासिक वारसाच नष्ट करण्याचा डाव मांडला गेला आणि त्यानुसार पुरातत्व विभागाचा ना हरकत प्रमाणपत्र घेऊन येथे जीगाव धरण प्रकल्प सुरु केला. मुळात येथे आणखी उत्खनन होणे गरजेचे होते. उत्खनन झाले असते तर नवीन काही हाती लागले असते. मुळात हे स्तुप मौर्यकालीन असल्याने त्याचे संवर्धन करणे हे पुरातत्व विभागाचे आणि सरकारचे कर्तव्यच आहे. पण याबाबत सरकार ठोस भूमिका घेत नसल्याने आश्चर्य वाटत आहे. परिणामी आता स्थानिकांनाच भोन स्तुपाच्या संरक्षणासाठी आंदोलने झाले.
पौनी (Pauni)
महाराष्ट्रातील हे एक प्राचीन ऐतिहासिक व पुरातत्त्वीय स्थळ आहे. ते भंडारा जिल्ह्यात नागपूर-भंडारा मार्गावर नागपूरच्या आग्नेयेस सु. ८० किमी.वर वैनगंगा नदीच्या उजव्या तीरावर वसले आहे. शुंग-सातवाहन काळातील बौद्ध धर्माचे केंद्र, तसेच वाकाटक काळातील एक महत्त्वपूर्ण स्थळ म्हणून पौनी प्रसिद्ध आहे. पौनी येथील पुरावशेष सर्वप्रथम पुरातत्त्वज्ञ हेन्री कझिन्स (१८७९), नंतर भारतीय पुरातत्त्व खात्याचे संचालक सर जॉन मार्शल यांच्या निदर्शनास आले (१९२६). पुरातत्त्वज्ञ एच. हरग्रीव्ह्ज यांनी पौनी येथील किल्ल्याची प्रेक्षणीय तटबंदी, बुरूज व खंदक यांचे वर्णन केल्याचे आढळते (१९२७). येथील पुरावशेषांचे महत्त्व लक्षात घेऊन तत्कालीन शासनाने पौनी येथील किल्ला व आसपासचे पुरावशेष संरक्षित म्हणून घोषित केले. भारतीय पुरातत्त्व विभागाचे मध्य भारतातील साहाय्यक पर्यवेक्षक जे. सी. चंद्रा यांनी पौनी येथे मोठ्या प्रमाणावर पुरावशेष, विशेषत: स्तूपाचे अवशेष, असावेत असे आपल्या पत्रव्यवहारांत नमूद केले (१९३६). पौनीची प्राचीनता तेथे आढळणाऱ्या पुरावशेषांव्यतिरिक्त तेथील क्षत्रप रुपिअम्म याचा लेखयुक्त छायास्तंभ आणि वाकाटक राजवंशातील दुसरा प्रवरसेन याच्या ताम्रपटामुळे अधोरेखित झाली. प्राच्यविद्यासंशोधक वा. वि. मिराशी यांनी छायास्तंभ उजेडात आणला (१९५७), तर ज्येष्ठ साहित्यिक-संशोधक वि. भि. कोलते यांनी ताम्रपट प्रकाशित केला (१९६९). पौनी येथील स्तंभ.येथील जगन्नाथ टेकाडाच्या भोवती नांगरटीमध्ये एका प्रचंड यक्षप्रतिमेचा अर्धा भाग, मौर्यकालीन अक्षरवटिकांचा उत्कीर्ण लेख असलेली स्तूपाच्या कठड्याची शीर्षशीला इ. प्राचीन बौद्धस्तूपाचे अवशेष अचानकपणे निदर्शनास आले. भारतीय पुरातत्त्व खाते व नागपूर विद्यापीठ यांनी संयुक्तपणे पुरातत्त्वज्ञ जगतपति जोशी व शांताराम भालचंद्र देव यांच्या मार्गदर्शनाखाली येथे उत्खनन केले (१९६९-७०). उत्खननाकरिता जगन्नाथ मंदिर, चांडकापूर (सुलेमान) व हरदोलाला अशा तीन टेकाडांची निवड करण्यात आली. यांतील पहिल्या दोन ठिकाणी शुंग-सातवाहन काळातील हीनयान पंथातील बौद्ध धर्माशी निगडित स्तूपाचे अवशेष प्राप्त झाले. त्यामुळे उत्तर व दक्षिण भारतामधील बौद्ध धर्माचा व त्या अनुषंगाने भारहूत व सांची येथील बौद्ध कलेचा प्रसार पौनी या केंद्रातून होत होता, हे आढळून आले. जगन्नाथ मंदिर टेकाडाच्या उत्खननात एका प्रचंड स्तूपाचे अवशेष उपलब्ध झाले. या स्तूपाचा व्यास सु. ४१.२ मी. असून त्याचा घुमट विटांत पेटिकापद्धतीने बांधल्याचे आढळले. या स्तूपाभोवती ६ मी. रुंदीच्या फरश्यांनी आच्छादिलेला प्रदक्षिणापथ होता आणि त्याच्याभोवती सांची-भारहूतपद्धतीचा दगडी कठडा किंवा वेदिका होती, तसेच चार दिशांना प्रवेशद्वारे होती, असे आढळले. शिवाय या स्तूपाचा तीन कालखंडांमध्ये विस्तार झाल्याचे आढळून आले. स्तूपाचे अण्ड, हर्मिका व छत्रावली प्रदक्षिणापथाने वेढली होती. दर्शनी भागी एकपाषाणी ध्वजस्तंभ होता. प्रदक्षिणापथाचीही नव्याने रचना करून त्याची रुंदी ३.५० मी. इतकी केलेली आढळली. येथील अष्टकोनी स्तंभांच्या तीन बाजूंवर बौद्धधर्माची प्रतीके (स्तूप, बोधिवृक्ष, चैत्य व भद्रासन), भक्तगण, नाग मुचुलिंदाची कथा व फुलांची नक्षी कोरलेली शिल्पे असून आडव्या सूचीवर प्रदानलेख आहेत. सांची येथील स्तूपापेक्षा या स्तूपाचा परीघ मोठा असून तोरणावर शुंगकालीन शिल्पे कोरलेली आहेत. या स्तूपाचा काळ शुंगशैली, लेख व शिल्पे यांनुसार इ. स. पू. तिसरे शतक ते इ. स. तिसरे शतक असा ठरतो. या स्थानाला तत्कालीन समाजातील सर्व स्तरांतील समुदायाकडून आश्रय लाभला होता, असे वेदिकेवरील प्राकृत भाषेतील ब्राह्मी लिपीत कोरलेल्या अभिलेखांवरून ज्ञात झाले. पौनी येथे आणखी एका भव्य हीनयानपंथीय बौद्ध धर्माशी निगडित स्तूपाचे अवशेष चांडकापुर टेकाड येथे केलेल्या उत्खननात सापडले (१९६९-७०). या स्तूपसमूहाचे अवशेष जगन्नाथ टेकाडाच्या दक्षिणेस सु. २ किमी. अंतरावर आढळले. या स्तूपाची बांधणी पायरीपद्धतीची असून त्याचा काळ इ. स. चे पहिले – दुसरे शतक असावा. या स्तूपाचा महत्त्वाचा भाग कालौघात नाहीसा झाला आहे. स्तूपाच्या अंतर्भागात अस्थिकलश होता; पण त्यावर अभिलेख आढळला नाही. पुरातत्त्वज्ञ अमरेंद्र नाथ यांनी भारतीय पुरातत्त्व विभागातर्फे पौनी येथील प्राचीन निवासी वसाहतींचा शोध घेण्यासाठी १९९४ मध्ये उत्खनन केले आणि या उत्खननात आढळलेल्या प्राचीन वसाहतींचा कालानुक्रम पुढीलप्रमाणे ठरविला आहे :
कालखंड १ : मौर्यपूर्व (इ. स. पू. सहावे शतक ते इ. स. पू. चौथे शतक) कालखंड २ : मौर्य काल (इ. स. पू. चौथे ते इ. स. पू. दुसरे शतक) कालखंड ३ : शुंग-भद्र (इ. स. पू. दुसरे शतक ते इ. स. पू. पहिले शतक) कालखंड ४ : क्षत्रप-सातवाहन (इ. स. पू. पहिल्या शतकाचा उत्तरार्ध ते इ. स. दुसरे शतक) कालखंड ५ : वाकाटक (इ. स. तिसरे शतक ते इ. स. सहावे शतक)
यातील वाकाटक कालखंडात सातवाहन काळातील बांधकामसाहित्याचा पुनर्वापर करून मोठ्या दगडांची बांधलेली तटबंदी व विहिरीचे अवशेष आढळले. अशा प्रकारची तटबंदी बिहार राज्यातील राजगीर येथे सापडली होती, तर दक्षिणेत पौनी येथे ती प्रथमच निदर्शनास आली. प्रस्तुत तटबंदी व अन्य पुराव्यांच्या आधारे पौनी हे वाकाटक काळातील ‘पुरिकाʼनामक नगर असावे, असा तर्क उत्खनकांनी केला आहे. एकूणच प्राचीन काळी पौनी हे विदर्भातील हीनयान पंथाचे मोठे केंद्र होते आणि या केंद्राद्वारे दक्षिणेत बौद्ध धर्म व कला यांचा प्रसार झाला असावा, असे सूचित होते.
नालासोपारा
सागराच्या मागे हटण्यामुळे निर्माण झालेल्या नवभूमीला 'शुर्पारक- अपरान्त' अपरान्त' किंवा 'कोकण भूमी' म्हणण्यात येते. या नवभूमीला सुजलाम् सुफलाम् करून तिची किर्ती दिगंत करणारा श्रीपरशुराम हा 'आद्य वसाहत-संस्थापक' ठरला जातो. या नवभूमीतील शुर्पारक म्हणजे कल्लिएण (कल्याण) आणि श्रीस्थान (ठाणे) यांच्या पश्चिमेकडील प्रदेश होय. सुमारे ७००० वर्षांपूर्वीचा पौराणिक कालखंड आणि प्राचीन इतिहास असलेली शुर्पारक नगरी म्हणजेच आजचे 'सोपारा' हे गाव होय! आज सृष्टीकर्त्या ब्रम्हालाही हेवा वाटेल असे टुमदार बंगले आणि सभाेवतालच्या हिरवळीने नटलेल्या मार्गाने नालासोपाऱ्याच्या पूर्वेला जमिनीसह आकाशातही जागा व्यापणाऱ्या गच्च इमारती तर पश्चिमेला इमारतींबरोबरच गावपण टिकवून ठेवलेल्या वाड्या आहेत. दोन्ही बाजूकडील लोकवस्त्यांमध्ये जमिन अस्मानाचं अंतर दिसते.
श्रीविष्णूचा सहावा आणि पूर्णतः मनुष्यरूपी पहिलाच अवतार म्हणून ओळखल्या गेलेल्या श्रीपरशुरामाने पृथ्वीदान केल्यानंतर स्वतःसाठी नवीन भूमी निर्माण केली, अशी वंदता आहे. त्यासाठी सह्य पर्वतावरून बाण मारून श्रीपरशुरामाने पश्चिम सागराला मागे हटविले. सागराच्या मागे हटण्यामुळे निर्माण झालेल्या नवभूमीला 'शुर्पारक- अपरान्त' किंवा 'कोकण भूमी' म्हणण्यात येते. या नवभूमीला सुजलाम् सुफलाम् करून तिची किर्ती दिगंत करणारा श्रीपरशुराम हा 'आय वसाहत संस्थापक' ठरला जातो. या नवभूमीतील शुर्पारक म्हणजे कल्लिएण (कल्याण) आणि श्रीस्थान (ठाणे) यांच्या पश्चिमेकडील प्रदेश होय. सुमारे ७००० वर्षापूर्वीचा पौराणिक कालखंड आणि प्राचीन इतिहास असलेली शुर्पारक नगरी म्हणजेच आजचे 'सोपारा' हे गाव होया
पौराणिक काळापासून महत्त्व प्राप्त झालेली शुर्पारक ही नगरी देवांची वसाहत असलेली पवित्र भूमी होती. हिंदुस्थानच्या पौराणिक, धार्मिक, सामाजिक, राजकीय आणि आर्थिक स्थित्यंतराचे प्रतिनिधित्व करणारी शुर्पारक ही एकमेव प्राचीन नगरी असावी. ह्या नगरीची प्राचीन व विश्वसनीय नोंद रामायण-महाभारत या महाकाव्यांसोबत अनेक पुराण ग्रंथातही आढळते, पौराणिक काळात देवभूमी म्हणून महत्त्व पावलेली ही नगरी जैन-बौद्ध काळात व्यापाराचे मुख्य केंद्र म्हणून भरभराटीस आली. उत्खननात सापडलेले अनेक ताम्रपट, शिलालेख, मूर्त्या, नाणी यावरून शुर्पारक नगरीचे जागतिक बाजारपेठेतील अद्वितीय महत्त्व सहज ध्यानात येते.
रामायण-महाभारतासारख्या महाकाव्यांतून प्रसिद्ध असलेली ही नगरी हरिवंश-स्कंद - भागवत मत्स्य वायू-ब्रह्मांड - विष्णू-वामन गरूड मार्कण्डेय भविष्य ब्रह्म, इत्यादी पुराण ग्रंथातून परिचित होते. याचसोबत परदेशी व्यापारी जलपर्यटक, ग्रीक-अरब प्रवासी, परदेशी इतिहासकार, जैन व बौद्ध धर्मीय यांचे साहित्य व नोंदी इत्यादीतून या नगरीची जागतिक कीर्ति, महत्त्व व स्थित्यंतराचा योग्य आढावा घेता येतो. 'पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रिअन सी' या पुस्तकाच्या लेखकाने त्यांच्या जलपर्यटनाच्या काळात सुमारे २००० वर्षांपूर्वीचे शुर्पारक येथील समृद्धी, समाजजीवन आणि भरभराटीला आलेला व्यापार याबाबतचे अनुभव सदर पुस्तकात नोंदविले आहेत. अनेक परदेशी प्रवासी आणि व्यापारी यांनी केलेल्या नोंदी आणि वर्णनानुसार हिंदुस्थान ही सुवर्णभूमी होती. चांदीच्या बदल्यात स्वस्त सुवर्ण हिंदुस्थानातून नेले जात असे. हिंदुस्थानातून निर्यात होणाऱ्या मालात मसाल्याचे पदार्थ, हिरे, माणके, मोती, सुवर्ण, रेशीम, मलमल, कापूस, तयार कपडे, हस्तीदंत, चंदन, तिळाचे तेल, गहू, तांदूळ, तूप, पशुंच्या कातड्यांच्या वस्तू आणि कपडे, मोर-माकडे इत्यादी प्राणी, इत्यादींचा समावेश असे. तर आयात होणाऱ्या मालात तांबे, कथील, शिसे, काच, औषधे आणि रोमन मद्य याचा समावेश असे. रोमन देशांसोबत होणाऱ्या व्यापारामुळे तेथील सुवर्णाचा ओघ हिंदुस्थानात वहात असे आणि चांदीच्या बदल्यात येथील सुवर्ण स्वस्त दरात अन्य देशात जात असे. इ.स. पूर्व ५०० वर्षांपूर्वीचा लिखित स्वरूपाचा विश्वसनीय इतिहास असलेली ही नगरी सम्राट अशोकाच्या काळात बौद्ध धर्माचे मुख्य स्थान बनली होती. या नगरीत सम्राट अशोकाचा धर्मप्रचारक 'यवनधर्मरक्षित' प्रचारार्थ येत असे. सोपारा येथे उत्खननात सापडलेल्या अशोकाच्या आठव्या शिलालेखानुसार इ.स. पूर्व २५० या काळात शुर्पारक नगरी ही अपरान्ताची राजधानी होती.
नालासोपरा उर्फ शुर्पारक बंदराचा नकाशा
बौद्ध वाङ्मयात गौतम बुद्धांचा मुख्य अनुयायी म्हणून प्रसिद्ध पावलेला 'मैत्रेयी बुद्ध' उर्फ 'पूर्ण' या व्यापाऱ्याची कथा दिली आहे. गौतम बुद्ध वृद्धत्वाकडे झुकल्यावर त्यांनी स्वतःचे भिक्षापात्र आणि महत्त्वाच्या वस्तू 'पूर्ण'कडे सोपविल्या. त्यामुळे बुद्धांचे अनुयायी पूर्णला बुद्ध मानू लागले. मैत्रेयी बुद्धाने त्याचा अखेरचा जीवनकाळ शुर्पारक येथे व्यतीत केला. सोपारा येथे उत्खननात सापडलेल्या स्तूपात असलेले निश्वापार व अन्य वस्तु पैवेधी बुद्धालेच ठेवल्या असल्याचा कयास आहे बौद्ध वाड्मयात शुर्पारक नगरीचे वर्णन करताना लिहीले आहे की, राजधानीचे शहर असलेल्या या नगरीत लक्षावधी प्रजा रहाते. येथील बहुसंख्य प्रजा धमनि ब्राह्मण आहे. या नगरीला अठरा दरवाजे आहेत. कमानीयुक्त, कलाकुसरीने सुशोभित केलेले चंदनी लाकडाचे बुद्ध मंदीर येथे आहे. उत्तर हिंदुस्थानातून अनेक व्यापारी मालाची निर्यात करण्यासाठी शुर्पारक बंदरात येतात. या व्यापार व व्यापाऱ्यांवर नियंत्रण ठेवणारी संघटना येथे अस्तित्यात आहे." शुर्पारक बंदरामुळे येथे येणाऱ्या परदेशी प्रवासी, व्यापारी, जलपर्यटक यांना हिंदुस्थानातील अर्थ, सामाजिक व राजकीय माहिती निळविण्यासाठी खुले कयाड गवसले होते. येथील संपन्नता व समृद्धीची योग्य ती नोंद अनेक ग्रीक, फिनिशिअन, असिरियन, चिनी प्रवासी आणि व्यापाऱ्यांनी वेळोवेळी करून ठेवलेली आहे. व्यापारामुळे भरभराटीला आलेले बंदर व येथील अर्थव्यवस्था टिकवून ठेवण्यासाठी भक्कम व्यापारी संघटनेसोबतच, नगरीच्या संरक्षणार्थ अठरा द्वारांनी युक्त अफाट अवाढव्य अशी तटबंदी शुर्पारक नगरीभोवती बांधण्यात आली होती. सातवाहन राजवटीच्या काळात सोपारा व कल्याण या कोकणातील बंदरांना देशावरील शहरांशी जोडणारे नाणेघाट-माळशेजघाट हे व्यापारी वाहतुकीचे घाटमार्ग निर्माण केले गेले. सातवाहन काळात नाणेघाट या राजमार्गामुळे शुर्पारक हे अत्यंत भरभराटीला आलेले नगर होते.
जैन-बौद्ध कालखंडापासून मौर्य सातवाहन शक क्षत्रप कोकण मौर्य - त्रैकुटक- वाकाटक अश्मक चालुक्य राष्ट्रकुट कलचूरी- कदंब परमार यादव शिलाहार हे हिंदुस्थानी राजवंश, तसेच धर्माध मुस्लीम प्रचारक लुटारू आणि राज्यकर्ते, शिवाय व्यापारी व धर्म प्रसारक म्हणून आलेले पोर्तुगिज व ब्रिटिशांपर्यंत अनेक राजवटी या नगराशी जवळून संबंधित होत्या.
प्राचीन काळात असलेली आर्थिक समृद्धी, दानशूर व्यापारी, साहित्य व स्थापत्यकलेची अचूक जाण असलेल्या उदार व कलाप्रिय राजवटी यामुळे शुर्पारक या नगरीसोबतच संपूर्ण महाराष्ट्रात कलापूर्ण स्थापत्य शैलींचा पूर ओसंडून वहात होता. घाटमार्ग, रस्ते, पाणपोया, कोरीव कलाकुसरींची मंदिरे, त्यातील अप्रतिम अद्भूत कलाकुसरीने नटलेल्या सुंदर मूर्ती- शिल्प, गुफा लेणी, संरक्षित तटबंद वसाहती अशा अनेक वास्तू उदयास आल्या.
आर्थिक सुबत्ता आणि समृद्धीची रेलचेल असलेल्या या नगरीवर मुस्लीम धर्मांधांमुळे गंडातंराला सुरूवात झाली. इस ६३६ ह्या वर्षी हिंदुस्थानावर झालेल्या पहिल्या अरबी मुस्लीमांच्या टोळधाडीची शिकार ठाणे नगरी होती, परंतु येथील जागृत जनतेने मुस्लीम दरोडेखोरांचा तीव्रतेने यशस्वी प्रतीकार केला. मात्र मध्ययुगात येथील सुव्यवस्था पार मोडकळीस आली. समुद्री चाचे, अरबी धर्माध, हबसाणातील सिद्धी यांनी वारंवार हल्ले करून अवधी पश्चिम किनारपट्टी घुसळून काढली होती. धर्मप्रसाराच्या नावावर उघडपणे दरोडे घातले जात होते. घरं, शेतं, वाड्या, नगरं उद्धवस्त करून स्त्रीयांवर अत्याचार केले जात होते, धर्म बाटवणे, घरं मंदिरं लुटणे, देवांच्या मुर्त्या विद्रुप करते, तरूण स्वीया-पुरुषांना पळवणे, त्यांना गुलाम बनवून विकणे असे प्रकार सर्रास घडत होते.
दख्खन प्रांतात नांदत असलेल्या अनेक राजवटीत एकवाक्यता नसल्यामुळे या परकीय आक्रमणांना तोंड देण्याचे सामर्थ्य कुणातही उरले नव्हते. हीच परिस्थिती उत्तर हिंदुस्थानात देखील होती. अवध्या हिंदुस्थानात परकीय आक्रमकांनी धुमाकूळ घातला होता. येथील अनमोल अगणित संपत्ती, जडजवाहीर, सुवर्ण, तरूण स्वीया-पुरुष, हत्ती-उंट इत्यादी प्राणी लुट म्हणून मुस्लीम राजवटीच्या प्रदेशात जातच राहिले. आर्थिक व संरक्षणदृष्ट्या भक्कम असलेली ही नगरी १५ व्या शतकात आलेल्या पोर्तुगीजांपुढे अगदीच कमकुवत ठरली. व्यापार आणि धर्मप्रसारार्थ आलेल्या पोर्तुगीजांनी मुसलमानांचाच कित्ता गिरवला. देवळं पाडून त्या जागी चर्च उभारली गेली. देवळातील मूर्त्या भंग करून त्यांना जलसमाधी देण्यात आली. साम-दाम-दंड-भेद या नितींचा वापर करून येथील जनतेला जबरदस्तीने धर्म बदलण्यास प्रवृत्त करण्यात आले.
चौदाव्या शतकानंतर शुर्पारक नगरीचे महत्त्व कमी होवून त्याऐवजी श्रीस्थान उर्फ ठाणे नगरीला महत्त्व प्राप्त झाले. पोर्तुगिजांनी वसई येथे भक्कम जलदूर्गाची निर्मिती केल्याने सोपाऱ्याचे महत्त्व लोप पावून वसई हे मुख्य सत्ता केंद्र बनले. शुपरिक उर्फ सोपारा हे पश्चिम रेल्वेच्या वसई-विरार रेल्वे स्थानकांच्या मधील 'नालासोपारा' हे स्थानक आहे. या रेल्वेस्थानकातून सोपारा गावात जायला अनेक वाहनं उपलब्ध आहेत. सोपारा गावात चक्रेश्वर तलाव व चक्रेश्वर महादेव हे प्राचीन तीर्थ व मंदिर आहे.
चक्रेश्वर तीर्थ
श्री परशुरामाने पाळपंजर दैत्याचा वध ज्या चक्राने केला, ते चक्र ज्या जलाशयात धुतले त्या जलाशयाला 'चक्रेश्वर तीर्थ' म्हणण्यात आले, अशी येथील आख्यायिका आहे. नालासोपारा गावात जाणार्या मार्गाने पुढे जात एका लहानशा विहीरीला वळसा घालून आपण तलावाजवळील ‘चक्रेश्वर महादेव’ मंदिराजवळ पोहोचतो.
शुकसुंदरीची मुर्ती
चक्रेश्वर तलावाचा गाळ उपसताना कोरीव काम केलेल्या काळ्या पाषाणातील अत्यंत सुबक आणि सुंदर अशा मूर्ती येथे सापडल्या आहेत. पैकी शुकधारी स्त्रीमूर्ती म्हणजे जिवंत सौंदर्याचा अद्भुत नजराणा आहे.हि मुर्ती शुकसुंदरीची आहे. या मूर्तीची ठेवण, कलाकुसर, केशभूषा वेषभूषा, अलंकार, डाव्या हातावरील शुक, उभे रहाण्याची ढब, मुखावरील सलज्ज भाव, प्रमाणबद्ध शरीर रचना असे शब्दशः 'मूर्तीमंत सौंदर्य' अनुभवयाला मिळते.
प्राचीन शुर्पारक नगरीतील चक्रतीर्थ किंवा चक्रेश्वर नावाच्या या तलावाचा अगदी रामायण-महाभारतातही उल्लेख असल्याचे सांगीतले जाते. विस्ताराने आणि सौंदर्याने विशाल असणाऱ्या चक्रेश्वर तलावाच्या दिशेकडील प्रवेशद्वारातून महादेव मंदिरात प्रवेश करायचा आणि शिवलिंगाचे दर्शन घेऊन उजवीकडे वळायचे.
मंदीराच्या गर्भगृहाबाहेरच एका बंदिस्त जागेत शिव-पार्वती, गणपती, अंबिका, मिनाक्षी अप्सरा अशी सुंदर आणि दुर्मिळ शिल्पे आहेत.
मंदिरातच एका बाजूला मारूतीची मिशी असलेली एक वैशिष्ट्यपूर्ण मूर्ती आहे.
मिशी असलेला मारूती
वसई किल्ल्यातील मारूतीशी साधर्म्य असणारी ही मूर्ती. मारूतीच्या एका अंगाला अग्नीदेवाची झीज झालेली मूर्ती आहे. मंदिराच्या उत्तरेकडील दारातून बाहेर पडल्यानंतर एक जुने रामंमदिर आहे. या मंदिराच्या बाहेरच्या भिंतीला एक वराह मूर्तीही आढळते. आश्चर्याची बाब म्हणजे महादेव मंदिर आणि कुंपण यांच्यामधील मोकळ्या जागेत एक भले मोठे शिवलिंग आहे, परंतु त्याकडे विशेष लक्ष पुरवल्याचे भासत नाही.या परिसराच्या कुंपणाला लागून अनेक सुंदर मूर्ती ओळीने ठेवलेल्या आढळतात.
गजलक्ष्मी
वीरगळ
गजलक्ष्मी, विष्णू, वीरगळ, नंदी इत्यादी भंग झालेल्या लहान-मोठय़ा मूर्ती यात आहेत.या ठळक मूर्त्यांव्यतिरिक्त गणेश, शिव-पार्वती, शिवलिंग, सतीशिला अशा अनेक मूर्त्या येथे पहावयास मिळतात.
प्राचीन काळात वैदिक, जैन आणि बौद्ध धर्माचे केंद्र असणाऱ्या शूर्पारक नगराचा लौकीक पाहता चक्रेश्वर तलाव परिसरात अतिशय सुंदर व भव्य मंदिर होते असे मानायला हरकत नाही. तलावात शास्त्रीय पद्धतीने शोध घेतल्यास इथल्या प्राचीन इतिहासावर प्रकाश टाकता येऊ शकेल. ब्रम्हदेवाच्या मूर्ती दुर्मिळ मानल्या जात असताना नालासोपाऱ्यात दोन मूर्ती आढळणे ही इथल्या प्राचिनत्वाला अधोरेखित करणारी गोष्ट आहे. ही दुर्मिळ आणि सुंदर कलाकृती उन-पाऊस झेलत उभी आहे. परिणामी मूर्तीच्या दगडाची झीज होत आहे.
चक्रेश्वर तलाव- सोपारा
परंतु कला आणि इतिहासाप्रतीच्या आपल्या उदासीनतेच्या चक्रात हा चक्रेश्वराचा परिसरही सापडलाय. काही वर्षांपूर्वी येथील तळ्याचा गाळ काढला गेला, असाच काहीसा दुर्लक्षाचा गाळ आमच्या दृष्टीवर पडलाय तोही निघायला हवा.
याशिवाय सापडलेली ब्रह्मदेवाची भव्य मूर्ती ही आजतागायत महाराष्ट्रात उपलब्ध असलेल्या ब्रह्मदेवाच्या मूर्त्यांमध्ये सगळ्यात मोठी मूर्ती आहे. अलीकडेच मंदिराचा जीर्णोद्धार झाला तेव्हा तलावाचा गाळ उपसताना सापडलेल्या या प्राचीन व दुर्मिळ अशा मूर्ती. या मूर्त्यांच्या रांगेतच ब्रह्मदेवाची आठ फूट उंचीची समभंग रचनेतील अचल मूर्ती आहे. ही महाराष्ट्रातील सर्वात मोठी ब्रह्मदेवाची मूर्ती म्हणून ओळखली जाते. सृष्टीचा निर्माता मानला जाणारा ब्रम्हा येथे उघड्या आभाळाखाली ‘स्थानक’ म्हणजेच उभ्या स्थितीत दिसतो.
“ब्रम्हा कमंडलुधर: कर्तव्य: स चतुर्मुख।
हंसारूढ: क्वचित् कार्य: क्वचिच्च कमलासन:।।
वर्णत: पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहु: शुभेक्षण:।
कमंडलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे।।”
ब्रम्हा मूर्ती
या पुराणांतील वर्णनाप्रमाणे येथील चतुर्मुखी ब्रम्हा दर्शनी त्रिमुख व चतुर्भूज रुपात आहे. तीन मुखं असलेल्या या मूर्तीचे मधले सन्मुख दाढीधारी आहे. डोक्यावर कलाकुसरीने सुशोभित मुकुट आहेत. मूर्तीला चार हात असून डाव्या हातांतील वरच्या हातात वेदांचे प्रतीक असलेली सुरनळी व खालच्या हातात भांडे आहे. उजव्या हातातील वरच्या हातात फुलसदृश्य प्रतीक, स्रुवा आहे. समोरच्या डाव्या हाती कमंडलू असून उजवा हात जमिनीच्या दिशेने आहे. या मूर्तीतील ब्रम्हदेवाच्या उजव्या हातातील स्रुवा-म्हणजे यज्ञाच्या वेळेस आहुती देण्यासाठी वापरली जाणारी पळी अतिशय सुबक आणि देखणी आहे. गळ्यात जानवे, कटीवस्त्र, अंगावर कमरपट्टा-मनगटी पट्टा अंगठ्या हार बाजूबंध- सलकडे असे अलंकार आहेत.
मूर्तीच्या पायाजवळ दोन्ही बाजूला दोन स्त्री मूर्त्या आहेत. फुटभर उंचीच्या या मूर्तीच्या हातात शस्व आहे. उजव्या स्त्री-मूर्तीच्या पुढ्यात अजून एक छोटी वेदधारी ऋषीची मूर्ती आहे आणि डाव्या मूर्तीच्या पुढ्यात सावित्री व ब्रह्मदेवाचे वाहन असलेला हंस आहे.
अंगावरील आभूषणे, यज्ञोपवित यांच्यातील एक वैशिष्ट्यपूर्ण लयबद्धता मूर्तीकाराने साधली आहे. मूर्ती पाहणाऱ्याचे लक्ष वेधून घेणारे हे उपकरण मुर्तीचे सौंदर्य वाढवते. रूप मंडनातील वर्णनानुसार दाढीधारी ब्रम्ह्याचे रूप पहायला मिळते. या मूर्तीतील समोरील मुखाला दाढी आहे. हे दाढी असलेले रूपही मूर्तीचे समभंगत्व राखून आहे. सामान्यत: शिव व ब्रम्हा यांच्या माथी जटामुकूट असतो, परंतु येथील मूर्तीवर किरीट मुकुट असून त्यात ‘किर्तीमुख’ कोरले आहे. अत्यंत सुबक व कलाकुसरीनेयुक्त अशा या रेखीव मूर्तींचे चतुर्थ मुख (जे पाठीमागच्या बाजूस असते) मात्र लुप्त आहे.
या सुंदर मूर्तीसह आणखी एक झीज झालेली ब्रम्हदेवाची मूर्ती सोपाऱ्यात आहे.
पुराणांनी ब्रम्हदेवाला सृष्टीचा निर्माता मानले असले तरी ब्रम्हदेवाची स्वतंत्र मंदिरे भारतात खूप कमी आहेत. पुष्कर(राजस्थान), ब्रम्हा कर्मळी(गोवा), कुल्लू, कुंभकोणम, तिरूपत्तूर अशी काही ब्रम्हदेवाची सुप्रसिद्ध मंदिरे आहेत.
चक्रेश्वर तलावाच्या परिसरात 'गोलकोट' उर्फ 'बुरूड राजाचा कोट' म्हणून ओळखले जाणारे टेकाड आहे. १८८२ साली ब्रिटिश राजवटीत झालेल्या उत्खननात येथे प्राचीन बुद्धस्तूपाचे अवशेष आढळले आहेत. या स्तूपात भिक्षापात्र, स्वर्ण फुले, स्वर्ण पत्रे, बुद्धाची स्वर्ण मूर्ती, सातवाहनकालीन स्वर्ण नाणी, अस्थींचे अवशेष इत्यादी वस्तू एका दगडी पेटीत ठेवलेल्या आढळल्या. आजमितिस या वस्तूंचे अस्तित्व अज्ञात आहे, परंतु ज्या पेटीत या वस्तू आढळल्या ती दगडी पेटी मात्र येथे पहावयास मिळते. याशिवाय सम्राट अशोकाचे शिलालेख व जयस्तंभ येथील उत्खननात सापडले आहेत.
नालासोपार्याजवळ बोळींज गावातील एका वृक्षाखाली उभी असलेली एक कोरीव विष्णूमूर्ती, केवळ आयुधांच्या जागेत बदल असणारी करमाळे येथील तलावात सापडलेली व सध्या सुरक्षित छप्पराखाली असणारी आणखी एक विष्णूमूर्ती बघता येते.
सोपारा गावापासून काही अंतरावर असलेले 'निर्मळ' हे एक प्राचीन तीर्थस्थान व सिद्धपीठ आहे. येथे श्री विमल व श्री निर्मळ ही प्राचीन तीर्थस्थळे असून श्री विमलेश्वर महादेव व श्री निर्मलेश्वर महादेवाची मंदिरे आहेत. ह्या शिवमंदिर परिसरातील टेकडावर श्री आद्य शंकराचार्यापासूनचे आठवे शंकराचार्य श्री विद्याशंकरभारती यांचे समाधीस्थान आहे. श्री विद्याशंकरभारती यांचे मुस्लीम व ब्रिटिश राजवटीत नजरेआड झालेले समाधीस्थळ त्यांचे शिष्य यती महाराज यांना कार्तिक वद्य एकादशीस सापडले. तेव्हापासून आजतागायत या दिवसापासून पुढे पंधरा दिवसांपर्यंत निर्मळ येथे नेमाने दरवर्षी मोठी यात्रा भरते.
निर्मळगावापासून अगदीच थोड्याशा अंतरावर दत्त दिगंबरांचे स्थान असलेली 'हिरा डोंगरी' उर्फ 'वज्रगड' हा किल्ला आहे. छोट्याशा टेकाडावर वसलेला हा आटोपशीर किल्ला समुद्र किनाऱ्यावर नजर ठेवण्यासाठी अत्यंत उपयुक्त स्थान होते. घोडबंदर किल्ल्यापासून धारावी व अर्नाळा किल्ल्यापर्यंत संपूर्ण खाडी परिसर व बंदरावर नजर ठेवण्यासाठी वज्रगड हे अत्यंत महत्त्वाचे स्थान होते. येथून हिरव्या गर्द वनराईने नटलेल्या वसई नगरीच्या निसर्ग सौंदर्याचे विलोभनीय दर्शन घडते.
सोपारा गावाच्या परिसरात असलेली नील टेकडी, तुलीनी टेकडी हा परिसर प्राचीन व ऐतिहासिक कालखंडाच्या अनेक खुणा घेवून बसला आहे. याशिवाय सोपारा गावापासून लगतच्या परिसरात असलेला वसई किल्ला, अर्नाळा किल्ला, तुंगारचा डोंगर, जिवदानी मातेचे स्थान असलेला जिवधन किल्ला अशा भेट देण्याजोग्या अनेक वास्तू आहेत. शिवाय लांबलचक पसरलेला सागर किनारा आणि नारळी-पोफळी व सुरूच्या बागा पर्यटकांना नेहमीच भुरळ घालीत असतात. रस्त्याच्या दुतर्फा पसरलेल्या नारळी-केळी आणि जाई-जुई मोगऱ्याच्या गर्द हिरव्या वाड्यांतून केलेली वसई तालुक्यातील प्राचीन नगरीची सफर नक्कीच प्रेक्षणीय, पुण्यप्रद आणि प्राचीन इतिहासाचा मागोवा घेणारी असेल!
संदर्भ:
१ ) R. C. Majumdar (ed.) The Age of Imperial Unity, Bharatiya Vidyabhavan, Bombay, 1968, pp. 54-94.
२ ) D. C. Sircar, Successors of The Satavahanas in the Lower Deccan, pp. 11-12-
३.) The Age of Imperial Unity, of. cit., p. 61.
४ ) K. V. Ramesh, Chalukyas of Vatapi, Sundeep Prakashan, Delhi, 1987, pp. 33-34.
५. B. C. Law Early History of Surashtra", Journal of Indian History, Vol. XLIV, Part II, August 1966, Sr. No. 131, pp. 339-347.
६ ) H. Kielhorn, Epigraphia Indica, 1894, Vol. II, pp. 221-228-
७ ) K. D Bajpai, Journal of the Epigraphical Society of India, 1979, p. 63.
८) B. C. Law, Ancient and Medieval Indian Kshatriya Tribes, p. 153.
९ ) P. V. Parabrahma Shastri, Ajaya-Sri, Recent Studies in Indology, Sundeep Prakashan Delhi, 1989, P. 71.
१० ) K. V. Ramesh, Epigraphia Indica, Vol. XL, Part II, PP. 51-54.
११ ) भारताची मूर्तीकला- पं.महादेवशास्त्री जोशी
१२) हरिहर ठोसर, संशोधक, राजवाडे संशोधन मंडळ, धुळे, डिसेंबर १९८९, ५.२-२२
१३ ) वा. वि. मिराशी, संशोधन मुक्तावली, विदर्भ संशोधन मंडळ, नागपूर, सर १०, पृ १४४.
१४) P. R. Shrinivasan, Journal of Indian History, Vol. LVII-VIII, p. 40.
१५ ) K. V. Ramesh, E. I. XL, op. cit.
१६ ) Bhagwanlal Indresi, Gazetteer of the Bombay Presi dency, Vol XIV, Thane District, p. 372.
१७ ) M. G. Dikshit, New Indian Antiquary, Vol. IV, pp. 181-184.
१८ ) Dhavalikar, M. K. Masterpieces of Indian Terracottas. Bombay : Taraporevala, 1977.
१९ ) Harper, Katherine Anne, ‘The Dancers of Bulandibhag: East-West Transactionsʼ, International Journal of Hindu Studies, Vol.9, No. 1/3, pp.77-97, 2005.
२० ) Singh, U. A history of Ancient and Early Medieval India : From the stone age to the 12th century, Uttar Pradesh : Pearson India Education Services Pvt. Ltd., 2009.
२१ ) Srivastava, S. K. Terracotta Art in Northern India, Delhi : Parimal Publications, 1996.
छायासौजन्य : गोपाल जोगे, (बिहार संग्रहालय, बिहार राज्य, बिहार).
२२ ) Deo, S. B. & Joshi, J. P. Pauni Excavation (1969-1970), Nagpur, 1972.
२३ ) Deotare B. C.; Joshi, P. S. & Parchure, C. N. ‘Glimpses of Ancient Maharashtraʼ, Pune, 2013.
Joshi, P. S. ‘Fragements of a Buddhist Pastʼ, Maharashtra Unlimited (Vidarbha Special), Mumbai, 2016.
२४ ) Nath, A. Further Excavations at Pauni : 1994, New Delhi, 1998.
२५ ) देव, शां. भा. ‘पवनी उत्खननʼ, विदर्भ संशोधन मंडळ, पृ. क्र. १२९-१३८, नागपूर, १९६९.
२६ ) मिराशी, वा. वि. सातवाहन आणि पश्चिमी क्षत्रप यांचा इतिहास आणि कोरीव लेख, मुंबई, १९७९.
२७ ) Allchin, F. R. & Norman, K. R. ‘Guide to the Asokan inscriptionsʼ, South Asian Studies, Vol.1, pp. 43-50, 1985.
२८ )_ Hultzsch, E. ‘Inscriptions of Asokaʼ, Corpus Inscriptionum Indicarum, Vol-1, Oxford, 1925.
२९ ) Sircar, D. C. Asokan Studies, Calcutta, 2000.
३० ) थापर, रोमिला, अशोक आणि मौर्यांचा ऱ्हास, महाराष्ट्र राज्य साहित्य आणि संस्कृती मंडळ, मुंबई, २००७ (द्वितीय आवृत्ती).
संदर्भ :
३१ ) Agarwala, V. S. Chakradhwaja : The Wheel Flag of India, Varanasi, Prithivi Prakashan, 1964.
३२ ) Agarwala, V. S. Studies in Indian Art, Varanasi, 1966.
Frederick, Asher & Spink, Walter ‘Maurya Figural Sculpture Reconsideredʼ, Ars Orientalis, Vol. 19, pp. 1-25. 1989.
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७K. D Bajpai, Journal of the Epigraphical Society of India, 1979, p. 63.
८. B. C. Law, Ancient and Medieval Indian Kshatriya Tribes, p. 153.
९. P. V. Parabrahma Shastri, Ajaya-Sri, Recent Studies in Indology, Sundeep Prakashan Delhi, 1989, P. 71.
१०. K. V. Ramesh, Epigraphia Indica, Vol. XL, Part II, PP. 51-54.
११. १२.
हरिहर ठोसर, संशोधक, राजवाडे संशोधन मंडळ, धुळे, डिसेंबर १९८९, ५.२-२२
वा. वि. मिराशी, संशोधन मुक्तावली, विदर्भ संशोधन मंडळ, नागपूर, सर १०, पृ १४४.
१३. M. G. Dikshit, New Indian Antiquary, Vol. IV, pp. 181-184.
१४. P. R. Shrinivasan, Journal of Indian History, Vol. LVII-VIII, p. 40.
१५. K. V. Ramesh, E. I. XL, op. cit.
१६. Bhagwanlal Indresi, Gazetteer of the Bombay Presi dency, Vol XIV, Thane District, p. 372.
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Dhavalikar, M. K. Masterpieces of Indian Terracottas. Bombay : Taraporevala, 1977.
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Joshi, P. S. ‘Fragements of a Buddhist Pastʼ, Maharashtra Unlimited (Vidarbha Special), Mumbai, 2016.
Nath, A. Further Excavations at Pauni : 1994, New Delhi, 1998.
After exploring the Kapra Kodia Caves we then headed over to see the Edicts of Ashoka. These are located on the way to Girnar Hills.
Direction to the same are tagged on Google maps.
Edicts of Ashoka/ Ashoka Shila Lekh / Ashoka Rock Edict are placed in this structure in Junagadh in Gujarat
Unfortunately, the building in which the edicts are housed was closed down for renovation purposes. So we were denied entry.
"So close but so far" I said to myself.
For
information purposes, one can view the Ashokan Rock Edicts from 8 AM to
6 PM all days, but there is a entry fee. I guess the entry fee will
change post the renovation is done. If you have visited this place post
the renovation do let me know your experience.
Rohan. Remember Rohan, he had accompanied me on my trips in Delhi.
he had informed me that it is a huge stone on which there are
inscriptions. These inscriptions were made by Ashoka the Emperor of the
Mauryan Empire.
Information on Edicts of Ashoka/ Ashoka Shila Lekh / Ashoka Rock Edict in Junagadh in Gujarat
The
Ashoka Rock Edicts were made around 250 BC and around 14 edicts are
located here. History states that the carvings are in Brahmi script in
Pali language.
There are many such edicts placed in different parts of India. NOTE: Please click on the highlighted words in the blog to read about them.
History of Mahapadma Nanda & Dhana
Nanda | From Pre - Mauryan Magadha Empire to arrival of Alexander | With
ancient sculptures
40–51 minutes
In the 8th century BC, India could be broadly understood in terms of five large regions viz.
- Madhyadesa (the middle country),
- Pratichya (western lands),
- Prachya (Eastern region),
- Uttarpatha (the land in the north of the Vindhyas[1]) and
- Dakshinpatha (the land south of the Vindhyas).
Dancing girl, Indus Valley Civilization, 2500 BCE, At National Museum, Delhi
The
girl wears a number of bangles and a necklace and is shown in a natural
standing position with one hand on her hip.
Both
arms are unusually long; the left arm is fully covered with 24-25
bangles, like a Banjara (an Indian tribe) woman, while there are just 4 bangles on her right arm. She holds some object in her left hand, which is resting on her legs.
In 1973, British archaeologist Mortimer Wheeler
described this statuette as his favourite: "She's about 15 years old
I should think, not more, but she stands there with bangles all the way
up her arm and nothing else on. A girl perfectly, for the moment,
perfectly confident of herself and the world. There's nothing like her, I
think, in the world."
John Marshall, another archeologist,
described the figure as "a young girl, her hand on her hip in a
half-impudent posture, and legs slightly forward as she beats time to
the music with her legs and feet".
The archaeologist Gregory
Possehl described the Dancing Girl as "the most captivating piece of art
from an Indus site" and qualified the description of her as a dancer by
stating that, "We may not be certain that she was a dancer, but she was
good at what she did and she knew it."
Around the 6th century BC, the territories of 16 Mahajanapadas (great countries)
got clearly marked. Those who are aware of the Mahabharata must have
read / heard about most of these names. These Mahajanapadas included :
- Kasi,
- Kosala,
- Anga,
- Magadha,
- Vajji or Vriji,
- Malla,
- Chedi or Cheti,
- Vamsa or Vatsa,
- Kuru,
- Panchala,
- Machcha or Matsya,
- Surasena,
- Assaka or Ashmaka ,
- Avanti,
- Gandhara, and
- Kamboja
An illustration of the 16 Mahajanapadas
The
names of at least 9 among them are given in Vedic literature.
Panini, in the 4th century BC, mentions as many as 22 different Janpadas,
but also mentions the 3 most important ones, viz. Magadha, Kosala and Vatsa.
Magadha
formed one of the sixteen Mahajanapadas ( great countries ) of ancient
India. The core of the Magadha kingdom was the area of present-day Bihar, south of
the river Ganga ; its first capital was Rajagriha (modern Rajgir[2]), then Pataliputra (modern Patna).
The Magadha
empire refers to the successive empires which were based in and around present-day Bihar.
Before the advent of the Mauryan dynasty, the following dynasties ruled
over Magadha:
- Haryanka Empire (Bimbisara dynasty) (c. 684 – c. 413 BC) - Shishunaga Empire (c. 413 – c. 368* BC) - Nanda Empire (c. 368* – c. 324 BC)
- Maurya Empire (c. 324 – c. 185 BC)
{ * - Years are not clearly known. }
According
to the Puranas, the Shishunaga dynasty was the second ruling dynasty of
Magadha, succeeding the Haryanakas. Shishunaga, the founder of the
dynasty, was initially a minister ( amatya / अमात्य ) of the last
Haryanka dynasty ruler and ascended to the throne after a rebellion in
c. 413 BC. The capital of this dynasty initially was Rajgir but later shifted to Pataliputra, near present-day Patna during the reign of Shishunaga's son - Kakavarna Kalasoka.
A
fragmentary terracotta plaque showing the head of a woman. She wears a
beautifully decorated headdress, the tassels of which fall on either
side of her head. Her hair is knotted in the centre. The face is carved
round like the moon. Features such as her eyes, nose and mouth are
clearly visible. There is a small hole
at the top.
Made in dull red clay. 2nd century BC. Now at the National Museum,
Delhi.
A Conspiracy of His Perfidious Queen with Probably Nanda Dynasty Founder
Kalasoka,
the son & successor of Shishunaga, probably corresponds to
Kakavarna of the Puranas. It was during his reign that the 2nd Buddhist
Council was held at Vaishali[3]. He had a tragic end which is referred to in later literature.
A passage in the Harshacharita of Banabhatta[4] (in
7th century AD) records the story, presumably handed down orally through the
centuries, that the king named Kakavarni Shishunagi was " killed by a dagger thrust into his throat ". An earlier reference to a similar event is made by the Greek writer Quintus Curtius Rufus (in the 1st century AD), as mentioned below.
Referring
to the founder of the Nanda dynasty, Curtius writes that : "The present king was the son of a barber, scarcely staving of hunger by his daily earnings, but who, from not being uncomely in
person, became the paramour of the queen, and being by her influence
advanced to too near a place in the confidence of the reigning monarch,
treacherously murdered him, and then under the pretence of acting as
guardian to the royal children, usurped the supreme authority and having
put the young princes to death begot the present king."
The murderer of Kalasoka or Kakavarna Shishunagi was thus possibly the founder of the next dynasty of kings - the Nandas.
The
"young princes" slain by him may be taken to be the 10 sons of the
murdered king who, according to the Mahavamsa, ruled, probably jointly,
for a period of 10 years. According to some sources, they ruled for 22 years!
These
are named in the Mahabodhivamsa and include Nandivardhana, who is
mentioned in the Purana, as the 9th king among the 10 kings of the
Shishunaga dynasty.
The Mahavamsa gives the names of the following kings before the Nandas: —
(1) Bimbisara (2) Ajatasatru (3) Udayabhadra (4) Anuruddha (5) Munda (6) Nagadasaka { Last ruler of Harayanka dynasty, c. 413 BCE } (7) Susunaga { Shishunaga } (8) Kalasoka Shishunaga (Kakavarna according to Asokavadana) (9) Ten sons of Kalasoka (who ruled for some years jointly before being murdered by the founder of the Nanda dynasty)
On the other hand, the Puranas give the following list : —
The Puranas add another king, Mahanandin, but his existence must be regarded as very doubtful unless we suppose that he was another of the 10 sons of Kalasoka.
The
Shishunaga dynasty thus came to an ignoble end. Whatever we might think
of the particulars related in different sources, there is no doubt that
the dynasty's downfall was brought about by a palace conspiracy, which took place
at the behest of the faithless queen of King Kalasoka.
A plaque showing the figure of a standing woman with her hands akimbo.
She wears an elaborate coiffure with two protuberances, pearl strings,
necklace, earrings, armlets, bracelets, girdle, dhoti and anklets.
Dull
red clay. 1st century BC.
The founder of the new dynasty was a man of low origin. His background, as stated by the Greek writer Quintus Curtius Rufus, has been noted above.
The Jain work Parisishtaparvan describes him as the son of a barber by a courtesan ( ganika-kushi-janma / गणिका-कुशी-जन्मा ) ; referring to him as the son of a barber : naapit-kumara (नापित-कुमार) or naapitasu ( नापितासु ).
The Avasyaka Sutra calls him a Napitadaas (नापितदास) - which means "the slave of a barber".
The
Puranas also brand the founder of the Nanda dynasty as "the son of King
Mahanandin by a Shudra woman" and the Nanda kings as immoral (adharmika / अधार्मिक) .
The Buddhist texts ( like the Mahavamsatika) regard the Nandas as ( annatakula / अन्नातकुल ) - "of unknown lineage."
It
will thus appear that all traditions are agreed about the lowly origins
of the Nanda dynasty. The Puranas trace it to a Shudra mother,
but the Greek account traces it to a Shudra father, a barber. Thus one
source fastens the "low origin" on the father and the other on the
mother. But it is the origin of the father that determines that of his
progeny. In any case, the Nandas are taken to be the offspring of a
Shudra father.
Mutilated
female torso wearing a flowing sari. She keeps her left hand on her
waist and is posing like any present-day model. Unfortunately, her head
and feet have been lost. 2nd century BC.
At Allahabad Museum.
The name of the founder and first king of the Nanda dynasty is differently given in different texts. The Puranas call him Mahapadma, presumably either with reference to his military strength as 'lord of an infinite host' , or Mahapadmapati, that is, lord of immense wealth amounting to 100,000 millions (padma[11] was also a unit of measurement of currency).
According to the Mahabodhivamsa, his name was Ugrasena[5a]. The term Ugrasena may have suggested the Greek name Agrammes[5b] for the Nanda king who ruled at the time of Alexander (Dhana Nanda).
The life of Mahapadma Nanda finds parallel in two historical personalities.
a. His later life reminds one of the the Kalachuri king Bijjala II, who was initially a vassal of Chalukya Vikramaditya VI, and later became independent. His reign was marked by a lot of turbulence towards the end.
b. His early relations with the preceding royal family (Shishunagas) resembled the relations between Cardinal Mazarin and the family of Louis XIII.
According to some manuscripts of the Vayu Purana, which is one of the oldest works, and was consulted by Banabhatta in 7th century AD, the first Nanda king ruled for 28 years, and was followed by his sons who ruled for 12 years.
The Tibetan historian Taranath[5c] also assigns a period of 29 years to the first Nanda king.
Based on these 2 accounts, we can infer that the first Nanda king should have died around 338 BCE, because his son Dhana Nanda was ruling in 326 BCE according to the Greek historians. The dynasty must have come to power in 367 BCE. But, as we have already seen, there is no unanimity among the Puranas, the Jain and the Buddhist accounts regarding the duration of the reign of the Nandas; hence we cannot be sure.
This
is one of the most beautiful themes in ancient Indian art, which i have
come across. This is a terracotta plaque showing a man carrying a
woman on his shoulders. Her hands are raised and resting on her
head. The man is shown wearing a headdress and a lower garment.
Dull red
clay. 2nd century BC. At National Museum, Delhi.
Who was Dhana Nanda - Mahapadma Nanda's brother or a son ?
The various ancient authorities agree that there were nine Nanda kings ( Nava-Nanda ). The Puranas take the first Nanda as the father and the other eight as his sons. The Buddhist texts, however, take all the nine Nandas as brothers. The details of the above mentioned 8 Nandas who succeeded the eldest Nanda, are obscure.
The 9 Nandas are named in the Mahabodhivamsa, as follows:
(1) Ugrasena[5a] (2) Panduka (3) Pandugati (4) Bhutapala (5) Rashtrapala (6) Govishanaka (7) Daiasiddhaka (8) Kaivarta and (9) Dhana (he is called Agrammes[6a] / Xandrames[6b] /Ganderites in Greek accounts)
Here the texts of Greek historians come to our rescue and help us in establishing that Dhana Nanda was the son of Mahapadma Nanda. We saw the Greek account of Curtius while reading about the end of the Shishunaga dynasty above. Curtius tells us that the king who was ruling in 326 BC (Dhana Nanda) was the son of a barber (Mahapadma Nanda). The latter became the king by killing the earlier king (Kalasoka Shishunagi) in a conspiracy with his (Kalasoka's) queen, after putting all the legitimate heirs of the Shishunaga dynasty to death.
The Puranas name only the first Nanda and one of his sons who is thought to be the eldest, Sumalya. The Matsya Purana spells the name as Sukalpa. The name in Vayu Purana is Sahalya. The Divyavadana calls him Sahalin.
A beautiful depiction on a terracotta plaque showing a closely seated royal couple on a throne.
There is a suspended hole on the upper left side of the plaque. The lower, right portion is broken and missing.
2nd Century BC. At the National
Museum, Delhi.
The Jain text, Avasyaka Sutra, tells us about the nine Nandas (Navame Nande). In the light of the above evidence regarding the nine Nandas, scholars have now disowned a theory according to which the word Nava (it can mean nine or new) should be taken to mean
new and not nine, and hence the two last rulers of the Shishunaga dynasty, viz.
Nandivardhana and Mahanandin should be treated as the old (पूर्व / Purva) Nandas who
were replaced by the new (नव / Nava) ones.
This issue has been resolved, and now the word Nava Nandas is believed to mean nine Nandas, and not the new Nandas. This is because there were no earlier Nandas (Purva Nandas) who could be differentiated from the new Nandas (Nava Nandas).
This discrepancy of Purva and Nava Nandas initially arose due to the misreading of the expression - Purva Nanda used by
Kshemendra and the other epitomisers and redactors of Brihatkatha[7]. The Puranas as well as the Sri-Lankan chronicles have told us of only one Nanda lineage and all the Jaina writers take Nava Nandas to mean 9, not new. Purva Nanda was, hence, the designation of a single king, not an earlier Nanda dynasty.
Mutilated
bust of a female figure wearing a highly ornamental headdress wrapped
around the head and resting to the left, disc-shaped ear ornaments and a
necklace
stamped with motifs made using applique design. Back then too, ladies
adorned themselves stylishly. A band supporting the headdress also
depicts the same
design. The left hand and torso are lost.
2nd century BC.
Terracota Gallery of Allahabad Museum.
We owe to the Mahavamsatika some
details of the life of the first and the last of the nine Nanda
brothers who ruled one after another, according to seniority.
The eldest brother who founded the dynasty is called Ugrasena
[5a], as already stated. He was a man of the frontier ( pachchanta-vasika
/ पच्चन्त-वासिक ) who fell into the hands of robbers and became one of
them and later their leader. He then, with his gang, started raiding the
neighboring kingdoms and their cities, giving them the ultimatum : "Either yield your kingdom or give battle." Fired with their success, they aimed at sovereignty.
The
text, however, is silent as to the actual steps by which the gang
achieved sovereignty. It simply insinuates that the conquest of Magadha
marked the
culmination of a career of violence and brigandage on the part of a gang
of outlaws whom the Mahabodhivamsa describes as Chorapubbas ( चोरपुब्बा )- 'dacoits of old'.
So this Buddhist tradition represents the Nandas as openly conquering
Magadha by force and not by any secret conspiracy or cowardly
assassination of the reigning king by conspiring with the queen.
The Puranas give a more reliable account of the founder of the Nanda dynasty whom they call Mahapadma. He is described as a second Parasurama, 'the exterminator of the entire Kshatriya race,'
and as one who made himself the sole sovereign in the country and
brought it under the umbrella of one authority which was not
challenged.
The Puranas tell us that he uprooted all the Kshatriya ruling houses who were the contemporaries of the Shishunaga dynasty. ( तुल्य-कलम भविष्यंति सर्वे ह्येते महिक्षितः। )
A terracotta sealing showing Kartikeya
in a standing posture with
his right hand raised and holding a stick type in left hand. {He was the
son of Shiva and the God of War, or the one who led the gods in their
war against the demons.} Two
peacocks {traditionally considered to be the vahana or carriage of
Kartikeya} have been shown, one on either side. Damaged and cracked.
2nd - 3rd century BC.
It can be seen that Ugrasena[5a] conquered Kalinga also. Like Parasurama, he conquered almost all the kshatriya kingdoms of the time.
Due to the subjugation of all the major Kshatriya powers by the first Nanda, the Puranas mention his name as - Sarva-kshatrantaka (which means destroyer of all
Kshatriyas) equivalent to Parshurama ; and call him the one who attained sole sovereignty ( ekarat & ekachchhatra / एकच्छत्र ).
This detailed and specific statement in the Puranas seems to be partially corroborated by independent evidence. The Katha-sarit-sagara mentions the camp of King Nanda in Ayodhya, thereby implying the inclusion of Kosala in the Nanda empire.
The conquest of Kalinga by a Nanda king has been interred, from a passage in the Hathigumpha inscription of Kharavela[9a]. The existence of a city called "Nav Nand Dehra"
(Nander on the banks of the Godavari river) has been taken by some
scholars to indicate Nanda supremacy over a considerable part of the Deccan.
According to some inscriptions of Mysuru, the Nandas ruled over Kuntala (southern part of Mumbai and north-western part of Mysuru).
Jaina writers refer to the subjugation of the country upto the sea by the Nanda ministers, in the following words :
A
mutilated horse rider riding on a horse, shown in terracotta. The fore
legs
of the horse are lost. The man is wearing a dress typical of the 2nd
century BCE and a headdress. The saddle of the horse is made by
applique design.
At the Allahabad Musuem.
Nature of the Nanda Empire : A Loose Federation or Consolidated Empire?
These
pieces of evidence related to the extent and might of the Nanda empire,
particularly the inscriptions (of Mysuru, which we saw above), cannot
be
regarded as conclusive because they are of later years, dating 1200
CE. The evidence related to the Nandas ruling over the trans-Vindhyan[9b] India is not strong. But the evidence undoubtedly supports the Puranic statement regarding the extermination of Kshatriyas. Its best corroboration is offered by the statement of the Greek
writers who refer to the extensive domains of Mahapadma Nanda's successor. The general
picture given in the Puranas of the great empire, which Mahapadma Nanda
had built by exterminating the numerous Kshatriya principalities,
may thus be regarded as historically accurate.
We
may also conclude from the Greek accounts that the Nanda empire was not
a loose federation but a strong, centrally administered empire. Mahapadma Nanda was, thus, historically the first great emperor in North India. His lowly origins proved to be the end of the age-old tradition of the political supremacy of the Kshatriyas.
A mutilated circular plaque showing a chariot
drawn by two horses / deers. The central part of plaque is chopped off
and is broken in three parts. Therefore, the royal figure seated under
the parasol is lost. Two persons in greeting posture stand before the
chariot on the right. Behind the parasol are seen some attendants. 2nd
century BCE. Allahabad Museum.
Unfortunately,
we know little about the subsequent history of the Nanda dynasty until we
come to the last king. He is not named in the Puranas but must have
maintained intact his imperial inheritance of territory and army.
As he was ruling at the time of Alexander's invasion of 326 B.C., the Greek and Roman historians (Curtius & Diodorus) record some facts of his power, position, and popularity, which were narrated to Alexander by a local king called Phegelas (Bhagela, Bhagala) and confirmed by Porus. He is called by them Agrammes[5b] & [6a]or Xandrames[6b], and is described as " the king of powerful peoples beyond the river Beas " , " the Gangaridae[10a] and the Prasii[10b] " , with his capital at Patliputra.
His empire seems to have extended up to the frontiers of the Punjab, for it is stated that king Porus the younger escaped from Alexander into the adjoining territory of the Nanda king.
Fragmented
coping stone depicting a horse rider on a horse. Between the usual
borders a horse with a rider is shown wearing a fillet around the head.
To the left are plump mangoes issuing from the kalpavalli.
2nd
century BC. Now, at the Allahabad Museum.
The Nandas maintained a formidable fighting machinery. Quintus Curtius Rufus credits Dhana Nanda with - " keeping in field for guarding the approaches of the country an army of 20,000 cavalry ; 200,000 infantry and 2000 four-horsed chariots, and what is the most formidable of all, a troop of war elephants which ran up to the number of 3000 elephants". However, another Greek writer Diodorus mentions 4000 elephants. Plutarch mentions a force comprising 6000 war elephants. Dhana Nanda father's army was so large that it could be arranged in a lotus shape - Padmavyuh.
Talking about the strength of the army of the Gangetic states, Plutarch puts the strength at 80,000 horses ; 200,000 foot soldiers ; 8000 war chariots ; 6000 fighting elephants. It is not, therefore, a surprise that such a king should call himself ekarat , as we saw above, the sole monarch of vast territories from the Himalayas to the Godavari or its neighbourhood.
With
all his military might and supremacy over a large empire, Dhana Nanda
lacked the strength of popularity by which alone they could be
maintained. Chandragupta Maurya, who was fated to overthrow him, already reported to Alexander's followers that he could easily conquer the Nanda empire because its king was so much " hated and despised by his subjects for the wickedness of his disposition and the meanness of his origin. "
This report was also confirmed by king Porus (Paurava) of the Punjab who added that " the king of the Gangaridae[10a] was a man of quite worthless character and held in no respect, and he was the son of a barber. "
However, much of his unpopularity was also due to his miserliness, avarice, and love of wealth, which he accumulated at the expense of his people by means of excessive taxation and exactions.
The reasons for the strong military might of the Nandas is said to be the result of conquests and a strong base which was built by the earlier great kings of the Magadha Empire - Bimbisara and Ajatsatru. Similarly, Chandragupta inherited a strong army and sound administrative system from the Nandas, which was reformed and strengthened by him and his minister Chanakya.
A plaque showing a standing elephant moving towards left. His trunk is
stretched down. There is a small suspension hole near the head. The
plaque has a beaded border.
1st Century BC.
The Nandas were wealthy rulers. The second Nanda was nicknamed Dhana Nanda - the worshipper of Mammon. The Katha-sarit-sagara preserves the tradition of his wealth computed at 990 million gold pieces. He was so wealthy that his wealth was counted in Padma[11].
Its Buddhist version says: "The youngest brother was called Dhana Nanda from his addiction to
hoarding treasure. . . .He collected riches to the amount of 80 kotis[12]in a cave in the bed of the river (Ganga). Having caused a great excavation to be made, he buried the treasure there. . . Levying taxes, among other articles, even on skins, gums, trees, and stones, he amassed further treasure which he disposed of similarly."
This story of his hoarded and hidden wealth is hinted at in a Tamil poem of Sangam era, stating how 'a very famous Nanda ruler victorious in war' , after accumulating a lot of wealth in the beautiful city of Patali,[13] hid it in the floods of the Ganga."
