Thursday, October 30, 2025

गुप्त राजवंश-इतिहास

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गुप्त राजवंश-इतिहास, शासक के नाम व अभिलेख |UPSC

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गुप्त वंश, पूर्वोत्तर भारत में मगध (अब बिहार) राज्य के शासक। उन्होंने चौथी शताब्दी की शुरुआत से छठी शताब्दी के अंत तक उत्तरी और मध्य और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों पर एक साम्राज्य बनाए रखा।

गुप्त साम्राज्य की स्थापना श्री गुप्त ने की थी और इसके उत्तराधिकारी उनके पुत्र घटोत्कच थे। यह राजवंश चंद्रगुप्त- I, समुद्रगुप्त, आदि जैसे शासकों के साथ प्रसिद्ध हुआ।
5वीं सदी के संस्कृत कवि कालिदास ने गुप्तों को श्रेय दिया कि उन्होंने भारत के भीतर और बाहर लगभग इक्कीस राज्यों पर विजय प्राप्त की, जिसमें पारसिक, हूण, कम्बोज, पश्चिम और पूर्व में स्थित ओक्सस घाटियों, किन्नरों के राज्य शामिल थे। , किरातस, और अन्य।
गुप्त साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र नगर थी। आज यह शहर पटना के नाम से जाना जाता है।

विष्णुपुराण गुप्त के अनुसार “वैश्य” से संबंधित है।

गुप्ता प्रशासन
राज्य (राज्य) को कई प्रांतों में विभाजित किया गया था और उन्हें उत्तर में ‘भुक्ति’ और दक्षिण में ‘मंडल’ या ‘मंडलम’ के नाम से जाना जाता था। ‘भुक्ति’ का राज्यपाल राजा द्वारा नियुक्त किया जाता था और ‘उपरिका’ के नाम से जाना जाता था।

• प्रांतों को उत्तर (भारत) में ‘विषय’ या ‘भोगा’ और दक्षिण (भारत) में ‘कोट्टम’ या ‘वलनाडु’ के रूप में उप-विभाजित किया गया था।

• प्रशासन की कुछ अन्य इकाइयाँ जिले थे, जिन्हें उत्तर (भारत) में ‘आधी’, ‘थाना’ या ‘पटना’ और दक्षिण (भारत) में ‘नाडु’ कहा जाता था।

गांवों के समूह (यानी आधुनिक तहसील) को उत्तर (भारत) में ‘विथिस’ और दक्षिण (भारत) में ‘पट्टला’ और ‘कुर्रम’ के नाम से जाना जाता था। ग्राम प्रशासन ग्रामीण निकायों के नियंत्रण में था जिसमें एक मुखिया और गाँव के बुजुर्ग शामिल थे।

प्रत्येक नगर प्रशासन के पास एक परिषद निकाय था।

गुप्त राजवंश स्रोत
नितिसार-कामंदक

कौमुदी महोत्सव – वज्जिका

देवीचंद्रगुप्तम (ध्रुव देवी और चंद्रगुप्त द्वितीय के बारे में) और मुद्राराक्षस – विशाखादत्त

स्वप्नवासवदत्तम (वासवदत्त का स्वप्न) – भासा

मृच्छकटिक (चारुदत्त नाम के एक ब्राह्मण के बारे में एक नाटक जो वसंतसेना नाम की एक वेश्या से प्रेम करता था) – शूद्रक

कथासरित्सागर (जो दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार की बात करता है) – सोमदेव

पुराण वंशावली अभिलेख देते हैं।

इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख
एरण, एमपी स्तंभ शिलालेख
नालंदा कॉपर प्लेट शिलालेख
गया कॉपर प्लेट शिलालेख
महरौली लौह शिलालेख (प्रशस्ति)
भिटारी अखंड स्तंभ

कला और वास्तुकला
गुप्त काल में, गुप्तों ने भारत में पहली बार हिंदू संरचनात्मक मंदिरों की स्थापना की। गुप्त काल के मंदिर हैं:

मध्य प्रदेश में वराह और विष्णु मंदिर
(विष्णु वराह के रूप में, उदयगिरि गुफाएं)

जबलपुर में कंकाली देवी का मंदिर
नचना कुथारा में महादेव और पार्वती का मंदिर
देवगढ़ में दशावतार का मंदिर
(विष्णु अनंतशयन पैनल)
उत्तर प्रदेश में भीतरगाँव मंदिर

कुमारगुप्त ने नालंदा विश्वविद्यालय की नींव रखी जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संस्थान के रूप में उभरा।
427 CE में स्थापित, नालंदा को दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है, एक प्रकार का मध्यकालीन आइवी लीग संस्थान, जिसमें नौ मिलियन पुस्तकें हैं, जिसने पूर्वी और मध्य एशिया के 10,000 छात्रों को आकर्षित किया।

आर्यभट, भारतीय गणित के जनक माने जाते हैं, आर्यभट सबसे पहले शून्य को एक अंक के रूप में निर्दिष्ट करने वाले थे।
आर्यभट्ट ने साइन फंक्शन (त्रिकोणमिति) की भी खोज की।
उन्होंने बीजगणित और साइन कोण के उपयोग से पाई के मान की भी गणना की

आर्यभट्ट का सिद्धांत कि पृथ्वी आकार में गोल है चपटी नहीं है।
आर्यभट्ट ने यह भी सिद्ध किया कि पृथ्वी प्रतिदिन अपनी धुरी पर घूमती है।
उन्होंने सूर्य और चंद्र ग्रहण के कारण की खोज की।

कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम, मालविकाग्निमित्रम, रघुवंश और कुमारसंभव जैसे महाकाव्यों की रचना की।

गुप्त काल में संस्कृत भाषा प्रमुख हो गई।

गुप्त काल के दौरान पंचतंत्र की कहानियों और हितोद्देश की रचना विष्णु शर्मा ने की थी।

