Modhera
वराहभैरव
प्राचीन काल से नेपाल तंत्र की भूमि
रहा है। शैव, शाक्त, वैष्णव आदि मतवादों के विभिन्न देवताओं के विशिष्ट
स्वरूपों की उपासना यहां होती आईं हैं। नेपाल के तांत्रिकों ने ‘भैरवीकरण’
की विशिष्ट प्रक्रिया का आलंबन करते हुएं ‘रहस्यमूर्ति’ की अवधारणा को जन्म
दिया। इन्हीं स्वरूपों में एक हैं वराहभैरव जिनकी अवधारणा वैष्णवमूर्ति के
भैरवीकरण से प्रकट हुईं। इन्हें क्रोडभैरव भी कहा जाता हैं ।
यह
वैष्णवस्वरुप षडाम्नाय में परिपूजित होता है। वराह उपासना में उच्चस्तरीय
साधकों को इस मूर्ति की साधना विधि प्रदान की जाती हैं । इनकी उपासना
प्रायः कौलाचार से होती है। इनकी उपासना से प्रबलतम शत्रुबाधा का नाश होता
है। साधक षटकर्म में पारङ्गतता प्राप्त कर लेता है।
वराहभैरव के छः
मुख हैं जो आगम के षड्स्रोत एवं षडाम्नाय के प्रतीक हैं। इनके छः मुख
श्रीभगवान् के षड्विध ऐश्वर्य का प्रतीक हैं। पांचरात्रसिद्धान्त के
अनुसार इनके छः मुख परवासुदेव (निर्वाणनारायण), वासुदेव, संकर्षण,अनिरुद्ध,
प्रद्युम्न तथा साम्ब का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके मस्तक पर मुकुट
विराजमान हैं। कर्णों में पुष्पकुण्डल हैं। कण्ठ एकावलीहार तथा प्रलंबित
वनमाला से शोभायमान है। वराहभैरव के अंक में द्विभुजा भूमिभैरवी का
अधिष्ठान हैं। देवी इनकी स्वात्रंत्यशक्ति का प्रतीक है। वराहभैरव की आठ
भुजाएं हैं जिनमें वे क्रमशः अंकुश, डमरू, शर, मूसल, मणि, धनुष तथा पाश
धारण करते हैं। एक हस्त देवी के श्रीस्कंध पर विराजमान हैं।अष्टभुजाएं
पाशाष्टक के नाश का प्रतीक है। वराहयामल शवासन पर विराजमान हैं।

कश्मीर की देवी-शारदा
त्र्यक्षाव्याघ्रनिविष्टतामुपगतारक्तांशुका शारदा
सूर्याचन्द्रमसौ शरंधनुरथो प्रासंवरंचाभयम् ।
देवी साच्छुरिकां सदैव दधती पूर्णेन्दुरम्यानना मालाकुण्डलभूषिणावतु परं सानः सदा शारदा ॥
महर्षि कश्यप की मानसपुत्री ‘कश्मीर’ प्राचीन काल से शास्त्रों के अध्ययन का केन्द्र रहीं हैं। आगामों की भूमि कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन काल से शारदा देवी की उपासना होती आई है। कश्मीर के ‘अद्वयवादी’ दर्शन हों या ‘द्वैतवादी’ सभी संप्रदायों में ‘वागीश्वरी’ का यजन होता आया है। कश्मीर के आचार्य शास्त्रव्याख्या प्रारम्भ करने से पूर्व गुरु, गणपति, वागीश्वरी तथा शास्त्र के अधिष्ठाता कल्पदेवता का याग किया करते थे।
‘………….भुवि उल्लिख्य संकल्प्य वा पद्माधारं चतुरश्रं
महामाहेश्वराचार्य अभिनवगुप्तकृत तन्त्रसार २०वां आह्निक
पद्मत्रयं पद्ममध्ये वागीशीं वामदक्षिणयोः गणपतिगुरू च पूजयेत् आधारपद्मे व्याख्येयकल्पदेवताम् ।… ‘
द्वैतवादी दर्शन में जहां मां शारदा का यजन ‘वागीश्वरी’ रूप में किया जाता था जो वैदिकों की सरस्वती से भिन्न स्वरूप था । कई लोग कश्मीर की शारदा और वैदिक देवी सरस्वती को अभिन्न मानते है जो समुचित नहीं है। देवी के दोनों स्वरूपों में भेद है। मां शारदा का ध्यान, मंत्र, आवरण आदि सरस्वती से भिन्न है। कश्मीर देश में शारदाकल्प के अनुसार इनकी पूजा हुआ करती थीं। कुछ विद्वान् इन्हें कश्मीर की लोकदेवी अथवा क्षेत्रीय देवी मानते है।
अद्वयवादी दर्शन में मां शारदा का यजन ‘वाग्वादिनीकाली’ अथवा ‘वागीश्वरीकाली’ के रुप में किया जाता था। इनके भैरव ‘विजयेश्वर’ है। कश्मीर की कई प्राचीन तथा अर्वाचीन पद्धतियां इस तथ्य की साक्षी हैं , इन ग्रन्थों में वाग्वादिनीकाली के रुप में ही शारदा का ध्यान प्राप्त होता है।
पद्माधिरूढां सुसितां त्रिनेत्रां शूलाक्षमाले कमलं च खड्गाम् ।
वाग्वादिनीकालीकल्पे
करैश्चतुर्भिः पतितो वहन्तीं सरस्वतीं सिद्धिकरीं नमामि ॥
समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाली, संविदरस से परिपूर्ण, देवी शारदा पद्म पर आसीन हैं । इनकी कांति श्वेतवर्ण की है, देवी एकवक्त्रा तथा त्रिनेत्रा हैं जो अपनी चारों भुजाओं में त्रिशूल, अक्षमाला, पद्म तथा खड्ग धारण करती हैं।
देवी का त्रिनेत्रा होना, शूल तथा खड्ग धारण करना इनके कालीत्व की ओर संकेत करता है। प्राचीन पद्धतियों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि इनकी उपासना जयद्रथयामल के चतुर्थषटक के अंतर्गत आने वाले ‘वाग्वादिनीकालीकल्प‘ तथा ‘पुस्तकवागीश्वरीकल्प‘ के आधार पर हुआ करती थीं। देवी का यह स्वरूप सामान्य सरस्वती अथवा दक्षिणभारत के श्रृंगेरी में पूजित शारदा स्वरूप से पूर्णतया भिन्न है।
मां शारदा के स्वतन्त्र उपासना सम्प्रदाय का केन्द्र था ‘शारदापीठ’। शारदापीठ का उपपीठ कुलग्राम ( वर्तमान कुलगाम) में था। इनके भैरव विजयेश्वर का भी एक मन्दिर है जो वर्तमान कश्मीर के बिजबिहारा में स्थित है।