The tale of the fabulous wealth of Nanda was also heard by the Chinese traveller Hiuen Tsang in the 7th century AD. He mentions five stupas of Pataliputra as symbols of "the five treasures of king Nanda's seven precious substances. "
Bust
of a female figure with hair supported by a band of thick pagree
stamped with leaf designs. She wears richly decorated ear and
precious neck ornaments. The decorated pendent of the necklace is stuck
above the bosom. The right hand is lost.
2nd century BC. Allahabad
Museum.
Alexander
invaded India in 326 BC during the rule of Dhana Nanda. The
Greek
historical texts mention that the crossing of the river Beas was
the last outpost of Alexander's army. Alexander insisted on crossing the
Ganga as well. But upon hearing that Dhana Nanda was waiting for them
with a 200,000 strong army, the Greek army was frightened and revolted.
Thus Alexander was forced to retreat. He began his homeward journey in
325 BC and, in
324 BC, he died in Persia.
One of the reasons why Alexander marched towards India was his attraction
to the wealth of the Indian subcontinent. Writing in the 5th century
BC, the Greek historian Herodotus tells us that 'India' was the 20th and
the most prosperous province of the ancient Persian empire and the tribute from India amounted to 360 talents[14] of gold dust - which was more than the tribute obtained from all the other Persian provinces combined together!
A FINE MACEDONIAN BRONZE WAR HELMET. Illyrian type, 6th century BCE.
Hammered from a single sheet of bronze, with twin reinforcing ridges on the top and two long pointed cheekpieces. Fine engraved decorative edging. The left cheekpiece is bent inward with a bit of edge missing.
It is of exceptional quality with its wonderful glossy green patina which covers the entire helmet. This helmet style is usually described as Illyrian in the literature but they were also worn by the Macedonian kings, as they are also found in the royal tombs at the Macedonian capital of Pella.
1. The Vindhya
Range is a complex, discontinuous chain of mountain ridges, hill
ranges, highlands and plateau escarpments in west-central India.
Location of the Vindhya Range vis-a-vis Magadha can be seen here
2. Rajgir
(originally known as Girivraj) is a city and a notified area in Nalanda
district in the Indian state of Bihar. The city of Rajgir was the first
capital of the kingdom of Magadha, a Mahajanapada that eventually
evolved into the Mauryan Empire. Its date of origin is unknown, although
ceramics dating to about 1000 BC have been found in the city. Rajgir is around 100 kms from Patna.
3. Vaishali
was an ancient city in Bihar, India, and is now an archeological site.
It was the capital city of the Licchavi rulers, considered one of the
first examples of a republic, in the Vajjian Confederacy (Vrijji)
mahajanapada, around the 6th century BC. It was here in 599 BC that the
24th Jain Tirthankara, Mahavira was born, which makes it a pious and
auspicious pilgrimage to Jains. Gautama Buddha also preached his last
sermon here before his death in c. 483 BC. In 383 BCE the Second
Buddhist council was convened here by King Kalasoka, making it an
important place for both Jains and Buddhists.
4. Banabhatta
was a 7th century Sanskrit prose writer and poet of India. He was the
Asthana Kavi (poet laureate) in the court of King Harsha Vardhana,
who reigned c. 606–647 CE in north India from Thanesar and Kannauj.
5a. Ugrasena : One with a large (ugra/अग्र/उग्ग) army (sena/सेना ) . This appears to be a title, not the name of the king. Actually, it is उग्गसेन (also pronounced as अग्रसेन ) and not उग्रसेन।
5b. Agrammes : This Greek variant of Ugrasena is derived from the distortion of a Sanskrit word : Augrasainya / औग्रसैन्य , which means , son / descendant of Ugrasena / उग्गसेन . It may be
noted that in this connection, Augrasainya as a royal epithet
may be traced back to the Aitreya Brahmana, where it occurs as a
patronymic of Yuddhamsrushti (युद्धमस्रुष्टि). The use of patronymics, or metronymics, instead of the
personal names, is by no means rare in Indian history. The other references like : Assakenus, Porus, Pandion, Sandrokottus, Androkottus show that, in several cases, Greeco-Roman historians did not take the pain of acquainting themselves with the personal epithets of the Indian princes. Instead, they mentioned the Greek variant of the Indian names.
5c. Taranath : He
was a Buddhist monk. His work is seen as a important source of Tibetan-Buddhist view of the events in ancient India. It is titled - rGya-gal-chos-byun, and was written around 1608. Due to the
difficult-to-pronounce name of this text, it is simply called 'The
Tibetan Legend'. This
text contains mystic stuff of exceptional quality and the best of
Indologists find it tough to translate it. We are therefore grateful to
the
efforts put in by the German linguist (Anton Schieftier) who translated the text in 1869. In the same year, the Russian translation (by Professor Wassiljew) was also published. There is a Japanese translation also ( by Enga Teramoto).
But the German translation is the one, which is widely used.
6a. Agrammes : Reference for Dhana Nanda by the Greek historian Curtius. Dhana Nanda was the son of Ugrasena[5a] (Mahapadma Nanda) ; hence this reference was used, as explained in 5b, above.
6b. Xandrames : Reference for Dhana Nanda by the Greek historian Diodorous.
7. Brihatkatha
(the Great Narrative) is an ancient Indian epic, said to have been
written by Gunadhya in a poorly-understood language known as Paisaci.
The work is no longer extant but several later adaptations — the
Katha-sarit-sagara, Brihat-katha-manjari and
Brihat-katha-shloka-samgraha in Sanskrit — furnish tantalizing and often
contradictory clues to its nature.
The
date of its composition is uncertain. According to testimonials by
later Sanskrit poets like Dandin, Subandhu, and Banabhatta[4], the work existed in the 6th century AD. According to other estimates, it predates that period by several more centuries.
8a. 8b. 8c. 8d. 8e. 8f. 8g. 8h. 8h. 8i. 8j. The following map serves as a reference for the notes in 8a to 8j. Readers may skip these points, and jump to note 9 ; these are only for serious history aficionados.
The 16 Mahajanapadas in ancient India
8a. The Ikshvakus
were the ruling clan of Kosala, roughly corresponding to modern Awadh
in Uttar Pradesh. They were defeated by Ajatashatru, son of Bimbisara. A
passage of the Katha-sarit-sagara refers to the camp (kataka) of Nanda
in Ayodhya. It appears that the Nanda ruler had undertaken an expedition
to Kosala. An important section of the Ikshvakus seems to have been
driven southwards as they are found in the 3rd- 4th century AD in occupation of the lower valley of the river Krishna.
8b. The Panchalas
occupied the tract of the country between the upper Ganges and the
Gomti together with a part of the Central Doab. They do not appear to
have come into hostile contact with the Magadhan monarchy before the
rise of the Nandas, and must have been brought under control by that
dynasty, as the evidence of the Greek writers suggests.
8c. The Kaseyas
were the people inhabiting the district around Kashi / Banaras / Varanasi, and
had come under the Magadhan sway as early as the days of Bimbisara and
Ajatasatru. It is recorded in the Puranas that a Shishunaga Prince was " placed in
Banaras " when the founder of the line took up his residence in
Girivraja, the Magadhan capital during the early times. It was apparently from a
descendant or successor of this prince that Nanda wrested control over
the people of Kashi / Kasi.
8d. The Haihayas
ruled over a part of the Narmada Valley till the medieval times. Their
earlier capital was at Mahishmati, which has been identified by Pargiter
with the rocky island of Mandhata and by others with a town named
Maheshwara on the northern bank of the Narmada within the boundaries of
the (erstwhile) Indore state. The subjugation of this region by the Nandas does not
seem to be improbable in view of the Puranic statement about the
humiliation of the rulers of the neighbouring realm of Avanti by their
Shishunaga predecessors. But there is lack of confirmation by
independent witnesses. It has however to be remembered that both Malwa
and Gujarat formed integral parts of the Magadha empire in the days of
Chandragupta towards the close of the fourth century BC, and the
foundation may have been lain by the Nandas.
8e. The Kalingas
occupied the extensive territory stretching from the river Vaitarani in
Odisha to the Varahanadi in the Vizagapatnam (present-day Visakhapatnam) District. The capital of Kalinga in
ancient times was the famous city of Dantakura or Dantapura* which has
been identified with the fort of Dantavaktra near Chicacole (present-day Srikakulam district in Andhra Pradesh) in the
Ganjam district, washed by the river Languliya (Langulini). The conquest
of a part of Kalinga by the Nandas is suggested by the Hathigumpha
inscription. The phraseology of the inscription hardly supports the view
held by some scholars that the Nandaraja mentioned therein is a local
chief. The reference is doubtless to a conqueror who established his
authority over a sannivesa (place) of Kalinga and constructed some
irrigation works in the province.
* - It is believed that Dantapura got its name from a tooth of Buddha that was kept there and later taken away to Sri Lanka. 8f. The Asmakas
occupied a part of the Godavari Valley with their capital at Potali /
Potana, or Podana. The last form of the name reminds one of Bodhan to
the south of the confluence of the Manjira and the Godavari, not very far
from Nizamabad near Hyderabad. The existence on the banks of the Godavari of a
city called "Nau Nand Dehra" (Nander), a little to the west of the
Nizamabad District, renders it probable that the dominions of the " Nine
Nandas" may have embraced the classic land of the Asmakas, though
independent confirmation by contemporary or semi-contemporary writers is
not available. 8g. The Kurus occupied
the country to the west of the Panchalas, stretching from the river Ganga
to the river Saraswati (now presumed to be flowing underground), which flows past the site of
Kurukshetra, near Thanesar. The subjugation of this territory by the
Nandas is not explicitly mentioned by any contemporary authority, but is
rendered probable by the Greek evidence in regard to "the dominions of
the nation of the Praisioi (see 10b) and the Gandaridai (see 10a)" which seem to have
embraced the whole tract of the river Ganga.
8h. The Maithilas
were the people of Mithila, the city famed in the Ramayana owing to its
connection with Janaka Nandni Maa Sita. It has been identified with
the small town of Janakpur along the Nepal border, north of where the
Darbhanga and Muzaffarpur Districts meet. The greater part of Northern
Bihar, over which the powerful confederation of the Vrijis (including
the Lichchhavis) had exercised sway, had been annexed by Ajatasatru, and
his successors are known to have graced Vaishali, the capital, with
their presence on occasions. If the Puranic tradition has any value,
then the chieftains of Mithila must have retained a certain amount of
independence in the fastnesses of the Nepalese Terai. The periodical
floods from the river Gandak, the Bagmati and connected streams during
the rainy season must have rendered this part of the country very
difficult to access and it is not surprising that the forests of the
Terai should have sheltered an autonomous principality when the great
city of Vaishali fell before the onslaught of Ajatasatru. The Nandas
attained greater success, as they could operate from their base in
Vaishali.
8i. The Surasenas
( Megasthenes calls them Sourasenoi ) had their capital at Mathura on
the banks of the river Yamuna. Their subjugation to the Prasii (see 10b) appears
very probable from the accounts of Alexander's Greek historians. 8j. The Vitihotras
are closely associated with the Haihayas and the Avantis in Puranic
tradition. Their sovereignty is said to have been terminated before the
rise of the famous lineage of Pradyota. If the Puranic statement, found in a
later passage of the Bhavishyanukirtana, about the contemporaneity of
some of the Vitihotras with the Shishunagas, has any value, the latter
may have restored some scion of the old line when they took away the
glory ( yatha kritsnam) of the Pradyotas. As already stated, the
undoubted control that Chandragupta Maurya exercised over western
India, including the Girnar region, makes it highly probable that the way
had been left clear by his Nanda predecessors. Jain accounts explicitly
mention the Nandas among the successors of Palaka, the son of Pradyota
of Avanti. 9a. Kharvela : Hathigumpha means the Elephant Cave. It is one of the most important
caves in the Udayagiri caves and contains a 17-line inscription in
Brahmi script. This cave faces the rock edicts of Asoka at Dhauli, which
are about 6 miles away. King Kharavela, who had the caves cut out on
the Udayagiri and Khandgiri hills for Jain ascetics, ruled over Kalinga
in the 2nd century BC.}
Hathigumpha Cave, Bhubhaneswar
9b. Trans-Vindhyan : Deep into southern India, after crossing the Vindhya ranges.
10a. The Gangaridae, according to Megasthenes, were the people occupying
the delta of the Ganga, that is the ones who were staying in the lower
Ganga valley.
10b. The
Prasii were the Prachyas or Easterners living to the east of the Middle
Country (Madhyadesa), such as the Panchalas, Surasenas, Kosalas, Kasis
and Videhas.
11. Padma : It is a unit of currency, equivalent to a million multiplied by a billion! 1 Padma = 1 Quadrillion ( 1,000,000,000,000,000
/ 1015 )
12. Koti : It is another unit of currency. 1 Koti = 1 crore = 10 million ( 10,000,000
/ 107 ) . Hence, 1 Padma = 100,000,000 Koti
13. Patli : A reference to Patliputra.
14. Talent : The
Greek talent is an ancient unit of mass equal to 25.992 kg. {From :
Herodotus, Robin Waterfield and Carolyn Dewald, The Histories, 1998, Pg-
593.}
AR Drachma* (13mm, 4.25 g). Athens. 454-404 BC.
Helmeted
head of Athena on the left / Owl standing on the right, its head facing
sideways and an olive sprig behind it; all within incuse square.
* - Drachma was the currency used in ancient Greece.
Incidentally, a Roman talent was 32.3 kilograms (71 lb), an Egyptian talent was 27
kilograms (60 lb), and a Babylonian talent was 30.3 kilograms.
The Mauryan Dynasty was one of ancient India’s most significant and
powerful empires, founded by Chandragupta Maurya in c. 321 BCE.
It peaked under his grandson, Ashoka the Great, who expanded the empire to cover almost the entire Indian subcontinent.
The Mauryan Dynasty is known for its central administration,
economic prosperity, and promotion of Buddhism, especially after
Ashoka’s conversion following the Kalinga War.
The dynasty played a crucial role in unifying India and establishing
a strong governance system. It lasted until Pushyamitra Shunga
overthrew it in 185 BCE.
Imagine a world where one empire’s brilliance cast a long shadow over
ancient India, shaping its history forever. The Mauryan Dynasty was a
beacon of power and progress from around 322 BCE to 185 BCE.
Chandragupta Maurya, a visionary leader, established this illustrious
dynasty by overthrowing the Nanda Dynasty. With the strategic brilliance
of Chandragupta Maurya, the administrative acumen of Bindusara, and the
transformative rule of Ashoka, the Mauryan Empire reached unparalleled
heights, achieving a level of political unity never before seen in
Indian history.
The capital, Pataliputra (modern-day Patna), became the heart of this
thriving empire. The Mauryan Dynasty era marked a pivotal shift from
republican and oligarchic governance to a consolidated monarchy, leaving
an indelible mark through its extraordinary contributions to
literature, art, architecture, and inscriptions. The iconic Lion Capital
of Ashoka, now India’s national emblem, is a testament to this period’s
grandeur. However, by 180 BCE, the sunset of the Mauryan Dynasty, with
Brihadratha as its final ruler, ended an era of monumental achievements
and left a legacy that continues to inspire.
Overview table of the Mauryan Dynasty:
Aspect
Details
Founding
322 BCE by Chandragupta Maurya
Duration
322 BCE – 185 BCE
Capital
Pataliputra (modern-day Patna)
Notable Rulers
Chandragupta Maurya, Bindusara, Ashoka
Geographic Extent
Vast areas of the Indian subcontinent
Political Unity
First major empire to consolidate much of India
Governance
Shift from republican and oligarchic systems to monarchy
Cultural Achievements
Literature, art, architecture, inscriptions
Iconic Symbol
Lion Capital of Ashoka (India’s national emblem)
End of Dynasty
185 BCE with the last ruler, Brihadratha
Rise of the Mauryan Dynasty
Before the establishment of the Mauryan Dynasty, the Nanda dynasty
governed a significant portion of the Indian Subcontinent, with its
capital at Pataliputra in the Magadh region. The populace within the
Nanda Kingdom grew discontented with the oppressive tactics employed by
their ruler, Dhana Nanda.
Kautilya, also known asChanakya
or Vishnugupta, harbored deep-seated animosity toward the Nanda
Dynasty. From Chandragupta Maurya’s youth, Kautilya was his mentor,
nurturing his administrative, governing, and military capabilities.
Following Kautilya’s counsel, Chandragupta Maurya began meticulously
preparing to amass troops and resources for the assault on Magadh.
Chandragupta devised an innovative strategy to conquer the Nanda Empire.
On one front, he engaged Dhana Nanda’s soldiers in battle to divert
their attention while simultaneously fostering dissent among corrupt
military commanders within the Nanda Kingdom to provoke a civil
conflict. Amidst this turmoil, the heir to the Nanda throne perished,
plunging King Dhana Nanda into grief. Consequently, he chose to
abdicate, relinquishing his authority to Chandragupta Maurya. Thus, he ended the Nanda Dynasty and marked the founding of the Mauryan Empire in 322 B.C.
Important Rulеrs of the Mauryan Dynasty
Rulers of the Mauryan Dynasty
Rеign (B. C.)
Chandragupta Maurya
(324/321 – 297 B.C.)
Bindusara
(297 – 272 B.C.)
Ashoka
(268 – 232 B.C.)
Thеsе thrее rulеrs wеrе pivotal in thе Mauryan Dynasty’s history,
with Ashoka, in particular, leaving a lasting lеgacy through his
promotion of Buddhism and Chandragupta Maurya, who was the founder of
the Maurya Dynasty.
Mauryan Dynasty Kings
King
Rеign (B. C.)
Chandragupta Maurya
(324/321 – 297 B.C.)
Bindusara
(297 – 272 B.C.)
Ashoka
(268 – 232 B.C.)
Dasharatha Maurya
(232 – 224 B.C)
Samprati
(224 – 215 B.C)
Shalishuka
(215 – 202 B.C)
Devavarman
(202 – 195 B.C)
Shatadhanvan
(195 – 187 B.C)
Brihadratha
(187 – 184 B.C)
Foundеr of Mauryan Dynasty: Chandragupta Maurya
Chandragupta’s lineage remains enigmatic, with Greek sources
suggesting non-warrior origins, Hindu texts portraying him as a humble
student of Kautilya, possibly born to a Shudra woman, and Buddhist
accounts asserting his Kshatriya status.
In Greek records, known as Sandrokottos, Chandragupta swiftly
emerged after Alexander’s withdrawal from India in 324 BC, defeating
Greek-ruled cities within a year in the northwest.
Guided by Kautilya’s strategy, Chandragupta formed a mercenary army and advanced eastward into Magadha.
Through a series of battles, Chandragupta overcame Dhana Nanda, establishing the Maurya Empire around 321 BC.
In 305 BC, Chandragupta forged a treaty with Seleucus Nicator,
securing Baluchistan, eastern Afghanistan, and territories west of the
Indus and marrying Seleucus Nicator’s daughter in exchange for 500
elephants.
Megasthenes served as the Greek ambassador at Chandragupta’s court.
Chandragupta’s reign from 321 BC to 297 BC was marked by expansive
policies that unified nearly all present-day India, excluding regions
like Kalinga and the Far South.
He abdicated in favor of his son, Bindusara, retiring to Karnataka
with Jain monk Bhadrabahu, where he embraced Jainism and eventually died
by fasting, following Jain tradition, at Shravanabelagola.
Alliancе with Chanakya
The mentor of Chandragupta Maurya and his Chief Minister, he was a
distinguished teacher and scholar at Taxila, known by alternate names
Vishnugupta and Kautilya.
He served as a minister in the court of Bindusara and is revered as
the mastermind behind Chandragupta’s ascent to power, leading to the
establishment of the Mauryan Empire.
Renowned for his seminal work, the Arthashastra is a comprehensive treatise on statecraft, economics, and military strategy.
The Arthashastra, which disappeared in the 12th century, was rediscovered by R. Shamasastry in 1905. It consists of 15 books and 180 chapters.
Its primary focus areas include governance structures, laws,
diplomacy, trade, espionage, ethical conduct, social welfare,
agriculture, mining, metallurgy, medicine, and forestry.
Often called the “Indian Machiavelli,” Chanakya’s teachings influence strategic thought and political theory.
Bindusara – Sеcond Rulеr of thе Mauryan Dynasty
Bindusara succeeded his father, Chandragupta Maurya, as the second king of the Maurya Dynasty (297 – 272 B.C.).
His reign focused on consolidating and expanding the Mauryan Empire across ancient India.
Bindusara maintained the administrative systems established by
Chanakya and continued the expansionist policies initiated by
Chandragupta.
He patronized Buddhism, following in his father’s footsteps, and his reign was characterized by stability.
Bindusara fostered friendly relations with Hellenistic kingdoms and sent emissaries to the Seleucid Empire.
His military campaigns extended Mauryan control, notably into the Deccan region of India.
Bindusara’s foreign policies significantly enhanced Mauryan influence beyond North India.
Ashoka The Great – Third Ruler of the Mauryan Dynasty
Ashoka, the son of Bindusara, ascended to the throne of the Mauryan Empire as its greatest ruler.
He pioneered the use of inscriptions to communicate messages directly to the people.
The Kalinga War, occurring after his accession, was his sole military conflict.
Moved by the devastation of the Kalinga War, he renounced the
pursuit of conquest through warfare and embraced conquest through
dhamma, thereby replacing Bherigosha with Dhammagosha.
Ashoka embraced Buddhism, convened the Third Buddhist Council, and
dispatched missionaries to regions including South India, Sri Lanka, and
Burma.
Ashoka, renowned for his missionary efforts, contributed to the
unity of the Mauryan Empire through promoting one dharma, one language,
and one script.
His policy of Dhamma encompassed a broad set of principles governing personal conduct and societal norms.
He appointed Dhamma Mahamattas to propagate his teachings among the populace.
Ashoka pursued a policy of religious tolerance, peace, non-aggression, and cultural diffusion.
Kalinga War
After ascending to the throne, Ashoka engaged in the Kalinga War, a
major conflict where 100,000 people perished and 150,000 were captured.
Witnessing the suffering inflicted by the war on Brahmana priests and Buddhist monks caused Ashoka profound grief and remorse.
Consequently, Ashoka abandoned the policy of physical conquest and
embraced cultural conquest, replacing Bherighosha with Dhammagosha as
outlined in the 13th Major Rock Edict.
Post-Kalinga war, Ashoka sought to expand his dominion ideologically rather than through military conquest.
Ashoka integrated Kalinga into his empire following its conquest,
opting for a policy to consolidate his realm rather than extreme
pacifism.
He promoted adherence to dharma among tribal communities,
threatening consequences for violations of social order and
righteousness (dharma).
Ashoka established Rajukas; officers empowered to administer justice within his empire.
Influenced by the Kalinga War, Ashoka converted to Buddhism and
became a monk. He initiated significant donations to Buddhists and
embarked on pilgrimages to Buddhist sites.
Under his patronage, a Buddhist council was convened under the
leadership of his brother, and missionaries were dispatched to spread
Buddhism in South India, Sri Lanka, Burma, and beyond.
Ashoka appointed Dharma Mahamatras to propagate dharma among all social classes, including women.
Maurya Dynasty Family Tree
Name
Relationship
Reign
Notable Achievements
Chandragupta Maurya
Founder
322 BCE – 298 BCE
Established the Maurya Dynasty, centralized administration
Bindusara
Son of Chandragupta
298 BCE – 272 BCE
Expanded the empire, maintained stability
Ashoka the Great
Son of Bindusara
268 BCE – 232 BCE
Promoted Buddhism, non-violence, built stupas and pillars
Dasaratha Maurya
Grandson of Ashoka
232 BCE – 224 BCE
Continued Buddhist policies, maintained infrastructure
Samprati
Successor of Dasaratha
224 BCE – 215 BCE
Propagated Jainism, religious tolerance
Shalishuka Maurya
Successor of Samprati
215 BCE – 202 BCE
Faced internal strife, decline of central power
Devavarman Maurya
Successor of Shalishuka
202 BCE – 195 BCE
Struggled with regional challenges, weakening authority
Shatadhanvan Maurya
Successor of Devavarman
195 BCE – 187 BCE
Period of decline, internal rebellions
Brihadratha Maurya
Last ruler
187 BCE – 180 BCE
Assassinated by his general, end of the Mauryan Dynasty
Mauryan Dynasty – Administration
During the Mauryan Dynasty era, notable administrative reforms were implemented, with the King
positioned as the central authority wielding extensive powers. Despite
this, Mauryan rulers, particularly Ashoka, were characterized by
paternalistic governance rather than asserting divine authority. The
Arthashastra introduces the concept of Saptanga Rajya, illustrating the
state’s structure as consisting of seven interconnected and
interdependent elements.
King (Svamin):
Mauryan kings, including Ashoka, governed with paternal authority
rather than claiming a divine mandate, distinguishing their rule as
practical governance over spiritual assertion. The concept of Saptanga
Rajya, articulated in the Arthashastra, defined their reign as
incorporating seven interconnected elements, ensuring comprehensive
control over state affairs.
The king’s role extended beyond ceremonial duties; he actively
promulgated social order through Rajasasanas (royal edicts) and upheld
ancient customs, demonstrating a blend of tradition and administrative
efficiency. His direct engagement in decision-making encompassed pivotal
aspects like law enforcement, revenue management, and military
strategy.
Amatya (Council of Ministers):
The Mantriparishad, a council of ministers appointed by the king,
played a crucial role in the Mauryan administration. It oversaw
day-to-day governance and policy formulation. The council wielded
significant influence in appointing key officials such as governors,
treasurers, and judges, ensuring a structured hierarchy within the
administrative framework.
Differentiated by rank and responsibilities, the Maha-Mantrins held
prominent roles within the council and received higher salaries than
their counterparts. This hierarchical structure facilitated efficient
decision-making and governance across the empire’s provinces and
districts.
Janapada (Territory and Population):
Under Ashoka’s reign, the Mauryan Empire expanded to encompass five
major provinces, each strategically governed from key centers like
Taxila in Uttarapatha and Tosali in Eastern India. This territorial
division facilitated effective administration and tax collection,
crucial for maintaining centralized control.
Provinces were subdivided into divisions and districts, each led by
appointed officials such as Pradeshikas and Rajukas, who oversaw local
governance and revenue collection. This hierarchical administrative
setup ensured the efficient management of diverse regions under Mauryan
rule.
Durga (Fortified Capital):
Pataliputra, the capital of the Mauryan Empire, boasted a
sophisticated municipal administration characterized by specialized
committees overseeing various aspects of urban life. These committees
regulated industry, foreign affairs, market trade, and public health,
showcasing a systematic approach to urban governance.
The city’s defenses were meticulously planned according to
Kautilya’s directives. They featured multiple concentric moats,
fortified walls, and secret exit routes, ensuring security and strategic
advantage during conflict or civil unrest.
Kosha (Treasury):
Mauryan economic policies relied heavily on efficient tax
collection, predominantly through land revenue, constituting a
significant portion of state income. The administration deployed
officials like Samahartas for assessment and Samadhatas for treasury
management, ensuring systematic revenue collection and storage.
Beyond land revenue, the empire regulated economic activities such
as trade, commerce, and crafts through a network of guilds (shrines) and
state-controlled workshops. This economic intervention aimed to bolster
state resources to sustain the empire’s expansive military and
administrative machinery.
Danda/Bala (Justice/Force):
The king’s judicial authority extended across civil and criminal
matters, with courts like Dharmasthiyas handling civil disputes and
Kantakasodhanas addressing criminal cases. The severity of punishments
varied based on the gravity of offenses and the societal status of the
accused, underscoring the hierarchical nature of Mauryan justice.
The empire maintained a disciplined standing army, centrally managed
through a structured military organization comprising boards overseeing
infantry, cavalry, war elephants, chariots, and naval forces (where
applicable). This military apparatus ensured defense readiness and
strategic deployment in both domestic policing and external conflicts.
Mitra (Ally):
Mauryan diplomacy was instrumental in fostering alliances and
strategic partnerships with neighboring states and Hellenistic kingdoms.
Diplomatic missions and specialized envoys (such as Nisriharthaduta and
Sasanharaduta) facilitated communication and negotiation, promoting
stability and mutual benefit across regional boundaries.
The Arthashastra prescribed nuanced diplomatic strategies
(Shad-gunya) tailored to various geopolitical scenarios, emphasizing
peace treaties (Sandhi), military alliances (Yana), and defensive
postures (Samshraya). This diplomatic acumen enabled the Mauryas to
navigate complex international relations while consolidating their
regional influence.
Key Aspects of the Mauryan Dynasty
1. Founding and Expansion
Chandragupta Maurya: The dynasty was founded by
Chandragupta Maurya, who, with the help of his mentor Chanakya (also
known as Kautilya), overthrew the Nanda Dynasty. He established the
Mauryan Empire around 322 BCE.
Territorial Expansion: Chandragupta expanded the
empire through military conquests and strategic alliances, eventually
controlling a large part of the Indian subcontinent, including
present-day India, Pakistan, and parts of Afghanistan.
2. Ashoka the Great
Reign: Ashoka, the grandson of Chandragupta, ruled
from 268 to 232 BCE and is often regarded as one of the greatest rulers
in Indian history.
Conversion to Buddhism: After witnessing the
devastation of the Kalinga War, Ashoka embraced Buddhism and adopted a
non-violence (ahimsa) and dharma (moral law) policy.
Edicts of Ashoka: He is known for his edicts, which
were inscribed on pillars and rocks throughout his empire and promoted
ethical governance, religious tolerance, and social welfare.
3. Administrative Structure
Bureaucracy: The Mauryan Empire had a
well-organized administrative system, with a hierarchy of officials
overseeing various regions, including provincial governors and local
administrators.
Taxation and Economy: The empire implemented a
structured taxation system that supported its vast military and
administrative needs. Trade flourished, with the Mauryan Empire engaging
in commerce with regions beyond India, including the Mediterranean.
4. Cultural Achievements
Art and Architecture: The Mauryan period is known
for its remarkable contributions to art and architecture, including the
construction of stupas (Buddhist monuments), such as the Sanchi Stupa,
and the famous Ashoka Pillars, which are adorned with intricate carvings
and inscriptions.
Literature and Philosophy: The period also saw the
development of literature and philosophical thought, with texts like the
Arthashastra by Chanakya, which discusses statecraft and economic
policy.
5. Decline of the Empire
Post-Ashoka Era: After Ashoka’s death, the empire faced succession disputes, internal strife, and external invasions.
Fall of the Mauryan Empire: The last Mauryan ruler,
Brihadratha, was assassinated by his general Pushyamitra Shunga around
185 BCE, leading to the establishment of the Shunga Dynasty and the end
of Mauryan rule.
Mauryan Dynasty – Military Administration
The military administration of the Mauryan Dynasty was a formidable force crucial for both expansion and defense.
This section delves into the composition and strategies of the
Mauryan army and its successful conquest campaigns, which bolstered its
dominance in ancient India.
The Mauryan army comprised diverse units: infantry, cavalry,
elephants, and chariots. The infantry, consisting mainly of foot
soldiers, formed the army’s core, while cavalry and war elephants
provided flexibility and strength.
The Mauryans employed advanced military tactics, including defensive
formations, flanking maneuvers, and the strategic use of war elephants,
to instill fear and confusion in their adversaries.
The Mauryans implemented defensive measures and expansionist
strategies concurrently. They maintained fortified cities and defensive
outposts while launching successful campaigns that expanded their
territories across modern-day India, Pakistan, and Afghanistan.
The Mauryan military’s prowess was pivotal in establishing and
maintaining the empire’s territorial control and dominance throughout
the Indian subcontinent.
Mauryan Dynasty – Economy
The economy of the Mauryan Dynasty flourished due to a blend of robust agrarian practices and extensive trade networks.
This section explores the agrarian foundations and trade dynamics
that drove economic prosperity and urbanization in the Mauryan Dynasty
era.
Agriculture was pivotal to the Mauryan economy. It focused on the
fertile Gangetic plains, where crops like rice and wheat were grown.
The Mauryans established trade connections with regions such as
Central Asia and the Mediterranean, facilitating the exchange of goods
and knowledge.
The thriving economy of the Mauryan Dynasty spurred significant urbanization.
Major cities such as Pataliputra emerged as trade, culture, and administration hubs.
This economic prosperity enabled the dynasty to undertake ambitious
projects, maintain a vast bureaucracy, and support a formidable
military.
These factors collectively contributed to the grandeur and influence of the Mauryan Dynasty.
Mauryan Dynasty – Architеcturе
Court Art and Popular Art
Court Art: Includes pillars, stupas, and palaces commissioned by Mauryan rulers for political and religious purposes.
Popular Art: Initiated by commoners, encompassing sculpture, cave arts, pottery, etc.
Ashokan Pillars
Made of Chunar sandstone, Ashokan pillars were instrumental in
propagating Buddhist ideology and royal edicts throughout the empire.
The national emblem is derived from the four-lion capital of the Sarnath pillar.
Influenced by Persian (Achaemenian) pillar inscriptions in form and style.
Similarities with Persian Pillars
Both used polished stones and featured similar sculpture motifs like lotuses.
The origin of inscribing proclamations on pillars traces to Persian pillars.
Inscriptions in both empires start in the third person and shift to the first person.
Differences between Mauryan and Persian Pillars
The shape of the Mauryan lotus differs from that of a bulge; the Persian lotus lacks this feature.
Persian pillars are fluted; Mauryan pillars have smooth surfaces.
Mauryan shafts are monolithic; Persian shafts are built of stacked stone segments.
Persian pillars stand on bases; Mauryan pillars lack bases.
Stupas
Reached zenith during the Ashokan period and served as burial mounds for relics and ashes.
Constructed with unburnt brick cores, outer surfaces are layered with burnt bricks and plaster.
Notable examples include Sanchi Stupa and Piprahwa Stupa.
Cave Architecture
Used as viharas (monastic living quarters) by Jain and Buddhist monks.
Marked by polished interior walls and decorative gateways.
Examples include Satgharwa caves and Nagarjunakonda caves.
Sculptures
Highlighted by polished stone and terracotta artworks.
Famous sculptures include Didarganj Yakshini and Ashoka’s stone portrait.
Pottery
Known as Northern Black Polished Ware (NBPW), characterized by black paint and a lustrous finish.
The centers of production were Kosambi and Pataliputra.
Material Culture in the Gangetic Plains
Rapid development fueled by iron technology, writing, punch-marked
coins, NBPW pottery, burnt bricks, timber construction, and ring wells.
It spread to peripheral regions, as evidenced by artifacts in Bangladesh, Odisha, Andhra, and Karnataka.
Mauryan Sources: Unlocking the Legacy of the Mauryan Dynasty
The history of the Mauryan Empire is enriched by various literary and
archaeological sources that offer a vivid glimpse into this ancient
dynasty.
Literary Sources:
The Arthashastra by Kautilya: Written by Chanakya
(or Kautilya), Chandragupta’s brilliant advisor, this ancient treatise
provides an in-depth look at the administrative policies and statecraft
of the Mauryan Dynasty, detailing the empire’s inner workings during
Chandragupta’s rule.
Indica by Megasthenes: The Greek ambassador
Megasthenes was a close ally of Chandragupta, and his writings offer a
fascinating account of the Mauryan Empire’s administration. His
impressions reveal how the Mauryan system fascinated foreign diplomats.
The Puranas: Ancient texts like the Vishnu Purana
mention the fall of the Nanda Dynasty at the hands of Chandragupta,
marking the dawn of the Mauryan Dynasty.
Buddhist Literature: Buddhist texts such as the
Jatakas, Dighanikaya, and Sumangalavilasini provide valuable insights
into the Mauryan period, shedding light on the political and cultural
landscape of the time.
Jain Literature: Works like Hemchandra’s Jaina Parishishta Parvan and Acharya Bhadrabahu’s JainaKalpasutra offer vivid accounts of Chandragupta’s life, including his eventual embrace of Jainism.
Archaeological Sources:
Mauryan Palace Remains: In Patliputra (modern-day
Patna), the remnants of the grand Mauryan palace were uncovered in
Kumrahar. These findings reveal the empire’s impressive architectural
and administrative capabilities.
Fortifications in Kaushambi: Excavations at
Kaushambi have unveiled the robust defense system that protected the
empire, demonstrating the military might of the Mauryas.
Key Archaeological Sites: Other significant sites,
such as Taxila, Mathura, and Bhita, have yielded valuable artifacts,
contributing to our understanding of Mauryan culture and influence.
Ashoka’s Stupas: The stupas built by Ashoka, such
as those in Sanchi, Amaravati, Dhauli, and Bodhgaya, continue to stand
as monumental testaments to the emperor’s legacy and his promotion of
Buddhism.
Ashoka’s Inscriptions: Ashoka’s famous edicts,
inscribed on rocks, pillars, and stone slabs, provide direct insights
into his rule and philosophies. Notable among them are the Fourteen Major Rock Edicts, Six Pillar Edicts, and Two Minor Rock Edicts, which can still be seen across India today.
These literary and archaeological sources paint a rich and detailed
picture of the Mauryan Empire’s splendor, governance, and lasting
influence.
Mauryan Dynasty – Dеclinе
Ashoka was deeply affected by the immense
loss of life during the Kalinga War and subsequently chose to halt all
further expansion campaigns. He later converted to Buddhism and began
promoting messages of peace and non-violence.
Following Ashoka’s death, the Mauryan Empire entered a decline
characterized by internal conflicts over succession. Additionally,
specific policies implemented by Ashoka weakened the empire and hastened
its downfall. These policies included:
Highly centralized administration.
A complete disinterest in warfare and violence.
Neglect of the North-Western frontier, which invited external invasions.
Oppressive measures imposed on provinces.
Dissatisfaction among local leaders who were denied adequate autonomy.
Subsequent revolts when central authority faltered.
The final ruler of the Mauryan dynasty, Brihadratha, met an
unfortunate end when his commander-in-chief, Pushyamitra, assassinated
him in 185 B.C. This event marked the end of the Mauryan Dynasty, after
which Pushyamitra established the Shunga dynasty, primarily governing
central India.
Conclusion
The Mauryan Dynasty was an essential period in ancient Indian history
that had a lasting impact on governance, administration, architecture,
and Buddhism. Their centralized rule, infrastructure development, and
cultural contributions played a significant role in shaping the
subcontinent. We can draw inspiration and caution from their rise and
eventual decline, demonstrating power and governance dynamics.
Therefore, the Mauryan Dynasty is a pivotal historical milestone in
India’s heritage.
Chandragupta Maurya - The Empire builder & Protector of Bharat | An Introduction
17–22 minutes
" Since the days of Cyrus[1a]
(558 - 530 B.C.) parts of India to the west of the Sindhu (modern day
river Indus) and some parts of the Punjab off and on formed part of the
Achaemenian[1b] empire. During Mahapadma's[1c]
time in 326 B. C. Alexander, the Macedonian, with his thundering
legions, entered North-West India, the erstwhile satrapy of the Iranian
empire[1d].
In a few months, however, he retreated from India. He could
neither face the Nanda empire nor leave any impression on the people.
The natives fought him heroically; yielded for the time being only to
the superior military organization of the Macedonians; and soon after
under Chandragupta drove out[2] the Greeks from the Punjab in a brilliant war of liberation.
The successful war against the Greeks awoke Chandragupta (c.
324-300 B.C.>) to a consciousness of his strength. To Chandragupta
and to his master - Chanakya, we owe a gorgeous phenomenon :
- a swift war of liberation;
- a vast empire;
- India politically and administratively unified;
- the re-establishment of Dharma as the supreme law; and
- the organization of life on which was founded the invulnerable culture-consciousness of Indians in succeeding ages.
Consolidating his position in the Punjab, and inspired by his teacher Chanakya, Chandragupta :
- marched on Pataliputra;
- removed Dhana Nanda, assumed the sovereignty of Magadha;
- vanquished Seleucus, the Greek, who was moving towards India to recapture Alexander's lost possessions; and
- started on a career of becoming the architect of an all-India empire.
For the first time the writ of one emperor ran in the
country through a hierarchy of centrally appointed officers. This is how
we define the aura around one of the most formidable personalities to
have graced this land - Chandragupta Maurya."
THE MAURYAN empire was the first and one of the greatest empires
that were established on Indian soil. The vast Mauryan empire stretching
from the valley of the Oxus[3a] to the delta of Kaveri[3b] was given a well-knit, common administration.About
Mauryan rulers we have epigraphical sources, literary sources, foreign
accounts and materials obtained from archaeological excavations. The Arthashastra
gives us detailed information about the administrative system of the
Mauryan empire. The work was written by Kautilya who is also known as Chanakya. Some scholars opine that Kautilya was the real architect of the Mauryan empire. He was also the Prime Minister of Chandragupta Maurya. Megasthenese, the Greek ambassador from the court of Seleucus to that of Chandragupta Maurya, wrote accounts of India and Indian people. His book Indica
is lost but some fragments of it are known to us in the form of
quotations in the works of the later Greek writers. Despite some
discrepancies and inaccuracies in the information provided by
Megasthenese it is, nevertheless, an useful source. However, the most
important and authentic source for the history of Mauryan period is
provided by the inscriptions of Ashoka.
In the courtyard opposite Gate No. 5 of the
Indian Parliament House, on a red sandstone pedestal, is installed a
symbolic bronze statue of Chandragupta Maurya, one of the greatest
figures in Indian history and founder of the Mauryan dynasty, who
reigned from 324/321 B.C. to 300/298 B.C.
The 0.74 metre high bust bears at its base the inscription: "Shepherd boy - Chandragupta Maurya dreaming of India he was to create".
This bust was made by Hilda Selegman who donated it for installation in Parliament Complex.
Origins & Early Life of Chandragupta Maurya (324/21 - 300/298 B.C.)
The Buddhist sources like Mahavamsa[4a] and Dipavamsa[4b] describe Chandragupta Maurya as a scion of the Kshatriya clan of the Moriyas[4c] branch of Sakyas who lived in kingdom of Piphalivan[4d], in eastern Uttar Pradesh.
The Mudrarakshasa, a play written by Vishakha Datta, uses the terms like Chandrashri[5a] , Vrishala[5b]and Kulahina[5c], for Chandragupta which mean a person of humble origin.
According to Buddhistsources Chandragupta's father was killed in a battle/ambush and he was brought up by his maternal uncle. Justin, a Greek writer, says that Chandragupta was "born in humble life". Chanakya, finding the signs of royalty in the child Chandragupta, took him as his pupil, and educated him at Taxila[6] which was then a great centre of learning.
Chandragupta's early life and education at Taxila is indirectly
proved by the fact that the Greek sources tell us that he had seen
Alexander in course of the latter's campaign of Punjab.
I wish to do a detailed analysis about his early life and origins from the Greek, Roman, Buddhist, Sanskrit and Jain sources, in a separate blog post.
Beginning of Conquests :
The minute details of Chandragupta's conquests and empire building
process are not available to us. From the Greek and Jain sources it
seems that Chandragupta took advantage of the disturbances caused by the
invasion of Alexander and his sudden death in 323 B.C. in Babylon. He,
with the help of Chanakya raised a large army and launched campaigns. He first overthrew the Greek kshatrapas[7] ruling in the region of north-western India.
Justin writes, "India after the death of Alexander,
had shaken, as it were, the yoke of servitude from its neck and put his
Governors to death. The architect of this liberation was Sandrocottas".
Sandrocottas of the Greek writer Justin has been identified with Chandragupta Maurya. Another Greek writer Plutarch called him Androcottus. In the Shahnama written by Firdausi, he is called Kandra. Manuscripts of Shahnama were commissioned by Mughal EmperorAkbar and he was very fond of this text.
Overthrow of Nandas :
After liberating north-western India from the Greek rule,
Chandragupta turned his attention to the conquest of Magadha from the
Nandas. The fine details of this conquest is not known to us. The Jain text, Parisistha Parvam, describes that with the help of Chanakya, Chandragupta defeated the Nanda king and captured him. After defeating Nanda, Chandragupta became the ruler of Magadha empire.
Mauryan seal. 3rd century BCE. Mauryan Empire
A chakra / wheel can be seen - damaged and cracked. Preserved in the National Museum, Delhi
Inscriptions about Chandragupta Maurya :
Chandragupta's western and southern Indian conquests are known to us through indirect evidences. The Junagarh rock inscription of Rudradaman[8a]
says that a dam on the Sudarshana lake for irrigation was constructed
by Pushyagupta, a provincial governor of Chandragupta Maurya. Later,
Yavanaraja Tushapha[8b] excavated canals for irrigation during Asoka's reign.
Similarly, the discovery of Asokan inscriptions at Girnar hills in Junagarh district (in Gujarat) and at Sopara (Thane district, Maharashtra) shows that these areas formed part of Mauryan empire.
Asoka's inscriptions have been found at Maski, Yerragudi and Chitaldurga in Karnataka. Rock Edict II and XIII of Asoka mentions that his immediate neighbouring states were those of Cholas, Pandyas, Satyaputras and Keralaputras. Since Asoka and his father Bindusara are not known to have made conquest in south India, it is believed that it was conquered by Chandragupta.
This conclusion is further strengthened by the Jain tradition which says that in his old age Chandragupta abdicated the throne and retired to Sravanbelgola in Karnataka with his teacher, the Jain ascetic Bhadrabahu. Local inscriptions of later period refer to his giving up life as a devout Jaina by fast unto death at that place. There is a hill nearby called Chandragiri, which seems to be named after him.
Battle with the Greek general Seleucus Nikator :
Chandragupta defeated the invading army of the Greek kshatrapa Seleucus
who had succeeded Alexander in the eastern part of his empire. This
victory was achieved in about 305 B.C. The Greek writers do not give
details of the war but state that a treaty was concluded in which
Seleucus conceded the territories of Kandahar, Kabul, Herat and Baluchistan and Chandragupta presented him 500 elephants.
It is also stated that this led to the matrimonial alliance between the two - it is believed that Seleucus married his daughter in the Mauryan house. Seleucus sent Megasthenese as his ambassador to the court of Chandragupta.
Bust of Plutarch. Museum of Delphi (Greece). Photo Jona Lendering.
Plutarch writes, "Sandrocottas who had by that time mounted the throne overran and subdued the whole[9] of India with an army of 6,00,000". Thus, it can be safely assumed that Chandragupta established a vast empire which with the exception of Kalinga, extended from Afghanistan in the west to Assam in the east and from Kashmir in north to Karnataka in south. This is indirectly proved by the find spots of the edicts of his grandson, Asoka.
Asoka is said to have added only Kalinga to the Mauryan empire, and there is no definite evidence that his father Bindusara made any conquests at all. Chandragupta Maurya is said to have ruled for approx. 24 years i.e. from 324 B.C. to 300 B.C.
1. The approximate extent of the Magadha Empire in the 5th century BCE.
2. Nanda Dynasty
3.
The Mauryan Empire when it was first founded by Chandragupta Maurya,
after conquering the Nanda Empire when he was only about 22-24 years
old. It includes the area in North West which was obtained after
defeating the Greeks.
4. Chandragupta extended the borders of the Maurya Empire towards Seleucid Persia after defeating Seleucus c. 305 BCE.
5. Chandragupta Maurya later extended the borders of the empire southward into the Deccan Plateau c. 300 BCE.
6. Bindusara is not known to have made any conquest. He maintained the empire of Chandragupta. Asoka extended into Kalinga during the Kalinga War c. 265 BCE, and established superiority over that kingdom.
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Notes:
1a. Cyrus II of Persia commonly known as Cyrus the
Great, was the founder of the Achaemenid Empire. From the Mediterranean
Sea and Hellespont in the west to the Indus River in the east, Cyrus the
Great created the largest empire the world had yet seen. His
regal titles in full were The Great King, King of Persia, King of
Anshan, King of Media, King of Babylon, King of Sumer and Akkad, and
King of the Four Corners of the World.
1b.The Achaemenid Empire, also called the
First Persian Empire, was an empire based in Western Asia, founded by
Cyrus the Great, notable for including various civilizations and
becoming the largest empire of ancient history, spanning at its maximum
extent from the Balkans and Eastern Europe proper in the west, to the
Indus Valley in the east. It is equally notable for its successful model
of a centralised, bureaucratic administration (through satraps under
the King of Kings), for building infrastructure such as a postal system
and road systems and the use of an official language across its
territories and a large professional army and civil services.
1c. He was the then ruler of the Nanda dynasty.
1d. The Iranian / Persian Empire is a series of
imperial dynasties centered in Persia (modern–day Iran). The first of
these was established by Cyrus the Great in 550 BC with the conquest of
Media, Lydia and Babylonia. Several later dynasties "claimed to be heirs
of the Achaemenids". These are as follows :
Achaemenid Empire (550–330 BC) Seleucid Empire (312–63 BC) Parthian Empire (247 BC–224 AD), also called the "Arsacid Empire" Sasanian Empire (224–651), also called the "Sassanid Empire" or the "Empire of Empires".
In the time of Chandragupta Maurya, it was the
Selucid branch of Iranian Empire which was in power. Persian dynastic
history was interrupted by the Muslim conquest of Persia in 651 AD and
later by the Mongol conquest of Khwarezmia. The main religion of ancient
Persia was Zoroastrianism, but after the seventh century, it was
replaced by Islam.
2. This happened in 317 BC.
3a.Oxus is a river, today called Amu Darya in
its western part and Wakhsh in its eastern parts, which flows for a
length of 2400 km across modern Tajikistan, Afghanistan, Turkmenistan
and Uzbekistan into Lake Aral. In Ancient times it crossed the regions
Fergana, Bactria, Oxeiana, Sogdiana and Khiva.
The
Oxus was the nucleus of the successive Bactrian civilizations and
kingdoms. The river was the borderline between the Persian satrapy of
Sogdiana northward and Bactria southward, whereas the western part
belongs to nomads. Several cities were founded here, mostly known under
their Greek names, like Alexandreia Oxeiana (actual Termez).
Alexander came across the river three times between 329 and 327 BC.
River Oxus
3b. The Kaveri (or Cauvery) is a large
Indian river. The origin of the river is at Talakaveri, Kodagu in
Karnataka, flows generally south and east through Karnataka and Tamil
Nadu and across the southern Deccan plateau through the southeastern
lowlands, emptying into the Bay of Bengal through two principal mouths
in Poompuhar, Tamilnadu.
In the 5th century B.C, the Moriyas were the ruling clan of
the republic of Pipphalivana. According to the Mahavamstika, Moriyas
were a branch of the Sakyas and were so called because, when
driven by the attack of the Kosalan* prince Virudhaka, they left their
original home and settled in a place which was abounded in mayura / mor or peacocks. Gautam Buddha also belonged to the Kshatriya clan of Sakyas.
* - Kosala is an ancient kingdom, which is said
to be the kingdom of Lord Rama, and was situated in the region
corresponding to present day Awadh in Uttar Pradesh state of India.
The Mahavamsa calls Chandragupta as a member of the Kshatriya clan of the Moriyas, who are represented in the Mahavamsatika as a Himalayan off-shoot of the Sakyas.
The
description of the Moriyas as a Kshatriya clan is also mentioned in the
Mahaparinibana Sutta, an old Pali text. It mentions the Moriyas as one
of the Kshatriya tribes who claimed a portion of the relics of Buddha
after the latter's death.
This tradition was also recorded in medieval inscriptions of Mysore and Coorg, which call the Maurya family as a branch of the solar race / Surya Putras and Chandragupta an abode of the usages of eminent Kshatriyas.
Till 728 AD, the rulers of Chittorgarh in Rajasthan, ruled under the name/clan of Moris. After that, Bappa Rawal established the Sisodia Rajput dynasty, who took the titles of Ranas. We are well aware of the Rajput clan of Moris, who consider themselves as the descendants of the Mauryas.
4d.Piplivana, Piphlivana / Piplikana / Piplikanan - is a site in present day Eastern Uttar Pradesh, 50 miles west of Kushinagara.
According to Mahaparinirvana Sutta, Gautam Buddha made his
journey to Kushinagar, died there. Modern scholarship, based on
archaeological evidence, confirms that the Buddha died in Kushinagar,
close to the modern Kasia (Uttar Pradesh).
Asoka
built a stupa and pilgrimage site to mark Buddha's parinirvana in
Kushinagara.The kings of Gupta dynasty period (4th to 7th century CE)
helped greatly enlarge the Nirvana stupa and Kushinagar site, building a
temple with reclining Buddha.This site was abandoned by Buddhist monks
around 1200 CE, who fleed to escape the invading army after defeat of
Prithviraj Chauhan, after which the site decayed over the Islamic rule
in India that followed.
The British archaeologist Alexander
Cunningham rediscovered Kushinagara in late 19th-century and his
colleague A. C. L. Carlleyle unearthed the 1500 year old Buddha
image.The site has since then become an important pilgrimage site for
Buddhists. Archaeological evidence from the 3rd century BCE suggests
that the Kushinagara site was an ancient pilgrimage site.
Excavated Ruins of Stupa in Kushinagar
5a. 5b. 5c. There are various views about this. Some scholars take the meaning of Vrshala and Kulahina to be a Shudra and an outcaste. However, the most accepted view is that Kulahina means one of lowly birth or humble origins, while the terms Vrishala is sometimes used in sense of a Vrisha or chief among kings.
Note how the meaning changes with respect to Vrshala and Vrishala.
6. Taxila University flourished between 600 BC and 500 AD, in the
kingdom of Gandhar, in ancient India, but now in Pakistan. 68 subjects
were taught including vedas, grammar, philosophy, astronomy, medicine,
surgery, politics, archery warfare, music, commerce etc. Minimum entry
age was 16. At the time, 10500 students studied there, including those
from China, Babylon, Syria and Greece.
Excavated Ruins of Taxila University
7. It originally referred to a provincial governor
in the ancient Persian Empire. Also, refers to a feudatory / vassal /
subordinate / local ruler.
8a. Rudradaman I (130–150 CE) was a Saka ruler from
the Western Kshatrapas dynasty. Rudradaman I was instrumental in the
decline of the Satavahana Empire.
The Sanskrit Junagadh inscription dated 150 CE credits
Rudradaman I with supporting the cultural arts and Sanskrit literature
and repairing the dam built by the Mauryans. He in fact repaired the
embankments of the lake Sudarshana, which was constructed by the Mauryas
for checking floods.
Silver coin of Rudradaman I
8b. Provincial governor or Emperor Asoka Maurya. He is believed to be a Persian.
9. Some modern scholars believe it to be an exaggeration of Plutarch. However, this is not an exaggeration as Chandragupta Maurya had won almost entire India which was known to the Greeks, till river Kaveri in Karnataka.
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Article Category : Mauryans
सकाळ वृत्तसेवा
5–6 minutes
लेखक : ॲड. सुशील अत्रे
महाभारतानंतरच्या
काळात भारतातील बहुधा सगळ्यात विशाल साम्राज्य हे मौर्य साम्राज्य होते.
पाश्चात्त्य इतिहासकारांच्या दृष्टीने तर तिथंपासूनच भारताचा इतिहास सुरू
होतो. त्याच्या आधीच्या काळाला ते ‘इतिहास’ मानायलाच तयार नाहीत. तो भाग
जाऊ द्या; पण प्राचीन भारतातील राजवंशांमधे मौर्य वंशाची गणना अग्रक्रमाने
होते, यात शंकाच नाही. इतर अनेक प्राचीन राजवंशांप्रमाणेच मौर्य
वंशाबद्दलही विद्वानांमधे एकमत नाही. त्यांचा काळ नक्की कोणता, यावर आजही
घनघोर वाद होत असतात. (saptarang latest article on Mauryan Dynasty news)
म्हैसूरच्या ग्रंथसंग्रहालयात असलेली कौटिल्याच्या अर्थशास्त्राची मूळ भूर्जप्रतesakal
प्रचलित
मान्यता अशी आहे, की इ. स. पूर्व ३२४ मध्ये चंद्रगुप्त मौर्य सम्राट बनला.
नंद वंशातील अखेरचा राजा धनानंद याचा, आर्य चाणक्याच्या मदतीने पराभव करून
चंद्रगुप्त मगधाच्या गादीवर बसला. त्याच्या वंशाला ‘मौर्य’ हे नाव कसे
मिळाले, यावरही विविध मते आहेत.
चंद्रगुप्त हा राजा धनानंदाचाच
दासीपुत्र होता, त्याच्या आईचे नाव ‘मुरा’ असल्याने त्याने आपला वंश आईच्या
नावे ‘मौर्य’ ठरवला, असे एक मत आहे. तो एका गुराख्याचा मुलगा होता आणि
त्याला चाणक्याने हेरले, असे एक मत आहे. तो ‘मयूर-पोषक’ समाजात जन्मला
म्हणून त्याला ‘मौर्य’ नाव मिळाले, असे जैन ग्रंथामध्ये म्हटले आहे.
यापैकी
कोणत्याच दाव्याला ठोस पुरावा नाही. त्या काळातले, आज उपलब्ध असलेले ग्रंथ
म्हणजे ‘कौटिलिय अर्थशास्त्र’ आणि ‘मुद्राराक्षस’ हे नाटक. यापैकी
अर्थशास्त्र हा एकूणच राजधर्म विशद करणारा ग्रंथ आहे. याचा कर्ता कौटिल्य
अथवा चाणक्य तथा विष्णुगुप्त हा आहे. या अद्वितीय ग्रंथाची भूर्जप्रत १९०४
मध्ये म्हैसूरच्या ग्रंथसंग्रहालयात सापडली.
मात्र या ग्रंथात
चंद्रगुप्तचा स्वतंत्र उल्लेख नाही. ‘मुद्राराक्षस’ हे नाटक लिहिणारा
विशाखादत्त तर खूपच नंतरच्या काळातील आहे. त्यामुळे चंद्रगुप्त मौर्य नक्की
कोण, हे गूढ आजही कायम आहे. ग्रीक सम्राट अलेक्झांडर इ. स. पूर्व ३२७
मध्ये भारतात आला होता. तो परत गेला (भारत जिंकून वगैरे अजिबात नव्हे.)
त्यानंतर चंद्रगुप्त सत्तेवर आला.
चंद्रगुप्तचा सामना ग्रीक राजा/
सेनानींपैकी सेल्युकस निकेटरशी झाला होता; ॲलेक्झांडरशी नव्हे.
चंद्रगुप्ताविषयी काहीही सांगायचे, तर चाणक्याला वगळून सांगताच येणार नाही.
नंद वंशाचा संपूर्ण उच्छेद करून नवख्या चंद्रगुप्तला गादीवर बसवणारा
चाणक्य होता. आजच्या भाषेत तो ‘किंगमेकर’ होता. काही काळ तो मौर्य
साम्राज्याचा अमात्यसुद्धा होता.
गंमत बघा, एवढे प्रचंड साम्राज्य
ज्यांनी उभे केले ते दोघेही चाणक्य आणि चंद्रगुप्त आयुष्याच्या उत्तरार्धात
संन्यस्त होते. चंद्रगुप्त राज्यत्याग करून दक्षिणेत श्रवणबेळगोळला गेला
आणि तिथे त्याने भद्रबाहू या जैन मुनींचे शिष्यत्व स्वीकारले. त्यानंतर
चाणक्याने काही काळ बिंदुसाराचा अमात्य म्हणून काम केले आणि नंतर वानप्रस्थ
स्वीकारले. (latest marathi news)
इ.
स. पूर्व ३२४ पासून मौर्य राजवंश सुरू झाला. एक मतप्रवाह असा, की या वंशात
एकूण नऊ राजे होऊन गेले. त्यांची नावे अशी अमित्रघात अथवा बिंदुसार,
सम्राट अशोक, दशरथ, संप्रति, शालिशुक, देववर्मन, शतधन्वा आणि बृहद्रथ.
यांची कारकीर्द इ. स. पूर्व १८४ पर्यंत होती.
त्या साली बृहद्रथाचा
सेनापती पुष्यमित्र शुंग याने बृहद्रथाचा वध केला आणि स्वत:चा राज्याभिषेक
केला. म्हणजे, सुमारे १४० वर्षे मौर्य वंशाची सत्ता होती. याविरुद्ध
‘कलियुगराज वृत्तांत’ या प्राचीन ग्रंथामध्ये आणि पुराणात नमूद
केल्याप्रमाणे मगध राजसिंहासनावर मौर्य वंशाचे एकूण १२ सम्राट होऊन गेले.
त्यांनी
एकूण ३१६ वर्षे राज्य केले आणि तो काळ इ. स. पूर्व १५३४ ते १२१८ असा होता.
हा मतप्रवाह ज्यांचा आहे, त्यांनीही शेकडो संदर्भ बघून, ग्रंथ वाचून मग
आपले मत दिले आहे. त्यामुळे या दोन्ही पक्षांपैकी कोणालाही थिल्लरपणे
‘मूर्ख’ म्हणण्याआधी आपला अभ्यास किती, हे बघणे आवश्यक आहे.
मौर्य
सम्राटांपैकी चंद्रगुप्त इतकाच; किंबहुना थोडा अधिकच प्रसिद्ध असलेला राजा
म्हणजे सम्राट अशोक! चंद्रगुप्तचा नातू इ. स. पूर्व २७३ ते इ. स. पूर्व २३६
अशी त्याची कारकीर्द मानली जाते. आयुष्याच्या पूर्वार्धात अत्यंत उग्र आणि
निर्मम असणारा आणि उत्तरार्धात बौद्ध धर्म स्वीकारून ज्याने हिंसेचा पूर्ण
त्याग केला, तो हा अशोक. (latest marathi news)
आज
भारताचे राजचिन्ह असलेला चार सिंहांकित ‘अशोक स्तंभ’ ही त्याचीच देणगी
आहे. सारनाथ या ठिकाणी उत्खननात सापडलेला हा मूळ स्तंभ आजमितीस सारनाथ
वस्तू संग्रहालयात ठेवलेला आहे. तो सुमारे सात फूट उंचीचा आहे. बौद्ध
धर्माचा प्रसार भारताबाहेर करण्यात मोठे योगदान अशोकाचे होते.
‘देवानाम्
प्रिय .. प्रियदर्शी’ अशी त्याची पदवी होती. अशोकाबाबतही काही इतिहास
अभ्यासकांचा दावा असा आहे, की प्राचीन भारतात मौर्यवंशीय अशोक आणि
गुप्तवंशीय अशोक असे दोघे वेगवेगळ्या कालखंडात होऊन गेले. ज्याचे अनेक
शिलालेख आपण बघतो, तो गुप्तवंशीय अशोक होता.
त्याने नंतर बौद्ध धर्म
स्वीकारला. दोन्ही मतप्रवाह आपापल्या दाव्यांना दुजोरा देणारे अनेक मुद्दे
मांडतात. या लेखापुरता मी अधिक प्रचलित असलेला मतप्रवाह गृहित धरून मौर्य
राजवंशाची माहिती दिली आहे. परंतु एखादी पर्यायी ‘थिअरी’ कोणी मांडली असेल,
तर ती न वाचताच बाजूला फेकणे मला योग्य वाटत नाही.
कारण मौर्य
वंशाबद्दल कोणताही वादातीत व स्पष्ट पुरावा आज तरी उपलब्ध नाही. तेव्हा,
वाचकांनी आपल्या परीने अधिक अभ्यास केला आणि आपले स्वत:चे मत बनवले, तर ती
अधिक आनंदाची गोष्ट आहे.
आमचे राज्य कल्याणकारी असो. आमचे साम्राज्य सर्व उपभोग्य
वस्तुंनी परिपूर्ण असो. येथे लोकराज्य असो. आमचे राज्य आसक्तिरहित, लोभरहित
असो. अशा परमश्रेष्ठ महाराज्यावर आमची अधिसत्ता असो. आमचे राज्य
क्षितिजाच्या सीमेपर्यंत सुरक्षित असो. समुद्रापर्यंत पसरलेल्या पृथ्वीवर
आमचे एकसंघ दीर्घायु राज्य असो. आमचे राज्य सृष्टीच्या अंतापर्यंत म्हणजे
परार्ध वर्ष पर्यंत सुरक्षित राहो.
मंत्रपुष्पांजली मधील या दोन श्लोकांवरून वैदिक समाजात
‘राज्य’ या संकल्पनेबद्दलची स्पष्टता दिसून येते. प्राचीन काळातील विविध
वाङ्मयात राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, साम्राज्य, एकराज्य, अशा विविध
राज्यप्रकारांचे उल्लेख मिळतात. वैदिक कालखंडात अशा विविध प्रकारची
राज्ये अस्तित्वात होती याचे हे प्रमाण आहे.
कालानुरूप या राज्यव्यवसस्थेमध्ये काही बदल होत गेले पण
भारतीय शासन व्यवस्था कायमच प्रजासत्ताक स्वरूपाची राहिली आहे. इ.स.पूर्व
६वे शतक हे इतिहासाच्या प्रवासातला मैलाचा दगड आहे. कारण याच कालखंडात
बौद्ध आणि जैन धर्मांचा उदय झाला आणि याच शतकाच्या सुरुवातीला उत्तर भारतात
लहान लहान राज्येही उदयास आली. पण ही राज्ये स्वतंत्र होती. या
राज्यांना कोणीही सार्वभौम राजा नव्हता. अशा राज्यांना गणराज्ये म्हणत. या
गणराज्यांमध्ये राजसत्ता एका व्यक्तीच्या हाती नसून गण किंवा अनेक
व्यक्तींच्या हाती असे. पण त्याचबरोबरीने राज्य किंवा सार्वभौम अधिकार
राजाच्या हातात असणारी जनपदेही होती.