चंद्रगुप्त द्वितीय “विक्रमादित्य” ने उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
वह कला और संस्कृति के व्यक्ति भी थे, उज्जैन में उनका दरबार ‘नवरत्न’ से सुशोभित था-
कालिदास – कवि
अमरसिंह – कोशकार
धन्वंतरि- डॉक्टर
वेताल बत् – जादूगर
वैहरमिहिर-खगोलविद
वरची – व्याकरणिक
शंका-वास्तुकार
हरीसेना – दरबारी कवि
क्षपंक- ज्योतिषी

शासकों की सूची

श्री-गुप्त प्रथम महाराजा – तीसरी शताब्दी के उत्तरार्ध में

घटोत्कच महाराजा – 280/290–319 ई

चन्द्रगुप्त प्रथम – 319–335 ई

समुद्रगुप्त 335-375 ई

कच्छ मध्य चौथी शताब्दी ई

चन्द्रगुप्त द्वितीय 375-415 ई

कुमार-गुप्त प्रथम 415-455 ई

पुरु-गुप्त 467-473 ई

कुमार-गुप्त द्वितीय क्रमादित्य 473-476 ई

बुद्ध-गुप्त 476-495 ई

नरसिम्हा-गुप्ता 495-530 ई
कुमार-गुप्त III 530-540 सीई
विष्णु-गुप्त चंद्रादित्य 540-550 ई

 

गुप्त काल (240 ई.–550 ई.)

  • संस्थापक – श्रीगुप्त
  • शासनकाल – 240 ई. – 550 ई.
  • अंतिम शासक – विष्णुगुप्त -3

प्रमुख गुप्त काल शासक-

  • श्रीगुप्त (240 – 280 ई.)
  • घटोत्कच गुप्त (280-319ई.)
  • चन्द्रगुप्त (320 ई. से 335 ई.)
  • समन्द्रगुप्त ( 335 ई.)
  • रामगुप्त
  • चन्द्रगुप्त 2 विक्रमादित्य (375 – 415 ई. )
  • कुमार गुप्त (415 – 455ई.)
  • स्कन्दगुप्त (455 – 467ई.)
  • भानुगुप्त (510 ई. )
  • विष्णुगुप्त -3 (540 – 550ई.)

गुप्त काल के साक्ष्य

साहित्यिक साक्ष्यअभिलेखीय साक्ष्य
पुराण – विष्णु पुराण, वायु पुराण एवं ब्राह्मण पुराणसमुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति
देवी चन्द्रगुप्तम (विशाखदत्त कृत)कमारगुप्त का विलसड अभिलेख
कालीदास की रचनाएंस्कन्दन गुप्त का भितरी अभिलेख
विदेशी यात्री: फाह्यान, ह्नेनसाग आदिप्रभावती गुप्त का पूना ताम्रपत्र

गुप्त कौन थे ? वैश्य या ब्राह्मण ?

वैश्य होने के पक्ष में तर्क – रोमिला थापर, रामशरण शर्मा आदि इतिहासकारों ने गुप्तों को वैश्य माना है।

कारण: स्मृतियों के अनुसार नाम के पीछे गुप्त उत्तरांश लगाना वैश्यों की एक विशेषता है। गुप्त वैश्यों का एक गोत्र भी है। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि गुप्त वंश के संस्थापक का नाम केवल गुप्त प्राप्त होता है। श्री आदर भाव से जोड़ा गया उपसर्ग है। इस प्रकार गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त माना जाता है।

ब्राह्मण होने के पक्ष में तर्क – राय चौधरी ने गुप्तों को ब्राह्मण वंशी माना है।

कारण: पुष्यमित्र शुंग षट्टमहिषी धारणी में गुप्त गोत्र को ब्राह्मण वंशी बताया गया है। इसका एक कारण गुप्त शासकों द्वारा अपनी पुत्रियों का विवाह ब्राह्मणों के साथ किया जैसे – चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक शासक द्वितीय से एवं भानु गुप्त ने अपनी बहनों का विवाह भी ब्राह्मणों से किया। चूंकि गुप्त काल में एवं मौर्योत्तर काल में जाति प्रथा प्रबल थी तथा अन्तर्जातीय विवाह अमान्य था।इस प्रकार गुप्तों की पुत्रियों के ब्राह्मणों से विवाह उन्हें ब्राह्मण वंशी मानने को प्रेरित करते हैं। परन्तु इस समय अनुलोम विवाह (उच्चवंश का वर, निम्न वंश की कन्या) प्रचलित था। ये पुनः इस तथ्य का उलझा देती है।

अतः ये कौन थे इसका कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है।

गुप्तवंशीय शासक

श्रीगुप्त (240 – 280 ई)

प्रभावती गुप्त का पूना स्थित ताम्रपत्र अभिलेख के अनुसार श्री गुप्त को गुप्त वंश का आदिराज/आदिपुरूष माना गया है। अतः गुप्त वंश की स्थापना का श्रेय श्री गुप्त को प्राप्त है। श्री गुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की थी।

घटोत्कच्च गुप्त (280-319)

  • यह श्री गुप्त का उत्तराधिकारी था।
  • घटोत्कच्छ ने भी महाराज की उपाधि धारण की थी।

नोट – श्री गुप्त एवं घटोत्कच गुप्त को संपूर्ण स्वतंत्र शासक नहीं माना गया है क्योंकि इन दोनो ने महाराज की उपाधि धारण की थी और उस समय महाराज की उपाधि सामन्तों को प्राप्त होती थी तथा पूर्ण स्वतंत्र शासक महाराजाधिराज की उपाधि धारण करते थे। चूंकि चंन्द्रगुप्त-1 ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी इसी कारण चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक माना गया है।

चन्द्रगुप्त प्रथम (319ई. – 334ई.)