६टीं से १२वीं तक शारदापीठ शास्त्रों के अध्ययन तथा अध्यापन का
मुख्य केन्द्र रहा। यहां देवी का त्रिकाल यजन ‘कौलाचार’ से हुआ करता
था।प्रातः देवी की पूजा ‘वाग्वादिनीकाली’ के रुप में होती थी वहीं सायंकाल
में ‘पुस्तकवागीश्वरी’ रुप में इनका यजन होता था। महानिशा के समय
‘कुलवागीश्वरी’ रुप में इनका अर्चन होता था।
शारदापीठ के उपपीठ कुलग्राम में केवल कुलवागीश्वरी का यजन होता था। यह पीठ कुलगाम अभी भी मंदिर के रूप में विद्यमान हैं। यहां आधिकारी साधकों को कुलागाम तथा कुलप्रक्रिया का अध्ययन करवाया जाता था।

कालांतर में जड़ब्रह्मवादियों द्वारा हठात् कौलाचार के अनुसार मां शारदा की पूजा को रुकवा दिया गया और पशुभाव पर आधारित पाश्वकल्पानुसारीपूजा को प्रारम्भ किया । आकरण कौलाचार की विधि को भग्न करनें से देवी शारदा कुपित हो गईं। देवीकोप के कारण शनै शनैः शारदापीठ का तिरोधान हो गया और कश्मीर पर यवन मलेच्छों का आधिकार हो गया। शारदापीठ का भग्न मन्दिर आज भी इसकी साक्षी देता है।

जड़ब्रह्मवादियों की उद्दण्डता के कारण कुलमार्ग के साधकों द्वारा देवीचैतन्य को कुलग्राम के कुलवागीश्वरी पीठ में समाहित कर दिया गया। एक लम्बे समय तक यहां कुलाचार द्वारा देवी कुलवागीश्वरी का यजन किया जाता रहा परन्तु काल के प्रभाव से यहां भी परम्परा का उच्छेद हो गया साक्षीरूप में पीछे छुट गया देवी कुलवागीश्वरी का मन्दिर।
श्रीविजयेश्वर भैरव युत भगवती वाग्वादिनीकाली
को नमस्कार कर लेख उन्हीं के चरणों में अर्पित करते हैं।
विजयेश्वरसंयुक्तां काश्मीरे वाग्विधायिनीम् ।
विद्यापीठेश्वरीं वन्दे शारदां बुद्धिवर्धिनीम् ॥
॥ ग्रहमण्डल ॥

नेपालीय परम्परा में नवग्रह के यजन में यह मंडल प्रयुक्त किया जाता है। नेवार समुदाय के वज्राचार्य इस मंडल का उपयोग ग्रहपूजा में करते हैं।
śrī Porkkali