जनपदे म्हणजे छोट्या आकाराची राज्ये तर महाजनपदे म्हणजे
राजाच्या अधिकाराखाली येणारा बराच मोठा प्रदेश. प्राचीन ग्रंथांमधून उल्लेख
असणारी महाजनपदे त्याकाळी खूप महत्वाची होती. कारण या महाजनपदांमध्ये
गणराज्य स्वरूपाची व्यवस्था होती.
इ.स.पूर्व ६व्या शतकात अशी लहान मोठी पुष्कळ राज्ये
गणराज्य किंवा प्रजासत्ताक पद्धतीने कारभार करत होती. या सर्व
महाजनपदांमध्ये मगध महाजनपद हे बलाढ्य राज्य होते. या राज्याचा संस्थापक
बिंबिसार राजा असला तरी हे राज्य वाढवण्याचे श्रेय नंद घराण्याकडे जाते.
हे साम्राज्य मोठे असले तरी त्याचा राजा धनानंद अतिशय जुलुमी आणि लोभी
होता. त्याने जनतेवर अनेक जाचक कर लादले होते. त्याच्या खजिन्यात चौदा कोटी
सुवर्णमुद्रा जमा होत्या असे उल्लेख मिळतात.
याच धनानंदाविरूद्ध प्रतिकार करून आर्य चाणक्या व
चंद्शीरगुप्त मौर्य यांनी महान मौर्य सम्राज्य निर्माण केले. नंद राजावर
विजय मिळवून चंद्रगुप्त मौर्य घराण्याचा पहिला राजा झाला. आता जवळपास सगळा
उत्तर भारत चंद्रगुप्त मौर्याच्या अधिपत्याखाली होता. चंद्रगुप्त हा अतिशय
कुशल शासक होता. त्याच्या कारकिर्दीत मौर्य साम्राज्य भरभराटीला आले.
चंद्रगुप्तानंतर त्याचा मुलगा बिंदुसार हा राजा झाला.
त्यानेही हे राज्य कुशलतेने सांभाळले. बिन्दुसारानंतर अशोकाने मौर्य
साम्राज्याचा अफाट विस्तार केला. अशोकाने अनेक युद्धांत दिग्विजय प्राप्त
केले आणि विजिगिषु सम्राट बनला. सम्राट अशोकाच्या काळात मौर्य साम्राज्य
अफगाणिस्तानापासून ओरिसापर्यंत आणि दक्षिणेस कृष्ण तुंगभद्रा नद्यांपर्यंत
पसरले होते.
चंद्रगुप्त मौर्याच्या काळात आर्य चाणक्याने जी शासनव्यवस्था आरंभली होती ती अशोकाने समर्थपणे पुढे नेली.
प्राचीन भारतीय इतिहासातील सर्वात शक्तिशाली आणि लोककल्याणकारी राजा
म्हणून सम्राट अशोकाच्या एकूणच कार्यपद्धतीवरुन दिसून येते. बरोबर एक
महिन्याच्या अंतरावर या महान चक्रवर्ती सम्राटाचा जन्मदिवस आहे. त्याच्या
अलौकिक कार्याला ही लेखमाला पुरेशी ठरणार नाही. या महान सम्राटाचा जन्मदिवस
ज्या पद्धतीने साजरा केला गेला पाहिजे त्यापध्दतीने साजरा केला जात नाही.
त्यामुळेच त्याच्या कार्यावर म्हणावा तसा प्रकाश पडत नाही. आज प्रत्येक
भारतीयाने आपापल्या घरांमध्ये या महान राजाची जयंती मोठ्या थाटामाटात साजरी
करुन कृतज्ञता व्यक्त केली पाहिजे. सम्राट अशोकाने कोरलेले ऐतिहासिक
शिलालेख, शिलाखंड, राजाज्ञा यासारखे किंवा दुसरे अनेक ऐतिहासिक पुरावे
उपलब्ध असताना सुध्दा इतिहास तज्ञ या सम्राटाला एकप्रकारे अडगळीत टाकण्याचा
प्रयत्न करत आहेत किंवा पूर्वग्रहदूषित दृष्टिकोन समोर ठेवून त्या महान
सम्राटाचा इतिहास समोर घेऊन येत नाहीत ही मोठी शोकांतिका म्हणावी लागेल.
अशोकाने भारतीय प्राचीन इतिहासाला सर्वात महत्वाचा वारसा दिला तो म्हणजे
साम्राज्यात सर्वत्र कोरलेले शिलालेख. या शिलालेखांमधून आपले विचार प्रकट
केलेले आहेत. काळाच्या ओघात बरेचसे शिलालेख नष्ट झालेले आहेत. अजूनही
उत्खननात बरेचसे पुरावे उघडकीस येऊ शकतील परंतु त्यासाठी इच्छाशक्ती
दाखवावी लागेल.
चक्रवर्ती सम्राट अशोक यांचा जन्म इ. स. पूर्व ३०४ तेव्हाच पाटलीपुत्र
(बिहार) हे या सम्राटाचे जन्माचे ठिकाण. चंद्रगुप्त मौर्य यांनी पाया
घातलेल्या मौर्य साम्राज्याचा दुसरा मौर्य सम्राट बिंदुसार याचा अशोक हा
मुलगा. अशोकावदान, दिव्यावदान आणि वंसथ्थपकासिनी या ग्रंथांमधून अशोकाच्या
आईसंबधी खात्रीलायक माहिती देणारे पुरावे दिलेले आहेत. त्यापैकी पहिल्या
ग्रंथात अशोकाची आई सुभ्रदांगी असे संबोधले आहे. चंपा येथील ब्राम्हणाची
मुलगी असा तीचा उल्लेख आहे. राजवाड्यातील कारस्थानामुळे तीला राजापासून दूर
रहावे लागले परंतु ती शेवटी राजाकडे जाऊ शकली पुढे तिला मुलगा झाला
त्यावेळी ‘मी दुःखमुक्त म्हणजे अशोक आहे ‘ असे ती स्वतःबद्दल उद्देशून
म्हणाली. सम्राट अशोकाच संपूर्ण आयुष्य हे अनेक अख्यायिकांनी भरलेले आहे.
त्यामुळे त्या अख्यायिकांवरती किंवा कथांवरती जास्त भर न देता साम्राज्यात
त्यांनी निर्माण केलेल्या लोककल्याणकारी उपाययोजना, एक राजा ते देवानाम
प्रियदर्शी चक्रवर्ती सम्राट हा अलौकिक प्रवास सर्वांसमोर येण गरजेचे आहे.
प्रा. रोमिला थापर म्हणतात भारतीय इतिहासातील ख्रिस्तपूर्व पाच शतकांमध्ये
झालेल्या घडामोडी यांच्या उलटसुलट प्रवाहामधून ज्या विशेष कतृत्ववान
व्यक्ती उदयाला आल्या त्यांच्यामध्ये सम्राट अशोकाची गणना होते. कलिंग
युद्धामध्ये झालेल्या संहारामुळे व त्यातून झालेल्या आपल्या विजयामुळे
दारूण दुःखाची झालेली निर्मिती पाहून त्या विजयाविषयी खंत व्यक्त करणारा
विजेता, एक संत, साधू आणि सम्राट यांचा संगम, राजकीय विचारवंत, मानवी
जीवनाविषयी क्वचितच आढळणारा समंजसपणा दाखवणारा राजा अशा अनेक रुपांमध्ये तो
अनेकांना दिसतो.
तरूण अशोकाने आपल्या गुणांनी आपल्या पित्यावर सम्राट बिंदुसारवर छाप
पाडली. त्यामुळे या तरूण राजपुत्राची उज्जयनीच्या राज्यपाल पदासारख्या
महत्वाच्या पदांवर नेमणूक केली. त्यानंतर काही खास हेतूने त्याला
तक्षशिलेला पाठवले होते व तेथील कामगिरी व्यवस्थितरित्या पार पाडली.
उच्चपदावरील अधिकार्यांच्या जुलमी कारभाराला कंटाळून बिंदुसार राजाच्या
कारकिर्दीत तक्षशिलेला एक बंड पुकारले होते. अशोकाला त्याच्या पित्याने ते
बंड शांत करण्यासाठी तक्षशिलेला पाठवले अशोकाने प्रजेचा संताप वाढू न देता
ते बंड यशस्वीपणे शांत केले. अशोकासारख्या गुण आणि अभिरुची असणार्या तरूण
राजपुत्राला तक्षशिला हे एक आकर्षक शहर वाटत होते. संरक्षणाच्या दृष्टीने
महत्त्वाचे आणि राजकीय राजधानीचे शहर एवढेच या शहराचे महत्त्व नव्हते तर
राजमार्गावरील शहर, बहुरंगी संस्कृती असलेले व्यापारी केंद्र आणि महत्वाचं
म्हणजे विद्येच्या अनेक मोठ्या केंद्रांपैकी एक.
काही ग्रंथांमधून असे सांगितले आहे की, बिंदुसारला विविध राण्यांपासून
झालेल्या नव्यान्नव मुलांना अशोकाने ठार केले. परंतु ही माहिती काल्पनिक
असल्याने मानण्याजोगी नाही. बिंदुसारच्या मृत्युच्या वेळी सिंहासनावर
अधिराज्य गाजवण्यासाठी संघर्ष झाला. मोठा मुलगा सुसीमचा राज्याभिषेक करावा
असा बिंदुसारचा प्रयत्न होता परंतु तक्षशिलेला झालेला उठाव मोडून
काढण्यासाठी सुसीमला आलेले अपयश पुढे तक्षशिलेला अशोकाने केलेली यशस्वी
मोहीम यामुळे बिंदुसारचा मुख्यमंत्री राधागुप्त याचा अशोकाला पाठिंबा होता
त्यामुळेच अशोकाला स्वतःच्या राज्याभिषेकाला विरोध करणाऱ्या भावांना बाजूला
सारून राज्यकारभार करणे भाग पडले होते. आपले स्थान पक्के झाले अशी खात्री
झाल्यानंतर इ. स. पुर्व २६९ अशोकाने आपला अधिकृत राज्याभिषेक केला.
सम्राट अशोक हा आधुनिक काळातील मॅनेजमेंट मधील मॅनेजमेंट चा निर्माता
आहे असे म्हटले तर वावगे ठरू नये प्रथम मॅनेजमेंट म्हणजे काय हे पाहणे
आवश्यक आहे तर आधुनिक काळात त्याची व्याख्या आहे लोकां कडून काम करवून
घेण्याची कला म्हणजे मॅनेजमेंट होय management is art of getting things
done through people . आता याला कला का म्हटले आहे तर जन्मताच कोणाला काही
येत नसते त्याला ते अवगत करावी लागते अशोकाचा व्यवस्थापन जगतातले काम आजवर
कधी जगापुढे आले नाही ते आले असते तर अशोक आज मॅनेजमेंट जगतातील एक उत्तुंग
व्यक्तिमत्व असा सम्राट ठरला असता पण त्याला तसे कोणी प्रेझेंट करण्याचा
प्रयत्न केला नाही आता याला कला का म्हणतात ते पाहू या त्याची कारणे
असतात एक यात नावीन्य असावे लागते ते व्यवस्थापनात केले जाते म्हणजे नवनवीन
युक्त्या नवे प्रश्न सोडवण्यासाठी वापरले नवीन संकटे असतात ते
सोडवण्यासाठी नवा मार्ग शोधला जातो एकदंरीत नवनव्या गोष्टींचे निर्माण
करावे लागते त्यात एक नाविन्यता असेल तरच ते यशस्वी होते आता व्यवस्थापनात
कॉपी करण्यास जागा नसतो कारण सतत बदलत असणारी परिस्थिती तसे बदल करण्यास
प्रवृत्त करते त्यामुळे एखादा व्यक्ती जशीच्या तशी कृती करू शकत नाही आणि
तशीच परिस्थिती असताना तसाच निर्णय घेऊ शकत नाही त्यात बदल करू शकतो म्हणजे
काय यात बुद्धिमत्ता महत्वाची असते अशोकाने तक्षशीलेचे शमवलेले बंड असेल
किंवा अशोकाने आपल्या साम्राज्यात विविध लोकांनी केलेलं बंड असतील किंवा
धम्म प्रसारासाठी वापरलेली यंत्रणा आहे जे सारे त्याचंच एक भाग आहे पण हा
लोकांसमोर कधी आला नाही दुसरी गोष्ट व्यक्तिगत दृष्टिकोन हि महत्वाचा
भाग आहे प्रत्येक माणसाची काम करण्याची पद्धत वेगळी असते एकी व्यक्ती करतोय
तशीच दुसऱ्याची कृती असू शकत नाही कारण दुसऱ्याच्या पद्धतीचा वापर आपणास
तंतोतंत करता येत नाही तेव्हा कधी हि स्वतःची कृती महत्वाची असते तिसरी
गोष्ट असते मन आणि मेंदू दोन्हीचा उपयोग करणे म्हंजे काय हे दोन्ही घटक
एकाच वेळी कामामध्ये युझ करणे आता आता व्यवस्थापक होण्यासाठी नुसते कौशल्य व
ज्ञान असून फायदा नाही तर त्याच्याकडे शिस्त समर्पण बांधिलकी हे गुण असावे
लागतात सम्राट अशोकाने अनेक संकटाना झेलत एवढे मोठे साम्राज्य उभारले
आहे ते बिना मॅनेजमेंट चे शक्य होईल का कोणत्या हि राजाला ते शक्य नाही
व्यवस्थापन हा महत्वाचा भाग असतो अशोकाने आपल्या आयुष्यात एक एक माणसे
जोडली आहेत लोकांमध्ये प्रिय राजा म्हणून त्याची ओळख आहे सामाजिक बांधिलकी
जपण्यामध्ये सम्राट अशोक सर्वात यशस्वी सम्राट झालेला आहे अशोकाची शिस्त हि
आजच्याघडीला महत्वाची आहे आजवर कोणी यावर लक्ष दिलेले नाही सम्राट अशोकाने
सैन्याला शिस्त घालून दिली च पण सोबत त्याने आपल्या जनतेला हि शिस्त घालून
दिलेली आहे अशोकाच्या काळात अन्याय अत्याचार च्या घटना लांबची गोष्ट आहे
या तीन तत्वांचा जिथे योग्य मेल असतो तिथे च कल्याणकारी राज्य निर्माण होते
सम्राट अशोकाची कारकीर्द किती वर्षाची आहे सम्राट अशोक इसवी सन
पूर्व २६९ ला सत्तेवर बसला व इसवी सॅन पूर्व २३२ मध्ये त्याचे निधन झाले
आहे ३७ वर्षाचा कालावधी मध्ये अशोकाने निर्माण केलेलं साम्राज्य ते हि
एकछत्री साम्राज्य जगात एकछत्री साम्राज्य असावे असे लोकांना अशोकाचे
साम्राज्य पाहूनच पुढे लोकांनी पावले उचलली आहेत यालाच व्यवस्थापक यांचे यश
आहे जेव्हा मन आणि मेंदू एकत्र काम करतात तेव्हाच काम बिनचूक होते चौथी
गोष्ट आहे निकालावर आधारित म्हणजे काम रिझल्ट ओरियंटेड असावे लागते कोणते
हि काम करताना कामाचा रिझल्ट लागणे गरजेचे असते नुसते आम्ही हे केले ते
केले सांगून होत नाही तर त्याचा रिझल्ट लागणे आवश्यक आहे सम्राट अशोकाने
धम्म विजय करून जगाला ते दाखवून दिले आहे कि कामाचा रिझल्ट कसा असायला
पाहिजे ते शिवाय त्याचे साम्राज्य हेच त्याच्या कामाचा सर्वात मोठा रिझल्ट
आहे शिवाय त्याने केलेलं प्रत्येक काम हे हे रिझल्ट ओरियंटेड आहे त्याने जे
जे मनात आणले ते ते त्याने पूर्ण केले सम्राट अशोकाने आपल्या राज्याचे
विस्तार करतेवेळी साम्राज्यवादी भूमिका ठेवून ते केले असे म्हणता येत नाही
लोकांनी चुकीचा अशोक मांडला आहे अशोकाला साम्राज्य विस्ताराची भूक नसून
सामान्य लोकांच्या भल्याची भूक होती आणि त्यातून अशोकाचे व्यवसाय
व्यवस्थापन पुढे येते आधुनिक काळातील भले भले मॅनेजमेंट मध्ये पारंगत असणाऱ्या लोकांना जे जमले नाही ते अशोकाने दोन हजार वर्षांपूर्वी यशस्वी करून दाखवले अशोकाच्या
सैन्यामध्ये शिस्तप्रिय काम असायची प्रत्येक सैन्याला त्याचे एक अस्तित्व
होते अशोकाने साम्राज्य विस्तार करताना अनेक राजांपुढे मैत्रीचा हात
देतेसमयी महत्वाची गोष्ट केली आहे ती म्हणजे लोक जोडणे सामन्यातील सामान्य
माणसाला जोडले गेले म्हणून अखंड भारत वर्ष साकारले गेले हे व्यवस्थापनाचे
महत्वाचे भाग आहेत पाचवी बाब आहे ती म्हणजे पुढाकार घेणे म्हणजे आपण मागे
आणि तुम्ही पुढे चला असे नाही प्रत्येकवेळी आपल्या सैन्याला नवीन
गोष्टीसाठी स्वतः पुढाकार घेऊन दाखवत असे आणि योग्य ठिकाणी योग्य काम करणे
हे महत्वाचे असते यासाठी योग्य त्याच माणसाला ते काम देणे अशोकाने धम्म
प्रसारासाठी ज्या ज्या लोकांना निवडले ते ते लोक धम्माचा प्रसार करण्यात
यशस्वी झाले आहेत याला मॅनेजमेंट म्हणतात अशोकाचा एक हि पराभव झालेला नाही
हे अजून एक महत्वाचे आहे मग लढाई रणांगणावर ची असेल व बुद्धीच्या मैदानात
अशोकाने हार पाहिलेली नाही कारण योग्य त्या ठिकाणी योग्य माणसाला नेमून काम
पूर्ण करणे आणि अशोकाच्या राज्यात सामान्य जनतेला पुढाकार घेता येत होता
म्हणून भारतभर स्तूपांची निर्मिती झाली आहे . ८४ हजार स्तूपांची निमिर्ती
ती हि अवघ्या काही कालावधी मध्ये याला आजवर लोकांनी वेगळ्या मुद्द्यातून
पाहिले पण हे एका अभियंत्याची दृष्टी आणि कृती चे मॅनेजमेंट म्हणतात टाइम
मॅनेजमेंट म्हटले जाते सहावी गोष्ट बुद्धिमत्ता हि तर लागतेच नसेल तर तो
माणूस यशस्वी होत नसतो अशोकाच्या साम्राज्याचा विस्तार पूर्ण कल्पना देते
अशोकाची बुद्धी कौशल्य किती अफाट असेल याचे आता यात चार प्रकारची बुद्धिमत्ता असते एक मानसिक बुद्धिमत्ता सामाजिक बुद्धिमत्ता अंतर व्यक्ती बुद्धिमत्ता भावनिक बुद्धिमत्ता आता
मानसिक मध्ये कोणत्या हि संकटाच्या वेळी अचूक पणे ज्याची कामे पूर्णत्वास
जातात त्यालाच मानसिक बुद्धिमत्ता चांगली असली पाहिजे असे म्हणतात अशोकाने
आपल्या भावाच्या चुकीच्या वागणुकीमुळे सामान्य माणूस पिळवटाला जातोय ये
पाहून लोकांसाठी अतिशय नाजूक असणारा विषय त्याने हाताळून घेतला ते कौशल्य
सहज कोणाला हि जमत नाही यामध्ये भावनेच्याभरात वाहून चुकीची पावले पडून
विनाशाकडे वाटचाल होते व्यवस्थापकाला यामध्ये महत्वाचा भाग पार पाडावा
लागतो सामाजिक बुद्धिमत्ता मध्ये त्या व्यवस्थापकाला सामाजिक
परिस्थितीचे भान असायला लागते आणि सर्व समाजाचा पाठींबा असणे महत्वाचे आहे
अशोकाने लोकांच्या मनात राष्ट्राप्रती एक भावना निर्माण करून दिली आहे
ज्यामुळे लोक अशोकाच्या त्या प्रवाहात आली आहेत आणि अखंड भारत पूर्णत्वास
नेला आहे अंतर व्यक्ती बुद्धिमत्ता म्हणजे स्वतः बुद्धिमान असून चालणार
नाही तर बुद्धिमान लोकांना शोधून आपल्या सोबत घेण्याची बुद्धिमत्ता असावी
लागते भावनिक बुद्धिमत्ता मानसिक व भावनिक म्हणजे वैचारिक व भावनिक शब्द
एकत्र येतात म्हणजे काय वैचारिक बुद्धिमत्ता जिथे संपते तिथे भावनिक
बुद्धिमत्ता चालू होते आणि यात भावनिक न होणे हिलाच भावनिक बुद्धिमत्ता
म्हटली जाते अशोकाने भावनिक राजकारण केले नाही काही ठिकाणी कठोर निर्णयाची
गरज होती तिथे कठोर निर्णयांची अंमलबजावणी केली आहे नुसते आदेश देऊन सोडले
नाही त त्यावर अंमल झाला पाहिजे सम्राट अशोकाने भावनिक राजकारण न करता लोकांच्या
भल्याचे राजकारण केले आहे राज्य करताना आदर्श राज्यकारभार कसा असावा याचे
महत्वाचे पुरावे हे अशोकाकडेच पाहून घ्यावे लागतात अशोकाच्या बाबतीत
सर्वात मोठा गैरसमज असा आहे कि अशोक क्रूर होता कलिंगाच्या युद्धांनंतर तो
बदलला तर हे अत्यंत चुकीचे आहे अशोकाच्या घराचे वातावरण हे बुद्धाच्या
शिकवणीचा प्रभाव असणारे आहे काही इतिहासकारांनी अशोक चुकीचा रंगवला आणि
त्याचे हि कारण आहे कारण बुद्धाला लोकांनी प्रेझेंट करण्यासाठी अशोक चुकीचा
रंगवला म्हणजे बुद्ध तत्व सांगायला अशोक असा प्रकारे सांगितला गेला एक
गोष्ट लक्षात घ्या अशोकाची एकमेव लढाई आहे जो अशोक मैदानात लढाई करण्यासाठी
गेला आहे आणि जिथे माणसे मारली गेली अशी त्याची एकमेव लढाई आहे ती म्हणजे
कलिंग आणि कलिंगाच्या स्वाभिमानपणा हा त्यास कारणीभूत ठरला सामान्य लोक
लढाई स उतरले शेवटी विजय झाला तेव्हा अशोक अस्वस्थ झाला होता कारण माणसे
मारणे चुकीचे आहे हे त्याला माहित असताना हि लढाईत मारावेच लागतात कारण ती
लढाई आहे लोकांनी मात्र अशोक याने मोठ्या प्रमाणात कलिंग बेचिराख केले असे
चुकीचे सांगतात मुळात सामान्य माणसे लढाईत उतरली तेव्हाच अशोकाने लढाईच
मार्ग बदलला आहे माणसे मारून काही होत नसते हे सांगणारा अशोक क्रूर असेल
असे वाटत नाही आणि लगेच काही तो बुद्ध तत्वज्ञान ऐकून बुद्धाकडे आलेला
नाही त्याचा लहानपणापासून तो बुद्धाच्या शिकवणी च्या प्रभावाखाली आहे
म्हणून अशोक बुद्धकडे सहज गेला कारण त्यावेळी बुद्धशिवाय कोणता पर्याय च
समोर नव्हता अशोकाने बुद्धाच्या प्रति प्रेरणेची भावना होती श्रद्धा
वैगरे अजिबात ठेवणारा अशोक नव्हता कारण यशस्वी व्यवस्थापकाला श्रद्धा ठेवून
जमत नसते तर त्याला प्रेरणेची गरज असते आणि अशोकाने आपल्या लोकांमध्ये
प्रेरणा जागवली आहे हे अशोकाचे स्किल आहे अशोक केवळ राजा किंवा
चक्रवर्ती सम्राट नसून एक यशस्वी मॅनेजमेंट किंग आहे ज्याने दोन हजार
वर्षांपूर्वी या जगाला मॅनेजमेंट कशी करावी हे शिकवून गेला आता अशोकाच्या मॅनेजमेंट मधील सूत्रांचा अभ्यास करू जी आता मॅनेजमेंट सांगतात ते अशोकाने पूर्वी कशाप्रकारे अमलात आणले होते ते कामाचे
वाटप हे मॅनेजमेंट मधील पहिले सूत्र मानले जाते सम्राट अशोकाच्या संपूर्ण
राज्याचे कामकाजाचे विभाग आहेत अशोकाचे नऊ मंत्री आहेत शिवाय अशोकाची सैन्य
व्यवस्था त्यावेळच्या काळातीळ सर्वात मोठी सैन्य व्यवस्था आहे आणि हे
सैन्य कायमस्वरूपी कामदार आहेत ६ लाख पायदळ ३० हजार घोडदळ व ९ हजार हत्तीदल
आहे शिवाय अशोकाचे स्वतःचा खजिना म्हणजे कोषागार आहे म्हणजे आजची नॅशनल
बँक अशोक हा बँक सिट्सम चा जनक होता असे म्हणायला हरकत नाही कारण त्याने
तसे काम केले आहे अशोकाची स्वतंत्र अर्थव्यवस्था होती अशोकाचा स्वतःची
अदयावत धान्याची बँक आहे लोकांना जेव्हा गरज लागेल तेव्हा धान्य पुरवणारी
जगातील पहिली सरकारी बँक अशोकाने केली आहे शेतकऱ्यांना लागणाऱ्या बी
बियाणाची इथूनच पुरवणी केली जायची अशोकाच्या व्यायामशाळा आहेत जिथे कसलेले
पैलवान तयार केले जायचे खास करून अशोकाचे सैन्य त्या तोडीचे होते शिवाय
अशोक हा कलागुणांना वाव देणारा सम्राट होता त्यामुळे त्याने स्वतंत्र
विद्यालये ती हि विश्वविद्यालये निर्माण केली आहेत अशोकाच्या दवाखाने
,यंत्रशाळा हत्तीशाळा आरोग्यशाला पक्षी शाळा टाकसाळ असे बरेच विभाग आहेत
अशोकाच्या राज्यात एकूण काय तर अशोकाने प्रत्येक काम विभागाहून देऊन कामाचे
स्वरूप सहज आणि सोपे केले आहे अन्यथा एवढ्या अवाढव्य राज्याचा कारभार
एकट्या व्यक्तीला करणे शक्य नसते मॅनेजमेंट मध्ये महत्वाची गोष्ट आहे
कामाची विभागणी इन प्रकारे केली जाते ते म्हणजे सोपे काम थोडे अवघड काम आणि
अवघड काम अशी असते त्यात सोपी कामे करण्यासाठी लोक ठेवली जातात थोडे अवघड
काम करण्यासाठी कौशल्य पूर्ण माणसे ठेवली जातात व अवघड काम करण्यासाठी
स्वतः कौशल्य दाखवावे लागते म्हणजे काय एखादे सोपे काम आहे तर तेसैन्याच्या
लायक आहे ते सैन्यानं च द्यायचे जे मंत्र्यांच्या लायक आहे ते मंत्र्यांना
च करायला द्यायचे व मंत्री सेनापति यांच्यानी झाले नाही तर राजाला करावे
लागायचे अशोकाने नेमके तेच केले आहे जे जे महत्वाचे काम आहे ते ते त्याने
स्वतः केलेलं आहे अशोकाने धम्माच्या बाबतीत स्वतः लक्ष देऊन काम केले आहे
माणसे निवडण्याचे काम अशोकाने स्वतः केले आहे म्हणजे कोणता माणूस कोणत्या
ठिकाणी पाठवला पाहिजे हे अचूक माहित असणे हे मॅनेजमेंट आहे कौशल्य आहे ते
कोणाला हि पाठवून जमणार नव्हते सीरियाच्या राजाकडे जाण्यासाठी अंतियोक
नावाच्या भिक्षूला पाठवले मिश्र देशात तूरमय याला पाठवले म्हणजे भारताबाहेर
ज्यांना पाठवले ते लोक तिकडे बुद्धाचा धम्म प्रभावी मांडतील असेच लोक
पाठवले आहेत अशोकाने एवढ्या मोठ्या साम्राज्याचे यशस्वी पणे राज्यकारभार
कसा चालवला तर त्याने केलेली कामाची विभागणी आज आपण आपल्या भारताची जी
यंत्रणा पाहतो तशीच यंत्रणा अशोकाची आहे सम्राट अशोकाच्या हाताखाली नऊ
मंत्र्यांचे मंत्रिमंडळ त्यांच्या हाताखाली प्रांतवार माणसांची नेमणूक
केलेली आहे आणि महत्वाचे म्हणजे अशोकाच्या राज्यात वतनदार पाहायला मिळत
नाहीत कारण सामान्य माणसाला टॅक्समुक्त करणारा जगातला पहिला सम्राट हा
सम्राट अशोक आहे आजच्या युगात सोडा असा एकही राजा भेटणार नाही ज्याने
रयतेकडून टॅक्स घेतला नाईल पण अशोकाचे सर्वत्र एकछत्री राज्य असल्यामुळे
कुठे हि बंडाळी नव्हती कारण कामाचे यशस्वी नियोजन महत्वच भाग आहे अशोकाच्या
राज्यात रयतेवर जुलूम जबरदस्ती करण्याची मुभाच नव्हती कारण थेट यंत्रणा
अशोकाच्या निगराणी खाली होती त्यामुळे सैन्याला त्याप्रकारे आदेश होते
अशोकाचा काळ सुवर्ण काळ गणला जातो कारण शेती हा प्रमुख व्यवसाय असणारा भाग
असल्याने अशोकाने जगातील सर्वातमोठ्या प्रमाणावर शेतमालाचा व्यापार करणारी
यंत्रणा उभारली आणि हे सारे शक्य झाले कारण अशोकाने कामाची विभागवार काम लोकांना देऊ केली ज्याची जशी गुणवत्ता तशी त्याला कामाची पोस्ट दिली जायची आधुनिक
यंत्रणेत हि तशी सिस्टम नाही गुणांनुसार कामांची विभागणी आज हि प्रभावी
पणे चालताना दिसत नाही पण अशोकाने ती त्याकाळची यशस्वी करून दाखवली आहे आणि
त्याच्याकडून च बहुतांश लोकांनी ती यंत्रणा वापरली आहे सम्राट अशोकाने ज्या पद्धतीने व्यवस्थापन क्षेत्रात केलेली क्रांती आजवर च्या इतिहासात लोकांनी कधी सांगितली च नाही असो व्यवस्थापन मधील दुसरे सूत्र पुढच्या भागात पाहू पण सम्राट अशोकाला इतिहासकारांनी न्याय दिला नाही एवढेच म्हणावे लागेल कारण अशोकाची यंत्रणा हि प्रभावी यंत्रणा म्हणून जगापुढे नेली गेली पाहिजे सम्राट अशोक हा व्यवस्थापनाचाजनक आहे
मागील भागात आपण मॅनेजमेंट च्या पहिल्या सूत्रांचे विश्लेषण केले होते आता मॅनेजमेंट च्या १३ सूत्रांची माहिती घेऊ या
२: अधिकार व जबाबदारी : भारतीय संविधानाने आपल्याला अधिकार जसे दिलेलं
आहेत तसे आपणास जबाबदारी हि दिलेली आहे हे समजण्यासाठी मॅनेजमेंट माहित
असावी लागेल हा एक मॅनेजमेंट चा भाग आहे बाबासाहेब ते उत्तम जाणत होते
म्हणून संविधानात अधिकार सोबत जबाबदारी दिलेली आहे. त्याच हेतूने मॅनेजमेंट
मध्ये देखील हा महत्वाचा भाग असतो म्हणजे काय जेव्हा आपण एखाद्याला काम
करण्याची संधी देतो तेव्हा त्याच्याकडे पूर्ण जबाबदारी हि देणे आवश्यक आहे
कारण लोक नुसते काम देतात जबाबदारी नसते म्हणून जबाबदारी हे मॅनेजमेंट
मधील महत्वाचा भाग आहे यामध्ये जितके अधिकार जास्त दिले जातात तितकीच
जबाबदारी जास्त असायला हवी अन्यथा तो व्यक्ती त्या अधिकारांचा गैरवापर करू
शकतो उलट जितकी जबाबदारी जास्त असते तितका तो अधिकारांचा गैरवापर कमी करतो
कारण त्याच्यावर जबाबदारीचे ओझे असते व त्या दबावाखाली तो व्यक्ती पूर्णपणे
काम करण्यात व्यस्त असतो आणि हे व्यवस्थापनातील सूत्र सम्राट अशोकाने
दोनहजार वर्षांपूर्वी अमलात आणून जगाला दाखवून दिले आहे सम्राट
अशोकाच्या दरबार असणाऱ्या प्रत्येक सैनिकाला जसे अधिकार दिलेत तसे त्यांना
तेवढी जबाबदारी हि दिलेली आहे कारण एवढ्या मोठ्या साम्राज्याचा राजा म्हणजे
त्याचे मंत्रिमंडळ केवढे असणार आजच्या पंतप्रधान म्हणजे अशोकाचा प्रधान
असे त्याला आपण वजीर हि म्हणतो आणि वजिराच्या हाताखाली आज जसे खासदार असतात
तसे अशोकाच्या राज्यात देखील त्येवळचे खासदार आहेत प्रत्येक प्रांताचा एक
अधिकारी नेमलेला आहे जो आजचा खासदार आहे आता याना जशी अधिकार दिलेत तशी
त्यांना जबाबदारी दिलेली आहे त्यावेळच्या काळात अशोकाचे सैन्य व्यवस्थापन
मध्ये ६ लाख नुसते पायदळाचे सैन्य आहेत ते आणि त्याचे नेतृत्व करणाऱ्या
सेनापती ला जसे सैन्य व्यवस्थापनाचे अधिकार दिलेत तसे त्याला सैन्याची
बांधणी करण्याची जबाबदारी दिलेली आहे घर तिथे सैनिक ह्याचे निर्माण करणारा
कोणी असेल तर तो सम्राट अशोक आहे म्हणजे सेनापती ला नुसते एकाच प्रांतातील
सैन्य व्यवस्थापन नाही अशोकाच्या संपूर्ण राज्यात सैन्य व्यवस्थापनाची
जबाबदारी दिलेली आहे त्याच्याकडून चूक झाली तर कठोर शासन हे अशोकाच्या
राज्यात दिले आहे म्हणजे नुसते अधिकार गाजवून प्रजेला कष्ट द्यायचे नाहीत
तर दिलेली जबाबदारी पूर्ण करून द्यायची आहे आणि सम्राट अशोक पहिला सम्राट
आहे ज्याने आपल्या राज्यात असणाऱ्याकाम करणाऱ्या लोकांना टार्गेट बेस काम
देऊ केले आहे म्हणजे एका दिवसाचा वा एका आठवड्याचा किंवा एका महिन्यात जे
काम दिलेले असायचे ते पूर्ण झालेच पाहिजे मग त्यात कसर केली जायची नाही आता
महत्वाचे यात चुका करणाऱ्या मंत्र्याला हि चूक झाली म्हणून ती चूक का झाली
याची कारणे संगवई लागत असत मंत्र्याला हि कधी मोकळे सोडलेले नाही अशोक
धम्माच्या मार्गावर आला म्हणजे त्याने तलवार टाकून दिली हा सर्वांचा मोठा
गैरसमज कोणता हि सम्राट आपली हातातील तालावर सोडून देत नसतो त्याला त्याची
वेळोवेळी गरज असतेच राजेशाही मध्ये ती महत्वाची मानली जाते स्वतः सम्राट
असून अशोकाने जेवढे आपले अधिकार आहेत त्याहून अधिक जबाबदारी स्वीकारलेली
आहे त्यामुळे सम्राट अशोकाची पावले कुठे हि चुकीच्या दिशेला गेली नाहीत
भारतीय इतिहासात राजपूत राजे असो हिंदू राजे यांचे मात्र उलटे झाले त्यांनी
अधिकार खूप घेतले पण जबाबदारी काहीच घेतली नाही त्यामुळे हिंदू राजे बाई
आणि बाटली यामध्ये व्यस्त राहिले व शत्रूला आयते साम्राज्य कष्ट न करता
मिळवता आले खूप सारी संपत्ती लुटून घेऊन गेले हा त्यांचा विलासीपणा मुले
कारण त्यांच्याकडे जबाबदारी नव्हते आणि इथे सम्राट अशोकाने आपल्याला देखील
या सूत्रापासून वेगेळे ठेवले नाही याला खरे मॅनेजमेंट म्हणतात दुसरी बाब
सम्राट अशोकाने बुद्धाच्या धम्माल राजधर्म म्हणून मान्यता दिल्यावर धम्म
प्रसार करण्यासाठी भिक्षूंची नेमणूक केली आहे तेव्हा त्याने धर्मगुरू
म्हणून नाही तर धम्माचे प्रचारक म्हणून त्यांची नेमणूक करून त्यांना काही
अधिकार देऊ केलेत म्हणजे जिथे जिथे हा प्रचारक जाईल तिथे तिथे त्याचा मान
हा एखाद्या राजाच्या तोडीचा होता त्याचे अधिकार देऊ केले होते पण त्याच
बरोबर घरघरात धम्म पोहचला पाहिजे हि सर्वात मोठी जबाबदारी दिलेली आहे
तुम्ही ज्या भागात आहेत तिथे कोणत्याही प्रकारची कमी तुम्हाला पडणार नाही
पण धम्म प्रसारात कसूर झाल्यास त्यांना कारणे दाखवा नोटीस द्यावी लागायची
जे लोक योग्य काम करत नसायचे अश्यांची भिक्षु संघातून हकालपट्टी करणारा
सम्राट अशोक होता हे मॅनेजमेंट चे स्किल आहे अधिकार व जबाबदारी देऊन
त्यांचा समतोल बांधणे याला खरे मॅनेजमेंट म्हटले जाते आम्ही कधी याचा
विचार केला आहे का अशोकाला आम्ही चक्रवर्ती सम्राट एवढ्यावर च मांडले मी पण
त्या चक्रवर्ती सम्राटाला चक्रवर्ती का म्हणतात हे कधी आम्ही पहिले नाही
तो वेगळा भाग आहे तो सविस्तर दुसऱ्या भागात आपण पाहणार आहोत
थोडक्यात आपण मॅनेजमेंट मधील दुसऱ्या सूत्र अशोकाने किती सचोटीने व काटकोर पणे आपल्या साम्राज्यात राबवले आहे याची जाणीव होईल आपणास
थोडक्यात अशोकाचे विविध विभाग आहेत प्रत्येक विभागाला मुख्य अधिकारी आहे
आणि त्या अधिकाऱ्याला सर्व अधिकार देऊन त्याला त्या विभागाची सर्व
जबाबदारी देऊ केलेली आहे की तो त्याच्या जबाबदारी शिवाय दुसरा विचारच करू
शकत नाही म्हणून अशोकाचे साम्राज्य दिवसेंदिवस वाढतच गेले लोक जोडत गेले एक
हि माणूस शत्रूला जाऊन मिळाला नाही शत्रू मात्र सम्राटाच्या राज्याचा भाग
बनून राहिला याला एका यशस्वी व्यवस्थापकाचे कौशल्य म्हणतात आणि सम्राट अशोक
हा मॅनेजमेंट मधील किंग होता हे उभ्या जगाने समजून घेणे आवश्यक आहे
मागच्या भागात आपण मॅनेजमेंट च्या सूत्रातील दुसरे सूत्र पाहिले आता आपण तिसरे सूत्र पाहू या
३} शिस्त : शिस्त हि महत्वाचा भाग आहे मॅनेजमेंट मध्ये कारण प्रत्येक
संस्थेला संघटना किंवा राज्याला शिस्त असावी लागते शिस्त नसेल तर त्या
संस्था वा राज्य उभे राहू शकत नाही शिस्त हि सर्वाना पाळावीच लागते आता इथे
जशी शिस्तीची अपेक्षा मालक नोकरांकडून करतो तशीच शिस्त मालकाला हि असणे
आवश्यक आहे म्हणजे एखाद्या राजाने सैन्यानं शिस्त व स्वतः मात्र बेशिस्त
असेल तर राज्य बुडते शिस्तीला जगाच्या इतिहासात खूप महत्व आहे राजाने शिस्त पाळली तरच तो सैन्याला जनतेला शिस्त पाळण्यास सांगू शकतो
सम्राट अशोक शिस्तीच्या बाबतीत सर्वात कठोर मानला जातो त्याच्या
सैन्याला हि त्याच प्रकारची शिस्त दिलेली आहे अगदी खुद्द स्वतः सम्राट असून
देखील शिस्त मोडलेली नाही अगदी अशोकाच्या साम्राज्यात रयतेला देखील शिस्त
घालून दिलेली होती शिक्षणाची द्वारे उघडली होती अशोकाचा आदेश आहे
शिक्षणासाठी घरातील प्रत्येक मुलाला शिक्षित झाले पाहिजे यासाठी अशोकाचे
स्वतंत्र विभाग आहे शिक्षणाचा ज्यामध्ये मुलाला सर्व प्रकारचे शिक्षण दिले
जायचे शिक्षणासाठी स्वतंत्र्य विभाग तयार करणारा सम्राट म्हणून जगात तो
एकमेव च गणला जातो जो दोन हजार वर्षांपूर्वी शिक्षणाला महत्व दिले आहे
तक्षशिला विद्यापीठाला विश्वविद्यापीठाचा दर्जा दिला तिथे सर्व विद्यांचे
शिक्षण दिले जायचे त्याचा स्वतःचा मुलगा कुणाल हा त्या काळातला पहिला
इंजिनियर आहे ज्याने लेण्याची व स्तूपांचे इंजिनियरिंग करून बांधकाम केले
आहे अशोकाने घालून दिलेली शिस्त पहा त्याची मुले धम्माच्या प्रचारासाठी
देऊ केली कारण स्वतः राजा शिस्तप्रिय असेल तरच रयत शिस्तप्रिय असते आणि
म्हणूनच अशोकाचा भारत हा सुवर्णमय होता जगातील पहिली आर्थिक महासत्ता
असणारा देश म्हणून दोन हजार वर्षांपूर्वी भारत महासत्ता होता पण आज आम्हाला
तेच माहित नाही अशोक इतिहासात सांगताना अशोकाची महत्वाची कौशल्य लोक
विसरले अशोक शिस्तप्रियसम्राट आहे हेच लोक विसरून गेले इतिहासकरांनी
चुकीचा अशोक रंगवून सांगितलं कारण कुठे तरी धम्म मोठा व चांगला वाटावा
म्हणून कलिंग चे युद्धात माणसे मारावी हा हेतूच नव्हता पण ऐनवेळी
कलिंगातील रयत युद्धात उतरली त्याच क्षणी अशोकाने आदेश दिलेला आहे युद्ध
विरामाचा पण खुल्या मैदानात घडलेले तो प्रसंग अशोकाला वेदना देऊन गेला
त्यावेळी अशोकाने मैत्रीने जग जिंकण्याचे निश्चित केले ते अशोकाच्या शिस्तप्रिय वागण्यामुळे च अशोकाने
आपल्या सैन्याला एक शिस्तच घालून दिली होतो कि प्रथम आपला देश व नंतर आपण
म्हणून अशोकाचे राज्य टिकून होते अशोकांनंतर अनेक राजे झाले तरी देखील
त्याचा प्रभाव त्यांच्यावर कायम राहिला आहे सातवाहन असोत कि गुप्त राजे
असोत अशोकाचा प्रभाव त्यांच्या वर स्पष्ट दिसतो हि एक शिस्तप्रिय राजाची
वैशिष्टये असतात अशोकाने रयतेला शिस्त अशी दिली आहे की अशोकाच्या
साम्राज्यात चोरी घडल्याचे प्रसंग नाही अशोकाच्या राज्यात बलात्कार सोडा
स्त्रीकडे वाकड्या नजरेने पाहण्याची हिंमत नव्हती कारण अशोकाच्या सैन्यात
स्त्री वर्गाची स्वतंत्र फौज होती स्त्रीला देखील सैन्यामध्ये स्थान देऊन
ती अबला नाही हे दाखावून देणारा पहिला चक्रवर्ती सम्राट अशोक आहे अशोकाच्या
राज्यात कधी संपत्तीसाठी भांडणे झाली नाहीत कारण अशोकाचे कार्यव्यवस्थापन
कारणीभूत आहे कारण अशोकाच्या राज्यात शिस्तीने काम केले जायचे प्रत्येक
घरात अशोकाचा सैनिक होता इतकेच काय अशोक स्वतः रयतेमध्ये वेषांतर करून
प्रजेला कोणाकडून उपद्रव तर होत नाही ना याची काळजी घेत होता लोकांनी अशोक
चुकीचा रंगवला आहे कारण अशोक लगेच बदलून इतका प्रेमळ झाला असे म्हणता
येत नाही अशोक प्रेमळ च होता न्यायी राजा होता त्याच्या अंगी मैत्री भावना
आधीच होती म्हणूनच तो एवढे मोठे साम्राज्य उभे करू शकला तलवारीच्या
पातीवर साम्राज्य उभे केले जाते पण मैत्रीच्या माध्यमातून साम्राज्य उभे
करून प्रजेच्या हक्काचे राज्य निर्माण करणारा अशोक जगातला पहिला सम्राट आहे
अशोकाची अजून एक महत्वाची गोष्ट अशोकाने आपल्या साम्राज्यात घालून दिलेलं नियम अतिशय कठोर आहेत न्यायप्रिय राजा म्हणून अशोकाची ओळख आहे व्यवस्थापनात महत्वाची गोष्ट हीच असते शिक्षण कला गुणानं वाव देणारा राजा सम्राट अशोक होता त्याच्या शिस्तप्रियतेमुळे अशोकाला जगप्रसिद्धी मिळाली आहे धम्म प्रसारासाठी माणसे निवडताना हि त्याने योग्य तीच निवडली आहेत भिक्षु
संघ बुद्धाच्या नियमांचे उल्लंघन करतोय असे जाणवले त्यामुळेच धम्म संगीती
घेऊन बेशिस्त भिक्षुना त्याने संघातून हाकलून दिले आहे
अशोक नेहमीच नवनव्या रूपात तुम्हाला पाहायला मिळेल पण इतिहासाने अन्याय केला असल्याने त्याचे चित्रण चुकीचे होते आहे
मॅनेजमेंट मध्ये महत्वाची गोष्ट शिस्त आहे जिच्यामुळेच मॅनेजमेंट यशस्वी
होते अशोकाच्या साम्राज्यत त्याने केलेलं मॅनेजमेंट थक्क करणारे आहे बहुधा
लोकांनी सम्राट अशोक समजून च घेतलेला नसतो तर अशोकाचे मॅनेजमेंट तर लांबची
गोष्ट आहे आपण जाणून घेऊ या एक एक सूत्रे जी आजच्या काळात मांडली गेली तीच
सूत्रे सम्राट अशोकाने दोन हजार वर्षांपूर्वी आपले साम्राज्य निर्माण
करण्यासाठी वापरली आहेत
व्यवस्थापनातील चौथे सूत्र आहे आदेशाची एकवाक्यता चक्रवर्ती सम्राट
अशोकाचे राज्य अखंड जम्बूद्वीप मध्ये होते .आणि महत्वाची गोष्ट म्हणजे
सम्राट अशोकाची शासन प्रणाली एवढ्या मोठ्या अवाढव्य साम्राज्यात कोणत्या हि
प्रकारचे प्रशासन हे चुकीचे सापडत नाही कोणते व्यवस्थापन अतिशय कौतुकास्पद
आहे यामध्ये महत्वाचा आहे राजाचा आदेशाची अंमलबजावणी कशी होते ते .
आणि सम्राट अशोकाच्या आदेशाची अंमलबजावणी कशी होते याचे दाखले च त्याने
कोरून ठेवलेले शिलालेखातून आपणास पाहायला मिळते . यासाठी आपण महत्वाचा शिलालेख पाहू या
देवा……….
एल………..
पाट…………..ये केनपि संघे भेतवे ए चु खो
भिखु वा भिखुनी वा संघ भाखति से ओदितानि दुसानि संनंधापयिया अनावाससि
देवांचा प्रिय राजा प्रियदर्शी याचा आदेश आहे कि , पाटीलपुत्र मध्ये
भिक्खू व भिक्खुनी संघात जो कुणी फुट पाडत असेल व संघ दुषित करण्याचा
प्रयत्न करत असेल तर त्याला संघापासून वेगळे करावे योग्य ती समज देवून
शुद्ध करावे त्याला पांढरे वस्त्र देवून भिक्खू वा भिक्खुनी संघापासून
वेगळे राहण्याची व्यवस्था करावी व उरलेला भिक्खू वा भिक्खुनी संघ
विनयानुसार म्हणजेच विनय पिटकात दिलेल्या विनयानुसार संपूर्ण संघ पुन्हा
विनशील करून घ्यावा. असे देवानपियेन प्रियदर्शी राजाने सांगितले आहे. या
लेखाची प्रत स्वताजवळ ठेवावी कारण हे सर्वाना प्रसारित व्हावे यासाठी तसेच
एक प्रत प्रत्येक उपासाकांकडे दिली जावी आणि उपासकांनी त्यानुसार अनुसरण
करावे या अनुशासनावर विश्वास ठेवून ते कायम आचरणात आणावे . आणि प्रत्येक
महामात्रा ने हे जपून ठेवावे म्हणून आपणास हा अनुशासन दिले आहे त्यावर
विश्वास ठेवावा आणि आचरण करावे जेव्हा आपण दूरवर विहार म्हणजे प्रवास
करण्यास जाल तेव्हा देखील हि एक प्रत आपल्याकडे असावी कारण हे सर्व दूर
असणाऱ्या प्रत्येक भागातील लोकांसाठी अनुशासन आहे. म्हणून हि आपल्या जवळ
बाळगावी
वरील वाचल्यानंतर आपल्याला एक गोष्ट लक्षात येईल पाटीलपुत्र हि अशोकाची
राजधानी आहे इथून आदेश काढला आहे आणि सर्वदूर असणाऱ्या प्रदेशातील
प्रत्येक महामात्रा तसेच प्रत्येक जनतेला खास करून इथे त्याने आपल्या
जनतेला उपासक म्हणून म्हटलेले आहे यावरून च भारतातील जनता हि बौद्ध धम्माचे
आचरण करणारी बौद्ध उपासक होते याचे ऐतिहासिक दाखले आहेत हे. उपासक
यांच्याकडे हि हा आदेश दिलेला आहे कि एखादा व्यक्ती कोणी हि भिक्खू वा
भिक्खू नि संघात फुट पाडण्याचे काम करत असेल तर अश्या भिक्खुंचे चीवर
काढण्याचा आदेश आहे याची लिखित नोंद आपणास मिळते जरी बौद्ध धम्माला
राजाश्रय दिला असला तरी धर्माच्या ओझ्याखाली राज्यशासन दबलेले नाही याचा
लिखित पुरावा आपणास पाहायला मिळतो
आदेशाची एकवाक्यता कशी असते ते पहा संपूर्ण जम्बुद्विपात आपला आदेश
देणारा आणि त्याची अमलबजावणी व्हावी शिवाय हा आदेश चिरकाळ टिकून राहावा
यासाठी ते आदेश शिलास्तंभ आणि शिलेवर कोरून ठेवले म्हणजे हजारो वर्षांनी हि
ते लोकांनी वाचावे आणि त्यानुसार काम करावे अशी दूरदृष्टी ठेवून दिलेले
आदेश आहेत पुढील आदेश अगदी आज हि आपल्या प्रशासनात आलेले दिसतात
प्राण्यांची हिंसा करू नये म्हणून काढलेल्या आदेशाची अमलबजावणी संपूर्ण
राज्यात केली जाते शिवाय धम्माचे आचरण करावे यासाठी धम्ममहापात्रा ची
नियुक्ती करून लोकांचे आचरण सुधारावे यासाठी काढलेला आदेश आणि त्याची
अमलबजावणी हि साऱ्या राज्यात होते हि एक प्रशंसनीय गोष्ट आहे . सम्राट
अशोकांनी या व्यवस्थापन कौशल्यात पारंगत होते म्हणून च त्यांना हा
अवाढव्य असणारा राज्यकारभार सहज सांभाळता आला इतिहासात हि बाब खूप
महत्वाची आहे सम्राट अशोकाने दिलेली आदेश व त्याचे पालन झाले नाही अशी घटना
आपणास पाहायला मिळत नाही शिवाय सम्राटाच्या आदेशाशिवाय इतर कोणी आदेश
दिल्याची नोंद सापडत नाही जोवर सम्राटाचा आदेश येत नाही तोवर खालील कोणते
हि अधिकारी स्वतःचा आदेश देत नव्हते . आपल्या महापात्रा याना त्यांनी काही
अधिकार दिलेले होते पण जनतेवर अधिकार गाजवाण्यासाठी कोणी त्याचा गैरवापर
होणार नाही यासाठी त्याची पूर्णपणे सम्राट अशोक यांच्याकडे अधिकार होते .
संपूर्ण जम्बूद्वीप मध्ये आपले राज्य प्रशासन काम करत असताना कोणत्या हि प्रकारचे चुकीचे नियोजन आपणास पाहायला मिळत नाही. शिवाय
प्रशासनातील जे अधिकारी वर्ग आहेत त्यांच्याकडून हि कोणत्या हि चुकीच्या
प्रकारची काम होताना पाहायला मिळत नाही. सम्राट अशोकाने घालून दिलेले नियम
हे प्रत्यक अधिकारी जबाबदारीने पालन करत होता शिवाय लोक धम्म आचरण करणरे
असल्यामुळे कपटनीती अथवा कोणत्या हि प्रकारचे चुकीची काम कोणी केलेली
नाहीत हाच सर्वात महत्वाचा मुद्दा या निमित्ताने अधोरेखित होतो अश्या या महान सम्राटाला नक्कीच मानाचा मुजरा
सम्राट अशोकाच्या राज्यव्यवस्थेचा विचार केला तर या गोष्टीची नक्कीच
जाणीव होइल की एका राजाला सम्राट, प्रियदर्शी किंवा चक्रवर्ती अशी संबोधने
का लावली असतील. सम्राट अशोकाच्या साम्राज्यातील जे प्रदेश राजकीय दृष्ट्या
महत्वाचे आहेत, जसे उज्जैन, तोसली आणि सुवर्णगिरी या प्रातांचा
राज्यकारभार आपल्या राजपुत्राकडे सोपवला होता. सम्राट अशोकाने गादीवर
बसण्यासाठी आपल्या सर्व भावांना ठार केले. इतिहासकारांनी आणि पुराणांनी असा
अनेक ग्रंथांमधून चुकीचा प्रचार केलेला आहे. स्तंभलेख पाचवर उल्लेख केला
आहे की, पाटलीपुत्र व इतर शहरांमध्ये त्यांचे भाऊ बहीण आणि इतर
नातेवाईकांना स्वतंत्र घर किंवा खोल्यांची व्यवस्था निर्माण केली होती याचा
अर्थ त्यांचे कुटुंबातील सर्व सदस्य व नातेवाईक जिवंत आणि सुरक्षित होते.
सम्राट अशोकाने आपला राज्यकारभार सुरळीत चालावा यासाठी गव्हर्नराची
नेमणूक केली होती त्याच्यामर्फत प्रांतातील सोई सुविधा आणि देखरेख
करण्यासाठी काही उच्चपदावरील अधिकारी नेमले होते. त्यांनाच प्रादेशिक असे
म्हणत. प्रत्येक प्रांतातील जिल्ह्यात असे महामात्र नेमले जात. महामात्र
परिषद किंवा मंत्रीमंडळाची स्थापना केली होती. अशा प्रकारची कार्यपद्धती
सम्राट अशोकाला महाबलाढ्य किंवा महान नैतिक राजा म्हणून ओळख निर्माण करून
देते. कोसंबी येथील लेखात तसेच पाटलीपुत्र आणि राणीच्या लेखात कोसंबीच्या
महामात्रास, सारनाथ येथील लेखात त्या प्रांतातील महामात्रांना आदेश देण्यात
आले आहेत. धौली व समापा येथील महामात्रांना न्यायदानाचे अधिकार देण्यात
आले आहेत. याशिवाय सीमेवर असणार्या राष्ट्रांवर नजर ठेवण्याची जबाबदारी
सोपवण्यात आली होती. आपल्या राज्यभिषेकाच्या तेराव्या वर्षी धर्ममहामात्र
नेमले होते. त्या धर्महामात्रांची जबाबदारी लोकांमध्ये नीतिमत्ता वाढीस
लागावी यासाठी काम करावे लागत होते.
समाजातील महत्वाचा घटक म्हणजे स्त्रिया! त्यांच्या कल्याणासाठी किंवा
स्त्रियांना सक्षम बनवण्यासाठी ज्या योजना राबविण्यात येत असत त्यावर लक्ष
ठेवण्यासाठी स्त्री अध्यक्ष महामात्र यांची नियुक्ती करण्यात आली होती.
दुसरा अधिकारी वर्ग म्हणजे राजुक किंवा लाजुक होता. त्याचे कार्यक्षेत्र
म्हणजे काही लाख लोकसंख्येवरती त्यांची नियुक्ती होती. चांगल्या सज्जन
लोकांना शासकीय बक्षिसे आणि दुर्जनांना शिक्षा किंवा दंड देण्याचा त्यांना
अधिकार होते. रज्जूवाहक म्हणजे दोर धरणारा म्हणजे याचे काम जमिन मोजणे,
तळ्यातील किंवा सरोवरातील पाणी वाटप करणे, तसेच गावातील प्रत्येक
क्षेत्रातील कारागिरांकडून कर वसूल करणे इत्यादी कामे होती. आधुनिक
पटवार्यास त्यावेळी रज्जूक म्हणत याशिवाय सेक्रेटरी म्हणून काम करणारा युतस
किंवा युक्तस म्हणून ओळखले जात. तो महामात्रांना कार्यालयात मदत करत होता.
युत हे प्रांताचे अधिकारी होते. या अधिकाऱ्यांना राजकार्याशिवाय
धर्मप्रसार करण्यासाठी आपल्या जनपद क्षेत्रात दौरे करावे लागत.
आजच्या विदेश मंत्रालयाच्या कार्यालयासारखे त्यावेळी कार्यालय होते.
राजाचा दूत वकील म्हणून सम्राट अशोकाने शेजारच्या पांड्य, चोल, सिलोन आणि
इतर पाच ग्रीक देशात आपले वकील नेमले होते. सम्राट अशोकाच्या दरबारात
डियोनिसीयस हा आॅलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस हा इजिप्तचा वकील होता. विदेशनीती
सह अस्तित्व आणि शांती यावर आधारित होती. चंद्रगुप्तापासून सम्राट अशोक
पर्यंत साम्राज्याची विदेश निती मैत्रीपूर्ण होती. सिरियाच्या राजाशी
सम्राट अशोकाच्या वडिलांचा बिंदुसार राजाचा पत्रव्यवहार होता. सम्राट
अशोकाने धर्मविजय आणि धर्मप्रचाराकरिता अन्तियोक, इजिप्तचा राजा तुरमाय
राजाशी मैत्रीचे संबंध होते. विश्वशांतीसाठी म्हणजेच सर्व मानवजात व
पशुपक्षी सुखी रहावेत यासाठी सदैव प्रयत्नशील असावे. याच उद्देशाने प्रेरीत
होऊन सिमेलरील शेजारच्या राष्ट्रांना आपली निती प्रतिपादित केली. ” आपण
घाबरु नका, भितीचे कारण नाही. अगदी निश्चिंतपणे रहा. माझ्याकडून सुख शांती
प्राप्त करा. दुःखी होऊ नका. ” धौली लेखात स्पष्ट आदेश दिले आहेत. असे
लिखित अभिवचन दिले आहे. सम्राट अशोक मनुष्य कल्याणासाठी झटत होते.
त्यांच्या सर्व अधिकारी आणि कर्मचारी यांनी देखील सदैव मनुष्य आणि
प्राणिमात्रांच्या कल्याणासाठी झटावे असे आदेश दिले होते. पशुपक्षांच्या
कल्याणासाठी त्यांनी व्रजभूमीक नावाचे अधिकारी नियुक्त केले होते. त्यांनी
साम्राज्यातील पशुपक्षांच्या सुखशांती साठी औषधालय स्थापन करून औषधी
गुणयुक्त झाडांची लागवड करावी. विहीरी आणि पिण्याच्या पाण्यासाठी प्याऊ,
प्राण्यांच्या पिण्याच्या पाण्यासाठी हौद, विश्रांमगृह सावलीसाठी
रस्त्याशेजारी झाडांची लागवड करावी व त्यांची देखरेख करावी असे आदेश दिले
होते. ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ यामुळेच विश्वकल्याण व शांती स्थापित होऊ
शकेल यावर सम्राट अशोकाची श्रध्दा होती.
विश्वशांतीसाठी प्रयत्न करत असताना साम्राज्याला धोका निर्माण होऊ नये
म्हणून त्यांनी शस्त्रांचा वापर अजिबात टाळला नाही. आपली सैनिकी शक्ती
पुर्वी होती तीच पुढेही कायम ठेवली. त्यांच्या संरक्षण व्यवस्थेविषयी
आपणांस कळून येईल की, ती सहा विभागात विभागली गेली होती. त्यावर राजाला मदत
करण्यासाठी तीस सदस्यांची महासमिती होती. त्यानंतर सहा सैनिकी विभागांकरता
सहा उपसमित्या होत्या. १) नौसेना २) साहित्य ३) पायदळ ४) अश्वसेना ५)
रथसेना ६) हत्ती सेना. यावरुन सैनिकी क्षमता दिसून येते. सहा लाख पायदळ,
तीन हजार घोडदळ, नऊ हजार हत्ती आणि तेवढेच रथ इतके बलाढ्य सैन्य असताना
त्याची सुसंघटीत आणि शिस्तबद्ध रचना केली होती. त्यामुळे शत्रूची वाकडी नजर
टाकण्याची हिम्मत होत नव्हती. या सैन्यबळावर व बुध्दिकौशल्यामुळे हे
साम्राज्य संपूर्ण जंबुदिपात पसरले होते.
येवढे बलाढ्य साम्राज्य आणि त्याचा सम्राट अशोक एका शिलालेखात म्हणतो
(सर्व मुनिसे पजायमा) सर्व मानव माझे संतान आहे. दुसर्या एका लेखात
म्हणतात जनहिताला मी आपले सर्वश्रेष्ठ कार्य समजतो. यावरच एकच दिसून येत
आहे की, सधम्म आणि राजकारण यांचे एकत्रीकरण करून एवढे मोठे साम्राज्य
चालवणे जगातील कोणत्याही राजाला सम्राट अशोकाशिवाय जमलेले नाही.
दुर्गाबाईंशी ऐसपैस गप्पा या पुस्तकात बाई म्हणतात की भगवान हा शब्द
प्रथमतः गौतम बुद्धाच्या संदर्भात वापरला गेला. त्याआधी वैष्णव देवांना
भगवान ही उपाधी लावली जात नसे. यावरून भागवत् धर्माची पताका बुद्धानंतर
रोवली गेली असे विधान करता येईल का?
गांधारात हिंदु देवतांच्या मूर्ती आढळत नाहीत या वाक्यावर अधिक शोध
घेण्याचा प्रयत्न केला परंतु फारसे हाती लागले नाही. वैष्णव धर्म
प्रस्थापित होण्याआधी शिवाची किंवा दुय्यम देवतांची पूजा होत असे का ते ही
कळले नाही. परंतु याचा अर्थ गांधारात हिंदु देवता आढळत नाहीत असा नाही.
कदाचित, ज्या प्रकारे बौद्ध लेणी खणली गेली तसा प्रयत्न हिंदु देवतांसाठी
झाला नसावा कारण मुख्य धर्म बौद्ध होता.
गांधार या विकी
लेखावर बुद्धाच्या सर्व मूर्ती पहिल्या शतकापासून पुढे दिसतात. गांधारात
त्या सुमारास हिंदु मूर्तीही आहेत. परंतु त्या हिंदुशाही दरम्यान कोरल्या/
घडवल्या गेल्या असतील असे मानण्यास जागा आहे.
मध्यंतरी इंडिएनापोलिस आर्ट म्युझियममध्ये गांधारातील पहिल्या शतकातील
उजव्या सोंडेचा गणेश आढळला. विष्णूचे दशावतारही आढळले. इतरत्रही गांधारातील
हिंदू देवांच्या मूर्ती असणे शक्य आहे.
गणपतीच्या गांधारातील मूर्तीबाबत 'लोकदैवतांचे विश्व' या
रा.चिं.ढेरेलिखित पुस्तकात उल्लेख आहे. वर तुम्ही दिलेल्या फोटोत तीच
मूर्ती असण्याची शक्यता आहे.
या मूर्तीमुळे गणपती देवतेची उपासना आणखी मागे जाते असे ते म्हणतात. (या
देवतेचे नावही 'पील' या (फारसी?) शब्दावरून आलेले आहे की पील हा शब्द
भारतातून फारसीत गेला?)