  • यह गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक था।
  • इसने गुप्त वंश में महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
  • गुप्त वंश में सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाने वाला शासक यही था
  • चन्द्र गुप्त प्रथम ने ही गुप्त संवत् की स्थापना की थी।
  • चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया।

समुद्रगुप्त (335ई. – 380ई.)

  • समुद्रगुप्त को विसेट स्मिथ ने अपनी पुस्तक अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया में भारत का नेपोलियन कहा है।
  • उपाधियां – पराक्रमांक, अप्रतिरथ एवं व्याघ्रपराक्रम।

समुद्रगुप्त का विजय अभियान (5 चरण)

  • प्रथम चरण – अहिच्छत्र, चम्पावती एवं विदिशा सहित उत्तर भारत के 9 राज्य। यह आर्यावर्त राज्य प्रसभोद्वरण कहलाया।
  • द्वितीय चरण – पंजाब, सीमावर्ती राज्य एवं नेपाल।
  • तृतीय चरण – विंध्यक्षेत्र पर विजय।
  • चतुर्थ चरण – पल्लव, कोसल, कोट्टूर, महाकान्तर, कांची, वेंगी आदि सहित कुल 12 राज्यों पर विजय प्राप्त की। दक्षिण भारत पर यह विजय धर्म विजय कहलायी
  • पांचवां चरण – उत्तर पश्चिम भारत के कुछ विदेशी राज्यों पर विजय।

विजय अभियान को पूरा करने के बाद अश्वमेधयज्ञ करवाया एवं अश्वमेध पराक्रम की उपाधि ली। समुद्रगुप्त को उसके सिक्कों पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। समुद्र गुप्त को कविराज की उपाधि प्रदान की गयी है

चन्द्रगुप्त द्वितीय/चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य/देवगुप्त

  • उपाधियां – विक्रमांक, विक्रमादित्य, परमभागवत।
  • अन्य नाम – देवगुप्त, देवराज, देवश्री।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में गुप्त साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से पूर्व में बंगाल तक एवं उत्तर में हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक क्षत्रप रूद्रसिंह-3 को पराजित किया इस उपलक्ष में व्याघ्र शैली के चांदी के सिक्के चलाए एवं शकारि की उपाधि धारण की।
  • गुप्तकाल में चांदी के सिक्के चलाने वाला प्रथम शासक यही था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ही विक्रम संवत् की स्थापना की।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी यात्री फाह्यान आया था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजदरबार में 9 रत्न थे।

नो रत्न –

  • धन्वन्तरी – चिकित्सा क्षेत्र
  • घाटखर्पर – कवि
  • कालिदास – लेखक
  • वाराहमिहिर – खगोल शास्त्री
  • अमरसिंह
  • कक्षपनक – ज्योतिष
  • वररूचि – संस्कृत व्याकरण
  • वेतालभट्ट – मन्त्रशास्त्र
  • शंकु – शिल्प शास्त्र

चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन काल कला एवं साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है।

कुमारगुप्त

  1. कुमारगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
  2. उपाधि – महेन्द्रादित्य, श्री महेन्द्र, गुप्तकुल व्योमशशि, अश्वेमेध महेन्द्र।
  3. कुमार गुप्त की मुद्राओं पर गरूड के स्थान पर मयूर आकृति अंकित है।
  4. कुमारगुप्त प्रथम के शासन में नालंदा विश्वविधालय की स्थापना करवायी।
  5. कुमारगुप्त के सिक्कों पर कार्तिकेयन का अंकन मिलता है।

स्कन्दगुप्त (455 – 467)

  • उपाधि – क्रमादित्य
  • अन्यनाम – देवराय
  • स्कन्दगुप्त के शासन काल में प्रथम हूण आक्रमण हुआ जिसे स्कंदगुप्त ने विफल कर दिया।
  • स्कन्दगुप्त ने अपनी राजधानी अयोध्या में स्थानांतरित की थी।

स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारी

पुरूपुप्त – कुमारगुप्त द्वितीय – बुद्धगुप्त – नरसिंहगुप्त – भानुगुप्त।

भानुगुप्त (510 ई. )

  • इसकी जानकारी एरण अभिलेख से प्राप्त होती है।
  • भानुगुप्त का मित्र गोपराज, भानुगुप्त की ओर से हूणों से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ तथा गोपराज की पत्नि आग में जलकर सती हो गयी।
  • एरण अभिलेख में सतीप्रथा का पहला अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है।

विष्णुगुप्त -3 (540 – 550)

यह गुप्तवंश का अंतिम शासक था एवं इसके बाद गुप्त साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था।

रामगुप्त प्रकरण

गुप्त शासकों के रूप में रामगुप्त का नाम देवीचन्द्रगुप्तम, हर्षचरित, काव्यमीमांशा आदि ग्रंथों से प्राप्त होता है। यह समुद्रगुप्त के पश्चात् गद्दी पर बैठा परन्तु यह कायर शासक था। इसके समय में शक आक्रमण बढ़ गए थे जिसे इसने अपनी पत्नी ध्रुवदेवी को शाकाधिपति के लिए सौंपकर राज्य में शांति बहाल करने की कोशिश की। परन्तु रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय को इस बात की भनक लग गयी तथा स्त्री के वेश में ध्रुवदेवी के स्थान पर शक शिविर में गया तथा मौका पाकर शकाधिपति की हत्या कर दी। इसके बाद इसने अपने कायर भाई की भी हत्या कर दी तथा स्वंय गद्दी पर बैठा एवं ध्रुवदेवी से विवाह कर लिया।

गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण

  1. अयोग्य तथा निर्बल उत्तराधिकारी
  2. शासनक व्यवस्था का संघात्मक/विकेन्द्रित स्वरूप
  3. उच्च पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर आनुवांशिक।
  4. प्रांतीय शासकों को विशेषाधिकार प्रदान करना।
  5. बाह्म आक्रमण।

गुप्तकालीन प्रशासन

  • राजत्व का दैवीय उत्पत्ति सिद्धांत लोकप्रिय था।
  • राजपद वंशानुगत था परन्तु ज्येष्ठाधिकार की अटल प्रथा का अभाव था।
  • गुप्तकाल प्रशासन विकेन्द्रीकरण व्यवस्था पर आधारित अथवा संघात्मक था। प्रमाण: सामन्तों/प्रांत अधिकारियों को प्राप्त विशेषाधिकार।
  • राजा न्याय व्यवस्था का प्रधान होता था परन्तु विधि निर्माण का अधिकार सीमित था।
  • राजा का मुख्य कार्य जनता की एवं राज्य की सुरक्षा, वर्ण व्यवस्था कायम रखना तथा धर्म की रक्षा करना था।

केन्द्रीय प्रशासन एवं प्रांतीय प्रशासन

राजा

  • प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी
  • कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं सैन्य प्रधान।
  • विधि निर्माण का अधिकार नहीं।

देश/राष्ट्र

  • प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई
  • इसका शासक गोप्ता होता था

भुक्ति/प्रांत

  • देश भुक्तियों में बंटा हुआ होता था।
  • यहां कुमारमात्यों को नियुक्त किया जाता था।
  • यहां उपरिक नामक अधिकारी होता था।

विषय/जिला

  • प्रांतों का विभाजन विषय/जिलों में होता था।
  • इसका सर्वोच्च अधिकारी विषयपति था
  • विषयपति की सहायता श्रेष्ठि, सार्थवाह, कुलिक, कायस्थ करते थे

विधि/तहसील

विषय विधियों में बंटा होता था

पेठ

पेठ विधि से छोटी इकाई थी। गांवों का संघ।

ग्राम/गांव

  • गुप्त कालीन प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी।
  • इसका प्रधान महत्तर/मुखिया या ग्राम वृद्ध होता था।

गुप्त साम्राज्य के प्रशासनिक अधिकारी

  • महाबलाधिकृत – सेनापति
  • महादण्डनायक – न्यायाधीश
  • दण्डपाशिक – पुलिश विभाग का सर्वोच्च अधिकारी
  • सन्धि विग्रहिक – युद्ध तथा संधि से संबंधित विदेश मंत्र
  • विनयस्थिति – शिक्षा एवं धार्मिक मामलों का प्रधान
  • महाअक्षपटलिक – लेखा विभाग का सर्वोच्च अधिकारी
  • चौरोदरनिक – गुप्तचर विभाग का प्रधान।
  • अग्रहारिक – दान विभाग का प्रधान
  • भाण्डागाराधिकृत – राजकोष अधिकारी

गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था

कृषि

गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था।

भमि के प्रकार-

  • वास्तु भूमि – वास करने योग्य
  • अप्रहत – बिना जोती गयी भूमि
  • सदबल भूमि – घास मैदान वाली
  • औदिक – दलदल भूमि

राजस्व – भू राजस्व ही राज्य की आय का मुख्य साधन था। भू राजस्व कुल आय का 1/6 हिस्सा होता था।

विभिन्न प्रकार के कर

  • धान्य – अनाज में राजा का हिस्सा
  • भट्टकर – पुलिस कर
  • चाट – लुटेरों से बचाने के लिए दिया जाने वाला कर
  • प्रणय – अनिवार्य कर
  • विष्टि – बेगार कर
  • शुल्क – सीमा कर या बिक्री कर
  • बलि – यह एक धार्मिक कर था।
  • उपरि कर – यह उन रैयतों पर लगाया जताा था जो भूमि के स्वामी नहीं थे
  • भू राजस्व नकद तथा अनाज दोनों के रूप में वसूला जाता था।
  • हिरण्य सामुदायिक – नकद भू राजस्व वसूलने वाले।
  • औदरांगिक – अनाज के रूप में भू राजस्व वसूलने वाले।

गुप्तकालीन व्यापार

  • रोमन व्यापार का पतन
  • द. पू. एशिया एवं चीन के साथ व्यापार में वृद्धि।
  • आंतरिक व्यापार में कमी।

गुप्तकालीन समाज

गुप्तकालीन समाज की विशेषताएं

  • गुप्तकालीन समाज ब्राह्मणवादी था।
  • विभिन्न पेशेवर समूहों का जाति में ढलना
  • पुनरूत्थान के कारण उच्चवर्णो के विशेषाधिकारों का बल
  • वैश्यों की सामाजिक दशा में तुलनात्मक रूप में गिरावट
  • शूद्रों की सामाजिक दशा में सुधार

दास प्रथा

गुप्त काल में दास प्रथा प्रचलित थी तथा इस काल में दासों को मुख्यतः घरेलू कार्यो में लगाया जाता था। कारण – जनजातियों के आत्मसातीकरण के कारण श्रमिकों की पूर्ति, शूद्रों को कृषि कार्यो में लगाया जाना एवं भूमि दानों द्वारा दास प्रथा को कमजोर कर देना।

स्त्रियों की दशा

  • स्त्रियों की सामाजिक दशा में तुलनात्मक रूप से गिरावट आयी।
  • पर्दा प्रथा का प्रचलन हो चुका था।
  • बाल विवाह प्रथा एवं बहु विवाह प्रथा व्याप्त हो चुकी थी।
  • सती प्रथा का साक्ष्य एरण अभिलेख से प्राप्त हुआ है।
  • देवदासी प्रथा द्वारा मंदिर के पुजारियों द्वारा यौन शोषण बढ़ गया था।
  • गणिकाओं एवं वैश्यावृति में वृद्धि हुई।