In the mysterious land of Kerala goddess
Bhadrakālī is invoked in a number of regional forms. Instead of typical
temple rituals (Tantrapaddhati), these divinities are adored with the
folk śākteya rituals.
śrī Porkkali is a regional form of Bhadrakālī venerated by warriors from a number of castes.It
is believed that she is the incarnation of Bhadrakālī who came with
great ferocity (kali) for killing in battle (por). Which is why she’s
named Porkkali.
śrī Porkkali is usually invoked in aniconic form.Nandakam/ Bhadrātmaja sword depict her present during rituals.
Many
temples have a theyyam for her. Porkkali theyyam is a great theyyam
with a long crown and facial apex. She is portrayed holding sowrd and
sheild.
She’s dressed in a large crown of snakes. Her dress is red.
A number of śākteya practitioners invoke her to subjugate the enemy. A typical śākteya blood sacrifice (gurūthi) is offered to delight her.Typically bhāṣā mantras are used in her rituals.She is invoked by chanting the malayāla mantra.
To receive her blessings, you must worship the goddess Porkkali on the evening of Tuesdays and Fridays.She should be invoked in a lamp or sword. She should be offered red flowers, red sandalwood paste and red fabrics.Lamp,incense and steamed red rice should be offered to her.Then with one pointedness, he should recite her mantra 108 times. The ritual must be pursued until the desired results are achieved.

॥ śrī Porkkali Mantram ॥
Brahmā ṛṣiḥ। anuṣṭup chandaḥ। śrīPorkkalidevatā ।
śrī
mahālakṣmi svāhā ṭhaṃ ṭhaṃ caṇḍapracaṇḍayoginī sarvvaśatrukkaleyuṃ
veṭṭi niṇattekkuṭīcca niṇamenti nilkka svāhā rudhiranadiyil ninnuṃ
asuradahanamūrti mātṛharī asuravadanacaṇḍī duṣṭanigrahārī caṇḍī
ripumadhukaiṭabhārī śulakapāladhārī vaṭukadaṃṣṭradhārīdhārī kalapulī
carmadhārī vetālī karālī gaurī gaṅkārī gaṃ namāmi oṃ namo bhagavati kālī
kālī rudhirakoḍuṅkālī kālī raktachāmuṇḍī kālī āyiraṃ kālīyamme
śrīPorkkali duṣṭanigraha hūm phaṭ svāhā॥
श्रीस्वच्छंदभैरव
भैरवागमों में वर्णित नाना भैरवमूर्तियों
में ‘स्वच्छंदनाथ’ का प्राधान्य है। इनकी उपासना विशेष रुप से कश्मीर देश
में होती थी। दक्षिणस्रोत के आगमों में ‘स्वच्छभैरवतन्त्र’ का प्राधान्य
है। स्वच्छंदभैरवनाथ के आठ स्वरुप प्रधान है । इन आठ स्वरूपों का सम्बंध
विविध स्रोत, आम्नाय तथा दीक्षा क्रमों से है। विभिन्न परंपराओं में इन आठ
स्वरूपों की उपसाना की जाती है।
१. निष्कलस्वच्छन्दभैरव
२. सकलस्वच्छन्दभैरव
३. ललितस्वच्छन्दभैरव
४. कोटराक्षस्वच्छन्दभैरव
५. महास्वच्छन्दभैरव
६. व्याधिभक्षस्वच्छन्दभैरव
७. शिखास्वच्छन्दभैरव
८.वृद्धस्वच्छन्दभैरव

परवर्ती आम्नायक्रम के अनुसार निष्कल,सकल,कोटराक्ष,व्याधिभक्ष तथा महास्वच्छन्द
स्वरूपों
की साधना दक्षिणाम्नाय से होती है। ललितस्वच्छन्द तथा शिखास्वच्छन्द
पश्चिमाम्नाय में पूजित हैं। वृद्धस्वच्छन्दनाथ उत्तराम्नाय तथा
दक्षिणाम्नाय उभय आम्नायों में उपासित होते हैं।
वर्तमान में भी साधक समाज अपनी- अपनी परम्परा के अनुरूप स्वच्छंदभैरवनाथ का यजन करते हैं। वर्तमान काशमीरक (काश्मीर देश के ब्राह्मण) पूर्वाचार्यों की परिपाटी के अनुरूप मृत्तिका के विशेष लिंग अथवा चललिंग में स्वच्छंददेव का अर्चन शिवरात्रि पर्व (हैरत) पर किया करते हैं।
वस्तुतः दीक्षा आदि के समय पंचवर्ण की रज से मण्डल बनाकर उसमें स्वच्छंददेव का यजन किया जाता था । स्वच्छतन्त्र ९.१२-१६ में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। नवतत्त्व दीक्षा के उपलक्ष्य में नवनाभमण्डल अंकित किया जाता था। विकल्प से इनका अर्चन स्वयंभू लिंग में किया जा सकता है। विशेष ‘ श्रीमद् स्वच्छंद’ में देखना चाहिए।
( क्रमशः)


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