आणखी माहिती -
रा.चिं.ढेरे म्हणतात -
"हाल सातवाहनाच्या 'गाथासप्तशती'मध्ये गणेशाचा निर्देश असूनही गणेशोपासना
सातवाहन काळाइतकी प्राचीन नाही असे म्हटले जात होते. परंतु आता
ख्रिस्तपूर्व वाङ्मयीन आणि पुरातत्वीय प्रमाणांनीच गणेशोपासनेची प्राचीनता
सिद्ध होत आहे."
"ह्यू-एन्-त्संग सध्या काफिरीस्तान
नावाने ओळखल्या जाणार्या भागात असलेल्या कपिशा नगरीत काही महिने राहिला
होता. त्याने प्रत्यक्ष निरीक्षणातून अशी माहिती दिली आहे की हत्तीच्या
स्वरूपात नांदणारा 'पिलुसार' नावाचा देव कापिशीवासियांचा प्रमुख देव असून
तो नगराच्या उत्तारेस असलेल्या 'पिलुसार' नावाच्याच पर्वतावर रहात आहे." -
(इ.स्.~६००)
तसेच या कालातील (अफगाणिस्तानात सापडलेल्या) गणेश मूर्तीचे पुरावेही ढेरे
देतात.पिलुसार नावाचे केरळमधील गणेशाच्या 'पिळ्ळैयार' या नावाशी साधर्म्य
ते नमूद करतात. पुढे -
"परंतु ह्यू-एन्-त्संगच्या माहितीस अत्यंत प्रबळ आणि प्राचीन पुरावा
खुद्द कपिशा नगरीतच उपलब्ध झालेला आहे. कपिशा येथील पुरातत्त्वीय पाहाणीत
आणि उत्खननात काही विशिष्ट प्रकारची नाणी उपलब्ध झालेली आहेत. त्या
नाण्यांवर उजवीकडे एका पुरुष दैवताची आकृती सिंहासनाधिष्ठीत दाखवली असून,
डाव्या बाजूला हत्तीचे शीर आणि वरच्या बाजूस डोंगर व 'कवि(पि)शि ये नगरदेवता' अशी
अक्षरे खरोष्टी लिपीत आहेत. ही नाणी ग्रीक राजा युक्रेडायटीस याची असून
त्याचा मान्य राज्यकाळ ख्रिस्तपूर्व १७१-१५० असा आहे. अर्थातच
युक्रेडायटीसला ज्याअर्थी स्थानिक नगरदेवतेला आपल्या नाण्यांवर अंकित करावे
लागले, त्याअर्थी ती तेथील लोकांची त्याहूनही पुरातन अशी लोकप्रिय देवता
असली पाहिजे, हे उघड आहे."
"या भागात (कपिशा - पुष्करावती
- गांधार) अलेक्झांडरच्या काळी (ख्रिस्तपूर्व चौथे शतक) हस्तिक नावाची
जमात रहात होती आणि अलेक्झांडरच्या स्वारीच्या वेळी पुष्करावती या
हस्तिकांच्या नगरीत हस्ति नावाचाच राजा होता असे समकालीन ग्रीक
इतिहासकारांच्या साक्षीवरून दिसून येते.".
इ.इ.
प्रियाली यांच्याकडून इंडिएनापोलिस आर्ट म्युझियममधल्या गणेशाबद्दल अधिक माहितीची अपेक्षा.
नरहर कुरुंदकरांचे म्हणणे असे आहे की -
कंसाचे वडील उग्रसेन ही केवळ व्यक्ती नसून राज्यपद्धती आहे - भारतातील
प्राचीन गणतंत्र. यात कृष्ण हा वसुदेवाचा मुलगा. वसुदेव हा उग्रसेनाचा
मंत्री.
भारतीय उपखंडात गोधनाशी संबंधित व्यवसाय असलेले जे गणतंत्र मथुरेच्या भागात
होते त्याला जरासंधामुळे धक्का बसला. जरासंधाने तेथे राजेशाही आणण्यासाठी
कंसाला आपल्या मुली देऊन आपल्या बाजूला करून घेतले. पुढे जरासंधांचे
उच्चाटन करण्यासाठी श्रीकृष्ण मागे लागला त्याचे कारण गणतंत्राची पुन्हा
स्थापना करण्यासाठी. जरासंधाचे साम्राज्य विस्ताराचे धोरण असल्याने
कृष्णाला त्याच्या राजधानीपासून दूर असे द्वारकेला स्थानांतर करावे लागले.
कृष्णाशी संबंधित सर्व गोष्टींचा अतिशय वेगळा अर्थ लावण्याचे काम
कुरुंदकरांनी केले आहे.
शूरसेन हा या कुळातील राजा (किंवा महाजनपदातील नेता) इ. स.पूर्वी सहावे
शतकात होता. ह्याचे उल्लेख बौद्ध नोंदींमध्ये तसेच ग्रीक नोंदीमध्ये आले
असल्याचे विकीवरून कळते.
याचा अर्थ महाभारत रचण्याचा काळ हा इ.स.पूर्व सहाव्या शतकानंतर असावा
असे धरता येऊ शकते का? महाजनपदे अस्तित्वात होती, त्यांच्यात भांडणे असणे
शक्य आहेच.
आता माझे थोडे जर तर -
कृष्णाचे मूळ कुठचे हे बहुदा वृष्णी कूळ इथपर्यंत नक्की सांगता येऊ शकते
असे वाटते. गणतंत्र मथुरेला होते. येथे वृष्णी कुळ अस्तित्त्वात होते
ह्याबद्दल पुरावे आहेत. हे कूळ बहुदा चंद्रवंशीय समजले जाते. सूर्यवंशीय
नाही. आता ययातीच्या देवयानीपासून झालेला यदू या मुलाची ही संतती असे
समजले जाते. नहुषपुत्र ययाती हा ऋग्वेदात एक सूक्तकर्ता म्हणून येतो.
म्हणजे ययाती हा ऋग्वेदापासून माहिती आहे. परंतु त्याची ब्राह्मण पत्नी
देवयानी हिच्यापासून झालेल्या यदुची संतती क्षत्रिय आहे. हा सर्व भाग
सोडून दिला तरी वृष्णिंचा काळ हा ऋग्वेद रचल्यानंतरचा असावा. कौटिल्य,
पाणिनी आणि महाभारत सर्व वृष्णींचा उल्लेख करतात. महाभारतात त्यांना
व्रात्य आणि कौटिल्य त्यांना संघ असे संबोधले आहे असे विकीवर आहे. यामुळे
कृष्ण ज्या यादवांपैकी एक होता, ते एतद्देशीय असावेत. यात वृष्णींचे एक
नाणे आहे त्यावर अर्धा सिंह आणि अर्धा हत्ती असलेले नाणे आहे. हत्ती ह्या
प्राण्याचे महत्त्व भारतीय उपखंडातले असावे - बाहेर हा प्राणी नेहमीच्या
पाहण्यातला नसावा.
@ प्रमोद सहस्त्रबुद्धे : @पौंड्र वासुदेव - तर याबद्दल कुरुंदकर
म्हणतात - पौंड्र वासुदेवाला कृष्णाचा आक्षेप त्याला वासुदेव व्हायचे होते
हा नाही. याचा आक्षेप अरण्यपर्वात १७-१८ व्या श्लोकात वर्णलेला आहे की "हा
पौंड्र वासुदेव दुर्मती आहे, तो स्वतःला पुरुषोत्तम म्हणवतो, माझी चिन्हे
धारण करतो. म्हणजे कृष्णाचा दावा आपण वासुदेव आहोत असा नसून परमेश्वर आहोत
असा आहे. ... एकूण वासुदेव होण्याचा प्रयत्न करणे नामक प्रकरणच कल्पित आहे
त्याला पुरावा नाही."
@चंद्रशेखर, असा निष्कर्ष मी काढणारा कोण? (म्या पामरे ऐसा निष्कर्ष कैसा काढावा?)
मिथ्राडेटस-१ बद्दल माझे वाचन नाही.
'हेलिओडॉरस हा भागवत होता' हे माझे स्वतंत्र मत नाही. ते साक्षेपी पुरालेखतत्त्वज्ञांचे मत आहे, जे मला पटते.
आणि जर आपल्याला अजूनही असे वाटत असेल की 'हेलिओडॉरस हा भागवत नव्हता' तर तुमच्याशी मी असहमत आहे. मी कोणी इतिहासतज्ञ नाही. "महाजनौ येन गतः सः पंथः" - थोरामोठ्या इतिहासकारांनी अनेक मते आधीच व्यक्त केलेली आहेत.
माझी अवस्था "इतिहासकारांते वाट पुसतु" अशी आहे. आणि त्यांनी दाखवलेली योग्य वाट मला दिसेलच अशी खात्री (मी ज्ञानेश्वरही नसल्याने)
देता येत नाही. तेव्हा प्रत्येकाने आपला निष्कर्ष आपण काढावा हे बरे.
असो. आपला खोडकरपणा आवडला.
गोयष्टी धारक हेराक्लिज मित्रदत्ताच्या नाण्यांवर दिसला म्हणून
मित्रदत्ताने वैष्णव होण्याची गरज नाही. :-) त्या हेराक्लिजवरून चंद्रशेखर
यांनी काढलेले अनुमान आणि माझे अनुमान निराळे आहे. माझे अनुमान असे -
मित्रदत्ताच्या राज्यात गोयष्टीधारक हेराक्लिजला विशेष महत्त्व असावे.
नाण्यावरील त्याची मूर्ती एखादा प्रसंग दाखवते असे दिसत नसल्याने कदाचित एक
पूजनिय देवता म्हणून हेराक्लिजला नाण्यावर स्थान मिळालेले असावे.
आता या हेराक्लिजची पार्श्वभूमी अलेक्झांडर पासून सुरू होते. ती अशी आहे
की सिकंदर जेव्हा भारतात पोहोचला तेव्हा त्याच्या समोर अनेक प्रश्न उभे
होते. त्याची सेना थकलेली होती. अलेक्झांडरने पर्शियन सैनिकांना सैन्यात
भरती केल्याने, आपला पोशाख त्यांच्याप्रमाणे बदलल्याने आणि इतर अनेक
कारणाने सेना त्याच्यावर रुष्ट होती. अलेक्झांडरला भारत, भारतातील
परिस्थिती, हवामान-भूगोल याची फारच कमी माहिती होती. पुरु बरोबर झालेल्या
युद्धात अलेक्झांडर जबर जखमी झाला होता. अशावेळी जास्तीत जास्त राजे
युद्धाशिवाय शरणागती पत्करतील तर त्याच्या पथ्यावर पडणारे होते. यासाठी
त्याने आपण परकीय नसून आपली मूळे एतद्देशीय आहेत असा समज पसरवण्यास सुरूवात
केली. यासाठी हेराक्लीज आणि डिओनायसस या दोन देवतांचा वापर करण्यात आला.
हेराक्लीज हा कृष्ण असून डिओनायसस हा शंकरस्वरूप असल्याचे अलेक्झांडरच्या
गोटातून सांगण्यात आले. (हा शैव आणि वैष्णव या दोन्ही गटांचा पाठिंबा मिळवण्याचा प्रयत्न असावा. [कंसातील टिप्पणी माझे मत]) (संदर्भः अरायन)
अलेक्झांडर हा झ्यूसपुत्र असल्याने तो कृष्णाच्याच परिवारातला असे
सांगण्याचा प्रयत्न केला गेला आणि हेराक्लिजला स्थानिक देवतेचे स्वरूप
देण्याचाही. तोच हा गोयष्टीधारक हेराक्लिज असावा.
पुढे इंडो-ग्रीक राजांनी बौद्ध धर्म स्वीकारला तरी त्यांची जनता हिंदू
धर्माचे पालन करत असणेही शक्य आहेच. सरसकट बौद्धकरण झाले नसावे.
बौद्धधर्मीय राजांनी हिंदू धर्मीय प्रजेवर अत्याचार केले अशा नोंदीही
नाहीत. अशात ग्रीक देवतेचे हिंदू स्वरूप मित्रदत्ताच्या नाण्यावर असण्यात
काहीच वावगे वाटत नाही.
गोयष्टी धारक हेराक्लिज
मित्रदत्ताच्या नाण्यांवर दिसला म्हणून मित्रदत्ताने वैष्णव होण्याची गरज
नाही. :-) त्या हेराक्लिजवरून चंद्रशेखर यांनी काढलेले अनुमान आणि माझे
अनुमान निराळे आहे.
प्रियाली म्हणते तसे कोणतेच अनुमान मी काढलेले नाही. माझा मुद्दा असा होता
की एखाद्या पुरातन राजाच्या राज्यात त्या राज्यात रहाणार्या नागरिकांच्या
धर्माशी संबंध जोडता येणे शक्य होईल अशी एखादी पुरातनवस्तू सापडली की लगेच
ते राज्य व शासक हे दोन्ही त्या धर्माचे पुरस्कर्ते होते असे म्हणणे योग्य
नाही. यासाठी बर्याच जास्त संशोधनाची आवश्यकता गरजेची वाटते.
चन्द्रशेखर
Learning is not compulsory... neither is survival.
विसूनाना, प्रियाली, चंद्रशेखरजी आणि मित्रहो,
काही फुटकळ निरीक्षणे नोंदवतो. अर्थात ती अवांतर वाचनातून लक्षात राहिली असल्याने अपुरी (किंवा चुकीचीही) असू शकतील.
सम्राट अशोकाने बौद्ध धर्म स्वीकारल्यावर मौर्य कुळातील मधले काही राजे
जैनधर्मीय होते, याची निश्चित माहिती उपलब्ध आहे का? मगधाचा शेवटचा मौर्य
सम्राट ब्रुहद्रथ हा बौद्ध होता. त्याचवेळी शेजारी कलिंगाच्या गादीवर
असलेला खारवेल मात्र जैनधर्मीय होता. राजे जरी अहिंसेचा पुरस्कार करणारे
असले तरी मगध आणि कलिंग या देशांनी सैन्य मात्र सुसज्ज राखले होते आणि ही
सैन्ये वैदिक क्षात्रधर्माचे पालन करणारी होती. त्यावेळी या प्रदेशात एवढे
राजकारण एकवटले होते, की मुत्सद्दीपणाची कमाल लागली होती. मगध राज्यावर
कितीजणांचा डोळा होता ते पाहा.
सगळ्यात पहिले ग्रीक (त्या काळात परदेशातून आलेल्यांनाच यवन संबोधत असत.
बौद्धांना यवन म्हटले जात नसे. पुढील काळात मुसलमानांसाठीही यवन ही संज्ञा
वापरली गेली, पण अधिक अचूकपणे मुस्लिम आक्रमणकर्त्यांना म्लेंच्छ म्हणत
असत.) ग्रीकांचा प्रमुख मिन्यांडर (मिलिंद) हा बौद्ध धर्माचा अभ्यासक या
बुरख्याखाली मगधाचा घास घ्यायला टपून बसला होता. ब्रुहद्रथ हा हलक्या
कानाचा आणि विलासात मग्न सम्राट होता. त्याला मिन्यांडरने एका रुपवान ग्रीक
नर्तकीच्या नादाला लावले होते. ब्रुहद्रथ जरी सम्राट असला तरी मगधाचे
प्रशासकीय निर्णय राजप्रतिनिधीं आणि मगधाच्या मांडलिक राजांचा समावेश
असलेली संघटना म्हणजेच 'चंद्रगुप्तसभा' घेत असे आणि तो निर्णय मानणे
सम्राटावर बंधनकारक असे. तर चंद्रगुप्ताच्या साम्राज्याचा आयता घास
घेण्याची संधी मिन्यांडरला सोडायची नव्हती.
दुसरा बोका म्हणजे कलिंगराज खारवेल. मगध आणि कलिंगात कायम हिंसक संघर्ष
होत असे. अशोकाच्या काळात तर कलिंगाची अख्खी सेनाच गारद झाली होती. ते जुने
वैभव पुन्हा मिळवून देण्याची संधी खारवेल बघत होता. त्याला ऐतिहासिक सूड
उगवायचा होता. पुष्यमित्राला हे माहित होते. खारवेलाने मगध राजकारणात
हस्तक्षेप करावा आणि त्यायोगे ग्रीकांच्या हालचालींवर नजर ठेवणारी एक प्रबळ
शक्ती असावी, म्हणून पुष्यमित्राने धूर्तपणे एक डाव खेळला. त्याने ठरवून
एका हेराला अपमान करुन मगधाबाहेर हाकलून दिले. या हेराने खारवेलला जाऊन
सांगितले, की कलिंगाच्या मालकीची असलेली भगवान तथागतांची रत्नजडीत प्रतिमा
एका युद्धात मगधाने लुटून नेली आहे आणि ती अप्रतिम आहे. त्यामुळे खारवेलाने
ती प्रतिमा आपल्या ताब्यात मिळावी म्हणून ब्रुहद्रथाशी बोलणी सुरु केली.
यानिमित्ताने खारवेलचाही चंचुप्रवेश मगध राजकारणात झाला.
तिसरा बोका म्हणजे आंध्रराज शातकर्णी. हा जरी मगधापासून लांब असला तरी
त्याला स्वतःच्या राज्याची सीमा उत्तरेत वाढवायची होती. त्यामुळे तो
सावधपणे या राजकारणावर नजर ठेऊन बसला होता.
या स्थितीत मगधाच्या हिताचे रक्षण करण्यासाठी सावध असलेल्या काही
व्यक्ती होत्या. त्या म्हणजे राजगुरु पतंजली, सेनापती पुष्यमित्र, त्याचा
मुलगा अग्निमित्र आणि नातू वसुमित्र. पुष्यमित्र हा वृद्ध होता. त्याने
सम्राट ब्रुहद्रथाला अंगाखांद्यावर खेळवले होते. त्याने अनेकवेळेला
ब्रुहद्रथाला धोक्याचे इशारे दिले आणि ग्रीकांच्या कच्छपि न लागण्यास
सांगितले, पण ब्रुहद्रथ इतका वेड्यासारखा वागत होता, की मगधाचे स्वातंत्र्य
संपणार हे दिसून येत होते. पुष्यमित्राने ठरवून आणि स्वतःच्या
स्वार्थासाठी ब्रुहद्रथाला मारले नाही. वार्षिक सैन्य संचलनात (चतुरंग
दळाचे व मगध सामर्थ्याचे प्रदर्शन) सम्राट ब्रुहद्रथ अगदीच वेड्यासारखा
वागला. त्याने सर्व सैनिकांना हत्यारे गंगेत विसर्जित करुन आणि मुंडण करुन
भिक्षू बनण्याचे आवाहन केले. सैन्य काही बौद्ध नव्हते. त्यांना
क्षत्रियधर्माची निंदा सहन झाली नाही आणि ते बिथरले. त्यानंतर ग्रीक
यवनीच्या नादाने ब्रुहद्रथाने राज्यकारभार चालवणे सुरु केले. हा चंद्रगुप्त
सभेचा अपमान होता. सम्राटाच्या देशद्रोही वर्तनावर निर्णय घेण्यासाठी
चंद्रगुप्त सभेची बैठक झाली त्यातही ब्रुहद्रथाने चक्क ही सभा कायमसाठी
विसर्जित करण्याचा निर्णय जाहीर केला. त्यामुळे चंद्रगुप्त सभेने एकमताने
कौल दिला, की 'सेनापतीने या जुलमी आणि देशद्रोही राजाचा वध करावा.'
पुष्यमित्राला ती आज्ञा अमलात आणावी लागली.
दरम्यानच्या काळात पुष्यमित्राचा मोठा नातू सुमित्र हाही ग्रीक यवनीच्या
आणि ब्रुहद्रथाच्या नादी लागून वाया गेला आणि एका हल्ल्यात मारला गेला. या
खुनाखुनीच्या राजकारणाने रागावून आणि मुलगा गेल्याच्या दु:खाने निराश होऊन
पुष्यमित्राचा मुलगा अग्निमित्र हा आपल्या मालव राज्यात निघून गेला.
ब्रुहद्रथ निपुत्रिक असल्याने मगधाला वारस नव्हता आणि पुष्यमित्र वृद्ध
असल्याने त्याला सम्राट होण्यात रस नव्हता. त्यामुळे पुष्यमित्राचा तरुण
नातू वसुमित्र हा मगधाचा सम्राट झाला. अशारीतीने मौर्य घराणे जाऊन त्याजागी
शुंग घराण्याची सत्ता आली. हे सत्तांतर मगधाला अनुकूल ठरले कारण
वसुमित्राने लगेचच अश्वमेध् यज्ञ केला आणि खारवेल तसेच शातकर्णीला युद्धात
हरवून मगधाचा दरारा पुन्हा स्थापित केला.
पुष्यमित्र वैदिक धर्माचा पुरस्कर्ता होता खरा आणि बौद्ध धर्माची अवनती
मगधाच्या स्वातंत्र्याचा घास घेणार, हे त्याला दिसत होते. त्यामुळे त्याने
क्रांती घडवली ती खरे तर मगधाच्या हितासाठी. वैदिक धर्माची पुनर्स्थापना
वगैरे हेतू त्याला अभिप्रेत नव्हता. पुढे ते आपोआपच घडले. (त्या काळात
हिंदू हा शब्दप्रयोग नव्हता. तो बर्याच नंतर रुढ झाला. त्यावेळी वैदिक
धर्म म्हणले जात असे.)
पुष्यमित्राबद्दल माहितीसाठी धन्यवाद. हे संदर्भ तुम्हाला कोठे
मिळाले त्याबद्दल आठवते का काही? मला पुष्यमित्राबद्दल माहिती फार पूर्वी
(कॉलेजातील लायब्ररीत) एका बौद्ध साहित्यातून मिळाली होती परंतु बौद्ध
साहित्यात पुष्यमित्राला बराच दोष दिल्याने आणि पुढे तो अतिशयोक्त असल्याची
टीका वाचल्याने खरी गोष्ट कळत नाही.
पुष्यमित्र वैदिक धर्माचा पुरस्कर्ता होता खरा आणि बौद्ध
धर्माची अवनती मगधाच्या स्वातंत्र्याचा घास घेणार, हे त्याला दिसत होते.
त्यामुळे त्याने क्रांती घडवली ती खरे तर मगधाच्या हितासाठी. वैदिक धर्माची
पुनर्स्थापना वगैरे हेतू त्याला अभिप्रेत नव्हता. पुढे ते आपोआपच घडले.
हे आपोआप कसे घडले हाच प्रश्न आहे कारण भारतातून बौद्ध धर्म सुदूर
गांधार, तिबेट, बॅक्ट्रिया, श्रीलंका, आग्नेय आशिया वगैरे मध्ये पसरला.
वायव्य भाग सोडता इतर देशांत तो आजही आढळतो. वायव्येला नष्ट झाल्याचे कारण
इस्लाम परंतु भारतात त्याचे समूळ उच्चाटन व्हावे अशी परिस्थिती आपोआप आली
असावी असे वाटत नाही. पुष्यमित्राने असे केले नाही तर हे उच्चाटन कोणी व का
केले असा प्रश्न पडतो.
शुंग राज्यकाळ इतका मोठा नाही की तो भारतातील बौद्ध धर्माचे समूळ
उच्चाटन करू शकेल आणि शुंगांनंतरही अतिशय प्रबळ असे बौद्ध राजे होऊन गेले
(उदा. कनिष्क आणि हर्षवर्धन) तरीही बौद्ध धर्माला अशी अवकळा येण्याचे कारण
हिंदू धर्माने आवळलेले आपले पाश असावेत. याकाळात हिंदू धर्म कर्मठ झाला,
त्याने बौद्ध धर्मातून प्रतिके स्वीकारली आणि शेवटी बुद्धाला विष्णूचाच
अवतार करून बौद्ध धर्माला तिलांजली देण्यास मदत केली असावी. चू.
भू.द्या.घ्या.
त्या काळात हिंदू हा शब्दप्रयोग नव्हता. तो बर्याच नंतर रुढ झाला. त्यावेळी वैदिक धर्म म्हणले जात असे.
हे बरोबर आहे. मला वरचे प्रतिसाद लिहिताना स्वतःलाच हा शब्द खटकत होता पण वैदिक धर्म हा शब्द वेळीच आठवला नाही.
अवांतरः बौद्ध धर्माची परिस्थिती गेल्या
शतकात कशी होती त्याबद्दल धर्मानंद कोसंबींची टिप्पणी कालच वाचली. खरेतर या
विषयावर नवी चर्चा सुरु करायला पाहिजे पण येथेच देते.
मला वाटले बुद्धगया बौद्धांच्या ताब्यात आहे. पण येथे वेगळाच प्रकार
दिसून आला. मठांत शिरल्याबरोबर बाहेरच्या बाजूला बैल, उंट, घोडे वगैरे
जनावरे बांधलेली होती. आत जाऊन पाहतो, तो एका बाजूस देवीची मूर्ती होती व
तिची त्यावेळी शंखानादयुक्त पूजा सुरू होती. महंताचे मुख्य शिष्य देवीच्या
शेजारी ओसरीवर हुक्का पीत बसले होते.
लेख आवडला. या धाग्यावरची चर्चा खरोखरच अतिशय अभ्यासपूर्ण व
उपक्रमच्या दर्जाला साजेशी झाली आहे. या इतिहासा संबंधी जास्त माहिती
नसल्याने मला फारसे काही लिहिता आले नाही. वाचनालयातून पुस्तके आणून या
कालाबद्दल वाचन केले पाहिजे असे वाटते.
चन्द्रशेखर
Learning is not compulsory... neither is survival.
या प्रतिसादाने चर्चेत मोलाची भर घातली आहे. (फुटकळ निरीक्षणे नव्हेत.)
फक्त काही संदर्भ दिले असते तर आणखी चांगले झाले असते.योगप्रभू यांच्याकडून संदर्भांची आणि अधिक माहितीची अपेक्षा.
आणखी काही माहिती-
१. पुष्यमित्र शुंग हा मगधाचा राजा झाला तरी त्याच्या राज्यकालातील
शीलालेखात त्याचा उल्लेख 'सेनापती' असाच आढळतो. (संदर्भ -'भारतीय
पुरालेखोंका अध्ययन' हेच डॉ. शिवस्वरूप सहाय यांचे पुस्तक) (शंका - असे का
असावे?)
२. संप्रति हा अशोकाचा नातू जैन होता. त्याला जैन अशोक असेही म्हटले जाते. (संदर्भ - पूर्वीचे वाचन आणि विकी)
त्याचा उत्तराधिकारी शालिशुक हाही जैन होता.
३.
अशावेळी जास्तीत जास्त राजे युद्धाशिवाय शरणागती पत्करतील
तर त्याच्या पथ्यावर पडणारे होते. यासाठी त्याने आपण परकीय नसून आपली मूळे
एतद्देशीय आहेत असा समज पसरवण्यास सुरूवात केली. यासाठी हेराक्लीज आणि
डिओनायसस या दोन देवतांचा वापर करण्यात आला. हेराक्लीज हा कृष्ण असून
डिओनायसस हा शंकरस्वरूप असल्याचे अलेक्झांडरच्या गोटातून सांगण्यात आले
. +
ग्रीकांचा प्रमुख मिन्यांडर (मिलिंद) हा बौद्ध धर्माचा अभ्यासक या बुरख्याखाली मगधाचा घास घ्यायला टपून बसला होता
.-
या प्रियाली यांच्या वरीलपैकी एका प्रतिसादावरून आणि योगप्रभूंच्या मिन्यांडरवरील मतावरून असे वाटते की -
यवन क्षत्रप किंवा बाल्हिक (बॅक्ट्रियन) राजांनी येथील जनतेस गाफिल ठेवून
निर्वेधपणे राज्य करण्यासाठी आपण बौद्ध असल्याची भूमका सामान्य जनतेत उठवली
असावी. मिन्यांडरची खरोष्टी लिपीतली नाणी (एतद्देशियांना समजणारी लिपी)
जरी त्याचा 'महाराजस धर्मिकस' असा उल्लेख करून त्याच्या बौद्ध निष्ठेची
ग्वाही देत असली तरी ग्रीक लिपीत असलेल्या नाण्यावरील अथेना,निकी/नाइकी या
देवतांचे छाप त्याची ग्रीक देवतांशीही असलेली जवळीक दाखवतात. (हे मत
योग्य असावे का? )
४. विदिशा येथील शुंग घराण्याच्या राज्याला कालिदासाच्या 'मालविकाग्निमित्र'
या नाटकानेही आधार मिळतो. या नाटकातील नायक 'अग्निमित्र' हा पुष्यमित्राचा
मुलगा अग्निमित्र होय. ही कथा घडते तेव्हा अग्निमित्र विदिशेचा राज्यपाल
असतो.
एक तर पुष्यमित्र हा विश्वासघातकी नव्हता. तो मौर्य घराण्याशी
एकनिष्ठ होता. त्याच्यावर सेनापती म्हणून मगध राज्याच्या रक्षणाची जबाबदारी
होती. ती त्याने शेवटपर्यंत निभावली. ब्रुहद्र्थाला मारायचे आणि सत्ता
हस्तगत करायची, हेही त्याचे ध्येय नव्हते. ब्रुहद्रथाला त्याने
लहानपणापासून अंगाखांद्यावर खेळवले होते. त्यामुळे मगधाचा सम्राट
व्यसनांच्या आणि भोगांच्या मागे लागून अंतिमतः ग्रीकांच्या कुटील डावाला
बळी पडणार आणि मगध साम्राज्याचा नाश होणार या काळजीने पुष्यमित्र व्यथित
होता. त्याने सम्राट ब्रुहद्रथाला वारंवार धोक्याचे इशारे दिले होते, पण
ब्रुहद्रथ बेफाम झाला होता. अखेर त्याने नको ती चूक केली. अगदी सम्राट
अशोकापासून मौर्य घराण्यातील अनेक राजांचा धर्म बौद्ध किंवा जैन असला तरी
या राजांनी राज्यसंरक्षणासाठी सैन्य सज्ज ठेवले होते. त्याचप्रमाणे
जनतेच्या धर्मात ढवळाढवळ केली नव्हती. ब्रुहद्रथाने मगधाच्या सैन्यालाच
बौद्ध होण्याचे आवाहन केले आणि शस्त्रे गंगेत बुडवून पिवळ्या छाट्या परिधान
करुन सैनिकांनी भिक्षू व्हावे, अशी बडबड केली. शस्त्रांची निंदा क्षत्रिय
सहन करत नाहीत त्यामुळे सैन्य बिथरले, पण सेनापती असलेल्या पुष्यमित्राने
त्यांना आवरले. यानंतर ब्रुहद्रथाच्या देशद्रोही वर्तनावर निर्णय
घेण्यासाठी चंद्रगुप्तसभा बोलवण्यात आली. ही चंद्रगुप्तसभा अगदी
चंद्रगुप्ताच्या काळापासून रुढ झाली होती. सम्राटाने सर्वांच्या सहमतीने
निर्णय घ्यावा म्हणून चाणक्यानेच या राजप्रतिनिधी सभेची घडी बसवून दिली
होती. ही प्राचीन परंपरा असलेली प्रतिनिधी सभा विसर्जित करण्याचे
ब्रुहद्रथाने जाहीर केले. त्याने सभेबाबत तुच्छतेचे उद्गार काढले त्यामुळे
या सभेचे जवळपास ३००-४०० सदस्य संतप्त झाले आणि त्यांनी एकमुखाने 'या जुलमी
राजाचा वध करा' असा आदेश सेनापती पुष्यमित्राला दिला. पुष्यमित्राने या
अंतिम क्षणीही ब्रुहद्रथाची समजूत काढण्याचा प्रयत्न केला, परंतु ब्रुहद्रथ
माफी मागायला तयार नव्हता. पुष्यमित्राला नाईलाजाने तो आदेश अमलात आणावा
लागला कारण तोसुद्धा अखेर मगधाचा सेवक होता. खरे तर पुष्यमित्र या वेळेस
वृद्ध झाला होता. त्याचा मुलगा अग्निमित्र हा प्रौढ म्हणजे पस्तिशीच्या
पुढचा तर नातू वसुमित्र हा कोवळा म्हणजे १६-१७ वर्षांचा होता. या वयात
पुष्यमित्राला सम्राट होण्याची लालसा नव्हती.
ब्रुहद्रथाच्या मृत्यूनंतर तो निपुत्रिक असल्याने चंद्रगुप्त सभेने
पुष्यमित्राला सम्राट होण्याची विनंती केली, पण आपण सेनापती आहोत आणि
सेनापतीच राहू, असे त्याने निक्षून सांगितले. म्हणून त्याजागी वसुमित्राची
निवड झाली. मगधातील राजकारणाला कंटाळून अग्निमित्र आणि त्याची पत्नी धारिणी
हे मालव राज्यात (माळवा) राजधानी विदिशा (उज्जैन) येथे निघून गेले.
त्यांना वसुमित्रालाही बरोबर न्यायचे होते, परंतु पुष्यमित्र व महामुनी
पतंजली यांनी धारिणीची समजूत काढली. वसुमित्र सम्राट झाल्यावर मगध सैन्यासह
दिग्विजय करायला गेला. त्याने युद्धात विजयश्री मिळवल्यावर आणि मगधच्या
शत्रूंचा बंदोबस्त झाल्यावर मगच पुष्यमित्राने वानप्रस्थाश्रम स्वीकारला
आणि तो मरेपर्यंत मातृभूमी मगधातच राहिला.
यवन क्षत्रप किंवा बाल्हिक (बॅक्ट्रियन) राजांनी येथील
जनतेस गाफिल ठेवून निर्वेधपणे राज्य करण्यासाठी आपण बौद्ध असल्याची भूमका
सामान्य जनतेत उठवली असावी. मिन्यांडरची खरोष्टी लिपीतली नाणी
(एतद्देशियांना समजणारी लिपी) जरी त्याचा 'महाराजस धर्मिकस' असा उल्लेख
करून त्याच्या बौद्ध निष्ठेची ग्वाही देत असली तरी ग्रीक लिपीत असलेल्या
नाण्यावरील अथेना,निकी/नाइकी या देवतांचे छाप त्याची ग्रीक देवतांशीही
असलेली जवळीक दाखवतात. (हे मत योग्य असावे का? )
असे नसावे. या राजांनी बौद्ध धर्म स्वीकारला असावा परंतु त्यांची जनता
ही बौद्ध आणि वैदिक धर्म मानणारी होती. यवन/ग्रीक हे आधीपासूनच मूर्तीपूजा
करणारे. आपल्या संस्कृतीचा प्रचंड अभिमान असणारे. ते अचानक आपली संस्कृती
सोडून देतील असे वाटत नाही. त्यांनी दोन्ही संस्कृतींचा मिलाफ करून आम्हीही
तुमच्यातलेच असे सांगण्याचा प्रयत्न केला असावा. तसे केल्याने एका वेगळ्या
वंशाच्या, धर्माच्या आणि आचारांच्या जनतेवर राज्य करणे सुकर झाले असावे.
चू. भू. दे. घे.
त्यांनी दोन्ही संस्कृतींचा मिलाफ करून आम्हीही
तुमच्यातलेच असे सांगण्याचा प्रयत्न केला असावा. तसे केल्याने एका वेगळ्या
वंशाच्या, धर्माच्या आणि आचारांच्या जनतेवर राज्य करणे सुकर झाले असावे.-
-कदाचित त्यांनी (नागसेनासारख्या बौद्ध धर्मपंडिताला हाताशी धरून/
त्याला संतुष्ट करून) 'आम्ही तुमच्यातलेच' असे दाखवण्याचा प्रयत्न केला. -
त्यामुळे जनतेस गाफिल ठेवून निर्वेधपणे राज्य करता आले असावे - वेगळ्या
शब्दात - राज्य करणे सुकर झाले असावे.
बौद्ध धर्मात मांसभक्षणाला परवानगी नव्हती, असे वाटत नाही.
स्वतः बुद्धाचे महानिर्वाण होण्यास शिळे मांस खाण्यातून झालेला अतिसार कारणीभूत असल्याचे मी कुठेतरी वाचले होते.
-असेच म्हणतो.पण शिळे मांस नव्हे - तर एक विशेष पदार्थ - "सूकरमद्दव" - हा लेख खूप माहितीप्रद आहे. (नव्हे, ती लेखमालाच माहितीप्रद आहे.)
तरीही -
बहीण-भावाचा संभोग त्यांना चालू शके. मद्यसेवन, मांसभक्षण
या तर काय, रोजच्याच गोष्टी होत्या. चोरी करणे, लूटमार करणे यात काहीच
वावगे नव्हते, खोटे बोलणेही सर्रास चाले
-असे मीही कोठेतरी वाचले आहे. (कदाचित नंतरच्या वैदिक/ब्राह्मिक
हिंदूंनी या गोष्टी पसरवल्या असतील.)(राम व सीता हे भाऊबहिण -एकमेकांशी
विवाहबद्ध होते असे उल्लेख बौद्ध रामायणात आढळतात. पहा - रिडल्स ऑफ
हिंदुइझम, डॉ. आंबेडकर)
विसुनाना, चर्चाप्रस्ताव आणि प्रतिसादातील माहिती उपक्रमाचा दर्जा
उंचावणारी आहे. काही प्रतिसादात काही लेखन संदर्भ आले असते तर बरे राहीले
असते, असे वाटले. संदर्भ असले की पुस्तके उचकता येतात.
आणि मूख्य माहिती शोधण्यास मदत होते.
वरील चर्चा (मुख्यतः योगप्रभू - विसुनाना -प्रियाली ) उद्बोधक वाटली.
मात्र अनेक मुद्दे पटले नाहीत. मुळात योगप्रभूंचे लिखाण एका कादंबरीवर आधारित असल्याने थोडे अतिरंजित वाटले.
कित्येकदा इतिहासात एका दोन वाक्येच मिळतात. (उदा. गरुडध्वज हा
शिलालेख.) अशा एकदोन वाक्यावरून अंदाज बांधावे थोडेफार परिस्थितीचे
रिकन्स्ट्र्क्शन करावे हे साहजिक आहे. त्याचवेळा मूळ स्रोतांना बाधा येत
नाही हे बघितले जाते. चांगले इतिहासकार त्याला आपला 'कयास' (सत्य नाही)
असे संबोधतात. कादंबरीत कयास हा सत्यासारखा लिहिला जातो . (चांगल्या
कादंबरीत त्यावर तळटीपातून टिप्पणी केली जाते ती गोष्ट वेगळी.
योगप्रभूंना मिळालेली कादंबरी (फार वाचनीय वाटते आहे. मिळवण्याचे
प्रयत्न करीन.) ही कदाचित पूर्णपणे इतिहासाला धरून आणि कुठले अंदाज आणि
कुठच्या साठी पुरावा आहे हे स्पष्ट करून लिहिली गेली असेल. मात्र
पुष्यमित्र राजा होता. त्याने बृहद्रथाला मारले. (तो स्वत:ला सेनापती
असे म्हणवत असण्याचा पुरावा आहे. पण त्यानंतर त्याची मुले राज्यकारभार करू
लागली. त्याने ब्रुहद्रथाच्या वंशातला अजून कोणाला राजा म्हणून आणले
नाही.) बौद्ध वाङ्मयात या राजाविरुद्ध बरेच लिहिले आहे. या तीन
पुराव्यांवरून मला कादंबरीतील मांडणी पटली नाही. चंद्रगुप्त सभा, राजाचा
बदफैलीपणा (राजे सरळमार्गी असणे हे जवळपास अपवादात्मक असावे. असे माझे मत
आहे.), सैन्याचे वैदिक क्षत्रीय असणे (ब्राह्मण सेनापती असताना.) यांच्या
मागे काही पुरावा आहे का याचा शोध घेणे गरजेचे आहे.
अवांतरः अशीच एक मांडणी हिरण्यकश्यपू
आणि प्रल्हाद (का प्रह्लाद?) यांच्यात केली जाते. हिरण्यकश्यपू देव मानत
नव्हता (?). नरसिंहाने त्याला मारले. त्यानंतर प्रल्हाद राजा झाला.
यातील चमत्काराची घटना (नरसिंहाने हिरण्यकश्यपूस मारले) काढली तर. माझा
कयास असा होतो की प्रल्हादाने हिरण्यकश्यपूस मारले व तो राजा झाला.
गोष्टीत हिरण्यकश्यपूने प्रल्हादाला मारण्याचे प्रयत्न (होळी चा चमत्कार),
त्याने नास्तिक (?) वा विष्णूला न मानणे यात तथ्य असेल किंवा नाही सांगता
येत नाही.
आता धर्माबद्दल. माझ्या वाचनात असे आले होते की स्वतः चंद्रगुप्त
सरतेशेवटी जैन झाला होता. (ही जैन कथा आहे.) मुळात बुद्धाच्या काळी
संसारी माणसाने हा मार्ग चोखाळायचा काही मार्ग होता का? का बुद्धाचा संघ
हा केवळ सर्वसंगपरित्याग केलेल्या लोकांसाठीच होता. (माझ्या मते तसा
होता.) जो संघातील भिख्खुंना मानतो आदरसत्कार करतो तो बौद्ध / जो कधीतरी
संघात जाऊन भिख्खु व्हायची आस धरतो तो बौद्ध. अशी व्याख्या (कदाचित योग्य
असेल) केली तर प्रजा बौद्ध होती अथवा नव्हती असा अर्थ होईल. पण ही संज्ञा
तयार व्हायला वेळ लागेल असे मला वाटते. या करिता प्रजेला आपले रितीरिवाज
टाकावे लागतात. एक उदाहरण म्हणून पौर्तुगिजांनी गोव्यातील धर्मपरिवर्तनाचे
देता येईल. ख्रिश्चन धर्म स्वीकारलेली प्रजा कित्येक हिंदू रिवाज पाळायची
(अ.का.प्रियोळकरांच्या पुस्तकात हे मी वाचले आहे.). हे बंद होण्यासाठी
अगदी साध्या साध्या रिती गुन्हे म्हणून पोर्तुगिजांनी नोंदवले होते.
(त्यांची मोठी यादी पुस्तकात आहे. ) हे एवढ्या काळजीपूर्वक केले नाही तर
दोन धर्मात फरक करणे कठीण जाते. आजही जैन धर्मातील लोक कित्येक हिंदू
देवतांची पूजा करताना दिसतात. बौद्धांची गोष्ट अजून वेगळी नाही. थायलंड
मध्ये गणपती दैवत दिसणे नवीन नाही. भारतात तर बुद्धाला हिंदू केले गेले.
(त्यांची धर्मस्थळे ब्राह्मणांच्या ताब्यात आहेत्.) ज्या एकसंघ रितीने
मुख्यतः कॅथॉलिक धर्म आहे (सर्व नेमणुका, संपत्ती एकत्रित पणे केली जाते.)
त्या एकसंध रितीने भारतातील धर्म अस्तित्वात नव्हते (जाती संस्था मात्र
एकसंघ असाव्यात.). कदाचित आताही नाहीत. अशा वेळी धार्मिक संघर्षाच्या
चश्म्यातून या इतिहासाला पाहता येईल का?
हल्लीच्या काळातील लिंगायत व रामकृष्णांचा धर्म (का कल्ट ) यांना कुठे
घालावे हा प्रश्न कदाचित बुद्धकाळातील बौद्ध धर्माबद्दल विचारता येईल.
या दोन्हीतील काही पुढार्यांचे मत आहे की ते हिंदू नाहीत. भविष्यकाळात
त्यांचा र्हास वा हिंदू धर्माचा र्हास झाला तर आपण आजच्या काळातल्या
संघर्षाने तो झाला असे म्हणण्यासारखे होईल. (आ़ज हिंदू-लिंगायत वा हिंदू
-रामकृष्णी संघर्ष जाणवत नाही)
वरील विवेचन हे कयासात्मक आहे. पण विरुद्ध पुरावा मिळेस्तोवर कदाचित मी तो धरून ठेवेन.
हल्लीच्या काळातील लिंगायत व रामकृष्णांचा धर्म (का कल्ट )
यांना कुठे घालावे हा प्रश्न कदाचित बुद्धकाळातील बौद्ध धर्माबद्दल विचारता
येईल.
हे तितकेसे पटले नाही. याचे कारण बौद्ध धर्म हा झपाट्याने पसरला होता.
तसेच तो अनेक शासनकर्त्यांनी स्वीकारला होता. अशोकाच्या शिलालेखांनुसार या
धर्माचे पालन व्हावे अशी अपेक्षा दिसते. बौद्ध धर्म अशाच झपाट्याने
वायव्येला आणि आग्नेयेला पसरला. पैकी वायव्येचे काय झाले हे सांगायला नको
आणि आग्नेयेत तो अद्यापही टिकून आहे. त्यामु़ळे लिंगायत आणि इतर कल्ट्सशी
बौद्धधर्माची समान तुलना होत नाही असे वाटते. चू. भू. द्या. घ्या.
तुमचा मुद्दा (बुद्ध धर्माच्या व्यापकतेबद्दलचा) हा मान्य आहे.
बुद्ध धर्माची व लिंगायतांची (जरी त्यांची लोकसंख्या भरपूर आहे.) तुलना
होणार नाही.
त्याकाळी बुद्ध धर्म आणि हिंदू धर्म हे दोन्ही आज ज्या स्वरूपात धर्म
बघतो, तसे ते होते का? त्यांच्यात संघर्ष झाला. (संघर्ष हा शब्द मला
हिंसायुक्त वाटतो.) या इंटरप्रिटेशन साठी मला आक्षेप आहे. आज लिंगायत आणि
हिंदू यात संघर्ष जाणवत नाही. या हेतूने लिंगायत धर्माचा माझा उल्लेख
होता. ज्यावेळी बौध्द धर्म झपाट्याने प्रसरत होता त्याच वेळी वासुदेवाचा
वैष्णव धर्म हा देखिल प्रसवत होता. (हा धर्म आज आपण वेगळा मानत नाही ही
गोष्ट वेगळी.) वैदिक (यज्ञयाग) - वैष्णव वा वैष्णव - बौद्ध अशा
संघर्षांबद्दल कोणी बोलत नाही. तसेच लिंगायत - हिंदू संघर्षाचे आहे. असे
काहीसे हे म्हणणे आहे.
प्रमोदजी,
मी दिलेली फूटकळ माहिती अवांतर वाचनातून संकलित असल्याने अपुरी (अगर चुकीची
म्हणजे मांडणी चुकलेली) वाटण्याची शक्यता आहे, हे मी पहिल्या
प्रतिसादाच्या सुरवातीलाच स्पष्ट केले आहे. आपणास माझे लेखन एका कादंबरीवर
आधारलेले असल्याने अतिरंजित वाटले असेल, पण ते कपोलकल्पित नाही एवढे
निश्चित कारण ऐतिहासिक कादंबरीत २० टक्के भाग काल्पनिक असला तरी उरलेला ८०
टक्के भाग इतिहासाच्या भक्कम पुराव्यावर आधारित लागतो आणि अभ्यासाची ही
शिस्त कादंबरीकारालाही पाळावी लागते. असो. काही नवी आणि रंजक माहिती
देण्याचा माझा उद्देश होता. मी कादंबर्यांना प्रमाण मानत नाही, पण
जंत्रीवजा आणि सैद्धांतिक पुस्तकांपेक्षा तो विशिष्ट काळ डोळ्यापुढे उभे
करणारे लेखन मला आवडते, हे पण नमूद केले आहेच.
ब्रुहद्रथ हा निपुत्रिक होता आणि तरुण वयात त्याचा वध झाला. तोच मौर्य
कुळाचा अखेरचा एकमेव वारस असेल तर त्याच्या वंशातील अजुन कोणाला राजा
म्हणून आणणार?
म्हणजे मगधाचे स्वातंत्र्य आणि सार्वभौमत्व सर्वोच्च मानून राजसभेने सत्ता
शुंग घराण्याकडे सोपवली असेल तर त्यात पुष्यमित्र दोषी कसा ठरतो? बौद्ध
साहित्यात त्याच्याविरुद्ध वाईट लिहिले आहे म्हणजे तो वाईट होता का?
इंटरप्रिटेशनचे स्वातंत्र्य दोन्ही बाजूला आहे.
पुष्यमित्राविषयी जाणून घेण्यासाठी इतिहासाची (पुरावासिद्ध) पुस्तके पाया आहेतच, पण त्याचबरोबर १) भाऊ धर्माधिकारी यांची कादंबरी (तर्काधारे दुवे सांधण्यासाठी)
२) चाणक्याचे अर्थशास्त्र (मगधाची प्रशासनव्यवस्था समजून घेण्यासाठी)
३) मुद्राराक्षस नाटक (मौर्यकालीन संबोधने, राजकारण, भाषा व संस्कृती समजण्यासाठी)
४) मालविका-अग्निमित्र नाटक (पुष्यमित्राची जवळची नाती समजण्यासाठी)
५) सावरकरांचे 'सहा सोनेरी पाने' हे पुस्तक (सर्वसाधारण वाचनासाठी)
६) बौद्ध साहित्य (विरोधी दृष्टीकोन समजण्यासाठी)
ही साधनेही काळजीपूर्वक अवलोकन करणे महत्त्वाचे ठरेल. त्यानंतर मग कुठे आपण
सहमत-असहमत होऊ शकू, असे आपले मला वाटते. (चु. भू. दे. घे.)
तुम्ही दिलेल्या प्रतिसादात तृटी होत्या असे म्हणण्याचा माझा उद्देश
नव्हता. तर कादंबरीतील अतिरंजितता कितपत ग्राह्य. कादंबरीत ८० टक्के २०
टक्के अशी विभागणी मात्र मला मान्य नाही. इतिहासातील चार दोन वाक्ये
(जशी गरुडध्वज शिलालेखातील वाक्ये.) हे कादंबरीचे बीज असू शकते. आणि १०
टक्के ऐतिहासिकता ९० टक्के काल्पनिकता इत्यादी राहू शकते. मराठी
नाटक/कादंबरीतील घरगुती संवाद हे जवळपास इतिहासाधारित नसतात पण त्यातील
८०-९० टक्के जागा व्यापतात हे त्यातले एक उदाहरण.
राजा निपुत्रिक निवर्तला म्हणजे त्याच्या घराण्यातले (वंशातले हा माझा
शब्द प्रयोग) मूल दत्तक/वारस म्हणून पुढे आणणे हे इतिहासात बरेचदा घडते.
(माधवरावा नंतर नारायणराव व त्यानंतर सवाई माधवराव नंतर राघोबा, तसेच
दुसर्या शिवाजी नंतर, शाहू नंतर, सयाजी गायकवाड, यशवंतराव होळकर
इत्यादी.). सेवकाने परिस्थितीचा फायदा न घेण्यासाठी हे नियम आपसूक झालेले
असावेत. (इंग्लंडचा राजा निपुत्रिक निवर्तल्यावर वा कुठला अमीर
निवर्तल्यावर त्याच्या घराण्यातला वारस कसा शोधायचा यावर काटेकोर नियम
आहेत.) आपल्या गोष्टीत ब्रुहद्रथ हा पिढीजात राजा होता. त्यामुळे मौर्य
घराण्याशी संबंधित कोणीच नव्हता हे पटण्यासारखे नाही (कदाचित खरे असेल पण
तसा शोध घेतला आणि कोणी मिळाले नाही याचा ऐतिहासिक पुरावा लागेल.)
तुम्ही दिलेल्या पुस्तकांपैकी चाणक्याचे अर्थशास्त्र, मुद्राराक्षस,
सहासोनेरी पाने ही पुस्तके माझ्या वाचनातली आहे. इतर पुस्तके बघावी/वाचावी
म्हणतो.
चंद्रगुप्त सभा यावर कुठे माहिती मिळेल? (अर्थशास्त्र वा मुद्राराक्षसात
मला ती आढळली नाही.) कारण इतिहासाचा अन्वयार्थ लावताना तो एक कच्चा दुवा
वाटतो. (पुष्यमित्र अगदीच साधा भोळा वाटतो.)
अवांतरः नाना फडणवीसाने (जो वयाने मोठा होता.) बारभाई (सभे) नुसार
सवाई माधवरावाच्या लहानपणी राज्यकारभार पाहिला. सवाई माधवराव वेडा होता.
वेडाच्या भरात आत्महत्या करून मेला. निपुत्रिक होता. म्हणून नाना
फडणवीसाने त्यानंतर राज्य केले. हे पुष्यमित्र (नाना) ब्रुहद्रथ (स.मा.)
गोष्टीला जोडणारे उदाहरण वाटते ना.
ऐतिहासिक कादंबरी नेहमीच अतिरंजित असते, असे नाही. त्यापूर्वीची
पायरी म्हणजे ती रंजक, कल्पनारम्य आणि संवादात्मक असते. मी पुन्हा एकवार
स्पष्ट करु इच्छितो, की कादंबरीकार वर्णनात कल्पनास्वातंत्र्य घेत असले तरी
कादंबरीचा मूळ पाया हा अस्सल ऐतिहासिक साधनांवरच आधारलेला लागतो. तेथे
बनवाबनवी चालत नाही. केवळ दोन वाक्यांच्या नोंदीवर कादंबरीचा डोलारा उभारणे
केवळ अशक्य असते. वानगीदाखल आपण मराठीतील गाजलेल्या कादंबर्यांचे उदाहरण
घेऊया. रणजित देसाईंनी 'स्वामी' आणि 'श्रीमान योगी' या कादंबर्या
लिहिण्यापूर्वी मराठा दप्तरातील कागदपत्रांचा अभ्यास आणि त्याविषयी
इतिहासकारांशी चर्चा केली होती. कादंबर्या सिद्ध झाल्यावर त्यातील त्रुटी
समीक्षकांनी दाखवून दिल्या असतील, पण कल्पनारम्यतेवर आक्षेप घेतलेला नाही
(माधवराव पेशब्यांच्या पदरी असलेले श्रीपती-मैना हे सेवक जोडपे किंवा
शिवाजी महाराजांच्या खास सेवेत असलेला महादेव अंगरक्षक किंवा मनोहारी दासी
हा लेखकाचा कल्पनाविलास असू शकेल पण पेशवे अथवा महाराजांनी उघडलेल्या
मोहिमांच्या तारखा आणि तपशिलात घोळ घालून कसा चालेल? एका विशिष्ट तारखेला
महाराज हैदराबाद मुक्कामी असतील तर कादंबरीत ते त्यावेळी सातारा किल्ल्यावर
आजारी पडल्याचे दाखवता येणार नाही. यासाठीच घडलेल्या घटनांचा इतिहासाने
नमूद केलेला सुसंगत क्रम समोर ठेवावा लागतो.
बरे प्रत्येक वेळी अशा त्रुटी केवळ इतिहासकारांनाच उमगतात, असे नाही.
सर्वसामान्य वाचकही त्यावर आक्षेप घेऊ शकतो. प्रसिद्ध लेखक सुहास शिरवळकर
यांनी याचा किस्सा एकदा सांगितला होता. एक ऐतिहासिक कथा फुलवताना लेखकाने
पेशवे पती-पत्नीमधील एक प्रेमाचा प्रसंग वर्णन केला होता आणि पत्नी पतीच्या
घनदाट केसात बोटे फिरवत गूजगोष्टी करते, असे दाखवले होते. त्यावर चाणाक्ष
वाचकांनी आक्षेप घेतला. पेशवे जर शेंडी व घेर्याखेरीज बाकी डोक्याचा
तुळतुळीत गोटा करत असतील तर घनदाट केस कुठून आले? अशी शंका वाचकांनी
विचारली. म्हणजे बघा. तपशील जाणून घेतल्याखेरीज केलेले सैल लेखन कसे अंगाशी
येते ते.
(ना. सं. इनामदार यांच्या ऐतिहासिक कादंबर्यांवर सेतु माधवराव पगडी
यांनी केलेली टीका मी वाचली आहे. पण मला ती वाजवीपेक्षा अधिक कठोर वाटते.
इनामदारांनी कादंबर्यात मूळ इतिहासाचा पाया पार कोसळवून टाकला आणि स्वतःचा
नवाच इतिहास निर्माण केला, असे पगडींनाही म्हणता आले नसते.)
आचार्य चाणक्य यांचे अखंड भारताचे स्वप्न पूर्ण करणारा हिंदुस्तानाचा पहिला सम्राट म्हणजे अशोक. अशोकाचे चक्रवर्ती हे उपपद त्याच्या ठायी सार्थ झाले होते हे त्याच्या राज्यविस्तारावरून दिसून येते.
भारतीयांनीच नाही तर अनेक पाश्चात्त्य इतिहासकारांनी सुद्धा अशोकाचे चक्रवर्तीत्व स्वीकारलं आहे.
१. व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतात, "His dominions were far more extensive than British India of to day excluding Burma"
म्हणजे,
आज ब्रिटिश इंडिया हे नाव जेवढ्या प्रदेशाला येते (ब्रह्मदेश वगळून)
त्याच्यापेक्षाही जास्त विस्तृत प्रदेश अशोकाच्या सत्तेखाली होता.
२. रे. मॅकफेल
याने इंग्लंडचा सुप्रसिद्ध राजा आल्फ्रेड दि ग्रेट याच्याशी अशोकाची तुलना
केली आहे. न्यायदानतत्परता, विद्योत्साह, आणि भविकता या बाबतीत
दोघांमध्ये बरेच साम्य दाखवले आहे. परंतु त्याबरोबरच मॅकफेल हे ही कबुल
करतो की आल्फ्रेड दि ग्रेट चे राज्य अशोकाच्या मगधाच्या कितीतरी पटीने
लहान होते.
३. प्रो. ह्रिस डेव्हीड्सने त्याच्या Buddhist India या ग्रंथात ओलिव्हर क्रोमवेलशी अशोकाची तुलना केली आहे.
वरील प्रकारे सम्राट अशोकाची तुलना नेपोलियन, पीटर दि ग्रेट, अलेक्झांडर इत्यादी पाश्चात्य व्यक्तींशी होऊ शकते.
परंतु सम्राट अशोक या सगळ्यांपेक्षाही श्रेष्ठ होता हे आपण म्हणू शकतो. ते कसं?
१.अशोक नेपोलियन सारखा धाडसी शूर महत्वाकांक्षी होता परंतु त्याने महत्वाकांक्षेच्या पायी आपला नाश करून घेतला नाही.
२.पीटर
दि ग्रेट प्रमाणे प्रजेच्या ऐहिक सुखकडेच फक्त अशोकाची दृष्टी नव्हती.
ऐहिक सुखाबरोबरच अध्यात्मिक आणि नैतिक उन्नती कशी साधावी हे त्याने
उपदेशांकरवी दाखविले.
३.अलेक्झांडरने
दिग्विजय केला. अशोकानेही कलिंगविजय केला. पण सगळा भारत खंड आपल्या
स्वामित्वाखाली आल्यानंतर आता जिंकण्यास काही उरले नाही म्हणून तो
अलेक्झांडर प्रमाणे शोक करत बसला नाही. उलट दिग्विजयाहूनही श्रेष्ठ असा
आत्मविजय त्याने करून दाखविला.
याच प्रमाणे सेंट पॉल, अरबस्तानचा पहिला म्हालिफा उमर, मुघल बादशाह अकबर या सगळ्यांच्या तुलनेत सम्राट अशोकच श्रेष्ठ ठरतो.
अशोकाची
कीर्ती शोधायची झाली तरी ती त्याच्या अफाट राज्यविस्तारात, अतुल
ऐश्वर्यात, अपरंपार संपत्तीत, कलिंग विजयात दिसून येतेच, परंतु याचबरोबर
त्याच्या अंतःकरणाच्या औदार्यात, हृदयाच्या ऐश्वर्यात, त्याच्या अतुल
त्यागबुद्धितही दिसून येते.
कंगनहल्ली येथील अशोकाचे त्याच्या २ पत्नींबरोबरचे शिल्प.
मगध! सोळा महाजनपदातील एक महत्वाचे राज्य. सध्याचा भारतातील बिहारचा परिसर म्हणजे पूर्वीचे मगध साम्राज्य.
आतापर्यंत ऐतिहासिक साधनातून मगधाच्या वेगवेगळ्या काळातील एकूण ४ राजधान्या कळतात.
१. महाभारतातील जरासंधाच्या वेळची राजधानी गिरीव्रज(आत्ताचे गिर्यांक),
२. सातव्या शतकातील शिशुनाग वंशावेळची राजधानी राजगृह(आत्ताची राजगिर),
३. राजगृह(दुसरी)
४. सम्राट अजातशत्रूने पाटलीग्राम या गावी गंगा व शोणभद्र यांच्या संगमावर बसवलेली पाटलीपुत्र(आत्ताचे पटना) ही राजधानी.
अशोकाचे पूर्वज.
जसा
आज बऱ्याच घराण्यांचा कुलवृत्तांत उपलब्ध आहे तसा सम्राट अशोकाचा उपलब्ध
नाही. तरी मिळालेल्या पुराव्यानुसार आपण अशोकाच्या पूर्वजांची उपयुक्त
माहिती काढू शकतो.
१. शिशुनाग
हा शिशुनागाला अशोकाच्या वंशाचा संस्थापक होता. याची कारकीर्द इ.स. पूर्व ७व्या शतकात झाली. याने साधारण ४० वर्ष मगधावर राज्य केलं. या वेळी मगधाची राजधानी वर उल्लेख केल्याप्रमाणे राजगृह ही होती.
२. बिंबिसार
बिंबिसार हा शिशुनागचा पाचवा वंशज. याचा काळ इ.स. पूर्व ५८१ ते इ.स. पूर्व ५५३
असा होता. हा फार पराक्रमी होता. याने मगधाच्या शेजारीच पूर्व हद्दीला
लागून असलेला अंगदेश जिंकून घेतला. (अंगदेश म्हणजे महाभारतात दुर्योधनाने
कर्णाला ज्या भागाचा राजा घोषित केलं होता तो परिसर. आत्ताचा मोघील,
भागलपूर वगैरे परिसर.) या बिंबिसारने कोशल आणि वैशाली या राजघराण्यांशी
संबंध जोडले आणि आपले बळ वाढविले.
बिंबिसारने
पूर्वीची राजधानी राजगृह ज्या डोंगरावर होती ती सोडून डोंगराखालीच एक
नवीन शहर वसवून तिकडे राजधानी हलवली. तिला राजगृहच नाव ठेवले.
३. अजातशत्रू
हा
अजातशत्रू जैन धर्माचे संस्थापक महावीर यांच्या काळात होऊन गेला. याच
अजातशत्रूने मगधची राजधानी राजगृह वरून हलवून पाटलीपुत्र(आत्ताचे पटना)
येथे वसविली.
४. महानंदन
अजातशत्रूनंतर
साधारण १००-१२५ वर्षांनी महानंदन राजा बनला. हा शिशुनाग घराण्यातील
शेवटचा राजा. याला महापद्मनंद नावाचा दासीपुत्र पुत्र होता. या
महापद्मनंदने महानंदनची हत्या केली आणि नंद घराण्याची स्थापना केली.
५. महापद्मनंद
हा
महापद्मनंद फार शूर, पराक्रमी पण तितकाच लोभी आणि निर्दयी होता. याच्याच
काळात अलेक्झांडर हिंदुस्थानच्या हद्दीवर आला होता. हा महापद्मनंद
अलेक्झांडरला हरवण्यासाठी ४०००० हत्ती, २०००० घोडदळ, २ लक्ष पायदळ घेऊन
निघालाही होता परंतु अलेक्झांडर पंजाब प्रांतापर्यंतच थांबला व परत गेला
आणि युद्ध टळले.
८ नंद राजे
महापद्मनंद ला ९ मुलं होती. त्यांच्यानंतर २४ वर्षाच्या काळातच ही ९ मुलं एकामागोमाग एक सम्राट बनून गेली.
६. धनानंद
धनांनंद
हा नंद घराण्यातील शेवटचा राजा. हा सुद्धा क्रूर, जुलमी निघाला. याला
मुरा नावाची दासी होती आणि त्या दासीच्या मुलाचं नाव चंद्रगुप्त.
७. चंद्रगुप्त मौर्य
चंद्रगुप्ताने कौटिल्य चाणक्याच्या मदतीने नंद वंशाचा उच्छेद करून इ.स. पूर्व ३३२ साली मगधाचे राज्य मिळविले. मुरा दासीचा मुलगा म्हणून मौर्य असे नाव त्याने लावले.
चंद्रगुप्तने
नंदांपासून मिळविलेल्या मगध साम्राज्यात वेळोवेळी भर टाकली. पश्चिमेकडील
हिंदुकुशपर्वतापासून हिमालयाच्या पूर्वभागापर्यंतचा प्रदेश आणि
हिमालयापासून दक्षिणेतील चोल, पांड्य, केरळ एवढा प्रदेश त्याने मिळविला.
चंद्रगुप्ताने २४ वर्ष राज्य केले.
व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतात, "Chandragupta became the first strictly historical emperor of India and ruled the land from sea to sea."
म्हणजेच, चंद्रगुप्त अखंड भारताचा पहिला सम्राट बनला ज्याने एका समुद्रापासून दुसऱ्या समुद्रापर्यंत पसरलेल्या भागावर राज्य केले.
८. बिंदूसार मौर्य.
चंद्रगुप्तानंतर
त्याचा मुलगा बिंदूसार सम्राट बनला. बिंदूसार या नावाचा उल्लेख कुठल्याही
ग्रीक साधनात मिळत नाही, तिकडे नाव अमित्राघात असे येते. परंतु भारतीय
साधनांमध्ये बिंदूसार हे नाव आढळते. अमित्राघात याचा अर्थ शत्रूंचा घात
करणारा असा आहे त्यामुळे ही बिंदुसाराला मिळालेली पदवी असू शकते.