कुछ सकारात्मक परिवर्तन

  1. स्त्रियों को सम्पत्ति संबंधि अधिकार दिए गए।
  2. पत्नि एवं पुत्रियों को सम्पति का उत्तराधिकारी बनाया गया।
  3. स्त्रियां प्राकृत भाषा का प्रयोग कर सकती थी।

गुप्तकाल में धार्मिक स्थिति

गुप्तकालीन धार्मिक व्यवस्था का मुख्य लक्षण – जटिलता एवं विविधता है। एक ओर ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के कारण यहां यज्ञ की पद्धति पुनर्जीवित हो रही थी वहीं जनजातीय तत्वों के प्रभावस्वरूप भक्ति की अवधारणा को प्रोत्साहन मिल रहा था। मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण हुआ। अवतार वाद की अवधारणा का उदय हुआ तथा ब्राह्मण धर्म के अन्तर्गत वैष्णव एवं शैव भक्ति का विकास हुआ। नव हिन्दु धर्म की शुरूआत भी इसी काल में हुई। इसके चलते वैष्णव धर्म सबसे प्रधान बन गया। शैव सम्प्रदाय को भी संरक्षण मिल गया।

भगवान हरिहर की मूर्ति

  • यह शैव एवं वैष्णव धर्म के समन्वय को दर्शाती है।
  • देवताओं के साथ देवियों को इसी काल में जोड़ा गया।
  • त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की संकल्पना इसी काल में विकसित हुई।
  • ब्राह्मणवाद के उत्थान के कारण धार्मिक कर्मकाण्डों में पुनः वृद्धि हुई।
  • मूर्ति पूजा का प्रभाव एवं भक्ति का प्रभाव बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म पर भी पड़ा तथा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी मूर्ति बनना शुरू हुआ।
  • मन्दिरों का निर्माण, भक्ति, कर्मकाण्ड, मूर्तिपूजा इस काल की प्रमुख विशेषता थी।

गुप्तकालीन स्थापत्य

  • गुप्तकाल को भारतीय कला एवं संस्कृति का स्वर्णयुग माना जाता है।
  • गुप्तकाल के प्रमुख मंदिर-
  • देवगढ़ का दशावतार मंदिर – ललितपुर (उत्तर प्रदेश)
  • तिगवा का विष्णु मंदिर – जबलपुर (मध्य प्रदेश)
  • एरण का विष्णु मंदिर – सागर (मध्य प्रदेश)
  • भूमरा का शिव मंदिर – सतना (मध्यप्रदेश)
  • नचना कुठार का पार्वती मंदिर – पन्ना (मध्य प्रदेश)
  • भीतर गांव का कृष्ण मंदिर – कानपुर (उत्तर प्रदेश)
  • नागोद का शिव मंदिर – सतना (मध्यप्रदेश)

गुप्तकालीन शिक्षा एवं साहित्य

गुप्तकालीन साहित्य की विशेषताएं

  • अधिकांश रचनाएं प्रेमप्रधान एवं सुखान्त होती थी।
  • रचनाओं में उच्च वर्ण के पात्र संस्कृत बोलते थे। शूद्र एवं महिलाएं प्राकृत भाषा बोलती थी।
  • नोट – सेक्सपियर एवं कालिदास की रचनाओं में मुख्य अंतर प्रेमगाथा के अंत का होता है। कालिदास की रचनाएं सुखान्त वाली हैं। जबकि सेक्सपियन की रचनाओं का अंत सुखद नहीं होता।
  • महाभारत एवं रामायण का अंतिम रूप से संकलन इसी काल में हुआ।

गुप्तकालीन रचनाएं

  • मालविकाग्निमित्रम – कालिदास – अग्निमित्र एवं मालविका की प्रणयकथा
  • अभिज्ञान शाकुन्तलम – कालिदास – दुष्यन्त एवं शकुन्तला की प्रेमकथा।
  • विक्रमोवर्षीयम – कालिदास – सम्राट पुरूरवा एवं उप्सरा उर्वसी की प्रेमकथा।
  • मुद्राराक्षसम् – विशाखदत्त – चन्द्रगुप्त मौर्य कालीन विश्लेषण व कथा।
  • देवीचन्द्रगुप्तम् – विशाखदत्त – चन्द्रगुप्त-2 द्वारा शक राजा का वध एवं ध्रुवदेवी (रामगुप्त की पत्नी) से विवाह।
  • मृच्छकटिकम् – शूद्रक – चारूदत्त एवं वसन्त सेना की प्रेमगाथा।
  • स्वप्नवासदत्तम् – भास – महाराजा उदयन एवं वासवदत्ता की प्रेम कथा।

अन्य रचनाएं

  1. कालिदास – ऋतुसंहार, मेघदूतम, कुमार सम्भवम, मालविकाग्निमित्रम, रघवंशम, अभिज्ञानशाकुन्तलम, विक्रमोर्वशीयम।
  2. दशकुमारचरित्र – दण्डिन, काव्यदर्शन-दण्डिन, अमरकोष -अमरसिंह
  3. ब्रह्मसिद्धांत – आर्यभट्ट, सूर्य-सिद्धांत – आर्यभट्ट, आर्यभट्टीयम – आर्यभट्ट।
  4. पंचतंत्र – विष्णुशर्मा, कामसूत्र – वात्स्यायन
  5. चरक संहिता – चरक, मृच्छकटिकम – शूद्रक
 https://www.careertutorial.in/study-material/bharat-ka-itihas/prachin-bharat/gupt-kaal-240-550ce/
 
 