चंद्रगुप्तप्रमाणेच बिंदूसारही अतिशय पराक्रमी सम्राट होता. चंद्रगुप्तांने
त्याच्या काळात बनविलेल्या शत्रूंशी बिंदुसाराने यशस्वीरीत्या सामना
केला.
बिंदूसाराच्या
कारकिर्दीचा जास्त इतिहास उपलब्ध नाही. परंतु आपण तर्क लावू शकतो.
चंद्रगुप्ताच्या काळात सगळाच दक्षिण भारत मगध साम्राज्यात नव्हता आणि पुढे
अशोकानेही फक्त कलिंग जिंकून घेतले त्यामुळे दक्षिण भारत बिंदूसार याने
जिंकला असावा असे दिसते. बिंदूसारने २५(काही साधनात २८) वर्ष राज्य केले
आणि त्याचा इ.स. पूर्व २७३ मध्ये मृत्यू झाला आणि पुढे इ.स. पूर्व २६९ मध्ये अशोक सम्राट बनला
अशोकाच्या पूर्व वयासंबंधीची माहिती बौद्ध ग्रंथांतून तसंच दिपवंश व महावंश या सिंहली दंतकथांतून मिळते.
१. अशोकाची आई
अशोकाच्या
आईबद्दलची माहिती फक्त दंतकथांतून मिळते व आज बहुतेक सर्व संशोधकांकडून
तिला अविश्वसनीय असा करार मिळाला आहे. तरी आपण अशोकाच्या आईची धावती भेट
घेऊ.
असं म्हणतात की चंपा नगरीतील एका ब्राह्मणाच्या घरी अशोकाची आई सुभद्रांगीचा
जन्म झाला. ती दिसायला अतिशय सुंदर होती त्यामुळे त्या ब्राह्मणाने तिला
पुढे बिंदूसाराच्या राजवाड्यात पाठविले. तिकडे तिला तिच्या सौंदर्यामुळे
महाराणींकडून हीन वागणूक मिळाली आणि न्हाविणीचे काम तिला देण्यात आले. काही
दिवसांनी शेवटी बिंदूसाराची दृष्टी तिच्यावर गेली आणि त्याने तिच्याशी
लग्न करून तिला आपली १६वी पट्टराणी केले. पुढे सुभद्रांगीला अशोक आणि विगतअशोक अशी २ मुले झाली.
२. अशोकाचे शिक्षण
याबद्दलही फक्त दंतकथाच आल्या आहेत. त्या अशा की,
अशोक
जन्माला आल्यापासून एकदम कुरूप व दुष्ट निघाला त्यामुळे पहिल्यापासूनच तो
बिंदूसाराचा नावडता झाला. यामुळे त्याला इतर राजकुमारांबरोबर बोलू, खेळू
देण्यात येत नसे आणि त्याचे शिक्षणही नीट झाले नाही. परंतु या गोष्टी
तर्काने खऱ्या वाटत नाहीत.
३. तक्षशिला व उज्जैनी
अशोकाची सर्वात पहिली ज्ञात कामगिरी म्हणजे त्याने तक्षशिला येथील मोडून काढलेले बंड.
मौर्य घराण्याविरुद्धचे बंड हे अगदी चंद्रगुप्तांपासून चालून येत असतं.
पुढे बिंदूसाराच्या काळातही अनेक बंड झाले. त्यातलाच एक तक्षशिला येथील
बंड.
तक्षशिला हे सिंधू नदीपासून ३ दिवसांच्या मजलेवर सुप्रसिद्ध स्थान होते. बौद्ध ग्रंथात तक्षशिलाचा उल्लेख 'तक्षशिर' असाही येतो.
बिंदूसाराच्या
काळात इकडे बंड झाला त्यामुळे राजाने राजकुमार अशोकाला बंड मोडण्यासाठी
पाठवले. अशोकाने युद्ध व रक्तपात न करताच बंड मोडून काढले.
यानंतर ३ वर्षे अशोक तक्षशिला मधेच राहिला.
पुढे त्याची नेमणूक उज्जैनी
येथे झाली. काही कथांमधून अशी माहिती मिळते की अशोकाच्या सावत्र आईच्या
सांगण्यावरून अशोकाची नेमणूक पाटलीपुत्रापासून लांब उज्जैनी मध्ये करण्यात
आली. अशोक उजैनी मध्ये असतानाच पुढे इ.स. पूर्व २७३ रोजी बिंदूसाराचा मृत्यू झाला.
४. सिंहसनासाठी संघर्ष व राज्याभिषेक
बिंदूसाराचा मृत्यू इ.स. पूर्व २७३ मध्ये झाला आणि अशोकाचा राज्याभिषेक इ.स. पूर्व २६९ म्हणजे ४ वर्षांनी झाला. यावरून आपण असा तर्क लावू शकतो की ही ४ वर्ष सिंहसनासाठी संघर्ष चालू होता.
तो संघर्ष कसा आणि किती जणांत झाला हे आपण आज ठामपणे सांगू शकत नाही. तरी मी काही मुद्दे मांडतो.
अ. बौद्ध ग्रंथामध्ये म्हटले आहे की अशोकाने आपल्या १०० भावांपैकी ९९ भावांना ठार मारले आणि स्वतःला सम्राट घोषित केले.
आ.
सिंहली दंतकथांमध्ये सुद्धा साधारण असाच उल्लेख आहे की बिंदूसारला १०१
पुत्र होते. पण त्यात १०१ पैकी फक्त ३ पुत्रांची नावं मिळतात.
तिष्य,अशोकवर्धन,सुमल.
इ. तारानाथ म्हणतो की अशोकाने ६ भाऊ मारले.
ई. महबोधिवंश या ग्रंथात म्हटले आहे की अशोकाने सर्व भावांना मारले.
परंतु
या वरील गोष्टींना ठोस काहीच पुरावा मिळत नाही आणि वरून सम्राट बनल्यावर
अशोकाने खोदविलेल्या एका आदेशात सरळसरळ म्हटलं आहे की 'आपले भाऊ पाटलीपुत्र नगरात व अन्यत्रही आहेत.' याचमुळे दंतकथांमधील गोष्टी खऱ्या नसाव्यात असे मला वाटते.
व्हिन्सेंट स्मिथ सुद्धा याबाबतीत हेच म्हणतो की,
"These
fictions were sufficiently refuted by the testimony of the
inscriptions which proves that the brothers and sisters of the king
were still living in the middle of the reign."(पान १९)
या
सगळ्यावरून आपण असं म्हणू शकतो की अशोकाने फक्त अशाच भावांना मारले
ज्यांचे अशोकाबरोबर वैर होते. आणि याच संघर्षामुळे यामुळे बिंदूसाराच्या
मृत्यूनंतर अशोकाला गादीवर बसायला ४ वर्ष लागली.
अशोकाचे हिंदुस्थानातील शिलालेख आणि स्तंभ असलेली ठिकाणे
आधीच्या भागात पाहिल्या प्रमाणे इ.स. पूर्व २६९ साली बिंदूसाराच्या मृत्यूनंतर ४ वर्षांनी अशोकाचा विधिवत राज्याभिषेक झाला.
अशोकाच्या शासनकाळातील सुरवातीच्या वर्षात काय झाले याबाबत कोणताही ठोस पुरावा मिळत नाही.
१. देवानां प्रियस्य अशोकस्य.
कलिंग
युद्धापूर्वी ९ वर्षाच्या शासनकाळात विशेष अशी काही घटना घडलेली दिसत
नाही.(९ वर्ष ही २६९ साली राज्याभिषेक झाल्यापासून. बिंदूसाराच्या
मृत्यूपासून बघायची झाली तर १३ वर्ष.) फक्त या काळात कधीतरी अशोकाने स्वतःस
'देवानां पिय पियदस्सी राजा' ही पदवी लावून घेतली. याचा अर्थ देवांना प्रिय असलेल्या प्रियदर्शी राजा असा होतो.
अशोकाला समकालीन असणाऱ्या पतंजलीने या पदाचा अर्थ चिरंजीव, आयुष्यमान, श्रीमान असा सांगितला आहे.
२. कलिंग देश
अशोक
सम्राट बनल्यापासून त्याने केलेल्या साम्राज्यविस्ताराचा जो पहिला आणि
शेवटचा उल्लेख मिळतो तो म्हणजे कलिंग युद्ध. (त्याने इतर काही भाग जोडलेले
उल्लेख आहेत पण त्या दंतकथा आहेत.)
कलिंग राज्य हिंदुस्तानाच्या पूर्व भागात ओरिसाच्या जवळ होते. पूर्वेला बंगालचा उपसागर, पश्चिमेस पूर्वघाट, दक्षिणेस गोदावरी नदी आणि उत्तरेस महानदी अशा त्याच्या सीमा होत्या.
कलिंगच दुसरं नाव 'स्त्रि-कलिंग' असेही होते. राज्याची राजधानी 'राजपूर'(बौद्ध ग्रंथानुसार सिंहपूर) होती. लोकांची धर्मनिष्ठा, शौर्य, शिल्प, वाणिज्य यांसाठी हा देश प्रसिद्ध होता.
३. कलिंग युद्ध व भयंकर प्राणहानी.
चंद्रगुप्ताला, बिंदूसाराला जे जमले नाही असा कलिंग वर विजय अशोकाने मिळवून दाखवला. ही गोष्ट अशोकाच्या राज्यरोहणापासून १३ वर्षांनी म्हणजे इ. स. पूर्व २६१ रोजी घडली.
अशोकाने लिहून घेतलेल्या एका गिरिलेखात युद्धाचा असा उल्लेख आहे की,
"देवांचा
प्रिय राजा याने राज्याभिषेकाला ८ वर्षे होऊन गेल्यावर कलिंग देश जिंकला.
तेव्हा दीड लाख लोक कैद करण्यात आले, एक लक्ष लोकांना मारण्यात आले आणि
या संख्येच्या अनेक पट लोक प्राणास मुकले."
यात 'लोकांना मारण्यात आले' म्हणजे युद्धादरम्यान मारण्यात आलेले सैनिक,लोकं.
'अनेक पट लोक प्राणास मुकले' म्हणजे कदाचित युद्धा नंतरच्या परिणामांना बळी पडलेले लोक. परिणाम म्हणजे दुष्काळ, महामारी, साथीचे रोग.
व्हिन्सेंट स्मिथ याबद्दल म्हणतो की,
"His(ashoka's) arms were successful and the kingdom(kalinga) was annexed to the empire."
म्हणजे, अशोक विजयी झाला आणि कलिंग देश मगध साम्राज्याला जोडला गेला.
४. युद्धाचे परिणाम.
कलिंग
येथील प्राणहानीमुळे अशोकाच्या मनावर विलक्षण परिमाण घडला व त्यामुळे
त्याच्या चरित्राबरोबरच हिंदुस्तानाच्या इतिहासात परिवर्तन घडून आले.
या बाबतीत व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतो,
"The horrors which must accompany war, even successful war, made a deep impression on the heart of the victorious monarch."
थोडक्यात, युध्दासोबतच झालेल्या प्रचंड हानिमुळे युद्ध जिंकूनही विजयी सम्राट अशोकाचे मन द्रवले.
कलिंग युद्धाचे ३ परिणाम झाले.
-- पहिला परिणाम - पुढील आयुष्यात अशोकाने युद्धाचे नाव काढले नाही.
-- दुसरा परिणाम - प्रजेला भोगावे लागणारे अत्याचार, जुलूम बंद व्हावेत यासाठी अशोकाने सक्तीचे हुकूम सोडले.
-- तिसरा परिणाम - अशोकाचा बौद्ध धर्म स्वीकार.
५. दुसऱ्या परिणामाविषयी थोडी अजून माहिती.
आज कलिंग प्रदेशात जौगाड व धौली
या ठिकाणी अशोकाचे २ शिलालेख सापडले आहेत. कलिंग राज्य खालसा केल्यावर
आपल्या हातून धोर अन्याय घडला अशी टोचणी अशोकाच्या मनात लागून राहिल्यामुळे
यापुढेतरी आपल्या अंमलाखाली कलिंग प्रजेला सुख लागावे व अधिकारी
वर्गाकडून त्यांच्यावर अत्याचार होऊ नयेत म्हणून त्याने कलिंग प्रांतासाठी
जास्त सवलतीची अशी शासन पद्धती योजून तिच्या संबंधाचे हुकूमवजा दोन
गिरिलेख जौगाड व धौली या ठिकाणी जाहीर केले आहेत. या आदेशाच्या
अंमलबजावणीसाठी त्याच प्रदेशातील पुरी तालुक्यातील तोसली या ठिकाणी त्याने
राजप्रतिनिधी नेमला होता.
१.जौगाड येथील शिलालेख.
२.धौली येथील शिलालेख
(पुढील भागात त्याच्या बौद्ध धर्माचा स्वीकार आणि त्याने केलेल्या धर्मयात्रेबद्दल माहिती असेल.)
(भाग ५)
चक्रवर्ती सम्राट अशोक (भाग ५)
पोस्तसांभार :: ओंकार ताम्हनकर
बौद्ध धर्म स्वीकार, धर्मयात्रा आणि धर्मप्रसार.
१. अशोकाचा बौद्धधर्माचा स्वीकार.
अशोकाच्या
वेळी बौद्ध धर्म त्याच्या शुद्ध स्वरूपात होता आणि निरनिराळ्या
धर्मप्रचारकांकडून तो उपदेशिला जात होता. मगधराज्यात असा कोणताही प्रदेश
नव्हता जेथे बौद्ध भिक्षूंचा व धर्मप्रचारकांचा प्रवेश झाला नव्हता.
त्यामुळे कलिंगयुध्दाच्या आधी अशोकाची बौद्ध धर्माशी ओळखच झाली नव्हती असं
आपण म्हणू शकत नाही. पुढे कलिंगयुद्धावेळी विजयानंतर झालेल्या
प्राणहानीमुळे अनुतप्त झालेल्या अंतःकरणाला शांती देण्यासाठी भूतदयाप्रधान
बौद्ध धर्मासारखा धर्मच अत्यंत योग्य असल्यामुळे अशोकाच्या मनावर या
धर्माची छाप पडली आणि त्याने बौद्ध धर्माचा स्वीकार केला.
बौद्ध
धर्माचा स्वीकार करणं म्हणजे आता कधीच शस्त्र धरायचं नाही असं नक्कीच
नव्हतं. शेवटी अशोक एक राजा होता. आपल्या राज्याच्या सीमा सुरक्षित ठेवणं
हे बौद्ध धर्म स्वीकारण्याऐवढंच महत्वाचं होतं हे त्याला नक्कीच माहीत
असेल.
व्हिन्सेंट स्मिथ म्हणतो की,
"All
that we know about his life indicates that once he had begun to devote
himself to the love, protection and teaching of the law of Piety, or
dharma, he never again allowed himself to be tempted by ambition into an
unprovoked war."(Page 26)
म्हणजेच,
त्याच्या आयुष्याबद्दल आपल्याला जे काही माहित आहे ते हे दर्शविते की
जेव्हा त्याने प्रेम, संरक्षण, धर्म आणि धर्मातील शिकवणीस स्वत: ला समर्पित
केले, तेव्हा त्याने स्वतःस कधीही बिनआगळिकीच्या युद्धाची महत्वाकांक्षा
बाळगण्याची परवानगी दिली नाही.
पुरावे नसले तरी आपण असे म्हणू शकतो की कलिंगयुद्ध हे त्याच्या आयुष्यातील पाहिलं युद्ध नाही तर शेवटचं युद्ध होतं.
वर
म्हटल्याप्रमाणे कलिंगयुद्धापूर्वी सुद्धा अशोकाने बौद्ध धर्माची दीक्षा
घेतली होती. ते साल इ.स. पूर्व २६५ होतं म्हणजे युद्धापूर्वी साधारण अडीच
वर्ष आधी. परंतु त्या वेळची बौद्ध धर्मविषयीची अशोकाची आस्था विशेष नसावी.
कलिंग युद्धाने त्याचे मन वळविले.
बौद्ध ग्रंथ आणि दंतकथा बघितल्या तर 'उपगुप्त' नावाचा आचार्य आणि 'श्रमण निग्रोध' नावाच्या अधिकाऱ्याच्या मदतीने अशोकाने बौद्ध धर्माची दीक्षा घेतली.
अशोकाने बौद्ध धर्म स्वीकारल्यानंतर त्यासंबंधी ३ मोठे निर्णय घेतले.
I. हिंदू धर्मातील वर्ण व्यवस्था काढून टाकली.
II. प्राणी जीवनाच्या पावित्र्याचा आदर केला.
III. पालक, वडीलधाऱ्या माणसांचा आदर करण्याच्या श्रद्धेला फार मोठे स्थान दिले.
२. धर्मयात्रा
स्तंभ
आणि शिलालेखांतून दिसून येतं की अशोकाने त्याची धर्म यात्रा इ.स. पूर्व
२४९ रोजी म्हणजे राज्याभिषेकानंतर २१व्या वर्षी आणि कलिंग युद्धानंतर
साधारण १२ वर्षांनी सुरू केली.
I. सर्वप्रथम त्याने नेपाळ मधील तराई प्रांतातील बौद्ध जन्मस्थानाचे दर्शन घेतले.
II. नेपाळ तराई येथीलच कपिलवस्तू(तिलौरा कोट) यालाही भेट दिली. बुद्धाचे बालपण ज्या स्थानी गेले ते स्थान.
III. बोधी वृक्ष असलेले गया.
IV. ऋषीपट्टण/सारनाथ.
V.
श्रावस्ती (बौद्ध ज्या ठिकाणी दीर्घ काळ राहिला ते स्थान.) हे सध्या औंध
प्रांतातील राप्ती नदीच्या काठी असलेले सहात-महात असावे असं व्हिन्सेंत
स्मिथ म्हणतो. (पान - 41)
VI. बुद्धाचे मदुत्युस्थान कुशीनगर.
३. धर्मप्रसार
अशोकाने
बौद्ध धर्माचा प्रसाराचे काम फार नेटाने केले. त्याने अगदी जंगली
लोकांपासून मगध राज्यातील दूरदूरच्या प्रांतात आणि त्याच बरोबर आशिया,
युरोप व उत्तर आफ्रिका वगैरे खंडात धर्म प्रसार केला.
A. भारताबाहेरील धर्मप्रसार
I. सीरियाच्या बादशहकडे आणि पश्चिम आशियात.
II. टॉलेमी फिलाडेफस, इजिप्तच्या शाहच्या प्रदेशात.
III. उत्तर आफ्रिकेतील राजा मॅगस याच्या प्रदेशात.
IV. मेसिडोनियात.
B. भारतातील धर्मप्रसार
देश (भाग) - धर्मप्रचारकाचे नाव
I. काश्मीर - मज्झन्तिक
II. गांधार - मज्झन्तिक
III. महिश्मंडल(म्हैसूर) - महादेव
IV. वनवासी(उत्तर कन्नड) - रक्षित
V. अपरांतक(उत्तर कोंकण) - योन धर्मरक्षित
VI. महाराष्ट्र - महा धर्मरक्षित
VII. योन(सरहद्द प्रांत) - महारक्षित
VIII. हिमवंत(हिमालय) - कश्यप, सहदेव
IX. सुवर्णभूमी(पेगु आणि मूलमेन)- सोन आणि उत्तर
X. सिंहलद्वीप (लंका) - महेंद्र (मुलगा)
अशोकाचा
हा बौद्ध धर्मप्रसार अतिशय यशस्वी झाला होता हे व्हिन्सेंट स्मिथ, जनरल
कनींगहॅम सारखे पाश्चात्य इतिहास संशोधकही मान्य करतात.
ते
म्हणतात की सम्राट अशोकामुळेच बौद्ध धर्माचा विस्तार प्रत्यक्षित आणि
अप्रत्यक्षितरीत्या भारत, सिलोन प्रमाणेच बर्मा, कंबोडिया, चायना, कोरिया,
जपान, मंगोलिया, तिबेट सारख्या देशांत झाला.
अशोकाच्या परिवारसंबंधात त्याच्या शिलालेख, स्तंभलेख तसेच बौद्धग्रंथांतून फार थोडी माहिती मिळते.
I. अशोकाच्या राण्या.
साधनांतून असे कळू शकते की अशोकाला ५ राण्या होत्या.
१.देवी
- बौद्ध ग्रंथात असा उल्लेख येतो की उजैनी मध्ये राजप्रतिनिधी असताना
अशोकाचा श्रेष्ठी जातीच्या 'देवी उर्फ विदिशा महादेवी शक्यकुमारी' नावाच्या
एका स्त्रीशी प्रेमसंबंध होता आणि त्यांना एक संतती सुद्धा होती.
२. असंधीमित्रा - ही अशोकाची पट्टराणी होती.
३. कारुवाकी - अशोकाच्या एका लेखात त्याची 'दुसरी राणी' कारुवाकीचा उल्लेख येतो.
४. पद्मावती.
५. तिष्यारक्षिता.
II.अशोकाचे पुत्र आणि कन्या.
पुत्र
१. महेंद्र(महिंद) - देवी चा मुलगा. अशोकाने याला बौद्ध धर्मप्रसारासाठी लंकेत पाठविले. (व्हिन्सेंट स्मिथ महिंद्राला अशोकाचा भाऊ मानतो.)
महेंद्र अशोकाचा मुलगा होता की भाऊ हे आपण स्पष्ट सांगू शकत नाही. परंतु या संबंधी आपण तर्क लावू शकतो. ते असे,
अ)
महेंद्र जर पहिला मुलगा म्हणजेच भावी सम्राट असता तर अशोकाने त्याला
राज्यात ठेवण्याऐवजी लांब लंकेत धर्माच्या कामाला का पाठवले असते? त्यासाठी
दुसऱ्या कोणा राजकुमाराला का पाठविले नाही? अशोकाने जरी बौद्ध धर्म
स्वीकारून कधीही युद्ध न करण्याचा निर्णय घेतला असला तरी एका राजाने आपल्या
राज्याचं रक्षण केलं पाहिजे आणि त्यासाठी शस्त्र उचलावं लागलं तरी
उचलायचं हे तो जाणून होता. त्यामुळे अशोक राज्याच्या युवराजाला
राज्याबाहेर पाठवेल असं वाटत नाही. व्हिन्सेंट स्मिथ यांचेही असेच विचार
आहेत की महेंद्र हा मुलगा नसून भाऊ असावा.
ब)
काही इतिहासकार मानतात की महेंद्र हा मुलगाच असावा. कारण अशोकाच्या
साम्राज्याचे ४ मोठे भाग होते. तक्षशिला, उजैनी, सुवर्णगिरी, तोसली.
चंद्रगुप्ताच्या काळापासून अशा मोठ्या विभागावर राजप्रतिनिधी म्हणून
युवराजांना पाठविण्यात येत असे. महेंद्र धरून अशोकाचे ४ पुत्र होतात व
अशोकाच्या काळात राज्याचेही ४ मोठे भाग होते त्यामुळे महेंद्र हा अशोकाचा
मुलगाच असावा असं काही इतिहासकारांचे मत आहे.
२. तीवर.
हा
कारुवाकी या अशोकाच्या दुसऱ्या राणीचा मुलगा होता. 'द्वितीया देवी
तीवरमाता कारुवाकी' असा एक लेखात उल्लेख येतो यावरून तीवर नावाचा मुलगा
होता हे समजते.
३. कुणाल
पद्मावती राणीचा मुलगा. याच्या २ मुलांनी दशरथ आणि सांप्रतिने अशोकानंतर राज्यकारभार पाहिला.
४. जलौक
कन्या
१. संघमित्रा - महेंद्र बरोबर ही सुद्धा लंकेत बौद्ध धर्म प्रसाराला गेली.
२. चारुमती
- ही देवपाल नावाच्या नवऱ्याबरोबर नेपाळ मध्ये देवपाटन ला गेली आणि तिथेच
वारली.तिच्या स्मरणार्थ अशोकाने तिकडे ४ स्तूप बांधले असं म्हणतात.
(इकडे
आपण एक लक्षात घेतले पाहिजे की अशोकाची राणी कारुवाकी आणि तिचा मुलगा
तीवर या दोघांचाच फक्त अशोकस्तंभांत, लेखांत वगैरे उल्लेख येतो. बाकी
सगळ्यांचा उल्लेख बौद्ध ग्रंथांतून आणि दंतकथांतून येतो.)
अशोकाचा मृत्यू.
अशोकाचे अखेरचे दिवस व मृत्यू यांविषयी अशोकाच्या कोणत्याही लेखात उल्लेख येत नाही. जो उल्लेख येतो तो बौद्ध ग्रंथांतून येतो.
बौद्ध ग्रंथांनुसार अशोकाचा मृत्यू वार्धक्याने झाला.
बौद्ध
ग्रंथांमध्ये अशी कथा येते की, एकदा अशोक आपले गुरू आचार्य उपगुप्त
यांच्याबरोबर चर्चा करत असताना त्याला कळले की जगात सर्वात जास्त दान
करणारा माणूस आपण नाही. त्यामुळे त्याने १०० कोटी सुवर्णमुद्रा दान
करण्याचा निर्णय घेतला. हे दान सरकारी खजिन्यातून जाऊ लागले. राजा एवढे
खर्च करतोय आणि ते पण सरकारी खजिन्यातून! हे पाहून अनेक मंत्री बिथरले आणि
अशोकाचा नातू सांप्रतीकडे(कुणालचा मुलगा) गेले. आणि नंतर सांप्रतिच्या
आज्ञेवरून हे दान थांबवण्यात आले. गेलेल्या पैशांची परतफेड होण्यासाठी
मंत्र्यांनी अशोकाला अप्रत्यक्षरीत्या छळण्यास सुरवात केली. उदाहरणार्थ,
अशोक नेहमी सोन्याच्या ताटातून जेवायचा. हळू हळू त्याला चांदीच्या ताटातून
आणि मग मृत्तिकापात्रांतून जेवण जाऊ लागले. तरी बौद्ध धर्म स्वीकारलेला
अशोक काहीच बोलला नाही. आणि मग पुढे त्याचा मृत्यू झाला.
अशोकानंतर
मगध राज्य त्याच्या २ नातवंडांत, दशरथ आणि सांप्रती यांच्यात वाटले गेले
आणि पुढे ५० वर्षांतच मौर्य साम्राज्याचा शेवट झाला.
अशोकाचे लेख म्हणजे काय? तर अशोकाने आपल्या आयुष्यात अख्या हिंदुस्थानाभर जे काही कोरून ठेवले ते म्हणजे अशोकाचे लेख.
अशोकाच्या लेखांचे साधारण खालील वर्ग पडतात.
१. स्तंभलेख, लघुस्तंभलेख
२. गिरिलेख, लघु गिरिलेख
३. कलिंगलेख
(याखेरीज भाब्रूलेख, गुहालेख, स्मारकलेख असे प्रकार आढळतात.)
यातील बहुतांश लेखांची भाषा मागधी असून अलंकार विरहित सोपी आहे. बहुतेक सर्व लेख ब्राह्मी लिपीत लिहिले गेले आहेत.
१. स्तंभलेख, लघुस्तंभलेख
अशोकाचे
स्तंभलेख दिल्ली, तोपरा, मीरत, अलाहाबाद, लौरीया अराराज, लौरीया नंदनगड,
राम पुरा, तरई नेपाळ(२ लेख), निग्लीव, सारनाथ, कौशांबी, सांची इत्यादी
ठिकाणी आहेत. एकूण मिळालेल्या स्तंभलेखांची संख्या ७ आणि ४(लघु स्तंभलेख)
मिळून ११ आहेत. हुएन त्सांग नावाच्या ६व्या शतकातील चिनी प्रवाशाने अशोकाचे
१६ स्तंभलेख असल्याचा उल्लेख केला आहे. या सोळापैकी वर उल्लेख
केल्याप्रमाणे ११ लेखांचा शोध लागला आहे. त्यातील २ स्तंभच चांगल्या
स्थितीत आहेत.
अशोकाच्या
परिवारापैकी आजपर्यंत त्याच्या फक्त एका राणी(कारुवाकी) आणि एका
मुलाचा(तीवर) उल्लेख आढळतो अलाहाबाद येथील स्तंभावर आढळतो. त्यात उल्लेख
आहे की,
"दुसरी राणी व तीवरची माता कारुवकी हिच्या प्रित्यर्थ करण्यात आले आहे.."
अशोकाचे
हे स्तंभलेख एकंदर प्रजेला उद्देशून आहेत. त्यात राज्यशासनाची तत्वे,
धर्माचरण, आत्मपरीक्षण, हिंसेसंबंधांचे नियम, धर्मानुराग, धर्मप्रचारार्थ
योजना इत्यादी भिन्न भिन्न विषय आले आहेत.
स्तंभांचे वैशिष्ट्य -
I.
प्रत्येक स्तंभावरील लेखांची सुरवात "देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा"
अशीच होते. इथे कुठेही अशोकाचे नाव येत नाही. त्यामुळे एका लेखावर अशोकाचे
नाव सापडेपर्यंत संशोधकांना वाटत होते की हे लेख 'पियदस्सी'(प्रियदर्शी)
नावाच्या कोणा राजाचे आहेत.
II. अशोकाने किती स्तंभ बांधले हे आज समजत नाही परंतु जेवढे मिळालेले स्तंभ आहेत ते एकमेकांपासून बऱ्याच अंतरावर आहेत.
III.
स्तंभांची उंची १० ते १२ मीटर आहे. प्रत्येक स्तंभाचे वजन साधारण ३० टन
पासून ५० टन पर्यंत आढळते. स्तंभांचा आकार गोलाकार आहे. हा आकार खालून वर
निमुळता होत गेलेला आहे.
IV.
सगळ्या स्तंभांसाठी वापरलेला दगड एकाच प्रकारचा आहे. हा दगड
उत्तरप्रदेशातील मिर्झापुर जिल्ह्यातील चुनार येथील डोंगरातून आढळतो. या
भागात अनेक स्तंभ सापडले आहेत यावरून स्तंभ बनविण्याचा कारखाना इकडेच असू
शकतो असा आपण तर्क लावू शकतो.
V. स्तंभांची निर्मिती पूर्णपणे भारतीय कलाकारांनी केलेली आहे.
२. गिरीलेख, लघु गिरिलेख
गिरिलेख म्हणजे आदेश. पर्वतांवर कोरून ठेवलेले लहानमोठे शिलालेख.
आजपर्यंत
अशोकाच्या गिरिलेखांपैकी १४ लेखांचा शोध लागला आहे. या १४ पैकी बहुतेक
लेख अशोकाच्या कारकिर्दीच्या १३व्या आणि १४व्या वर्षातील आहेत. हे
सापडलेले सर्व गिरिलेख मगध पासून खूप दूर आहेत. या गिरिलेखांतून अशोकाचा
धर्म व त्याची राज्यपद्धती यांच्या संबंधीची बरीच माहिती मिळते.
प्रथम गिरिलेखाचा शोध शाहबाजगडी येथे लागला. हे ठिकाण आजच्या पाकिस्तानच्या पेशावर प्रांताच्या पुढे युसफझाई येथे आहे.
इतर गिरिलेख गिरनार, कालसी, मानसेरा इत्यादी ठिकाणी मिळाले आहेत.
लघु गिरिलेख
अशोकाचे
लघु गिरिलेख रुपनाथ, मस्की, ब्रह्मगिरी(२) इत्यादी ठिकाणी आहेत. इकडे
मस्की येथील लघु गिरिलेखाचा उल्लेख करावासा वाटतो कारण वर म्हटल्याप्रमाणे
संशोधकांना अशोक हे नाव ज्या पहिल्या आणि एकुलत्या एक लेखात सापडले आहे तो
लेख म्हणजे हा मस्कीचा लघु गिरीलेख.
याची सुरवात "देवानां पियस असोकस..." अशी होते. यावरून सम्राटाचे नाव पियदस्सी नसून असोक(अशोक) आहे हे संशोधकांना कळले.
३. कलिंगलेख
कलिंग म्हणजे सध्याचे ओडिसा प्रांत. आधी म्हटल्या प्रमाणे अशोकाने कलिंगयुद्धानंतर तेथे दोन लेख उभारले.
पहिला
कलिंगलेख कलिंग मधील तोसली जवळील जौगड या ठिकाणी सापडला. या लेखाला
'प्रांतीय अधिकाऱ्यांसाठी लेख' असे आपण म्हणू शकतो कारण यात नागरिकांना
न्यायाने वागवावे, त्यांच्यावर जोरजुलूम करू नये याबाबत बजावले आहे.
दुसरा
लेख हा तोसली जवळील धौली येथे सापडला. हा लेख सुद्धा अधिकाऱ्यांनाच
उद्देशून आहे पण या लेखास 'सीमांत लेख' असे आपण म्हणू शकतो कारण या लेखात
सरहद्दीवरील लोकांशी अधिकाऱ्यांनी कशाप्रकारे वर्तन ठेवावे हे सांगितले
आहे.
सारनाथ येथील अशोकस्तंभ
नेपाळ तरई येथील अशोकस्तंभ
भारतातल्या पहिल्या कोरीव लेणींची निर्मिती आणि इतिहास
धम्मचक्र टीम
3 minutes
“भारतामध्ये
कोरीव लेणींची निर्मिती ही सर्वात प्रथम सम्राट अशोक याच्या काळात
झाली.बौद्ध भिक्षूंना हवा असलेला एकांत, ध्यान-धारणा , चिंतन-मनन
करण्यासाठी लागणारी शांतता ही नगरात किंवा गावात निवास करुन मिळणारी
नव्हती. या साठी त्याने मनुष्यवस्तीपासून दूर अशा डोंगरपरिसरात ही
‘शैलगृहे’ अर्थात ‘लेणी’ खोदविली.
अशोक व त्याचा नातू दशरथ ह्यांनी
बौद्ध भिक्खूंसाठी दक्षिण बिहारमधील बाराबर, नागार्जुनी, व सितामढी इ.
ठिकाणी ही सुरुवातीची लेणी खोदविली. बाराबर येथे सुदामा, विश्वामित्र,
कर्णकौपर, व लोमशऋषी ही चार लेणी आहेत. त्यापैकी ‘सुदामा’ हे लेणे सर्वच
प्राचीन असून,’न्यग्रोध गुंफा’ या नावाने ते प्रसिद्ध आहे. याची रचना साधी
असून, समोर आयताकार दालन व त्यानंतर वर्तुळाकार खोली आहे.
या
लेणींपासून सुमारे १.५ कि मी. अंतरावर ‘नागार्जुनी’ गुहा आहेत. गोपिका,
वाडिहक व वडलिक या तीन लेण्यांचा समावेश त्यात आहे. या लेणींचे वैशिष्ट्य
म्हणजे ती डोंगरातील खडकाला समांतर अशी खोदलेली आहेत. ‘बाराबर’ येथील
सुप्रिया व ‘नागार्जुनी’ येथील गोपिका ही लेणी प्रशस्त आहेत.या समूहातील
‘सुदामा’ व ‘लोमशऋषी’ ही लेणी सर्वात प्राचीन असून, ती आकाराने लांबट
आयताकार असून त्यातील एका टोकाची रचना ही गजपृष्ठाकार असून ती अर्धगोलाकार
आहे.
‘लोमशऋषी’ लेण्याचे प्रवेशद्वार हे वैशिष्ट्यपूर्ण असून इतर
लेणींहून भिन्न आहे. ते रेखीव असून, अर्धस्तंभांनी युक्त चौरसाकृती द्वार व
त्यावर अर्धगोलाकार आकारातील चैत्यकमान कोरलेली असून कमानीच्या वरच्या
भागात जाळी कोरलेली असून , त्याखाली स्तूपाला वंदन करणाऱ्या आठ हत्तींचे
कलात्मक शिल्पांकन आहे. हे वैशिष्ट्यपूर्ण शिल्प लेणींमधील ‘शैल शिल्पकले’
ची सुरुवात ठरते. ही लेणी अतिशय साधी असून, बौद्ध भिक्खूंच्या समर्पित
जीवनाशी या लेणींची जवळीक साधलेली आहे.
मुखदर्शनाचा काही अलंकृत भाग
वगळता या लेणीमधील साधेपण नजरेत भरण्यासारखेच आहे. ही लेणी खोदतांना
तत्कालीन स्थापत्यविशारदांनी एखाद्या साध्या घरासारख्या ‘आकृतीबंधा’चा
उपयोग केला असावा. एखादे घर ज्याप्रमाणे अगोदर लाकडी खांबावर तुळया व छत
टाकून उभारण्यात येते, व नंतर भिंतीमध्ये दारे- खिडक्या बसवण्यात येतात,
त्याप्रमाणे या ‘लोमशऋषी’ लेणींची प्रारंभीच रचना दिसून येते.
”
चारही दिशांकडून आलेल्या भिक्खूंना पावसात राहता यावे, यासाठी ही लेणी
खोदविली आहेत…” असे ‘बाराबर’ येथील लेणींच्या भिंतीवर सम्राट अशोक यांचा
नातू ‘दशरथ’ याने ‘धम्मलिपी’तील शिलालेखातून लिहून ठेवल्याचे आपणांस आजही
स्पष्टपणे दिसून येते….”
-अशोक नगरे, पारनेर,अहमदनगर (लेखक – बौद्ध शिल्पकला आणि इतिहास अभ्यासक)
-आनंद कानिटकर
गांधारमधील हिंदू-देवतांच्या मूर्ती
- आनंद कानिटकर kanitkaranand@gmail.com
सध्याच्या
उत्तर पाकिस्तानातील ख़ैबर पख़्तूनख़्वा या भागात प्राचीन गांधार हा
प्रदेश होता. इथल्या पेशावर, स्वात खोऱ्यात या प्रदेशाचं मुख्य केंद्र
होतं. आधीच्या लेखांत पाहिल्यानुसार, जरी या प्रदेशावर इराणी राजे, ग्रीक
राजे यांची सत्ता आली तरी इथं स्थानिक भारतीय राजेदेखील राज्य करत होते. या
प्रदेशातील बौद्ध स्तूपांचे आणि विहारांचे अवशेष मोठ्या प्रमाणावर माहीत
असले तरी इथले भारतीय, ग्रीक, पहलव, शक, कुशाण रहिवासी हे इथल्या ग्रीक
इराणी, हिंदू देवताही पूजत असत. इथल्या १८०० वर्षांपूर्वीच्या कुशाण
राजांच्या नाण्यांवर इराणी, ग्रीक, आणि भारतीय देवता (स्कंद, कुमार, विशाख,
गौतम बुद्ध, मैत्रेय इत्यादी) आढळून येतात.
संस्कृत
व्याकरणकार पाणिनी यांच्या ‘अष्टाध्यायी’ या ग्रंथात ‘शिवभागवत’ आणि
‘वासुदेवक’ असे शब्द येतात. शिवभागवत म्हणजे शिवाचे भक्त आणि वासुदेवक
म्हणजे वासुदेवाचे भक्त. पाणिनी यांचा काळ अंदाजे इसवीसनपूर्व पाचवं आणि
चौथं शतक (आजपासून २४०० वर्षांपूर्वीचा काळ) हा मानला जातो.
पाणिनी हे शालातुर या गावचे रहिवासी होते. प्राचीन शालातुर म्हणजे उत्तर
पाकिस्तानातील सध्याच्या अटक गावापासून काही अंतरावर असलेलं छोटा लहूर हे
गाव. म्हणजे, पाणिनी देखील गांधारप्रांतातील रहिवासी होते. त्यांनी
केलेल्या उल्लेखावरून गांधारप्रदेशात अंदाजे २३०० वर्षांपूर्वी शिव आणि
वासुदेव या देवतांचा भक्तिपंथ होता असा अंदाज लावता येऊ शकतो.
त्यानंतर गांधारप्रदेशात साधारणपणे इसवीसनाच्या पहिल्या शतकादरम्यान
(आजपासून १९०० वर्षांपूर्वी) दगडात घडवलेल्या हिंदू-देवता सापडतात.
अर्थात्, त्यापूर्वी या देवतांच्या लाकडी, मातीच्या मूर्ती असतील, ज्या
नष्ट झाल्यामुळे आपल्याला त्यांचा पुरावा आढळत नाही. गांधारप्रदेशात
विशेषतः शिव, शिव-पार्वती, कार्तिकेय, विष्णू यांच्या मूर्ती अधिक आढळतात.
शिव, शिवपार्वती यांच्या मूर्तींवरून शिवाचे भक्त या प्रदेशात होते हे
लक्षात येतं. कुशाण राजांच्या राज्यकालात (म्हणजे इसवीसन पहिलं ते तिसरं
शतक या काळात) मस्तकावर जटा असलेली, हातात त्रिशूल घेतलेली शिवमूर्ती
गांधारप्रदेशातील गांधारशैलीत घडवलेली आढळून येते. अनेकदा या शिवमूर्तीसोबत
नंदीदेखील दाखवलेला असतो. याशिवाय, या प्रदेशात अनेक शिवलिंगं आढळून आली
आहेत.
गांधारप्रदेशात शिवपरिवारातील स्कंद-कार्तिकेय या
देवतेच्या मूर्तीदेखील आढळून आल्या आहेत. अठराशे वर्षांपूर्वीचा कुशाण राजा
हुविश्क याच्या सोन्याच्या नाण्यावर स्कंद, कुमार, विशाख यांच्या प्रतिमा
आहेत आणि त्यांची नावंदेखील या नाण्यांवर कोरलेली आहेत. देवांचा सेनापती
असलेल्या या स्कंद-कार्तिकेयाच्या मूर्तीमध्ये कार्तिकेय हा हातात भाला
किंवा पाठीवर धनुष्य घेतलेला दाखवला जातो. त्याचं वाहन असलेला मोरदेखील
अनेक शिल्पांमध्ये आढळतो. याशिवाय, गांधारप्रदेशातील काही मूर्तींमध्ये
कार्तिकेय चिलखत घातलेला दाखवण्यात आलेला आहे. गांधारप्रांतात अंदाजे
इसवीसनाच्या पहिल्या शतकापासून ते सहाव्या-सातव्या शतकापर्यंतच्या काळातील
कार्तिकेयाच्या मूर्ती आढळतात.
कार्तिकेयासोबत अनेकदा षष्ठी
या भारतीय देवतेची मूर्ती दाखवली जाते. सहा मुखं असलेली षष्ठी ही सटवाई या
नावानं महाराष्ट्रात प्रसिद्ध आहे. गांधारप्रदेशातही कार्तिकेयासोबत सहा
मुखं असलेली षष्ठी ही देवता दाखवली जाते. या प्रदेशातील भारतीय देवतांच्या
मूर्तींवर अर्थातच गांधारशैलीचा प्रभाव आहे.
मागील
लेखात पाहिल्यानुसार, गांधारप्रांतात वैष्णवपंथही लोकप्रिय होता. या
प्रदेशात अनेक विष्णुमूर्तीसुद्धा सापडलेल्या आहेत. मस्तकावर किरीट, गळ्यात
वैजयंतीहार, हातात शंख, चक्र, गदा घेतलेल्या सुंदर छोटेखानी विष्णुमूर्ती
गांधार प्रदेशात सापडल्या आहेत. विष्णूबरोबरच नरसिंह, वराह या विष्णूच्या
अवतारांच्या प्रतिमाही गांधारप्रदेशात आढळतात.
या सर्व
मूर्तींमध्ये १२ ते १४ सेंटिमीटर उंचीच्या छोटेखानी मूर्तीही आहेत. या
मूर्ती कदाचित खासगी वापरासाठी, म्हणजे वैयक्तिक पूजेसाठी, वापरल्या जात
असाव्यात, तर मोठ्या मूर्ती कदाचित मंदिरात पूजल्या जात असाव्यात.
गांधार हा प्रदेश मुख्यतः तिथले बौद्ध-स्तूप आणि विहार यांच्यासाठी
प्रसिद्ध आहे. मोठे स्तूप दुरून दिसत असल्यानं त्यांची नोंद करणं, तिथं
उत्खनन करणं हे तुलनेनं सोपं जातं. तिथल्या बौद्ध-मूर्तींची संख्या जास्त
असल्यानं त्या अनेक संग्रहालयांतून पाहायला मिळतात. यामुळे गेल्या दोनशे
वर्षांत गांधारमधील बौद्ध-वारसा हा अधिक नोंद आणि उत्खनन झालेला आहे.
गेल्या दोनशे वर्षांत गांधार प्रदेशातील हिंदू-मूर्ती या अनेकदा
अचानकपणे सापडलेल्या आहेत. या मूर्ती कोणत्या गावात कोणत्या ठिकाणी
सापडल्या आहेत याची नोंद केलेली नसते. त्यामुळे तिथं उत्खनन करता येणं शक्य
होत नाही. स्वातंत्र्यप्राप्तीनंतर विदेशी आणि पाकिस्तानी
पुरातत्त्वज्ञांनी पाकिस्तानातील हडप्पा संस्कृतीच्या आणि
बौद्ध-पुरातत्त्वीय स्थळांवर उत्खनन करण्यावर लक्ष केंद्रित केल्यामुळे फार
क्वचित हिंदू-मंदिरांचे अवशेष उजेडात आले आहेत.
मात्र,
या गांधार प्रदेशात शिव, विष्णू, कार्तिकेय, पार्वती, गणेश यांच्या अनेक
प्रतिमांवरून या सर्व देवतांचे उपासक या प्रदेशात दहाव्या शतकापर्यंत या
देवतांची उपासना करत होते हे स्पष्ट होते. या जवळजवळ एक हजार वर्षांच्या
काळात हाच गांधारप्रदेश भारतीय संस्कृती आणि धर्म त्यापलीकडील
अफगाणिस्तानात आणि मध्य आशियातील प्रदेशात पोहोचवण्यासाठी महत्त्वाचा ठरला.
(सदराचे लेखक हे सांस्कृतिक वारसा-अभ्यासक आहेत.)
मौर्यकाळात विदेशी व्यापारात प्रगती
संपूर्ण भारताला एका सूत्रात गोवण्याचा प्रयत्न पहिल्यांदा मौर्य काळात
झाला. राजकीय व्यवस्था एकाच सत्तेखाली येण्याचा हा काळ होता. या काळातील
सक्षम राजकीय पार्श्वभूमीने व्यापार व उद्योगाच्या विकासात मोलाचे योगदान
दिले.यावेळी सिरिया,इजिप्त तसेच इतर पाश्चात्य देशांशी भारताचे संबंध
स्थापित झाले. ग्रीक-रोमन लेखकांनी भारताच्या सागरी व्यापाराविषयी लिहून
ठेवले आहे.
एरियनच्या म्हणण्यानुसार भारतीय व्यापारी आपला माल विकण्याकरिता
ग्रीसच्या बाजारात जात असत. व्यापारी जहाजांची निर्मिती करणे हा
त्याकाळातील प्रमुख उद्योग होता. विदेशातील व्यापाऱ्यांच्या संरक्षणाचे
कार्य नवाध्यक्ष आणि पणाध्यक्ष नावाचे अधिकारी करीत असत असे अर्थशास्त्र या
कौटिल्याच्या ग्रंथात लिहिलेले आहे. विदेशी सार्थवाह भारताच्या
उत्तर-पश्चिमी व्यापारी मार्गावरून व्यापार करीत आल्याचे उल्लेख आढळतात.
मौर्य काळात भारत व इजिप्तमधील व्यापार उन्नत अवस्थेत पोचला होता. टोलेमी
या इजिप्तचा राजाने या व्यापाराला प्रोत्साहन देण्याकरिता लाल समुद्राच्या
किनाऱ्यावर ’ बरनीस ‘ नावाचे एक बंदर निर्माण केले होते. तेथून इजिप्तच्या
सिकंदरिया या विख्यात बंदरापर्यंत जाण्याकरिता तीन जमिनीवरील मार्ग उपलब्ध
होते.
प्राचीन काळात समुद्र मार्गे व्यापार चालत असे त्या अर्थी जहाजांच्या
संरक्षणाची व्यवस्था असणारच, पण त्याचे भक्कम पुरावे मिळत नाहीत. त्यामुळे
भारतीयांचे पहिले आरमार बाळगाण्याचा मौर्य साम्राज्याकडे जातो. चंद्रगुप्त
मौर्याच्या संरक्षण खात्याचे एकूण सहा विभाग होते व त्यातील पहिलाच विभाग
हा आरमारी विभाग होता. या विभागाचे ५ अधिकारी होते आणि ते आरमार प्रमुखाशी
संलग्न रहात असत. या आरमाराचे मुख्य काम समुद्री सीमा, नद्यांची मुखे,
नद्या आणि तळी यांच्यावर लक्ष ठेवणे हे असे. हे आरमार समुद्री चाच्यांचा
बंदोबस्त करीत असे. हे आरमार श्रीलंकेपर्यंत तर जात असेच, पण अगदी इजिप्त,
सिरीया येथपर्यंतही पोहचत असे. मौर्यांच्या आरमाराची बंदरे भारताच्या पूर्व
आणि पश्चिम या दोन्ही किनारपट्टीवर होती.
मौर्यांच्या नौदलाचे उल्लेख अशोकाच्या शिलालेखामध्येही आढळतात.
मौर्यांच्या नंतर सातवाहन राजांचे मोठे आरमार असल्याचे उल्लेख मिळतात.
सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी याचा मुलगा पुळूमावी याचे शक्तीशाली
आरमार होते. पुळूमावीच्या काळातील चलनी नाण्यांवर दोन शिडांच्या जहाजाचे
चित्र असलेले दिसते. सातवाहनकाळात भारताचा व्यापार खाडीतले देश आणि अगदी
इजिप्तशीही चालायचा.
सातवाहनांच्या नंतर दक्षिण भारतात होवून गेलेल्या पल्लव राजांचेही
शक्तीशाली आरमार होते. पल्लव घराण्यातील नरसिंहवर्मन या राजाने श्रीलंकेवर
आक्रमण करून तो देश ताब्यात घेतला होता.
भारतीय आरमाराची ही परंपरा पुढेही चालूच राहिली. चालुक्य, राष्ट्रकुट,
चोल, शिलाहार या सगळ्यांच्या राजवटीत त्यांची-त्यांची आरमारे होती. चालुक्य
सम्राट पुलकेशी दुसरा याच्या आरमारात किमान १०० जहाजे होती. त्याने
ओरिसातील पुरी शहरावर समुद्रमार्गे आक्रमण केल्याचे उल्लेख मिळतात. पुलकेशी
दुसरा याचा नातू विनयादित्य याने लंकेवर आक्रमण करून तेथील राजाला पराभूत
केले होते. विनयादित्या प्रमाणेच राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तिसरा यानेही
लंकेवर हल्ला करून लंकेच्या उत्तर भागावर आपले राज्य स्थापन केले होते.
सम्राट अशोक व सांची येथील स्तूप
चंद्रशेखर
March 29, 2012 - 9:32 am
चित्रा ताईंनी सम्राट अशोकाबद्दल सुरू केलेल्या धाग्याने माझ्या
संग्रहात असलेल्या 4 फोटोंची आठवण झाली. (फोटो मी काढलेले नाहीत. उतरवून
घेतलेले आहेत. आज परत यूआरएल शोधण्याचा प्रयत्न केला पण यश आले नाही. मूळ
छायाचित्रकाराला फोटोंचे पूर्ण क्रेडिट देऊन विषयाकडे वळतो.)
हे फोटो सांची स्तूपाच्या बाजूला असलेल्या प्रवेशद्वारावरील तोरणांचे आहेत.
फोटो दिसत नाहीत. कृपया खालील दुव्यावर जाऊन ते बघावेत
चन्द्रशेखर
[ फोटोंचे दुवे चुकले होते. दुव्याचा शेवट इमेज फायलीच्या एक्सटेन्शनाने
होतो आहे (उदा. .jpg, .png, .gif) हे सुनिश्चित करावे आणि मग फोटो टाकावा.
-- संपादन मंडळ ]
सांचीचा स्तूप वास्तुकलेपेक्षा तोरणांच्या अलंकरणासाठी प्रसिद्ध
आहे. आधी इथे लाकडी कठडे होते. ते जाऊन मग दगडकाम आले आणि तोरणे आली.
प्रत्येक तोरण दोन चौरस स्तंभाचे बनलेले आहे. ह्या स्तंभांच्या वर तीन
बाकदार नक्षीदार चौकट पट्ट्या आहेत. ह्या चौकट पट्ट्यांना ढेरपोट्या
वामनमूर्ती किंवा प्राणी आधार देताना दिसतात. ह्या तोरणांचे डिझाइन
बांबूच्या उचलद्वारांसारखे आहे.
सांचीचे एक तोरण ( ट्रेकअर्थ डॉट कॉम वरून साभार)
ह्यानिमित्ताने स्तूपांविषयी आणि बौद्ध वास्तुकलेबाबत चर्चा झाल्यास उत्तम.
चित्रे उत्तम आहेत. त्यामानाने माहिती त्रोटक असली तरी चर्चेतून पुढे येईल असे समजते. अधिक माहितीच्या अपेक्षेत.
मौर्यकाल: इ. स. पू. चौथ्या शतकाच्या अखेरीस भारतातील
प्राचीन मगध देशात मौर्य वंश उद्यास आला. या वंशातील राजांनी इ. स. पू. ३२१
ते १८५ दरम्यान भारतखंडाच्या बहुतेक भागावर राज्य केले आणि प्रथमच एकछत्री
अंमल प्रस्थापित केला. या काळाला मौर्यकाल ही सर्वसाधारण संज्ञा देतात. या
काळात जमात राज्ये किंवा महाजनपदे आणि लहान लहान राज्ये यांच्या जागी एक
मोठे साम्राज्य उत्पन्न झाले. यापूर्वीचे नंद घराण्याचे राज्य फक्त उत्तर
भारतापुरते, त्यातल्या त्यात गंगा-यमुनांच्या दुवेदीत व त्याच्या आसपासच्या
प्रदेशापुरते मर्यादीत होते. त्याचा विस्तार करून ते बव्हंशी भारतभर
पसरविण्याचे काम मौर्य वंशातील राजांनी विशेषतः चंद्रगुप्ताने केले. पुढे
या साम्राज्याला आणि शासनयंत्रणेला काही उच्च जीवन मूल्ये व नैतिक अधिष्ठान
त्याच्या नातवाने–सम्राट अशोक–याने दिले. यामुळे मौर्य साम्राज्याला एकूण
भारतीय जीवनात एक विशिष्ट स्थान प्राप्त झाले आहे.
ऐतिहासिक साधने : मौर्यकालासंबंधीची माहीती मुख्यत्वे
तत्कालीन वाङ्मय, परकीय प्रवाशांचे वृत्तांत, पुरातत्त्वीय अवशेष–विशेषतः
शिला व प्रस्तर लेख यांवरून मिळते. पुराणांत अनेक राजे, राजवंश आणि त्यांचे
पराक्रम यांचे उल्लेख व वर्णने जागोजाग पाहावयास मिळतात परंतु ही वर्णने
बहुतेक ठिकाणी अतिशयोक्तीपूर्ण, संदिग्ध आणि बऱ्याच वेळा विसंगतच नव्हे, तर
परस्परविरोधी आहेत. त्यामुळे त्यांचा अन्वयार्थ लावणे जिकीरीचे होते.
तथापि मौर्यांच्याविषयी माहीती देणारी शिलालेखांसारखी साधने
विश्वसनीयतेच्या दृष्टीने अत्यंत महत्त्वाची आहेत. सम्राट अशोकाने
कोरविलेल्या या कोरीव लेखांपैकी अनेक लेख उपलब्ध झाले असून त्यांचे वाचनही
झाले आहे. आजपर्यंत दृष्टोत्पत्तीस आलेले बहुतेक लेख प्राकृतातील आहेत.
काही ब्राह्मी लिपीत तर काही खरोष्ठी वॲरेमाइक लिपीतही आहेत. या
शिलालेखांचे अभ्यासकांनी प्रस्तर लेख, प्रशस्ती लेख व लघुलेख असे तीन
स्वतंत्र भाग पाडलेले आहेत. हे लेख काहीसे उपदेशपर असून अशोकप्रणीत
सदाचरणाच्या मार्गांचे दर्शन त्यातून घडते. त्यांत राजाज्ञा, उपदेशपर
धर्माज्ञा, चोल, चेर, पांड्य अशा काही राज्यांचे तसेच सुधारणांचा उल्लेख
आहे. या अनुषंगाने काही शासनविषयक गोष्टींचा तसेच राजकीय स्थितीचा उल्लेख
त्यातून मिळतो. अशोकाचा नातू दशरथ याने बिहारमधील नागार्जुन टेकड्यातील
गुंफा-समूहांत कोरविलेला लेख म्हणजे एक दानपत्रच असून त्यात आजीवक
पंथीयांच्या निवासासाठी या गुंफा खोदविल्याचा स्पष्ट उल्लेख आहे. [→ अशोक
स्तंभ].
अशोकस्तंभाचे सिंहशीर्ष, सारनाथ.
लिखित साधनांत मीगॅस्थिनीझचे इंडिका आणि ⇨ कौटिलीय अर्थशास्त्र यांना असाधारण महत्त्व आहे. चंद्रगुप्ताच्या दरबारी सील्यूकस निकेटर या ग्रीक राजाने ⇨ मीगॅस्थिनीझ नावाचा
वकील पाठविला होता. त्याने इंडिका नावाचा ग्रंथ लिहिला होता. तो आता नष्ट
झाला आहे पण नंतरच्या ग्रीक लेखकांनी या ग्रंथातील काही भाग आपल्या ग्रंथात
उद्धृत केला आहे. विशेषतः स्ट्रेबो याने ख्रिस्ती शकाच्या आरंभाच्या
सुमारास लिहिलेल्या भूगोलविषयक ग्रंथात त्याने मीगॅस्थिनीझच्या इंडिकामधील
चंद्रगुप्त, पाटलिपुत्र, मौर्य साम्राज्य अशा विषयांवरील माहिती उद्धृत
केलेली आहे. ही माहिती बहुतेक ठिकाणी तपशीलवार आणि सूक्ष्म आहे. स्वाभाविकच
ती ग्राह्य मानण्याकडे अभ्यसकांचा कल असतो. त्या माहितीत सत्यांश किती
आहे, हे तत्कालीन इतर पुराव्यांच्या आधारे पडताळून पाहणे इष्ट ठरते.
याशिवाय प्लूटार्क आणि जस्टिन यांच्या लिखाणातूनही काही माहिती मिळते, ती
बरीचशी अप्रत्यक्षरीत्या मिळते.
चंद्रगुप्ताचा गुरू चाणक्य म्हणजेच अर्थशास्त्र या राजनीतिशास्त्रावरील ग्रंथाचा लेखक कौटिल्य असे अनेक अभ्यासकांचे मत आहे. अर्थशास्त्रात
राज्य या संस्थेची उत्पत्ती, तिचा विकास, सत्ता व अधिकार यांचे तात्त्विक
स्वरूप, नागरिक या कल्पनेचे स्पष्टीकरण अशा विविध स्वरूपाचे तात्त्विक आणि
सैद्धांतिक विवेचन आढळते. त्यामुळे स्वाभाविकपणेच अर्थशास्त्रामध्ये मौर्यांच्या शासनव्यवस्थेचे प्रतिबिंब उमटलेले आहे असे समजण्यात येते. मीगॅस्थिनीझची वर्णने आणि कौटिलीय अर्थशास्त्रातील वर्णने यांमध्ये पुष्कळ वेळा आश्चर्यकारक साम्य आढळते.
चंद्रगुप्त मौर्याने आपल्या आयुष्याच्या उत्तरकालामध्ये जैन मताचा
स्वीकार केला व तो राजसंन्यास घेऊन कर्नाटकमध्ये निघून गेला, अशी आख्यायिका
आहे. स्वभाविकच जैन वाङ्मयात त्याच्या चरित्राचे काही दिसतात.
बौद्धांच्या दिव्यावदान, महावंस, महापरिनिर्वाण सूत्र या ग्रंथांतून मुख्यतः चंद्रगुप्त आणि अशोक यांच्याविषयी माहिती मिळते. विष्णुपुराण, वायुपुराण, युगपुराण, गार्गी संहिता, हर्षचरित अशा काही ग्रंथात प्रसंगोपात्त त्यांचे उल्लेख येतात. विशाखदत्ताच्या मुद्राराक्षस
या नाटकाचा उल्लेख उत्तरकालीन साधनग्रंथांत प्रामुख्याने करण्यात येतो.
चंद्रगुप्तानंतर सहा–सात शतकांनी हे नाटक लिहिलेले आहे.या नाटकामध्ये नंद
राजाचे उच्चाटन करण्याचे व मौर्याचे राज्य स्थापन करण्याचे श्रेय
चंद्रगुप्तापेक्षा चाणक्यालाच अधिक दिलेले दिसते. परंपरेचे पालन त्यातून
स्पष्ट होते.
मौर्यकालीन कलाशिल्पांचे अनेक अवशेष अद्यापि अवशिष्ट आहेत. त्यांवरून
तत्कालीन धार्मिक समजुती व कलापरंपरा यांचा बोध होतो पण त्याबरोबरच
मौर्यकालीन संस्कृतीवर इराणी परंपरेचा किती प्रभाव पडला होता, हेही प्रतीत
होते.
राजकीय इतिहास : मौर्य हे कुलनाम जैन, बौद्ध, हिंदू
अशा सर्व धार्मिक वाङ्मयाला ज्ञात आहे. जस्टिनसाखे परकीय लेखकही या वंशाला
याच नावाने ओळखत. मात्र हे कुल कोठले व मौर्य हे नाव त्याला कसे प्राप्त
झाले, यांविषयी अनेक मतमतांतरे व प्रवाद प्रचलित आहेत. जस्टिनसारख्या काही
लेखकांच्या पुस्तकात चंद्रगुप्त हा हीन कुलात जन्मला, असे एक मोघम विधान
आढळते. जैन ग्रंथात चंद्रगुप्ताचा जन्म मोर पाळणाऱ्या जमातीत झाला, म्हणून
त्याला मौर्य नाव पडले असे म्हटले आहे. मौर्यकाळानंतरच्या पाचसहा शतकांनी
लिहिलेल्या संस्कृत ग्रंथात व नाटकात शेवटचा नंद सम्राट धनानंदाचा
चंद्रगुप्त हा दासीपुत्र असून त्या दासीचे नाव मुरा होते.म्हणून या
घराण्याचे नाव मौर्य पडले असे म्हटले आहे. मुरा ही धनानंदाची राणी होती व
तिला एका नापित प्रियकरापासून चंद्रगुप्त हा मुलगा झाला, असाही प्रवाद आहे.
बौद्ध वाङ्मयात चंद्रगुप्त व बिंदुसार हे क्षात्रकुलोत्पन्नच आहेत, असे
उल्लेख येतात. उत्तर प्रदेशाच्या पिप्पलिवन या भागात मोरिय नावाची एक
क्षत्रिय जमात राज्य करीत होती. या मोरिय जमातीत चंद्रगुप्ताचा जन्म झाला,
म्हणून त्याच्या घराण्याला मौर्य म्हणू लागले असावेत. चंद्रगुप्ताच्या
व्यक्तिमत्त्वाने चाणक्य प्रभावित झाला आणि त्याने चंद्रगुप्तास सर्व
विद्यांत पारंगत करून नंदांच्या उच्छेदास सिद्ध केले, अशी सर्वसाधारण
ऐतिहासिक धारणा आहे. अलेक्झांडरच्या भारतातील स्वारीनंतर दोनतीन वर्षांच्या
कालावधीतच चंद्रगुप्ताचा उदय होऊन त्याने मगध राज्याचा ताबा मिळविला.
अलेक्झांडरच्या स्वारीचा काळ इ. स. पू. ३२४–२१ असा मानला, तर चंद्रगुप्ताचा
राज्यारोहण काल इ. स. पू. ३२४–२१ असा समजता येतो. त्यानंतर या वंशात सात
राजे झाले. शेवटचा राजा बृहद्रथ याला मारून त्याचा सेनापती ⇨ पुष्यमित्र शुंग
याने गादी बळकावली. हा प्रसंग इ. स. पू. १८५–८४ च्या सुमारास घडला. म्हणजे
आठ मौर्य राजांची मिळून एक राजवट १३७ वर्षांची होती. त्यांची नावे
पुढीलप्रमाणे:
चंद्रगुप्त: इ.स.पू. ३२४/२१–३००
राज्यकाल – चोवीस वर्षे
बिंदुसार: इ.स.पू. ३००–२७३
राज्यकाल – पंचवीस वर्षे
अशोक: इ.स.पू. २७३–२३६
राज्यकाल –सदतीस वर्षे
कुणाल: अनिश्चित
अनिश्चित
दशरथ: ,,
,,
संप्रती: ,,
,,
शालिशूक: ,,
,,
बृहद्रथ: अनिश्चित–इ.स.पू. १८५
,,
यांपैकी चंद्रगुप्ताचा राज्यकाल पुराणांनी दिला आहे. बिंदुसाराचा
राज्यकाल पुरणांच्या मताने पंचवीस वर्षांचा, तर बौद्ध वाङ्ययानेअठ्ठावीस
वर्षांचा सांगितला आहे. अशोकाच्या कारकीर्दीतबाबत सर्व मौर्य राजवंशाचा
कालक्रम निश्चित करण्यासाठी उपयुक्त पडणारी सर्व साधने अप्रत्यक्ष आहेत
तसेच ती परस्परविरोधी आहेत. बौद्ध परंपरेप्रमाणे अशोकाने राज्यारोहण केले,
त्यावेळी गौतमाच्या निर्वाणास २१८ वर्षे झाली होती. निर्वाण केव्हा झाले,
याविषयी एक सिंहली व दुसरी चिनी अशा दोन परंपरा आहेत. सिंहली परंपरेप्रमाणे
हा काळ इ. स. पू. ५३७ असा येतो, तर चिनी परंपरेप्रमाणे इ. स. पू. ४८७
येतो. चिनी परंपरा अधिक विश्वसनीय मानण्याकडे विद्वानांचा कल आहे. याशिवाय
समकालीन ग्रीक राज्यांचे उल्लेख, विशेषतः अलेक्झांडरची स्वारी व तदनुषंगिक
माहिती किरीनचा राजा मगस, सिरियीचा थिऑस हे अशोकाचे समकालीन शेवटी
बृहद्रथाच्या वेळी ग्रीकांनी केलेली स्वारी व तिचा पतंजलीच्या महाभाष्यात येणारा वर्तमानकाळी उल्लेख यांचा कालनिश्चितीस उपयोग होतो.
चंद्रगुप्त (इ. स. पू. कार. ३२४–३००) हा मौर्य वंशाचा संस्थापक असून
सुरुवातीस त्याने तक्षशिलेच्या बाजूला शस्त्रोपजिवी लोकांचे सैन्य उभारून
धनानंदाचा पाडाव केला. पुढे गादीवर येताच त्याने सील्यूकस निकेटरच्या
आक्रमणास पायबंद घालून त्याचा पराभव केला. व भारतातील ग्रीक सत्ता
संपुष्टात आणली आणि पंजाब, सिंध हे भूप्रदेश आपल्या राज्यात समाविष्ट केले.
त्याने जवळजवळ अखिल भारत आपल्या एकछत्री अंमलाखाली आणला. सील्यूकसने
मीगॅस्थिनीझ यास आपला वकील म्हणून चंद्रगुप्ताच्या दरबारात ठेवले.
सील्यूकसच्या लढाईनंतर चंद्रगुप्ताने फारशी आक्रमणे केलेली दिसत नाहीत.
आयुष्याच्या उत्तरकाळात जैनमताचा स्वीकार करून त्याने राजसंन्यास घेतला आणि
उर्वरीत आयुष्य दक्षिणेत कर्नाटकात व्यतीत केले, अशी कथा प्रसृत आहे.
चंद्रगुप्तानंतर त्याचा मुलगा बिंदुसार (इ. स. पू. कार. ३००–२७३) गादीवर
आला. त्याला अमित्रघात व सिंहसेन अशीही नावे होती. त्याच्या कारकिर्दीविषयी
विशेष माहीती ज्ञात नाही. त्याने पित्याचेच राज्य राखले आणि तक्षशिला
प्रांताचे बंड मोडण्यासाठी राजपुत्र अशोक याची नियुक्ती केली.
[→ चंद्रगुप्त मौर्य].
अशोक (इ. स. पू. कार. २७३–२३६) हा या वंशातील सर्वश्रेष्ठ राजा.
राज्यारोहणानंतर त्याने कलिंग प्रदेश जिंकला आणि पुढे युद्धसंन्यास घेऊन
बौद्ध धर्माचा स्वीकार व प्रसार केला. अशोकाने धर्मप्रसारार्थ खास अधिकारी
नेमले आणि कोरीव लेखांद्वारे धर्माज्ञा कोरविल्या. त्याच्या प्रदीर्घ
कारकीर्दीत अनेक कल्याणकारी सुधारणा करण्यात आल्या. त्याचा अंमल दक्षिणेतील
काही राज्ये वगळता सर्व भारतावर होता.
[→ अशोक–२].
यानंतरच्या एकही राजाचे चरित्र ज्ञात नाही. बृहद्रथ हा अशोकाचा
नातू/पणतू. त्याचा वध त्याचाच सेनापती पुष्यमित्र शुंग याने केला. यावरून
त्यावेळी राजकुल दुर्बल झाले होते हेच स्पष्ट होते.
अलंकृत द्वारशाखा, लोमशऋषी-गुहा, बराबर टेकडी, बिहार राज्य.
साम्राज्य विस्तार : नंदांच्या वेळी मगधचे राज्य
मुख्यत्वे गंगा-यमुनांच्या खोऱ्यात बिहार व उत्तर प्रदेश असे मर्यादित
होते. कालांतराने त्याचा पश्चिमेकडे विस्तार झाला. चंद्रगुप्ताने नंदांचा
उच्छेद केल्यावर अफगाणिस्तान, सिंध वगैरे पश्चिमेकडील प्रदेश आपल्या
अंमलाखाली आणले. बिंदुसाराने ते फक्त जोपासले. मौर्य साम्राज्याचा सर्वांत
अधिक विस्तार अशोकाचा कारकीर्दीत झाला. त्याने कलिंगवर स्वारी करून ते
जिंकले. या साम्राज्याच्या सीमा अशोकाच्या कोरीव लेखांद्वारे निश्चित
होतात. ज्या ज्या ठिकाणी अशोकाने आपले लेख कोरविले, ती स्थळे त्याच्या
साम्राज्यात व आधिपत्याखाली असणार हे उघडच आहे. उत्तर भारतात,
गंगा-यमुनांच्या खोऱ्यात, वायव्येला अफगाणिस्तानात जलालाबाद, कंदाहार आणि
पाकिस्तानच्या पेशावर व हजारा जिल्ह्यातील शहबाझगढी, तक्षशिला व मानसेहरा
येथेही हे लेख मिळाले आहेत. पश्चिमेला सौराष्ट्रात गिरनारच्या पायथ्याशी व
ठाणे जिल्ह्यात सोपारा येथे दक्षिणेला चितळदुर्ग आणि कोप्पळ जिल्ह्यात,
आंध्र प्रदेशात कुर्नूल जिल्ह्यात आणि पूर्वेकडे ओरिसाच्या पुरी व गंजाम
जिल्ह्यांत अशोकाचे लेख मिळालेले आहेत. थोडक्यात वायव्येकडील
अफगाणिस्तानापासून पूर्व-पश्चिम आसिंधुसिंधू आणि दक्षिणेला
कृष्णा-तुंगभद्रा नद्यांपर्यंत मौर्य साम्राज्य विस्तारलेले होते. या
लेखांमध्ये अशोकाने आपले सीमावर्ती लोक व देश यांचा उल्लेख केला असून
वायव्येला यवन राजा अंतियक (अँटायओकस) आणि दक्षिणेकडील चोल, पांड्य व
केरलपुत्र (चेर) यांचा सीमावर्ती म्हणून निर्देश केलेला आहे.
शासनव्यवस्था : मीगॅस्थिनीझचे लेखन, अशोकाचे लेख आणि काही प्रमाणात कौटिलीय अर्थशास्त्र
यांतून मौर्य शासनाची माहिती मिळते. राजा किंवा सम्राट हा शासन
यंत्रणेच्या अग्रभागी होता. तो वंशपरंपरेच्या अधिकाराने या पदावर येत
असल्याने त्याची सत्ता तत्त्वतः तरी अनियंत्रित होती. नवीन कायदेकानू करणे,
त्यांची अंमलबजावणी करणे आणि न्यायदान या सगळ्यांचे अधिकार राजाकडे होते.
चंदगुप्तासंबंधी मीगॅस्थिनीझ सांगतो, की ‘सम्राट हा सतत राज्यव्यवहारात
मग्न असतो, मालीश वा स्नान करीत असतानाही तो आपल्या दूतांनी आणलेली माहिती
ऐकतो, विश्रांती घेताना क्वचितच सापडतो.’ या कामात त्याला सहाय्य
करण्यासाठी मंत्रिपरिषद असे. परिषदेतील मंत्री राजानेच नेमलेले असत आणि
त्याला नकोसे वाटल्यास त्यांना काढून टाकण्यात येई. हे मंत्री
राज्यव्यवहाराचा उत्तम अनुभव गाठीशी असलेले, राजाच्या विश्वासातले असून
त्यांच्याकडे एकेका स्वतंत्र खात्याचा कारभार सोपविलेला असे. मीगॅस्थिनीझ
मंत्रिपरिषदेच्या सर्वसाधारण कार्यव्यापाचीही कल्पना देतो. प्रादेशिक,
प्रांतांचे प्रमुख अधिकारी, उपशासनाधिकारी, राज्याचे कोषाध्यक्ष , सेनापती,
दंडाधिकारी, न्यायाधीश, शेतकीसारख्या खात्यांचे प्रमुख असे (सगळे
महत्त्वाचे) अधिकारी यांची नियुक्ती मंत्रिपरिषद करीत असे. राजा व
मंत्रिपरिषद यांच्यामध्ये उपराज व अग्रामात्य अशी दोन पदे काही वेळा
दिसतात. अशोकाने आपला भाऊ वा मुलगा तिस्स यालाच उपराज नेमले होते.
साम्राज्याचे जे प्रांत होते त्या प्रांतांच्या प्रमुखपदी राजप्रतिनिधी
किंवा प्रांताधिप नेमलेले असत. अशोकाने तक्षशिला, उज्जैन, तोषाली व
सुवर्णगिरी या प्रांतांवर राजपुत्रांची राजप्रतिनिधी म्हणून नेमणूक केली
होती. त्यांपैकी तक्षशिलेचा ‘कुणाल’ याचे नाव ज्ञात आहे. प्रादेशिक,
राष्ट्रिक राजूक, यूत, महामात्र अशी अनेक पदे साधारण प्रांताधिकाऱ्यांच्या
दर्जाची असावीत. त्यांच्या दर्जात व कार्यक्षेत्रात नेमका काय फरक होता हे
समजत नाही. ज्यांची कार्यव्याप्ती निश्चितपणे समजते असे दोनच अधिकारी ज्ञात
आहेत, ते म्हणजे अशोकाने नेमलेले धर्म-महामात्र व
स्त्री-अध्यक्ष-महामात्र. धर्म-महामात्रांचे काम बौद्ध धर्माचा प्रचार करणे
असे नव्हते, तर प्रत्येक धर्मपंथांचे आचारविचार निर्वेधपणे चालावेत हे
होते. यासाठी प्रत्येक पंथाला महामात्र नेमला होता. प्रांताच्या मुख्य
शासकाला सल्ला देण्यासाठी, कारभारात साहाय्य करण्यासाठी मंत्रिपरिषदेसारखीच
इतर मंडळे असत. दर तीन किंवा पाच वर्षांनी, महत्त्वाच्या सर्व
अधिकाऱ्यांनी आपापल्या क्षेत्रात तपासणीसाठी दौरे काढावेत, अशी पद्धत
अशोकाने सुरू केली. परराष्ट्रांशी, म्हणजे राजांशी, संपर्क ठेवण्यासाठी जे
वकील नेमले जात, त्यांना दूत अशी संज्ञा होती.
राज्यातील घडामोडींची, प्रजेची, राजाला अद्ययावत माहिती असली पाहिजे,
यावर मौर्य शासनाचा कटाक्ष होता. ही माहिती गोळा करून राजापर्यंत
पोहोचविण्याचे काम करणारी स्वतंत्र यंत्रणा होती. ही गुप्तहेरांची संघटना
नव्हती, तर नित्याची आकडेवारी जमा करून राजाला पुरविण्याचे काम तिच्याकडे
होते. गुप्तहेरांचे स्वतंत्र खाते होते. मीगॅस्थिनीझ व कौटिल्य दोघांनीही
या संघटनांचे महत्त्व प्रतिपादिले आहे.
मध्यवर्ती शासनाची रचना कितीही विचारपूर्वक केलेली असली आणि रस्ते व
वाहतूकव्यवस्था कितीही उत्तम असली, तरी भौगोलिक अंतर नाहीसे करणे अशक्य
होते. म्हणून स्थानिक प्रशासनाचे महत्त्व कधीही कमी झाले नाही. खेड्यात आणि
ग्रामातून पूर्वापार चालत आलेली पंचायतीसारखी शासनपद्धत कायम होती.
मीगॅस्थिमीझने नगरशासनाचे तपशीलवार वर्णन दिले आहे. त्यावरून शासनाच्या
कार्याची आणि कार्यव्याप्तीची कल्पना येते. त्यात म्हटले आहे, नगराचा
कारभार पाहण्यासाठी एक नगरपरिषद असे. या परिषदेच्या सहा उपसमित्या असत व
प्रत्येकीत पाच सभासद होते. पहिल्या समितीकडे औद्योगिक-शिल्पविषयक कामे
असत. दुसऱ्या समितीकडे परदेशी नागरिकांच्या देखभालीचे काम होते. त्यांना
निवासस्थाने उपलब्ध करून देणे व त्यांच्या एकूण वर्तणुकीवर देखरेख ठेवणे ही
या समितीची मुख्य कामे होती. परदेशी नागरिकांच्या दिमतीला जे नोकरचाकर
दिलेले असत त्यांच्याकडून परकीयांवर लक्ष ठेवले जाई. याशिवाय त्यांना
आपापाल्या देशी सुखरूप पोहोचविणे, आजारी पडले तर औषधपाणी व शुश्रूषा करणे,
मृत्यू पावले तर त्यांची उत्तरक्रिया करणे आणि त्यांची मालमत्ता त्यांच्या
वारसाकडे पोहोचविणे, ही या समितीचीच जबाबदारी होती. तिसऱ्या समितीकडे
जनगणनेची नोंद, विशेषतः जन्म-मृत्यू यांची नोंद ठेवण्याचे काम होते.
यामध्ये कर आकारणीचे काम सुलभ व्हावे असा हेतू होता. तद्वतच, समाजाच्या
विविध स्तरांत जन्म-मृत्यूचे प्रमाण काय आहे, याची शासनाला सतत जाणीव ठेवणे
हाही होता. चवथ्या समितीकडे व्यापार उदिमाची व्यवस्था होती. विशेषतः
वजनमापे तपासणे आणि मालाच्या दर्जावर लक्ष ठेवणे, ही या समितीची प्रमुख
कामे होती. एकापेक्षा अधिक वस्तूंचा व्यापार करावयाचा असला, तर त्यासाठी
वेगळा कर भरावा लागे. पाचव्या समितीकडे उत्पादन हे खाते होते. नव्या
मालाच्या विक्रीची व्यवस्था करणे, हे या समितीचे मुख्य काम. सहाव्या
समितीकडे विक्रीकर वसूली हे काम होते. किंमतीच्या एक-दशांश इतका भाग
विक्रीकर म्हणून द्यावा लागत असे व कर चुकविणाऱ्यास जबर शिक्षा असे.
याशिवाय सर्वांना मिळून सार्वजनिक हिताची अनेक कामे करावी लागत.
सार्वजनिक बांधकामे, मंदिरे-मठ यांची देखभाल, बंदरे, रस्ते व बाजारपेठांची
व्यवस्था, किंमतीवर नियंत्रण, भूमापन, जलपूर्ती, कालवे, जंगले,
जंगलसंपत्ती, खाणी इ. गोष्टींची व्यवस्था नगरपरिषदेला पहावी लागत असे.
सैन्याची व्यवस्था अशाच सहा समित्यांकडे सोपविलेली होती. घोडदळ, पायदळ,
गजदळ, रथांचे दळ, नौदल आणि पुरवठा या प्रत्येकासाठी एकएक समिती होती.
युद्धाचे वेळी सेनादलांचे नेतृत्व राजाच करीत असे. या समित्या त्याच्याच
मार्गदर्शनाखाली काम करीत असत. कौटिलीय अर्थशास्त्रात वर्णन केलेली सेनादलाची संघटना याच प्रकारची होती, हे ध्यानात ठेवण्यासारखे आहे.
आर्थिक स्थिती : लोकांचा मुख्य व्यवसाय शेती हा होता.
गंगा-यमुना खोरे अतिशय सुपीक आणि त्यामुळे धान्याची आणि धनाची सुबत्ता
होती. शेतकीच्या जोडीला पूर्वीपासून चालत आलेला गोपालनाचा व्यवसाय सर्वत्र
प्रचलित होताच. संपत्तीचे आणखी एक निसर्गदत्त साधन म्हणजे जंगले आणि खाणी.
जंगलातून विविध प्रकारचे इमारती- लाकूड, डिंक, लाख असे पदार्थ मिळत.
खाणीतून निरनिराळे धातू तसेच हिऱ्यामाणकांसारखे मौल्यवान खडे मिळत. या
व्यवसायांच्या जोडीला, काही प्रमाणावर त्यांना आवश्यक व त्यांच्यावरच
अवलबूंन असे अनेक व्यवसाय होते. या सगळ्यांना मिळून ‘शिल्प’ ही संज्ञा
होती. ह्या शिल्पकारांमध्ये सुतार, लोहार, (धातुकार), चर्मकार, कुंभार,
पाथरवट, चितारी-रंगारी, सोनार, हस्तिदंतावर कोरीवकाम करणारे अशांचा समावेश
असे. याशिवाय मच्छीमारी, फासेपारधी यांचे व्यवसाय ‘हीन-शिल्प’ या वर्गात
येत. प्राचीन जातक वाङ्मयावरून असे दिसते की बऱ्याच वेळी एकाएका
व्यावसायिकांची स्वतंत्र खेडी व गावे असत. त्यांचेच प्रतिबिंब पुढच्या
काळातल्या नगरांच्या आखणीतही उमटले आणि मग रंगारी गल्ली (वींधी), लोहार
गल्ली अशा भागांचे उल्लेख येतात. या व्यावसायिकांच्या संघटना-श्रेणी
होत्या. त्यांचा उपयोग कारागिरांना शिक्षण देण्याकरताच नव्हता, तर धंद्याला
आवश्यक ते भांडवल, साहित्य हे उधार-उसनवारीने पुरविण्याचे काम या
व्यावसायिक संघटना करीत. सामान्यपणे व्यवसायावर संघटना असत. स्वाभाविकच
बाजारपेठा तयार झाल्या आणि उत्पादक व उपयोजक यांना जोडणारा दुवा म्हणजे
व्यापारी तोही चांगला सरसावला. व्यापाऱ्यांच्याही श्रेणी तयार झाल्या.
उधार-उसनवारी, कर्जे इ. व्यापारात अंगभूत असणाऱ्या गोष्टींची व्यवस्था या
श्रेणी करीत असत. उत्पादन दूरवर जावयाचे झाले म्हणजे प्रत्यक्ष वाहतुकीची
व्यवस्था आलीच. वाहतूक हाच व्यवसाय करणारे, बैलांचे मोठाले तांडे बाळगणारे
लोक एकत्र आले, त्यांच्या संघटना तयार झाल्या. या श्रेणीमध्ये सार्थवाह आणि
स्थलनियामक हे मार्गदर्शक महत्त्व पावले. वाहतूक म्हटल्यावर व्यापारी
मार्ग आलेच. असे अनेक प्राचीन व्यापारी मार्ग आता ज्ञात झाले आहेत.
राजगिरपासून पश्चिमेकडे श्रावस्ती, साकेत, बनारस असे करीत करीत एक मार्ग
तक्षशिलेपर्यंत आणि तेथून पुढे थेट इराणपर्यंत जात असे. मथुरेपासून
दक्षिणेला एक रस्ता असावा असे पुरातत्त्ववेत्त्यांचे मत आहे. तो
अवंती-म्हणजे उज्जैनवरून-गुजरातच्या किनाऱ्यावरील भडोच, सोपारावरून कल्याण,
जुन्नरमार्गे दक्षिणेला जाई. दुसरा फाटा उज्जैनवरून माळव्यातून खाली उतरून
पितळखोरे, अजिंठा मार्गाने दक्षिणेकडे जाई. मौर्यकालीन साहित्यात कोणत्या
मालाची ने-आण होत असे, याचे स्पष्ट उल्लेख मिळत नाहीत. भूमार्गांशिवाय
जातककथांमध्ये सागरीवाहतुकीचे अनेक उल्लेख आणि वर्णने येतात. यांपैकी
बहुतेक वाहतूक पूर्वेकडील देशांकडे-सुवर्णभूमी-सध्याचा इंडोचायना आणि
दक्षिणेकडे सिंहलद्वीपाकडे होत असे. उच्चप्रतीचे तलम कापड, मलमल, रेशमी
कापड, अत्तरे व सुगंधी द्रव्ये (धूपासारख्या वस्तू), मसाले, मोती, रत्ने,
माणके यांची निर्यात होत असे. तर आयात मालात प्रत्यक्ष सुवर्णरूपाने,
उत्पादन, वाहतूक, व्यापार यांचा व्याप व देवघेवीची गुंतागुंत ध्यानात घेतली
म्हणजे या व्यवसायात गुंतलेला समाज सर्व देशभर पसरलेला असला तरी
परस्परावलंबी होता हे सहज ध्यानात येते.
कला : मौर्यकाळात लाकूड, माती, हस्तिदंत, पाषाण इ.
माध्यमांचा उपयोग वास्तुकला आणि शिल्पकला यांकरिता करीत असत तथापि या
अवशेषांत प्रामुख्याने पाषाणशिल्पांचेच प्रमाण जास्त असून काही मृण्मूर्ती
उपलब्ध झाल्या आहेत. त्या काळची वास्तुकला ही प्रामुख्याने लाकडाची
असल्यामुळे पाटलिपुत्र येथील राजवाड्यांचे अवशेष फारसे उपलब्ध झाले नाहीत.
मात्र स्तूपांतून मौर्यकालीन शैली ज्ञात होते. तिथे लाकूडकामाच्या खुणा वा
खोबण्या दिसतात. त्यात अशोकाचे स्तंभ व त्यांवरील कलाकुसर वैशिष्ट्यपूर्ण
असून काही यक्ष-यक्षींच्या प्रतिमा आणि मातृदेवतांच्या मृण्मूर्तीही
आढळतात. या कालातील कलाशिल्पांचे अवशेष हे उपलब्ध कला अवशेषांतील सर्वांत
प्राचीन अवशेष समजण्यात येतात. याचे प्रमुख कारण म्हणजे हे अवशेष, विशेषतः
मूर्तिकाम, दगडांचे आहे. म्हणून ते टिकून राहिले आहे. मौर्य शिल्पावर
काचेसारखी चमक आणलेली आहे. नंतरच्या काळात ही विद्या कोठे कोठे टिकून
राहिली पण मौर्यांच्या सर्वच मूर्तिकामावर अशी झिलाई आहे. पाटलिपुत्र या
राजधानीतील (सध्याचे पाटणा, बिहार) उत्खननात काही अवशेष मिळाले. त्यात
कलात्मकतेपेक्षा भव्यतेची अधिक साक्ष पटते. अशोकाच्या काळात बौद्ध
धर्मीयांना पवित्र असलेल्या स्थळी स्तूप आणि ध्वजस्तंभ उभारण्यात आले.
यांतील स्तूप बव्हंशी नाहीसे झाले आहेत आणि सांचीसारख्या काही ठिकाणी
नंतरच्या जीर्णोद्धारामुळे त्यांचे मूळ स्वरूप लोप पावले आहे. ध्वजस्तंभ
एका पाषाणात घडविलेले गोल स्तंभ असून त्यांची उंची पुष्कळदा बारा मीटर इतकी
होती. या स्तंभांची शीर्षे अलंकारयुक्त असत. या स्तंभांच्या माथ्यावर
हत्ती, बैल, घोडा आणि सिंह यांच्या मूर्ती बसविलेल्या होत्या. या मूर्ती
यथातथ्य आहेतच पण त्यांपैकी अनेक प्राणी उदा. वृषभ (रामपूर्वा, बिहार)
अत्यंत जिवंत वाटतात. सारनाथच्या स्तंभावर एकमेकाकडे पाठ करून खेटून उभे
असलेले चार सिंह आहेत. त्यांच्या डोक्यावरील धर्मचक्र आता पुसट झाले आहे.
परंतु या सिंहाच्या मूर्ती अतिशय वेधक ठरतात. सिंहाच्या नैसर्गिक रूपाला
थोडासा कृत्रिमतेचा, ताठरपणाचा, रेखीवपणाचा स्पर्श करून या वनराजाच्या
प्रतीकातून राजवैभव व सामर्थ्य यांचे उत्कृष्ट दर्शन शिल्पकाराने घडविले
आहे. सिंहांच्या पायाशी असलेल्या तबकडीवरच हत्ती, घोडे इ.प्राणी उलट अगदी
सहज हालचाल करताना दिसतात. अशोकाचा नातू दशरथ याने नागार्जुन टेकड्यांत
खोदविलेल्या गुंफांमध्ये दोन विशेष आढळतात. काहीमध्ये गवताच्या झोपडीचा
आभास उत्पन्न होईल असे कोरीव काम आहे, तर लोमशऋषी गुंफेचे मुखदर्शन हे
तत्कालीन इमारतीच्या प्रवेशिकेची हुबेहूब प्रतिकृती आहे. मौर्य कालातील
बहुतेक सर्व शिल्पकाम बौद्ध आणि आजीवक, म्हणजे अवैदिक धर्मपंथांचे आहे, हा
आणखी एक विशेष होय.
या कलाकृतींवर परकीयांची, विशेषतः इराणी छटा आहे आणि त्यांच्या कलेचेच
काही अंशी अनुकरणही या कलेत आढळते परंतु या कलेचा आशय आणि अभिव्यक्ती मात्र
पूर्णतः भारतीय आहे. भारतावरील अलेक्झांडरचे आक्रमण ही एक महत्त्वाची घटना
असून ग्रीकांनी तिचा इतिहास लिहून ठेवला आहे. यापूर्वी शंभर-सव्वाशे वर्षे
आधी इराणच्या ॲकिमेनिडी सम्राटांनी भारतावर अतिक्रमण करून सिंधू नदीच्या
पश्चिमेचा काही भाग आपल्या साम्राज्याला जोडला होता. त्यामुळे इराणी शासक,
प्रशासक व इराणी संस्कृती यांचा भारतीय राजसत्तेला व समाजाला परिचय झालेला
असावा. अलेक्झांडरच्या वेळी इराणी साम्राज्य संपुष्टात आल्यावर त्यांच्या
दरबारातील कलाकार, मुत्सद्दी, तज्ञ हे उद्योगाच्या शोधात भारतात आले
असावेत. मगधची नंद राजसत्ता प्रबळ होतीच, पुढे मौर्यांच्या नेतृत्वाने ती
आणखी बलिष्ठ आणि वर्धिष्णू झाली. स्वाभाविकच मौर्य दरबारी अनेक परकीय,
विशेषतः इराणी तंत्रज्ञ, कारागीर, मुत्सद्दी आले असले पाहिजेत. मौर्य शासन व
कला यांची थोडी सूक्ष्म तपासणी केली, तर अनेक गोष्टी उजेडात येतात. या
अनामिक परकीयांच्या अस्तित्वाची आणि प्रभावाची जाणीव होऊ लागते. मौर्यांची
शासनव्यवस्था, विशेषतः प्रांतांचे शासन व त्यांचे शासक यांसारख्या गोष्टीचे
इराणी व्यवस्थेशी फार साम्य आहे, असे तज्ञ सांगतात. मोठे मोठे राजमार्ग
किंवा व्यापारी मार्ग बांधणे व प्रवास सोपा व सुलभ करणे या गोष्टी
मौर्यांच्या आधी इराणमध्ये रूढ झाल्या होत्या. कलावशेषांच्या बाबतीत तर ही
गोष्ट अधिकच प्रकर्षाने जाणवते. राज्यात सर्वत्र मोठाले शिलालेख अशोकाने
कोरविले, या आधी शंभर वर्षे तरी असे लेख आपल्या साम्राज्यात ॲकिमेनिडी
सम्राटांनी कोरविले होते. पाटलिपुत्रच्या राजसभेचे केवळ विधानच नव्हे तर
तेथे सापडलेली स्तंभशीर्षे तसेच ध्वजस्तंभावरील सिंह आणि इतर तपशील यांचे
इराणी शिल्पावशेषांशी इतके साम्य आहे, की तो केवळ एक योगायोग समणजे अशक्य
आहे. मात्र या कलाकृतींचा आशय बौद्ध धर्मीय, विशुद्ध भारतीयच होता.
साम्राज्याचा अस्त : बृहद्रथाचा वध आणि पुष्यमित्र
शुंगाचे राज्यारोहण ही मौर्य राजकुलाचा व मौर्य साम्राज्याचा अस्त झाल्याची
दृश्य निशाणी आहे पण हा अस्त आकस्मिकपणे झालेला नव्हता. साम्राज्याच्या
विघटनाला यापूर्वीच प्रारंभ झालेला होता. वायव्य सीमेवरील तक्षशिलेसारखे
प्रदेश मौर्यांच्या साम्राज्यात नाखुषीनेच नांदत होते. त्या भागात वेळोवेळी
झालेल्या बंडांवरून हे स्पष्ट झाले होते. पूर्वी हे प्रदेश अलेक्झांडरने
पादाक्रांत केलेले असल्याने ते आपले आहेत, अशी पश्चिम आशियातील ग्रीकांची
समजूत होती व ते पुन्हा ताब्यात आणण्यासाठी त्यांचे यत्नही चालू असत.
सीमावर्ती लोकांच्या बंडाला त्यांचे उत्तेजन व सहाय्य मिळत असे. याशिवाय
अगदी दक्षिण टोकाचे तसेच महान रक्तपातानंतर साम्राज्यात आलेले पूर्वेकडील
कलिंगासारखे भाग स्वस्थ बसले असतील, हे संभवनीय वाटत नाही. मात्र अशा
अशांततेची प्रत्यक्ष नोंद नाही हे खरे. अशोकानंतर केवळ पस्तीसच वर्षांत
ग्रीक सैन्ये साकेत नगरीपर्यंत मुसंडी मारून साम्राज्याचा ठाव पाहू शकतात,
यावरूनच मौर्यसत्ता किती क्षीण झाली होती, याचा अंदाज येतो. खुद्द
अशोकाच्या काळातसुद्धा या साम्राज्याचा पाया कितपत बळकट होता, अशी शंका
येते.
बहुतेक सर्व प्राचीन व मध्ययुगीन साम्राज्यांसारखे मौर्यांचे साम्राज्य
हे व्यक्तीसापेक्षच होते. चंद्रगुप्त व अशोक यांनी उभारलेली शासनयंत्रणा
जवळजवळ निर्दोष होती. मात्र ती सचेतन आणि कार्यक्षम ठेवण्यास, कर्तबगार आणि
महत्त्वाकांक्षी अशा माणसांचे नेतृत्व अत्यावश्यक होते, हे तितकेच खरे
आहे. तिला व्यक्तिनिरपेक्ष संघटनेचे शाश्वत रूप मिळालेले नव्हते. भारतीय
उपखंडातील स्वाभाविक परिस्थिती व तद्जन्य आर्थिक जीवन हे प्रादेशिक राज्ये
आणि एकसंघ साम्राज्ये या दोघांनाही सारखेच उपकारक आहे. तथापि काटा
साधारणपणे स्वायत्त प्रादेशिक राज्यांच्या बाजूने अधिक झुकलेला दिसतो.
त्याचा तोल साम्राज्याच्या बाजूने ढळावयाचा असेल, तर व्यापारात फार मोठी
वृद्धी आणि एखादा समर्थ व महत्त्वाकांक्षी नेत्याचा उदय या दोन गोष्टींची
गरज लागते. साम्राज्यांचे विघटन होणे आणि त्याजागी प्रादेशिक राज्ये येणे
म्हणजे काहीसे कृत्रिमापासून स्वाभाविकांपर्यंत जाणेच होते. त्यासाठी विशेष
कारणपरंपरा शोधण्याची जरूरी नाही. मौर्य साम्राज्याच्या अस्ताचा प्रश्न
इतका साधा व सरळ राहिलेला नाही. याला कारण सम्राट अशोक, त्याचा धर्म आणि
त्याचे धोरण.
अशोकाने बौद्ध धर्म स्वीकारला होता आणि पुष्यमित्र शुंग हा ब्राह्मण
होता अशोकाने अहिंसेचा पुरस्कार केला आणि कलिंगाच्या युद्धानंतर त्याने
साम्राज्यवृद्धीसाठी युद्ध केले नाही, या गोष्टींमुळे साम्राज्याच्या
विघटनाला त्यालाच बऱ्याच इतिहासकारांनी जबाबदार धरले आहे. बौद्ध धर्माच्या
पुरस्काराला जोरात प्रारंभ झाला आणि त्यामुळे वैदिक धर्माला गौण स्थान
मिळाले, हे नक्कीच. हे वैदिक धर्मीय बौद्ध धर्माचा प्रसार थांबविण्यासाठी
पुष्यमित्राच्या रूपाने पुढे झाले किंवा पुष्यमित्र ही वैदिकांची
बौद्धांविरुद्धची प्रतिक्रिया होती, असे म्हणणे अनैतिहासिक आहे. अशोकाच्या
धोरणाची प्रतिक्रिया पस्तीस वर्षांनी व्यक्त व्हावी हे थोडे आश्चर्याचेच
वाटते. अशोकानंतर मौर्य राजे बौद्ध धर्माचेच अनुयायी होते, हेही निश्चित
सांगता येत नाही. मुख्य म्हणजे पुष्यमित्राने बौद्ध धर्मीयांविरुद्ध काही
उपाययोजना केल्याचेही दिसत नाही. तसेच कलिंगानंतर अशोकाने आक्रमक युद्धे
केली नाहीत हे खरे पण त्याने आपले सैन्य बरखास्त केलेले नाही. दंडयोजना
जरूर तेथे केली. कोठे अशांतता उद्भवली किंवा बंडे उभी राहिली तर त्यांचे
दमन शस्त्रबळानेच केले. एवढे मोठे साम्राज्य शांततेच्या आणि अहिंसेच्या
उपदेशामुळे टिकून राहिले, असे समजणे अशक्य आहे. युद्धसंन्यास व अहिंसा या
दोन गोष्टी भिन्न आहेत. व्यक्तिगत जीवनातील अनावश्यक असेल ती हिंसा टाळावी
असा अशोकाचा यत्न होता. त्याने स्वतः दिलेले उदाहरण पुरेसे बोलके आहे.
‘स्वयंपाकासाठी हरिणे व मोर मारून शिजवीत, त्यांचे प्रमाण प्रथम कमी केले
आणि नंतर ते थांबविले पण कोठेही शस्त्रदल बरखास्त केल्याची घोषणा नाही.
अहिंसेच्या शिकवणुकीमुळे क्षात्रतेज कमी झाले’ इ. निष्कर्ष अवास्तव आहेत.
अशोक हा सम्राट होता, शासक होता, त्याने धर्मोपदेशकाची भूमिका स्वीकारली,
तरी ती राज्यत्याग करून नव्हे. थोडक्यात सांगावयाचे, तर मौर्य
साम्राज्याच्या विघटनाचे अपश्रेय अशोकाच्या पदरी बांधता येत नाही. हे विघटन
सृष्टिक्रमाने, जवळपास अपरिहार्यपणे घडले.
पश्चिम आशियातील ग्रीक सम्राटांची आक्रमणे हा सुरुवातीला तरी फार मोठा
धोका नव्हता. मौर्य सम्राट दुर्बल होऊ लागल्यावर हा धोका वाढत गेला व शेवटी
वर सांगितल्याप्रमाणे ग्रीक स्वारी हेच निमित्त मौर्य सत्ता लयाला गेली.
संदर्भ : 1. Majumdar, R. C. Ed. The Age of Imperial Unity, Bombay, 1970.
2. Mookerji, R. K. Chandragupta Maurya& His Times, Delhi, 1960.
3. Rapson, E. J. Ed. The Cambridge History of India, Vol. I. Jullundar, 1968.
4. Sasrti, K. A. N. Ed. Age of Nandas&Mauryas, Patna, 1967.
5. Smith, V. A. Asoka, Jullundar, 1957.
6. Thapar, Romila, Ashok and the Decline of the Mauryas, Oxford, 1961.
माटे म. श्री.
जम्बुद्विपावरराज्यकरणारासम्राटअशोक
#जम्बुद्विपावरराज्यकरणारासम्राटअशोक
कलिंग देशावर मिळवलेल्या विजयानंतर त्या युद्धात झालेली प्रचंड हानी पाहुन उद्विग्न झालेल्या सम्राट अशोकाने बुद्धांचा संदेश जनमानसांपर्यँत पोहचवण्याचा शेवटपर्यँत प्रयत्न केला. अशोकाची पत्नी विदिशा हि बुद्ध धम्माचे पालन अगोदर पासुनच करत होती.
जगातील एकमेव सम्राट असा असेल की ज्याने तलवार म्यान केल्यावर सुद्धा त्याचे राज्य हे वाढतच गेले.
सम्राट अशोक हा असा एकमेव राजा होता की त्याने सर्वप्रथम मनुष्यां सोबतच प्राण्यांचे देखील दवाखाने उभे केले. सम्राटाने त्याच्या प्रजेसाठी काही नियम केले ते सर्व नियम आजही आपल्याला त्याच्या शिलालेखांतून वाचायला मिळतात. आपल्या शिलालेखांत वडीलधारे मंडळी,श्रमण,ब्राम्हण यांच्या सोबत आदराने वागायला सांगितले.कोणीही भ्रष्टाचार करू नये म्हणुन प्रत्येक विभागात एका अमात्याची नेमणुक केली.रस्त्याच्या दुतर्फा झाडे लावली,पाणपोई निर्माण केल्या.
बुद्धांच्या दोनशे वर्षां नंतर सम्राट अशोकाचा काळ येतो तोवर या भुमीतून बुद्ध धम्म नष्ट होत चाललेला. बुद्धांचे जन्मस्थळ लुंबिनी येथे एक शिलालेख लिहुन ठेवला कि याठिकाणी सिद्धार्थ गौतमाचा जन्म झाला असल्याने लुंबीनी ग्राम मधील सर्व नागरिकांना कर माफी केली.तसेच बुद्धांचे अस्थी धातु स्तुपांतून काढुन त्या सर्व अवशेषांवर ८४००० स्तुपांची निर्मिती केली.
आज या स्तुपांपैकी सांची येथील स्तुप आपल्याला ज्ञात आहेत.व्यवस्थित संशोधन केल्यास अनेक स्तुपांची माहिती आजही मिळु शकते.
अशोकाने २५६ दिवस धम्मयात्रा केली. श्रमण आजीवकांसाठी बिहार येथील बाराबर या ठिकाणी भारतातील पहिली लेणी कोरली.
बुद्ध धम्माने सर्व मानवांचे कल्याण व्हावे यासाठी स्वतःची मुलगी संघमित्रा व मुलगा महामहेंद्र यांना सिरीलंकेत बुद्ध गयेतील बोधी वृक्षाची फांदी घेऊन पाठवले आजही श्रीलंकेतील अनुराधापुर येथे तो बोधिवृक्ष आहे.
*अतुल भोसेकर सरांनी सम्राट अशोकाने धम्मलिपीत कोरलेल्या १४ शिलालेखांचे मराठीत वर्णन.
१. पूर्वी प्रियदराशी राजाच्या भटारखान्यात हजारों प्राणी मारले जात. आता धम्म समजल्यामुळे, येथून पुढे पशु हत्या निषेध आहे.
२. संपूर्ण राज्यभर तसेच इतर राज्यांच्या सीमेवर देखील मनुष्य आणि जनावरांसाठी हॉस्पिटल आणि फार्मसी ची सोय. तसेच या फार्मसी जवळ औषधी वनस्पतींची लागवड. मनुष्य आणि पशूंसाठी रस्त्याच्या दुतर्फा मोठी झाडे व पाणपोई.
३. दर पाच वर्षांनी, राज्यातील सर्व कमिश्नर आणि कलेक्टर यांनी आपल्या हद्दीतील सर्व गावांना भेटी देऊन लोकांच्या समस्या जाणून घेतल्या पाहिजे. तसेच सर्व लोकांनी आपल्या आई वडील, मित्र परिवार, ब्राह्मण, श्रमण यांचा आदर केला पाहिजे. सर्वांशी प्रेमाने बोलायला हवे.
४. माझे सर्व पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र मी दाखविलेल्या नीतीमार्गावर चालणार आहेत व हीच अपेक्षा मी माझ्या प्रजे कडून करत आहे.
५. माझे अनेक दूत राज्यभर विखुरले आहेत. सर्व लोके सर्व व्यवहारात नीतिमत्ता पाळतात का याकडे त्यांचे लक्ष असेल. तसेच कोणता अधिकारी लोकांना उगीचच छळतोय अथवा त्यांच्याशी अन्यायकारक वागतो का हे ते पाहतील.
६. मी शयनकक्षेत असो अथवा बागेत अथवा अंतःपुरात, माझ्या राज्याची मला प्रत्येक बातमी समजली पाहिजे म्हणजे लोककल्याणाच्या निर्णय मला ताबडतोब घेता येईल. दिवसातील माझा प्रत्येक प्रहर हा लोकांसाठीच असेल, माझं उर्वरित संपूर्ण आयुष्य त्यांच्यासाठीच असेल.
७. प्रत्येक मनुष्याला उत्कर्ष करायचा असतो, मात्र त्याच्यात तेवढी नैतिकता, सजगता आणि तळमळ असेल तरच तो तेथे पोहचू शकेल. माझ्या राज्यात प्रत्येक माणसाला ही संधी असेल मग तो कुठलाही पंथ मानणारा असो.
८. पूर्वी प्रियदर्शी राजा शिकारी साठी लांब यात्रा करायचा मात्र येथून पुढे त्याच्या यात्रा लोकांच्या समस्या जाणून घेऊन त्या निवारण्यासाठीच असेल.
९. लोकं उत्सवात किंवा लग्नात प्रचंड खर्च करतात मात्र या दिखाव्यामुळे कुठलेही नीतिमान कार्य होत नाही. त्यापेक्षा त्यांनी त्यांच्या घरातील नोकर चाकर, शेजारी, मित्रपरिवार व सगळ्यांशी प्रेमाने वागावे. त्यामुळे त्यांचे जीवन नीतिमान होईल व त्यांना पुण्य लाभेल.
१०. खरी प्रतिष्ठा ही सत्ता आणि पदावर अवलंबून नाही तर लोककल्याणासाठी तुमची किती तळमळ आहे यावर प्रतिष्ठा ठरते. लोककल्याणाच्या विचार करणे हा धम्म आहे. लोकांनी खऱ्या प्रतिष्ठेचा अवलंब करावा.
११. लोकधर्म पाळणे या सारखे धर्मदान नाही. आपला मित्र परिवार, नोकर, नातेवाईक, समाजातील प्रत्येक घटक यांच्या बद्दल आपल्याला मैत्री असायला हवे. त्यांच्या सुख दुःखात आपण त्यांना सदोदित मदत केली पाहिजे. हीच धम्माची शिकवण आहे. तेच सर्वश्रेष्ठ धर्मदान होय.
१२. प्रत्येक धर्मात चांगले विचार असतात. ते समजून न घेता दुसऱ्या धर्माला नावे ठेवणे चुकीचे आहे. असे केल्याने तुम्ही तुमच्या धर्माची कमकुवत शिकवण दाखवता. त्यापेक्षा चर्चा करा, दुसऱ्या धर्माची शिकवण समजून घ्या. यातच सर्वांचे कल्याण आहे.
१३. कलिंगातील युद्धात मारलेले लाखों सैनिक पाहून प्रियदर्शी राजाचे मन दुखी झाले आहे. येथून पुढे जग जिंकायचे ते केवळ धम्माच्या मार्गाने. हाच मार्ग योग्य आहे.
१४. हा धम्म प्रियदर्शी राजाने अनेक ठिकाणे कधी लघु, कधी मध्यम तर कधी दीर्घ स्वरूपात लिहिले आहेत. त्याचे कारण म्हणजे तेथे उपलब्ध असलेला दगड. तसेच काही ठिकाणी माझे लेख अर्धवट किंवा चुकीचे शब्द असतील तर ती सर्वस्वी चुकी तेथील लिपिकाराची आहे.
अशा या महान सम्राटाचे भारतावर अनंत उपकार असुनही आपण त्यांना विसरलो आहोत कारण येथील इतिहासकारांनी या सम्राटाचे केलेले चुकीचे वर्णन.
वरील शिलालेखातून आपल्याला हे समजते कि अशोकाला त्याच्या प्रजेविषयी तसेच त्याच्या राज्यातील प्रत्येक प्राणिमात्राविषयी प्रचंड आपुलकी होती. जर दूरदर्शनवर सम्राट अशोक,बुद्ध या संबधी मालिका निर्माण केल्या गेल्या असत्या तर आज देशाची परिस्थिती नक्कीच वेगळी असती.
काही वर्षां पुर्वी झी टी. व्ही. वर बुद्धांची एक अप्रतिम ५० एपिसोडची मालिका तयार केली होती.
आपल्या सर्वांना सम्राट अशोकाच्या २३२४ व्या जयंतीच्या हार्दिक शुभेच्छा.
सिद्धार्थ कसबे
नालासोपारा*
डॉ. उमेश ज. खोपकर
सागराच्या मागे हटण्यामुळे निर्माण झालेल्या नवभूमीला 'शुर्पारक- अपरान्त' अपरान्त' किंवा 'कोकण भूमी' म्हणण्यात येते. या नवभूमीला सुजलाम् सुफलाम् करून तिची किर्ती दिगंत करणारा श्रीपरशुराम हा 'आद्य वसाहत-संस्थापक' ठरला जातो. या नवभूमीतील शुर्पारक म्हणजे कल्लिएण (कल्याण) आणि श्रीस्थान (ठाणे) यांच्या पश्चिमेकडील प्रदेश होय. सुमारे ७००० वर्षांपूर्वीचा पौराणिक कालखंड आणि प्राचीन इतिहास असलेली शुर्पारक नगरी म्हणजेच आजचे 'सोपारा' हे गाव होय!
श्रीविष्णूचा सहावा आणि पूर्णतः मनुष्यरूपी पहिलाच अवतार म्हणून ओळखल्या गेलेल्या श्रीपरशुरामाने पृथ्वीदान केल्यानंतर स्वतःसाठी नवीन भूमी निर्माण केली, अशी वंदता आहे. त्यासाठी सह्य पर्वतावरून बाण मारून श्रीपरशुरामाने पश्चिम सागराला मागे हटविले. सागराच्या मागे हटण्यामुळे निर्माण झालेल्या नवभूमीला 'शुर्पारक- अपरान्त' किंवा 'कोकण भूमी' म्हणण्यात येते. या नवभूमीला सुजलाम् सुफलाम् करून तिची किर्ती दिगंत करणारा श्रीपरशुराम हा 'आय वसाहत संस्थापक' ठरला जातो. या नवभूमीतील शुर्पारक म्हणजे कल्लिएण (कल्याण) आणि श्रीस्थान (ठाणे) यांच्या पश्चिमेकडील प्रदेश होय. सुमारे ७००० वर्षापूर्वीचा पौराणिक कालखंड आणि प्राचीन इतिहास असलेली शुर्पारक नगरी म्हणजेच आजचे 'सोपारा' हे गाव होया
पौराणिक काळापासून महत्त्व प्राप्त झालेली शुर्पारक ही नगरी देवांची वसाहत असलेली पवित्र भूमी होती. हिंदुस्थानच्या पौराणिक, धार्मिक, सामाजिक, राजकीय आणि आर्थिक स्थित्यंतराचे प्रतिनिधित्व करणारी शुर्पारक ही एकमेव प्राचीन नगरी असावी. ह्या नगरीची प्राचीन व विश्वसनीय नोंद रामायण-महाभारत या महाकाव्यांसोबत अनेक पुराण ग्रंथातही आढळते, पौराणिक काळात देवभूमी म्हणून महत्त्व पावलेली ही नगरी जैन-बौद्ध काळात व्यापाराचे मुख्य केंद्र म्हणून भरभराटीस आली. उत्खननात सापडलेले अनेक ताम्रपट, शिलालेख, मूर्त्या, नाणी यावरून शुर्पारक नगरीचे जागतिक बाजारपेठेतील अद्वितीय महत्त्व सहज ध्यानात येते.
रामायण-महाभारतासारख्या महाकाव्यांतून प्रसिद्ध असलेली ही नगरी हरिवंश-स्कंद - भागवत मत्स्य वायू-ब्रह्मांड - विष्णू-वामन गरूड मार्कण्डेय भविष्य ब्रह्म, इत्यादी पुराण ग्रंथातून परिचित होते. याचसोबत परदेशी व्यापारी जलपर्यटक, ग्रीक-अरब प्रवासी, परदेशी इतिहासकार, जैन व बौद्ध धर्मीय यांचे साहित्य व नोंदी इत्यादीतून या नगरीची जागतिक कीर्ति, महत्त्व व स्थित्यंतराचा योग्य आढावा घेता येतो. 'पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रिअन सी' या पुस्तकाच्या लेखकाने त्यांच्या जलपर्यटनाच्या काळात सुमारे २००० वर्षांपूर्वीचे शुर्पारक येथील समृद्धी, समाजजीवन आणि भरभराटीला आलेला व्यापार याबाबतचे अनुभव सदर पुस्तकात नोंदविले आहेत. अनेक परदेशी प्रवासी आणि व्यापारी यांनी केलेल्या नोंदी आणि वर्णनानुसार हिंदुस्थान ही सुवर्णभूमी होती. चांदीच्या बदल्यात स्वस्त सुवर्ण हिंदुस्थानातून नेले जात असे. हिंदुस्थानातून निर्यात होणाऱ्या मालात मसाल्याचे पदार्थ, हिरे, माणके, मोती, सुवर्ण, रेशीम, मलमल, कापूस, तयार कपडे, हस्तीदंत, चंदन, तिळाचे तेल, गहू, तांदूळ, तूप, पशुंच्या कातड्यांच्या वस्तू आणि कपडे, मोर-माकडे इत्यादी प्राणी, इत्यादींचा समावेश असे. तर आयात होणाऱ्या मालात तांबे, कथील, शिसे, काच, औषधे आणि रोमन मद्य याचा समावेश असे. रोमन देशांसोबत होणाऱ्या व्यापारामुळे तेथील सुवर्णाचा ओघ हिंदुस्थानात वहात असे आणि चांदीच्या बदल्यात येथील सुवर्ण स्वस्त दरात अन्य देशात जात असे. इ.स. पूर्व ५०० वर्षांपूर्वीचा लिखित स्वरूपाचा विश्वसनीय इतिहास असलेली ही नगरी सम्राट अशोकाच्या काळात बौद्ध धर्माचे मुख्य स्थान बनली होती. या नगरीत सम्राट अशोकाचा धर्मप्रचारक 'यवनधर्मरक्षित' प्रचारार्थ येत असे. सोपारा येथे उत्खननात सापडलेल्या अशोकाच्या आठव्या शिलालेखानुसार इ.स. पूर्व २५० या काळात शुर्पारक नगरी ही अपरान्ताची राजधानी होती.
बौद्ध वाङ्मयात गौतम बुद्धांचा मुख्य अनुयायी म्हणून प्रसिद्ध पावलेला 'मैत्रेयी बुद्ध' उर्फ 'पूर्ण' या व्यापाऱ्याची कथा दिली आहे. गौतम बुद्ध वृद्धत्वाकडे झुकल्यावर त्यांनी स्वतःचे भिक्षापात्र आणि महत्त्वाच्या वस्तू 'पूर्ण'कडे सोपविल्या. त्यामुळे बुद्धांचे अनुयायी पूर्णला बुद्ध मानू लागले. मैत्रेयी बुद्धाने त्याचा अखेरचा जीवनकाळ शुर्पारक येथे व्यतीत केला. सोपारा येथे उत्खननात सापडलेल्या स्तूपात असलेले निश्वापार व अन्य वस्तु पैवेधी बुद्धालेच ठेवल्या असल्याचा कयास आहे बौद्ध वाड्मयात शुर्पारक नगरीचे वर्णन करताना लिहीले आहे की, राजधानीचे शहर असलेल्या या नगरीत लक्षावधी प्रजा रहाते. येथील बहुसंख्य प्रजा धमनि ब्राह्मण आहे. या नगरीला अठरा दरवाजे आहेत. कमानीयुक्त, कलाकुसरीने सुशोभित केलेले चंदनी लाकडाचे बुद्ध मंदीर येथे आहे. उत्तर हिंदुस्थानातून अनेक व्यापारी मालाची निर्यात करण्यासाठी शुर्पारक बंदरात येतात. या व्यापार व व्यापाऱ्यांवर नियंत्रण ठेवणारी संघटना येथे अस्तित्यात आहे." शुर्पारक बंदरामुळे येथे येणाऱ्या परदेशी प्रवासी, व्यापारी, जलपर्यटक यांना हिंदुस्थानातील अर्थ, सामाजिक व राजकीय माहिती निळविण्यासाठी खुले कयाड गवसले होते. येथील संपन्नता व समृद्धीची योग्य ती नोंद अनेक ग्रीक, फिनिशिअन, असिरियन, चिनी प्रवासी आणि व्यापाऱ्यांनी वेळोवेळी करून ठेवलेली आहे. व्यापारामुळे भरभराटीला आलेले बंदर व येथील अर्थव्यवस्था टिकवून ठेवण्यासाठी भक्कम व्यापारी संघटनेसोबतच, नगरीच्या संरक्षणार्थ अठरा द्वारांनी युक्त अफाट अवाढव्य अशी तटबंदी शुर्पारक नगरीभोवती बांधण्यात आली होती. सातवाहन राजवटीच्या काळात सोपारा व कल्याण या कोकणातील बंदरांना देशावरील शहरांशी जोडणारे नाणेघाट-माळशेजघाट हे व्यापारी वाहतुकीचे घाटमार्ग निर्माण केले गेले. सातवाहन काळात नाणेघाट या राजमार्गामुळे शुर्पारक हे अत्यंत भरभराटीला आलेले नगर होते.
जैन-बौद्ध कालखंडापासून मौर्य सातवाहन शक क्षत्रप कोकण मौर्य - त्रैकुटक- वाकाटक अश्मक चालुक्य राष्ट्रकुट कलचूरी- कदंब परमार यादव शिलाहार हे हिंदुस्थानी राजवंश, तसेच धर्माध मुस्लीम प्रचारक लुटारू आणि राज्यकर्ते, शिवाय व्यापारी व धर्म प्रसारक म्हणून आलेले पोर्तुगिज व ब्रिटिशांपर्यंत अनेक राजवटी या नगराशी जवळून संबंधित होत्या.
प्राचीन काळात असलेली आर्थिक समृद्धी, दानशूर व्यापारी, साहित्य व स्थापत्यकलेची अचूक जाण असलेल्या उदार व कलाप्रिय राजवटी यामुळे शुर्पारक या नगरीसोबतच संपूर्ण महाराष्ट्रात कलापूर्ण स्थापत्य शैलींचा पूर ओसंडून वहात होता. घाटमार्ग, रस्ते, पाणपोया, कोरीव कलाकुसरींची मंदिरे, त्यातील अप्रतिम अद्भूत कलाकुसरीने नटलेल्या सुंदर मूर्ती- शिल्प, गुफा लेणी, संरक्षित तटबंद वसाहती अशा अनेक वास्तू उदयास आल्या.
आर्थिक सुबत्ता आणि समृद्धीची रेलचेल असलेल्या या नगरीवर मुस्लीम धर्मांधांमुळे गंडातंराला सुरूवात झाली. इस ६३६ ह्या वर्षी हिंदुस्थानावर झालेल्या पहिल्या अरबी मुस्लीमांच्या टोळधाडीची शिकार ठाणे नगरी होती, परंतु येथील जागृत जनतेने मुस्लीम दरोडेखोरांचा तीव्रतेने यशस्वी प्रतीकार केला. मात्र मध्ययुगात येथील सुव्यवस्था पार मोडकळीस आली. समुद्री चाचे, अरबी धर्माध, हबसाणातील सिद्धी यांनी वारंवार हल्ले करून अवधी पश्चिम किनारपट्टी घुसळून काढली होती. धर्मप्रसाराच्या नावावर उघडपणे दरोडे घातले जात होते. घरं, शेतं, वाड्या, नगरं उद्धवस्त करून स्त्रीयांवर अत्याचार केले जात होते, धर्म बाटवणे, घरं मंदिरं लुटणे, देवांच्या मुर्त्या विद्रुप करते, तरूण स्वीया-पुरुषांना पळवणे, त्यांना गुलाम बनवून विकणे असे प्रकार सर्रास घडत होते.
दख्खन प्रांतात नांदत असलेल्या अनेक राजवटीत एकवाक्यता नसल्यामुळे या परकीय आक्रमणांना तोंड देण्याचे सामर्थ्य कुणातही उरले नव्हते. हीच परिस्थिती उत्तर हिंदुस्थानात देखील होती. अवध्या हिंदुस्थानात परकीय आक्रमकांनी धुमाकूळ घातला होता. येथील अनमोल अगणित संपत्ती, जडजवाहीर, सुवर्ण, तरूण स्वीया-पुरुष, हत्ती-उंट इत्यादी प्राणी लुट म्हणून मुस्लीम राजवटीच्या प्रदेशात जातच राहिले. आर्थिक व संरक्षणदृष्ट्या भक्कम असलेली ही नगरी १५ व्या शतकात आलेल्या पोर्तुगीजांपुढे अगदीच कमकुवत ठरली. व्यापार आणि धर्मप्रसारार्थ आलेल्या पोर्तुगीजांनी मुसलमानांचाच कित्ता गिरवला. देवळं पाडून त्या जागी चर्च उभारली गेली. देवळातील मूर्त्या भंग करून त्यांना जलसमाधी देण्यात आली. साम-दाम-दंड-भेद या नितींचा वापर करून येथील जनतेला जबरदस्तीने धर्म बदलण्यास प्रवृत्त करण्यात आले.
चौदाव्या शतकानंतर शुर्पारक नगरीचे महत्त्व कमी होवून त्याऐवजी श्रीस्थान उर्फ ठाणे नगरीला महत्त्व प्राप्त झाले. पोर्तुगिजांनी वसई येथे भक्कम जलदूर्गाची निर्मिती केल्याने सोपाऱ्याचे महत्त्व लोप पावून वसई हे मुख्य सत्ता केंद्र बनले. शुपरिक उर्फ सोपारा हे पश्चिम रेल्वेच्या वसई-विरार रेल्वे स्थानकांच्या मधील 'नालासोपारा' हे स्थानक आहे. या रेल्वेस्थानकातून सोपारा गावात जायला अनेक वाहनं उपलब्ध आहेत. सोपारा गावात चक्रेश्वर तलाव व चक्रेश्वर महादेव हे प्राचीन तीर्थ व मंदिर आहे.
श्री परशुरामाने पाळपंजर दैत्याचा वध ज्या चक्राने केला, ते चक्र ज्या जलाशयात धुतले त्या जलाशयाला 'चक्रेश्वर तीर्थ' म्हणण्यात आले, अशी येथील आख्यायिका आहे. चक्रेश्वर तलावाचा गाळ उपसताना कोरीव काम केलेल्या काळ्या पाषाणातील अत्यंत सुबक आणि सुंदर अशा मूर्त्या येथे सापडल्या आहेत. पैकी शुकधारी स्वीमूर्ती म्हणजे जिवंत सौंदर्याचा अद्भुत नजराणा आहे. या मूर्तीची ठेवण, कलाकुसर, केशभूषा वेषभूषा, अलंकार, डाव्या हातावरील शुक, उभे रहाण्याची ढब, मुखावरील सलज्ज भाव, प्रमाणबद्ध शरीर रचना असे शब्दशः 'मूर्तीमंत सौंदर्य' अनुभवयाला मिळते.
याशिवाय सापडलेली ब्रह्मदेवाची भव्य मूर्ती ही आजतागायत महाराष्ट्रात उपलब्ध असलेल्या ब्रह्मदेवाच्या मूर्त्यांमध्ये सगळ्यात मोठी मूर्ती आहे. तीन मुखं असलेल्या या मूर्तीचे मधले सन्मुख दाढीधारी आहे. डोक्यावर कलाकुसरीने सुशोभित मुकुट आहेत. मूर्तीला चार हात असून डाव्या हातांतील वरच्या हातात वेदांचे प्रतीक असलेली सुरनळी व खालच्या हातात भांडे आहे. उजव्या हातातील वरच्या हातात फुलसदृश्य प्रतीक आहे. गळ्यात जानवे, कटीवस्त्र, अंगावर कमरपट्टा-मनगटी पट्टा अंगठ्या हार बाजूबंध- सलकडे असे अलंकार आहेत. मूर्तीच्या पायाजवळ दोन्ही बाजूला दोन स्वी मूर्त्या आहेत. फुटभर उंचीच्या या मूर्तीच्या हातात शस्व आहे. उजव्या स्त्री-मूर्तीच्या पुक्यात अजून एक छोटी मूर्ती आहे आणि डाव्या मूर्तीच्या पुढ्यात
ब्रह्मदेवाचे वाहन असलेला हंस आहे. अत्यंत सुबक व कलाकुसरीनेयुक्त अशा या रेखीव मूर्तींचे चतुर्थ मुख (जे पाठीमागच्या बाजूस असते) मात्र लुप्त आहे. या ठळक मूर्त्यांव्यतिरिक्त गणेश, शिव-पार्वती, शिवलिंग, सतीशिला अशा अनेक मूर्त्या येथे पहावयास मिळतात.
चक्रेश्वर तलावाच्या परिसरात 'गोलकोट' उर्फ 'बुरूड राजाचा कोट' म्हणून ओळखले जाणारे टेकाड आहे. १८८२ साली ब्रिटिश राजवटीत झालेल्या उत्खननात येथे प्राचीन बुद्धस्तूपाचे अवशेष आढळले आहेत. या स्तूपात भिक्षापात्र, स्वर्ण फुले, स्वर्ण पत्रे, बुद्धाची स्वर्ण मूर्ती, सातवाहनकालीन स्वर्ण नाणी, अस्थींचे अवशेष इत्यादी वस्तू एका दगडी पेटीत ठेवलेल्या आढळल्या. आजमितिस या वस्तूंचे अस्तित्व अज्ञात आहे, परंतु ज्या पेटीत या वस्तू आढळल्या ती दगडी पेटी मात्र येथे पहावयास मिळते. याशिवाय सम्राट अशोकाचे शिलालेख व जयस्तंभ येथील उत्खननात सापडले आहेत.
सोपारा गावापासून काही अंतरावर असलेले 'निर्मळ' हे एक प्राचीन तीर्थस्थान व सिद्धपीठ आहे. येथे श्री विमल व श्री निर्मळ ही प्राचीन तीर्थस्थळे असून श्री विमलेश्वर महादेव व श्री निर्मलेश्वर महादेवाची मंदिरे आहेत. ह्या शिवमंदिर परिसरातील टेकडावर श्री आद्य शंकराचार्यापासूनचे आठवे शंकराचार्य श्री विद्याशंकरभारती यांचे समाधीस्थान आहे. श्री विद्याशंकरभारती यांचे मुस्लीम व ब्रिटिश राजवटीत नजरेआड झालेले समाधीस्थळ त्यांचे शिष्य यती महाराज यांना कार्तिक वद्य एकादशीस सापडले. तेव्हापासून आजतागायत या
दिवसापासून पुढे पंधरा दिवसांपर्यंत निर्मळ येथे नेमाने दरवर्षी मोठी यात्रा भरते.
निर्मळगावापासून अगदीच थोड्याशा अंतरावर दत्त दिगंबरांचे स्थान असलेली 'हिरा डोंगरी' उर्फ 'वज्रगड' हा किल्ला आहे. छोट्याशा टेकाडावर वसलेला हा आटोपशीर किल्ला समुद्र किनाऱ्यावर नजर ठेवण्यासाठी अत्यंत उपयुक्त स्थान होते. घोडबंदर किल्ल्यापासून धारावी व अर्नाळा किल्ल्यापर्यंत संपूर्ण खाडी परिसर व बंदरावर नजर ठेवण्यासाठी वज्रगड हे अत्यंत महत्त्वाचे स्थान होते. येथून हिरव्या गर्द वनराईने नटलेल्या वसई नगरीच्या निसर्ग सौंदर्याचे विलोभनीय दर्शन घडते.
सोपारा गावाच्या परिसरात असलेली नील टेकडी, तुलीनी टेकडी हा परिसर प्राचीन व ऐतिहासिक कालखंडाच्या अनेक खुणा घेवून बसला आहे. याशिवाय सोपारा गावापासून लगतच्या परिसरात असलेला वसई किल्ला, अर्नाळा किल्ला, तुंगारचा डोंगर, जिवदानी मातेचे स्थान असलेला जिवधन किल्ला अशा भेट देण्याजोग्या अनेक वास्तू आहेत. शिवाय लांबलचक पसरलेला सागर किनारा आणि नारळी-पोफळी व सुरूच्या बागा पर्यटकांना नेहमीच भुरळ घालीत असतात. रस्त्याच्या दुतर्फा पसरलेल्या नारळी-केळी आणि जाई-जुई मोगऱ्याच्या गर्द हिरव्या वाड्यांतून केलेली वसई तालुक्यातील प्राचीन नगरीची सफर नक्कीच प्रेक्षणीय, पुण्यप्रद आणि प्राचीन इतिहासाचा मागोवा घेणारी असेल!