गुप्तोत्तर काल

भारत के राजनीतिक इतिहास में गुप्त वंश के अंत के बाद विकेन्द्रीकरण एवं क्षेत्रीयता का आविर्भाव हुआ। गुप्त वंश के पश्चात् अनेक छोटे-छोटे राज्य बने जैसे – थानेश्वर का पुष्य भूति वंश, कन्नौज का मौखिरी वंश आदि मुख्य राज्य थे।

पुष्यभूति/वर्धन वंश

  • इस वंश की स्थापना थानेश्वर में पुष्यभूति द्वारा की गई। (थानेश्वर, हरियाणा)
  • ये संभवतः गुप्तों के सामन्त थे जिन्होंने मौका पाकर स्वतंत्र राज्य को स्थापित कर लिया ।
  • इस वंश की प्रारंभ में राजधानी थानेश्वर थी।
  • पुष्यभूति वंश के प्रभावशाली शासक था।

प्रभाकरवर्धन

  • वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन ही था।
  • प्रभाकर वर्धन ने परमभट्टारक एवं महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
  • यह इस बात का सबूत है कि यह एक स्वतंत्र एवं ताकतवर शासक था।
  • बाणभट्ट ने हर्षचरित्र में प्रभाकर वर्धन के लिए अनेक अलंकरणों का प्रयोग किया है। हूणहरिकेसरी, सिंधुराजज्वर, गुर्जरप्रजागर, सुगंधिराज आदि अलंकरण बाणभट्ट द्वारा दिए गए है।
  • अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखिरी शासक ग्रहवर्मन के साथ तय किया।

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राज्यवर्धन

  • प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम दिनों में हूणों का आक्रमण हुआ परन्तु प्रभाकरवर्धन युद्ध में जाने के लिए सक्षम नहीं था अतः उसका पुत्र राज्यवर्धन युद्ध के लिए गया किन्तु युद्ध के मध्य में ही प्रभाकरवर्धन का स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ गया। राज्यवर्धन युद्ध से वापस लौटा तो उनके पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।
  • इसी समय मालवा शासक देवगुप्त एवं बंगाल शासक-शशांक ने मिलकर कन्नौज के मौखिरी शासक गृहवर्मन (राज्यवर्धन के बहनोई) की हत्या कर दी एवं राज्यश्री को बंदी बना लिया।

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हर्षवर्धन

  • अन्य नाम – शिला दित्य
  • उपाधि – माहेश्वर, सार्वभौम व महाराजाधिराज।
  • हर्षवर्धन के गद्दी संभालते ही उसक सामने अपनी बहिन राज्यश्री को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती थी इसी क्रम में अपनी बहिन को देवगुप्त की कैद से छुड़ाने एवं अपने भाई तथा बहनोई की हत्या का बदला लेने हर्षवर्धन कन्नौज की तरफ बढ़ा परन्तु सूचना मिली की राज्यश्री देवगुप्त की कैद से भागकर विंध्य की पहाड़ीयों में चली गयी है। तो अब वह विंध्य की तरफ बढ़ने लगा।
  • बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र की सहायता से हर्ष ने राज्यश्री को खोज निकाला एवं सती होने से बचा लिया।
  • गृहवर्मन का कोई उत्तराधिकारी नहीं था अतः राज्यश्री की सहमति से हर्ष को कन्नौज का शासक बना दिया गया।
  • हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित कर ली।

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मौखिरी वंश (कन्नौज)

इस वंश का संस्थापक संभवतः गुप्तों का सामन्त था। क्योंकी इस वंश के प्रारंभिक 3 शासकों (हरि वर्मा, आदित्य वर्मा एवं ईश्वर वर्मा) को महाराज की उपाधि प्राप्त थी।

बाद के तीन शासकों (ईशान वर्मन, सर्ववर्मन एवं अवंतिवर्मन) को महाराजाधिराज की उपाधि प्राप्त हुई। अतः ईशान वर्मन इस वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं शक्तिशाली राजा प्रतीत होता है।

गुप्तवंश के पतन के बाद कन्नौज उत्तर भारत का शक्ति स्थल बना इसी कारण भारत का एकछत्र सम्राट बनने की होड में गुर्जर-प्रतिहार, पाल एवं राष्ट्रकूटों के मध्य एक लंबा त्रिदलीय संघर्ष चला।

मौखरी वंश के शासक – ईशानवर्मन, सर्ववर्मन, अवंतिवर्मन, ग्रहवर्मन, हर्ष (राज्यश्री के साथ), सुचंद्रवर्मन (अंतिम)।

कन्नोज के लिए त्रिदलीय संघर्ष

  • कारण – एकछत्र सम्राट बनने की इच्छा
  • गंगाघाटी एवं इसमें उपलब्ध कृषि एवं व्यापारिक संबंधित संमृद्ध संसाधनों पर नियंत्रण।
  • अन्य सामरिक महत्व के उद्देश्य।
  • संघर्ष में शामिल प्रमुख शासक
  • प्रतिहार वंश – वत्सराज, नागभट्ट-2, राम भद्र, मिहिर भोज, महेन्द्रपाल।
  • पाल वंश – धर्मपाल, देवपाल, विग्रहपाल, नारायण पाल।
  • राष्ट्रकूट – ध्रुव, गोविन्द-3, अमोघवर्ष-1, कृष्ण-2

तथ्य

कन्नौज पर स्वामित्व के लिए संघर्ष को शुरू पाल शासक धर्मपाल ने किया। इसके बाद प्रतिहार शासक इस संघर्ष में शामिल हुए। बाद में राष्ट्रकूट इस संघर्ष में कूदे।

 

प्रभाकरवर्धन (583 – 604 ई.)

  • उपाधि – महाराजाधिराज
  • पिता – आदित्यवर्धन
  • राजवंश – पुष्पभूति (वर्धन)
  •  मृत्यु – 604 ई.

वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकरवर्धन ही था।

प्रभाकर वर्धन ने परमभट्टारक एवं महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

यह इस बात का सबूत है कि यह एक स्वतंत्र एवं ताकतवर शासक था।

बाणभट्ट ने हर्षचरित्र में प्रभाकर वर्धन के लिए अनेक अलंकरणों का प्रयोग किया है। हूणहरिकेसरी, सिंधुराजज्वर, गुर्जरप्रजागर, सुगंधिराज आदि अलंकरण बाणभट्ट द्वारा दिए गए है।

अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रभाकरवर्धन ने अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखिरी शासक ग्रहवर्मन के साथ तय किया।

प्रभाकरवर्धन थानेश्वर का शासक था, जो पुष्यभूति वंश का था और छठी शताब्दी के अंत में राज्य करता था। प्रभाकरवर्धन की माता गुप्त वंश की राजकुमारी महासेनगुप्त नामक स्त्री थी।

अपने पड़ोसी राज्यों, मालव, उत्तर-पश्चिमी पंजाब के हूणों तथा गुर्जरों के साथ युद्ध करके प्रभाकरवर्धन ने काफ़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। अपनी पुत्री राज्यश्री का विवाह प्रभाकरवर्धन ने कन्नौज के मौखरि राजा गृहवर्मन से किया था।

प्रभाकरवर्धन की मृत्यु 604 ई. में हुई जिसके बाद उसका सबसे बड़ा पुत्र राज्यवर्धन उत्तराधिकारी बना।

पुष्यभूति वंश का प्रथम शासक था जिसने थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था। यह “प्रतापशील” के नाम से विख्यात था। इस वंश के शासकों में सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि प्रभाकरवर्धन ने ही धारण की।

इसकी मृत्यु के बाद इसकी पत्नी यशोमती सती हो गयी। यशोमती की तीन संतान थी – राज्यवर्धन, हर्षवर्धन, राज्यश्री। राजयश्री का विवाह मौखरि नरेश ग्रहवर्मा से हुआ था। देवगुप्त ने ग्रहवर्मा की हत्या कर दी और राज्यश्री को बंदी बना लिया। राज्यश्री को हर्षवर्धन विंध्याचल के जंगलों से बचाकर लाया।

 

राज्यवर्धन

प्रभाकरवर्धन के जीवन के अंतिम दिनों में हूणों का आक्रमण हुआ परन्तु प्रभाकरवर्धन युद्ध में जाने के लिए सक्षम नहीं था अतः उसका पुत्र राज्यवर्धन युद्ध के लिए गया किन्तु युद्ध के मध्य में ही प्रभाकरवर्धन का स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ गया। राज्यवर्धन युद्ध से वापस लौटा तो उनके पिता प्रभाकरवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी।

इसी समय मालवा शासक देवगुप्त एवं बंगाल शासक – शशांक ने मिलकर कन्नौज के मौखिरी शासक गृहवर्मन (राज्यवर्धन के बहनोई) की हत्या कर दी राज्यश्री बना लिया।

राज्यश्री (बहिन) को बंदी बनाए जाने तथा गृहवर्मन की हत्या की सूचना मिलते ही राज्यवर्धन देवगुप्त एवं शशांक से बदला लेने के लिए निकल पड़ा इसी क्रम में राज्यवर्धन ने देवगुप्त को हराया । शशांक ने राज्यवर्धन से मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए अपने शिविर में बुलाया और धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी। राज्यवर्धन की मौत की सूचना पाकर हर्षवर्धन ने थानेश्वर राज्य की बागडोर संभाली।

राज्यवर्धन थानेश्वर के शासक प्रभाकरवर्धन का ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने भाई हर्षवर्धन और बहन राज्यश्री से बड़ा था। 

तीनों बहन-भाइयों में अत्यंत प्रेम था। एक भीषण युद्ध के फलस्वरूप बंगाल के राजा शशांक द्वारा राज्यवर्धन का वध हुआ।

राज्यवर्धन की बहन राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि वंश के शासक गृहवर्मन से हुआ था। प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के पश्चात ही देवगुप्त का आक्रमण कन्नौज पर हुआ और एक भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया।

युद्ध में गृहवर्मन मालवा के राजा देवगुप्त के हाथों मारा गया और उसकी पत्नी राज्यश्री को बन्दी बनाकर कन्नौज के काराग़ार में डाल दिया गया।

सूचना मिलते ही राज्यश्री के ज्येष्ठ अग्रज राज्यवर्धन ने अपनी बहन को काराग़ार से मुक्त कराने के लिए कन्नौज की ओर प्रस्थान किया

राज्यवर्धन ने मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित करके मार डाला, किंतु वह स्वयं देवगुप्त के सहायक और बंगाल के शासक शशांक द्वारा मारा गया।

इस समय राज्य में व्याप्त भारी उथल-पुथल से राज्यश्री काराग़ार से भाग निकली और उसने विन्ध्यांचल के जंगलों में शरण ली।

बाद में राज्यवर्धन के उत्तराधिकारी सम्राट हर्षवर्धन ने राज्यश्री को विन्ध्यांचल के जंगलों में उस समय ढूँढ निकाला, जब वह निराश होकर चिता में प्रवेश करने ही वाली थी। हर्षवर्धन उसे कन्नौज वापस लौटा लाया और आजीवन उसको सम्मान दिया।

 

हर्षवर्धन (606-647 ई.)

  • जन्म – 590 ई.
  • राजवंश – वर्द्धन (पुष्यभूति)
  • शासनकाल –  606 ई.-647 ई.
  • मृत्यु – 647 ई.