नेहमीची वर्दळ पार करत नालासोपारा रेल्वे उड्डाणपुलावरून पश्चिमेच्या‘शूर्पारक’ नगरीत म्हणजेच सोपारा गावात दाखल झालो. इच्छित स्थळाकडे जाण्याऐवजी विरारच्या दिशेकडे मार्गक्रमण केले.
विष्णूमूर्ती- बोळींज
बोळींज गावातील एका वृक्षाखाली उभी असलेली एक कोरीव विष्णूमूर्ती, केवळ आयुधांच्या जागेत बदल असणारी करमाळे येथील तलावात सापडलेली व सध्या सुरक्षित छप्पराखाली असणारी आणखी एक विष्णूमूर्ती पाहीली आणि पुन्हा सोपाऱ्याच्या दिशेने निघालो.
विष्णूमूर्ती- करमाळे
सृष्टीकर्त्या ब्रम्हालाही हेवा वाटेल असे टुमदार बंगले आणि सभाेवतालच्या हिरवळीने नटलेला हा मार्ग. नालासोपाऱ्याच्या पूर्वेला जमिनीसह आकाशातही जागा व्यापणाऱ्या गच्च इमारती तर पश्चिमेला इमारतींबरोबरच गावपण टिकवून ठेवलेल्या वाड्या आहेत. दोन्ही बाजूकडील लोकवस्त्यांमध्ये जमिन अस्मानाचं अंतर. याच मार्गाने पुढे जात एका लहानशा विहीरीला वळसा घालून तलावाजवळील ‘चक्रेश्वर महादेव’ मंदिराजवळ पोहोचलो.
प्राचीन शुर्पारक नगरीतील चक्रतीर्थ किंवा चक्रेश्वर नावाच्या या तलावाचा अगदी रामायण-महाभारतातही उल्लेख असल्याचे सांगीतले जाते.
विस्ताराने आणि सौंदर्याने विशाल असणाऱ्या चक्रेश्वर तलावाच्या दिशेकडील प्रवेशद्वारातून महादेव मंदिरात प्रवेश केला. शिवलिंगाचे दर्शन घेऊन उजवीकडे वळलो.
मंदीराच्या गर्भगृहाबाहेरच एका बंदिस्त जागेत शिव-पार्वती, गणपती, अंबिका, मिनाक्षी अप्सरा अशी सुंदर आणि दुर्मिळ शिल्पे आहेत.
मंदिरातच एका बाजूला मारूतीची मिशी असलेली एक वैशिष्ट्यपूर्ण मूर्ती आहे.
मिशी असलेला मारूती
वसई किल्ल्यातील मारूतीशी साधर्म्य असणारी ही मूर्ती. मारूतीच्या एका अंगाला अग्नीदेवाची झीज झालेली मूर्ती आहे. मंदिराच्या उत्तरेकडील दारातून बाहेर पडल्यानंतर एक जुने रामंमदिर आहे. या मंदिराच्या बाहेरच्या भिंतीला एक वराह मूर्तीही आढळते. आश्चर्याची बाब म्हणजे महादेव मंदिर आणि कुंपण यांच्यामधील मोकळ्या जागेत एक भले मोठे शिवलिंग आहे, परंतु त्याकडे विशेष लक्ष पुरवल्याचे भासत नाही.या परिसराच्या कुंपणाला लागून अनेक सुंदर मूर्त्या ओळीने ठेवलेल्या आढळतात.
गजलक्ष्मी
वीरगळ
गजलक्ष्मी, विष्णू, वीरगळ, नंदी इत्यादी भंग झालेल्या लहान-मोठय़ा मूर्ती यात आहेत.
अलीकडेच मंदिराचा जीर्णोद्धार झाला तेव्हा तलावाचा गाळ उपसताना सापडलेल्या या प्राचीन व दुर्मिळ अशा मूर्ती. या मूर्त्यांच्या रांगेतच ब्रह्मदेवाची आठ फूट उंचीची समभंग रचनेतील अचल मूर्ती आहे. ही महाराष्ट्रातील सर्वात मोठी ब्रह्मदेवाची मूर्ती म्हणून ओळखली जाते. सृष्टीचा निर्माता मानला जाणारा ब्रम्हा येथे उघड्या आभाळाखाली ‘स्थानक’ म्हणजेच उभ्या स्थितीत दिसतो.
“ब्रम्हा कमंडलुधर: कर्तव्य: स चतुर्मुख।
हंसारूढ: क्वचित् कार्य: क्वचिच्च कमलासन:।।
वर्णत: पद्मगर्भाभश्चतुर्बाहु: शुभेक्षण:।
कमंडलुं वामकरे स्रुवं हस्ते तु दक्षिणे।।”
ब्रम्हा मूर्ती
या पुराणांतील वर्णनाप्रमाणे येथील चतुर्मुखी ब्रम्हा दर्शनी त्रिमुख व चतुर्भूज रुपात आहे. पाठीमागील उजव्या हातात स्रुवा व डाव्या हाती वेद आहेत. समोरच्या डाव्या हाती कमंडलू असून उजवा हात जमिनीच्या दिशेने आहे. या मूर्तीतील ब्रम्हदेवाच्या उजव्या हातातील स्रुवा-म्हणजे यज्ञाच्या वेळेस आहुती देण्यासाठी वापरली जाणारी पळी अतिशय सुबक आणि देखणी आहे. मूर्ती पाहणाऱ्याचे लक्ष वेधून घेणारे हे उपकरण मुर्तीचे सौंदर्य वाढवते. रूप मंडनातील वर्णनानुसार दाढीधारी ब्रम्ह्याचे रूप पहायला मिळते. या मूर्तीतील समोरील मुखाला दाढी आहे. हे दाढी असलेले रूपही मूर्तीचे समभंगत्व राखून आहे. सामान्यत: शिव व ब्रम्हा यांच्या माथी जटामुकूट असतो, परंतु येथील मूर्तीवर किरीट मुकुट असून त्यात ‘किर्तीमुख’ कोरले आहे.
मूर्तीच्या पायाजवळ डाव्या बाजूला सावित्री व हंस असून, उजव्या पायाजवळ वेदधारी ऋषी आहेत. अंगावरील आभूषणे, यज्ञोपवित यांच्यातील एक वैशिष्ट्यपूर्ण लयबद्धता मूर्तीकाराने साधली आहे.
या सुंदर मूर्तीसह आणखी एक झीज झालेली ब्रम्हदेवाची मूर्ती सोपाऱ्यात आहे.
पुराणांनी ब्रम्हदेवाला सृष्टीचा निर्माता मानले असले तरी ब्रम्हदेवाची स्वतंत्र मंदिरे भारतात खूप कमी आहेत. पुष्कर(राजस्थान), ब्रम्हा कर्मळी(गोवा), कुल्लू, कुंभकोणम, तिरूपत्तूर अशी काही ब्रम्हदेवाची सुप्रसिद्ध मंदिरे आहेत.
प्राचीन काळात वैदिक, जैन आणि बौद्ध धर्माचे केंद्र असणाऱ्या शूर्पारक नगराचा लौकीक पाहता चक्रेश्वर तलाव परिसरात अतिशय सुंदर व भव्य मंदिर होते असे मानायला हरकत नाही. तलावात शास्त्रीय पद्धतीने शोध घेतल्यास इथल्या प्राचीन इतिहासावर प्रकाश टाकता येऊ शकेल. ब्रम्हदेवाच्या मूर्ती दुर्मिळ मानल्या जात असताना नालासोपाऱ्यात दोन मूर्ती आढळणे ही इथल्या प्राचिनत्वाला अधोरेखित करणारी गोष्ट आहे. ही दुर्मिळ आणि सुंदर कलाकृती उन-पाऊस झेलत उभी आहे. परिणामी मूर्तीच्या दगडाची झीज होत आहे.
चक्रेश्वर तलाव- सोपारा
परंतु कला आणि इतिहासाप्रतीच्या आपल्या उदासीनतेच्या चक्रात हा चक्रेश्वराचा परिसरही सापडलाय. काही वर्षांपूर्वी येथील तळ्याचा गाळ काढला गेला, असाच काहीसा दुर्लक्षाचा गाळ आमच्या दृष्टीवर पडलाय तोही निघायला हवा. या सृष्टीच्या निर्मात्याची चतुर्भूज मूर्ती निर्माण करणाऱ्या अज्ञात कलाकाराला द्वीभूजांनी मनोमन नमस्कार केला आणि निघालो प्राचिन शूर्पारक नगरीतून अर्वाचीन नालासोपाऱ्याकडे....
- तुषार म्हात्रे, पिरकोन (उरण)
संदर्भ: भारताची मूर्तीकला- पं.महादेवशास्त्री जोशी #सोपारा #शूर्पारक #सुप्पारक #नालासोपारा #चक्रेश्वर #चक्रतीर्थ #ब्रम्हा #ब्रम्हदेव #मूर्ती (सदर लेख दैनिक कर्नाळामध्ये शनिवार 4 ऑगस्ट 2018च्या आवृत्तीत प्रकाशित झाला आहे.)
इतिहासनामा: विश्व इतिहास का गौरव - प्राचीन भारत का इतिहास जानें | Itihasnama
ITIHASNAMA (इतिहासनामा) - भारत का इतिहास| Blog| Food History| प्राचीन भारत का इतिहास| DR.UDAY PRAKASH
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मौर्य राजवंश का इतिहास जानने के तीन प्रमुख स्रोत माने जाते हैं - साहित्य, विदेशी विवरण तथा पुरातत्व। इन तीनों साधनों से मौर्य इतिहास की पर्याप्त जानकारी उपलब्ध होती है।
1. साहित्यिकस्रोत
(A)ब्राह्मण साहित्य - कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र, सोमदेव कृत कथासरित्सागर, क्षेमेन्द्र लिखित वृहत्कथामंजरी, पतंजलि का महाभाष्य, विष्णु पुराणकी मध्यकालीन टीका, विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस, मुद्राराक्षस का टीकाकार ढुंढिराजआदिप्रमुख ब्राह्मण साहित्यिक स्रोत हैं।
पुराणों में मौर्य राजाओं की सूची और कालक्रम का विधिवतउल्लेख किया गया है।आचार्य चाणक्य (अन्य नामकौटिल्य वविष्णुगुप्त) कृत ‘अर्थशास्त्र’
मौर्य इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। मौर्य वंश के संस्थापक
चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु व प्रधानमंत्री आचार्य चाणक्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ से मौर्य काल की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति की पर्याप्तजानकारी मिलती है।
वहीं, विशाखदत्त रचित संस्कृत नाटक ‘मद्राराक्षस’ से मौर्यकालीन सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की जानकारी मिलती है।विशाखदत्त
ने इस बात का बखूबी उल्लेख किया है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने किस प्रकार से
अभेद्य नंद शक्ति को ध्वस्त कर मगध सम्राट धनानंद पर विजय प्राप्त की।
(B) बौद्ध साहित्य - बौद्ध ग्रन्थों मेंदीपवंश, महावंश, दिव्यावदान, महाबोधिवंश, दीघनिकाय, दिव्यावदान आदिप्रमुख हैं। इनसे चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक तथा परवर्ती मौर्य शासकों के विषय में जानकारी मिलती है।सिंहली अनुश्रुती महावंश में लिखा गया है कि कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त को जम्बूद्वीप का सम्राट बनाया।
यही नहीं, महावंश और दीपवंश नामक बौद्ध ग्रन्थों में सम्राट अशोक द्वारा श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया गयाहै।तिब्बती बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान से हमें बौद्ध धर्म के प्रसार में अशोक के प्रयासों की जानकारी मिलती है।दीघनिकाय की टीका ‘सुमंगलाविलासिनी’ भी मौर्य इतिहास का स्रोत है।वहीं बुद्ध की जातक कथाओं में भी मौर्यकालीन सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
(c) जैन साहित्य - जैन ग्रन्थों मेंभद्रबाहु का कल्प सूत्रतथाहेमचन्द्र रचित परिशिष्टपर्वभीमौर्य इतिहास केअन्य प्रमुख स्रोत हैं।भद्रबाहु रचित जैन कल्पसूत्र मेंचौथी शताब्दी ईसा पूर्व इतिहास का उल्लेख मिलता है।जबकि हेमचन्द्र लिखित परिशिष्टपर्व एक प्रकार से आचार्य चाणक्य की जीवनी है, बावजूद इसके यह कृति मगध साम्राज्य की सामाजिक और आर्थिक जानकारी प्रदान करती है।
2. विदेशी विवरण
यूनानी इतिहासकारों विशेषकर स्ट्रेबो, कर्टिअस, डिओडोरस, प्लिनी, एरियन, जस्टिन, प्लूटार्क, नियार्कस, ओनेसिक्रिटस, एरिस्टोब्यूलस आदि के विवरण से मौर्यकालीन इतिहास एवं संस्कृति का ज्ञान प्राप्त होता है।स्ट्रैबो ने अपनी कृति में चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस निकेटर के बीच हुए वैवाहिक सम्बन्धों का उल्लेख किया है, साथ ही यहलेखक चंद्रगुप्त मौर्य की महिला अंगरक्षकों की भी जानकारी प्रदान करता है।
प्लूटार्क लिखता है कि “चन्द्रगुप्त ने 6 लाख सैनिकों के साथ समूचे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किया”। जस्टिन के अनुसार, “सम्पूर्ण भारत चन्द्रगुप्त मौर्य के कब्जे में था”।
सिकन्दर के बाद के लेखकों में मेगस्थनीज का नाम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जिसकी रचना ‘इंडिका’ मौर्य इतिहास का प्रमुख स्रोत है। सेल्यूकस निकेटर के राजदूत मेगस्थनीज की महत्वपूर्ण कृति ‘इंडिका’ अपने मूल रूप में प्राप्त नहीं है किन्तु इसके उद्धरण परवर्ती लेखकों जैसे - प्लूटार्क, स्ट्रैबो और एरियनआदिकी रचनाओं में उपलब्ध है।
स्ट्रेबो एवं जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को ‘सैण्ड्रोकोट्स’ तथा एरियन व प्लूटार्क ने ‘एण्ड्रोकोट्टस’ जबकि फिलार्कस ने ‘सैण्ड्रोकोट्टस’ कहा है।सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने ही सैण्ड्रोकोट्टस की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से की।
मौर्य वंश का इतिहास जानने में पुरातात्विक स्रोतों की विशेष महत्ता है।इन अभिलेखों से ही हमें अशोक के शासनकाल एवं उसके साम्राज्य विस्तार की सम्पूर्ण जानकारी मिलती है।
अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त शक महाक्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़लेख, काली पॉलिश वाले मृदभाण्ड तथा चांदी व तांबे के पंचमार्क सिक्कों से भी मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है।रूद्रदामन के जूनागढ़ (गिरनार) लेखसे सौराष्ट्र प्रान्त में चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन की जानकारी मिलती है।
बांग्लादेश में बोगरा स्थित महास्थान तामपत्र लेख तथा उत्तर प्रदेश में गोरखपुर स्थित सौहगोरा तामपत्र लेख सेमौर्ययुग में अकाल से सामना करने के लिए अन्न भंडार के बारे में जानकारी मिलती है।
सम्राट अशोक के अभिलेख भी मौर्य इतिहास को प्रबल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। अशोक के तकरीबन 40 अभिलेख भारत, पाकिस्तान
तथा अफगानिस्तान के विभिन्न हिस्सों से अब प्रकाश में आ चुके हैं। अशोक
के अभिलेखों का विभाजन तीन वर्गों में किया जा सकता है। 1. शिलालेख 2.
स्तम्भ लेख3. गुहालेख।
सम्राट अशोक के अभिलेखों की सर्वप्रथम खोज टीफेन्थैलर ने साल 1750 में की। वहीं जेम्स प्रिंसेप पहला नाम है जिसने 1837 ई. में अशोक के अभिलेखों की लिपि पढ़ने में सफलता प्राप्त की।मास्की में अशोक के लेख की खोज मि. बीडल ने साल 1915 में की। सिंहलीग्रन्थ दीपवंश में ‘प्रियदर्शी’ एवं ‘देवानामप्रिय’ का प्रयोग सम्राट अशोक के लिए किया गया है, इसकी जानकारी सर्वप्रथम टर्नर ने दी।
(A) शिलालेख - सम्राट अशोक से जुड़े 14 शिलालेख, आठ स्थान व खोजकर्ता का नाम।
(c) स्तम्भ लेख - ब्राह्मी लिपि में पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण अशोक के स्तम्भ लेखों की संख्या सात है, जो छह भिन्न-भिन्न स्थानों से पाए गए हैं।
1. दिल्ली – टोपरा - टोपरा
स्तम्भ लेख मूलत: हरियाणा के अम्बाला में था। सुल्तान फिरोज तुगलक ने इसे
दिल्ली में गड़वा दिया। सिर्फ टोपरा स्तम्भ लेख में सात अभिलेख पूरे मिलते
हैं, अन्य सभी पर केवल छह ही लेख उत्कीर्ण मिलते हैं।टोपरा स्तम्भ लेखमें आजीवकों, निर्ग्रन्थों आदि का संघ के साथ उल्लेख किया गया है।
2. दिल्ली – मेरठ - मेरठ से फिरोज तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया।
3. लौरिया - अरराज - बिहार के चम्पारन जिला में स्थित।
4. लौरिया- नन्दनगढ़ - बिहार के चम्पारन जिला में स्थित।
5. रामपुरवा - बिहार के चम्पारन जिला में स्थित।
6. प्रयाग - यह स्तम्भ लेख बादशाह अकबर द्वारा इलाहाबाद किले में लगवाया गया।
लघु स्तम्भ लेख — लघु स्तम्भ लेखों पर अशोक की राजकीय घोषणाएं उत्कीर्ण हैं, जो निम्नलिखित स्थानों से मिले हैं।
सांची 2. सारनाथ 3. कौशाम्बी : इन तीनों जगहों पर संघ भेद रोकने सम्बन्धी आदेश।
4. रूम्मिनदेई (नेपाल की तराई) - अशोक ने इस स्थान की धम्म यात्रा की तथा लुम्बिनी का भूमिकर घटाकर 1/8 कर दिया व लुम्बिनी को ‘धार्मिक कर’ से पूर्णतया मुक्त कर दिया। 5. निग्लिवा (नेपाल की तराई) - अशोक ने राज्याभिषेक के 14वें वर्ष कनकमुनि स्तूप को संवर्धित करवाया तथा बीसवें वर्ष में कनकमुनि की यात्रा की।
—कौशाम्बी के स्तम्भ लेख में अशोक की रानी कारुवाकी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है।अत: इसे ‘रानी का अभिलेख’ भी कहा जाता है।
—रूम्मिनदेई लेख में मौर्यकालीन ‘करनीति’ की जानकारी मिलती है।अशोक के शेष अभिलेखों का विषय प्रशासनिक है।
—कौशाम्बी के लघु स्तम्भ लेख में कौशाम्बी के महामात्रों को संघ भेद रोकने के आदेश दिए गए हैं।
गुहालेख — बिहार
स्थित गया जिले में बराबर पहाड़ी गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख
उत्कीर्ण मिले हैं। गुहा लेख धार्मिक सहिष्णुता के परिचायक हैं। गुहा लेख
में अशोक द्वारा आजीवक साधुओं को निवास हेतु दान करने का उल्लेख है।
सम्राटअशोकनेआजीवकोंकेनिवासकेलिएचारगुफाओंकानिर्माणकरवाया – 1.कर्ण, 2. सुदामा, 3. चौपार तथा 4. विश्व झोपड़ी।
पनगुडरिया गुहालेख में अशोक को ‘महाराज कुमार’ कहा गया है।
नागार्जुनी गहालेख अशोक के पौत्र दशरथ ने उत्कीर्ण करवाए।
अशोक के शिलालेखों तथा स्तम्भलेखों
से यह स्पष्ट होता है कि उसका साम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण में
कर्नाटक तथा पश्चिम में सौराष्ट्र प्रान्त तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक
फैला हुआ था।
अशोक के अभिलेखों की भाषा एवं लिपि
अशोक के भिन्न-भिन्न अभिलेख ब्राह्मी, खरोष्ठी तथा अरामेइक लिपि में उत्कीर्ण हैं। जबकि अभिलेखों की भाषा प्राकृत है।
—अशोक ज्यादातर अभिलेख ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं, केवल शाहबाजगढ़ी व मानसेहरा अभिलेखों की लिपि खरोष्ठी है।
—तक्षशिला व लमघान (अफगानिस्तान) से अरामेइक लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं।कन्धार में ‘शेर-ए-कुना’ के पास यूनानी तथा अरामेइक लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख मिले हैं।
—एर्रगुडी एक मात्र अभिलेख है जो खरोष्ठी व ब्राह्मी दोनों लिपि में है।
—खरोष्ठी व अरामेइक लिपि का जनक ईरान है।
—ब्राह्मी लिपि बाएं से दाएं लिखी जाती है, जबकि खरोष्ठी लिपि दाएं से बाएं (उर्दू की तरह) लिखी जाती है।
—डॉ. आर.जी. भण्डारकर ने केवल अशोक के अभिलेखों के आधार पर अशोक का इतिहास लिखा है।
— भाब्रु-बैराट (राजस्थान) अभिलेख की खोज 1840 ई. में कैप्टन बर्ट ने की।भाब्रुअभिलेख से अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की जानकारी मिलती है।
निष्कर्षतया साहित्य, विदेशी
विवरण तथा पुरातात्विक स्रोत मौयकालीन इतिहास की बहुमूल्य जानकारी सुलभ
कराते हैं। दरअसल मौर्यकाल से ही भारत के क्रमबद्ध इतिहास का सिलसिला शुरू
होता है।
The Mauryan Empire, which formed around 321 B.C.E. and ended in 185 B.C.E., was the first pan-Indian empire,
an empire that covered most of the Indian region. It spanned across
central and northern India as well as over parts of modern-day Iran.
The
Mauryan Empire’s first leader, Chandragupta Maurya, started
consolidating land as Alexander the Great’s power began to wane.
Alexander’s death in 323 B.C.E. left a large power vacuum, and
Chandragupta took advantage, gathering an army and overthrowing the
Nanda power in Magadha, in present-day eastern India, marking the start
of the Mauryan Empire. After crowning himself king, Chandragupta took
additional lands through force and by forming alliances.
Chandragupta’s chief minister Kautilya, sometimes called Chanakya, advised Chandragupta and contributed to the empire’s legacy. In addition to being a political strategist, Kautilya is also known for writing the Arthashastra, a treatise
about leadership and government. The Arthashastra describes how a state
should organize its economy and maintain power. Chandragupta’s
government closely resembled the government described in the
Arthashastra. One notable aspect of the Arthashastra was its focus on
spies. Kautilya recommended the king have large networks of informants
to work as a surveillance force for the ruler. The focus on deception
reveals a pragmatic, and borderline cynical, view of human nature.
Bindusara,
Chandragupta’s son, assumed the throne around 300 B.C.E. He kept the
empire running smoothly while maintaining its lands. Bindusara’s son,
Ashoka, was the third leader of the Mauryam Empire. Ashoka left his mark
on history by erecting large stone pillars inscribed with edicts
that he issued. After leading a bloody campaign against Kalinga (a
region on the central-eastern coast of India), Ashoka reevaluated his
commitment to expanding the empire and instead turned to Buddhism
and its tenet of nonviolence. Many of his edicts encouraged people to
give up violence and live in peace with each other—two important
Buddhist principals.
After Ashoka’s death, his family continued to reign,
but the empire began to break apart. The last of the Mauryas,
Brihadratha, was assassinated by his commander in chief—a man named
Pushyamrita who went on to found the Shunga Dynasty—in 185 B.C.E.
Chandragupta
Maurya founded the Mauryan Empire which had a large portion of the
subcontinent, extending up to the far northwest and was ruled by a
single supreme power.
By Vajiram Editor - Aug 22, 2025, 15:29 IST
Vajiram and Ravi
Mauryan Empire
Table of Contents☰
Chandragupta
Maurya (321–297 BCE) is considered to be the founder of the Mauryan
Empire. Inspired by Alexander, Chandragupta built up an army and
overthrew the Nanda power in Magadha, in present-day eastern India,
establishing the Mauryan Empire.After becoming king, Chandragupta took
additional lands by force and alliances. Chandragupta’s chief minister,
Kautilya, sometimes advised Chandragupta and contributed to the empire’s
legacy.
The Mauryan empire marks a watershed
juncture in Indian history. For the first time in India's history, a
large portion of the subcontinent, extending up to the far northwest,
was ruled by a single supreme power.
Sources for the Mauryan Period
Kautilya’s Arthashastra
Ashokan inscriptions
The most important literary source is Megasthenes’ Indica.
Divyavadana and the Ashokavadana
Sri Lankan Buddhist chronicles included the Mahavamsa, theDipavamsa, and the kings listed in Puranas.
Bulandi Bagh and Kumrahar archaeological remains are associated with the Mauryan capital, Pataliputra.
Mauryan Empire Rulers and their Contributions
Archaeologically, the Mauryan period in South Asia corresponds to the Northern Black Polished Ware (NBPW) era.
Period: 321 BCE- 185 BCE Capital: Patliputra
Chandragupta Maurya
(321 BCE-297 BCE)
-
Parishishtaparvan, written by Hemachandra, identifies Chandragupta as
the grandson of the chief of the peacock tamers clan (mayura-poshakas).
-
He was the chief architect of the Mauryan empire and built a vast
empire, which included Bihar, Nepal, western and north-western India,
and the Deccan.
- War with Seleucus: The
Mauryans annexed several areas in the Hindu Kush region in 305 BC. These
regions were governed by satraps (governors) appointed by Alexander
during his campaign.
This move prompted Seleucus to campaign against Chandragupta to secure the eastern border of his empire.
-
Treaty with Seleucus Nicator (303 BCE): According to the terms of this
treaty, Seleucus ceded Chandragupta the territories of Arachosia (the
Kandahar area of south-east Afghanistan), Gedrosia (south Baluchistan),
and Paropomisadai (area between Afghanistan and the Indian
subcontinent).
Alongside the treaty, the general rights of intermarriage between the Greeks and the Indians were also acknowledged.
- Greek historians Megasthenes and Dionysius resided at the Mauryan court.
- Religion: Chandragupta gave up his throne and became a disciple of Jain teacher Bhadrabahu.
Bindusara (297 BCE-273 BCE)
- The Mahabhashya refers to Chandragupta’s successor as Amitraghata (a slayer of enemies).
He is also referred to as "Amitrochates" in Greek sources.
- Conquest: He brought sixteen states under the Mauryan Empire and thus conquered almost all of the Indian peninsula.
He conquered ‘the land between the two seas’, i.e., the Arabian Sea and the Bay of Bengal.
He continued the empire’s expansion well into the Deccan, stopping around the region of Karnataka.
- Deimachus was the Seleucid emperor Antiochus I's ambassador at Bindusara's court.
- Religion: He joined the Ajivika sect.
Ashoka (272 BCE –232 BCE)
- During his father’s reign, he was appointed as the Viceroy of Taxila and Ujjain.
- He was the first ruler to maintain direct contact with his people through his inscriptions.
-
Names of Ashoka: Buddhashakya and Ashoka (in the Maski Edict),
Dharmasoka (Sarnath inscription), Devanampiya (meaning beloved of the
gods), and Piyadassi (given in the Sri Lankan Buddhist chronicles
Dipavamsa and Mahavamsa).
- Kalinga War: Fought between Ashoka and the state of Kalinga.
Reason for invading Kalinga: Kalinga was a glorious and prosperous
region that valued freedom and was talented in the arts. Kalinga had
some important ports as well as a strong navy.
After
witnessing so much loss of life during the war, Ashoka abandoned
violence and established peace and harmony in his kingdom.
- Religion: Proponent of Buddhism; Organised 3rd Buddhist Council at Pataliputra.
- Dhamma: The word ‘Dhamma’ is the Prakrit form of the Sanskrit word ‘Dharma’.
The Ashokan edicts were written primarily to explain to the people throughout the empire the principles of Dhamma.
Ashoka’s dhamma was not a specific religious belief or practice.
Dasharatha
(232 BCE - 224 BCE)
- He was the last ruler of the Mauryan dynasty to have issued imperial inscriptions.
- Several territories of the empire broke away during his reign.
- Religion: Continued the religious and social practices of Ashoka.
Samprati
(224 BCE - 215 BCE)
- Samprati ruled both from Pataliputra and Ujjain, according to the Jain text Parisistaparvan.
- He reconquered the provinces of Saurashtra, Maharashtra, Andhra, and Mysore, which were disintegrated after Ashoka’s death.
- Contributions to Jainism: He is regarded for his patronage and efforts to spread Jainism in East India.
He made it possible for monks to travel to barbarian lands.
He was a disciple of Suhastisuriji.
Samprati was mentioned in the Kalpa-sutra-bhashya as making Andhra, Dravida, Maharashtra, and Coorg safe for Jain monks.
Shalishuka
(215 BCE - 202 BCE)
- He was mentioned in the Gargi Samhita's Yuga Purana section as a quarrelsome, unrighteous ruler.
Devavarman
(202 BCE- 195 BCE)
- According to the Puranas, he was Shalishuka's successor and reigned for seven years.
Shatadhanvan
(195 BCE - 187 BCE)
- According to Puranas, Shatadhanvan succeeded Devavarman Maurya.
- The empire lost some of its territories because of invasions from outside and neighbouring kingdoms during his reign.
Brihadratha
(187 BCE - 185 BCE)
- Brihadratha was the last Mauryan emperor.
-
According to some sources, he was assassinated by his Brahman
commander-in-chief, Pushyamitra Shunga, who went on to establish the
Shunga Empire.
Mauryan Empire Map
Mauryan Empire Society and Religion
Megasthenes and later Greek authors describe Indian society at the
time of Mauryas as being divided into seven distinct groups –
philosophers, cultivators, hunters and herders, artisans and traders,
overseers (spies), and the king’s counsellors.
These occupations were hereditary, and
Intermarriage between groups was not allowed.
Religion: Chandragupta took recourse to Jainism in his later years,
and Bindusara favoured the Ajivikas. In his personal life, Ashoka
practised Buddhism, but he never imposed it on his subjects.
Agrarian Society
The
majority of the population concentrated on agriculture. All accounts
speak of the profusion and diversity of crops achieved due to the
profitable combination of highly fertile soil, rivers, and plentiful
rainfall.
Non-agrarian activities such as the herding of animals were practised even within villages.
Kautilya even listed animals among the items that were assessed and taxed.
Status of Women: Women occupied a high position and freedom and were employed as the King's personal bodyguards.
They were permitted to divorce or remarry.
Slavery under Mauryan Empire
According to Megasthenes, there was no concept of slavery in India.
But some other sources mentioned situations that led to enslavement –
a person could be a slave either by birth, by voluntarily selling
themselves, by being captured in war, or as a result of judicial
punishment. Kautilya also discussed various types of slaves.
Ashokan Major Rock Edict V: Concerns about the policy towards slaves.
He mentions in this rock edict, "Every Human is my child".
Mauryan Empire Economy
Agriculture
was the leading sector during the Mauryan Empire, contributing
significantly to revenue and employment. The fertile soil allowed for
two crop cycles, including food grains and commercial crops like
sugarcane and cotton. Crafts, such as weaving cotton fabrics, were
widespread. Trade and exchange became crucial as the economy diversified
and expanded beyond subsistence needs.
StepUp Mentorship
GS 12
GS 2 yr
IAS Toppers
Agrarian Economy: The Arthashastra recognised permanent village
settlement as a method of expanding the agrarian economy. This method of
settlement was known as janapadanivesa.
Agriculture
in other areas of the Mauryan State, known as janapada territories, was,
in all probability, carried on privately.
Sita or
crown lands: In these areas, the King's and the State's rights to
possession, cultivation, mortgage, and sale were naturally superior.
Sitadhyaksa, or superintendent of agriculture, supervised the cultivation works here.
Currency: During the Mauryan Empire, the primary form of currency in
widespread circulation was the silver coin called the "pana" and its
smaller denominations.
Rajapanya: Goods produced by states
were called rajapanya, and different categories of officials were
stationed there to look after specific departments.
Mauryan Empire Land Revenue
The Mauryan era was a watershed moment in the evolution of ancient India's taxation system.
Samaharta: Collector general of revenue for the Mauryan Empire. He had control over the expenditure part also.
Sannidhata: Officer-in-charge of the treasury and store.
Bhaga (land tax): 1/4th of the produce paid by the peasants.
The peasants paid a tax known as pindakara, which was levied on groups of villages by husbandmen.
Other taxes were Bali and Hiranaya (paid in cash).
Mauryan Empire Trade
The Jataka stories frequently mention caravan traders transporting large amounts of goods to various parts of the country.
Trade routes: The main trade routes in northern India were along the Ganges River and the Himalayan foothills.
Megasthenes also mentions a land route linking the North West to Pataliputra.
It was connected to Central India in the south and Kalinga in the
south-east. This eastern route turned southwards to reach Andhra and
Karnataka finally.
Taxila (near Islamabad) was the overland route to Western countries.
Internal trade was considerably beneficial because river transport
improved once the forests around the Valleys had been cleared under
State initiative.
The artisans during the Mauryan period
were organised along guild lines. The well-known guilds were
metallurgists, carpenters, potters, leatherworkers, painters, textile
workers, etc.
The State employed some artisans like
armourers, shipbuilders, and stone builders. They were exempt from
paying taxes because they performed mandatory labour services for the
state. Other artisans who worked for the State were taxed, like
spinners, weavers, miners, etc.
The State's policy,
particularly under Bindusara and Ashoka, of maintaining peaceful and
friendly relations with the Greeks boosted foreign trade.
Key officers:
Panyadhyaksha: Superintendent of commerce whose duty was to fix prices of goods.
Samsthadhyaksa: Look after the markets and check the unfair practices of the traders.
Pautavadbyaksa: Superintendent of weights and measures.
Navadhyaksha: Facilitated state boats for transport and helped regulate river transport and collect ferry charges.
Sulkadhyaksa: Superintendent of tolls.
Akaradhyaksa: Superintendent of mines.
Mauryan Empire Decline
The
imperial authority of the Mauryas began to weaken with the death of
Ashoka (232 BCE) and finally collapsed in 180 BCE. The major reasons for
its decline are:
Successors of Ashoka:
After Ashoka, the empire fragmented, and there was a quick
succession of rulers. This weakened the imperial control over the
administration.
These rulers ruled only for a short
period and, therefore, could not formulate either new governance
policies or maintain the old ones.
Other Political factors for disintegration:
Dhamma-mahamattas (large body of officials of State) might have
become very powerful and oppressive during the latter half of Ashoka’s
reign.
Weak rulers for a short duration resulted in an
overwhelming number of new officials constantly emerging and owing only
personal loyalty to their respective kings rather than to the State.
The complex system of spies under the later Mauryas collapsed, which led to corruption.
Economic factors:
The state monopoly on metals was gradually eroding. Magadha could
no longer meet the increasing demand for iron, which was critical to
the expanding agrarian economy.
Expansion in
cultivation, extensive use of forest wood, and deforestation, in
general, may have led to floods and famines. There is, in fact, evidence
of a big famine in north Bengal during the Mauryan period.
In a centralised administrative system, the problem of not having
enough revenues created many other acute difficulties. To enhance the
revenues, the Arthashastra suggested that taxes should be imposed even
on actors, prostitutes, and so on.... Read more at:
https://vajiramandravi.com/upsc-exam/mauryan-empire/
The teacher known as the Buddha lived in northern India sometime between the mid-6th and the mid-4th centuries before the Common Era. In ancient India the title buddha referred to an enlightened
being who has awakened from the sleep of ignorance and achieved freedom
from suffering. According to the various traditions of Buddhism,
buddhas have existed in the past and will exist in the future. Some
Buddhists believe that there is only one buddha for each historical age,
others that all beings will become buddhas because they possess the
buddha nature (tathagatagarbha).
The
historical figure referred to as the Buddha (whose life is known
largely through legend) was born on the northern edge of the Ganges River basin, an area on the periphery of the ancient civilization of North India, in what is today southern Nepal. He is said to have lived for 80 years. His family name was Gautama (in Sanskrit) or Gotama (in Pali), and his given name was Siddhartha (Sanskrit: “he who achieves his aim”) or Siddhattha (in Pali). He is frequently called Shakyamuni,
“the sage of the Shakya clan.” In Buddhist texts he is most commonly
addressed as Bhagavat (often translated as “Lord”), and he refers to
himself as the Tathagata,
which can mean both “one who has thus come” and “one who has thus
gone.” Traditional sources on the date of his death—or, in the language
of the tradition, his “passage into nirvana”—range from 2420 to 290 bce. Scholarship in the 20th century limited that range considerably, with opinion generally divided between those who believed he lived from about 563 to 483 bce and those who believed he lived about a century later.
dream of Maya presaging the Buddha's birthDream
of Maya presaging the Buddha's birth, marble relief from
Nagarjunikonda, Andhra Pradesh state, India, Amaravati school, c. 3rd
century ce; in the India Museum, Kolkata.
Birth of the BuddhaThe
Buddha's mother, Maha Maya, holding onto a tree and giving birth to the
Buddha from under her right arm. Black stone figurine statue, Pala
period, from India (Madhya Pradesh or Bihar), 11th century; in the
Metropolitan Museum of Art, New York.
Information about his life derives
largely from Buddhist texts, the earliest of which were produced
shortly before the beginning of the Common Era and thus several
centuries after his death. According to the traditional accounts,
however, the Buddha was born into the ruling Shakya clan and was a
member of the Kshatriya, or warrior, caste. His mother, Maha Maya, dreamt one night that an elephant entered her womb, and 10 lunar months later, while she was strolling in the garden of Lumbini,
her son emerged from under her right arm. His early life was one of
luxury and comfort, and his father protected him from exposure to the
ills of the world, including old age, sickness, and death. At age 16 he married the princess Yashodhara,
who would eventually bear him a son. At 29, however, the prince had a
profound experience when he first observed the suffering of the world
while on chariot rides outside the palace. He resolved then to renounce
his wealth and family and live the life of an ascetic. During the next six years, he practiced meditation
with several teachers and then, with five companions, undertook a life
of extreme self-mortification. One day, while bathing in a river, he
fainted from weakness and therefore concluded that mortification was not
the path to liberation from suffering. Abandoning the life of extreme asceticism, the prince sat in meditation under a tree and received enlightenment, sometimes identified with understanding the Four Noble Truths.
For the next 45 years, the Buddha spread his message throughout
northeastern India, established orders of monks and nuns, and received
the patronage of kings and merchants. At the age of 80, he became
seriously ill. He then met with his disciples for the last time to impart his final instructions and passed into nirvana. His body was then cremated and the relics distributed and enshrined in stupas (funerary monuments that usually contained relics), where they would be venerated.
The
Buddha’s place within the tradition, however, cannot be understood by
focusing exclusively on the events of his life and time (even to the
extent that they are known). Instead, he must be viewed within the context of Buddhist theories of time and history. Among these theories is the belief that the universe is the product of karma, the law of the cause and effect
of actions. The beings of the universe are reborn without beginning in
six realms as gods, demigods, humans, animals, ghosts, and hell beings. The cycle of rebirth, called samsara
(literally “wandering”), is regarded as a domain of suffering, and the
Buddhist’s ultimate goal is to escape from that suffering. The means of
escape remains unknown until, over the course of millions of lifetimes, a
person perfects himself, ultimately gaining the power to discover the
path out of samsara and then revealing that path to the world.
A person who has set out to discover the path to freedom from suffering and then to teach it to others is called a bodhisattva.
A person who has discovered that path, followed it to its end, and
taught it to the world is called a buddha. Buddhas are not reborn after
they die but enter a state beyond suffering called nirvana (literally
“passing away”). Because buddhas appear so rarely over the course of
time and because only they reveal the path to liberation from suffering,
the appearance of a buddha in the world is considered a momentous
event.
The story of a particular buddha begins before his birth and extends beyond his death. It encompasses
the millions of lives spent on the path toward enlightenment and
Buddhahood and the persistence of the buddha through his teachings and
his relics after he has passed into nirvana. The historical Buddha is
regarded as neither the first nor the last buddha to appear in the
world. According to some traditions he is the 7th buddha, according to
another he is the 25th, and according to yet another he is the 4th. The
next buddha, Maitreya, will appear after Shakyamuni’s teachings and relics have disappeared from the world.
Sites associated with the Buddha’s life became important pilgrimage places, and regions that Buddhism entered long after his death—such as Sri Lanka, Kashmir, and Burma (now Myanmar)—added
narratives of his magical visitations to accounts of his life. Although
the Buddha did not leave any written works, various versions of his
teachings were preserved orally by his disciples. In the centuries
following his death, hundreds of texts (called sutras) were attributed to him and would subsequently be translated into the languages of Asia.
Teaching BuddhaFresco of the Teaching Buddha at the Gubyaukgyi temple, 12th century, Pagan, Myanmar.
The
teaching attributed to the Buddha was transmitted orally by his
disciples, prefaced by the phrase “evam me sutam” (“thus have I heard”);
therefore, it is difficult to say whether or to what extent his
discourses have been preserved as they were spoken. They usually allude
to the place and time they were preached and to the audience to which
they were addressed. Buddhist councils in the first centuries after the
Buddha’s death attempted to specify which teachings attributed to the
Buddha could be considered authentic.
Suffering, impermanence, and no-self
The Buddha based his entire teaching on the fact of human suffering and the ultimately dissatisfying character of human life. Existence
is painful. The conditions that make an individual are precisely those
that also give rise to dissatisfaction and suffering. Individuality
implies limitation; limitation gives rise to desire; and, inevitably, desire causes suffering, since what is desired is transitory.
Living
amid the impermanence of everything and being themselves impermanent,
human beings search for the way of deliverance, for that which shines
beyond the transitoriness of human existence—in short, for
enlightenment. The Buddha’s doctrine offered a way to avoid despair. By
following the “path” taught by the Buddha, the individual can dispel the
“ignorance” that perpetuates this suffering.
According to the Buddha of the early texts, reality,
whether of external things or the psychophysical totality of human
individuals, consists of a succession and concatenation of microelements
called dhammas (these “components” of reality are not to be confused
with dhamma
meaning “law” or “teaching”). The Buddha departed from traditional
Indian thought in not asserting an essential or ultimate reality in
things. Moreover, he rejected the existence of the soul as a metaphysical substance, though he recognized the existence of the self as the subject of action in a practical and moral sense. Life is a stream of becoming, a series of manifestations
and extinctions. The concept of the individual ego is a popular
delusion; the objects with which people identify themselves—fortune,
social position, family, body, and even mind—are not their true selves.
There is nothing permanent, and, if only the permanent deserved to be
called the self, or atman, then nothing is self.
To make clear the concept of no-self (anatman), Buddhists set forth the theory of the five aggregates or constituents (khandhas) of human existence: (1) corporeality or physical forms (rupa), (2) feelings or sensations (vedana), (3) ideations (sanna), (4) mental formations or dispositions (sankhara), and (5) consciousness (vinnana).
Human existence is only a composite of the five aggregates, none of
which is the self or soul. A person is in a process of continuous
change, and there is no fixed underlying entity.
The belief in rebirth, or samsara,
as a potentially endless series of worldly existences in which every
being is caught up was already associated with the doctrine of karma
(Sanskrit: karman; literally “act” or “deed”) in pre-Buddhist
India, and it was accepted by virtually all Buddhist traditions.
According to the doctrine, good conduct brings a pleasant and happy
result and creates a tendency toward similar good acts, while bad
conduct brings an evil result and creates a tendency toward similar evil
acts. Some karmic acts bear fruit in the same life in which they are
committed, others in the immediately succeeding one, and others in
future lives that are more remote. This furnishes the basic context for
the moral life.
The
acceptance by Buddhists of the teachings of karma and rebirth and the
concept of the no-self gives rise to a difficult problem: how can
rebirth take place without a permanent subject to be reborn? Indian
non-Buddhist philosophers attacked this point in Buddhist thought, and
many modern scholars have also considered it to be an insoluble problem.
The relation between existences in rebirth has been explained by the analogy of fire, which maintains itself unchanged in appearance and yet is different in every moment—what may be called the continuity of an ever-changing identity.
Awareness of these fundamental realities led the Buddha to formulate the Four Noble Truths: the truth of misery (dukkha;
literally “suffering” but connoting “uneasiness” or “dissatisfaction”),
the truth that misery originates within the craving for pleasure and
for being or nonbeing (samudaya), the truth that this craving can be eliminated (nirodhu), and the truth that this elimination is the result of following a methodical way or path (magga).
The law of dependent origination
The Buddha, according to the early texts, also discovered the law of dependent origination (paticca-samuppada),
whereby one condition arises out of another, which in turn arises out
of prior conditions. Every mode of being presupposes another immediately
preceding mode from which the subsequent mode derives, in a chain of
causes. According to the classical rendering, the 12 links in the chain
are: ignorance (avijja), karmic predispositions (sankharas), consciousness (vinnana), form and body (nama-rupa), the five sense organs and the mind (salayatana), contact (phassa), feeling-response (vedana), craving (tanha), grasping for an object (upadana), action toward life (bhava), birth (jati), and old age and death (jaramarana).
According to this law, the misery that is bound with sensate existence
is accounted for by a methodical chain of causation. Despite a diversity
of interpretations, the law of dependent origination of the various
aspects of becoming remains fundamentally the same in all schools of
Buddhism.
The
law of dependent origination, however, raises the question of how one
may escape the continually renewed cycle of birth, suffering, and death.
It is not enough to know that misery pervades all existence and to know
the way in which life evolves; there must also be a means to overcome
this process. The means to this end is found in the Eightfold Path, which is constituted by right views, right aspirations, right speech, right conduct, right livelihood, right effort, right mindfulness, and right meditational attainment.
The aim of Buddhist practice is to be rid of the delusion of ego and thus free oneself from the fetters of this mundane world. One who is successful in doing so is said to have overcome the round of rebirths and to have achieved enlightenment. This is the final goal in most Buddhist traditions, though in some cases (particularly though not exclusively in some Pure Land schools in China and Japan) the attainment of an ultimate paradise or a heavenly abode is not clearly distinguished from the attainment of release.
The living process is again likened to a fire. Its remedy is the extinction of the fire of illusion, passions, and cravings. The Buddha, the Enlightened
One, is one who is no longer kindled or inflamed. Many poetic terms are
used to describe the state of the enlightened human being—the harbour
of refuge, the cool cave, the place of bliss, the farther shore. The
term that has become famous in the West is nirvana, translated as
passing away or dying out—that is, the dying out in the heart of the
fierce fires of lust, anger, and delusion. But nirvana is not
extinction, and indeed the craving for annihilation or nonexistence was
expressly repudiated by the Buddha. Buddhists search for salvation,
not just nonbeing. Although nirvana is often presented negatively as
“release from suffering,” it is more accurate to describe it in a more
positive fashion: as an ultimate goal to be sought and cherished.
In
some early texts the Buddha left unanswered certain questions regarding
the destiny of persons who have reached this ultimate goal. He even
refused to speculate as to whether fully purified saints, after death,
continued to exist or ceased to exist. Such questions, he maintained,
were not relevant to the practice of the path and could not in any event
be answered from within the confines
of ordinary human existence. Indeed, he asserted that any discussion of
the nature of nirvana would only distort or misrepresent it. But he
also asserted with even more insistence that nirvana can be
experienced—and experienced in the present existence—by those who,
knowing the Buddhist truth, practice the Buddhist path.
The Mauryan Empire (322 BCE - 185 BCE) supplanted the earlier Magadha Kingdom to assume power over large tracts of eastern and northern India.
At its height, the empire stretched over parts of modern Iran and
almost the entire Indian subcontinent, barring only the southern
peninsular tip. The empire came into being when Chandragupta Maurya stepped into the vacuum created by Alexander of Macedon's departure from the western borders of India. Chandragupta subjugated the border states, recruited an army, marched upon the Magadha
kingdom, killed its tyrannical king who was despised by the populace,
and ascended the throne. He thus founded the Mauryan dynasty. In his
rise to power, he was aided and counselled by his chief minister Kautilya (also known as Chanakya), who wrote the Arthashastra, a compendium of kingship and governance.
Consolidation of power
Chandragupta embarked upon an aggressive expansion policy. Seleucos I Nicator, who was Alexander's satrap
for the eastern Macedonian conquests, was defeated and had to cede the
entire territory under him to Chandragupta, along with a daughter and
considerable money. He also sent Megasthenes, who wrote the Indica, to the Mauryan court as the Greek ambassador.
Chandragupta used marriage alliances, diplomacy, trickery, and war
to extend his kingdom. Under him, the Mauryan empire stretched from
eastern Iran to the western borders of the Burmese hills, and from the
Himalayan tribal kingdom to the southern plateaus of peninsular India.
After ruling for about 25 years, Chandragupta abdicated in favour of his
son, Bindusara, and became a Jain monk.
Bindusara maintained his father's large dominions efficiently and
extended the southern borders to cover the peninsular plateau of India.
When he died, his son Ashoka
seized the throne after a fratricidal succession dispute. The empire
that Ashoka inherited was large, but a small kingdom on the east coast,
Kalinga, was outside its pale. Ashoka decided to conquer
it. The war that ensued was bloody and long. Kalinga resisted to the
last man but fell. After Kalinga, Ashoka did not attack any kingdom but
proceeded on a mission of peace. He erected several pillars throughout
his kingdom, exhorting people to give up violence and live in harmony
with each other and with nature. He actively patronised Buddhism,
built several stupas and repaired older ones, and sent evangelical
missions abroad, two of which comprised his own son and daughter.
...various animals were declared to be protected — parrots,
mainas, aruna, ruddy geese, wild ducks, nandimukhas, gelatas, bats,
queen ants, terrapins, boneless fish, vedareyaka, gangapuputaka, sankiya
fish, tortoises, porcupines, squirrels, deer, bulls, okapinda, wild
asses, wild pigeons, domestic pigeons and all four-footed creatures that
are neither useful nor edible. Those nanny goats, ewes and sows which
are with young or giving milk to their young are protected, and so are
young ones less than six months old. Cocks are not to be caponized,
husks hiding living beings are not to be burnt and forests are not to be
burnt either without reason or to kill creatures. One animal is not to
be fed to another. On the three Caturmasis, the three days of Tisa and
during the fourteenth and fifteenth of the Uposatha, fish are protected
and not to be sold. During these days animals are not to be killed in
the elephant reserves or the fish reserves either. On the eighth of
every fortnight, on the fourteenth and fifteenth, on Tisa, Punarvasu,
the three Caturmasis and other auspicious days, bulls are not to be
castrated, billy goats, rams, boars and other animals that are usually
castrated are not to be. On Tisa, Punarvasu, Caturmasis and the
fortnight of Caturmasis, horses and bullocks are not be branded.
(Pillar edict)
The successor's of Ashoka were not strong enough to hold the empire
together. It started disintegrating bit by bit, and in 185 BCE, almost
150 years after Chandragupta had overthrown the Magadha king, the last
Mauryan ruler was assassinated by his commander-in-chief while
inspecting his troops.
Trade
and enterprise were public-private affairs: the state could own and
engage in business activities just like ordinary citizens could. The
royal revenue was drawn from taxes (and war booty). Additionally, the
king owned timber land, forest land, hunting groves, and manufacturing
facilities, and their surplus was sold off. The state had monopoly over coinage, mining, salt production, arms manufacture, and boat building.
The state could own & engage in business
activities just like ordinary citizens could. Additionally, it had A
monopoly over coinage, mining, salt production, arms manufacture, &
boat building.
Farmers comprised the largest part of the population, and agriculture
was taxed. Tradespeople were organised into guilds that held both
executive and judicial authority and also functioned as banks.
Craftspeople engaged in a particular industry tended to live together.
Goods could not be sold at the place where they were produced; they had
to be brought to specific markets. Tolls were collected for roads and
river crossings; and goods sold within the kingdom were taxed, as were
imports and exports. The state fixed the wholesale price of goods and
inspected weights and measures. Barter was prevalent, as were gold, bronze, and copper coins. Money was lent on interest against promissory notes.
The main road that ran through the entire kingdom and connected it to
the western Greek world was well maintained and well patrolled, with
pillars and signposts marking the distances and the by-roads. Ships
sailed down the Ganges and its tributaries, and to foreign shores such as Sri Lanka, China, and the African and Arabian harbours, and the state took care to destroy pirates.
Administration
The king was the head of the state and controlled the military,
executive, judiciary, and legislature. He took advice from a council
comprising the chief minister, the treasurer, the general, and other
ministers. The kingdom was divided into provinces under governors, who
were often royal princes. Provinces were further composed of towns and
villages under their own district and village administrators. It was a
large bureaucracy that the king employed. Like today, the rungs in the
civil services were clearly defined, and those at the very top were far
removed from the lower grades. For example, the ratio of a clerk's
salary to the chief minister's has been estimated at 1:96. With such
high levels of salary, we can assume that the higher officers were
expected to carefully oversee the functioning of their departments.
There were departments to govern, look after, and control almost
every aspect of social life: industrial art, manufacturing facilities,
general trade and commerce, foreigners, births and deaths, commercial
taxes, land and irrigation, agriculture, forests, metal
foundries, mines, roads, and public buildings. The high-ranking
officers were expected to go on inspection tours to ensure that the
bureaucracy was discharging its duties well.
He who causes loss of revenue eats up the king's wealth, he
who produces double the [anticipated] revenue eats up the country, and
he who spends all the revenue [without bringing any profit] eats up the
labour of workmen.
(Arthashastra, 2.9.13, 15, 17)
The empire also had a large spy network and maintained a large
standing army. The king's army was not really disbanded even after the
third Mauryan king, Ashoka, gave up war. Next to the farmers, it was the
soldiers who formed the bulk of the population. Soldiers were expected
to only fight and were not required to render any other service to the
king; when there was no war, they could amuse themselves in whatever
manner that caught their fancy. There were separate departments for the
infantry, cavalry, navy, chariots, elephants, and logistics. Soldiers
not only drew their salary from the exchequer but were also provided
with arms and equipment at the state's expense. We have descriptions of
some of the arms that these soldiers carried: foot soldiers carried
man-length bows (and arrows), ox-hide bucklers, javelins, and
broadswords. The cavalry rode bareback and used lances and bucklers.
... nor do they curb them with bits like the bits in use
among the Greeks or the Kelts but they fit around the extremity of the
horse's mouth a circular piece of stitched raw ox-hide studded with
pricks of iron or brass pointing inwards, but not very sharp. If a man
is very righ, he uses pricks of ivory. Within the horse's mouth is put
an iron prong like a skewer to which the reins are attached. When the
rider, then, pulls the reins, the prong controls the horse and the
pricks, which are attached to this prong, goad the mouth...
(Indica)
Chandragupta, the founder of the Maurya dynasty, was a Hindu.
In later life, he became a Jain. His grandson Ashoka put the state's
entire resources to promote Buddhism, but whether he formally converted
to the faith remains unclear. The populace, by and large, belonged to
one of these three religions while other noticeable groups were
atheists, agnostics, or those who subscribed to primitive faiths.
Downfall
About 50 years after Ashoka's death,
the Mauryan king was killed by his general-in-chief, Pushyamitra, who
founded the Shunga dynasty. Scholars give several reasons for the
empire's downfall, the major ones being its size and its weak rulers
after Ashoka. Border states had started asserting their independence
right after Ashoka's death. The empire started shrinking under Ashoka's
successors. By the time Pushyamitra seized the throne, the mighty
Mauryan Empire was a fraction of its size, reduced to only the three city-states of Pataliputra, Ayodhya, and Vidisha, and some parts of the Punjab.
The Mauryan Empire, also known as the Maurya Empire, was a
historically significant power during the Iron Age on the Indian
subcontinent, with its core in Magadha. It was founded by Chandragupta
Maurya in 322 BCE and declined around 184 BCE.[45] The Maurya Empire centralized its power through the conquest of the Indo-Gangetic Plain, with its primary capital located at Pataliputra, modern-day Patna. However, the empire also had other regional capitals, including Taxila, Ujjain, Suvarnagiri, and Tosali, which were governed by appointed governors and governers controlled by the Emperor.[46]The
empire directly or indirectly ruled by Ashoka was thus immense, running
from the Hindu Kush to Bengal, and from the Himalayas to the Karnataka.[47]
It declined for about 50 years after Ashoka's rule, and dissolved in 185 BCE with the assassination of Brihadratha by Pushyamitra Shunga and the foundation of the Shunga Empire in Magadh.
Under the Mauryas, internal and external trade, agriculture, and
economic activities thrived and expanded across India due to the
creation of a single and efficient system of finance, administration,
and security. The Maurya dynasty built a precursor of the Grand Trunk Road from Pataliputra to Taxila.[52]After the Kalinga War, the Empire experienced nearly half a century of centralized rule under Ashoka the Great. Ashoka's embrace of Buddhism and sponsorship of Buddhist missionaries allowed for the expansion of that faith into Sri Lanka, northwest India, and Central Asia.[53]
The population of South Asia during the Mauryan period has been estimated to be between 15 and 30 million.[54]
The Maurya period was marked by exceptional creativity in art, architecture, inscriptions and texts,[55] but also by the consolidation of caste in the Gangetic plain, and the declining rights of women in mainstream Indo-Aryan speaking regions of India.[56]
Archaeologically, the period of Mauryan rule in South Asia falls into the era of Northern Black Polished Ware (NBPW). The Arthashastra[57] and the Edicts of Ashoka are the primary sources of written records of Mauryan times.[citation needed] The Lion Capital of Ashoka at Sarnath is the national emblem of the Republic of India.
The name "Maurya" does not occur in Ashoka's inscriptions, or the contemporary Greek accounts such as Megasthenes's Indica, but it is attested by the following sources:[58]
Kuntala inscription (from the town of Bandanikke, North Mysore) of 12th century AD chronologically mention Mauryya as one of the dynasties which ruled the region.[60]
The Kalpasutra of the Jains mentions a Mauryaputra of the Kasyapa
gotra, which shows that the Mauryas were regarded as high class folk who
was the disciple of Mahavira.[61]
According to Kharavela' Hathigumpha inscription (2nd-1st century BC) mentions era of Maurya Empire as Muriya Kala (Mauryan era),[62] but this reading is disputed: other scholars—such as epigraphist D. C. Sircar—read the phrase as mukhiya-kala ("the principal art").[63]
According to the Buddhist tradition, the ancestors of the Maurya kings had settled in a region where peacocks (mora in Pali)
were abundant. Therefore, they came to be known as "Moriyas", literally
meaning, "belonging to the place of peacocks". According to another
Buddhist account, these ancestors built a city called Moriya-nagara
("Moriya-city"), which was so called, because it was built with the
"bricks coloured like peacocks' necks".[64]
The dynasty's connection to the peacocks, as mentioned in the
Buddhist and Jain traditions, seems to be corroborated by archaeological
evidence. For example, peacock figures are found on the Ashoka pillar at Nandangarh and several sculptures on the Great Stupa of Sanchi. Based on this evidence, modern scholars theorize that the peacock may have been the dynasty's emblem.[65]
Some later authors, such as Dhundhi-raja (an 18th-century commentator on the Mudrarakshasa and an annotator of the Vishnu Purana),
state that the word "Maurya" is derived from Mura and the mother of the
first Maurya king. However, the Puranas themselves make no mention of
Mura and do not talk of any relation between the Nanda and the Maurya
dynasties.[66]
Dhundiraja's derivation of the word seems to be his own invention:
according to the Sanskrit rules, the derivative of the feminine name
Mura (IAST: Murā) would be "Maureya"; the term "Maurya" can only be derived from the masculine "Mura".[67]
History
Founding
Prior to the Maurya Empire, the Nanda Empire
ruled over a broad swathe of the Indian subcontinent. The Nanda Empire
was a large, militaristic, and economically powerful empire due to
conquering the Mahajanapadas. According to several legends, Chanakya travelled to Pataliputra, Magadha,
the capital of the Nanda Empire where Chanakya worked for the Nandas as
a minister. However, Chanakya was insulted by the Emperor Dhana Nanda when he informed them of Alexander's invasion. Chanakya swore revenge and vowed to destroy the Nanda Empire.[68] He had to flee in order to save his life and went to Taxila,
a notable center of learning, to work as a teacher. On one of his
travels, Chanakya witnessed some young men playing a rural game
practicing a pitched battle. One of the boys was none other than
Chandragupta. Chanakya was impressed by the young Chandragupta and saw
royal qualities in him as someone fit to rule.
Meanwhile, Alexander the Great was leading his Indian campaigns and ventured into Punjab. His army mutinied at the Beas River and refused to advance farther eastward when confronted by another army. Alexander returned to Babylon and re-deployed most of his troops west of the Indus River. Soon after Alexander died in Babylon in 323 BCE, his empire fragmented into independent kingdoms led by his generals.[69]
The Maurya Empire was established in the Magadha region under the
leadership of Chandragupta Maurya and his mentor Chanakya. Chandragupta
was taken to Taxila by Chanakya and was tutored about statecraft and
governing. Requiring an army Chandragupta recruited and annexed local military republics such as the Yaudheyas
that had resisted Alexander's Empire. The Mauryan army quickly rose to
become the prominent regional power in the North West of the Indian
subcontinent. The Mauryan army then conquered the satraps established by
the Macedonia ns.[70] Ancient Greek historians Nearchus, Onesictrius, and Aristobolus have provided lot of information about the Mauryan empire.[71] The Greek generals Eudemus and Peithon
ruled in the Indus Valley until around 317 BCE, when Chandragupta
Maurya (with the help of Chanakya, who was now his advisor) fought and
drove out the Greek governors, and subsequently brought the Indus Valley
under the control of his new seat of power in Magadha.[49]
Chandragupta Maurya's ancestry is shrouded in mystery and
controversy. On one hand, a number of ancient Indian accounts, such as
the drama Mudrarakshasa (Signet ring of Rakshasa – Rakshasa was the prime minister of Magadha) by Vishakhadatta,
describe his royal ancestry and even link him with the Nanda family. A
kshatriya clan known as the Mauryas are referred to in the earliest Buddhist texts, Mahaparinibbana Sutta.
However, any conclusions are hard to make without further historical
evidence. Chandragupta first emerges in Greek accounts as
"Sandrokottos". As a young man he is said to have met Alexander.[72] Chanakya is said to have met the Nanda king, angered him, and made a narrow escape.[73]
Empire Expansion
Conquest of the Nanda Empire
Historically reliable inscription details of Chandragupta's campaign against Nanda Empire are unavailable and but later written Buddhist, Jain, and Hindu texts which claim Magadha was ruled by the Nanda dynasty, which, with Chanakya's counsel, Chandragupta conquered Nanda Empire.[74][75][76] The army of Chandragupta and Chanakya first conquered the Nanda outer territories, and finally besieged the Nanda capital Pataliputra.
In contrast to the easy victory in Buddhist sources, the Hindu and Jain
texts state that the campaign was bitterly fought because the Nanda
dynasty had a powerful and well-trained army.[77][75]
Nanda_Empire 323 BCE
The Buddhist Mahavamsa Tika and Jain Parishishtaparvan records Chandragupta's army unsuccessfully attacking the Nanda capital. [78]
Chandragupta and Chanakya then began a campaign at the frontier of the
Nanda empire, gradually conquering various territories on their way to
the Nanda capital.[79]
He then refined his strategy by establishing garrisons in the conquered
territories, and finally besieged the Nanda capital Pataliputra. There Dhana Nanda accepted defeat.[80][81] The conquest was fictionalised in Mudrarakshasa play, it contains narratives not found in other versions of the Chanakya-Chandragupta legend.Radha Kumud Mukherjee similarly considers Mudrakshasa play without historical basis.[82]
These legends state that the Nanda king was defeated, deposed and
exiled by some accounts, while Buddhist accounts claim he was killed.[83] With the defeat of Dhana Nanda, Chandragupta Maurya founded the Maurya Empire.[84]
" Seleucus crossed the Indus and
waged war with Sandrocottus [Maurya], king of he Indians, who dwelt on
the banks of that stream, until they came to an understanding with each
other and contracted a marriage relationship. Some of these exploits
were performed before the death of Antigonus and some afterward."
" The geographical position of the
tribes is as follows: along the Indus are the Paropamisadae, above whom
lies the Paropamisus mountain: then, towards the south, the Arachoti:
then next, towards the south, the Gedroseni, with the other tribes that
occupy the seaboard; and the Indus lies, latitudinally, alongside all
these places; and of these places, in part, some that lie along the
Indus are held by Indians, although they formerly belonged to the
Persians. Alexander [III 'the Great' of Macedon] took these away from
the Arians and established settlements of his own, but Seleucus Nicator gave them to Sandrocottus [Chandragupta], upon terms of intermarriage and of receiving in exchange five hundred elephants. "
Greecian historian Pliny also quoted a passage from Megasthanes work about Chandragupta Empire boundaries:
Most geographers, in fact, do not look upon India as bounded by the river Indus, but add to it the four satrapies of the Gedrose, the Arachotë, the Aria, and the Paropamisadë, the River Cophes
thus forming the extreme boundary of India. According to other writers,
however, all these territories, are reckoned as belonging to the
country of the Aria.
The conquest of the south by Chandragupta Maurya may also perhaps be
inferred from the following statement of Plutarch. "The throne" in the
context is the Magadhan throne, the occupation of which by Chandragupta
is thus followed by two other events, viz., the defeat of Selucus, and
the conquest of the remaining part of India not included in the Magadhan
empire of the Nandas:
"Not long afterwards Androkottos, who had by that time
mounted the throne, presented Selukos with 500 elephants, and overran
and subdued the whole of India with an army of 600,000."
Megasthenes defined the region that Chandragupta won from Seleucus as
likely western side Gedrosia which shares boundaries with the Euphrates
River, and eastern side Arachosia shares boundaries with the Indus. The
northern frontier boundary formed by Hindukush mountain range:
India, which is in shape quadrilateral, has its eastern as well as
its western side bounded by the great sea, but on the northern side it
is divided by Mount Hemôdos from that part of Skythia which is inhabited
by those Skythians who are called the Sakai, while the fourth or
western side is bounded by the river called the Indus.
— Book I Fragment I , Indica, Megasthanes[89]
Satrapian provinces in northwestern India which ceaded to Chandragupta by Selucus due to Treaty of Indus.
Sandrokottos the king of the Indians, India forms the largest of the
four parts into which Southern Asia is divided, while the smallest part
is that region which is included between the Euphrates and our own sea.
The two remaining parts, which are separated from the others by the
Euphrates and the Indus, and lie between these rivers...
India is bounded on its eastern side, right onwards to the south, by the
great ocean; that its northern frontier is formed by the Kaukasos
range(Hindukush Range) as far as the junction of that range with Tauros;
and that the boundary.
The ancient historians Justin, Appian, and Strabo preserve the three main terms of the Treaty of the Indus:[91]
(i) Seleucus transferred to Chandragupta's kingdom the
easternmost satrapies of his empire, certainly Gandhara, Parapamisadae,
and the eastern parts of Gedrosia, Arachosia and Aria as far as Herat.
(ii) Chandragupta gave Seleucus 500 Indian war elephants.
(iii) The two kings were joined by some kind of marriage alliance
(ἐπιγαμία οι κῆδος); most likely Chandragupta wed a female relative of
Seleucus.
Other account
Tibbetan Lama Taranatha (1575–1634)
Ashoka brought under his rule without bloodshed all the
countries including those to the south of the Vindhya. And he conquered
the northern Himalayas, the snowy ranges beyond Li-yul (Khotan)," the
entire land of Jambudvipa bounded by seas on east, south and west, and
also fifty small islands.
Ashoka served as a viceroy during the rule of his father Bindusara.
According to established constitutional usage, Asoka as Prince served as
viceroy in one of the remoter provinces of the Empire. This was the
province of Western India called Avantirattham or province of Avanti
with headquarter at Ujjain.
— Mahabodhivamsa, pg.98[93]
Bindusara Empire 273 BCE
Conquest of the Saurashtra
Chandragupta
conquered Southern-Western part of India. Especially his conquest over
Saurashtra and Sudarshana lake construction is preseved in later
Satrapian king Rudradaman inscription:
Translation : for the sake of ordered to be made by the Vaishya Pushyagupta, the provincial governor of the Maurya king Chandragupta; adorned with conduits for Ashoka the Maurya by the Yavana king Tushaspha
while governing; and by the conduit ordered to be made by him,
constructed in a manner worthy of a king (and) seen in that breach.
Rule over territories of Yonas , Kambojas, Nabhakas, Nabhapamktis, Bhojas, Pitinikas, Andhras and Palidas
The Kambojas are a people of Central Asian origin who had settled first in Arachosia and Drangiana (today's southern Afghanistan), and in some of the other areas in the northwestern Indian subcontinent in Sindhu, Gujarat and Sauvira. The Nabhakas, the Nabhapamkits, the Bhojas, the Pitinikas, the Andhras and the Palidas were other people under Ashoka's rule:
10. Adha Paladeshu shavata Devānampiyashā dhammanushathi anuvatamti[] yata pi dutā
— Ashoka, Rock Edict 13 , Kalsi Rock, South Portion.[95]
Translation : Likewise here in the king's (Ashoka ) territory, among the Yonas and Kambojas, among the Nabhakas and Nabhapamkits, among the Bhojas and the Pitinikas, among the Andhras and the Palidas, everywhere (people) are conforming to Beloved-Of-God (Ashoka) instruction in morality.
Conquest of the Kalinga
Kalinga War plays a very important role in Mauryan history which changes a cruel Emperor Chanda-Ashoka to Priyadarshi Ashoka.
"Beloved-of-the-Gods, King Priyadarsi(Ashoka)conquered
the Kalingas eight years after his coronation. One hundred and fifty
thousand were deported, one hundred thousand were killed and many more
died (from other causes). After the Kalingas had been conquered,
Beloved-of-the-Gods came to feel a strong inclination towards the
Dharma, a love for the Dharma and for instruction in Dharma. Now
Beloved-of-the-Gods feels deep remorse for having conquered the
Kalingas. "
Shikarpur Taluq inscription mentioned about Mauryan ruling in the region of Kuntala
.The Kuntala country is an ancient Indian political region included
the western Deccan and some parts of central,south Karnataka and north
Mysore.
South India , Kuntala present in Western coastal region
Kuntala-kshôpiyam pesarvett â-nava-Nanda-Gupta-kula-Mauryya-kshmâpar aldar llasaj-jasad
Translation : The Kuntala country, which is like curls
(kuntaja) to the lady Earth, was-ruled by the renowned nine Nandas, the
Gupta and Mauryan kings.
Conquest of the Nepala
According
to the Asokavadana, it is stated that in his youth, Ashoka subdued the
revolt in the of the Khasas (present day Nepala region) and Taksasila. Similarly, in contrast, according to a 15th-century Tibetan historian:
Meanwhile, peoples of the hilly countries like Nepal and Khasya
revolted. Asoka was sent with the army to subdue them. Without
difficulty Asoka subdued .the hilly races, imposed levy and annual tax
on them, realised ransom from them and offered these to the king.
Apart from Taranath's account, it is noteworthy that Ashoka was
responsible for the construction of several significant structures in
Nepal. These include the Ramagrama Stupa,Gotihawa Pillar of Ashoka, Nigali-Sagar Ashoka Pillar inscription , and the Lumbini pillar inscription of Ashoka.The Chinese pilgrims Fa-Hien (337 CE – c. 422 CE) and Xuanzang
(602–664 CE) describe the Kanakamuni Stupa and the Asoka Pillar of
currently Nepal region in their travel accounts. Xuanzang speaks of a
lion capital atop the pillar, now lost. A base of a Pillar of Ashoka has been discovered at Gotihawa, a few miles from Nigali Sagar, and it has been suggested that it is the original base of the Nigalar Sagar pillar fragments.[100]
Boundaries sharing territories
Even though Ashoka defined the boundaries of his empire four times in various inscriptions (with same lines)
but he never mentioned any inner hole or unconquered region inside his
empire.This suggests that Ashoka's empire was likely contiguous, with no
significant unconquered regions within its borders :
3. Sav[r]atra vijite [De]va[naṃ]priyasa Priyadraśisa y[e] ca
[a]ṃta yathā [Coḍa] Paṃḍiya Satiyaputro Keraḍaputro Taṃbapaṃṇī
Aṃtiyo[k]o nāma Yonaraja ye ca aṃñe tasa Aṃtiyokasa samaṃta rajano
6. Sa[vatra vi]jitasi Devanapriyasa Priyadrasisa rajine ye cha ata
atha [Choda] Pa[mdiya] Sa[ti]ya[p]u[tra] Keralaputra [Tam]bapani
Atiyoge nama Yona-raja ye cha [a] .... sa ......[gasa] samata ra[jane
sa]vratra ...... priyasa Priyadrasisa rajine
7. duve chikisa [ka]ta manusa-chik[isa cha] pasu [chi]kisa cha
— James Prinsep Translation :
Everywhere within the conquered province of Raja Piyadasi (Ashoka), the
beloved of the gods, as well as in the parts occupied by the faithful,
such as Chola, Pandiya, Satiyaputra, and Keralaputra, even as fart as
Tambapanni (Sri Lanka) and, moreover, within the dominions the Greek (of
which Antiochus
generals are the rulers ) everywhere the heaven-beloved Raja Piyadasi’s
double system of medical aid is established— both medical aid for men,
and medical aid for animals, together with the medicaments of all sorts,
which are suitable for men, and suitable for animals.[105]
— E. Hultzsch Translation:
Everywhere in the dominions of Dévanampriya Priyadarsina, and (of
those) who (are his) borderers, such as the Cholas, the Pandyas, the
Satiyaputra, the Kéralaputra, Tamaraparni, the Yona(Greek) king named
Antiyoka , and the other kings who are the neighbours of this Antiyoka,
everywhere two kinds of medical treatment were established by king
Devanampriya Priyadarsin, (viz.) medical treatment for men and medical
treatment for cattle.[106]
Possible Mauryan Empire size according to details given in Ashoka Second Rock Edict of Shahbazgarhi , Kalsi ,Mansera and Girnar.
Empire reconstruction from fragments
According
to the account of Fa Hein who was the first Chinese pilgrim to visit
India during 399 and 414 CE. His work "The travels of Fa-Hian (400
A.D.)"mentioned that Ashoka constructed 84,000 Buddhist stupas and
pillars after destroying seven stupas that initially housed Buddha
relics. Ashoka divided the relics from these seven stupas into 84,000
parts :
" King Asoka having destroyed seven (of the original)
pagodas, constructed 84,000 others. The very first which he built is the
great tower which stands about three li to the south of this. city. In
front of this pagoda is an impression of Buddha’s foot, (over which)
they have raised a chapel, the gate of which faces the north. To the
south of the tower is a stone pillar, about a chang and a half in girth
(18 feet), and three cluing or so in height (35 feet). On the surface of
this pillar is an inscription to the following effect: “King Asoka
presented the whole of Jambudvipa to the priests of the four quarters,
and redeemed it again with money, and tins he did three times.” Three or
four hundred paces to the north of the pagoda is the spot where Asoka
was horn (or resided). On this spot he raised the city of Ni-li, and in
the midst of it erected a stone pillar, also about 35 feet in height, on
the top of which he placed the figure of a lion, and also engraved an
historical record on the pillar giving an account of the successive
events connected with Ni-li, with the corresponding year, day, and
month."
— Chapter XXVII , The travels of Fa-Hian (400 A.D)[107]
" When King Asoka was living he wished to destroy the eight towers
and to build eighty-four thousand others. Having destroyed seven, he
next proceeded to treat this one in the same way."
— Chapter XXIII ,The travels of Fa-Hian (400 A.D)[108]
Ashoka built one pillar beside every stupa :
" In after times Asoka, wishing to discover the utmost depths to
which these ladders went, employed men to dig down and examine into it.
They went on digging till they came to the yellow spring (the earth's
foundation), but yet had not come to the bottom. The king, deriving from
this an increase of faith and reverence, forthwith built over the
ladders a and facing the middle flight he placed a standing figure (of
Buddha) sixteen feet high. Behind the vihara, he erected a stone pillar
thirty cubits high, and on the top placed the figure of a lion. Within
the pillar on the four sides are figures of Buddha; both within and
without it is shining and bright as glass. It happened once that some
heretical doctors had a contention with the Sramanas respecting this as a
place of residence. Then the argument of the Sramanas failing, they all
agreed to the following compact: "If this place properly belongs to the
Sramanas, then there will he some supernatural proof given of it."
Immediately on this the lion on the top of the pillar uttered a loud
roar."
—Chapter XVII, The travels of Fa-Hian (400 A.D)[109]
Ashoka commissioned the construction of 84,000 stupas for the
preservation of Buddha's relics. However, over time, many of the Ashoka
pillars , inscriptions and stupas have been subject to complete
destruction and deterioration. According to the British historian
Charles Allen, historical records of Ashoka were effectively cleansed to
the extent that his name was largely forgotten for nearly two thousand
years. However, very few mysterious stone monuments and inscriptions
miraculously survived, preserving his historical legacy :
" Pg.2 - Ashoka Maurya—or Ashoka the Great as he was
later known—holds a special place in the history of Buddhism and India.
At its height in around 250 BCE, his empire stretched across the Indian
subcontinent to Kandahar in the east, and as far north as the Himalayas.
Through his quest to govern by moral force alone, Ashoka transformed
Buddhism from a minor sect into a major world religion, while
simultaneously setting a new yardstick for government that had lasting
implications for all of Asia. His bold experiment ended in tragedy,
however, and in the tumult that followed the historical record was
cleansed so effectively that his name was largely forgotten for almost
two thousand years. Yet, a few mysterious stone monuments and
inscriptions miraculously survived the purge. "[110]
According to the Indian historian Ram Sharan Sharma, the Mauryans
maintained a large army and implemented a strict judicial system to
exercise control over tribal populations under their Empire :
" Pg.355 The biggest fact of Maurya political history was the
establishment of the Magadha Empire, which included the whole of India
except the far south. This empire was established with the strength of
the sword and it could be protected only with the strength of the sword.
Strong military power was necessary for both external security and
internal peace..The tribal people living inside the empire and on its
borders were equally a cause of trouble. So for this, there was a huge
permanent army and tight judicial system."[111]
North-East and South influence
Ashoka's
influence in North-East and South India is evident through the
dissemination of Buddhist principles, rock edicts, and the broader
cultural exchanges facilitated by the Mauryan Empire. While the direct
impact may vary, Ashoka's legacy remains a significant part of India's
historical and cultural tapestry. [112]
Popular Maps
Indian New Parliament already
have carved Mauryan Empire over mural which represents Indian integrity and glorious past.[113].
Several historians have reconstructed the map of the Mauryan Empire
based on details from Ashoka's inscriptions and accounts from Greek
historians, among other sources. For example :
Renowned Scholars Authoritative Crafted Maps
Mauryan empire maps created by Historians/Other Scholars
After the death of Alexander the Great in 323 BCE, Chandragupta led a series of campaigns in 305 BCE to take satrapies in the Indus Valley and northwest India.[117]
When Alexander's remaining forces were routed, returning westwards,
Seleucus I Nicator fought to defend these territories. Not many details
of the campaigns are known from ancient sources. Seleucus was defeated
and retreated into the mountainous region of Afghanistan.[118]
The two rulers concluded a peace treaty in 303 BCE, including a
marital alliance. Under its terms, Chandragupta received the satrapies
of Paropamisadae (Kamboja and Gandhara) and Arachosia (Kandhahar) and Gedrosia (Balochistan). Seleucus I received the 500 war elephants that were to have a decisive role in his victory against western Hellenistic kings at the Battle of Ipsus in 301 BCE. Diplomatic relations were established and several Greeks, such as the historian Megasthenes, Deimakos and Dionysius resided at the Mauryan court.[119]
Megasthenes in particular was a notable Greek ambassador in the court of Chandragupta Maurya.[120] His book Indika is a major literary source for information about the Mauryan Empire. According to Arrian, ambassador Megasthenes (c. 350 – c. 290 BCE) lived in Arachosia and travelled to Pataliputra.[121]
Megasthenes' description of Mauryan society as freedom-loving gave
Seleucus a means to avoid invasion, however, underlying Seleucus'
decision was the improbability of success. In later years, Seleucus'
successors maintained diplomatic relations with the Empire based on
similar accounts from returning travellers.[117]
Chandragupta established a strong centralised state with an
administration at Pataliputra, which, according to Megasthenes, was
"surrounded by a wooden wall pierced by 64 gates and 570 towers". Aelian, although not expressly quoting Megasthenes nor mentioning Pataliputra, described Indian palaces as superior in splendor to Persia's Susa or Ecbatana.[122] The architecture of the city seems to have had many similarities with Persian cities of the period.[123]
Chandragupta's son Bindusara extended the rule of the Mauryan empire towards southern India. The famous Tamil poet Mamulanar of the Sangam literature described how areas south of the Deccan Plateau
which comprised Tamil country was invaded by the Maurya army using
troops from Karnataka. Mamulanar states that Vadugar (people who resided
in Andhra-Karnataka regions immediately to the north of Tamil Nadu)
formed the vanguard of the Mauryan army.[59][124] He also had a Greek ambassador at his court, named Deimachus.[125] According to Plutarch,
Chandragupta Maurya subdued all of India, and Justin also observed that
Chandragupta Maurya was "in possession of India". These accounts are
corroborated by Tamil sangam literature which mentions about Mauryan
invasion with their south Indian allies and defeat of their rivals at
Podiyil hill in Tirunelveli district in present-day Tamil Nadu.[126][127]
Chandragupta renounced his throne and followed Jain teacher Bhadrabahu.[128][129][130] He is said to have lived as an ascetic at Shravanabelagola for several years before fasting to death, as per the Jain practice of sallekhana.[131]
Bindusara was born to Chandragupta, the founder of the Mauryan Empire. This is attested by several sources, including the various Puranas and the Mahavamsa.[132][full citation needed] He is attested by the Buddhist texts such as Dipavamsa and Mahavamsa ("Bindusaro"); the Jain texts such as Parishishta-Parvan; as well as the Hindu texts such as Vishnu Purana ("Vindusara").[133][134] According to the 12th century Jain writer Hemachandra's Parishishta-Parvan, the name of Bindusara's mother was Durdhara.[135] Some Greek sources also mention him by the name "Amitrochates" or its variations.[136][137]
Historian Upinder Singh estimates that Bindusara ascended the throne around 297 BCE.[124]
Bindusara, just 22 years old, inherited a large empire that consisted
of what is now, Northern, Central and Eastern parts of India along with
parts of Afghanistan and Baluchistan. Bindusara extended this empire to the southern part of India, as far as what is now known as Karnataka.
He brought sixteen states under the Mauryan Empire and thus conquered
almost all of the Indian peninsula (he is said to have conquered the
'land between the two seas' – the peninsular region between the Bay of Bengal and the Arabian Sea). Bindusara did not conquer the friendly Tamil kingdoms of the Cholas, ruled by King Ilamcetcenni, the Pandyas, and Cheras. Apart from these southern states, Kalinga (modern Odisha) was the only kingdom in India that did not form part of Bindusara's empire.[138] It was later conquered by his son Ashoka, who served as the viceroy of Ujjaini during his father's reign, which highlights the importance of the town.[139][140]
Bindusara's life has not been documented as well as that of his
father Chandragupta or of his son Ashoka. Chanakya continued to serve as
prime minister during his reign. According to the medieval Tibetan
scholar Taranatha who visited India, Chanakya helped Bindusara "to
destroy the nobles and kings of the sixteen kingdoms and thus to become
absolute master of the territory between the eastern and western
oceans".[141] During his rule, the citizens of Taxila revolted twice. The reason for the first revolt was the maladministration of Susima,
his eldest son. The reason for the second revolt is unknown, but
Bindusara could not suppress it in his lifetime. It was crushed by
Ashoka after Bindusara's death.[142]
Bindusara maintained friendly diplomatic relations with the Hellenic world. Deimachus was the ambassador of Seleucid emperor Antiochus I at Bindusara's court.[143]Diodorus states that the king of Palibothra (Pataliputra, the Mauryan capital) welcomed a Greek author, Iambulus. This king is usually identified as Bindusara.[143]Pliny states that the Egyptian king Philadelphus sent an envoy named Dionysius to India.[144][145] According to Sailendra Nath Sen, this appears to have happened during Bindusara's reign.[143]
Unlike his father Chandragupta (who at a later stage converted to Jainism), Bindusara believed in the Ajivika sect. Bindusara's guru Pingalavatsa (Janasana) was a Brahmin[146] of the Ajivika sect. Bindusara's wife, Queen Subhadrangi (Queen Dharma/ Aggamahesi) was a Brahmin[147]
also of the Ajivika sect from Champa (present Bhagalpur district).
Bindusara is credited with giving several grants to Brahmin monasteries (Brahmana-bhatto).[148]
Historical evidence suggests that Bindusara died in the 270s BCE. According to Upinder Singh, Bindusara died around 273 BCE.[124]Alain Daniélou believes that he died around 274 BCE.[141]
Sailendra Nath Sen believes that he died around 273–272 BCE, and that
his death was followed by a four-year struggle of succession, after
which his son Ashoka became the emperor in 269–268 BCE.[143] According to the Mahavamsa, Bindusara reigned for 28 years.[149] The Vayu Purana, which names Chandragupta's successor as "Bhadrasara", states that he ruled for 25 years.[150]
Ashoka
As a young prince, Ashoka (r. 272–232 BCE)
was a brilliant commander who crushed revolts in Ujjain and Taxila. As
monarch he was ambitious and aggressive, re-asserting the Empire's
superiority in southern and western India. But it was his conquest of Kalinga
(262–261 BCE) which proved to be the pivotal event of his life. Ashoka
used Kalinga to project power over a large region by building a
fortification there and securing it as a possession.[151]
Although Ashoka's army succeeded in overwhelming Kalinga forces of
royal soldiers and civilian units, an estimated 100,000 soldiers and
civilians were killed in the furious warfare, including over 10,000 of
Ashoka's own men. Hundreds of thousands of people were adversely
affected by the destruction and fallout of war. When he personally
witnessed the devastation, Ashoka began feeling remorse. Although the
annexation of Kalinga was completed, Ashoka embraced the teachings of
Buddhism, and renounced war and violence. He sent out missionaries to
travel around Asia and spread Buddhism to other countries. He also
propagated his own dhamma.[citation needed]
Ashoka implemented principles of ahimsa
by banning hunting and violent sports activity and ending indentured
and forced labor (many thousands of people in war-ravaged Kalinga had
been forced into hard labour and servitude). While he maintained a large
and powerful army, to keep the peace and maintain authority, Ashoka
expanded friendly relations with states across Asia and Europe, and he
sponsored Buddhist missions. He undertook a massive public works
building campaign across the country. Over 40 years of peace, harmony
and prosperity made Ashoka one of the most successful and famous
monarchs in Indian history. He remains an idealized figure of
inspiration in modern India.[citation needed]
The Edicts of Ashoka, set in stone, are found throughout the Subcontinent. Ranging from as far west as Afghanistan and as far south as Andhra (Nellore District),
Ashoka's edicts state his policies and accomplishments. Although
predominantly written in Prakrit, two of them were written in Greek, and one in both Greek and Aramaic. Ashoka's edicts refer to the Greeks, Kambojas, and Gandharas
as peoples forming a frontier region of his empire. They also attest to
Ashoka's having sent envoys to the Greek rulers in the West as far as
the Mediterranean. The edicts precisely name each of the rulers of the Hellenic world at the time such as Amtiyoko (Antiochus), Tulamaya (Ptolemy), Amtikini (Antigonos), Maka (Magas) and Alikasudaro (Alexander) as recipients of Ashoka's proselytism.[citation needed]
The Edicts also accurately locate their territory "600 yojanas away" (a
yojanas being about 7 miles), corresponding to the distance between the
center of India and Greece (roughly 4,000 miles).[152]
Decline
Ashoka was followed for 50 years by a succession of weaker kings. He was succeeded by Dasharatha Maurya, who was Ashoka's grandson. None of Ashoka's sons could ascend to the throne after him. Mahinda, his firstborn, became a Buddhist monk. Kunala Maurya
was blind and hence couldn't ascend to the throne; and Tivala, son of
Kaurwaki, died even earlier than Ashoka. Little is known about another
son, Jalauka.
The empire lost many territories under Dasharatha, which were later reconquered by Samprati, Kunala's son. Post Samprati, the Mauryas slowly lost many territories. In 180 BCE, Brihadratha Maurya, was killed by his general Pushyamitra Shunga in a military parade without any heir. Hence, the great Maurya empire finally ended, giving rise to the Shunga Empire.
Reasons advanced for the decline include the succession of weak
kings after Aśoka Maurya, the partition of the empire into two, the
growing independence of some areas within the empire, such as that ruled
by Sophagasenus,
a top-heavy administration where authority was entirely in the hands of
a few persons, an absence of any national consciousness,[153] the pure scale of the empire making it unwieldy, and invasion by the Greco-Bactrian Empire.
Some historians, such as H. C. Raychaudhuri, have argued that Ashoka's pacifism undermined the "military backbone" of the Maurya empire. Others, such as Romila Thapar, have suggested that the extent and impact of his pacifism have been "grossly exaggerated".[154]
Shunga coup (185 BCE)
Buddhist records such as the Ashokavadana write that the assassination of Brihadratha and the rise of the Shunga empire led to a wave of religious persecution for Buddhists,[155] and a resurgence of Hinduism. According to Sir John Marshall,[156]
Pushyamitra may have been the main author of the persecutions, although
later Shunga kings seem to have been more supportive of Buddhism. Other
historians, such as Etienne Lamotte[157] and Romila Thapar,[158]
among others, have argued that archaeological evidence in favour of the
allegations of persecution of Buddhists are lacking, and that the
extent and magnitude of the atrocities have been exaggerated.
The fall of the Mauryas left the Khyber Pass unguarded, and a wave of foreign invasion followed. The Greco-Bactrian king, Demetrius,
capitalized on the break-up, and he conquered southern Afghanistan and
parts of northwestern India around 180 BCE, forming the Indo-Greek Kingdom.
The Indo-Greeks would maintain holdings on the trans-Indus region, and
make forays into central India, for about a century. Under them,
Buddhism flourished, and one of their kings, Menander, became a famous figure of Buddhism; he was to establish a new capital of Sagala, the modern city of Sialkot.
However, the extent of their domains and the lengths of their rule are
subject to much debate. Numismatic evidence indicates that they retained
holdings in the subcontinent right up to the birth of Christ. Although
the extent of their successes against indigenous powers such as the Shungas, Satavahanas, and Kalingas are unclear, what is clear is that Scythian tribes, renamed Indo-Scythians, brought about the demise of the Indo-Greeks from around 70 BCE and retained lands in the trans-Indus, the region of Mathura, and Gujarat.[citation needed]
Historians theorise that the organisation of the Empire was in line with the extensive bureaucracy described by Chanakya in the Arthashastra:
a sophisticated civil service governed everything from municipal
hygiene to international trade. The expansion and defense of the empire
was made possible by what appears to have been one of the largest armies
in the world during the Iron Age.[160]
According to Megasthenes, the empire wielded a military of 600,000
infantry, 30,000 cavalry, 8,000 chariots and 9,000 war elephants besides
followers and attendants.[161]
Administration
The Empire was divided into four provinces, with the imperial capital at Pataliputra. From Ashokan edicts, the names of the four provincial capitals are Tosali (in the east), Ujjain (in the west), Suvarnagiri (in the south), and Taxila (in the north). The head of the provincial administration was the Kumara (royal prince), who governed the provinces as king's representative. The kumara
was assisted by Mahamatyas and council of ministers. This
organizational structure was reflected at the imperial level with the
Emperor and his Mantriparishad (Council of Ministers).[citation needed].
The mauryans established a well developed coin minting system. Coins
were mostly made of silver and copper. Certain gold coins were in
circulation as well. The coins were widely used for trade and commerce[162]
The economy of the empire has been described as, "a socialized
monarchy", "a sort of state socialism", and the world's first welfare
state.[163]
Under the Mauryan system there was no private ownership of land as all
land was owned by the king to whom tribute was paid by the by the
laboring class. In return the emperor supplied the laborers with
agricultural products, animals, seeds, tools, public infrastructure, and
stored food in reserve for times of crisis.[163]
Local government
Arthashastra and Megasthenes accounts of Pataliputra
describe the intricate municipal system formed by Maurya empire to
govern its cities. A city counsel made up of thirty commissioners was
divided into six committees or boards which governed the city. The first
board fixed wages and looked after provided goods, second board made
arrangement for foreign dignitaries, tourists and businessmen, third
board made records and registrations, fourth looked after manufactured
goods and sale of commodities, fifth board regulated trade, issued
licenses and checked weights and measurements, sixth board collected
sales taxes. Some cities such as Taxila had autonomy to issue their own
coins. The city counsel had officers who looked after public welfare
such as maintenance of roads, public buildings, markets, hospitals,
educational institutions etc.[164] The official head of the village was Gramika (in towns Nagarika).[165]
The city counsel also had some magisterial powers. The taking of Census
was regular process in the Mauryan administration. The village
officials (Gramika) and municipal officials (Nagarika)
were responsible enumerating different classes of people in the Mauryan
empire such as traders, agriculturists, smiths, potters, carpenters
etc. and also cattle, mostly for taxation purposes.[166] These vocations consolidated as castes, a feature of Indian society that continues to influence the Indian politics till today.
For the first time in South Asia,
political unity and military security allowed for a common economic
system and enhanced trade and commerce, with increased agricultural
productivity. The previous situation involving hundreds of kingdoms,
many small armies, powerful regional chieftains, and internecine
warfare, gave way to a disciplined central authority. Farmers were freed
of tax and crop collection burdens from regional kings, paying instead
to a nationally administered and strict-but-fair system of taxation as
advised by the principles in the Arthashastra. Chandragupta
Maurya established a single currency across India, and a network of
regional governors and administrators and a civil service provided
justice and security for merchants, farmers and traders. The Mauryan
army wiped out many gangs of bandits, regional private armies, and
powerful chieftains who sought to impose their own supremacy in small
areas. Although regimental in revenue collection, Maurya also sponsored
many public works and waterways to enhance productivity, while internal
trade in India expanded greatly due to new-found political unity and
internal peace.[citation needed]
Under the Indo-Greek friendship treaty, and during Ashoka's reign, an international network of trade expanded. The Khyber Pass,
on the modern boundary of Pakistan and Afghanistan, became a
strategically important port of trade and intercourse with the outside
world. Greek states and Hellenic kingdoms in West Asia became important
trade partners of India. Trade also extended through the Malay peninsula
into Southeast Asia. India's exports included silk goods and textiles,
spices and exotic foods. The external world came across new scientific
knowledge and technology with expanding trade with the Mauryan Empire.
Ashoka also sponsored the construction of thousands of roads, waterways,
canals, hospitals, rest-houses and other public works. The easing of
many over-rigorous administrative practices, including those regarding
taxation and crop collection, helped increase productivity and economic
activity across the Empire.[citation needed]
In many ways, the economic situation in the Mauryan Empire is
analogous to the Roman Empire of several centuries later. Both had
extensive trade connections and both had organizations similar to corporations.
While Rome had organizational entities which were largely used for
public state-driven projects, Mauryan India had numerous private
commercial entities. These existed purely for private commerce and
developed before the Mauryan Empire itself.[167]
Religion
Throughout the period of empire, Vedic was an important religion.[169] The Mauryans favored Brahmanism as well as Jainism and Buddhism. Minor religious sects such as Ajivikas also received patronage. A number of Hindu texts were written during the Mauryan period.[170]
According to a Jain text from the 12th century, Chandragupta Maurya followed Jainism
after retiring, when he renounced his throne and material possessions
to join a wandering group of Jain monks and in his last days, he
observed the rigorous but self-purifying Jain ritual of santhara (fast unto death), at Shravana Belgola in Karnataka.[171][130][172][129]
Nevertheless, it is possible that Chandragupta Maurya "did not give up
the performance of sacrificial rites and was far from following the
Jaina creed of Ahimsa or non-injury to animals."[173]Samprati, the grandson of Ashoka, also patronized Jainism. Samprati was influenced by the teachings of Jain monks like Suhastin and he is said to have built 125,000 derasars across India.[174] Some of them are still found in the towns of Ahmedabad, Viramgam, Ujjain, and Palitana.[citation needed] It is also said that just like Ashoka, Samprati sent messengers and preachers to Greece, Persia and the Middle East for the spread of Jainism, but, to date, no evidence has been found to support this claim.[175][176]
The Buddhist texts Samantapasadika and Mahavamsa suggest that Bindusara followed Hindu Brahmanism, calling him a "Brahmana bhatto" ("monk of the Brahmanas").[177][178]
Magadha, the centre of the empire, was also the birthplace of Buddhism. Ashoka initially practised Brahmanism[citation needed] but later followed Buddhism; following the Kalinga War, he renounced expansionism and aggression, and the harsher injunctions of the Arthashastra
on the use of force, intensive policing, and ruthless measures for tax
collection and against rebels. Ashoka sent a mission led by his son Mahinda and daughter Sanghamitta to Sri Lanka, whose king Tissa
was so charmed with Buddhist ideals that he adopted them himself and
made Buddhism the state religion. Ashoka sent many Buddhist missions to West Asia, Greece and South East Asia,
and commissioned the construction of monasteries and schools, as well
as the publication of Buddhist literature across the empire. He is
believed to have built as many as 84,000 stupas across India, such as Sanchi and Mahabodhi Temple, and he increased the popularity of Buddhism in Afghanistan and Thailand. Ashoka helped convene the Third Buddhist Council
of India's and South Asia's Buddhist orders near his capital, a council
that undertook much work of reform and expansion of the Buddhist
religion. Indian merchants embraced Buddhism and played a large role in
spreading the religion across the Mauryan Empire.[179]
Society
The population of South Asia during the Mauryan period has been estimated to be between 15 and 30 million.[180] According to Tim Dyson, the period of the Mauryan Empire saw the consolidation of caste among the Indo-Aryan people
who had settled in the Gangetic plain, increasingly meeting tribal
people who were incorporated into their evolving caste-system, and the
declining rights of women in the Indo-Aryan speaking regions of India, though "these developments did not affect people living in large parts of the subcontinent."[181]
The greatest monument of this period, executed in the reign of Chandragupta Maurya, was the old palace at Paliputra, modern Kumhrar in Patna.
Excavations have unearthed the remains of the palace, which is thought
to have been a group of several buildings, the most important of which
was an immense pillared hall supported on a high substratum of timbers.
The pillars were set in regular rows, thus dividing the hall into a
number of smaller square bays. The number of columns is 80, each about 7
meters high. According to the eyewitness account of Megasthenes,
the palace was chiefly constructed of timber, and was considered to
exceed in splendour and magnificence the palaces of Susa and Ecbatana,
its gilded pillars being adorned with golden vines and silver birds. The
buildings stood in an extensive park studded with fish ponds and
furnished with a great variety of ornamental trees and shrubs.[182]Kauṭilya's Arthashastra
also gives the method of palace construction from this period. Later
fragments of stone pillars, including one nearly complete, with their
round tapering shafts and smooth polish, indicate that Ashoka was
responsible for the construction of the stone columns which replaced the
earlier wooden ones.[citation needed]
During the Ashokan period, stonework was of a highly diversified order and comprised lofty free-standing pillars, railings of stupas,
lion thrones and other colossal figures. The use of stone had reached
such great perfection during this time that even small fragments of
stone art were given a high lustrous polish resembling fine enamel. This
period marked the beginning of Buddhist architecture. Ashoka was responsible for the construction of several stupas, which were large domes and bearing symbols of Buddha. The most important ones are located at Sanchi, Bodhgaya, Bharhut, and possibly Amaravati Stupa. The most widespread examples of Mauryan architecture are the Ashoka pillars and carved edicts of Ashoka, often exquisitely decorated, with more than 40 spread throughout the Indian subcontinent.[183]
The peacock was a dynastic symbol of Mauryans, as depicted by Ashoka's pillars at Nandangarh and Sanchi Stupa.[65]
Natural history
The protection of animals in India was advocated by the time of the
Maurya dynasty; being the first empire to provide a unified political
entity in India, the attitude of the Mauryas towards forests, their
denizens, and fauna in general is of interest.[186]
The Mauryas firstly looked at forests as resources. For them, the
most important forest product was the elephant. Military might in those
times depended not only upon horses and men but also battle-elephants; these played a role in the defeat of Seleucus, one of Alexander's
former generals. The Mauryas sought to preserve supplies of elephants
since it was cheaper and took less time to catch, tame and train wild
elephants than to raise them. Kautilya's Arthashastra contains not only maxims on ancient statecraft, but also unambiguously specifies the responsibilities of officials such as the Protector of the Elephant Forests.[187]
On the border of the forest, he
should establish a forest for elephants guarded by foresters. The Office
of the Chief Elephant Forester should with the help of guards protect
the elephants in any terrain. The slaying of an elephant is punishable
by death.
The Mauryas also designated separate forests to protect supplies of
timber, as well as lions and tigers for skins. Elsewhere the Protector of Animals also worked to eliminate thieves, tigers and other predators to render the woods safe for grazing cattle.[citation needed]
The Mauryas valued certain forest tracts in strategic or economic
terms and instituted curbs and control measures over them. They
regarded all forest tribes with distrust and controlled them with
bribery and political subjugation. They employed some of them, the
food-gatherers or aranyaca to guard borders and trap animals. The
sometimes tense and conflict-ridden relationship nevertheless enabled
the Mauryas to guard their vast empire.[188]
When Ashoka
embraced Buddhism in the latter part of his reign, he brought about
significant changes in his style of governance, which included providing
protection to fauna, and even relinquished the royal hunt. He was the
first ruler in history[failed verification] to advocate conservation
measures for wildlife and even had rules inscribed in stone edicts. The
edicts proclaim that many followed the king's example in giving up the
slaughter of animals; one of them proudly states:[188]
However, the edicts of Ashoka reflect more the desire of rulers
than actual events; the mention of a 100 'panas' (coins) fine for
poaching deer in royal hunting preserves shows that rule-breakers did
exist. The legal restrictions conflicted with the practices freely
exercised by the common people in hunting, felling, fishing and setting
fires in forests.[188]
Contacts with the Hellenistic world
Foundation of the Empire
Relations with the Hellenistic world may have started from the very beginning of the Maurya Empire. Plutarch reports that Chandragupta Maurya met with Alexander the Great, probably around Taxila in the northwest:[189]
Sandrocottus(Chandragupta), when he
was a stripling, saw Alexander himself, and we are told that he often
said in later times that Alexander narrowly missed making himself master
of the country, since its king (Dhananda) was hated and despised on
account of his baseness and low birth.
Chandragupta
ultimately occupied Northwestern India, in the territories formerly
ruled by the Greeks, where he fought the satraps (described as
"Prefects" in Western sources) left in place after Alexander (Justin),
among whom may have been Eudemus, ruler in the western Punjab until his departure in 317 BCE or Peithon, son of Agenor, ruler of the Greek colonies along the Indus until his departure for Babylon in 316 BCE.[citation needed]
India, after the death of
Alexander, had assassinated his prefects, as if shaking the burden of
servitude. The author of this liberation was Sandracottos, but he had
transformed liberation in servitude after victory, since, after taking
the throne, he himself oppressed the very people he has liberated from
foreign domination.
Later, as he was preparing war
against the prefects of Alexander, a huge wild elephant went to him and
took him on his back as if tame, and he became a remarkable fighter and
war leader. Having thus acquired royal power, Sandracottos possessed
India at the time Seleucos was preparing future glory.
Seleucus I Nicator, the Macedonian satrap
of the Asian portion of Alexander's former empire, conquered and put
under his own authority eastern territories as far as Bactria and the
Indus (Appian, History of Rome, The Syrian Wars 55), until in 305 BCE he entered into a confrontation with Emperor Chandragupta:
Always lying in wait for the
neighbouring nations, strong in arms and persuasive in council, he
[Seleucus] acquired Mesopotamia, Armenia, 'Seleucid' Cappadocia, Persis,
Parthia, Bactria, Arabia, Tapouria, Sogdia, Arachosia, Hyrcania, and
other adjacent peoples that had been subdued by Alexander, as far as the
river Indus, so that the boundaries of his empire were the most
extensive in Asia after that of Alexander. The whole region from Phrygia
to the Indus was subject to Seleucus.
— Appian, History of Rome, "The Syrian Wars" 55[193]
Though no accounts of the conflict remain, it is clear that Seleucus
fared poorly against the Indian Emperor as he failed to conquer any
territory, and in fact was forced to surrender much that was already
his. Regardless, Seleucus and Chandragupta ultimately reached a
settlement and through a treaty sealed in 305 BCE, Seleucus, according
to Strabo, ceded a number of territories to Chandragupta, including
eastern Afghanistan and Balochistan.[citation needed]
Mainstream scholarship asserts that Chandragupta received vast territory west of the Indus, including the Hindu Kush, modern-day Afghanistan, and the Balochistan province of Pakistan.[205][206] Archaeologically, concrete indications of Mauryan rule, such as the inscriptions of the Edicts of Ashoka, are known as far as Kandahar in southern Afghanistan.
He (Seleucus) crossed the Indus and
waged war with Sandrocottus [Maurya], king of the Indians, who dwelt on
the banks of that stream, until they came to an understanding with each
other and contracted a marriage relationship.
The treaty on "Epigamia"
implies lawful marriage between Greeks and Indians was recognized at
the State level, although it is unclear whether it occurred among
dynastic rulers or common people, or both.
Exchange of presents
Classical
sources have also recorded that following their treaty, Chandragupta
and Seleucus exchanged presents, such as when Chandragupta sent various aphrodisiacs to Seleucus:[136]
And Theophrastus says that some
contrivances are of wondrous efficacy in such matters [as to make people
more amorous]. And Phylarchus confirms him, by reference to some of the
presents which Sandrakottus, the king of the Indians, sent to Seleucus;
which were to act like charms in producing a wonderful degree of
affection, while some, on the contrary, were to banish love.
His son Bindusara 'Amitraghata' (Slayer of Enemies) also is recorded in Classical sources as having exchanged presents with Antiochus I:[136]
But dried figs were so very much sought after by all men (for really, as Aristophanes says, "There's really nothing nicer than dried figs"), that even Amitrochates, the king of the Indians, wrote to Antiochus, entreating him (it is Hegesander who tells this story) to buy and send him some sweet wine, and some dried figs, and a sophist;
and that Antiochus wrote to him in answer, "The dry figs and the sweet
wine we will send you; but it is not lawful for a sophist to be sold in
Greece.
An influential and large Greek population was present in the
northwest of the Indian subcontinent under Ashoka's rule, possibly
remnants of Alexander's conquests in the Indus Valley region. In the Rock Edicts of Ashoka, some of them inscribed in Greek, Ashoka states that the Greeks within his dominion were converted to Buddhism:
Here in the king's dominion among the Greeks, the Kambojas, the Nabhakas, the Nabhapamkits, the Bhojas, the Pitinikas, the Andhras and the Palidas, everywhere people are following Beloved-of-the-Gods' instructions in Dharma.
Now, in times past (officers) called Mahamatras
of morality did not exist before. Mahdmatras of morality were appointed
by me (when I had been) anointed thirteen years. These are occupied
with all sects in establishing morality, in promoting morality, and for
the welfare and happiness of those who are devoted to morality (even)
among the Greeks, Kambojas and Gandharas, and whatever other western borderers (of mine there are).
Fragments of Edict 13 have been found in Greek, and a full Edict, written in both Greek and Aramaic, has been discovered in Kandahar.
It is said to be written in excellent Classical Greek, using
sophisticated philosophical terms. In this Edict, Ashoka uses the word Eusebeia ("Piety") as the Greek translation for the ubiquitous "Dharma" of his other Edicts written in Prakrit:
Ten years (of reign) having been completed, King Piodasses (Ashoka) made known (the doctrine of) Piety (εὐσέβεια, Eusebeia)
to men; and from this moment he has made men more pious, and everything
thrives throughout the whole world. And the king abstains from
(killing) living beings, and other men and those who (are) huntsmen and
fishermen of the king have desisted from hunting. And if some (were)
intemperate, they have ceased from their intemperance as was in their
power; and obedient to their father and mother and to the elders, in
opposition to the past also in the future, by so acting on every
occasion, they will live better and more happily.
Also, in the Edicts of Ashoka,
Ashoka mentions the Hellenistic kings of the period as recipients of
his Buddhist proselytism, although no Western historical record of this
event remains:
Ashoka also encouraged the development of herbal medicine, for men and animals, in their territories:
Everywhere within Beloved-of-the-Gods, King Piyadasi's [Ashoka's] domain, and among the people beyond the borders, the Cholas, the Pandyas, the Satiyaputras, the Keralaputras, as far as Tamraparni and where the Greek king Antiochos
rules, and among the kings who are neighbors of Antiochos, everywhere
has Beloved-of-the-Gods, King Piyadasi, made provision for two types of
medical treatment: medical treatment for humans and medical treatment
for animals. Wherever medical herbs suitable for humans or animals are
not available, I have had them imported and grown. Wherever medical
roots or fruits are not available I have had them imported and grown.
Along roads I have had wells dug and trees planted for the benefit of
humans and animals.
The Greeks in India even seem to have played an active role in the
spread of Buddhism, as some of the emissaries of Ashoka, such as Dharmaraksita, are described in Pali sources as leading Greek ("Yona") Buddhist monks, active in Buddhist proselytism (the Mahavamsa, XII)[212]
Sophagasenus was an Indian Mauryan ruler of the 3rd century BCE, described in ancient Greek sources, and named Subhagasena or Subhashasena in Prakrit. His name is mentioned in the list of Mauryan princes. He may have been a grandson of Ashoka, or Kunala, the son of Ashoka. He ruled an area south of the Hindu Kush, possibly in Gandhara. Antiochos III, the Seleucid king, after having made peace with Euthydemus in Bactria, went to India in 206 BCE and is said to have renewed his friendship with the Indian king there:
He (Antiochus) crossed the Caucasus
and descended into India; renewed his friendship with Sophagasenus the
king of the Indians; received more elephants, until he had a hundred and
fifty altogether; and having once more provisioned his troops, set out
again personally with his army: leaving Androsthenes of Cyzicus the duty
of taking home the treasure which this king had agreed to hand over to
him.
Fa-Hian, the Chinese Buddhist monk and traveler, mentioned Dharmavarddhana, who was believed to be Subhagsena by historians :
From this, descending eastward, journeying for five days, we arrive
at the country of Gandhara (Kien-to-wei). This is the place which
Dharmavarddhana, the son of Asoka, governed. Buddha also in this
country, when he was a Bodhisattva, gave his eyes in charity for the
sake of a man. On this spot also they have raised a great stupa, adorned
with silver and gold. The people of this country mostly study the
Little Vehicle.
~Chapter X ,The travels of Fa-Hian (400 A.D.)
[21]
Later Mauryans
The
Rājataranginī mentions Jalauka as the successor of Asoka in Kasmira,
while Tāranātha mentions another successor Virasena who ruled in
Gandhāra and he was as Dr. Thomas suggests, probably the predecessor of
Subhagasena.[214]
Petty Maurya kings continued to rule in western India as well as
Magadha long after the extinction of the imperial line. King Dhavala of
the Maurya dynasty is referred to in the Kanaswa inscription of A.D.
738. Professor Bhandarkar identifies him with Dhavalappadeva, the
overlord of Dhanika mentioned in the Dabok (Mewar) inscription of A.D.
725.” Maurya chief of the Konkan and Khandesh are referred to in the
early epigraphs. A Maurya Prince of Magadha named Pürnavarman is
mentioned by Chinese traveller Hiuen Tsang.[215]
In 7th century A.D. Hiuen Tsang, wrote about small dominions in eastern
India for he relates that shortly before his visit Purnavarman, king of
Magadha, a descendant of Ashoka who had restored the Bodhi-tree, which
had been destroyed by Sasanka, apart from this he also mention Mauryan
ruler named Narendragupta of Karnasuvarna(Bengal).[216]
During the sixth century Kolaba along with the Northern Konkan
coast was probably ruled by Mauryas and Nala Chiefs as Kirtivarman
(550-567), the first of the Calukyas who conquered Konkan is described
as the night of death to the Nalas and Mauryas [Indian Antiquary VIII.
24.].
From an inscribed stones of the fifth and the sixth century
discovered in the Thānā district of North Konkan, it describes that a
Mauryan King Suketuvarman was ruling in Konkan. Konkan was given in
charge of a Maurya family.[217][218][219]
It is interesting to see that More is a name quite common among
Marathas, Kunbis and Rolls of Kolaba. Probably here can be traced the
name Maurya. Two small landing places of the name of More in Elephanta
and in Karanja can be taken as relics of the Maurya power formerly
existing in Konkan. The Mauryas of the Konkan, previously subdued, were
overwhelmed and the city of Puri (either Gharapuri, i.e., the island of
Elephanta near Bombay, or Rajpuri near Janjira), which was located in
the Arabian Sea and was probably the Maurya capital, was invaded by
Pulakesin's battleships and was captured.[220]
Rediscovery
Coins
of the Kalacuri king Krşņarāja have been found in the island of Bombay.
But the country was not directly administered by the Kalacuris. They
gave it to a feudadtory family called the Mauryas.The Kaņaśva
inscription dated A.D. 738-39 mentions the Maurya king Dhavalappa, who
was probably holding the fort of Chittorgarh.This family probably
succumbed to the attack of the Arabs, who are credited with a victory
over them. Another Maurya family was ruling at Valabhi (modern Valā) in
Saurāştra. A later scion of it named Govindaraja Maurya was reigning
from Väghli in Khāndeśa as a feudatory of the Mahamandaleśvara
Seunacandra II. The family ruling in North Konkan in the sixth and
seventh centuries A.D. was related to any of the branches of the great
Maurya family. The first notice of the Maurya family ruling in North
Konkan occurs in the description of the conquests of the early Chalukya
king Kirtivarman I (A.D. 566-598). In the Aihole inscription where he is
described as the Night of Destruction to the Nalas, Mauryas and
Kadambas. The Kadambas were described as subclan of Southern Mauryans
who where completely lost.[221]
The Mauryas of Konkan region
Suketuvarman
is known from a solitary stone inscription found at Vada to the north
of Thana near Bombay but now preserved in the Prince of Wales Museum,
Bombay. The epigraph, which is damaged and written in the southern
characters of about the 4th or 5th century A.D. and refers to a king
named Suketuvarman of the Maurya dynasty. He appears to have been ruling
near about Thana during that period.[222]
The Mauryas of Western coastline
Two copper plate grants discovered in the Goa territory on the west coast reveal the existence of two kings named Chandravarman and Anirjitavarman
who belonged to the Maurya dynasty as per their inscription. As both
the grants are dated in the regnal years of the ruling kings, from the
palaeographical point of view, they may be assigned to the 6th or 7th
century A.D., the grant of Chandravarman being slightly earlier than
that of Anirjitvarman. Both these rulers, who assume the epithet of
Mahārāja in their records. The charter of Chandravarman records the
donation, by the king, of some lands to the Mahāvihāra situated in
Sivapura which is identified with the village bearing the same name near
Chandor in Goa. The grant of Anirjitavarman, registers certain gifts,
made by the king, to a Brāhmaņa named Hastyärya. It is issued from a a
place called Kumāradvīpa which appears to be located somewhere in the
Goa territory. These two records show that Candravarman and
Anirjitvarman were ruling somewhere in the Goa territory about the
6th-7th century A.D.[223]
The Mauryas of the Mathura region
Dindirāja
alias Karka fragmentary stone inscription from Mathura city in Uttar
Pradesh which, on palaeographical grounds, is referred to the latter
half of the 7th century A.D., mentions four members of the Maurya
dynasty viz. Krşņarāja in his family, Chandragupta his son, Aryarāja
and, probably his son, Dindirāja alias Karka.[224][225]The
last named ruler of this Mauryan branch appears to have burnt the city
of Kanyakubja (Kannauj). The Maurya kings mentioned in this record seem
to have held sway over the south-western areas of Uttar Pradesh. The
Jaina tradition represents king Yasovarman (circa 728-53 A.D.) of
Kannauj as a descendant of Chandragupta Maurya. This may refer to
Yasovarman's relations with Karka-Dindirāja who, in all probability, was
the grandson of a Maurya ruler named Chandragupta of 7th century A.D.[226]
The Mauryas of the Rajasthan region
King
Dhavala or Dhavalātman inscription" from Kanaswa in the old Kota, State
of Rajasthan, dated in the Mälava year (i.e. Vikrama Samvat) 795 or
738. A.D., refers to the Brahmana Sivagana as a feudatory of king
Dhavala of the Maurya lineage. Dr. D.C. Sircar has suggested, on grounds
of palaeographical resemblance and geographical proximity, that the
Mauryas of the Mathura region mentioned above may be connected with the
Maurya king Dhavala of the Kanaswa record.[227]
It has also been suggested that the Mauryas who are stated to have been
defeated by the Tājika (i. e. Arab) army in the Navsari plates of the
Gujarat Chalukya chief Pulakeśin, dated 738 A.D., were probably these
Mauryas of the Malwa Rajasthan region.[228]
Dhavala inscription from Dabok about 8 miles to the east of
Udaipur in Rajasthan, mentions a Guhila chief Dhanika of Dhabagarta and
his lord Dhavalappa Deva. Bhandarkar was inclined to identify
Dhavalappa of this epigraph with the Maurya king Dhavalātman of the
Kanaswa inscription referred.[229]
It is possible that they were related to the Mauryas of the West Coast
region and might have extended their suzerainty over Rajasthan which
then formed part of Harsa's (606-47 A.D.) dominion. As pointed out by
Dr. Sircar, the date of the Dabok record as read by him shows that Harsa
must have lost parts of Rajasthan before his death in 647 A.D., though
the Mauryas of Rajasthan must have owed allegiance to him before.[230][231]
Jhalrapatan (Jhalwar District Rajasthan) inscription dated 689 A.D. mentions a Maurya ruler named Durgagana.[232]
Further, Bappa, son of Guhila or Guhadatta, founder of the Guhila
family, supplanted his uncle known as the Mori (i.e. Maurya) ruler of
Chitor in whose service he was before.[233]
The Mauryas of Khandesh region
Govindarāja
stone record from Väghli in the Khandesh District, Maharastra State,
dated Saka 991 or 1069 A.D. refers to a Maurya chief Govinda or
Govindaraja as a subordinate of the early Yadava king Seuņachandra II.
The epigraph mentions twenty princes or chiefs who were predecessors of
Mauryan King Govindaraja, the earliest member being Kikața. It is also
stated that originally the capital of the Mauryas was at Valabhī in
Surashtra.[234]
Modern Assertion
Ashoka
appointed the princes of the royal blood as viceroys in the outlying
provinces of his vast empire to carry on the administration.Four such
Mauryan princes viceroys ruling at Taxila, Ujjain, Tosali and
Suvarnagiri are known from lithic records of Ashoka edicts. So Mauryan
lineage kings spreaded from the time of Ashoka.The Chinese traveller
Hiuen Tsang (7th century A.D.) mentions a Maurya ruler of Magadha named
Pürņavarman. While some of the later Mauryan rulers enjoyed independent
status, others were either semi-independent or feudatories or even petty
chiefs. Future discoveries may throw further light on these later
Mauryas.
250 BCE: Ashoka builds Buddhist stupas and erects pillars bearing inscriptions.
184 BCE: The empire collapses when Brihadratha, the last emperor, is killed by Pushyamitra Shunga, a Mauryan general and the founder of the Shunga Empire.
Sources of Mauryan History
Mauryan History Sources
Authentic Names
Jain Scriptures
1 - Brihatkalpa Sutra
2 - Brihatkathakosha
3 - Aradhana Satkathaprabandh
4 - Shri Chandravirachita Kathakosha
5 - Nemichandrakrita Kathakosha
6 - Parishishtaparvana
7 - Vividhtirthakalpa
8 - Punyashravakathakosha
9 - Nisitha Sutra
Buddhist Scriptures
1 - Mahavansha
2 - Dipavansha
3 - Mahabodhivansha
4 - Tripitaka
5 - Divyavadana
6 - Ashokavadana
7 - Vinayapitaka
8 - Mahavansatika (Vansatthappakasini)
9 - Uttara Vihara Attakatha
Vedic Scriptures
1 - Matsya Purana
2 - Vishnu Purana
3 - Bhagavata Purana
4 - Bhavishya Purana
5 - Brahmanda Purana
6 - Vayu Purana
7 - Kamandaka Neetisara
Inscriptions / Rock Edicts Evidence
1 - Ashoka's Rock Edicts, Cave Inscriptions, Pillar Edicts
2 - Kharavela's Hathigumpha Rock Edicts
3 - Rudradaman Inscription of Junagarh
Ancient Historical Books
1 - Arthashastra, Kautilya
2 - Mudrarakshasa, Vishakhadatta
3 - Mahabhashya, Patanjali
4 - Malavikagnimitram, Kalidasa
5 - Harshacharita, Banabhatta
6 - Rajatarangini, Kalhana
7 - Indica, Megasthenese
8 - Naturalis Historia, Pliny
9 - Epitome of Trogus, Justin
10 - Geographica, Strabo
11 - Anabasis Alexandri, Arrian
12 - The travels of Fa-Hian, Fa Hian
In literature
According to Vicarasreni of Merutunga, Mauryans rose to power in 312 BC.[236]
Greatest emperor of dynasty. His son Kunala was blinded and died before his father. Ashoka was succeeded by his grandson. Also known for Kalinga War victory.
The Buddha was a charismatic leader who founded a distinctive religious community based on his unique teachings. Some of the members of that community were, like the Buddha himself, wandering ascetics. Others were laypersons who venerated the Buddha, followed certain aspects of his teachings, and provided the wandering ascetics with the material support that they required.
In
the centuries following the Buddha’s death, the story of his life was
remembered and embellished, his teachings were preserved and developed,
and the community that he had established became a significant religious
force. Many of the wandering ascetics who followed the Buddha settled
in permanent monastic establishments and developed monastic rules. At
the same time, the Buddhist laity came to include important members of
the economic and political elite.
During its first century of existence, Buddhism spread from its place of origin in Magadha and Kosala throughout much of northern India, including the areas of Mathura
and Ujjayani in the west. According to Buddhist tradition, invitations
to the Council of Vesali (Sanskrit: Vaishali), held just over a century
after the Buddha’s death, were sent to monks living throughout northern
and central India. By the middle of the 3rd century bce, Buddhism had gained the favour of a Mauryan king, Ashoka, who had established an empire that extended from the Himalayas in the north to almost as far as Sri Lanka in the south.
To
the rulers of the republics and kingdoms arising in northeastern India,
the patronage of newly emerging sects such as Buddhism was one way of
counterbalancing the political power exercised by Brahmans (high-caste Hindus). The first Mauryan emperor, Chandragupta (c. 321–c. 297 bce), patronizedJainism and, according to some traditions, finally became a Jain monk. His grandson, Ashoka, who ruled over the greater part of the subcontinent from about 268 to 232 bce,
traditionally played an important role in Buddhist history because of
his support of Buddhism during his lifetime. He exerted even more
influence posthumously, through stories that depicted him as a chakravartin
(“world monarch”; literally “a great wheel-rolling monarch”). He is
portrayed as a paragon of Buddhist kingship who accomplished many
fabulous feats of piety and devotion. It is therefore very difficult to
distinguish the Ashoka of history from the Ashoka of Buddhist legend and myth.
The first actual Buddhist “texts” that are still extant
are inscriptions (including a number of well-known Ashokan pillars)
that Ashoka had written and displayed in various places throughout his
vast kingdom. According to these inscriptions, Ashoka attempted to
establish in his realm a “true dhamma” based on the virtues of
self-control, impartiality, cheerfulness, truthfulness, and goodness.
Although he promoted Buddhism, he did not found a state church, and he
was known for his respect for other religious traditions. He sought to
maintain unity in the Buddhist monastic community, however, and he
promoted an ethic that focused on the layperson’s obligations in this world. His aim, as articulated in his edicts, was to create a religious and social milieu that would enable all “children of the king” to live happily in this life and to attain heaven
in the next. Thus, he set up medical assistance for human beings and
beasts, maintained reservoirs and canals, and promoted trade. He
established a system of dhamma officers (dhamma-mahamattas) in order to help govern the empire. And he sent diplomatic emissaries to areas beyond his direct political control.
Ashoka’s empire began to crumble soon after his death, and the Mauryan dynasty was finally overthrown in the early decades of the 2nd century bce. There is some evidence to suggest that Buddhism in India suffered persecution during the Shunga-Kanva period (185–28 bce). Despite occasional setbacks, however, Buddhists persevered, and before the emergence of the Gupta dynasty, which created the next great pan-Indian empire in the 4th century ce, Buddhism had become a leading if not dominant religious tradition in India.
During
the approximately five centuries between the fall of the Mauryan
dynasty and the rise of the Gupta dynasty, major developments occurred
in all aspects of Buddhist belief
and practice. Well before the beginning of the Common Era, stories
about the Buddha’s many previous lives, accounts of important events in
his life as Gautama, stories of his “extended life” in his relics, and other aspects of his sacredbiography
were elaborated on. In the centuries that followed, groups of these
stories were collected and compiled in various styles and combinations.
Beginning in the 3rd century bce and possibly earlier, magnificent Buddhist monuments such as the great stupas at Bharhut and Sanchi were built. During the early centuries of the 1st millennium ce,
similar monuments were established virtually throughout the
subcontinent. Numerous monasteries emerged too, some in close
association with the great monuments and pilgrimage sites. Considerable
evidence, including inscriptional evidence, points to extensive support
from local rulers, including the women of the various royal courts.
During this period Buddhist monastic centres proliferated, and there developed diverse schools of interpretation concerning matters of doctrine and monastic discipline. Within the Hinayana tradition there emerged many different schools, most of which preserved a variant of the Tipitaka
(which had taken the form of written scriptures by the early centuries
of the Common Era), held distinctive doctrinal positions, and practiced
unique forms of monastic discipline. The traditional number of schools
is 18, but the situation was very complicated, and exact identifications
are hard to make.
About the beginning of the Common Era, distinctively Mahayana
tendencies began to take shape. It should be emphasized, however, that
many Hinayana and Mahayana adherents continued to live together in the
same monastic institutions. In the 2nd or 3rd century the Madhyamika school, which has remained one of the major schools of Mahayana philosophy,
was established, and many other expressions of Mahayana belief,
practice, and communal life appeared. By the beginning of the Gupta era,
the Mahayana had become the most dynamic and creative Buddhist tradition in India.
At this time Buddhism also expanded beyond the Indian subcontinent. It is most likely that Ashoka sent a diplomatic mission to Sri Lanka
and that Buddhism was established there during his reign. By the
beginning of the Common Era, Buddhism, which had become very strong in
northwestern India, had followed the great trade routes into Central Asia and China. According to later tradition, this expansion was greatly facilitated by Kanishka, a great Kushana king of the 1st or 2nd century ce, who ruled over an area that included portions of northern India and Central Asia.
By the time of the Gupta dynasty (c. 320–c. 600 ce), Buddhism in India was being influenced by the revival of Brahmanic religion and the rising tide of bhakti
(a devotional movement that emphasized the intense love of a devotee
for a personal god). During this period, for example, some Hindus
practiced devotion to the Buddha, whom they regarded as an avatar
(incarnation) of the Hindu deityVishnu, and some Buddhists venerated Hindu deities who were an integral part of the wider religious context in which they lived.
Throughout
the Gupta and Pala periods, Hinayana Buddhists remained a major segment
of the Indian Buddhist community. Their continued cultivation of
various aspects of Buddhist teaching led to the emergence of the Yogachara school, the second great tradition of Mahayana philosophy. A third major Buddhist tradition, the Vajrayana, or Tantric
tradition, developed out of the Mahayana school and became a powerful
and dynamic religious force. The new form of text associated with this
tradition, the tantras, appeared during the Gupta period, and there are indications that distinctively Tantric rituals
began to be employed at this time as well. It was during the Pala
period (8th–12th centuries), however, that the Vajrayana tradition
emerged as the most dynamic component of Indian Buddhist life.
Also during the Gupta period, there emerged a new Buddhist institution, the Mahavihara
(“Great Monastery”), which often functioned as a university. This
institution enjoyed great success during the reign of the Pala kings.
The most famous of these Mahaviharas, located at Nalanda, became a major centre for the study of Buddhist texts and the refinement of Buddhist thought, particularly Mahayana
and Vajrayana thought. The monks at Nalanda also developed a curriculum
that went far beyond traditional Buddhism and included much Indian
scientific and cultural knowledge. In subsequent
years other important Mahaviharas were established, each with its own
distinctive emphases and characteristics. These great Buddhist monastic
research and educational institutions exerted a profound religious and
cultural influence not only in India but throughout many other parts of Asia as well.
भगवान आणि हिंदुशाही
दुर्गाबाईंशी ऐसपैस गप्पा या पुस्तकात बाई म्हणतात की भगवान हा शब्द प्रथमतः गौतम बुद्धाच्या संदर्भात वापरला गेला. त्याआधी वैष्णव देवांना भगवान ही उपाधी लावली जात नसे. यावरून भागवत् धर्माची पताका बुद्धानंतर रोवली गेली असे विधान करता येईल का?
गांधारात हिंदु देवतांच्या मूर्ती आढळत नाहीत या वाक्यावर अधिक शोध घेण्याचा प्रयत्न केला परंतु फारसे हाती लागले नाही. वैष्णव धर्म प्रस्थापित होण्याआधी शिवाची किंवा दुय्यम देवतांची पूजा होत असे का ते ही कळले नाही. परंतु याचा अर्थ गांधारात हिंदु देवता आढळत नाहीत असा नाही. कदाचित, ज्या प्रकारे बौद्ध लेणी खणली गेली तसा प्रयत्न हिंदु देवतांसाठी झाला नसावा कारण मुख्य धर्म बौद्ध होता.
गांधार या विकी लेखावर बुद्धाच्या सर्व मूर्ती पहिल्या शतकापासून पुढे दिसतात. गांधारात त्या सुमारास हिंदु मूर्तीही आहेत. परंतु त्या हिंदुशाही दरम्यान कोरल्या/ घडवल्या गेल्या असतील असे मानण्यास जागा आहे.
मध्यंतरी इंडिएनापोलिस आर्ट म्युझियममध्ये गांधारातील पहिल्या शतकातील उजव्या सोंडेचा गणेश आढळला. विष्णूचे दशावतारही आढळले. इतरत्रही गांधारातील हिंदू देवांच्या मूर्ती असणे शक्य आहे.