हर्षवर्धन गुप्तोत्तर काल का शासक था। 606 ई. में हर्षवर्धन थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा। हर्षवर्धन के बारे में जानकारी के स्रोत है- बाणभट्ट का हर्षचरित, ह्वेनसांग का यात्रा विवरण और स्वयं हर्ष की रचनाएं।

हर्षवर्धन का अन्य नाम शिलादित्य था। हर्ष ने महायान बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया। हर्ष ने 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे तथा 643 ई. और 646 ई. में दो चीनी दूत उसके दरबार में आये। हर्ष ने 646 ई. में कन्नौज तथा प्रयाग  में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया।

हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दंत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किये। हर्षवर्धन भगवान् शिव का भी भक्त था। वह सैनिक अभियान पर निकलने से पूर्व रूद्र शिव की आराधना किया करता था।

हर्षवर्धन शासक के साथ साथ साहित्यकार भी था। उसने प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानंद तीन ग्रंथों (नाटक) की रचना की। बाणभट्ट हर्ष का दरबारी कवि था। उसने हर्षचरित, कादम्बरी तथा शुकनासोपदेश आदि कृतियों की रचना की।

मालवा के शासक देवगुप्त एवं गौड़ शासक शशांक ने, ग्रहवर्मन की हत्या करके कन्नौज पर कब्ज़ा कर लिया। हर्षवर्धन ने शशांक को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार करके उसे अपनी राजधानी बना लिया ।

हर्षवर्धन को बांसखेड़ा तथा मधुबन अभिलेखों में परम महेश्वर कहा गया है। ह्वेनसांग के अनुसार, हर्ष ने पड़ोसी राज्यों पर अपना कब्जा करके अपने नियंत्रण में कर लिया था।

दक्षिण भारत के अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है की हर्ष सम्पूर्ण उत्तरी भारत का मालिक था। हर्ष के साम्राज्य का विस्तार उत्तर में थानेश्वर (पूर्वी पंजाब) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तथा पूर्व में गंजाम से लेकर पश्चिम में वल्लभी तक फैला हुआ था।

भारतीय इतिहास में हर्ष का सर्वाधिक महत्त्व इसलिए भी है की वह उत्तरी भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट था, जिसने आर्यावर्त पर शासन किया।

हर्ष का शासन प्रबंध

राजा के दैवीय सिद्धांत का प्रचलन था, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि राजा निरंकुश होता था। वस्तुतः राजा के अनेक कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व होते थे, जिन्हें पूरा करना पड़ता था। हर्ष को एक प्रशासक एवं प्रजापालक राज्य के रूप में स्मरण किया जाता है।

नागानंद में उल्लेख आया है की हर्ष का आदर्श प्रजा को सुखी एवं प्रसन्न देखना था। केन्द्रीय शासन का जो नियंत्रण मौर्य युग में दिखाई देता है वह हर्ष युग में नहीं दिखाई देता। ह्वेनसांग के विवरण में हर्ष की छवि एक प्रजापालक राजा की उभरती है।

वहीँ राजहित कादम्बरी और हर्षचरित में उसे प्रजा का रक्षक कहा गया है। राजा को राजकीय कार्यों में सहायता देने के लिए एक मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गयी थी। मंत्रियों की सलाह काफी महत्व रखती थी।

राजा प्रशासनिक व्यवस्था की धुरी होता था। वह अंतिम न्यायाधीश और मुख्य सेनापति था। हर्ष के प्रशासन में अवंति, युद्ध और शांति का अधिकारी था। हर्ष की प्रशासनिक व्यवस्था गुप्तकालीन व्यवस्था पर आधारित थी।

बहुत से प्रशासनिक पद गुप्तकालीन थे, जैसे ‘संधिविग्रहिक‘ अपटलाधिकृत ‘सेनापति’ आदि। राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति, राष्ट्र में विभाजित था। भुक्ति का तात्पर्य प्रांत से था, विषय जिले के समान था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी।

महासामंत, महाराज, दौस्साधनिक, प्रभावर, कुमारामात्य, उपरिक आदि प्रांतीय अधिकारी थे। पुलिस विभाग का भी गठन किया गया था। चौरोद्धरजिक, दण्डपाशिक आदि पुलिस विभाग के कर्मचारी थे। हर्ष काल के अधिकारीयों को वेतन के रूप में जागीरें (भूमि) दी जाती थीं।

राज्य के विरुद्ध षड्यंत्र करने पर आजीवन कैद की सजा दी जाती थी। इसके आलावा अंग-भंग, देश निकाला, आर्थिक दण्ड भी लगाया जाता था। हर्ष ने अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक संगठित सेना का गठन किया था। सेना में पैदल, अश्वारोही, रक्षारोही और हरिन्तआरोही होते थे।

हर्षवर्धन की जानकारी के स्रोत

  • हर्ष चरित्र– लेखक बाणभट्ट ( 8 अध्याय )- इसे ऐतिहासिक विषय पर गद्यकाव्य लिखने का प्रथम प्रयास कहा जा सकता हैं।
  • कादम्बरी–लेखक बाणभट्ट- हर्षकालीन सामाजिक धार्मिक जीवन का वर्णन मिलता है।
  • हर्ष के ग्रन्थ (नाटक)– नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिका।
  • ह्वेनसांग पुस्तक– ‘सी-यू-की’
  • काओसेंग चुवान– चीनी यात्री इत्सिंग की भारत यात्रा का विवरण। इसने बौद्ध धर्म के गहन अध्ययन के लिए 672-688 ई. तक भर्मण किया था। उसने बताया कि भारत को आर्यदेश कहा जाता है।
  • बाँसखेड़ा ताम्रलेख (628 ई.), मधुबन ताम्रपत्र लेख (631 ई.) व पुलकेशिन-द्वितीय का ऐहोल का अभिलेख (634 ई.)
  • मुहरें-  नालन्दा से मिट्टी की व सोनीपत से तांबे की मुहरें मिली जिसमे हर्ष का पूरा नाम मिलता हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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